Sunday, April 19, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 648

3 राज्य यूँ ही नहीं गँवाये… भाजपा ने बड़ा जुआ खेला है

सुषमा कनुप्रिया
पाँच राज्यों के विधानसभा निपट गये। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया, राहुल गाँधी एक अच्छे और परिपक्व नेता बनकर उभरे हैं। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अहंकार को गहरी चोट लगी। यह भाजपा के लिए आत्ममंथन का समय है। भाजपा के लिए 2019 में सत्ता वापसी करना आसान नहीं होगा….इन दिनों तमाम अखबार और चैनल व वेबसाइट ऐसे विश्लेषणों से भरे पड़े हैं। निश्चित रूप से राहुल गाँधी एक अच्छे नेता बनकर उभरे हैं मगर कुछ सवाल ऐसे हैं, जिन पर अगर सोचा जाए तो मामला कुछ और ही निकलता है। विश्लेषण अपने – अपने होते हैं, सही या गलत हो सकते हैं मगर हर विश्लेषण और दृष्टि का अपना महत्व होता है।
इस जीत को सीधे -सपाट रूप से देखना बहुत सी बातों को अनदेखा करना हैं। मेरा यह मानना है कि भाजपा को इस समय जीत से ज्यादा हार की जरूरत थी। किसी भी आकलन से पहले आपको हमेशा याद रखना होगा कि भाजपा न तो क्षेत्रीय पार्टी हैं और न ही क्षेत्र तक सीमित रहना इसका लक्ष्य है। भाजपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और इसके लिए यह राष्ट्रीय छवि अधिक मायने रखती है और इसके राजनीतिक लक्ष्य भी क्षेत्रीय से अधिक राष्ट्रीय ही हैं। जाहिर है कि इस राष्ट्रीय लक्ष्य यानि सीधे तौर पर 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस पार्टी के लिए तीन राज्यों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण केन्द्र की सत्ता है। हमारी समझ में पार्टी ने सिर्फ जुआ ही नहीं खेला बल्कि ऐसा जाल बिछाया है जिसमें कांग्रेस ही नहीं बल्कि पूरा विपक्ष फँसता जा रहा है।


जवाबदेही और समस्याओं को सुलझाने की जिम्मेदारी अब कांग्रेस की
यह याद रखने की जरूरत है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, इन तीनों राज्यों में सत्ता सम्भालना तलवार की धार पर चलना है। जनता में धैर्य नहीं होता, वह अपनी समस्याओं का तुरन्त व त्वरित परिणाम चाहती है। मध्य प्रदेश में बेरोजगारी, अशिक्षा, विकास व किसान के मुद्दों के साथ व्यापम जैसे कांड भी हैं जिनकी आँच सीधे कांग्रेस तक भी जाती है। राजस्थान में सरकारी अस्पतालों से लेकर परिवहन क्षेत्र तक में लगातार हड़तालें हो रही हैं। 19 जिलों में पानी एक विकट समस्या है और चुनावी मौसम में यह और तेज होगी। ठीक यही बेरोजगारी, विकास, निकासी व किसान समस्या, छत्तीसगढ़ के मुद्दे हैं। कांग्रेस के क्षत्रपों के सामने इनको सुलझाना और तय समय में सुलझाना एक बड़ी समस्या होगी। कांग्रेस ने जिन चेहरों को लेकर विधानसभा चुनाव लड़ा, वह अब केन्द्र की राजनीति में चाहकर भी समय नहीं दे सकेंगे। कमलनाथ और अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने जो बड़ा किरदार निभाया, वह लोकसभा में दिखे भी तो उतनी गहराई से नहीं दिखेगा। जनता की नाराजगी को मैनेज करने में कांग्रेस की बड़ी ऊर्जा जाने वाली है। आपने शिवराज सिंह का बयान सुना होगा…नाऊ आई एम फ्री, अब मैं आजाद हूँ। फिलहाल तो भाजपा के तीनों नेता आजाद हो गये।


राज्य सम्भालेंगे या गुटबाजी से निपटेंगे राहुल
आप गौर कीजिए कि भाजपा के तमाम दलबदलू मंत्रियों ने चुनाव के ठीक पहले ही भाजपा से किनारा किया है। राहुल गाँधी भले ही किसी एक को चुनें, दूसरे पक्ष को असन्तुष्ट होना ही है। जाहिर है कि भाजपा ऐसे असन्तुष्टों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। कांग्रेस के तमाम क्षत्रपों में भले कितने ही एकता दिखती हो मगर उनके जिन समर्थकों में सत्ता की लालसा है, उनका क्या होगा…? राजस्थान में तो कलह सत्ता सम्भालने के पहले ही दिखने लगा है। सीएम पद के लिए प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और अशोक गहलोत दोनों की ओर से दावेदारी की जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते सचिन पायलट सीएम पद से नीचे समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। पूर्व सीएम अशोक गहलोत तीसरी बार सीएम बनने के लिए मजबूत तरीके से दावेदारी पेश कर रहे हैं। जयपुर में विधायक दल की बैठक हुई। करीब आठ घंटे की मशक्कत का नतीजा सिफर रहा। डीग-कुम्हेर से एमएलए विश्वेंद्र सिंह विधायक दल की बैठक बीच में छोड़कर चले गए। उन्होंने कहा कि जब फैसला आलाकमान को करना है तो यह बैठक क्यों? यही स्थिति भाजपा की होती और यही असन्तोष पार्टी को देखना पड़ता और यह लोकसभा की तैयारियों के लिए अच्छी खबर नहीं होती। राहुल गाँधी अपनी सरकारों के वायदे पूरे करें या गुटबाजी दूर करें, मगर उनका ध्यान अब अपनी सरकारों पर ही अधिक रहेगा क्योंकि अब कांग्रेस को सत्ता के साथ जवाबदेही भी मिली है। जाहिर है कि भाजपा इस स्थिति से बचकर अपने नेताओं को एकजुट करना चाहती थी, तो अब तमाशा देखने की बारी भाजपा की है। कांग्रेस के मौन असन्तुष्टों पर पार्टी की नजर बनी हुई है।


