Wednesday, April 22, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 602

हिमा दास ने 11 दिन में तीसरा स्वर्ण जीता, अनस को 400 मीटर में स्वर्ण

चेक रिपब्लिक : भारतीय धावक हिमा दास ने 11 दिन के अंदर तीसरा स्वर्ण पदक जीत लिया। हिमा ने शनिवार को चेक रिपब्लिक में हुई क्लांदो मेमोरियल एथलेटिक्स में महिलाओं की 200 मीटर रेस को 23.43 सेकेंड में पूरा किया। वहीं, नेशनल रिकॉर्ड होल्डर मोहम्मद अनस ने भी 400 मीटर रेस में स्वर्ण जीता। उन्होंने 45.21 सेकेंड में रेस पूरी की। दोनों ने विश्व चैम्पियनशिप के लिए भी क्वालिफाइ कर लिया है।
इससे पहले हिमा ने 7 जुलाई को पोलैंड में कुटनो एथलेटिक्स मीट में 200 मीटर रेस को 23.97 सेकंड में पूरा कर स्वर्ण पदक जीता था। हिमा ने 4 जुलाई को भी पोजनान एथलेटिक्स ग्रां प्री में गोल्ड जीता था। पोजनान में हिमा ने पहली बार 200 मीटर रेस में हिस्सा लिया था। उन्होंने 23.65 सेकंड में उस रेस पूरा कर गोल्ड जीता था।

अनस ने 11 दिन में 2 स्वर्ण और एक कांस्य जीता
मोहम्मद अनस ने भी 11 दिन के अंदर देश के लिए 2 स्वर्ण और एक कांस्य जीते हैं। कुटनो एथलेटिक्स मीट में अनस ने 400 मीटर रेस 21.18 सेकंड में पूरी कर स्वर्ण जीता था। जबकि पोजनान एथलेटिक्स ग्रां प्री में वे तीसरे पायदान पर रहे थे। उन्होंने पुरुषों की 200 मीटर रेस को 20.75 सेकंड में पूरा किया था। इसके साथ ही उन्हें कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।

घर में नहीं था शौचालय, परेशानी देख किसान के बेटे ने 5 गाँवों में बनवाए 484 शौचालय

उस्मानाबाद : महाराष्ट्र के उस्मानाबाद में रहने वाले 34 साल के गणेश देशमुख ने पाँच गांवों में 484 शौचालय बनवा दिए, ताकि ग्रामीणों को शौच के लिए बाहर न जाना पड़े। दरअसल, गणेश किसान परिवार से हैं। 2006 में 10वीं करने के बाद वे नौकरी करने पुणे चले गए। अपनी गरीबी दूर करना उनकी जिद थी। उन्होंने पुणे में कई दिनों तक ट्रक क्लीनर का काम किया और आज वे 15 ट्रक के मालिक हैं। वे अपना खुद का ट्रांसपोर्ट बिजनेस चला रहे हैं।
शौचालय बनवाने की अपने गाँव से ही शुरुआत की
कुछ समय पहले वह अपने गांव ईट वापस आए। उन्होंने देखा कि अब तक उनके घर में शौचालय नहीं है। ये उनके घर की ही नहीं, बल्कि पूरे गाँव की परेशानी है। इसके बाद उन्होंने अपने गांव के साथ आसपास के गाँव में शौचालय बनवाना शुरू कर दिया। अब तक वे 484 शौचालय बनवा चुके हैं।
कर्ज लेकर ट्रक खरीदा था, अब 15 ट्रकों के मालिक
गणेश बताते हैं कि पुणे में उन्होंने क्लीनर और ड्राइवर का काम किया, लेकिन कमाई न के बराबर थी। कुछ साल रुपए जुटाकर और कर्ज लेकर एक ट्रक खरीदा। धीरे-धीरे कारोबार बढ़ा तो और ट्रक खरीद लिए। अब वे 15 ट्रक के मालिक हैं और 25 लोगों को रोजगार दे रहे हैं।

