कोलकाता : साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता सुप्रसिद्ध बांग्ला लेखक दिव्येंदु पालित का उम्र संबंधी बीमारी के चलते यहां निधन हो गया। परिवार ने बताया कि पूर्वाह्न 11 बजे जाधवपुर के एक निजी अस्पताल में 79 वर्षीय लेखक ने अंतिम सांस ली। उनके परिवार में एक बेटा है। उनकी पत्नी का पहले ही निधन हो चुका है। पालित को उनके उपन्यास ‘अनुभब’ के लिए 1998 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिया गया था। उम्र संबंधी बीमारियों के चलते वह पिछले तीन साल से अपने घर में ही रहते थे।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट किया, ‘‘वरिष्ठ लेखक दिव्येंदु पालित का चला जाना बेहद दुखद है। मेरी शोक संवेदना उनके परिवार के साथ है।’ दिव्येंदु पालित का जन्म बिहार के भागलपुर में 1939 में हुआ था और उन्होंने जाधवपुर विश्वविद्यालय से तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन किया था। उनकी पहली लघुकथा ‘छन्दोपातन’ का प्रकाशन 1955 में हुआ था।
बांग्ला लेखक दिव्येंदु पालित का निधन
5 साल का बाल मज़दूर, जिसे कभी कैलाश सत्यार्थी ने बचाया था, बना रेप पीड़ितों का वकील
23 वर्षीय अमर लाल कभी भी वकील बनने का अपना सपना पूरा नहीं कर पाते यदि नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी न होते। आज अमर लाल नोएडा में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। बाल मज़दूरी के शिकार, अमर को पाँच साल की उम्र में सत्यार्थी के बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के ज़रिये बचाया गया था। तब से उनके जीवन में लगातार बदलाव आया है।
“जब भाईसाहब जी (कैलाश सत्यार्थी) ने मुझे देखा तो मैं एक टेलीफोन पोल को ठीक करने के लिए काम कर रहा था। मैं पाँच साल का था जब मुझे बचपन बचाओ आंदोलन ने छुड़वाया था। मैं एक वकील बनकर समाज की भलाई के लिए अपना योगदान देना चाहता हूँ,” अमर ने डेक्कन हेराल्ड को बताया। सत्यार्थी ने जिन भी बच्चों का जीवन संवारा है, वे सब उन्हें प्यार से ‘भाईसाहब जी’ बुलाते हैं। सत्यार्थी ने हाल ही में बहुत गर्व के साथ अमर के बारे में सोशल मीडिया पर साझा किया।
उन्होंने ट्वीट किया, ”आज, मेरा बेटा अमर लाल एक 17 साल की रेप सर्वाइवर के लिए अदालत में खड़ा हुआ। इस युवा वकील के माता-पिता के रूप में यह हमारे लिए गर्व का क्षण है, जिसे हमने 5 साल की उम्र में बाल मज़दूरी से बचाया था। अपनी पढ़ाई पूरी करने तक अमर बाल आश्रम में रहा। अभी और आगे जाना है।”
अमर अपने परिवार से पहले सदस्य है, जो पढ़-लिख कर यहाँ तक पहुंचे है। उन्होंने बताया, “हम बंजारा समुदाय से आते हैं। हमेशा एक जगह से दूसरी जगह पर पलायन करते रहने की वजह से हमें कभी भी स्कूल जाने का मौका नहीं मिल पाता है।”अमर मूल रूप से राजस्थान से हैं। वकालत की डिग्री हासिल कर, अमर रेप पीड़ितों के लिए लड़ना चाहते हैं।
ऐसी ही एक कहानी किंसु कुमार की है, जिसे बीबीए ने आठ साल की उम्र में दिसंबर 2003 में बचाया था। किंसु अब राजस्थान में बी.टेक के छात्र हैं और एक दिन आईएएस अधिकारी बनने का सपना देखते हैं। किंसु कभी मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश) में गाड़ियों को धोने का काम करते थे। उन्हें भी दूसरों की तरह बाल मज़दूरी का शिकार होने से बचाया गया था।
2016 में ‘सेव द चिल्ड्रन’ द्वारा किये गये सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लगभग 380.7 लाख़ लड़के और 80.8 लाख़ लड़कियाँ बाल मज़दूरी के शिकार हैं। लेकिन इसके खिलाफ़ एक मुहीम छेड़ते हुए, सत्यार्थी के बचपन बचाओ आंदोलन ने 87,000 से भी अधिक बच्चों को विभिन्न तरीके के उत्पीड़न और शोषण से मुक्त करवाया है।
(साभार – द बेटर इंडिया )
सामाजिक समरसता का प्रतीक मकर संक्रांति और ‘उत्तरायण’
