गेम को शेयरचैट प्लैटफॉर्म पर 40 लाख से अधिक पेज व्यूज़ मिल चुके हैं
कोलकाता : देश कोविड-19 संकट से जूझ रहा है, ऐसे में शेयरचैट यूज़र्स को कोरोना वायरस से बदला लेने का अनूठा तरीका मिल गया है। एक्स एल आर आई जमशेदपुर के दो विद्यार्थियों अकरम तारिक खान और अनुश्री वरदे बीते 10 दिनों से प्लैटफॉर्म पर ट्रैंड कर रहे हैं, क्योंकि इन्होंने एक गेम डैवलप किया है। इस गेम में नीचे की तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विजुअल है जो कोरोना वायरस को हैंड सैनिटाइज़र की बूंदों से शूट कर रहे हैं। ’गो कोरोना, कोरोना गो’ इसका थीम म्यूज़िक है, इस गेम का इरादा कोविड19 के बारे में जागरुकता पैदा करना है। गेम के खत्म होने पर सलाह दी जाती है कि कोरोनावायरस को कैसे हराया जाए, इसके लिए ’स्टे होम’, ’वियर मास्क’, ’वॉश योअर हैंड्स’ आदि संदेश आते हैं। शेयरचैट पर लाइव होने के बाद से यह गेम प्लैटफॉर्म पर ट्रैंड कर रहा है और इसे 40 लाख से ज्यादा पेज व्यूज़ मिल चुके हैं। यूज़र्स लाखों बार इस गेम को खेल चुके हैं, इसका औसत प्रति यूज़र 3.2 बार है। औसत स्कोर 5.8 गेम प्रति गेम प्ले है।
कोरोना वायरस के भय के चलते लॉकडाउन करना पड़ना है और लोग इससे नाखुश हैं, परेशान हैं, चिंतित हैं। यह देखते हुए कहा जा सकता है कि यह गेम शेयरचैट यूज़र्स के लिए राहत लेकर आया है, इसने उनका तनाव घटाया है। शेयरचैट यूज़र्स को एक नया तरीका मिला है कोरोना को परास्त करने का और इस गेम के माध्यम से इस वायरस के बारे में जागरुकता का प्रसार भी हो रहा है।
कोलकाता : पेंट बनाने वाली कम्पनी कामधेनु कोरोना आपदा के दौर में अपने साथ काम करने वाले पेंट करने वाले श्रमिकों की मदद के लिए आगे आयी है। कामधेनु पेंट्स का लक्ष्य ऐसे 4000 मजदूरों की सहायता करना है। इसके लिए वह आर्थिक सहायता राशि सीधे इन मजदूरों के बैंक खाते में डालेगी। अब तक 1500 मजदूरों की सहायता की जा चुकी है। कामधेनु लिमिटेड के निदेशक सौरभ अग्रवाल ने कहा कि आज कोरोना आपदा के खिलाफ सारा विश्व एक साथ खड़ा है और कामधेनु पेंट्स भी अपने साथ काम करने वाले लोगों की सहायता कर रहा है। गौरतलब है कि लॉकडाउन के कारण श्रमिक बड़ी तादाद में बेरोजगार हो गये हैं..और यह सहायता उनको लाभ पहुँचाएगी।
लन्दन : कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सारी दुनिया एक साथ आ रही है। दवा और वैक्सीन खोजने के लिए वैज्ञानिक काफी परिश्रम कर रहे हैं। ऑक्सफोर्ड में रहने वाली कोलकाता की चन्द्रा दत्त उन युवाओं में शामिल हैं जो कोरोना की वैक्सीन बनाने के प्रयासों में जुटी टीम का हिस्सा हैं। चन्द्रा इस टीम में शामिल एकमात्र भारतीय हैं। चन्द्रा क्वालिटी एश्योरेंस मैनेजर के तौर पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में कार्य़रत हैं। यह टीम कोरोना से लड़ने के लिए प्रतिरोधक यानी एन्टी वायरल वेक्टर वैक्सीन बना रही है। चन्द्रा ने कोलकाता के गोखले मेमोरियल गर्ल्स स्कूल से पढ़ाई की है औऱ हेरिटेज इन्स्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में बी.टेक की पढ़ाई कर चुकी हैं।
