Thursday, July 2, 2026
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स्वतन्त्रता

सिम्पी मिश्रा

स्वार्थ से परमार्थ तक,

विरोध से बलिदान तक !

भारतीयता का मान धरो,

अपनी स्वतंत्रता का उचित सम्मान करो!!

बढ़ो आगे, महज भारतीयता की,

कागजी पहचान से…

देश का सम्मान करो , सच्चे जी-जान से !

सहेजो अपनी स्वतन्त्रता को,

आन-बान और शान से!!

व्यर्थ न लाओ बीच में,

साम्प्रदायिक अभिमान को !

बढ़ाओ आपसी सौहार्दता ,

एक-दूजे के मान सम्मान से !!

संकीर्णता से मुक्त हो,

विचारों से उन्मुक्त बनो!

कर्म से महान बनो,

धर्म से समान रहो !!

अपनी जाति, राष्ट्र का,

दिल से “तुम” सम्मान करो !

स्वतन्त्र हो , स्वतंत्र रहो…..

“स्वतन्त्रता” का मान रखो !!

                

                                

यूपी के हर सरकारी स्कूल में बनेगा किचन गार्डन

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे मिड डे मील के लिए फल-सब्जियां उगाएंगे और खाएंगे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) ने उत्तर प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों को नोटिस जारी करके यह निर्देश दिया है। मंत्रालय ने इस योजना का नाम ‘किचन गार्डन’ रखा है। इसमें आठवीं कक्षा तक के छात्र हिस्सा लेंगे।
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा- जब बच्चे अपने हाथ से सब्जी और फल पैदा करने के लिए मेहनत करेंगे तो सब्जी और फल का स्वाद अलग होगा। क्योंकि यह उनकी मेहनत का फल है तो वे इससे जुड़ पाएंगे। इस योजना का उद्देश्य मिड डे मील के पोषक मूल्य को बढ़ावा देना है। साथ ही पौधे, सब्जियों और फलों को उगाकर कृषि में बच्चों को प्रोत्साहित करना है।
मंत्रालय के निर्देशों के मुताबिक, जिन स्कूलों के पास पौधे उगाने के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है। वह छत पर बगीचे का निर्माण कर सकते हैं और उपज की खेती के लिए गमले, कंटेनर, बैग और अन्य तकनीक इस्तेमाल कर सकते हैं। बच्चों द्वारा रसोई बनाने में स्कूल के कर्मचारी और शिक्षक उनकी मदद करेंगे।

करीब 600 साल पुराना है सुब्रमण्या घाटी मंदिर, यहां होती है नाग देवता की पूजा

हिन्दू धर्म में सर्पों की पूजा का विशेष महत्व है। नाग पंचमी के अवसर पर देशभर के मंदिरों में नाग देवता की पूजा की जाती है। बेंग्लुरू शहर से 60 किमी की दूरी पर डोड्डाबल्लापुरा तालुका के पास नाग देवता का विशेष मंदिर है, जिसे घाटी सुब्रमण्या मंदिर के नाम से जाना जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान कार्तिकेय सभी नागों के स्वामी माने गए हैं। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रमण्या नाम से भी जाना जाता है। सुब्रमण्या घाटी मंदिर में भगवान सुब्रमण्या की सात मुख वाले सर्प के रूप में पूजा होती है। इस मंदिर में दोष निवारण पूजा जैसे सर्प दोष और नाग प्रतिष्ठापन आदि भी किया जाता है।
भगवान नरसिम्हा हुए थे प्रकट
पौराणिक कथाओं के अनुसार इस स्थान पर भगवान सुब्रमण्या ने सर्प के रूप में तपस्या की थी। इस दौरान उन्हें एक नाग परिवार के बारे में पता चला जिसे भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ परेशान कर रहा था। इसलिए भगवान सुब्रमण्या ने भगवान विष्णु का ही अवतार माने जानेवाले भगवान नरसिम्हा की तपस्या की और उनसेप्रार्थना करी कि वह गरुड़ को ऐसा करने से रोक लें। अंतत: यहां पर भगवान विष्णु अपने नरसिम्हा रूप में प्रकट हुए थे और भगवान सुब्रमण्या की बात मान ली थी। यही वजह है कि इस स्थान पर भगवान सुब्रमण्या और नरसिम्हा दोनों की पूजा की जाती है।
सात मुख वाली मूर्ति है स्थापित
मंदिर के मुख्य परिसर में ही भगवान नरसिम्हा और भगवान सुब्रमण्या की सात मुख वाली मूर्ति स्थापित है। यहां पर भगवान कार्तिकेय पूर्व की ओर व भगवान नरसिम्हा ने पश्चिम की ओर मुख किया है। इसलिए परिसर के ऊपर एक दर्पण लगाया गया है जिसमें भक्त दोनों देवताओं के एकसाथ दर्शन कर सकतेहैं। ऐसा माना जाता है कि यह मूर्ति स्वयंभू है और इसी स्थान प्रकट हुई थी।
श्रद्धालु स्थापित करते हैं सर्प
मान्यता है कि इस मंदिर में यदि निसंतान दंपति नाग देवता की मूर्ति स्थापित करतेहैं तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। इसके लिए मंदिर में नाग प्रतिष्ठापन के लिए जगह तय है। इस जगह श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित सर्पों की अनेक मूर्तियां रखी हुई हैं। मंदिर में स्थित सर्प की मूर्ति पर श्रद्धालु दूध अर्पित करते हैं। मान्यता है कि यह मंदिर 600 वर्ष से ज्यादा पुराना है। वास्तविक मंदिर को संदूर के शासक घोरपड़े ने बनवाया था। कहा जाता है कि बाद में इस मंदिर को अन्य राजाओं द्वारा विकसित किया गया। ये तीर्थस्थल द्रविड़ शैली में बना है। इस मंदिर में नाग पंचमी और नरसिम्हा जयंती का त्योहार विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है। इसके साथ ही यहां पर वार्षिक उत्सव के रूप में पुष्य शुद्ध षष्ठी भी मनाई जाती है जिस पर मंदिर परिसर में मेला भी लगता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