देश के प्रमुख त्योहारों में से एक मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाती है. लेकिन कभी-कभी ये त्योहार 13 या 15 जनवरी को भी हो सकता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूर्य कब धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। इस दिन से सूर्य की उत्तरायण गति की शुरुआत होती है, इसी वजह से इसको ‘उत्तरायणी’ भी कहते हैं। आइए जानते हैं, भारतीय समाज में आखिर क्यों मकर संक्रांति का इतना महत्त्व है।
जुड़ी हैं कई पौराणिक कथाएं
कहा जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर लंबे समय से देवताओं और असुरों के बीच जारी युद्ध के समाप्ति की घोषणा की थी। साथ ही सभी असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था। इस तरह यह दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन भी माना जाता है।
यह भी कहा जाता है कि गंगाजी को धरती पर लाने वाले राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी राजा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं इसलिए मकर संक्रांति पर देश भर में कई जगहों पर गंगा किनारे गंगा सागर में मेला लगता है।
यशोदा जी ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था, तब सूर्य देवता उत्तरायण हो रहे थे और उस दिन मकर संक्रांति थी। कहा जाता है तभी से मकर संक्रांति व्रत का प्रचलन शुरू हुआ। महाभारत में भी इसी दिन का उल्लेख किया गया है, क्योंकि भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन प्राण त्यागे थे और मोक्ष प्राप्त किया था। इससे पहले वे बाणों की शैया पर कष्ट सहते हुए उत्तरायण का इंतजार करते रहे।
मान्यता है कि दक्षिणायन अंधकार की अवधि है, इसलिए उस वक्त मृत्यु होने पर मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। वहीं, सूर्यदेव का उत्तरायण होना शुभ माना जाता है, क्योंकि यह प्रकाश की अवधि होती है इसलिए भीष्म पितामह ने शरीर त्याग करने के लिए इसी दिन को सबसे उपयुक्त माना.इस पर्व से जुड़ी एक पुरानी मान्यता यह भी है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने बेटे शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।
पर्व एक, मनाने की विधियां अनेक
भारत के अलग-अलग प्रदेशों में मकर संक्रांति के पर्व को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। हर प्रांत में इसका नाम और मनाने का तरीका अलग-अलग होता है।आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक में इसे केवल संक्रांति कहा जाता है और तमिलनाडु में इसे पोंगल पर्व के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में इस समय नई फसल का स्वागत किया जाता है और संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी पर्व के तौर पर मनाया जाता है।
वहीं असम में बिहू के रूप में इस पर्व को उल्लास के साथ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम, प्रयाग में सभी देवी-देवता अपना स्वरूप बदलकर स्नान के लिए आते हैं इसलिए मान्यता है कि इस दिन गंगा और दूसरी पवित्र नदियों में स्नान करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है।
अलग-अलग प्रांतों और मान्यताओं के हिसाब से इस पर्व के पकवान भी अलग-अलग होते हैं, लेकिन उत्तर भारत में दाल और चावल से बनी खिचड़ी इस पर्व की प्रमुख पहचान बन चुकी है। खासतौर से गुड़ और घी के साथ खिचड़ी खाने का विशेष महत्व है।
इसके अलावा, मकर संक्रांति के पर्व में तिल और गुड़ का भी बेहद महत्व है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर तिल का उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। इसके अलावा तिल और गुड़ के लडडू और इनसे बने कई तरह के पकवान भी बनाए जाते हैं और एक-दूसरे को भेंट किये जाते हैं। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में दही-चूड़ा और तिल के पकवान खाने और खिलाने का रिवाज है।
महादेवी वर्मा की दो देशभक्तिपरक कविताएं

मस्तक देकर आज खरीदेंगे हम ज्वाला
मस्तक देकर आज खरीदेंगे हम ज्वाला!