वसुन्धरा को पहाड़ के नीचे लाने के लिए राजस्थान गँवाना जरूरी था
वसुन्धरा राजे सिन्धिया ने ऐसे काम किये जो पार्टी को पसन्द नहीं थे। उनकी मनमानी के कारण राज्य में तीन – चार माह तक कोई प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं बन पाया। यहाँ तक कि टिकटों के बँटवारे में भी वसुन्धरा की ही चली। वसुन्धरा ने किसी की नहीं सुनी और यह बात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को खली जरूर होगी मगर उनके पास तब कोई रास्ता नहीं था। राजस्‍थान की जनता और पार्टी के कई नेता मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे स‍िंध‍िया की कार्यशैली से असंतुष्‍ट थे। केन्द्रीय नेतृत्‍व को भी इसकी श‍िकायतें लगातार म‍िलती रही थीं। कार्यकर्ताओं की शिकायत थी कि वसुन्धरा राजे किसी की सुनती नहीं हैं। उनके और कार्यकर्ताओं के बीच खाई गहरी होती गयी। राजस्‍थान में संगठन के कार्यकताओं और नेतृत्‍व के बीच तालमेल बिठाने के लिए अमित शाह ने प‍िछले साल अगस्‍त में संघ के प्रचारक रहे चंद्रशेखर को संगठन महामंत्री बनाकर भेजा था। अगर राजस्थान में भाजपा जीतती तो इसका मतलब था कि अमित शाह के लिए वसुन्धरा को रोक पाना नामुमकिन हो जाता और इसका दुष्प्रभाव सीधे लोकसभा चुनावों पर पड़ता। वसुन्धरा राजे जनता की नाराजगी को समझने में नाकाम रहीं और सरकार के 30 में से 20 मंत्री हार गए। इनमें से दो ने अपने बेटे को टिकट दिलाया था और बेटे भी नहीं जीत पाए लेकिन सरकार के 30 में से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे समेत महज 7 मंत्री जीते। चुनाव हारने के बाद वसुन्धरा के सुर भी नरम पड़े हैं और अरसे बाद उन्होंने पीएम पर राष्ट्रीय अध्यक्ष को याद किया। अब सम्भव है कि वे पार्टी नेतृत्व की सुनें। मतलब सीधा है, राजस्थान में पार्टी को अनुशासित करना और फैसले ले पाना अमित शाह के लिए आसान होगा।
बागियों को अब गम्भीरता से लेगी पार्टी
भाजपा के लिए यह आत्ममन्थन का ही नहीं बल्कि पार्टी से जा चुके लोगों को वापस लाने का समय है। राजस्थान में भाजपा ने चार मंत्रियों को टिकट काटा था और वह बागी बन के मैदान में उतरे थे यह चारों बागी मंत्री चुनाव हार गए। अब हो सकता है कि उनको गम्भीरता से लिया जाए और सम्भव है कि सुलह भी हो जाए। अन्य राज्यों के बारे में भी यही कहा जा सकता। लोकसभा चुनाव में अभी 4 महीने का वक्त है…सियासत बदल भी सकती है।


अब लोकसभा की तैयारियों के लिए भाजपा के पास सेनापति अधिक होंगे
भाजपा के तीनों मुख्यमंत्रियों ने हार की जिम्मेदारी खुद ली है। जाहिर है कि वे अब अपनी छवि सँवारने के लिए कड़ी मेहनत के मूड में हैं। इसका सीधा फायदा लोकसभा चुनावों में मिल सकता है। गौर करने वाली बात यह है कि सीटें भले ही कांग्रेस को अधिक मिली हों मगर वोट प्रतिशत में अन्तर इतना अधिक भी नहीं है कि उसे भरा न जा सके। वसुन्धरा, शिवराज और रमन सिंह, अब जमीनी स्तर पर काम करने पर ध्यान देंगे और अन्तर भरना चाहेंगे। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने पहले ही चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी है तो पार्टी उनका उपयोग प्रचार के लिए कर सकती है। इसके साथ ही सम्भव है कि पार्टी बड़बोलों पर अंकुश लगाये व कई बड़ी घोषणायें करे। दूसरी ओर कांग्रेस के सेनापति अब व्यस्त हो चले हैं तो वे राहुल भी उनका विकल्प तलाशेंगे मगर इसमें समय लगेगा।


विपक्षी एकता में हल्की सी दरार पड़ी तो है
जब तक कांग्रेस कमजोर थी, राहुल गाँधी को प्रधानपत्री पद का चेहरा बनाने पर वह समझौता करने पर तैयार हो सकता था, अब ऐसा नहीं होगा। सभी दलों के लिए राहुल को स्वीकार कर लेना इतना आसान भी नहीं है। अगर पार्टी नेतृत्व तैयार भी हो तो जमीनी स्तर पर इसका लाभ मिले, यह जरूरी नहीं है। विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या है कि इसके पास इतने चेहरे हैं कि वह किसी एक चेहरे का चयन नहीं कर पा रहा है। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी केन्द्र की सत्ता के लिए सोनिया से हाथ मिलाती हैं तो राज्य में कांग्रेस समर्थकों को पिटवाती भी हैं। अगर माकपा व कांग्रेस हाथ मिला लें तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता नाराज होंगे। ममता के लिए राहुल का नेतृत्व स्वीकारना अब भी आसान नहीं होगा। वह अपनी अनिच्छा जाहिर कर भी चुकी हैं। कांग्रेस की जीत से वह बहुत ज्यादा खुश इसलिए नहीं हैं क्योंकि अब कांग्रेस उनके सामने मुकाबला करने के लिए तैयार है जबकि कांग्रेस हार जाती तो ममता को आसानी होती। बहरहाल, ममता के ये इरादे पूरे नहीं हुए मगर सांसद उनके पास पूरे हैं और बंगाल में वह सीटों को लेकर समझौता करें, इसके आसार अब भी कम हैं। समझौता हो जाए तो तृणमूल कांग्रेस को जितवाएगी, यह मान लेना भी खुद को धोखे में रखना है। शायद यही कारण है कि कांग्रेस ने बंगाल में अकेले लड़ने का फैसला किया है। हाथ मिलाने से दिल नहीं मिला करते। प्रदेश कांग्रेस की गुजारिश पर केन्द्र में कांग्रेस ने बंगाल से अकेले लड़ने का निर्णय ले लिया है। मायावती ने मजबूरन कांग्रेस को समर्थन देना तय किया है मगर वह लोकसभा में भी यही करेंगी, कहना जल्दबाजी होगी। हर पार्टी के अपने हित हैं, इन हितों को एक साथ साधना आसान नहीं है। चन्द्रबाबू नायडू को कांग्रेस के साथ रहकर लाभ नहीं हुआ है। वहीं अगर भाजपा जीतती तो सभी दल एक हो जाते और विपक्ष एक बार फिर मजबूत हो जाता मगर अब कांग्रेस का पलड़ा भारी है और कई दल उसके साथ हैं मगर इसके बावजूद विपक्ष की एकता भारी रहेगी, कहा नहीं जा सकता।