दिव्यांग बेटे को ओवरसीज स्कॉलरशिप दिलाने के लिए 11 महीने लड़ी माँ

भोपाल : कोलार की सांईनाथ कॉलोनी में रहने वाले हर्ष वजीरानी भारत सरकार की ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए चयनित हुए हैं। वे मध्यप्रदेश में दिव्यांग श्रेणी के इकलौते व्यक्ति हैं। हर्ष कहते हैं कि चयन जरूर हो गया, लेकिन डेढ़ करोड़ रुपये की स्कॉलरशिप के लिए इतने ही रुपयों की साल्वेंसी माँगी गयी । सारे नाते-रिश्तेदारों ने हमसे किनारा कर लिया था। हमारे लिए डेढ़ करोड़ रुपए की साल्वेंसी जुटाना पहाड़ जैसा काम था। मां ने हार नहीं मानीं। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत और विभाग के अफसरों से मिलीं। नियम बदला और तय हुआ कि 50 हजार रुपए की एफडी से काम चल जाएगा। हर्ष एयरो स्पेस इंजीनियरिंग के लिए ऑस्ट्रेलिया की सिडनी यूनिवर्सिटी जा रहा हैं। यूनिवर्सिटी ने मुझे दस लाख रुपये की अतिरिक्त स्कॉलरशिप दी है और शिक्षण के लिए भी मौका दिया है। मैं सेटेलाइट बस डिजाइन पर काम करना चाहता हूं। माँ दीपिका की जिद थी, हर हाल में हर्ष का सपना पूरा हो। वह बताती हैं, बड़े बेटे को ब्रेन ट्यूमर हो गया था। अपने गहने बेचकर उसका इलाज हिंदुजा में कराया, लेकिन वह बच नहीं सका। पति और बहू तो पहले ही चल बसे थे। बस छोटा बेटा हर्ष ही है अब मेरे जीने की वजह। हर्ष बचपन से ही आर्थो और न्यूरो की बीमारी से परेशान है। उसके 5 बड़े ऑपरेशन कराए। ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिए चयनित तो हो गया, लेकिन डेढ़ करोड़ की साल्वेंसी जुटाना संभव नहीं था। डॉ. प्रकाश वर्मा और एचवी जोशी ने इसमें मदद भी की। फिर, मैंने दिल्ली पहुंचकर मंत्री थावरचंद गेहलोत के दफ्तर में बात की। धीरे-धीरे रास्ता निकलता गया । भोपाल आई तो दिग्विजय सिंह, नरेश ज्ञानचंदानी ने गेहलोत जी से समन्वय किया। साल्वेंसी को एसडीएम और तहसीलदार से अटेस्टेट कराने में मुश्किलें भी हुईं। मैं बीते 11 महीने से हर दिन इस सिलसिले में किसी न किसी से मिलती रही हूँ। बेटा हर्ष हमेशा दूसरों के लिए सोचता है। दिल्ली में रहकर उसने नौकरी से जो पैसे बचाए थे, उसे नारायण सेवा संस्थान और सैनिक कल्याण कोष में दान कर दिया था। हर्ष कहते हैं कि मैं 2010 में ट्रिपल आईटी ग्वालियर से पासआउट हूँ। 2013 में कॉमनवेल्थ स्कॉलरशिप के लिए चयनित हुआ था, लेकिन उस वक्त दुर्भाग्य ही हावी रहा। पिताजी नरेंद्र वजीरानी मेरे कॅरियर की चिंता में बीमार हुए और चल बसे। फिर भाई-भाभी भी नहीं रहे। मैं सिलेक्ट हो गया हूँ लेकिन मेरी चिंता मां के लिए है। मैं आस्ट्रेलिया चला जाऊंगा तो मां अकेले कैसे रहेगी?

