नयी दिल्ली : दिल्ली के इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में गत 17 जुलाई 2019 को पत्रकार व पर्यावरणविद् अभय मिश्रा के वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पर्यावरण आधारित उपन्यास ‘माटी मानुस चून’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में श्री रामबहादुर राय, अध्यक्ष, आई.एन.जी.सी., डॉ. सच्चिदानंद जोशी, सदस्य सचिव व वरिष्ठ लेखक, प्रो. मौली कौशल, विभागाध्यक्ष, जनसंपदा विभाग, श्री सोपान जोशी, घुमक्कड़ी परम्परा के अग्रज, युवा अग्रदूत, लेखक व पत्रकार ने पुस्तक पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश चन्द्र गौड़, विभागाध्यक्ष कलानिधि, आई.एन.जी.सी. द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् एवं रचनाकार अनुपम मिश्र की पत्नी श्रीमती मंजू मिश्र भी उपस्थित थीं। ज्ञात हो कि यह उपन्यास अनुपम मिश्र की आत्मीय स्मृति को ही समर्पित है। इस मौके पर मौली कौशल ने पर्यावरण की दयनीय स्थिति पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि हालाँकि उपन्यास सन् 2095 में शुरू होता है, लेकिन पर्यावरण की दुर्दशा का चित्रण हमारे वर्तमान काल का है। गंगा सिर्फ़ नदी न रह कर हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी बन कर प्रत्यक्ष है। साक्षी, तपन और गीताश्री की कहानी हमें दॉस्तोवस्की के कथानक की याद दिलाती है। पुस्तक में गिरमिटिया देशों में जन्मी नयी पीढ़ी के दर्द का आख्यान भी है। सोपान जोशी ने भारतीय नदियों के प्रति राजनीतिक उदासीनता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास सामाजिक पत्रकार की क़लम से निकला है। यह भी जानना ज़रूरी है कि कथा सिर्फ़ यथार्थ से नहीं निभती, उसमें कल्पना का बड़ा योगदान है। समाज की ओर से सवाल यूँ उठते हैं कि पर्यावरण के प्रति कोई संवेदना ही न हो। यह संवेदना कल्पना क्षेत्र में ही मुमकिन है। यदि चौमासे की तेज़ बारिश हिमालय से नहीं टकराती, तो भूतल नहीं बन पाता। यह पर्यावरण का संतुलन है। इस संतुलन का बिगड़ना और राजनीतिक उदासीनता हमारे समाज की सबसे बड़ी चुनौती है। इस उदासीनता को दर्शाना आसान नहीं, यह जोख़िम अभय ने उठाया है। सच्चिदानन्द जोशी ने ‘जल से जुड़े’ अभय मिश्रा की तुलना तपस्वी भागीरथ से की जिन्होंने विश्व में गंगा की पवित्रता के लिये तप किया। नदियाँ सिर्फ़ पानी देने वाली या जीवनदायिनी नहीं हैं, हमारे समाज की आत्मा है। हमारी शिक्षा प्रणाली ने नदियों को एक भूगोल खण्ड ही बनाया, उनसे आत्मीय संबंध नहीं बनने दिया। यह हमारी शिक्षा प्रणाली की हार है। इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र में ख़ास कार्यक्रम शुरू किये गये हैं जिनमें नदियों के प्रति सामाजिक समावेश किया गया है। वरिष्ठ पर्यावरणविद् अनुमप मिश्र को याद करते हुए सच्चिदानन्द जोशी ने अभय मिश्रा को उन्हीं की परम्परा का भविष्य माना। जोशी ने एलिवन टॉफ्श्लर (Alvin Tofler) की 1970 में छपी पुस्तक ‘फ्यूचर शॉक’ का संदर्भ देते हुए कहा कि ‘माटी मानुष चून’ इसी लेखनी की पद्धति में नया पड़ाव है।
राम बहादुर रॉय ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि पुस्तक पढ़ते हुए इंटेलिजेन्स ऐजेन्सी के सबसे क़ाबिल अफ़सर मलय कृष्ण धर की याद आयी। ‘Gangland Democracy’ में धर ने ज़मीनी अपराधों का पर्दाफ़ाश किया है। ‘माटी मानुष चून’ भी इसी तरह गंगा नदी के प्रति हो रहे अन्याय को रेखांकित करती है। यह किताब गंगा नदी की ऐन्जियोग्राफ़ी है। कार्यक्रम में सभी सम्मानित एवं श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक श्री अरुण माहेश्वरी ने कहा कि प्रसन्नता इस बात की है कि अब कार्यक्रम में पुस्तकों की चर्चा फ्लैप पढ़कर ही नहीं की जाती वरन् पुस्तक