76 साल के बुजुर्ग के ऑटो एंबुलेंस से 90 दिन में 100 की जान बची

नयी दिल्ली : 76 साल के हरजिंदर सिंह दिल्ली की सड़कों पर ‘ऑटो एंबुलेंस’ चलाते हैं। हरजिंदर ने बताया, ‘पिछले तीन महीने में 100 से ज्यादा लोगों की जान बचा चुका हूं। औसतन मैं रोजाना एक दुर्घटना पीड़ित की मदद करता हूं। मैं ट्रैफिक वॉर्डन के तौर पर काम कर चुका हूं। मैंने कई हादसे देखे। इसलिए अब मैं ऑटो एंबुलेंस के जरिए लोगों की मदद कर रहा हूं। ऑटो में तरह-तरह की दवाइयां लेकर चलता हूं।”
सड़क हादसा होने पर जब लोग वीडियो बना रहे होते हैं, तब हरजिंदर सिंह उस घायल को प्राथमिक उपचार देने में जुट जाते हैं। उन्होंने दुर्घटना के शिकार लोगों की जान बचाने के मकसद से अपने ऑटो को ‘ऑटो एंबुलेंस’ में तब्दील कर दिया है। वह ऑटो से न केवल घायल को प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराते हैं, बल्कि गंभीर हालत में पीड़ित को अस्पताल भी पहुंचाते हैं। साथ ही ये सुनिश्चित करते हैं कि उसे पूरा इलाज मिले।
अधिक काम करके दवाइयों का खर्च खुद जुटाते हैं
हरजिंदर सिंह दिल्ली के भजनपुरा में परिवार के साथ रहते हैं। वे रोजाना सुबह 8 बजे काम पर निकल जाते हैं। हरजिंदर ने बताया कि दवाइयों और मेडिकल का खर्च वे खुद उठाते हैं। इसके लिए उन्होंने ऑटो में डोनेशन बॉक्स लगा रखा है। साथ ही अतिरिक्त पैसे के लिए ज्यादा काम करते हैं।

बिहार के युवा वैज्ञानिक गोपाल को नासा से बुलावा, करेंगे सूर्य पर अध्ययन

भागलपुर : 2016 में केले के थंब (तना) से बिजली उत्पन्न होने की खोज कर चर्चा में आए बिहार के युवा वैज्ञानिक गोपाल एक और उपलब्धि हासिल करने वाले हैं। अमेरिका के अंतरिक्ष रिसर्च संस्थान (नासा) ने उन्हें अपने नए प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए बुलावा भेजा है। यह प्रोजेक्ट है गोपनियम एलोई। इस प्रोजेक्ट के लिए गोपाल ने नासा से संपर्क किया था। गोपाल भागलपुर के ध्रुवगंज खरीक बाजार के रहने वाले हैं। उन्होंने बताया कि गोपनियम एलोई पर नासा के साथ काम करेंगे। अगर प्रोजेक्ट सफल रहा तो सूर्य का अध्ययन करना आसान हो जाएगा। गोपनियम एलोई हाफनियम, टेंटिलुनियम, कार्बन और नाइट्रोजन का मिश्रण है। उन्हें इसका आइडिया साइंस फिक्शन पर आधारित एक फिल्म से आया था। दूसरी तरफ, केले के थंब से बिजली पैदा होने की गोपाल की खोज पर आधारित प्रोजेक्ट का पेटेंट 2018 में हो चुका है। युवा वैज्ञानिक ‘पेपर बायो सेल’ और ‘बनाना बायो सेल’ की खोज के बाद 4 साल के लिए भारत सरकार के साथ अनुबंधित हैं और अभी इसका एक साल ही पूरा हुआ है।
देहरादून की ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी के लैब में कर रहे हैं काम
वर्तमान में देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी के लैब में काम कर रहे गोपाल ने बताया कि केले के थंब से बिजली उत्पन्न करना आसान है। इसके लिए केले के थंब में दो इलेक्ट्रोड लगाना होता है जो बाजार में मिल जाता है। दोनों इलेक्ट्रोड से बिजली के तार जोड़कर, उन्हें बल्ब से कनेक्ट करने पर बल्ब जलने लगता है। अभी वह केले के थंब से सेनिटरी नैपिकन, बैंडेज, यूरिया, बेबी पैंपर तैयार करने के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।

स्वीडन में पानी पर तैरता होटल बनना शुरू 

स्टॉकहोम : स्वीडन के लैपलैंड क्षेत्र में ल्यूल नदी पर एक तैरता होटल और स्पा ‘द आर्कटिक बाथ’ बन रहा है। इस होटल का लोगों में ऐसा क्रेज है कि वर्ष 2020 और 2021 के लिए अभी से बुकिंग शुरू हो गई हैं। यहां एक दिन का किराया 815 पाउंड (करीब 75 हजार रुपये) है।
गर्मियों में तैरेगा, सर्दी में जम जाएगा
खास बात यह है कि गर्मी के दिनों में ये होटल नदी पर तैरेगा, लेकिन सर्दियों में नदी जम जाती है। ऐसे में होटल भी पानी के साथ जम जाएगा। स्पा सेंटर में वेलनेस थीम पर काम किया गया है और यहां पर ग्राहकों के न्यूट्रिशन, कसरत और मन की शांति के लिए विशेष थेरेपी दी जाएंगी।

