Thursday, July 2, 2026
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रक्षाबन्धन और स्वतन्त्रता दिवस पर हो जाए कुछ तिरंगा

 केसरी रसमलाई
सामग्री : 200 ग्राम ताजा पनीर या दो लीटर दूध, पौन लीटर दूध (अलग से), दो चम्मच मिल्क पावडर, एक चम्मच नींबू रस, एक चम्मच फैट फ्री दही, बारीक कटे बादाम व पिस्ते, दो कप शकर, पांच कप पानी, 4-5 केसर के लच्छे।
विधि : दो लीटर दूध उबाल लें और इसमें दही व नींबू रस मिला लें। पांच-दस मिनट उबालें। फिर तैयार पनीर को पानी से निथार लें और साफ कपड़े में बांधकर रात भर रख दें। इस पनीर के एक से डेढ इंच मोटे गोले बना लें। एक पैन में पांच कप पानी और एक कप चीनी डालकर उबालें। उबलने के बाद इसमें पनीर के गोले डालकर करीब 15 मिनट तक उबालें।
दूसरे पैन में दूध में एक कप शकर डाल लें। मिल्क पावडर मिलाएं और आधा होने तक उबाल लें। ध्यान रहे कि दूध पैन के तल में न चिपके। दूध थोड़ा ठंडा होने पर उसमें पनीर के तैयार गोले डाल दें। ऊपर से इलायची पावडर, बादाम-पिस्ता व केसर मिला लें और फ्रिज में ठंडा करके सर्व करें। यह बंगाल की लोकप्रिय मिठाई है। इसे घर पर बना कर आप त्योहार का खास आनंद उठा सकते हैं।

मलाई खाजा

सामग्री : 1 कटोरी मैदा, आधा कटोरी बादाम, पिस्ता की कतरन, 1/2 कटोरी घी, 1/2 कटोरी मलाई, 2 कटोरी शकर, 1/2 छोटी चम्मच पिसी इलायची, 1-2 चुटकी नमक, तलने के लिए घी।
विधि : सबसे पहले मैदे को छानकर, उमसें गर्म किया घी और नमक मिलाकर मलाई से पूरी के आटे की तरह गूंथें। 15-20 मिनट तक ढंक कर रख दें। शकर डूब जाए इतना पानी डालकर डेढ़ तार की चाशनी तैयार करें। अब कड़ाही में घी गर्म करें। छोटी-छोटी लोइयां बनाकर पेड़े की आकृति दें। बीच में थोड़ा-सा दबाकर खस्ता तल लें। धीमी आंच पर तलने से अच्छी तरह सिकाई होगी। तैयार चाशनी में इन्हें डुबोकर निकाल लें। ऊपर से बादाम, पिस्ता, बुरकाएं और चांदी के वर्क से सजाकर रखें।

हरियाली पनीर कोफ्ता 

सामग्री :  ग्रेवी के लिए –  3 कप बारीक कटा पालक, 2 चम्मच घी, 1 कप फेंटा हुआ दही,  1/2 चम्मच फेंटा हुआ दही, नमक  स्वादानुसार

पेस्ट बनाने के लिए  : 2 चम्मच कद्दूकस किया नारियल, 2 चम्मच बारीक कटा काजू, 2 चम्मच खसखस, 8 कलियां लहसुन, 3 बारीक  कटी मिर्च, 1 टुकड़ा अदरक,  1 चक्रफूल,  1/2 कप पानी-

कोफ्ता के लिए  : 1 कप  कद्दूकस किया पनीर, 4 चम्मच मैदा, 1/4 कप बारीक कटी धनिया पत्ती, 2 बारीक कटी मिर्च, चुटकी भर खाने वाला सोडा, नमक स्वादानुसार, तेल  आवश्यकतानुसार