जो ज्वाला नभ में बिजली है,
जिससे रवि-शशि ज्योति जली है,
तारों में बन जाती है,
शीतलतादायक उजियाला!
मस्तक …
फूलों में जिसकी लाली है,
धरती में जो हरियाली है,
जिससे तप-तप कर सागर-जल
बनता श्याम घटाओं वाला!
मस्तक …
कृष्ण जिसे वंशी में गाते,
राम धनुष-टंकार बनाते,
जिसे बुद्ध ने आँखों में भर
बाँटी थी अमृत की हाला!
मस्तक …
जब ज्वाला से प्राण तपेंगे,
तभी मुक्ति के स्वप्न ढलेंगे,
उसको छू कर मृत साँसें भी
होंगी चिनगारी की माला!
मस्तक देकर आज खरीदेंगे हम ज्वाला!
ध्वज गीत: विजयनी तेरी पताका!

विजयनी तेरी पताका!
तू नहीं है वस्त्र तू तो
मातृ भू का ह्रदय ही है,
प्रेममय है नित्य तू
हमको सदा देती अभय है,
कर्म का दिन भी सदा
विश्राम की भी शान्त राका।
विजयनी तेरी पताका!
तू उडे तो रुक नहीं
सकता हमारा विजय रथ है
मुक्ति ही तेरी हमारे
लक्ष्य का आलोक पथ है
आँधियों से मिटा कब
तूने अमिट जो चित्र आँका!
विजयनी तेरी पताका!
छाँह में तेरी मिले शिव
और वह कन्याकुमारी,
निकट आ जाती पुरी के
द्वारिका नगरी हमारी,
पंचनद से मिल रहा है
आज तो बंगाल बाँका!
विजयनी तेरी पताका!
(साभार – हिन्दी कविता)
हैंडसम दाढ़ी लुक चाहिए, तो अपनाएं ये तरीके
लड़कों में आजकल दाढ़ी बढ़ाने का चलन बढ़ गया है। पहले जहाँ क्लीन शेव चेहरे को आकर्षक माना जाता था, वहीं आजकल हल्की या घनी दाढ़ी का जमाना है। भरे हुए चेहरों पर अक्सर घनी दाढ़ी कूल लगती है। लेकिन कई लोगों के साथ समस्या ये होती है कि उन्हें दाढ़ी घनी नहीं आती है या उतनी घनी नहीं आती है, जितनी उनके लुक के लिए जरूरी होती है। ऐसे में अगर आप कुछ आसान टिप्स को आजमाएं, तो आप भी कुछ दिन में पा सकते हैं हैंडसम दाढ़ी वाला लुक।
ये हैं दाढ़ी बढ़ाने के लिए जरूरी विटामिन्स
स्वास्थ्य की तरह बालों की ग्रोथ में भी विटामिन का अहम रोल होता है। इसलिए अपने नियमित आहार में विटामिन बी को शामिल करें। विटामिन बी1, बी6 और बी12 भी बालों को जल्दी बढ़ाने में मदद करता है। साथ ही बायोटीन का सेवन करें। यह भी बालों को तेजी से बढ़ाने के लिए जाना जाता है। यह आपको फिश, सी फूड, अंडे, अनाज, दूध, दही, बीन्स, मीट और हरी सब्जियों में अच्छी मात्रा में मिलेगा।
एक्सफोलिएशन है जरूरी
आप अपनी त्वचा को साफ रखें। सुबह और शाम क्लींजर से कलीन करें। अगर आप हफ्ते में कम से कम एक बार चेहरे की त्वचा को एक्सफोलिएशन करेंगे तो इससे दाढ़ी को तेजी से बढने में मदद मिलेगी। एक्सफोलिएट डेड स्किन सेल्स को हटाने से नए बालों के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा। आप चाहें तो पुरुषों की त्वचा के लिए बना कोई अच्छा एक्सफोलिएट मास्क भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
नियमित ट्रिमिंग करें