मेक्सिको / दुर्व्यवहार ठीक करने मेयर दिव्यांग बनकर 2 महीने तक विभागों में घूमे, फिर सिस्टम सुधारा

मेक्सिको सिटी : मेक्सिको के प्रांत चिहुआहुआ के कुयाटेमोक में अधिकारियों के दिव्यांगों के प्रति दुर्व्यवहार की जाँच का जिम्मा खुद मेयर ने उठाया। वे दो महीने तक दिव्यांग के भेष में रहे। मेयर कार्लोस टेना इन 60 दिनों में शहर के हर विभाग में गए। इस दौरान उन्हें खुद अपमानित होना पड़ा। बाद में उन्होंने सभी अधिकारियों को उनकी कार्यशैली के फटकार लगाई। दरअसल, कार्लोस के पास लंबे समय से दिव्यांगों की शिकायतें आ रही थीं कि कोई भी काम करवाने के लिए विभाग में उनके साथ बुरा व्यवहार होता है। विभाग में दिव्यांग के गेटअप के लिए कार्लोस कभी काला चश्मा लगाते, कभी हैट पहनते, कभी कानों पर बैंडेज बांधकर घूमते। कभी किसी काम के बहाने वे स्वेटर पहनकर पहुंच जाते। कई बार खाना भी माँगा, लेकिन लोगों ने उनके साथ भेदभाव किया। सिर्फ एक-दो ऑफिस में कुछ अधिकारियों ने ईमानदारी से काम किया।
ऐसे जाना कि शिकायतें सही थीं
सोशल सर्विसेज ऑफिस के बाद कार्लोस दिव्यांग के गेटअप में अपने ऑफिस पहुँचे, जहां लोगों ने उनसे कहा कि मेयर तो है नहीं, कोई काम नहीं होगा। फिर कार्लोस शहर परिषद के सचिव से मिलने गए, जहाँ उन्हें बताया गया कि वह आधे घंटे तक नहीं आएंगे, इसलिए इंतजार करें। यह जानकर कार्लोस को यकीन हो गया कि उन्हें मिलने वाली शिकायतें बिल्कुल ठीक थीं।
व्हीलचेयर से उठे और सबको दी चेतावनी
कर्मचारियों के बहानों के बीच सिटी काउंसिल ऑफिस में मेयर कार्लोस व्हीलचेयर से उठ गए। दिव्यांग के गेटअप में शहर के मेयर को देख सभी कर्मियों की हालत खराब हो गयी। इसके बाद कार्लोस ने सभी विभागों के अधिकारियों की मीटिंग बुलाकर उन्हें खूब फटकारा और चेतावनी दी कि अगर वे अभी भी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करेंगे तो उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।
कार्लोस ने बताया, “मेरे इस प्रयोग का उद्देश्य उन मुश्किलों का अनुभव करना था, जो आम लोग रोज भुगतते हैं। मैं नहीं जानता था कि लोगों की शिकायतों पर भरोसा करूं या अपने सहकर्मियों पर। मैं लंबे समय में दिव्यांगों को उनका हक दिलाने की कोशिश में लगा हूँ। यह नहीं जानता था कि मेरे ही सहकर्मी उनके साथ दुर्व्यवहार करेंगे। उम्मीद करता हूँ कि आगे से दिव्यांगों की शिकायत नहीं मिलेगी।”