विधि : पालक को अच्छी तरह से धो लें। कड़ाही में आधा कप पानी उबालें और उसमें पालक को मध्यम आंच पर एक से दो मिनट पकाएं। गैस ऑफ करें, पालक को गर्म पानी से निकालें, एक बार ठंडे पानी से धोएं और उसे ग्राइंडर में पीस लें। कड़ाही में घी गर्म करें और नारियल-खसखस वाला तैयार पेस्ट डालें। दो से तीन मिनट तक भूनें। कड़ाही में दही डालें, अच्छी तरह से मिलाएं और लगातार मिलाते हुए एक-दो मिनट पकाएं। अब कड़ाही में पालक का पेस्ट, चीनी और नमक डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। एक-दो मिनट बाद गैस ऑफ कर दें। तेल के अलावा कोफ्ते की सभी सामग्री को एक बरतन में डालकर मिलाएं। मिश्रण को आठ हिस्सों में बांटें और कोफ्ता का आकार दें। कड़ाही में तेल गर्म करें और कोफ्ता को सुनहरा होने तक तल लें। अब सर्व करने से तुरंत पहले पालक वाली ग्रेवी को गर्म करें, उसमें कोफ्ता डालकर एक-दो मिनट तक पकाएं। तुरंत सर्व करें।

बनारसी पान, तिरंगा बर्फी बने हथियार, देश के लिए लड़ीं तवायफें

देश को आजाद कराने के लिए बनारस में युवा-बुजुर्ग सड़क पर लड़ रहे थे तो यहां की मिठाई, पान और तवायफें उनकी हौसला-अफजाई कर रही थीं। उस दौर में पहली बार बनारस में ही तिरंगा बर्फी बनी जो राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रंग की थी। पूरी दुनिया में मशहूर बनारसी पान पर भी अंग्रेजों ने बैन लगाया था। तवायफों से तो अंग्रेजी हुकूमत हिल गई थी। बनारस के चौक इलाके के प्रमुख बाजार दालमंडी की गली में आजादी के आंदोलन के दौर में राजेश्‍वरी बाई, जद्दन बाई से लेकर रसूलन बाई तक के कोठे पर संगीत की महफिलें सजती थीं। इतिहास के जानकार डॉ. प्रवेश भारद्वाज की मानें तो महफिलों में अंग्रेजों को देश से निकालने की रणनीति तय होती थी। मशहूर अभिनेत्री नर्गिस की मां और संजय दत्त की नानी जद्दन बाई ने कोठे पर आए दिन अंग्रेजों के छापे से तंग आकर दालमंडी गली छोड़ दी थी। ठुमरी गायिका राजेश्‍वरी बाई तो हर महफिल में अंतिम बंदिश ‘भारत कभी न बन सकेला गुलाम…’, गाना नहीं भूलती रहीं।  ‘फुलगेंदवा न मारो, मैका लगत जोबनवा में ….’, जैसे गीत से मशहूर रसूलन बाई ने तो आभूषण तभी पहने जब देश आजाद हो गया। तवायफ दुलारी बाई के ललकारने पर उसके सबसे खास नन्‍हकू ने कई अंग्रेजों के सिर धड़ से अलग कर दिए थे। कजरी गायिका सुंदरी के प्रेमी नागर को ब्रितानी सेना से मोर्चा लेने पर कालापानी की सजा हो गयी। ‘स्‍वर जीवनी’ कही जाने वाली सिद्धेश्‍वरी देवी भी महफिलों में देश भक्ति के गीत जरूर गाती रहीं।

बनारसी पान पर प्रतिबन्ध
मशहूर बनारसी पान पर भी अंग्रेजों ने बैन लगा दिया था। तवायफों के कोठे वाली गली दालमंडी के पास आजादी के आंदोलन के दौर में पान की दुकान चलाने वाले रामस्‍वरूप के वंशज पवन चौरसिया बताते हैं कि अंग्रेजों को शक था कि स्‍वतंत्रता आंदोलन में पान की भी कोई भूमिका है इसलिए पान बेचने से लेकर खाने तक पर पाबंदी लगा दी थी। बावजूद इसके चोरी-चोरी घर-घर पान पहुंचता था। बनारसी पान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मुंह में रखते ही घुल जाता है। इसमें लगाया जाने वाला कत्‍था, चूना और सुर्ती पानवाले घर में तैयार करते हैं।