दाढ़ी को नियमित ट्रिम करने या शेव करने से धीरे-धीरे दाढ़ी घनी होने लगती है। अलग-अलग लोगों के चेहरे पर अलग-अलग तरह से दाढ़ी उगती है। किसी के पूरे गाल पर बाल उगते हैं तो किसी के कुछ हिस्सों पर बाल नहीं कम आते हैं या नहीं आते हैं। ऐसे में अपनी दाढ़ी और चेहरे के लुक के अनुसार आपको समय-समय पर दाढ़ी ट्रिम भी करनी चाहिए। इसके अलावा लंबी दाढ़ी को शेप में लाने के लिए भी ट्रिमिंग जरूरी है।
दाढ़ी की सफाई जरूरी है
सर के बालों की तरह चेहरे के बालों को भी साफ-सफाई की ज़रूरत पड़ती है। दाढ़ी के बालों की सफाई के लिए शैंपू का प्रयोग किया जा सकता है। सप्ताह में दो बार शैंपू करने से दाढ़ी के बाल स्वस्थ रहते हैं। इससे डैंड्रफ का खतरा भी कम हो जाता है और बालों का रूखापन भी खत्म हो जाता है। ध्यान रखें दाढ़ी की सफाई में ठंडे या सामान्य पानी का प्रयोग करें। गर्म पानी के प्रयोग से बाल धीरे-धीरे सख्त हो जाते हैं।
ऑलिव ऑयल से बढ़ाएं दाढ़ी
ऑलिव ऑयल के प्रयोग से आपकी दाढ़ी के बाल मुलायम रहते हैं और ये इन्हें बढ़ाने में भी मदद करता है। ऑलिव ऑयल में मॉश्चराइजर के गुण भी होते हैं इसलिए ये आपके चेहरे की नमी को लॉक करता है, जिससे चेहरा खुरदुरा नहीं लगता। ऑलिव ऑयल को हल्का गर्म करके रोज रात में सोने से पहले चेहरे पर लगाएं। इससे आपकी दाढ़ी घनी होगी।
( साभार – ओनली माई हेल्थ)
रेलवे में एयरपोर्ट जैसे नियम! ट्रेन से 20 मिनट पहले पहुँचना होगा स्टेशन
नयी दिल्ली : भारतीय रेलवे अब एयरपोर्ट की तरह सुरक्षा जाँच की व्यवस्था करने जा रहा है। नयी सुरक्षा व्यवस्था के तरह एयरपोर्ट की ही तरह स्टेशनों पर भी ट्रेनों के तय प्रस्थान समय से कुछ समय पहले प्रवेश की अनुमति बंद दी जा सकती है। साथ ही यात्रियों को सुरक्षा जाँच की प्रक्रिया पूरी करने के लिए 15 से 20 मिनट पहले पहुँचना होगा। हालांकि अभी तक यह व्यवस्था लागू नहीं की गई है।
रेलवे सुरक्षा बल के महानिदेशक अरुण कुमार ने पीटीआई को बताया कि उच्च तकनीक वाली इस सुरक्षा योजना को इस महीने शुरू हो रहे कुम्भ मेला के मद्देनजर इलाहाबाद में और कर्नाटक के हुबली रेलवे स्टेशन पर पहले से ही शुरू कर दिया गया है। साथ ही 202 रेलवे स्टेशनों पर योजना को लागू करने के लिए खाका तैयार कर लिया गया है।
उन्होंने बताया, ‘योजना रेलवे स्टेशनों को सील करने की है. यह मुख्यत: प्रवेश बिंदुओं की पहचान करने और कितनों को बंद रखा जा सकता है, यह निर्धारित करने के संबंध में है। कुछ इलाके हैं, जिन्हें स्थायी सीमा दीवारें बनाकर बंद कर दिया जाएगा, अन्य पर आरपीएफ कर्मियों की तैनाती होगी और उसके बाद बचे बिंदुओं पर बंद हो सकने वाले गेट होंगे।