बेहद रोचक है पुरुषों की मेकअप की दुनिया का चार हजार साल पुराना इतिहास 

मेकअप की बात होती है तो सिर्फ औरतें ही दिमाग में आती हैं लेकिन पुरुष क्यों नहीं? सदियों में पहली बार, मेकअप पहने हुए पुरुष भले ही पूरी तरह वर्जित नहीं हैं लेकिन इसका श्रेय सोशल मीडिया और पुरुष सौंदर्य प्रभावितों के उद्गमन कवरबॉय जेम्स चार्ल्स और सौंदर्य मोगुल जेफ्री स्टार जैसे पुरुषों को जाता है। पुरुषों का मेकअप लिंग-समावेशी बनने के शुरुआती चरणों में है। हालांकि, यह अवधारणा अब भी कुछ समाज और सभ्यताओं के लिए नई है। कई पीढ़ियों से, मेकअप को “केवल महिला” उद्यम के रूप में देखा गया है, इसलिए हम यह भूल जाते हैं कि यह हमेशा ऐसा नहीं था।
आपको बता दें कि, 4000 ईसा पूर्व से लेकर 18 वीं शताब्दी तक, पुरुषों ने पारंपरिक रूप से असंख्य तरीकों से मेकअप का इस्तेमाल किया। 1800 के दशक के मध्य तक भी मेकअप को लेकर लिंग भेद नहीं था। उस समय, ग्रेट ब्रिटेन क्वीन विक्टोरिया प्रथम ने सौंदर्य प्रसाधन को अशिष्ट माना, ऐसा इंग्लैंड के चर्च द्वारा स्वीकृत किया गया है। विक्टोरियन युग के दौरान, मेकअप को ताज और चर्च दोनों द्वारा “घृणित” माना जाता था, जिससे मेकअप, घमंड, स्त्रीत्व और “शैतान के काम” के बीच मजबूत जुड़ाव पैदा होता था। जैसे-जैसे धार्मिक मूल्य दुनिया भर की संस्कृतियों को आगे बढ़ाते गए, मर्दानगी की मुख्य परिभाषा संकुचित होती गईं। 2019 में, आखिरकार विभिन्न लिंग अभिव्यक्तियों को स्वीकार करने की वापसी हो रही है। उम्मीद है कि पुरुषों का मेकअप ट्रेंड जारी रहेगा, लेकिन समाज पीछे देखे बिना आगे नहीं बढ़ सकता। ऐसे में आज हम आपको पुरुषों और श्रृंगार के आकर्षक इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं।
प्राचीन मिस्र
प्राचीन मिस्र की संस्कृति में पुरुषत्व महत्वपूर्ण था और मेकअप ने वास्तव में उसमें भूमिका निभाई। 4000 ईसा पूर्व पुरुषों ने काले रंग के वर्णक का उपयोग आंख पर ‘कैट आई’ डिजाइन बनाने के लिए किया था। कुछ सालों बाद, कोल आईलाइनर, हरे मैलाकाइट आई शैडो और लाल गेरू से बने होंठ और गाल के मेकअप भी लोकप्रिय हो गए थे। अजीबोगरीब आईलाइनर को धन और क्लास दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

प्राचीन रोम
पहली शताब्दी ई.पू., जब रोमन पुरुष अपने गालों पर लाल वर्णक (ब्लश) लगाते थे, पाउडर की मादा से त्वचा को सुंदर बनाते थे और सुअर के वसा और रक्त का उपयोग करके अपने नाखूनों को रंगते थे। यहां तक कि रोमन पुरुष अपने सिर के गंजेपन के धब्बों को छिपाने के लिए सिर कोपाइंट भी करते थे।

एलिजाबेटन इंग्लैंड
महारानी एलिजाबेथ प्रथम के शासन के दौरान, मेकअप पुरुषों के बीच काफी लोकप्रिय था, जो सफेद पाउडर वाली त्वचा को महत्व देते थे। यह वह युग भी था जब मेकअप से आकर्षक दिखने के लिए मेकअप उत्पादों को शीशे से बनाया जाता था, जो अक्सर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता था।

18 वीं शताब्दी फ्रांस
यह कोई रहस्य नहीं है कि किंग लुईस XVI ने मेकअप और बालों के उत्पादों की असाधारणता में भाग लिया। (लुईस 23 साल की उम्र में गंजे हो गए और बाद में फ्रांस के कलाकारों से नकली बाल बनवाए।)

1930 का हॉलीवुड
पुरुषों का मेकअप चलन दुबारा आने में काफी वक्त लगा। संयुक्त राज्य अमेरिका में आधुनिक फिल्म-निर्माण के आगमन के साथ, पुरुषों के लिए मेकअप फिर से शुरू हुआ। क्लार्क गेबल का पॉलिश लुक शायद “मेट्रोसेक्सुअल” सौंदर्य का पहला उदाहरण था।

1970 और 1980 का दशक
बाद की 20 वीं शताब्दी के दौरान, पुरुषों के लिए मेकअप शायद ही मुख्यधारा था। इस समय के दौरान, कई सबसे प्रसिद्ध पुरुष मेकअप कलाकारों ने क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया। 1967 में लेट वे बैंडी ने अपना काम शुरू किया, उसके बाद 1982 में केविन औकॉइन और पुरुष मेकअप कलाकार बढ़ते गए। ऐसे ही एक कलाकार थे स्कॉट बार्न्स, जिनके मेकअप ब्रश हॉलीवुड के हर बड़े नाम के चेहरे पर चले हैं।