बर्फी और लड्डू के रूप में तिरंगा घर-घर

बनारस की रंग बिरंगी मिठाइयों का कोई जवाब नहीं है। देश-विदेश में मशहूर ‘राम भंडार’ में पहली बार तिरंगे के रंग वाली तिरंगी बर्फी बनी तो अंग्रेजों के होश उड़ गए थे। तिरंगे पर रोक के दौर में लोग तिरंगी बर्फी हाथों में लिए घूमते रहे। इसके बाद बनारस से ही जवाहर लड्डू, गांधी गौरव, मदन मोहन, वल्‍लभ संदेश, नेहरू बर्फी के रूप में राष्‍ट्रीय मिठाइयों की श्रृंखला सामने आई। तिरंगी बर्फी और तिरंगे जवाहर लड्डू में आज की तरह रंग का उपयोग नहीं हुआ था। हरे रंग के लिए पिस्‍ता, सफेद के लिए बादाम और केसरिया के लिए केसर का प्रयोग कर तिरंगे का रूप दिया गया था।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

जानिए स्वाधीनता दिवस की कुछ खास बातें

भारत इस बार 15 अगस्त को  73वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। पीएम नरेंद्र मोदी दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराएंगे। बता दें कि 15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर विकसित किया। इस दिन हर भारतीय स्वतंत्रता दिवस के जश्न से शहीदों को याद करके अपने को गौरवान्वित महसूस करता हैं –

आइए जानते हैं 15 अगस्त से जुड़ी कुछ रोचक बातें…

  • भारत में हर साल लाल किले से देश का प्रधानमंत्री झंडा फहराते हैं पर 15 अगस्त 1947 को ऐसा नहीं हुआ था। एक शोध पत्र के मुताबिक पंडित नेहरू ने 16 अगस्त 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था।
  •  जवाहर लाल नेहरू ने 14 अगस्त की मध्यरात्रि को वायसराय लॉज (मौजूदा राष्ट्रपति भवन) से ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी दिया, तब नेहरू प्रधानमंत्री नहीं बने थे।
  • भारत और पाकिस्तान की सीमाओं का निर्धारित 17 अगस्त को किया गया जो कि रेडक्लिफ लाइन के नाम से जाना जाता है।
  • भारत आजाद हुआ तो देश का कोई राष्ट्रगान नहीं था। जन-गण-मन को राष्ट्रगान 1950 में बनाया गया हालांकि रवींद्रनाथ टैगोर इसे 1911 में ही लिख चुके थे।
  • 15 अगस्त भारत के अलावा तीन अन्य देशों का भी स्वतंत्रता दिवस होता है।
  •  दक्षिण कोरिया जापान से 15 अगस्त, 1945 को आजाद हुआ। बहरीन को ब्रिटेन से 15 अगस्त, 1971 को आजादी मिली और फ्रांस ने कांगो को 15 अगस्त 1960 को स्वतंत्र घोषित किया।
  • भारत को स्वतंत्रता दिलाने में महात्मा गांधी की भूमिका बेहद खास थी लेकिन जब पूरा देश 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी का जश्न मना रहा तो वह इसके जश्न में शामिल नहीं हुए थे।
  • महात्मा गांधी उस दिन बंगाल में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हो रही हिंसा को रोकने के लिए अनशन कर रहे थे।
  • जब यह तय हुआ कि 15 अगस्त को देश आजाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गांधी जी को पत्र लिखकर इस बारे में सूचना देकर कहा आप राष्ट्रपिता है इसमें शामिल होकर अपना आशीर्वाद दें।
  •  गांधी ने इसको लेकन अपना जवाब दिया कि कलकत्ता में हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे की जान ले रहे है, मैं जश्न मनाने कैसे आ सकता हूं। मैं इन्हें रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा।
  • (साभार – नवोदय टाइम्स)