भाजपा अब सहयोगियों को साथ लाएगी
अब तक फर्क नहीं पड़ा था मगर लोकसभा चुनाव आते ही रणनीति बदलेगी। केसीआर को प्रधानमंत्री मोदी खुद पसन्द करते हैं और एनडीए उनको मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। भाजपा ने क्षेत्रीय पार्टियों की ताकत देखी हैं और अब वह अपने बागी उम्मीदवारों के साथ सहयोगियों को साथ लाने की पूरी कोशिश करेगी। त्रिपुरा, मणिपुर जैसे उत्तर – पूर्वी राज्यों के अतिरिक्त अब अन्य राज्यों में नये सहयोगियों की तलाश शुरू कर सकती है।
कहने का मतलब यह है कि इन दूरगामी परिणामों को देखा जाए तो तीन राज्यों को हार जाना कोई महँगा सौदा नहीं है। बड़ी जंग जीतने के लिए छोटी लड़ाइयाँ कई बार हारनी पड़ती हैं और मोदी-शाह की नजर बड़ी जंग पर है…वैसे…पिक्चर अभी शुरू हुई है…आगे -आगे देखिए…क्या होता है…तब तक इन्तजार।

युगन्धर – ईश्वर और मनुष्य के बीच संतुलन साधने की कोशिश 

अपने चरित नायकों को हम उस पूज्य दृष्टि से देखते हैं कि उनके आस – पास चमत्कार की कथायें गढ़ लेते हैं जैसे मान लिया गया है कि जो अलौकिक होगा..वह चमत्कार करेगा ही वरना वह ईश्वर नहीं है। इस धारणा को कुछ हद शिवाजी सावन्त युगंन्धर में तोड़ते हैं। हमारे मानस में वंशी बजाने वाले चिरयुवा श्रीकृष्ण बसे हैं मगर आपको यहाँ कृष्ण वृद्ध भी दिखेंगे, थके और उदास भी दिखेंगे…उनकी आँखें डबडबाती भी हैं। शिवाजी सावन्त के उपन्यास का हिन्दी अनुवाद ही मैंने पढ़ा और यह दूसरी बार पढ़ा। आप जिनको चमत्कार समझते हैं, वह विराट रूप श्रीकृष्ण की रणनीतिक सूझ -बूझ को सामने रखता है। कई बार ऐसा भी लगता है कि उनके सोलह हजार आठ विवाहों को और द्रोपदी को जस्टीफाई करने का प्रयास यहाँ भी हुआ है।

श्रीकृष्ण के ईश्वरत्व को बरकरार रखते हुए कहीं – कहीं छूट लेते हैं मगर आपको यह उपन्यास उनके चरित्र और उनकी हर चिन्ता को समझने में है। पहला अध्याय आत्मकथात्मक शैली में है मगर इसके बाद रुक्मिणी, द्रोपदी, दा., सात्यकी,अर्जुन और अन्त में उद्धव उनकी कहानी अपने अनुसार कहते हैं। यहाँ आपको ब्र गोप कृष्ण मिलते हैं, खासकर दारुक, सात्यिकी, और उद्धव की दृष्टि से समझना एक नयी दिशा है। राधा हैं मगर वह बहुत कम जगहों पर आती हैं। आवरण पृष्ठ पर ही हाथ में प्रतोद और सुदर्शन चक्र लिए श्रीकृष्ण की तस्वीर उपन्यास का उद्देश्य समझा देती है। हमारे इतिहास और पुराणों में स्त्री चरित्रों को कभी हाशिये पर रखा गया है। श्रीकृष्ण के चरित्र पर आधारित इस उपन्सास में आपको कई ऐसे चरित्र मिलते हैं जिनका उल्लेख न के बराबर हुआ है।

 

 

इस उपन्यास में आपको ब्रज में उनकी बहन के रूप में एकानंगा मिलती हैं और उनकी बेटी चारुमती भी मिलती हैं पर दोनों का विशद वर्णन नहीं है। इसके अतिरिक्त कृष्ण की एक और पुत्री भी मिलती हैं। एक बार मैंने कहीं पांडवों की पुत्री के बारे में भी पढ़ा था। एक बात तो तय है कि स्त्रियों का तत्कालीन समाज आज जैसा तो नहीं था। वहाँ वह वस्तु है जिसका अपहरण किया जा सकता है या जीता जा सकता है। यह सही है कि मैं कृष्ण के चरित्र से प्रेरित हूँ मगर जब आप रचना या चरित्र पर बात करते हैं तो वहाँ निरपेक्ष होकर सोचने की जरूरत है। अगर 16 हजार विवाह नियति हैं तो भी रुक्मिणी के अतिरिक्त 7 विवाह प्रेम के कारण कम राजनीतिक और रणनीतिक प्रसार की जरूरत अधिक हैं और यहाँ स्त्री की इच्छा का प्रश्न ही नहीं है, वह या तो मोहरा है या वस्तु है। स्त्री का एकमात्र उद्देश्य अच्छा पति पाना है…अगर आप नैतिकता और सम्बन्धों के आधार पर बात करते हैं तो खुद श्रीकृष्ण ने भी इसका पालन नहीं किया..भीम का विवाह बहन से होता है तो नकुल का विवाह शिशुपाल की कन्या से। श्रीकृष्ण अर्जुन के भ्राता हैं मगर सुभद्रा से उनका विवाह करवाते हैं। अगर वह ईश्वर हैं तो वह भी हमारी तरह ही हैं…समय के प्रवाह में डूबते – उतरते…थकते और विश्राम लेते…इस उपन्यास को पहले लाइब्रेरी पढ़ा था..और अब खरीद भी लिया है…जाने कितने पाठों से कितने प्रश्न निकलें..। हमने ईश्वर की परिकल्पना और उनसे सम्बन्धित तथ्यों को अपने हिसाब से ढाला है और उसी को विश्वास बना लिया है जबकि यह पक्ष ही अधूरा है। यह हमारी सुविधा भी है..कृष्ण के चरित्र को समझना है तो वंशी काफी नहीं, आपको सुदर्शन चक्र, प्रतोद और राजदंड सभी को लेकर चलना होगा। उनकी दुविधा, चिन्ता, कठिनाई…उदासी..सबको समझना होगा…जरूरी है कि उनको जिस आसन पर आपने बैठा रखा है….उससे नीचे उतारकर अपनी तरह महसूस कीजिए एक ऐसे मनुष्य की तरह जिससे गलतियाँ हुई हैं और हो सकती हैं। उपन्यास के आरम्भ में जब वह खुद अपनी कथा कहते हैं तो यह उनकी शिकायतों में शामिल है। बहुत सी बातों के जस्टिफिकेशन से दूर रहकर भी आपको यहाँ समझ की नयी दृष्टि मिलती है। भाषा संस्कतनिष्ठ होकर भी समझ में आती है। उपन्यास धाराप्रवाह शैली में लिखा गया है जिसे बार – बार पढ़ने के साथ समझने की ललक भी पैदा होती है। वस्तुतः सम्बन्धों के आगे उनका एकमात्र उद्देश्य आर्यावर्त को अन्याय से मुक्त करवाना था और जाहिर है कि इसके लिए उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। आप उनकी आलोचना कर सकते मगर खारिज नहीं कर सकते। उनको न तो अपने मन से निकाल सकते हैं और न ही मंदिरों से।