2000 के दशक की शुरुआत में
2000 के दशक के मध्य में अमेरिकी पॉप कल्चर के आंकड़ों ने पिछले उपसंस्कृतियों को अपनाना शुरू कर दिया, हमें “गाइलाइनर” की अवधारणा से परिचित कराया गया। पॉप-पंक बैंड और उनके अनुयायियों के बीच यह लुक सबसे लोकप्रिय था। “मेट्रोसेक्सुअलिटी” की अवधारणा ने भी इस समय फिर से प्रवेश किया और सौंदर्य ब्रांडों ने “पुरुषों के लिए मेकअप” जारी करना शुरू कर दिया।
2010 के दशक
हालांकि पुरुषों के लिए मेकअप कोई मानक नहीं था, लेकिन सोशल मीडिया ने सदियों से चली आ रही रूढ़ियों को तोड़ने में मदद करते हुए बड़े पैमाने पर पुरुष सौंदर्य गुरुओं को अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति को साझा करने की अनुमति दी है। कवरगर्ल और मेबेलिन जैसी प्रमुख सौंदर्य कंपनियों ने नोटिस लिया और अपने ब्रांडों में पुरुष चेहरों की घोषणा की।

आज के दौर में पुरुष मेकअप
“मेकअप में काफी बदलाव आए हैं। जैसे-जैसे लिंग भेदभाव के नियम अधिक से अधिक लचीले होते जाएंगे, वैसे-वैसे मेकअप धीरे-धीरे कुछ पुरुषों की रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा बन जाएगा। हालांकि, पुरुषों का स्किनकेयर करना गलत नहीं है लेकिन रंगीन सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल, आईलाइनर, काजल, आईब्रो बनाना होटों पर कॉस्मेटिक इस्तेमालकरना अभी आम नहीं हुआ है। हालांकि, पश्चिम संस्कृति में जो हम देखते हैं, वह सबकुछ हमेशा दुनिया के बाकी हिस्सों द्वारा नहीं अपनाया जाता जैसे “जापानी युवा पुरुष हमेशा एक्सेसरी या तो उत्साह या मनोरंजन की अभिव्यक्ति के रूप में पहनते हैं, फैशों में नहीं। या इसके पीछे लिंग। वैसे मेकअप का मतलब हमेशा स्त्रीत्व नहीं होता है, आज के दौर में बिल्कुल नहीं। मेकअप उद्योग बहुत बदल गया है – व्यापारियों और नए ब्रांडों के लिए बहुत जगह है और सोशल मीडिया ने उस बदलाव में एक बड़ी भूमिका निभाई है। मेकअप की दुनिया में आगे कैसे बदलाव होते हैं ये देखना दिलचस्प होगा ।

(साभार – अमर उजाला)

नेत्रहीनों को बड़ी राहत, आरबीआई नोटों को पहचानने के लिए लाएगा एप

नयी दिल्ली : भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) दृष्टिबाधित या नेत्रहीन लोगों को नोटों की पहचान करने में मदद के लिए एक मोबाइल एप्लीकेशन (मोबाइल एप) पेश करेगा। केंद्रीय बैंक ने लेनदेन में अब भी नकदी के भारी इस्तेमाल को देखते हुए यह कदम उठाया। वर्तमान में 10, 20, 50, 100, 200, 500 और 2,000 रुपये के बैंकनोट चलन में हैं।
रिजर्व बैंक ने कहा कि नेत्रहीन लोगों के लिए नकदी आधारित लेनदेन को सफल बनाने के लिए बैंकनोट की पहचान जरूरी है। नोट को पहचानने में नेत्रहीनों की मदद के लिए ‘इंटाग्लियो प्रिंटिंग’ आधारित पहचान चिह्न दिए गए हैं। यह चिह्न 100 रुपये और उससे ऊपर के नोट में हैं। नवबंर 2016 में 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने के बाद अब चलन में नए आकार और डिजाइन के नोट मौजूद हैं।
केंद्रीय बैंक ने कहा, ‘‘रिजर्व बैंक नेत्रहीनों को अपने दैनिक कामकाज में बैंक नोट को पहचानने में आने वाली दिक्कतों को लेकर संवेदनशील है। बैंक मोबाइल एप विकसित करने के लिए वेंडर की तलाश कर रहा है। यह एप महात्मा गांधी श्रृंखला और महात्मा गांधी (नई) श्रृंखला के नोटों की पहचान करने में सक्षम होगा। इसके लिए व्यक्ति को नोट को फोन के कैमरे के सामने रखकर उसकी तस्वीर खींचनी होगी। यदि नोट की तस्वीर सही से ली गई होगी तो एप ओडियो नोटिफिकेशन के जरिए नेत्रहीन व्यक्ति को नोट के मूल्य के बारे में बता देगा। अगर तस्वीर ठीक से नहीं ली गई या फिर नोट को रीड करने में कोई दिक्कत हो रही है तो एप फिर से कोशिश करने की सूचना देगा। रिजर्व बैंक एप बनाने के लिए प्रौद्योगिकी कंपनियों से निविदा आमंत्रित कर रहा है। बैंक पहले भी इसी तरह के प्रस्ताव के लिए आवेदन मांगे थे। हालांकि, बाद में इसे रद्द कर दिया गया। देश में करीब 80 लाख नेत्रहीन लोग हैं। आरबीआई की इस पहल से उन्हें लाभ होगा।