यहाँ तिरंगा बनाती हैं महिलाएँ

15 अगस्त यानि की स्वतंत्रता दिवस पर हम अक्सर उन लोगों को याद करते है जिन्होंने देश को आजाद करवाने में मुख्य भूमिका अदा की है। हर जगह पर हमारे देश के गर्व यानि की हमारे तिरंगे को फहराया जाता है। वहीं हमारे देश की कुछ महिलाएं महीनों पहले ही इन झंड़ों को बनाना शुरु कर देती है। भारत में कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्‍त संघ (फेडरेशन) (KKGSS) खादी व विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन ही कंपनी है जो कि तिरंगा झंडा बनाती है। इसमें खास बात यह है कि इस कम्पनी में पुरुषों से अधिक महिलाएं काम करती है, जो कि पूरे सम्मान के साथ यहां पर हर साल तिरंगे बनाती है। कम्पनी की शुरुआत 1957 में हुई थी। 1982 में इन्होंने खादी बनाना शुरु किया था। 2005-06 में इसे ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडडर्स की ओर से सर्टीफिकेशन मिला था जिसके बाद इन्होंने झंडा बनाना शुरु किया था। यहां से भारत ही नही विदेश में मौजूद इंडियन एम्बेसी के लिए झंडे भेजे जाते है। यहां पर ऑर्डर व कुरियर बुक करके भी झंडे खरीदे जा सकते हैं।

कर्नाटक के तुलसीगरी देश में स्थित भारत की एकमात्र तिरंगा बनाने वाली कंपनी में 400 के करीब महिलाएं काम करती हैं। कम्पनी की सुपरवाइजर अन्नपूर्णा कोटी के अनुसार महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले धैर्य अधिक होता है। वहीं पुरुषों में धैर्य की कमी होने के कारण वह माप लेने में कमी करते है जिससे गलती हो जाती है। कम्पनी में कर्मचारी सारा साल ही झंडे बनाते है। इतना ही नही गणतंत्रता व स्वतंत्रता दिवस के लिए लाल किले पर फहराए जाने झंडे का ऑडर दो महीने पहले ही आ जाता है। कर्नाटका के तुलसीगरी देश में स्थित भारत की एकमात्र तिरंगा बनाने वाली कम्पनी में 400 के करीब महिलाएं काम करती हैं। कंपनी की सुपरवाइजर अन्नपूर्णा कोटी के अनुसार महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले धैर्य अधिक होता है। वहीं पुरुषों में धैर्य की कमी होने के कारण वह माप लेने में कमी करते है जिससे गलती हो जाती है। कंपनी में कर्मचारी सारा साल ही झंडे बनाते है। इतना ही नही गणतंत्रता व स्वतंत्रता दिवस के लिए लाल किले पर फहराए जाने झंडे का ऑडर दो महीने पहले ही आ जाता है।

लाल किले पर फहराए जाने वाला तिरंगा 12*8 फीट का होता है, जिसकी कीमत लगभग 6500 रुपए होती है। इस तिरंगे को छह हिस्सों में बनाया जाता है। सबसे पहले कपड़े के लिए कताई कर उसकी बुनाई की जाती है। उसके बना इसे तीन रंगों में रंगा जाता है। इसके बाद इस पर अशोक चक्र की छपाई की जाती है। छपाई होने के बाद सिलाई व बंधाई का काम इसके बाद पूरा किया जाता है। इन झंडो को ध्वज संहिता व भारतीय मानक ब्यूरो के दिशानिर्देश अनुसार बनाया जाता है। इसमें गलती की बिल्कूल भी गुंजाइश नही होती है, अगर गलती हो जाए तो उसकी सजा हो सकती है। इतना ही इसमें इस्तेमाल किए जाने वाली कपड़ा जींस से भी मजबूत होता है।

कम्पनी से बाहर निकलने से पहले झंडे को कई बार जाँचा जाता है। हर सेक्शन में 18 बाल क्वालिटी चेक होता है। जिसमें रंग के शेड, कपड़े की लंबाई चौड़ाई, अशोक चक्र की छपाई, फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002. साइज व धागे में किसी तरह का डिफेक्ट हर चीज को चेक किया जाता है। इसमें किसी तरह का डिफेक्ट निकलना अपराध माना जाता है।

(साभार – पंजाब केसरी)