कृत्रिम खेत में लगाई बाजरे की बालियां, ताकि पक्षी भूखे न रहें

जूनागढ़ : तस्वीर गुजरात के जूनागढ़ की है। यहां एक किसान ने कृत्रिम खेत में बाजरे की बालियां लगा दी हैं। ताकि बारिश के कारण पक्षी भूखे न रहें। ऐसे में रोजाना 2000 से ज्यादा तोते और अन्य पक्षी दाना चुगने के लिए खेत में पहुंच रहे हैं। केशोद इलाके का यह खेत धनसुखभाई डोबरिया का है। उन्होंने बताया कि बारिश में पक्षियों को खाने की समस्या रहती है। इसलिए यह खेत बनाया है। इसका नाम ‘अन्न क्षेत्र’ रखा है।

सामाजिक समरसता के अद्भुत कवि तुलसीदास — डॉ० इंदुशेखर तत्पुरुष

 कोलकाता :   तुलसी के साध्य राम हैं पर साधन है उनकी कविता। कविता को परिभाषित करते हुए तुलसीदास कहते हैं जो आम आदमी को संतुष्ट करती है, उनकी समस्याओं का समाधान करती है वह कविता है। तुलसी के राम सबके लिए हैं। तुलसीदास जप-तप एवं योग पर भरोसा न करके सुमिरन पर करते हैं। उनका काव्य हमारे भीतरी एवं बाहरी तापों का शमन करता है, यही कारण है कि वे सामाजिक समरसता के अद्भुत एवं क्रांतिकारी कवि माने जाते हैं। ये कथन हैं राजस्थान साहित्य अकादमी, जयपुर के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रख्यात कवि डॉ० इंदुशेखर तत्पुरुष के जो सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय द्वारा आयोजित तुलसी जयंती समारोह में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। उन्होंने कहा तुलसीदास अपनी कविताओं में नयी-नयी उपमाएं व उद्भावना लाते हैं इसलिए सांस्कृतिक क्रांतिकारी माने जाते हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो० चक्रधर त्रिपाठी ने कहा कि तुलसीदास ने रामचरित मानस में हमारी अस्मिता को वाणी दी है। रामचरित मानस का अध्ययन आवश्यक है इसे बिना पढ़े समझे हम भारत को पहचान नहीं सकते। रामचरित मानस का लक्ष्य ही है आदर्श मानव की स्थापना एवं आदर्श परिवार की स्थापना करना।

कार्यक्रम का शुभारम्भ जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ। तत्पश्चात जालान काॅलेज की छात्राओं एवं कामायनी पाण्डेय द्वारा तुलसीदास जी के पदों की सांगीतिक प्रस्तुति की गयी। अतिथियों का स्वागत किया संदीप जालान, अनुराधा जालान, ईशान जालान एवं अपूर्वी जालान ने तथा स्वागत भाषण दिया पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ० प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि तुलसी का काव्य हमारा मार्गदर्शक है इसके माध्यम से हमें राम की कृपा सहज ही प्राप्त हो सकती है।

उक्त कार्यक्रम में शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार और विभिन्न महाविद्यालयों के प्राध्यापक एवं छात्र और तुलसी प्रेमियों की महत्वपूर्ण उपस्थिति रही। कार्यक्रम को सफल बनाने में महावीर प्रसाद बजाज, अरुण प्रकाश मल्लावत, पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, शांतनु मुखर्जी, दिनेश शर्मा, विजय तिवारी, अरविन्द तिवारी, एवं परमजीत पंडित की सक्रीय भूमिका रही।

मेघे ढाका तारा -‘सेपरेशन इज इसेंशियल’

डॉ. विजया सिंह

काफी मुश्किलों के बाद और माँ की अतिशय (और कई बार अचम्भित कर देने वाली) साहसिकता के कारण ‘मेघे ढाका तारा‘(मेघाच्छादित नक्षत्र) देख ही आई. यह फिल्म बंगाल के प्रसिद्ध फिल्मकार और पटकथा लेखक रित्विक घटक के जीवन और कार्यों के साथ तत्कालीन परिस्थितियों (बंगाल के अकाल, प्रमुख आंदोलनों, स्वतंत्रता प्राप्ति( हस्तांतरण), असंतोष, कम्युनिष्ट पार्टी के दलीय मतभेद, फूट) को लेकर कलाकार के चेतन और अवचेतन के स्तर पर क्रिया प्रतिक्रिया और अंतःक्रिया की मोटी-महीन बुनाई करती चलती है. गौरतलब है कि रित्विक घटक ने स्वयं भी इस नाम से फिल्म बनाई है. कमलेश्वर मुखर्जी द्वारा निर्देशित यह फिल्म मुझे बेहतरीन लगी. शाश्वत चटर्जी और अनन्या चटर्जी ने नीलकंठ बागची और दुर्गा बागची के रूप में दो प्रेम करने वाले संवेदनशील लोगों की कहानी कही हैं जिनके बीच का अलगाव ही सत्य है, जरूरी है. तंगहाल दुर्गा कहती भी है -‘सेपरेशन इज इसेंशियल’.