कुमार ने कहा, ‘प्रत्येक प्रवेश बिंदु पर आकस्मिक सुरक्षा जाँच होगी. बहरहाल, हवाईअड्डों के उलट यात्रियों को घंटों पहले आने की जरूरत नहीं होगी बल्कि प्रस्थान समय से केवल 15-20 मिनट पहले आना होगा ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सुरक्षा प्रक्रिया के चलते देर न हो.’ उन्होंने कहा कि सुरक्षा बढ़ेगी, सुरक्षाकर्मियों की संख्या नहीं।
6 रुपये में 35 किलोमीटर चलने वाली बनायी ‘साइकिल बाइक’
गोरखपुर : दिमाग और मेहनत का अगर सही दिशा में प्रयोग हो तो मिसाल बन जाती है। ऐसी ही मिसाल गोरखपुर शहर के युवा अखिल सिंह चौहान ने बनाई है। राजेन्द्र नगर निवासी अखिल ने एक ऐसी साइकिल बाइक का निर्माण किया जो मात्र 2 घंटे की चार्जिंग से 35 किलोमीटर का सफर तय कर सकती है। साइकिल बाइक में 24 वोल्ट, 52 एएच की बैट्री लगी है जो दो घंटे में फुल चार्ज हो जाती है। इसका मतलब हुआ कि मात्र सवा 6.25 रुपये में 35 किलोमीटर तक का सफर तय कर सकते हैं। प्रति किलोमीटर साइकिल बाइक चलाने में मात्र 17 पैसे का खर्च आयेगा। अखिल का ताल्लुक किसी भी प्रकार की तकनीकी पृष्ठभूमि से नहीं है। उन्होंने साल 2018 में बीकॉम किया है।
टॉप स्पीड 40, दो घंटे की चार्जिंग में 35 किलोमीटर का सफर
इस साइकिल बाइक में एक्सीलेटर, ऑटोमैटिक गियर, लाइट, हार्न के साथ ही 40 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड भी मिलती है। अखिल को बैट्री चलित साइकिल बाइक का बनाने का आइडिया साइकिल से ट्यूशन पढ़ाने के दौरान थकने की वजह से आया। अखिल ने बताया कि कई किलोमीटर साइकिल चलाने के बाद थक जाता था। इससे मेरी कार्यक्षमता पर भी नकारात्मक असर पड़ता था। तभी ख्याल आया कि क्यों न ऐसी बाइक बनायी जाये जो इकोफ्रेंडली होने के साथ ही बिना मेहनत के सफर तय किया जा सके।
साइकिल बाइक को दिया नाम ‘रोड एज’
युवा अखिल ने अपनी इस इकोफ्रेंडली साइकिल बाइक को ‘रोड ऐज’ नाम दिया है। क्योंकि अखिल मानते हैं भविष्य इसी प्रकार की बैट्री चलित बाइक का होगा। अखिल ने कहा कि इस प्रकार की साइकिल बाइक को चलाने में खर्चा नहीं के बराबर होगा और प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी।
बहन और दोस्त की मिली मदद
अखिल ने बताया कि साइकिल बाइक को बनाने में 28 हजार रुपये की लागत आनी थी लेकिन मेरे पास पैसे नहीं थे। ऐसी दशा में मेरी बड़ी बहन रेनू और मेरे दोस्त विकास ने मेरे आइडिया को समझा और मेरी आर्थिक मदद की। तब जा सके मेरा ये सपना पूरा हो पाया। साइकिल बाइक को बनाने में डेढ़ महीने का समय लगा।
पहले सनकी कहा फिर सम्मान मिला
अखिल ने कहा कि नये आइडिये पर जब भी काम किया जाता है तो पहले किसी को यकीन नहीं होता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरे जानने वालों और परिवार वालों ने जब मुझे साइकिल को साइकिल बाइक बनाते देखा तो सबने हंसी उड़ायी और सनकी तक कहा लेकिन जब साइकिल बाइक बन गई तो सभी के विचारों में भी बदलाव आया और सम्मान से मुझे देखा गया।