साहित्य अकादमी के मैथिली युवा पुरस्कार, बाल साहित्य पुरस्कार विजेता घोषित

नयी दिल्ली : युवा पुरस्कार और बाल साहित्य पुरस्कार के विजेताओं की घोषणा के एक महीने बाद साहित्य अकादमी ने मैथिली भाषा के लेखकों के लिए पुरस्कार की घोषणा की। अमित पाठक को उनकी कविता ‘‘राग- उपराग’’ के लिए युवा पुरस्कार मिला, ऋषि वशिष्ठ को उनकी कहानी की किताब ‘‘एक फूलक गुलदस्ता’’ के लिए बाल साहित्य पुरस्कार हासिल हुआ। साहित्य अकादमी ने घोषणा की थी, ‘‘बाल साहित्य पुरस्कार के विजेताओं को बाल दिवस पर सम्मानित किया जाएगा, लेकिन युवा पुरस्कार के लिए तिथि अब तक जारी नहीं की गई है।’’ इससे पहले संगठन ने मैथिली को छोड़कर 23 भारतीय भाषाओं में युवा पुरस्कार और 22 भाषाओं में बाल साहित्य पुरस्कारों की घोषणा की थी। दोनों पुरस्कारों के विजेताओं को ताम्रपत्र और 50 हजार रुपये का चेक प्रदान किया जाएगा।

‘कबीर सिंह’ के बहाने 4000 फिल्मों का अध्ययन,  महिलाओं को कमतर ही दिखाता है बॉलीवुड 

तेलुगु फिल्म ‘अर्जुन रेड्‌डी’ की रीमेक शाहिद कपूर-किआरा आडवाणी स्टारर फिल्म ‘कबीर सिंह’ पर बहस छिड़ी हुई है। नारीवादी इसमें एक बिगड़ैल-गुस्सैल व्यक्ति को हीरो बताने की आलोचना कर रहे हैं, तो फिल्म के समर्थन में बोलने वाले भी बहुत हैं। हाल ही रिलीज हुई शाहिद कपूर की फिल्म ‘कबीर सिंह’ की कमाई से ज्यादा चर्चा इसकी कहानी, इसके कंटेंट की हो रही है। समीक्षकों से लेकर दर्शक तक इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं कि क्या कबीर सिंह जैसे किरदार को पर्दे पर दिखाना चाहिए? दरअसल कबीर सिंह एक जिद्दी, महिलाओं की बेइज्जती करने वाला, जबरदस्ती करने वाला और नशेड़ी किरदार है। नारीवादियों की चिंता है कि ऐसे किरदार को हीरो की तरह पेश करने और उसका गुणगान करने का समाज पर बुरा असर हो सकता है। तेलुगु फिल्म ‘अर्जुन रेड्‌डी’ की रीमेक इस फिल्म की समीक्षाओं को भी यूट्‌यूब पर लाखों व्यूज मिल रहे हैं। फिल्म समीक्षक सुचारिता त्यागी की समीक्षा ‘नॉट अ मूवी रिव्यू’ को 11 लाख बार देखा जा चुका है। वे कहती हैं, ‘क्या ऐसी फिल्म को दो बार बनाने की जरूरत थी।