क्या कलाकार, रचनाकार होना ही लगभग आत्महंता होना है? बार-बार लगता है कि ईमानदार रचनाकार ‘जो है’ और ‘होना चाहिए’ के द्वंद्व में सारे दाँव हारता जाता है. कहने की अपार कोशिशों के बाद उसे पता चलता है कि कोई उसे सुनना ही नहीं चाहता. हाथों से फिसलते जाते सारे तंतु दिमाग और दिल का संतुलन बिगाड़ने लगते हैं. इलेक्ट्रिक शॉक में बेदम होता नीलकंठ डॉक्टर से कहता है कि हजारों बोल्ट के विचार हमेशा उसके दिमाग में चहलकदमी करते हैं. इतने इलेक्ट्रिक शॉक से तो उसे केवल सुरसुरी होती है. ऐसी दुर्दांत चेतना के साथ क्या अकेले हो जाना संभव है…नहीं..बिल्कुल नहीं. लेकिन संयम और संतुलन के बिना तो स्व-विनाश को खुला आमंत्रण भी देना है. गरीबी जनित अभावों, महत्वाकांक्षा तथा मोहभंग के कारण स्वयं से ही उसका संबंध टूट जाता है. वह इतना अकेला हो गया है कि वह खुद भी अपने साथ नहीं और दुर्गा बच्चों के साथ बिल्कुल अकेली..

सामान्य से इतर गहन अनुभूति, पक्षधरता, सिद्धांत तथा मानव सत्य की बात करने वाला क्यों एक पल में समझौताहीन महामानव लगता है जो पागलखाने में पागलों के साथ ही एक नाटक का मंचन कर डालता है और दूसरे ही पल में एक ऐसा इंसान जिसे अपने काम की धुन में पत्नी, तीन बच्चों का कोई ख्याल नहीं रहता. चेतन-अवचेतन में दौड़ लगाते नीलकंठ के लिए असफलता का अवसाद ही सच है. वह जानता है कि पैसा नहीं काम ही बचा रह जाएगा अनवरत (तुम देखना), कि उसका विश्वास सभी में एक मनुष्य होने में है जो धोखेबाज नहीं, कायर नहीं. वहीं बहुत-बहुत प्यार करने वाली पत्नी जो उसकी बीमारी, बढ़ते अतिवाद, न छूटने वाले नशे और परिवार की जद्दोजहद में नौकरी करती है, पढ़ाई करती है. नौकरी व बच्चों के साथ दूर चली जाना चाहती है. वह समझ चुकी है कि नीलकंठ उससे अनजानी दूरियों तक छिटक गया है. उसकी परेशानियाँ वह जानता भले हो पर कर कुछ भी नहीं सकता. वह जब भी उसकी ओर देखती है या उसे सुनते हुए जबरन दूसरी ओर देखने लगती है तो लगता है मानो हताशा में उसके गालों के गड्ढे कहीं ज्यादा गहरे हो गए हैं. जिम्मेदारियों ने साड़ी को गंदला कर दिया है.

उसका सच, उसका जीवन, उसकी चेतना नीलकंठ से इतनी भिन्न हो गई है कि शायद एक-दूसरे को समझना-समझाना-चाहना-बने रहना मुश्किल हो गया है. नीलकंठ को धैर्यहीन सृजन करना है, दुर्गा को बचे हुए को प्राणपण से बचाना है. मनुष्य व उसके सत्य का अर्थ उसके लिए जीवन के उलझे तारों को फिर से करीने से पिरोना है. बाकी शेष बचाना लेना है, संभालना है, संवारना है. वह स्त्री है, तीन बच्चों की माँ है. नीलकंठ को सामाजिक-बौद्धिक दुनिया के लिए प्रतिबद्ध होना है जबकि दुर्गा के लिए दुनिया तो उसके निज के संसार में आसन्न उपस्थित है. उसकी दुनिया में उसके भूखे बच्चे हैं, उनकी शिक्षा-दीक्षा की चिंता है, अदद नौकरी की जरूरत शामिल है. उसे भी अपनी सृष्टि की रक्षा करनी है, संजोना है. निश्चित रूप से उसकी और नीलकंठ की जद्दोजहद दो महत्वपूर्ण रचना संसारों के निर्माण से संबंद्ध है. भिन्न किंतु आवश्यक. साथ चलकर एक दूसरे की बची-खुची शक्ति को छीन लेना प्यार का, जीवन का अपमान ही तो है. ऐसे में अलगाव ही उसका एकमात्र बचाव है. निर्णय दुर्गा का है. वही यह फैसला कर सकती है, उसमें ही यह ताकत है और उसके लिए यह जरूरी भी है. नीलकंठ अपने ही तीव्र वेग में खोया निर्णय लेने की ताकत को खो चुका है. अतएव दुर्गा चुनती है और नीलकंठ स्वीकार करता है. सर्जक होने की कीमत दोनों चुकाते हैं.