युगन्धर
शिवाजी सावंत
मूल्य: Rs. 800
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ
प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :936

इन दिनों आपकी किस किताब की गली से गुजर रहे हैं, हमें बताइए, नीचे कमेन्ट्स बॉक्स में

थेथर होती हैं औरतें!

आज के समय में सोशल मीडिया की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यह सही है कि सोशल मीडिया यूनिर्वसिर्टी बहुत सा कचरा परोसती है मगर इसी पर कुछ ऐसी बातें भी होती हैं, जो हमें अन्दर से छूती भी हैं और झकझोरती भी हैं। यही बातें कई बार विमर्श का रूप भी ले लेती हैं और कई बार नया जानने को भी मिलता है तो सोशल मीडिया से चुनी हुई कुछ पोस्ट हम आपके लिए ला रहे हैं जो कभी फेसबुक, कभी व्हाट्सएप से दिखती हैं। शुरुआत मृदुला शुक्ला जी की एक जरूरी पोस्ट से उन सबके लिए जो स्त्रियों पर चुटकुले बनाते हैं…इसे पढ़ा जाना चाहिए

मृदुला शुक्ला

सर्दियों में शादियों में स्त्रियों के स्वेटर न पहनने पर खूब बात होती है चुटकुले बनते हैं वजह तो पता होगी! न पता हो तो मैं बता देती हूँ । थेथर होती हैं औरतें। कभी सर्दी की ठण्ड सुबह जब आप रजाई में  दुबके होते हो तब नहा कर चौके में जाकर आपके लिए नाश्ता बनाती माँ या पत्नी की बात कर पूछते हैं क्या स्त्रियाँ किस मिट्टी की बनी होती हैं उन्हें ठण्ड क्यों नहीं लगती । उस वक्त आप उन्हें ममतामई ,महान, देवी और जाने क्या कह कर बेवकूफ बना ले जाते हैं । तब चुटकुले आपकी हलक में फंस जाते हैं।
मई जून की गर्मी में जब चौका तप रहा होता है आप एयर कंडिशनर, कूलर पंखा( जो भी आपकी हैसियत में हो) में बैठे होते है आपके लिए गरमागरम फुल्के उतारे जा रहे होते हैं । कभी उनके साथ उस गर्मी में जाकर काम करके देखिये शहरी औरतें तो सुविधाजनक कपड़ों में होती हैं ग्रामीण स्त्रियाँ सिंथेटिक साड़ियों में सिर ढंके आधा जीवन चौके में बिता देती हैं । उनकी पीठ पेट गर्दन पर घमौरियों की परतें चढ़ती जाती है ।
घर का वह हिस्सा जो सबसे गर्म होता है वहां ए सी पंखा कूलर क्यों नहीं लगता सोचियेगा कभी । अधिकाँश पुराने घरों में रसोई में खिड़की तक नहीं होती थी ।और कभी कभी तो रौशनदान भी नहीं ।
कभी किसी स्त्री को रसोई में काम करते देखिये अधिकांश समय वो चिमटे की मदद के बिना काम करती है उसकी कोमल उंगलिओं के पोर अधिक उष्म सहिष्णु होते ।हमारी भाषा में इसे कहते है थेथर होना ।हाँ औरतें थेथर होती हैं परिवार को ताजा गर्म और स्वास्थ्यवर्धक खाना मिले इसके लिए उन्हें गर्मी सर्दी की परवाह करना अलाउड नहीं है ।
औरतें कैसे कर पाती हैं यह सब ,कभी आप सबके दिमाग में ये प्रश्न क्यों नहीं उठते ? चुटकुले यहां बनने चाहिए थे मगर तब आपकी सुविधाओं में खलल पड़ेगा ।उसे दस बीस पीढ़ी तक सर्दी गर्मी का एह्साह होने दीजिये ।
सामान्य मध्य वर्ग और निम्न वर्ग की महिलाओं को शादी में मायके ससुराल से साड़ियां मिलती हैं महंगी भारी भरकम काम वाली (औकात के अनुसार)उनके पास शादी ब्याह के अतिरिक्त कोई जगह नही होती उन्हें पहनने की। और ज्यादातर घरों में साड़ी के अतिरिक्त कोई परिधान अलाउड भी नही होता । ससुर जेठ के सामने पल्ला करना होता है मगर उन साड़ियों के साथ स्वेटर शाल बनाने की जरूरत बाजार ने भी नही महसूस की। बाज़ार भी अब तक समाज के इस उपेक्षित वर्ग की जरूरत को कैश करने के मूड में नही दिखता । बाज़ार जानता है अभी भी इस क्षेत्र में कोई स्कोप नही है । यदि बहुत कम संख्या में उपलब्ध है तो परिवार और स्वयम स्त्रियां भी उसे खरीदने में हिचकती हैं । एक ही रात की तो बात है बिना स्वेटर के भी चला लेंगी काम । उन्हें तो वैसे ही कम लगती है ठंड ।
उन्हें कुछ दिनों का चैन दीजिये उनकी देह को मौसम बदलने को महसूस करने दीजिए तब जाकर उनका थर्मोस्टेट सही होगा फिर वो शादियों में आपके साथ सूट कोट जूता मोजा पहन कर शामिल होगी |