किसी पुरुष के किसी महिला के लिए सनक की हद तक प्यार की कहानी दिखाना गलत नहीं है, लेकिन ऐसे व्यक्ति को हीरो बनाकर पेश करना कितना सही है। ऐसे किरदार पर सीटियां बज रही हैं, तालियां पिट रही हैं। इससे असहज महसूस होता है। आप एक राक्षस को बेचारा बनाकर पेश कर रहे हैं, जिसका दिल टूटा है।’ सोशल मीडिया पर भी फिल्म के विरोधियों का मानना है कि फिल्म की सफलता बताती है कि औरत से नफरत करने वाले किरदार लोग पसंद कर रहे हैं, यह चिंताजनक है। वहीं सोशल मीडिया पर यह तर्क देने वालों की भी कमी नहीं है कि फिल्म को फिल्म की तरह ही देखना चाहिए, जिसका उद्देश्य केवल मनोरंजन है।
फिल्म के डायरेक्टर संदीप रेड्‌डी वांगा ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, ‘मैं जानबूझकर एक असामान्य लव स्टोरी बनाना चाहता था। यह प्यार के कारण एक व्यक्ति की जिंदगी बदलने की कहानी है। मैंने किरदार को ज्यादा से ज्यादा वास्तविक और सरल रखने की कोशिश की है।’ इस रोल को निभाने के लिए शाहिद की भी आलोचना हो रही है। उनके समर्थन में उनकी माँ नीलिमा अज़ीम भी उतर आई हैं। उन्होंने कहा है, ‘ऐसे रोल करने पर हॉलीवुड में ऑस्कर मिलता है।’ वहीं तमाम बहस के बीच 3123 स्क्रीन्स पर रिलीज हुई कबीर सिंह ने 8 दिन में करीब 146 करोड़ रु. कमा लिए हैं। यह इस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल हो चुकी है। अर्जुन रेड्‌डी और कबीर सिंह की सफलता के बाद अब इसका तमिल रीमेक ‘आदित्य वर्मा’ भी आ रहा है।
कबीर सिंह में किस बात पर आपत्ति? : फिल्म कबीर सिंह के कई दृश्यों पर आपत्ति जताई जा रही है। शाहिद का यह किरदार हर तरह का नशा करते हुए, गालियां देते हुए, लोगों को पीटते हुए दिखाया गया है। कबीर चाकू की नोक पर एक लड़की को कपड़े उतारने को कहता है, हीरोइन को मारता है, बिना लड़की की इच्छा जाने कॉलेज में घोषणा करता है कि यह उसकी ‘बंदी’ है और कोई उसे नहीं देखेगा, वह हीरोइन पर शादी के लिए दबाव बनाता है। ऐसी हरकतों के बावजूद कबीर को बेचारा बताने की कोशिश की गई हैं। वहीं कबीर की प्रेमिका प्रीति सिक्का, जिसका रोल किआरा आडवाणी ने निभाया है, को कबीर के तमाम बुरे बर्ताव, गुस्से और दबाव के बावजूद उसके सामने झुकने वाला बताया गया है। इस तरह के दृश्यों को मर्दानगी का बुरा स्वरूप और महिलाओं को कमजोर दिखाने वाला माना जा रहा है।
लेकिन कबीर सिंह ने जो किया, पहले भी होता रहा है : शाहरुख खान ने 1993 में आई फिल्म ‘डर’ में पागलपन की हद तक प्यार करने वाले व्यक्ति का किरदार निभाया था। हालांकि किरदार को विलेन की तरह ही पेश किया गया था। 2003 में आई सलमान खान की फिल्म ‘तेरे नाम’ में हीरोइन का किरदार निर्जरा हमेशा हीरो राधे के खौफ में जीता है, लेकिन फिर भी उससे प्यार करता है। 2013 में धनुष और सोनम कपूर की फिल्म में हीरो हीरोइन पर दबाव बनाने के लिए नस काट लेता है, उसका लगातार पीछा करता है, परेशान करता है। बॉलीवुड में ऐसी फिल्मों के सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जहां हीरो की तमाम जबरदस्ती और हिंसा के बावजूद हीरोइन को हीरो को पसंद करते हुए दिखाया गया है।
 एक दशक में महिलाओं के खिलाफ अपराध 83% बढ़े : नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की आखिरी रिपोर्ट 2016 में आई थी। इसके मुताबिक देश में महिलाओं के विरुद्ध हर घंटे 39 अपराध हो रहे हैं। यह संख्या 2007 में 21 थी। पति द्वारा ज्यादती करने के मामले सबसे ज्यादा दर्ज किए गए। एक दशक (2007 से 2017 के बीच) में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में 83 फीसदी की बढ़त आई। 2016 में शादी के लिए अपहरण करने के 33,796 मामले सामने आए। हर महीने 18 मामले एसिड अटैक के दर्ज किए गए। हर हफ्ते महिलाओं को आत्महत्या के लिए उकसाने के 86 मामले दर्ज हुए। यूनाइटेड नेशंस वुमन के आंकड़े बताते हैं कि 29 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हैं। देश की जेंडर इनइक्वालिटी इंडेक्स में 125वीं और ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में 87वीं रैंक है। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पिछली साल जारी किए गए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार पंद्रह वर्ष की उम्र से ही देश की हर तीसरी महिला ने घरेलू हिंसा का सामना किया है। सर्वे में चौंकाने वाला तथ्य यह था कि 40 से 49 वर्ष की 54.4 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा से सहमत थीं। ये आँकड़े हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति बताते हैं। जहां तक अपराध पर फिल्मों के असर की बात है तो फिल्मों से प्रेरित होकर चोरी, हत्या या लूट के मामले अक्सर खबरों में आते रहते हैं। उदाहरण के लिए ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ फिल्म के बाद मोबाइल से चीटिंग के कई मामले सामने आए थे।