जानिए तुलसीदास के जीवन की ऐतिहासिक घटनाएं

तुलसीदास के जीवन की कुछ घटनाएं एवं तिथियां भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। कवि के जीवन-वृत्त और महिमामय व्यक्तित्व पर उनसे प्रकाश पड़ता है।

यज्ञोपवीत

मूल गोसाईं चरित के अनुसार तुलसीदास का यज्ञोपवीत माघ शुक्ला पंचमी सं० १५६१ में हुआ –

पन्द्रह सै इकसठ माघसुदी। तिथि पंचमि औ भृगुवार उदी ।
सरजू तट विप्रन जग्य किए। द्विज बालक कहं उपबीत किए ।।

कवि के माता – पिता की मृत्यु कवि के बाल्यकाल में ही हो गई थी।

विवाह

जनश्रुतियों एवं रामायणियों के विश्वास के अनुसार तुलसीदास विरक्त होने के पूर्व भी कथा-वाचन करते थे। युवक कथावाचक की विलक्षण प्रतिभा और दिव्य भगवद्भक्ति से प्रभावित होकर रत्नावली के पिता पं० दीन बंधु पाठक ने एक दिन, कथा के अन्त में, श्रोताओं के विदा हो जाने पर, अपनी बारह वर्षीया कन्या उसके चरणों में सौंप दी। मूल गोसाईं चरित के अनुसार रत्नावली के साथ युवक तुलसी का यह वैवाहिक सूत्र सं० १५८३ की ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी, दिन गुरुवार को जुड़ा था –

पंद्रह सै पार तिरासी विषै ।
सुभ जेठ सुदी गुरु तेरसि पै ।
अधिराति लगै जु फिरै भंवरी ।
दुलहा दुलही की परी पंवरी ।।

आराध्य-दर्शन

भक्त शिरोमणि तुलसीदास को अपने आराध्य के दर्शन भी हुए थे। उनके जीवन के वे सर्वोत्तम और महत्तम क्षण रहे होंगे। लोक-श्रुतियों के अनुसार तुलसीदास को आराध्य के दर्शन चित्रकूट में हुए थे। आराध्य युगल राम – लक्ष्मण को उन्होंने तिलक भी लगाया था –

चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर ।
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ।।

मूल गोसाईं चरित के अनुसार कवि के जीवन की वह पवित्रतम तिथि माघ अमावस्या (बुधवार), सं० १६०७ को बताया गया है।

सुखद अमावस मौनिया, बुध सोरह सै सात ।
जा बैठे तिसु घाट पै, विरही होतहि प्रात ।।

गोस्वामी तुलसीदास के महिमान्वित व्यक्तित्व और गरिमान्वित साधना को ज्योतित करने वाली एक और घटना का उल्लेख मूल गोसाईं चरित में किया गया है। तुलसीदास नंददास से मिलने बृंदावन पहुंचे। नंददास उन्हें कृष्ण मंदिर में ले गए। तुलसीदास अपने आराध्य के अनन्य भक्त थे। तुलसीदास राम और कृष्ण की तात्त्विक एकता स्वीकार करते हुए भी राम-रुप श्यामघन पर मोहित होने वाले चातक थे। अतः घनश्याम कृष्ण के समक्ष नतमस्तक कैसे होते। उनका भाव-विभोर कवि का कण्ठ मुखर हो उठा –

कहा कहौं छवि आज की, भले बने हो नाथ ।
तुलसी मस्तक तब नवै, जब धनुष बान लो हाथ ।।

इतिहास साक्षी दे या नहीं द, किन्तु लोक-श्रुति साक्षी देती है कि कृष्ण की मूर्ति राम की मूर्ति में बदल गई थी।

रत्नावली का महाप्रस्थान

रत्नावली का बैकुंठगमन ‘मूल गोसाईं चरित’ के अनुसार सं० १५८९ में हुआ। किंतु राजापुर की सामग्रियों से उसके दीर्घ जीवन का समर्थन होता है।

मीराबाई का पत्र

महात्मा बेनी माधव दास ने मूल गोसाईं चरित में मीराबाई और तुलसीदास के पत्राचार का उल्लेख किया किया है। अपने परिवार वालों से तंग आकर मीराबाई ने तुलसीदास को पत्र लिखा। मीराबाई पत्र के द्वारा तुलसीदास से दीक्षा ग्रहण करनी चाही थी। मीरा के पत्र के उत्तर में विनयपत्रिका का निम्नांकित पद की रचना की गई।

जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिए ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही ।
सो छोड़िये
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषन बंधु, भरत महतारी ।
बलिगुरु तज्यो कंत ब्रजबनितन्हि, भये मुद मंगलकारी ।
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहां लौं ।
अंजन कहां आंखि जेहि फूटै, बहुतक कहौं कहां लौं ।
तुलसी सो सब भांति परमहित पूज्य प्रान ते प्यारो ।
जासों हाय सनेह राम-पद, एतोमतो हमारो ।।

तुलसीदास ने मीराबाई को भक्ति-पथ के बाधकों के परित्याग का परामर्श दिया था।

केशवदास से संबद्ध घटना

मूल गोसाईं चरित के अनुसार केशवदास गोस्वामी तुलसीदास से मिलने काशी आए थे। उचित सम्मान न पा सकने के कारण वे लौट गए।

अकबर के दरबार में बंदी बनाया जाना

तुलसीदास की ख्याति से अभिभूत होकर अकबर ने तुलसीदास को अपने दरबार में बुलाया और कोई चमत्कार प्रदर्शित करने को कहा। यह प्रदर्शन-प्रियता तुलसीदास की प्रकृति और प्रवृत्ति के प्रतिकूल थी, अतः ऐसा करने से उन्होंने इनकार कर दिया। इस पर अकबर ने उन्हें बंदी बना लिया। तदुपरांत राजधानी और राजमहल में बंदरों का अभूतपूर्व एवं अद्भुत उपद्रव शुरु हो गया। अकबर को बताया गया कि यह हनुमान जी का क्रोध है। अकबर को विवश होकर तुलसीदास को मुक्त कर देना पड़ा।