स्मार्ट चूड़ी: मुसीबत में भेजेगी लाइव लोकेशन, छेड़ा तो लगेगा बिजली का झटका

हैदराबाद : महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं और इन्हीं सवालों के कारण तरह के आविष्कार भी होते रहे हैं। अभी तक महिलाओं के लिए बाजार में ऐसे लॉकेट ही थे जिसमें लाइव लोकेशन शेयरिंग जैसे इमरजेंसी फीचर थे लेकिन अब ऐसी चूड़ियां भी बाजार में आ गईं हैं जो महिलाओं की सुरक्षा के लिए वरदान हैं।
हैदराबाद के हरीश नाम के युवक ने अपने दोस्त साईं तेजा के साथ मिलकर ऐसी ही चूड़ियां तैयार की हैं जिनमें लाइव लोकेशन शेयरिंग फीचर है। इसके अलावा इसमें बिजली के झटके भी हैं। साथ ही यदि कोई महिला या लड़की मुसीबत में है तो ये चूड़ियां पुलिस और रिश्तेदारों को मैसेज भी भेजती हैं। इन स्मार्ट चूड़ियों को सेल्फ सिक्योरिटी बैंगल (Self-Security Bangle for Women) को एक खास कोण पर हाथ को हिलाने पर इसके फीचर्स एक्टिव हो जाएंगे। इसके बाद जैसे ही कोई महिला का हाथ पकड़ेगा तो उसे बिजली के झटके लगेंगे और साथ ही चूड़ी परिजनों को लाइव लोकेशन के साथ अलर्ट भेजेगी। इन चूड़ियों को तैयार करने वाले हरीश ने बताया कि स्मार्ट चूड़ी का प्रोटोटाइप तैयार हो गया है और अब इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए सरकार की मदद की दरकार है। हरीश की उम्र महज 23 साल है।

कबाड़ में न जाएं, इसलिए 25 साल पुराने ट्रेन के 2 डिब्बों में बनाया दफ्तर

नयी दिल्ली: दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित रेलवे के अधिकारियों ने रेलवे के पुराने कोच को दफ्तर में तब्दील कर दिया है। इसे 25 साल पुराने दो कोचों को मिलाकर बनाया गया है। इसका इंटीरियर अंदर से बेहद खूबसूरत है। अब यह नेशनल रेल म्यूजियम का नया दफ्तर है। म्यूजियम का पूरा प्रशासनिक विभाग यहीं बैठकर काम करता है। म्यूजियम के डायरेक्टर भी इसी दफ्तर में बैठते हैं। इसमें डायरेक्टर ऑफिस के साथ विजिटर रूम भी है।
म्यूजियम के डायरेक्टर अमित सोराष्ट्री बताते हैं कि पुराने दफ्तर के कमरे छोटे थे। पूरा स्टाफ अलग बैठकर काम करता था। अब सब इस बड़े कोच में एक साथ बैठकर काम कर पाते हैं। कोचों को कन्वर्ट करने का मकसद- डिब्बों को कबाड़ से बचाना और दोबारा इस्तेमाल में लाना है। सोराष्ट्री ने बताया कि यह प्लान रेलवे बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अश्विनी लोहानी का था। रेल के ये दो डिब्बे 25 साल की सर्विस के बाद यहां खुले में पड़े थे। यह ऑफिस खूबसूरत दिखने के साथ-साथ किफायती भी है। इसमें ईंट से बने दफ्तर को तैयार करने से कम लागत लगी है।

