शिक्षा में अनुशासन आवश्यक, शिक्षा सभी के लिए आवश्यक है: निवेदिता भिड़े

वनिता वसन्त

निवेदिता भिडे समाजसेवा के क्षेत्र में एक नाम है जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लिए अर्पित कर दिया। जब वे स्कूल में पढ़ती थी उसी वक्त से उनके अन्दर भाव जगा था कि उन्हें देश और समाज के लिए कुछ करना है। बार-बार पिता से जिद करती थीं कि उन्हें समाज के लिए कार्य करना है। पिता को भी लगा था कि थोड़ी बड़ी होगी तो उसकी इच्छा में परिवर्तन आ जाएगा इसलिए उसे आश्वस्त किया था कि जैसे ही वह स्नातक करेगी उसे सेवा के क्षेत्र में जाने की इजाजत दे दी जाएगी। यह बात कच्चे मन में बैठ गई। समय बीता पर उसके साथ मन में बैठी इच्छा और अधिक बलवती हो गई। जिस दिन स्नातक स्तर का अन्तिम पर्चा देकर घर पहुंची तो सीधे जाकर कहा कि अब मुझे ले चलो। उसकी जिद के कारण उसे विवेकानन्द केन्द्र कन्या कुमारी से जुड़ीं। एकनाथ रानाडे ने उनकी प्रतिभा पहचान ली थी। समय के साथ ही उनका ग्रामीण क्षेत्रों में काम किया। उनके सेवा कार्य को मान्यता देते हुए उनका नाम पद्मश्री के लिए घोषित किया गया। इसके बाद कोलकाता में आई निवेदिता से वरिष्ठ पत्रकार वनिता वसन्त ने बातचीत की…पेश हैं प्रमुख अंश –

नारी शिक्षा और देश का विकास
नारी शक्ति का प्रतीक है। नारी सशक्तिकरण की बात कहते है वह स्वयं ही शक्ति स्वरूपा है उसको शक्ति देने वाले हम कौन ? हमें केवल उसको सही शिक्षा में आ रही अड़चनों को दूर करना है। उनके अन्दर के सारे गुण के विकास के मार्ग में आने वाली बाधा को दूर करना है। बस हमारा काम इतना ही है। उसके अन्दर की शक्ति अपने आप प्रकट होगी। यह कहना है विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की उपाध्यक्षा पद्मश्री निवेदिता भिडे का। कुछ बातें साझा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि महिलाओं का विकास ही राष्ट्र और समाज के विकास की सीढ़ी है। उनको छोडक़र न घर चल सकता है और न देश। निवेदिता ने कहा कि महिलाएं सिर्फ व्यक्ति नहीं है वह किस परिवार व समाज का अंग, किसी राष्ट्र का अंग है। ऐसे में यदि वह सोचती है कि मैं, मेरा विकास या मैं जीवन में आगे बढ़ू तो क्यों बढ़ूँ इसलिए बढ़े ताकि परिवार का, मेरे समाज का मेरे राष्ट्र का अच्छा करने के लिए आगे बढ़ूं पर दुखद है कि यह भाव मन में नहीं आता। हम अभी माई च्वाएश की तर्ज पर आगे बढ़ रहे है यानी मैं चाहे यह करु मैं चाहे वह करु मेरी मर्जी। चाहे वह कपड़े पहनने हो, खाना हो या फिर संबंध बनाना हो सिर्फ इच्छा पर केन्द्रित हो गया है। ऐसा आत्मकेन्द्रित व्यक्ति भोगवाद को जन्म देता है। भोगवाद से हम अपने ही इंद्रियों के गुलाम बन कर रह जाते हैं। इससे जीवन में जो योगदान वह कर सकते थे वह नहीं कर पाते। शिक्षा हो या नारी सशक्तिकरण दोनों ही परिपेक्ष्य में चिन्तन होना चाहिए वैसा हो नहीं रहा है।
शिक्षा व उसका परिवेश
हर एक व्यक्ति के अन्दर जो श्रेष्ठता है, अच्छाई है उसका प्रकटीकरण ही शिक्षा है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें मनुष्य को स्वयं पर नियन्त्रण करने की क्षमता आनी चाहिए। जैसे विवेकानन्द कहते है प्रत्येक आत्मा सुप्त ईश्वरत्व है। उसका प्रकटीकरण करना अनुभूति करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसलिए शिक्षा में अनुशासन आना चाहिए। हमें दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए वह आना चाहिए। चाहे लडक़ी हो चाहे लडक़ा हो दोनों को ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है। आज के समय के शिक्षण में नियन्त्रण, अनुशासन आता ही नहीं है। ज्यादा से ज्यादा स्वयं का विचार करो, स्व केन्द्रित बनो। मेरा क्या है, मेरा विकास तक ही सोच रहे है। यदि हम एक बार यह विचार करे की हम इस परिवार का, समाज का, राष्ट्र का, देश का अंग है। उसके प्रति भी हमारा कत्वर्य है। मैं समाज में रहता हूं तो हमारे व्यवहार खुद बु खुद अच्छा ही होगा क्योंकि यदि हम उसे अंग मान रहे है तो समाज की बुराई के लिए कुछ गलत कदम नहीं उठाएंगे। यदि समाज का अंग हूं और यदि मैं गलत करता हूं तो समाज बिगड़ेगा और समाज बिगड़ेगा तो मैं उसका अंग होने के नाते हमारा जीवन भी कही न कही प्रभावित होगा।