के पृष्ठ पर चर्चा की जाती है। ‘नदी के इर्द-गिर्द का समाज’ बुनकर एक नए तरह की उपन्यास की रचना की गई है। यह स्वागत योग्य कदम है कि आज की युवा प्रतिभाओं एवं वरिष्ठ लेखकों द्वारा न केवल जीवन की समस्याओं पर वरन् पर्यावरण, संस्कृति भाषा, शिक्षा आदि विषयों पर बेहतरीन पुस्तकें लिखीं जा रही हैं। वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, खोजबीन का आनंद, कुली लाइन्स, माटी मानुष चून आदि पुस्तकें अमेजॉन बिक्री केन्द्रों पर सफ़ल मानी जा रही हैं। इसी क्रम में ज्ञान का ज्ञान, माता हिमालय पिता हिमालय आदि पुस्तकें भी शीघ्र प्रकाशित होने वाली हैं।
गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।
गुरु की पूजा से परब्रह्म की प्राप्ति होती है। ज्ञान की प्राप्ति होती है और जीवन के सार से साक्षात्कार होता है। इसलिए धर्मशास्त्रों में गुरु-शिष्य परंपरा की विशेष महत्ता बताई गई है। शास्त्रों के अनुसार ‘गुरु’ शब्द में उसका महत्व छिपा हुआ है। ‘गु’ शब्द का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ शब्द का अर्थ है प्रकाश। यानी गुरु मानव को अंधकार से प्रकाश की और ले जाते हैं। अपने शिष्य के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं और अपने शिष्य के सफल जीवन के लिए उचित मार्गदर्शन करते हैं।
आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाए जाने के कई ऐतिहासिक पौराणिक कारण हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार हजारों वर्ष पहले इसी तिथि पर आदि गुरु शिव ने सप्तऋषियों को ब्रह्म के बारे में ज्ञानोपदेश देना आरंभ किया था तबसे आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाने लगा। इसी तिथि को गौतम बुद्ध तथा जैन तीर्थंकर महावीर ने अपने प्रथम शिष्य बनाए और गुरु के रूप में अपने कार्य की शुरुआत की। यह दिन बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी पवित्र है।
महर्षि वेदव्यास का हुआ था जन्म
मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन ही ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और 18 पुराण जैसे अद्भुत साहित्यों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इस पर्व को गुरु व व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। हमें अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित राजनाथ झा के मुताबिक सदियों से चली आ रही गुरु शिष्य की परंपरा का निवर्हन गुरु पूर्णिमा पर देखने को मिलता है। शिष्य देश-विदेश में कहीं भी हो इस मौके पर गुरु पूजन के लिए अवश्य पहुंचते हैं। राजधानी पटना के गुरु बलराम के शिष्य देशभर में हैं। पर गुरु पूर्णिमा पर उनके शिष्य गुरु पूजन को पटना स्थित मातृउदबोधन आश्रम जरूर पहुंचते हैं। हालांकि गुरु बलराम ब्रह्मलीन हो चुके हैं। चार भागों में वेदों को विभक्त किया महर्षि वेदव्यास ऋषि पराशर के पुत्र थे। हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास तीनों कालों के ज्ञाता थे। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देख कर यह जान लिया था कि कलियुग में धर्म के प्रति लोगों की रुचि कम हो जाएगी। मनुष्य ईश्वर में विश्वास न रखने वाला, कर्तव्य से विमुख और कम आयु वाला हो जाएगा। एक बड़े और सम्पूर्ण वेद का अध्ययन करना उसके बस की बात नहीं होगी। इसलिये महर्षि व्यास ने वेद को चार भागों में बांट दिया। व्यास ने वेदों को अलग-अलग खण्डों में बांटने के बाद उनका नाम ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद रखा। वेदों का इस प्रकार विभाजन करने के कारण ही वह वेद व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्वेद का ज्ञान अपने प्रिय शिष्यों वैशम्पायन, सुमन्तुमुनि, पैल और जैमिन को दिया।