बाकी बड़ी मेहनत से तैयार किये गए डिजायनर, ब्लाउज गहने दिखाना एक वजह तो है ही मगर ध्यान रहे इस क्लास के लोगों की शादियां वातानुकूलित जगहों पर होती हैं जिनके घर गाड़ी भी होते हैं वातानुकूलित। इन पर न तो चुटकुले गढे जाते हैं न ही इन पर फर्क पड़ता है ऐसी बातों का ।
इस बार ठंड की सुबह की चाय आप खुद बनाइये । देखिए बहुत से चुटकुलों और सवालों के जवाब मिल जाएंगे ।।
किसी भी अव्यावहारिक सामूहिक क्रिया के आर्थिक सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पक्ष होते हैं । हो सकता है मुझसे कुछ पक्ष छूट गए हों मगर चुटकुले बनाना सबसे क्रूर प्रतिक्रिया और समाज का गड़बड़ाया हास्यबोध है ।

वह बचपन पास बुलाता है

दियली का तराजू लिए आया बेटा मेरा
अचानक सम्मुख मेरे
कहा! मॉम्स मैजिक देखो
मेरा तराजू
देखते ही तराजू कौंध गया गुजरा बचपन
दिवाली…दिवाली…हाँ, दिवाली
हमजोलियों संग कूदती -फाँदती
दियों को ताक पर, छत पर, मुंडेर पर
कभी इस ताक, कभी उस ताक
कितना उत्साह, कितना आनन्द
कौंध गया, आजी का दलिद्दर
वो सूप खड़खड़ाना।
मेरा उनके साथ जाना, ईश्वर पैठे,
दलिद्दर निकले
कहतीं औरतों का झुंड
कौंध गया। हाँ, कौंध गया
भोर के अन्धेरे में
इस ताक से उस ताक
सबसे ज्यादा दियलियों को बीनना
बड़ी कशमकश के साथ
होड़ा – होड़ी में
दियलियों में छेद बनाना
वो तराजू बनाना,
दुकान सजाना
माटी के भूरे का आटा बनाना
सिटकियों का चावल, दाल बना
वो बालू की चीनी,
खोपड़े के बुरादों की हल्दी
कंकड़ों को बटखरा
सब कौंध गया, एक क्षण में
होठों पर एक स्मित रेखा भींच गयी
कहाँ गया वो बचपन
माटी के दियों की वह सोंधी खुशबू
सब कहाँ गये
झालरों की जगमगाहट
आँखों को सुहाती है
पर, मन का भोलापन
वो उमंग, वो उत्साह
हमजोलियों संग बेपरवाही
सबकी कमी सताती है।
जीवन के इस मेले में
एकाकीपन सताता है।
वो बेपरवाह जिन्दगी
मुझे अपने पास बुलाता है।

 

भारतीय भाषा परिषद में गूंजी हिंदी और नेपाली की कविताएँ

कोलकाता :  भारत-नेपाल के बीच 31जुलाई, 1950 को हुई अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुसार दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के देश में बिना किसी रुकावट के रहने और काम करने के लिए स्वतंत्र हैं। इस संधि का लाभ उठाते हुए दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, साहित्यिक और राजनीतिक संपर्क दिन-प्रतिदिन प्रगाढ़ होते गए। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण शुक्रवार की शाम भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता में आयोजित काव्य लहरी-2 की काव्य संध्या में देखने को मिला जहाँ नेपाल के संघर्षशील और प्रतिष्ठित रचनाकार कवि और हिंदी के कवियों के साथ रूबरू हुए। हिंदी के साथ अन्य राष्ट्रीय भाषाओं के बीच मैत्री, प्रेम एवं संहति बनाए रखने की सार्थकता ही भारतीय भाषा परिषद की काव्य लहरी-2 के आयोजन की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। कविता पाठ आरंभ होने के पूर्व हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ आलोचक तथा वक्ता डॉ.ऋषिकेश राय ने नेपाली साहित्य का संक्षिप्त परिचय दिलाते हुए उपस्थित साहित्यानुरागियों को अवगत कराया कि लोकभाषा में जिस प्रकार हिंदी के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन किया ठीक उसी प्रकार नेपाली साहित्य में भानुभक्त आचार्य का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है जिन्होंने नेपाली भाषा में रामायण की रचना की। डॉ राय ने नेपाली और हिंदी साहित्य की संवेदना की एकता को रेखांकित करते हुए सांस्कृतिक सौमनस्य पर बल दिया। नेपाल में केदारमान व्यथित जैसे कवि भी हैं जो हिंदी में कविता लिख कर हिंदी की निरन्तर सेवा करते जा रहे हैं। यह भारत और नेपाल दोनों देशों के लिए बड़ा सुखद संकेत है।
प्रो.सत्य प्रकाश तिवारी ने अपने नेपाल प्रवास के दौरान जो प्रेम और सम्मान पाया उसके लिए उन्होंने नेपाल और वहाँ के कवियों के प्रति आभार जताया और गोष्ठी में पधारे सभी नेपाली कवियों का परिचय कराया। नेपाली साहित्य के ज्ञाता एवं साहित्यिक संस्थाओं में कई पदों पर नियुक्त श्री राधेश्याम लेकाली की अध्यक्षता में हिंदी के स्वनामधन्य कवि-ग़ज़लकार श्री नन्दलाल रोशन, शायर जनाब शकील गोंडवी, दीनबन्धु कालेज के प्रो.सत्यप्रकाश तिवारी, नेपाली कवि श्री ऋषभ देव घिमिरे, श्री नारायण प्रसाद होमगाई एवं श्री विकास कार्की ने अपनी कविताओं से सुधी श्रोताओं को रसासिक्त किया। काव्य संध्या में अंतिम कवि के रूप में संयोजक और संचालक डा.गिरिधर राय ने अपनी विनोदी शैली में एक हास्य रचना सुना कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। अध्यक्ष श्री राधेश्याम ने नेपाली रामायण के रचनाकार भानुभक्त की जीवनी पर हिंदी में पुस्तक लिखने के लिए नेपाली समुदाय की ओर से लेखक-कवि प्रो.सत्य प्रकाश तिवारी के प्रति तथा सुंदर व्याख्यान के लिए डा.ऋषिकेश राय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। काव्य लहरी के आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी एक कविता का पाठ भी किया। वरिष्ठ कवि डा.लखवीर सिंह निर्दोष नेे धन्यवाद ज्ञापित किया।
प्रेषक : भारतीय भाषा परिषद