लंदन में दो विश्वविद्यालयों में अलग अलग रूप से करोना वायरस प्रतिरोधक वैक्सीन बनाने का कार्य चल रहा है। करोना वैक्सीन पर शोधरत ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी की एक टीम में चंद्रा दत्त भी हैं जो भारतीय हैं। गर्व की बात है कि चंद्रा दत्त के पिता डॉ समीर दत्त भवानीपुर एडूकेशन सोसायटी कॉलेज के साइंस विभाग के वाइस प्रिन्सिपल हैं। कोलकाता के गोखल मेमोरियल गर्ल्स स्कूल से 2004 में उच्च माध्यमिक में उत्तीर्ण कर चंद्रा दत्त ने हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से बी.टेक की डिग्री प्राप्त की। 2009 से ब्रिटेन लिडस विश्विद्यालय से एम एस सी किया। 2019 ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में जेनर इंस्टीट्यूट क्लिनिकल बायो मैनुफैक्चरिंग विभाग में कोविड 19 वायरस प्रतिरोधक वैक्सीन तैयार करने का कार्य कर रही हैं जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। चंद्रा की माँ रेमी दत्त और डॉ समीर दत्त दोनों ही गर्वित हैं कि उनकी पुत्री उस टीम में इस भयानक वायरस पर विजय प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। 20 जनवरी से इस वायरस वैक्सीन पर युद्ध स्तर पर शोध चल रहा है। लोगों पर ट्रायल भी शुरू कर दिए गए हैं। भवानीपुर कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज डी शाह ने चंद्रा दत्त को बधाई और शुभकामनाएं दी।
सब लोग कुछ न कुछ अपने मन की बात कह रहे है मैंने भी सोचा मैं भी अपने मन की बात आप से करूं कुछ लिख कर अगर कोई गलती हो तो माफ करना
आज हम सब एक जगह आकर रूक सा गये।पर किसी ने यह सोचा हमारे जीवन में क्या चल रहा था। यह हमें भी पता नही की हमारे जीवन में क्या चल रहा था। वही रोज की भाग दौड़ कहते हैं ना की प्रकृति व ईश्वर जो भी करता है वह अच्छे के लिए करता है। कोराना के कारण परिवार के सभी सदस्य घर पर रह रहे हैं।और समय का सदुपयोग करने के लिए कुछ ना कुछ कार्य कर रहे हैं। हंसी मजाक कर रहे हैं।इस से यह ज्ञात होता है की इस लॉक डाउन ने हमारे अहंकार के गुब्बारे को फोड़ दिया है कि पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है।जिस के पीछे दुनियां दिन रात दौड़ती है पर हमें यह अहसास दिलाया है कि दुनिया केवल पैसे से नही चल सकती, हालांकि इस की भी जरूरत है।पर हमें अपने जीवन को आराम से चलाने के लिए लोगों की भी जरूरत है।और हमें उन सब को सलाम करना चाहिए। जिन्होंने हमारे जीवन में खुशी की किरण ले कर आये है।हमारी जीवन शैली में कुछ सुधार आया है।हमारी प्रकृति में भी काफी परिवर्तन आया है।
नयी दिल्ली : एग्यूमेन्टेड रियेल्टी खिलौना कम्पनी प्लेशिफू का ऑरबुट ऐप अब उपभोक्ताओं के लिए निःशुल्क उपलब्ध है। कम्पनी ने लॉकडाउन के दिनों में सीखने की गतिविधियों को आसान बनाने के लिए यह फैसला लिया है। अब उपभोक्ता 4 गेम ऑरबुट ग्लोब खरीदे बगैर ही खेल सकेंगे। शिफू ऑरबुट ए आर द्वारा संचालित है और कम्पेनियन ऐप के साथ काम करता है। पिछले साल कम्पनी ने अपने दो उत्पादों ऑरबुट और प्लूगो के जरिए सीरिज – ए ने लगभग 7 मिलियन डॉलर फंडिंग उगाही थी और अब इनको उम्मीद है कि मार्च – अप्रैल में 30 हजार नये यूजर मिलेंगे क्योंकि अभिभावक शैक्षणिक गेम से सम्बन्धित ऐप खोज रहे हैं। कम्पनी को माँग में 300 गुना वृद्धि की उम्मीद है। कम्पनी के मुताबिक ऑरबुट एक इन्साइक्लोपीडिया है जो 6 श्रेणियों में 1 हजार से अधिक तथ्य और 400 से अधिक आश्चर्य 3 डी में लाता है। प्ले शिफू के सह संस्थापक विवेक गोयल ने कहा कि यह उत्पाद बच्चों को व्यस्त रखने और रचनात्मक बनाने में मदद करेगा। इसमें डीआईवाई गतिविधियाँ, पाठ्यक्रम केन्द्रित वर्कबुक भी सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं। सह संस्थापक दिनेश आडवानी के अनुसार यह अभिभावकों की सहायता करने का प्रयास है।
सच सामने आना चाहिए और यह खबर हमें दैनिक भास्कर में मिली…आप नीचे दैनिक भास्कर के लिंक पर जाकर पूरी खबर पढ़ सकते हैं। खबर आप ज्यों का त्यों पढ़ सकते हैं….