साइकिल बाइक में प्रयोग हुए उपकरण
अखिल ने बताया कि साइकिल को इको साइकिल बाइक का रूप देने के लिए पहले एक साइकिल खरीदी। इसके बाद इसमें 350 वॉट की डीसी मोटर, 24 वोल्ट, 52 एएच की बैटरी, 350 वॉट का कन्ट्रोलर, स्पीड थ्रॉटल एवं बाइक से जुड़े कुछ उपकरणों का प्रयोग किया गया है।
(साभार – हिन्दुस्तान)
अब सीबीएसई में पासआउट छात्र कर सकेंगे इन्टर्नशिप
नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) अपने विद्यार्थियों के लिए नए अकादमिक सत्र से इंटर्नशिप प्रोग्राम ला रहा है। बोर्ड ने कहा कि इस पर कार्य अंतिम चरण में है और नए सेशन से एजुकेशन के विद्यार्थियों के लिए इसे शुरू किया जाएगा।
बोर्ड स्किल बेस्ड प्रोग्राम में इनरोल्ड विद्यार्थियों को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देने के उद्देश्य से इंटर्नशिप प्रोग्राम ला रहा है। इससे विद्यार्थियों को थ्योरी में पढ़े गए काम को प्रैक्टिकल में उतारने का मौका सीबीएसई में ही मिलेगा। प्लान के अनुसार स्कूल से पास करने वाले विद्यार्थियों को सीबीएसई में ही 3 से 6 महीने की इंटर्नशिप/अप्रेन्टस्शिप करवाई जाएगी। बोर्ड ने गवर्निंग बॉडी की बैठक में इसके लिए मंजूरी दे दी है। इसे लागू करने की प्रक्रिया चल रही है।
वोकेशनल छात्रों को परखने की जरूरत
अब सीबीएसई के स्किल बेस्ड प्रोग्राम के पासआउट विद्यार्थियों को बोर्ड अपने ही सिस्टम में बतौर इंटर्न लगाएगा। इस प्लान पर सीबीएसई के स्किल एजुकेशन एंड ट्रेनिंग एक्सपर्ट बिश्वजीत साहा का कहना है, हम देखना चाहेंगे कि वोकेशनल कोर्स के बच्चे कितने काबिल हैं, कितना सीख पाएं हैं। खासतौर पर बोर्ड के वे छात्र जिन्हें डीयू में रेगुलर एडमिशन नहीं मिल पा रहा है और वे ओपन लर्निंग से पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे छात्र 3 से 6 महीने सीबीएसई की अलग अलग यूनिट में इंटर्नशिप कर सकते हैं। शुरुआत में विद्यार्थियों की संख्या कम होगी मगर इसी सत्र से इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर रखा जाएगा। अधिकारी का कहना है कि इस प्लान के फाइनल होते ही सीबीएसई की वेबसाइट में जानकारी दी जाएगी।
एआई पर कोर्स पढ़ाए जाएंगे