पाठ्यक्रम में बदलाव
पाठ्यक्रम में बदलाव लाने से बदलाव आएगा ऐसा मुझे नहीं लगता। पर बदलाव से सब ठीक हो जाएगा यह जरूरी नहीं है। क्योंकि घर का वातारण भी योग्य होना चाहिए। हमारा पाठ्यक्रम सही नहीं था फिर भी समाज काफी हद तक चल रहा है उसका कारण हमारे घर के संस्कार थे। लेकिन वह भी कम होते जा रहे हो तो पाठ्यक्रम ठीक करने से कुछ होगा नहीं। मान लीजिए पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप की कहानी है जिसे शिक्षक बेमन से पढ़ा रहा है उसमें महाराणा प्रताप के हृदय में प्रति भाव नहीं है वह भाव वह बच्चों तक प्रसारित नहीं करेगा। वह सिर्फ जानकारी प्रेषित करेगा। हमारे समाज में ऐसे भी शिक्षक है जो पूरे मनोयोग और पूरे भाव के साथ बच्चों को पढ़ाते है पर हमारे समाज में उनको एक्नोलेज, सम्मान नहीं किया जाता। उनको समझा नहीं जाता। ऐसे शिक्षिक जो मूल्य बोध देते है उन्हें आगे लाना और पाठ्यक्रम में थोड़ा बदलाव लाया जा सकता है। परिवेश और संस्कार ठीक रहे तभी शिक्षा अपने आप में सम्पूर्ण होगी।
मानव जीवन का लक्ष्य
मानव जीवन को पशु जीवन से ऊपर उठना फिर मानव जीवन से खुद को उससे ऊपर उठाना यानी फिर दैवीय व ईश्वरीय स्तर तक ऊपर उठाना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है तभी तो हम विकास की ओर जाएगा जिसे हम आत्मविश्वास कहते है मनुष्य में थोड़ा उच्च प्रकार का व्यवहार अपेक्षित है। इंस्टीग्टि बेस नहीं है। मनुष्य इंटेलिक्ट बेस है। तर्क से अपने जीवन का प्रयोजन समझते समझते वह जो कार्य करता है जिससे आखिर उसमें अन्तप्रेरणा भी आती है। तो वह अन्तरप्रेरणा जागृत करना भी शिक्षा का भी इम्पावरमेंट का गी हेतू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सभी अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर बनाना चाहते है जिस दिन हम उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर जोर देंगे उस दिन समाज की बहुत सारी समस्याएं खत्म हो जाएगी। जब हम राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है उसका अर्थ है कि राष्ट्र मैं सभी को सही शिक्षा, भोजन, मेडिकल आदि की मूलभूत अवसरंचना हो। यदि सिर्फ बाहरी विकास पर ही ध्यान देना है तो राष्ट्र को राष्ट्र ही है बोल नहीं कह सकते है। जैसे ग्रीस है पुराने पुरखो की ही पीढिय़ां है। अवसंरचना है पर ग्रीस संस्कृति नहीं है। इसलिए पुरातन राष्ट्र चला गया। राष्ट्र का पुनउत्थान कहते है तो स्वामीजी तो उसका आशय यह है कि हर राष्ट्र का कोई विशेषता होती है। जो सारे मानव समाज के विकास के लिए आवश्यक होती है। हर राष्ट्र को कुछ न कुछ योगदान करना है। हमारे राष्ट्र को आत्मीयता पर आधारित परिवार कैसे होता है, समाज कैसा होता इसी आत्मीयता के कारण ही विविधता के कारण ही एक साथ रहने की एक साथ कैसे रह सकते है। यह हमारा ही राष्ट्र सीखा सकता है क्योंकि यह ताकत हमारे राष्ट्र में है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि विविधता के साथ कैसे एक साथ होकर रहा जा सकता है तो वह केवल भारत ही सीखा सकता है। यह सत्य है।

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