पुणे : कोरोना वायरस के लॉकडाउन के कारण टीवी पर 34 साल बाद रामानंद सागर की बनाई रामायण का फिर से प्रसारण हो रहा है। दर्शक जहां इस धारावाहिक के बहाने यादों को ताजा कर रहे हैं, वहीं इसके कारण एक सच्चाई का खुलासा भी हुआ जो मंदोदरी का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस को लेकर है। दरअसल, बीते 15 वर्षों से लोग और मीडिया प्रभा मिश्रा नाम की जिस महिला को मंदोदरी की पहचान देते आए हैं, उन्होंने वास्तव में मंदोदरी की भूमिका नहीं निभाई थी। सच्चाई यह है कि इस भूमिका को महान अभिनेता भारत भूषण की बेटी अपराजिता भूषण ने निभाया था। एक महान किरदार की पहचान खोने के इस पूरे मामले में दैनिक भास्कर ने पड़ताल की और अपराजिता भूषण से सीधे बातचीत कर सच जाना। इसके बाद जो कहानी सामने आई, उसे हम ज्यों की त्यों अपराजिता के शब्दों में बयां कर रहे हैं।
मैं अपराजिता भूषण, भारत भूषण जी की बड़ी बेटी हूं और अपने परिवार के साथ पुणे में रहती हूं। मैं करीब 23 साल पहले फिल्म इंडस्ट्री से दूर हो गई थी और मैंने अपना आगे का करिअर बतौर एक लेखिका और मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में बनाया है।
ये इसी साल जनवरी के महीने की बात है। जब कुछ शुभचिंतकों ने मेरे ध्यान में यह बात लाई कि इंटरनेट पर ‘मंदोदरी’ शब्द को सर्च करें तो रामानंद जी की रामायण में मंदोदरी की आपकी भूमिका आपके नाम से नहीं, बल्कि बीके प्रभा मिश्रा के नाम से आती है। यह बात तब की है जब न तो कोई कोरोना संकट था और न ही रामायण के दोबारा प्रसारण की कोई योजना थी।
प्रभा मिश्रा…जो 15 साल तक मन्दोदरी बनी रहीं जबकि यह किरदार अपराजिता ने निभाया था
मैं शॉक्ड रह गई क्योंकि मेरे नाम और काम पर आघात यह सब पिछले 15 साल से चल रहा था। मैंने गूगल सर्च करके पुराने लिंक खोजे और पाया कि मेरे शुभचिंतक सही कह रहे थे। मैंने पाया कि जिन प्रभा मिश्रा के नाम को रामायण की मंदोदरी बताया जा रहा है वे प्रतिष्ठित संस्था ब्रह्मकुमारीज से जुड़ी हैं।
इसके बाद मैंने ब्रह्मकुमारीज संस्था से सम्पर्क किया और उन्हें पूरी बात बताते हुए कहा कि इससे तो मेरा काम और मेरी पहचान ही गुम हो गई, या कहें कि चोरी हो गई। उन्होंने मेरी बात बहुत गंभीरता से सुनी और मदद के लिए तुरंत कदम उठाए। उन्हीं के माध्यम से मैंने प्रभा मिश्रा से सम्पर्क किया। उन्होंने सब कुछ सुनकर मुझे कुछ अजीब से तर्क दिए, जो सच्चाई से परे थे।
सच-झूठ सामने आने के बाद उन्होंने मुझसे माफी मांगी। मैं व्यथित थी और मैंने उनसे आग्रह किया कि वे मेरी पहचान लौटाए और बीते 15 वर्षों में जो भी इंटरव्यू दिए है उन्हें डिलीट करवाएं और जो भी बातें उन्होंने मेरी मंदोदरी वाली भूमिका ओढ़कर की है उसे लेकर अपना स्पष्टीकरण लिखित में दें कि मैंने वह भूमिका नहीं की थी, मैंने तो सिर्फ उसका इस्तेमाल किया था।
कई बार ध्यान दिलाने के बाद भी दो महीने तक उनकी ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया। तभी अचानक कोरोना लॉकडाउन में दूरदर्शन ने रामायण को फिर से दिखाने का फैसला किया। मुझे मीडिया की ओर से कॉल आने लगे और साथ ही प्रभा मिश्रा की भूमिका को लेकर भी मुझसे सवाल किए जाने लगे। जब मैंने सच्चाई बताई तो सभी हैरान थे और मुझे कानूनी कदम उठाने की सलाह भी दी गई, हालांकि मैंने उस सलाह को नजरअंदाज करने का फैसला किया।