सोनिया गाँधी फिर बनीं कांग्रेस अध्यक्ष

नयी दिल्ली : कांग्रेस की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रह चुकी सोनिया गांधी को पार्टी को संकट की स्थिति से निकालने के लिए एक बार फिर से इसकी बागडोर सौंपी गई है।
राहुल गांधी के लिए कांग्रेस का शीर्ष पद स्वेच्छा से छोड़ने के महज 20 महीने बाद सोनिया गांधी (72) को कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) ने शनिवार को पार्टी का अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया। दरअसल, हालिया लोकसभा चुनावों में पार्टी को मिली करारी शिकस्त के बाद राहुल ने 25 मई को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था।
सीडब्ल्यूसी के लिए सोनिया स्वभाविक पसंद थी, जो पहले भी संकट की घड़ी में पार्टी की खेवनहार रह चुकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस घटनाक्रम ने एक बार से यह जाहिर कर दिया है कि कांग्रेस नेतृत्व के लिए किस कदर नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर है।
कांग्रेस अध्यक्ष पद पर 19 साल तक रहीं सोनिया की उन फैसलों को लेकर सराहना की जाती है, जिसने पार्टी को लगातार दो आम चुनावों में और कई राज्य विधानसभा चुनावों में जीत दिलाई। वह 1998 से 2017 तक पार्टी की अध्यक्ष रही थीं। वर्ष 2004 में उन्होंने पार्टी के चुनाव प्रचार का नेतृत्व किया और उसे जीत दिलाई। उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इनकार करते हुए इस पद पर मनमोहन सिंह को नामित करने का फैसला किया। उनके इस कदम को कई लोग एक राजनीतिक ‘मास्टरस्ट्रोक’ के तौर पर देखा गया।
सूत्रों ने बताया कि 134 साल पुरानी का नेतृत्व संभालने के सीडब्ल्यूसी के सर्वसम्मति वाले अनुरोध को स्वीकार करने का फैसला कर सोनिया ने साहस का परिचय दिया है क्योंकि वह लगातार अपने खराब स्वास्थ्य का सामना कर रही हैं। उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी में संप्रग के रूप में गठबंधन का सफल प्रयोग किया।
वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिये चुनाव पूर्व गठबंधन बनाना उनकी सबसे बड़ी सफलताओं में से एक थी। वहीं, जब 2009 में केंद्र में अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत में संप्रग लड़खड़ा रहा था, तब सोनिया ने गठबंधन की नाव पार लगाई। हालांकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समानांतर कैबिनेट चलाने को लेकर उनकी अक्सर ही आलोचना की जाती है।
अब, एक बार फिर से पार्टी के खेवनहार के तौर पर ऐसे समय में उनकी वापसी हुई है, जब इस साल के आखिर में हरियाणा,झारखंड और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होना है।
पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि उनका नेतृत्व पार्टी कार्यकर्ताओं में नयी जान फूंकेगा। यह भी महसूस किया जा रहा कि सोनिया की वापसी बंटे हुए विपक्ष को भाजपा का मुकाबला करने के लिए एकजुट होने की एक वजह देगी। यह ठीक उसी तरह से है जब 1998 की शुरूआत में सोनिया के पार्टी की बागडोर संभालने के बाद से चीजें बदलनी शुरू हुई थीं।
वह 1997 में पार्टी की प्राथमिक सदस्य बनी थी और 1998 में इसकी अध्यक्ष बनीं। वह 1999 से लगातार लोकसभा सदस्य हैं।

डिवीज़ लैब के मुरली को मिला 58.80 करोड़ रुपये का मेहनताना

हैदराबाद : डिवीज़ लैबोरेटरीज के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक मुरली के. डिवी को 2018-19 में वेतन और कमिशन समेत कुल 58.80 करोड़ रुपये का पारिश्रमिक दिया गया। यह भारतीय दवा कम्पनियों में किसी भी कार्यकारी को मिला सर्वाधिक मेहनताना है। कम्पनी की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार मुरली के पारिश्रमिक में पिछले साल की तुलना में 46.30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कम्पनी ने इस वित्त वर्ष में कार्यकारी निदेशक एन.वी.रमण को 30 करोड़ रुपये और मुरली डिवी के बेटे तथा पूर्णकालिक निदेशक किरण एस. डिवी को 20 करोड़ रुपये मेहनताने के रूप में मिले। मुरली डिवी को कमिशन के रूप में 57.61 करोड़ रुपये मिले। वित्त वर्ष 2017- 18 के दौरान मुरली डिवी को 40.20 करोड़ रुपये का पारिश्रमिक प्राप्त हुआ जिसमें कि 39 करोड़ रुपये कमीशन के तौर पर मिले। कंपनी के कर्मचारियों को इस दौरान मेहनताना में औसतन 3.96 प्रतिशत की वृद्धि मिली। कंपनी को 2018-19 में कर भुगतान के बाद 1,333 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ और 5,036 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी

नयी दिल्ली : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रधान न्यायाधीश के अलावा उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 30 से बढाकर 33 किए जाने संबंधी एक विधेयक पर दस्तखत कर दिया है। उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक को इसी सप्ताह संसद की मंजूरी मिली थी। फिलहाल, शीर्ष न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) समेत कुल 31 पद हैं। कानून लागू होने के बाद सीजेआई को छोड़कर 33 पद होंगे। शीर्ष न्यायालय में मामलों की बढती संख्या के मद्देनजर न्यायाधीश के पदों की संख्या में इजाफे के लिए विधेयक लाया गया था। फिलहाल, उच्चतम न्यायालय में करीब 60 हजार मामले लंबित हैं।
यह फैसला ऐसे वक्त हुआ है, जब कुछ दिन पहले देश के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर शीर्ष न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए पत्र लिखा था। विधि मंत्रालय ने 11 जुलाई को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में कहा था कि शीर्ष अदालत में 59,331 मामले लंबित हैं । प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि न्यायाधीशों की अपर्याप्त संख्या के कारण कानून के सवालों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर फैसले के लिए जरूरत के मुताबिक संविधान पीठ नहीं गठित हो पा रही।

अयोध्या मामला: जयपुर राजघराने ने किया दावा, कहा- हम भगवान राम के वंशज

जयपुर : सांसद दीया कुमारी ने दावा किया कि उनका परिवार भगवान राम के बेटे कुश का वंशज है। पत्रावली के माध्यम से पेश किए सबूत, कहा जल्द निकले अयोध्या मामले का समाधान। जयपुर की पूर्व रानी पद्मिनी देवी ने भी अपने परिवार को भगवान राम का वंशज बताया था। शीर्ष अदालत में अयोध्या मामले की सुनवाई चल रही है। नौ अगस्त को सुनवाई के दौरान अदालत ने रामलला के वकील से पूछा कि क्या भगवान राम का कोई वंशज अयोध्या या दुनिया में कही हैं? इस पर वकील का कहना था कि हमें इस बात की जानकारी नहीं है।
इस बात की लेकर जयपुर की राजकुमारी और राजसमंद की सांसद दीया कुमारी ने दावा किया कि उनका परिवार भगवान राम के बेटे कुश का वंशज है। उन्होंने एक ट्वीट में कहा कि हां भगवान राम के वंशज पूरी दुनिया में है। हमारा परिवार भी उनके पुत्र कुश का वंशज है। इससे पहले एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में जयपुर की पूर्व रानी पद्मिनी देवी ने भी अपने परिवार को भगवान राम का वंशज बताया था। उन्होंने कहा कि उनका परिवार भगवान राम के पुत्र कुश के परिवार से संबद्ध है। उन्होंने कहा कि जयपुर के पूर्व राजा और उनके पति भवानी सिंह कुश की 309वीं पीढ़ी के थे। पूर्व राजकुमारी द्वारा इस बात का सबूत भी पेश किया। उन्होंने एक पत्रावली दिखाई, जिसमें भगवान राम के वंश के सभी पूर्वजों का नाम क्रम से लिखा हुआ है। इसी पत्रावली में 289वें वंशज के रूप में सवाई जयसिंह और 307वें वंशज के रूप में महाराजा भवानी सिंह का नाम लिखा हुआ है। जयपुर राजघराने की पूर्व राजमाता पद्मिनी देवी ने कहा कि राम मंदिर पर जल्द समाधान हो। चूंकि अदालत ने पूछा है कि भगवान राम के वंशज कहां हैं? इसलिए हम सामने आए हैं कि हां! हम उनके वंशज हैं। दस्तावेज सिटी पैलेस के पोथीखाने में हैं। हम नहीं चाहते कि वंश का मुद्दा बाधा पैदा करे। राम सबकी आस्था के प्रतीक हैं।