स्किल प्रोग्राम के तौर पर बोर्ड जल्द ही डेटा एनालिटिक्स एंड मशीन लर्निंग, योग इंस्ट्रक्टर, अर्ली चाइल्डहुड एजुकेटर भी शुरू करेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में बोर्ड स्किल बेस्ड प्रोग्राम के तौर पर डेटा एनालिटिक्स एंड मशीन लर्निंग कक्षा 8वीं, 9वीं और 10वीं में शुरू किया जाएगा। हालांकि, विश्वजीत ने बताया कि इसे 8वीं और 9वीं में और 10वीं में अगले साल लाया जा सकेगा। अभी कोर्स को तैयार करने पर काम होगा। गवर्निंग बॉडी की बैठक में बोर्ड को सलाह दी गई है कि इसे 11वीं और 12वीं के लिए भी रखा जाए। वहीं, सीनियर सेकेंडरी स्तर पर योग इंस्ट्रक्टर का स्किल प्रोग्राम भी इसी सत्र से शुरू किया जा रहा है। विद्यार्थियों को स्कूल में ही योग एक्सपर्ट बनाने और इंस्ट्रक्टर के तौर पर नौकरी का विकल्प देने के लिए इस प्रोग्राम को अकादमिक सत्र 2019-20 से लाया जा रहा है। वहीं, अर्ली चाइल्डहुड एजुकेटर भी इसी सत्र में लाया जाएगा।
मुख्य बिंदु
– स्किल बेस्ड प्रोग्राम में इनरोल्ड विद्यार्थियों को मिलेगा मौका
– 3 से 6 महीने की इंटर्नशिप या अप्रेन्टस्शिप करवाई जाएगी
– 2019-20 के अकादमिक सत्र में इंटर्नशिप को लेकर पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाएगा
– 8वीं, 9वीं और 10वीं कक्षा में डेटा एनालिटिक्स एंड मशीन लर्निंग, योग इंस्ट्रक्टर और अर्ली – चाइल्डहुड एजुकेटर जैसे कोर्स कराए जाएंगे
– 11वीं और 12वीं के छात्रों के लिए एआई के कोर्स शुरू करने की दी गई सलाह
जिम में पसीना न बहाएं, कुछ देर सीढ़ियां चढ़ लें
आजकल ज्यादातर लोग जिम में पसीना बहाकर अपना वजन कम करते हैं तो कुछ लोग फिट रहने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि रोजाना 1 घंटे जिम में पसीना बहाने से बेहतर है कि आप 15 मिनट सीढ़ियां चढ़ लें। सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ कि जो लोग केवल एक मंजिल सीढियां चढ़कर अपने घर या ऑफिस जाते हैं, वह उनके आधे किलोमीटर ट्रेडमील पर चलने के बराबर हो जाता है।
सीढ़ियां चढ़ने के होते हैं इतने फायदे
सीढियां चढ़ना हार्ट और लंग्स के लिए जिम से ज्यादा फायदेमंद हैं। अगर आप रोजाना सीढ़ियां चढ़ते हैं तो आपकी थाई तो शेप में रहती है साथ ही मसल्स भी फ्लेक्सेबिल हो जाती हैं।
पूरी बॉडी की फिटनेस के लिए भी सीढ़ियां चढ़ना बेहद फायदेमंद है। इसके बाद आप जोड़ों की प्रॉब्लम जैसी चीजों से बचे रहेंगे।
सीढ़ियां चढ़ने से एड्रेनलिन हॉर्मोन एक्टिव हो जाता है। यह हॉर्मोन हार्ट की मसल्स तक ब्लड सर्कुलेशन बनाए रखने और हार्ट बीट नॉर्मल रखने के लिए बहुत जरूरी है।
ऊपर चढ़ने के दौरान जब बॉडी का 70-85 डिग्री का एंगल बनता है, तो यह पॉश्चर लोअर बॉडी के लिए और 135 डिग्री का एंगल अपर बॉडी के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
सीढ़ियां चढ़ने से मसल्स में फैट इकट्ठा नहीं हो पाता और शरीर शेप में रहता है। यह टेंशन कम करने के साथ व्यक्ति को फोकस करने में भी मदद करता है।
‘स्पर्शज्ञान’: नेत्रहीनों के लिए देश का पहला ब्रेल अख़बार!