जहांगीर को तुलसी-दर्शन

जिस समय वे अनेक विरोधों का सामना कर सफलताओं और उपलब्धियों के सर्वोच्च शिखर का स्पर्श कर रहे थे, उसी समय दर्शनार्थ जहांगीर के आने का उल्लेख किया गया मिलता है।

दाम्पत्य जीवन

सुखद दांपत्य जीवन का आधार अर्थ प्राचुर्य नहीं, पति -पत्नि का पारस्परिक प्रेम, विश्वास और सहयोग होता है। तुलसीदास का दांपत्य जीवन आर्थिक विपन्नता के बावजूद संतुष्ट और सुखी था। भक्तमाल के प्रियादास की टीका से पता चलता है कि जीवन के वसंत काल में तुलसी पत्नी के प्रेम में सराबोर थे। पत्नी का वियोग उनके लिए असह्य था। उनकी पत्नी-निष्ठा दिव्यता को उल्लंघित कर वासना और आसक्ति की ओर उन्मुख हो गई थी। रत्नावली के मायके चले जाने पर शव के सहारे नदी को पार करना और सपं के सहारे दीवाल को लांघकर अपने पत्नी के निकट पहुंचना। पत्नी की फटकार ने भोगी को जोगी, आसक्त को अनासक्त, गृहस्थ को सन्यासी और भांग को भी तुलसीदल बना दिया। वासना और आसक्ति के चरम सीमा पर आते ही उन्हें दूसरा लोक दिखाई पड़ने लगा। इसी लोक में उन्हें मानस और विनयपत्रिका जैसी उत्कृष्टतम रचनाओं की प्रेरणा और शिक्षा मिली।

वैराग्य की प्रेरणा

तुलसीदास के वैराग्य ग्रहण करने के दो कारण हो सकते हैं। प्रथम, अतिशय आसक्ति और वासना की प्रतिक्रिया ओर दूसरा, आर्थिक विपन्नता। पत्नी की फटकार ने उनके मन के समस्त विकारों को दूर कर दिया। दूसरे कारण विनयपत्रिका के निम्नांकित पदांशों से प्रतीत होता है कि आर्थिक संकटों से परेशान तुलसीदास को देखकर सन्तों ने भगवान राम की शरण में जाने का परामर्श दिया –

दुखित देखि संतन कह्यो, सोचै जनि मन मोहूं
तो से पसु पातकी परिहरे न सरन गए रघुबर ओर निबाहूं ।।

तुलसी तिहारो भये भयो सुखी प्रीति-प्रतीति विनाहू ।
नाम की महिमा, सीलनाथ को, मेरो भलो बिलोकि, अबतें ।।

रत्नावली ने भी कहा था कि इस अस्थि – चर्ममय देह में जैसी प्रीति है, ऐसी ही प्रीति अगर भगवान राम में होती तो भव-भीति मिट जाती। इसीलिए वैराग्य की मूल प्रेरणा भगवदाराधन ही है।

तुलसी का निवास – स्थान

विरक्त हो जाने के उपरांत तुलसीदास ने काशी को अपना मूल निवास-स्थान बनाया। वाराणसी के तुलसीघाट, घाट पर स्थित तुलसीदास द्वारा स्थापित अखाड़ा, मानस और विनयपत्रिका के प्रणयन-कक्ष, तुलसीदास द्वारा प्रयुक्त होने वाली नाव के शेषांग, मानस की १७०४ ई० की पांडुलिपि, तुलसीदास की चरण-पादुकाएं आदि से पता चलता है कि तुलसीदास के जीवन का सर्वाधिक समय यहीं बीता। काशी के बाद कदाचित् सबसे अधिक दिनों तक अपने आराध्य की जन्मभूमि अयोध्या में रहे। मानस के कुछ अंश का अयोध्या में रचा जाना इस तथ्य का पुष्कल प्रमाण है। तीर्थाटन के क्रम में वे प्रयाग, चित्रकूट, हरिद्वार आदि भी गए। बालकांड के “”दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि-भरि कांवर चले कहारा” तथा ”सूखत धान परा जनु पानी” से उनका मिथिला-प्रवास भी सिद्ध होता है। धान की खेती के लिए भी मिथिला ही प्राचीन काल से प्रसिद्ध रही है। धान और पानी का संबंध-ज्ञान बिना मिथिला में रहे तुलसीदास कदाचित् व्यक्त नहीं करते। इससे भी साबित होता है कि वे मिथिला में रहे।