मराठवाड़ा के किसानों ने खोजी बारिश के पानी से सिंचाई करने की नयी तरकीब

जालना : महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्र मराठवाड़ा के किसानों ने तलाबों की तरह दिखने वाली नालियों के जरिये वर्षा के जल का संचयन कर भूजल पुनर्भरण करते हुए खेती के काम को लाभकरी बनाने में कामयाबी हासिल की है।
ऊंचे क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों की जमीन तक पानी ले जाना भी एक दुरूह काम हो सकता है। जल संचयन की संरचना वाली नालियां पानी जमा करने और भूजल पुनर्भरण के लिये बिना उपयुक्त संरचना वाली नालियों से कहीं अधिक बेहतर साबित होती हैं।
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र का जालना जिला कम वर्षा वाले क्षेत्र में स्थित होने के चलते लगातार सूखे की चपेट में रहने को मजबूर है। जालना के गावों में सालाना औसतन 600 मिमि से 700 मिमि तक वर्षा होती है और यहां के किसान मुख्यतः सालाना दो फसलें – रबी और खरीफ उगाते हैं। जालना के जाफराबाद प्रशासनिक ब्लॉक के पापल गांव में करीब 250 परिवार बसते हैं और इसकी आबादी करीब 1500 की है।
कुछ दशक पूर्व सरकार ने किसानों को एक बराबर दर पर बिजली की आपूर्ति प्रारंभ की थी। इसके चलते मौजूदा कुओं से खेतों की सिंचाई का काम बेहद आसान हो गया नतीजतन कई किसान नए कुएं खोदने के लिये भी प्रेरित हुए। कुओं की मौजूदगी के बावजूद बेहद कम होने वाली बारिश ने ग्रामीणों के लिये कृषि के काम को और अधिक मुश्किल बना दिया। इसके बाद ग्रामीणों ने नालियों के जरिये बारिश के पानी का संचयन प्रारंभ किया जिसे दोहा मॉडल कहा जाता है। दोहा, जल संचयन की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें जमीन को खोदकर मलाब जैसा नालीनुमा स्थान तैयार किया जाता है। इसके चलते नालियों में न सिर्फ भारी मात्रा में वर्षा जल के संचयन की सुविधा मिलती है बल्कि यह भूजल पनर्भरण में भी काफी मददगार साबित होती है। इस अवधारणा ने इस क्षेत्र के किसानों की तकदीर ही बदलकर रचा दी है और अब वे अपनी जमीन से पहले से कहीं अधिक लाभ पाने लगे हैं।
नुकसान देती खेती
बिजली के कनेक्शन होने के बावजूद, किसान समय-असमय होने वाली बिजली के कटौती के कारण सिंचाई करने में काफी परेशानी भुगतते थे।अकोला देव गांव के रहने वाले भाउराव अटापले ने विलेजस्क्वायर.इन को बताया, ‘‘इसके चलते पहले से ही सूखे की मार झेल रहे किसानों पर अनावश्यक दबाव बनता था।’’इस छोटे से गांव के करीब 80 प्रतिशत किसानों के खेतों में खुले कुएं होते थे। हालांकि बेहद कम होने वाली बारिश के चलते साल के अधिकतर मौकों पर ये कुएं सूखे ही रहते थे। इसके अलावा वर्ष 2012 जैसे सूखे ने स्थितियां बद से बदतर कर दीं। किसान परमेश्वर बोबाडे, खरीफ के मौसम में कपास और तूअर दाल की खेती को याद करते हैं।
बोबाडे कहते हैं, ‘‘सिर्फ जुलाई से नवंबर के महीनों के बीच ही सिंचाई संभव थी।’’उनके खेत में 60 फीट गहरा कुआं खुदा होने के बावजूद उनके द्वारा रबी के मौसम में उगाई जाने वाली कोई भी फसल पूरी तरह से बारिश की दया पर निर्भर थी। वे पूरे साल में कृषि का काम करके अधिक से अधिक 25 हजार रुपये ही कमा पाते थे।
वर्षा जल का संचयन
पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए किसानों की आजीविका को सुरक्षित करने का काम करने वाली एक गैर लाभकारी संस्था, दिलासा फाउंडेशन ने चार साल पहले इस क्षेत्र में दोहा मॉडल को अपनाया। इसे अपनाने के बाद उन किसानों ने अपने कुओं के जल स्तर में वृद्धि देखनी शुरू की जिनके खेत नालियों के करीब थे और उनके अपने कुएं थे। अब उनके कुओं में पानी का स्तर इतना है कि वे फरवरी तक अपने खेतों की सिंचाई आराम से कर सकते हैं जबकि पहले उनके कुएं नवंबर या अधिकमतम दिसंबर के महीने में ही सूख जाते थे।
तालाबनुमा नायां
इसके अलावा जालना के जिन तीन अन्य गांवों में दोहा माॅडल को अपनाया गया उन्होंने भी रबी के मौसम के दौरान अपनी फसलों की सिंचाई के लिये मौजूद पानी की मात्रा के बढ़ने की सूचना साझा की।
दोहा के इतर, इन नालियों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों ने यह भी खुलाया किया कि चूंकि अब उनके कुओं में पर्याप्त मात्रा में पानी मौजूद है इसलिये पीने के पानी को लाने वाले टैंकरों की संख्या में भी कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होने के बाद उनके हरे चारे के उत्पादन की क्षमता में भी इजाफा हुआ है जिसके नतीजतन उनके पास मौजूद दुधारू पशुओं की संख्या भी बढ़ी है।
कृषि आय में इजाफा
बोबाडे कहते हैं कि अब उन्होंने अपने कृषि फसल पोर्टफोलियो में संशोधन किया है। बीते वर्ष उन्होंने खेती के लिये अपनी जमीन के एक छोटे से ही टुकड़े का उपयोग किया था। कपास के अलावा बाकी अन्य सभी फसलें मुख्यतः घरेलू खपत के लिये उगाई गई थीं। हालांकि बीते दो वर्षों में उन्होंने व्यवसायिक बीज उत्पादन के लिये फसल उगाने में महारथ हासिल कर ली है। इसके अलावा उन्होंने रेशन के कीड़ों को पालने (सेरीकल्चर) के हिसाब से शहतूत के पौधे भी लगाए हैं। उनका दावा है कि अब वे सेरीकल्चर और व्यवसायिक बीज उत्पादन के जरिये सिर्फ कृषि से ही सालाना करीब 3,50,000 रुपये कमा रहे हैं। इसके अलावा हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित होने के चलते उन्होंने और उनकी पत्नी विमल ने कुछ बकरियां भी खरीद ली हैं।
बोबाडे अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं। वे बताते हैं, ‘मेरी बेटी सिविल इंजीनियरिंग कर रही है और मैं चाहता हूं कि मेरा बेटा फार्मेसी का कोर्स करे ताकि वह हमारे क्षेत्र में एक दवाओं की दुकान खोल सके।’ इसी क्षेत्र के एक और किसान अंकुश बोबाडे कहते हैं कि कृषि से होने वाली उनकी वार्षिक आय दोगुनी होकर करीब 3,50,000 लाख प्रतिवर्ष हो गई है। इसके अलावा क्षेत्र के अन्य किसानों की कृषि आय में वृद्धि दर्ज की गई है।
अन्य चुनौतियां
कई फायदे होने के साथ दोहा मॉडल की अपनी कुछ चुनौतियां भी हैं। सिंचाई के लिये पानी में बराबरी की कमी इसकी सबसे प्रमुख चुनौती है। यह दोहा मॉडल सिर्फ उन्हीं किसानों के लिये फायदेमंद होता है जिनके खेत इन नालियों के करीब होते हैं। अगर इन नालियों से दूर चोती करने वाले किसानों के पास अपने खुद के कुएं नहीं हैं तो वे इसका फायदा उठाने में नाकामयाब ही रहेंगे।
इसी वजह से वे किसान जिनके खेत नालियों के तो नजदीक हैं लेकिन उनके पास अपना कुआं नहीं है, इसका लाभ उठाकर सिंचाई करने में अक्षम हैं। इसके अलावा चढ़ाई वाले स्थानों पर जमीन वाले किसानों को भी इसका पूर्ण लाभ नहीं मिलता। उतार वाली जमीन पर चोती करने वाले किसान, जिनकी जमीन उन नालियों के नजदीक हैं जो मानसून के दौरान पानी से भरती हैं, सबसे अधिक फायदे में रहते हैं।
जालना के लिये आगे का रास्ता
सभी ग्रामीणों को दोहा मॉडल का लाभ बराबर वितरित करने के लिये पानी के उपयोग को नियंत्रित करने की आवश्यकता है ताकि जिन किसानों के खेत नालियों से दूर स्थित हैं उनतक भी पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाया जा सके। हालांकि ऐसे किसी भी कदम को ग्रामीण सिर्फ आपसी समझबूझ और सहमति से ही लागू कर सकते हैं।
यह बात यहां से स्थानीय निवासियों और किसानों को ही समझनी होगी कि भूजल को रीचार्ज करके वे किसी एक को फायदा नहीं पहुंचा रहे हैं बल्कि इससे सबका ही फायदा होगा और ऐसे में उन्हें यह काम मिलकर ही करना होगा। इसका एक रास्ता किसानों के एक समूह के माध्यम से सहभागिता सिंचाई प्रबंधन का हो सकता है जिसमें समूह इन कुओं से पानी का एक निश्चित उपयोग सुनिश्चित करते हुए उन किसानों के खेतां तक पानी पहुंचाने के साधन तैयार कर सकता है जिनके खेत नालियों से दूर स्थित हैं।
इसके अलावा ऊंचे क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों की जमीन तक पानी ले जाना भी एक दुरूह काम हो सकता है। जल संचयन की संरचना वाली नालियां पानी जमा करने और भूजल पुनर्भरण के लिये बिना उपयुक्त संरचना वाली नालियों से कहीं अधिक बेहतर साबित होती हैं। एक सतही तलाब सबसे आम सिंचाई संरचना है। इस प्रकार की एक संरचना ऊंचे स्थान पर चोती करने वाले किसान को भी सिंचाई में मददगार साबित होगी। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ऐसी नालियों के जरिये पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना बड़ी वाटर हार्वेस्टिंग संरचानाओं के बनिस्बत वास्तव में सस्ता और स्थानीय विकल्प है। इन उपायों को अपनाकर सभी को बिना किसी परेशानी के सिंचाई के लाभ पहुंचाए जा सकते हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