थोराट : महाराष्ट्र के स्वागत थोराट, फरवरी 2008 से भारत का पहला ब्रेल अख़बार ‘स्पर्शज्ञान’ चला रहे हैं। मराठी भाषा में प्रकाशित होने वाला 50 पन्नों का यह अख़बार, महीने की 1 तारीख़ और 15 तारीख़ को प्रकाशित होता है। ‘स्पर्शज्ञान’ का मतलब होता है ‘स्पर्श करके ज्ञान अर्जित करना’! स्वागत थोराट का यह अख़बार महाराष्ट्र के 31 जिलों में मौजूद नेत्रहीन स्कूलों और नेत्रहीनों के विकास से जुड़ी विभिन्न स्वंय सेवी संस्थाओं को मुफ्त में दिया जाता है। एक इंटरव्यू के दौरान थोराट ने बताया था कि उनकी शुरुआत अख़बार की 100 प्रतियों के साथ हुई थी, लेकिन अब वे 400 से ज्यादा प्रतियाँ प्रकाशित करते हैं।
स्वागत थोराट पेशे से स्वतंत्र पत्रकार और थियेटर निर्देशक रहे हैं। वे नियमित अन्तराल पर दूरदर्शन और कई अन्य मीडिया संस्थानों के लिए डॉक्युमेंट्री बनाते थे। इसी सिलसिले में उनको एक बार दूरदर्शन के ‘बालचित्र वाहिनी’ कार्यक्रम के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाने का मौका मिला जो कि नेत्रहीनों के बारे में थी। इसी दौरान थोराट को नेत्रहीन बच्चों से सीधा मिलने, उन्हें जानने और उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा समझने का मौका मिला। थोराट ने जाना कि कोई भी शारीरिक अक्षमता इन बच्चों की कल्पना और आगे बढ़ने के जज़्बे को नहीं रोक सकती।
साल 1997 में थोराट ने एक मराठी नाटक ‘स्वतंत्रयाची यशोगथा’ का निर्देशन किया। इस नाटक में पुणे के दो स्कूलों के 88 नेत्रहीन बच्चों ने हिस्सा लिया। यह नाटक इतना सफल रहा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी चर्चा हुई। इस नाटक में 88 नेत्रहीन कलाकारों को शामिल करने के लिए इसका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। थोराट ने बताया,
“जब मैं इस नाटक के मंचन के लिए इन बच्चों के साथ यात्रा कर रहा था तो मैंने देखा कि ये बच्चे आपस में देश दुनिया की उन चीजों के बारे में बात कर रहे थे जो इन्होने पहले कहीं पढ़ी थी या सुनी थी। तब मुझे अहसास हुआ कि ये बच्चे और ज्यादा जानने को इच्छुक हैं और ये उनकी जरूरत भी है।”
इसके बाद थोराट ने ठान लिया कि वे देश में नेत्रहीन लोगों के लिए जरुर कुछ करेंगे। इसके लिए उन्होंने अपनी बचत से लगभग 4 लाख रूपये खर्च कर एक ब्रेल मशीन खरीदी और मुंबई में एक ऑफिस भी किराये पर लिया। जिसके बाद 15 फरवरी, 2008 को ‘स्पर्शज्ञान’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ।
थोराट कहते हैं कि हमारे समाज में नेत्रहीन लोगों के लिए बहुत कुछ होने की जरूरत है। आज उनकी टीम में छह लोग हैं। उन्हीं के प्रयासों के चलते साल 2012 में रिलायंस फाउंडेशन ने भी ब्रेल लिपि में एक हिंदी अख़बार ‘रिलायंस दृष्टि’ की शुरुआत की। रिलायंस दृष्टि का संपादन भी स्वागत थोराट ही करते हैं।
स्वागत थोराट के जैसे ही एक और समाज सेवी उपासना मकाती ने भी साल 2013 में नेत्रहीन लोगों के लिए ब्रेल लिपि में एक लाइफस्टाइल मैगज़ीन ‘व्हाइट प्रिंट‘ शुरू की। अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होने वाली यह मैगज़ीन देश की पहली लाइफस्टाइल ब्रेल मैगज़ीन है।
थोराट का कहना है कि सभी पुस्तकालयों में दृष्टिहीन छात्रों के लिए ब्रेल लिपि में पुस्तकों का एक विभाग अलग से होना चाहिए। हालांकि, शुरू में लोगों को थोराट का काम समझ नहीं आता था पर अब उनके और भी दोस्त व साथी उनका साथ दे रहे हैं। इस अख़बार में सामाजिक मुद्दों, अंतरराष्ट्रीय मामलों, प्रेरक जीवनी के अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, संगीत, फिल्म, थियेटर, साहित्य और खानपान से जुड़ी ख़बरें होती हैं।
आज हमारे देश में इस तरह के अख़बारों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है और इस पर थोराट कहते हैं“मैं उस दिन का सपना देख रहा हूँ जब इन लोगों (दृष्टिहीन) को इनका एक एक दैनिक अख़बार मिलेगा। मुझे उम्मीद है कि कोई एक मीडिया हाउस तो ऐसा अख़बार शुरू करेगा, और अगर नहीं तो कुछ सालों में, मैं एक दैनिक ब्रेल अख़बार जरुर शुरू करूँगा।”
(साभार – द बेटर इंडिया)