विरोध और सम्मान

जनश्रुतियों और अनेक ग्रंथों से पता चलता है कि तुलसीदास को काशी के कुछ अनुदार पंडितों के प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था। उन पंडितों ने रामचरितमानस की पांडुलिपि को नष्ट करने और हमारे कवि के जीवन पर संकट ढालने के भी प्रयास किए थे। जनश्रुतियों से यह भी पता चलता है कि रामचरितमानस की विमलता और उदात्तता के लिए विश्वनाथ जी के मन्दिर में उसकी पांडुलिपि रखी गई थी और भगवान विश्वनाथ का समर्थन मानस को मिला था। अन्ततः, विरोधियों को तुलसी के सामने नतमस्तक होना पड़ा था। विरोधों का शमन होते ही कवि का सम्मान दिव्य-गंध की तरह बढ़ने और फैलने लगा। कवि के बढ़ते हुए सम्मान का साक्ष्य कवितावली की निम्नांकित पंक्तियां भी देती हैं –

जाति के सुजाति के कुजाति के पेटागिबस
खाए टूक सबके विदित बात दुनी सो ।
मानस वचनकाय किए पाप सति भाय
राम को कहाय दास दगाबाज पुनी सो ।

राम नाम को प्रभाउ पाउ महिमा प्रताप
तुलसी से जग मानियत महामुनी सो ।
अति ही अभागो अनुरागत न राम पद
मूढ़ एतो बढ़ो अचरज देखि सुनी सो ।।

(कवितावली, उत्तर, ७२)

तुलसी अपने जीवन-काल में ही वाल्मीकि के अवतार माने जाने लगे थे –

त्रेता काव्य निबंध करिव सत कोटि रमायन ।
इक अच्छर उच्चरे ब्रह्महत्यादि परायन ।।

पुनि भक्तन सुख देन बहुरि लीला विस्तारी ।
राम चरण रस मत्त रहत अहनिसि व्रतधारी ।
संसार अपार के पार को सगुन रुप नौका लिए ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित बालमीकि तुलसी भए ।।

(भक्तमाल, छप्पय १२९)

पं० रामनरेश त्रिपाठी ने काशी के सुप्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक श्री मधुसूदन सरस्वती को तुलसीदास का समसामयिक बताया है। उनके साथ उनके वादविवाद का उल्लेख किया है और मानस तथा तुलसी की प्रशंसा में लिखा उनका श्लोक भी उद्घृत किया है। उस श्लोक से भी तुलसीदास की प्रशस्ति का पता मालूम होता है।

आनन्दकाननेह्यस्मिन् जंगमस्तुलसीतरु:
कविता मंजरी यस्य, राम-भ्रमर भूषिता ।

जीवन की सांध्य वेला

तुलसीदास को जीवन की सांध्य वेला में अतिशय शारीरिक कष्ट हुआ था। तुलसीदास बाहु की पीड़ा से व्यथित हो उठे तो असहाय बालक की भांति आराध्य को पुकारने लगे थे।

घेरि लियो रोगनि कुजोगनि कुलोगनि ज्यौं,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पोर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष, धूम-मूलमलिनाई है ।।

करुनानिधान हनुमान महा बलबान,
हेरि हैसि हांकि फूंकि फौजें तै उड़ाई है ।
खाए हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।

(हनुमान बाहुक, ३५)

निम्नांकित पद से तीव्र पीड़ारुभूति और उसके कारण शरीर की दुर्दशा का पता चलता हैं –

पायेंपीर पेटपीर बांहपीर मुंहपीर
जर्जर सकल सरी पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।

हौं तो बिन मोल के बिकानो बलि बारे हीं तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुंभज के निकट बिकल बूड़े गोखुरनि,
हाय राम रा ऐरती हाल कहुं भई है ।।

दोहावली के तीन दोहों में बाहु-पीड़ा की अनुभूति –

तुलसी तनु सर सुखजलज, भुजरुज गज बर जोर ।
दलत दयानिधि देखिए, कपिकेसरी किसोर ।।
भुज तरु कोटर रोग अहि, बरबस कियो प्रबेस ।
बिहगराज बाहन तुरत, काढिअ मिटे कलेस ।।
बाहु विटप सुख विहंग थलु, लगी कुपीर कुआगि ।
राम कृपा जल सींचिए, बेगि दीन हित लागि ।।

आजीवन काशी में भगवान विश्वनाथ का राम कथा का सुधापान कराते-कराते असी गंग के तीर पर सं० १६८० की श्रावण शुक्ला सप्तमी के दिन तुलसीदास पांच भौतिक शरीर का परित्याग कर शाश्वत यशःशरीर में प्रवेश कर गए।

(साभार – इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स)

सुषमा स्वराज नहीं रहीं, निधन से तीन घंटे पहले कश्मीर मुद्दे पर ट्वीट में कहा था- जीवन में इसी दिन की प्रतीक्षा थी

नयी दिल्ली : पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज (67) का मंगलवार रात निधन हो गया। उन्हें सीने में दर्द की शिकायत के बाद एम्स में भर्ती किया गया था। निधन से 3 घंटे पहले सुषमा ने एक ट्वीट में कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई दी थी। इसमें उन्होंने लिखा था- जीवन में इसी दिन की प्रतीक्षा कर रही थी। मोदी ने कहा कि सुषमा जी का निधन मेरे लिए निजी क्षति है। सुषमा का पार्थिव शरीर एम्स से उनके घर ले जाया गया। भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि बुधवार दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक सुषमा के पार्थिव शरीर को भाजपा मुख्यालय में रखा जाएगा।

करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा थीं सुषमा स्वराज- मोदी
मोदी ने सुषमा के निधन पर कहा- भारतीय राजनीति के एक गौरवपूर्ण अध्याय का अंत हो गया। गरीबों और समाज के लिए जीवन देने वाली अद्वितीय नेता के निधन पर पूरा भारत दुखी है। सुषमा स्वराज जी अपनी तरह की अकेली इंसान थीं। वे करोड़ों लोगों की प्रेरणा का स्रोत थीं। इससे पहले सुषमा ने कश्मीर मुद्दे पर फैसले के लिए तीन घंटे पहले ही मोदी को बधाई देता ट्वीट किया था।
@SushmaSwaraj
प्रधान मंत्री जी – आपका हार्दिक अभिनन्दन. मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी. @narendramodi ji – Thank you Prime Minister. Thank you very much. I was waiting to see this day in my lifetime.

पहला चुनाव 1977 में लड़ा था
सुषमा ने सबसे पहला चुनाव 1977 में लड़ा। तब वे 25 साल की थीं। वे हरियाणा की अंबाला सीट से चुनाव जीतकर देश की सबसे युवा विधायक बनीं। उन्हें हरियाणा की देवीलाल सरकार में मंत्री भी बनाया गया। इस तरह वे किसी राज्य की सबसे युवा मंत्री रहीं।


1998 में दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं
नब्बे के दशक में सुषमा राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गईं। अटलजी की सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया। 1998 में उन्होंने अटलजी की कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि, इसके बाद हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गई। पार्टी की हार के बाद सुषमा ने विधानसभा की सदस्यता छोड़ दी और राष्ट्रीय राजनीति में लौट आईं।
1999 में बेल्लारी लोकसभा सीट पर सोनिया से हारीं
1996 में हुए लोकसभा चुनाव में सुषमा दक्षिण दिल्ली से सांसद बनी थीं। इसके बाद 13 दिन की अटलजी की सरकार में उन्हें केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया। मार्च 1998 में दूसरी बार अटलजी की सरकार बनने पर वे एक फिर से आईबी मिनिस्टर बनीं। 1999 में उन्होंने बेल्लारी लोकसभा सीट पर सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन वे यहां हार गईं।
2014 से 2019 तक विदेश मंत्री रहीं
सुषमा 2009 और 2014 में विदिशा से लोकसभा चुनाव जीतीं। 2014 से 2019 तक वे विदेश मंत्री रहीं और दुनियाभर में भारतीयों को उन्होंने एक ट्वीट पर मदद मुहैया कराई। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों के चलते 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था। भाजपा की जीत के बाद मन जा रहा था कि वे दोबारा विदेश मंत्री बनेंगी, लेकिन उन्होंने खराब सेहत के चलते मंत्री पद नहीं लिया।
सुप्रीम कोर्ट की वकील रह चुकी थीं सुषमा
सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला में हुआ था। उनका परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा था। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की और 1973 में सुप्रीम कोर्ट में वकील के तौर पर प्रैक्टिस शुरू की। सुषमा का स्वराज कौशल से 1975 में विवाह हुआ। स्वराज कौशल वकील हैं। वे मिजोरम के गवर्नर भी रह चुके हैं। 1990 में देश के सबसे युवा गवर्नर बने, तब उनकी उम्र 37 साल थी। 1998 में वे हरियाणा विकास पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा सदस्य चुने गए। सुषमा को एक बेटी बांसुरी हैं। बांसुरी भी वकील हैं।

तीन फीट के गणेश को एमबीबीएस में दाखिला मिला, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी

भावनगर : तीन फीट के गणेश विठ्ठलभाई बारैया को आखिर मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया। इसके लिए उन्होंने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। जब उन्हें यह डिग्री दी जाएगी, तब उनका नाम सबसे छोटी कदकाठी की वजह से गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया जाएगा। गणेश ने कहा कि पहला दिन शानदार था। सभी साथियों और डॉक्टरों ने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया। मैं आज अच्छा महसूस कर रहा हूं, क्योंकि मैंने इस डिग्री के लिए दो मोर्चों पर (अकादमिक और कानूनी) लड़ाई लड़ी। मैं बेहद खुश हूं। मैं सभी को शुक्रिया कहना चाहता हूं , क्योंकि उनके साथ के बगैर में मेरा सपना पूरा नहीं हो पाता। दरअसल, गणेश को एनईईटी परीक्षा-2018 में 223 अंक मिलने के बाद भी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं दिया गया था। वजह थी उनकी 3 फीट हाइट। उस वक्त उनका वजन 14 किलोग्राम था। उन्हें किसी भी मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं दिया गया। उन्होंने 12वीं (विज्ञान) की परीक्षा 87% अंक के साथ पास की थी। शिक्षकों और स्कूल ने अपने मेधावी विद्यार्थी के हक की लड़ाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहाँ से फैसला उसके पक्ष में आया।