विदेश से धन भेजने के मामले में भारतीय अव्वल, 2018 में 80 अरब डॉलर भेजे

वॉशिंगटन : विदेश से अपने देश में पैसे भेजने के मामले में भारतीय सबसे आगे रहे हैं। उन्होंने 2018 में भी शीर्ष स्थान को बरकरार रखा है। विश्वबैंक की रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासी भारतीयों ने इस वर्ष 80 अरब डॉलर भारत भेजे हैं। इसके बाद चीन का नंबर है। यहां के नागरिकों ने चीन को 67 अरब डॉलर भेजे हैं।
भारत और चीन के बाद मैक्सिको (34 अरब डॉलर), फिलिपीन (34 अरब डॉलर) और मिस्त्र (26 अरब डॉलर) का स्थान है। विश्वबैंक की ‘माइग्रेशन एंड रेमिटेंस’ रिपोर्ट के हालिया संस्करण के मुताबिक, धन प्रेषण के मामले में भारतीय सबसे आगे रहे हैं। बैंक ने अपने अनुमान में कहा कि विकासशील देशों को आधिकारिक रूप से भेजा गया धन 2018 में 10.8 प्रतिशत बढ़कर 528 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। पिछले साल इसमें 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी थी।
दुनिया भर के देशों में भेजा जाने वाला धन इस दौरान 10.3 प्रतिशत बढ़कर 689 अरब डॉलर होने की उम्मीद है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले तीन वर्षों में विदेश से भारत को भेजे गये धन में महत्वपूर्ण वृद्धि हुयी है। 2016 में यह 62.7 अरब डॉलर से बढ़कर 2017 में 65.3 अरब डॉलर हो गया है। 2017 में विदेश से भेजे गये धन की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2.7 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
विश्वबैंक ने कहा कि विकसित देशों खासकर अमेरिका में आर्थिक परिस्थितियों में मजबूती और तेल की कीमतों में वृद्धि का संयुक्त अरब अमीरात जैसे जीसीसी देशों से निकासी पर सकारात्मक प्रभाव से धन प्रेषण में वृद्धि हुयी है। अमीरात से निकासी में 2018 की पहली छमाही में 13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है। बैंक ने कहा कि बांग्लादेश और पाकिस्तान में उनके प्रवासी नागरिकों द्वारा भेजे जाने वाले धन में क्रमश: 17.9 और 6.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है।