महिलाओं की स्थिति और फिल्मों का प्रभाव बताने वाली तीन रिसर्च : यह बहुत पुरानी बहस है कि क्या फिल्में समाज को प्रभावित करती हैं? देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1955 में अपने एक भाषण में कहा था कि भारत में फिल्मों का प्रभाव किताबों और अखबारों के कुल प्रभाव से भी ज्यादा है। कबीर सिंह के हिट होने और उसके आपत्तिजनक दृश्यों को पसंद किए जाने से फिल्मों में महिलाओं की स्थिति और उनके समाज पर असर को लेकर चर्चा हो रही है। इनसे जुड़ी तीन रिसर्च –


रिसर्च 1 – महिलाओं की भूमिकाएं कमजोर उनके लिए भाषा भी ठीक नहीं : आईबीएम रिसर्च और ट्रिपलआईटी दिल्ली ने 2018 में पिछले 50 सालों में आईं करीब 4000 हिन्दी फिल्मों का अध्ययन किया। अध्ययन में देखा गया था कि फिल्म की कहानियों के ऑनाइन विवरणों (सिनॉप्सिस) में महिलाओं और पुरुषों का कैसे जिक्र होता है, उनके लिए कैसे शब्दों, विशेषणों और क्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है। अध्ययन में सामने आया कि जहां कहानी में पुरुषों का जिक्र औसतन 30 बार आया, वहीं महिलाओं का जिक्र 15 बार आया। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह दर्शाता है कि महिला किरदारों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता। हीरो के लिए ज्यादातर मजबूत, सफल, ईमानदार जैसे विशेषण और ‘मार दिया’, ‘गोली मार दी’, ‘बचा लिया’, ‘धमकाया’ जैसी क्रियाओं का इस्तेमाल किया गया। वहीं हीरोइन के लिए खूबसूरत, प्यारी, विधवा, आकर्षक, सेक्सी जैसे विशेषण और ‘शादी की’, ‘स्वीकार किया’, ‘शोषण हुआ’, ‘मान गयी’ जैसी क्रियाएं इस्तेमाल की गईं। करीब 60 फीसदी महिला किरदारों को शिक्षक बताया गया, वहीं पुरुष किरदारों के पेशों में ज्यादा विविधता देखी गयी।
रिसर्च 2 – हीरो को धूम्रपान करते देख टीनएजर्स में लत की आशंका 16 गुना : अमेरिका की एजेंसी सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन 2002, 2004, 2005 और 2018 में कह चुकी है कि टीनएजर्स में धूम्रपान की लत की बड़ी वजह फिल्में हैं। एजेंसी की रिसर्च साबित कर चुकी है सिगरेट न पीने वाले ऐसे टीनएजर्स में, जिनके पसंदीदा स्टार पर्दे पर सिगरेट पीते दिखाए जाते हैं, उनमें भविष्य में धूम्रपान करने की आशंका 16 गुना तक ज्यादा होती है। एजेंसी की 2018 की रिसर्च के अनुसार जिन फिल्मों में धूम्रपान दिखाया जाता है, उन्हें अगर आर रेटिंग दी जाए तो टीनएज स्मोकर्स की संख्या 18 फीसदी तक घटाई जा सकती है। आर रेटिंग का अर्थ होता है कि 17 वर्ष से कम उम्र के बच्चे अभिभावक के साथ फिल्म देख सकते हैं।
रिसर्च 3 – विचार और सरकार के प्रति रवैया बदल सकती हैं फिल्में : 2015 में अमेरिका की डेटन यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर मिशेल सी. पॉट्ज ने कॉलेज के छात्रों पर एक शोध किया। उन्होंने छात्रों से सरकार के बारे में राय मांगी और सरकार से पूछे जा सकने वाले सवाल मांगे। उन्होंने ऐसा दो बार किया। ‘आर्गो’ और ‘जीरो डार्क थर्टी’ जैसी सफल फिल्में दिखाने से पहले और बाद में। डॉ पॉट्ज के अध्ययन में सामने आया कि फिल्म देखने के बाद करीब 25 फीसदी छात्रों की सरकार के प्रति राय बदल गयी। उनके सवाल सरकार के पक्ष में हो गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दिखाई गईं दोनों फिल्मों में सरकार को कमजोर और उसके कुछ किरदारों को ईमानदार और मेहनती बताया गया था।

(साभार – दैनिक भास्कर)