दीपिका पादुकोण ने इस साल 113 करोड़ रुपए कमाए

मुम्बई : फोर्ब्स ने सबसे ज्यादा कमाई करने वाली इंडियन सेलिब्रिटीज की सूची जारी की। लिस्ट में सेलेब्स की 2017-18 की कमाई का लेखा-जोखा दिया गया। बॉलीवुड की कई जोड़ियों और एक ही परिवार के दो सदस्यों ने भी लिस्ट में जगह बनाई है। टॉप-10 में न्यूली वेड कपल दीपिका-रणवीर का नाम है। इस साल करोड़ कमाई के साथ दीपिका चौथे और रणवीर 84.67 करोड़ के साथ आठवें नंबर पर हैं। कोहली और अनुष्का शर्मा भी फोर्ब्स की लिस्ट में शामिल हैं। हालांकि, कोहली (228.09 करोड़) का नंबर दूसरा और अनुष्का (45.83 करोड़) का नंबर 16वां है। आलिया (58.83 करोड़) 12वें और उनके ब्वॉयफ्रेंड रणबीर कपूर (44.5 करोड़) 17वें नंबर पर हैं। अमिताभ बच्चन (96.17 करोड़) सातवें और उनकी बहू ऐश्वर्या (16.83 करोड़) 56वें नंबर पर हैं। अनिल कपूर (15.5 करोड़) 65वें नंबर पर हैं और उनकी बेटी सोनम कपूर (13.23 करोड़) 76वें नंबर पर हैं।
शीर्ष 10 में 3 क्रिकेटर
टॉप 10 में तीन क्रिकेटरों विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी (101.77 करोड़) और सचिन तेंडुलकर (80 करोड़) शामिल हैं। महेंद्र सिंह धोनी पांचवें और सचिन 9वें नंबर पर हैं। बैडमिंटन खिलाड़ियों में पीवी सिंधु (36.5 करोड़) कमाई में टॉप पर हैं। लिस्ट में उनकी 20वीं पोजिशन है।

107 साल की हुईं इलीन ऐश, दुनिया की सबसे बुजुर्ग क्रिकेटर

लन्दन : दुनिया की सबसे बुजुर्ग टेस्ट क्रिकेटर इलीन ऐश ने हाल ही में 107वां जन्मदिन मनाया। 1937 में इंग्लैंड महिला टीम के लिए डेब्यू करने वाली इलीन का जन्म 1911 में हुआ था। उन्होंने 12 साल के लंबे करियर में सात टेस्ट खेले। इस दौरान उन्होंने 23.00 की औसत 10 विकेट लिए। इलीन ने क्रिकेट के बाद योग को अपना लिया। वे 30 साल से भी ज्यादा समय से योग कर रही हैं। योग करते हुए उनके एक विडियो को आईसीसी ने ट्विटर पर शेयर किया।

फेसबुक-इंस्टाग्राम पर राजनीतिक विज्ञापनों के लिए पहचान और लोकेशन बताना जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में रूसी दखलंदाजी के आरोपों का सामना कर रही फेसबुक ने भारत में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर अपनी पॉलिसी में बदलाव किया है। फेसबुक ने गुरुवार को एक ब्लॉग पोस्ट में जानकारी दी कि लोकसभा चुनाव के दौरान फेसबुक-इंस्टाग्राम पर राजनीतिक विज्ञापन चलाने के लिए विज्ञापनदाताओं को अपनी पहचान और लोकेशन बतानी होगी। फेसबुक का दावा है कि इससे चुनावों में विदेशी दखलंदाजी से बचा जा सकेगा।
विज्ञापन देने वाले का नाम भी लिखा जाएगा
फेसबुक की प्रोडक्ट मैनेजर सारा क्लार्क स्किफ ने ब्लॉग पोस्ट में बताया, “फेसबुक-इंस्टाग्राम पर दिखाए जाने वाले राजनीतिक विज्ञापन को लेकर हम नए बदलाव करने जा रहे हैं। इससे पहले हमने यही बदलाव अमेरिका, ब्राजील और यूके के चुनावों के दौरान किए थे और अब हमारा अगला कदम भारत में होने वाले चुनावों पर है।”
ब्लॉग पोस्ट में आगे लिखा है, “इस बदलाव का सीधा असर भारत में अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के राजनीतिक विज्ञापनों पर होगा। अब अगर कोई भी व्यक्ति राजनीति से जुड़ा विज्ञापन फेसबुक या इंस्टाग्राम पर चलाना चाहता है तो उसके लिए उसे अपनी पहचान और लोकेशन की जानकारी देना होगा।”
सारा ने बताया, “नई पॉलिसी के तहत, फेसबुक-इंस्टाग्राम पर चलने वाले राजनीतिक विज्ञापनों पर राजनीतिक विज्ञापन लिखा होगा ताकि लोगों को पता चल सके। साथ ही इस पर विज्ञापन देने वाले का नाम भी लिखा जाएगा। हालांकि, ये पॉलिसी न्यूज पब्लिशर्स पर लागू नहीं होगी।”
फेसबुक के मुताबिक, राजनीतिक विज्ञापन दिखाने को लेकर नए बदलाव शुक्रवार से ही लागू हो गए हैं। साथ ही विज्ञापन दिखाने के लिए वेरिफिकेशन भी शुक्रवार से कराए जा सकते हैं।
फेसबुक ने किए ये दो बदलाव
राजनीति से जुड़े विज्ञापन फेसबुक या इंस्टाग्राम पर दिखाने पर नीचे डिस्क्लेमर में विज्ञापनदाता का नाम भी दिखाई देगा। साथ ही इस विज्ञापन को देने वाले व्यक्ति का नाम भी दिखाया जाएगा। इसके अलावा राजनीतिक विज्ञापन को ‘एड लाइब्रेरी’ में 7 साल तक के लिए स्टोर किया जाएगा ताकि बाद में भी इस एक्सेस और देखा जा सके।
इस तरह करा सकेंगे वेरिफिकेशन
फेसबुक-इंस्टाग्राम पर राजनीतिक विज्ञापन दिखाने के लिए विज्ञापनदाता भारत सरकार की तरफ से जारी आइडेंटिटी प्रूफ (पैन कार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट या लाइसेंस) के जरिए अपनी पहचान और लोकेशन का वेरिफिकेशन करा सकेंगे। इसके लिए विज्ञापनदाता अपने मोबाइल फोन या कम्प्यूटर पर फेसबुक लॉग-इन कर अपनी पहचान और लोकेशन की जानकारी दे सकते हैं। मोबाइल के जरिए वेरिफिकेशन कराने के लिए अपडेटेड ऐप डाउनलोड करना होगा।