मैंने प्रभा जी को फिर से कॉल किया और उनसे कहा कि आप मुझे एक ईमेल करके अपनी सफाई दें और उसमें लिखें कि मैं असली मंदोदरी नहीं हूं, यह भूमिका अपराजिता भूषण ने की थी। उन्हाेंने बीते दिनों मुझे एक ईमेल भेजा और अपनी गलती स्वीकार कर मुझे अपनी मंदोदरी की पहचान लौटाई। आखिरकार, उन्होंने मेरा सहयोग किया और इस तरह सद्भावनापूर्वक इस पूरे मामले में सच की जीत हुई।
बीते तीन महीने मुझे इस पूरे मामले ने काफी परेशान किया। मेरे परिवारजन भी दुखी हुए, लेकिन हमने हिम्मत और सच्चाई के साथ सहानुभूति से सभी के सामने अपने पक्ष को रखा। मैंने प्रभा जी से अपना पक्ष रखने के लिए कहा है। मेरे पिता ने हमेशा हम बच्चों को रामायण और श्रीमदभगवतगीता के रास्ते पर चलने की सीख दी। बतौर स्प्रिच्युअल राइटर और स्पीकर होने के नाते मेरी शक्ति भी वही गुण हैं। मेरा मानना है कि जीवन में क्षमा और करुणा बहुत आवश्यक है, लेकिन मेरा यह भी मानना है कि जो कुछ भी गलत है और धर्म के विरूद्ध है, उसका मुकाबला करके उसे नष्ट किया जाना चाहिए।
अंत में, मैं कहूंगी कि ईश्वर की कृपा है कि उन्होंने मेरी सत्यनिष्ठा को स्थापित करने की शक्ति दी और मुझे अंधेरे से उजाले में आने का मार्ग दिखाया।
दुनियाभर में भले ही अब तक नए कोरोनावायरस की वैक्सीन न तैयार हो पाई हो लेकिन इंसानको संक्रमित करने वाले पहले कोरोनावायरस के खोज की कहानी दिलचस्प है। इसे 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ने वाली एक बस ड्राइवर की बेटी जून अल्मेडा ने 1964 में खोजा था। सर्दी-खांसी से जूझ रहे मरीजों के नाक के सैम्पल को जून ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी में देखा तो एक ताजनुमा (क्राउन) वायरस दिखा। जब इस बात की जानकारी जर्नल और सीनियर को दी तो उन्होंने यह कहते हुए रिसर्च रिजेक्ट कर दी कि इसकी तस्वीर काफी खराब है लेकिन बाद में यह खोज इतिहास बनी। कोरोनावायरस एक क्रॉउन की तरह दिखता है इसके आधार पर ही इसका नाम कोरोना रखा गया।
बतौर लैब टेक्नीशियन शुरू किया था करियर
स्क्रॉटलैंड की अल्मेडा एक वायरस विशेषज्ञ थीं। उनका जन्म 5 अक्टूबर 1930 में ग्लासगो में हुआ था। पिता एक बस ड्राइवर थे और आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई का खर्च नहीं उठा पाए तो अमलेडा को 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अल्मेडा ने ग्लासगो रॉयल इन्फर्मरी की एक लैब में बतौर टेक्नीशियन के तौर पर काम करना शुरू किया। कुछ महीनों के बाद ज्यादा वह लंदन आईं और सेंट बार्थोलोमियूज हॉस्पिटल में बतौर लैब टेक्नीशियन काम करने लगीं। 1954 में वैनेजुएला के एक आर्टिस्ट एनरीक अल्मेडा से शादी के बाद वह कनाडा आ गईं। टोरंटो के ऑन्टेरियो कैंसर इंस्टीट्यूट में उन्होंने बतौर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी टेक्नीशियन काम करना शुरू किया।
लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल ने नौकरी का ऑफर दिया
अल्मेडा का मन नई चीजों की रिसर्च में अधिक लगता था। यही वजह थी कि बिना किसी डिग्री के उन्होंने एक अलग मुकाम बनाया। कनाडा के बाद ब्रिटेन में उनके काम की अहमियत को समझा गया। 1964 में लंदन के सेंट थॉमस मेडिकल स्कूल ने उन्हें नौकरी का ऑफर दिया।
जर्नल ऑफ जनरल वायरोलॉजी में प्रकाशित हुई थी खोज
अल्मेडा और उनके सीनियर डॉ. टायरेल ने बाद में वायरस को नाम दिया था कोरोना क्योंकि इसके चारों ओर एक क्राउन यानी ताजनुमा संचरना थी। शुरुआती दौर में यह रिसर्च खारिज होने के बाद 1965 में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में इसकी जानकारी दी गई। इसकी खोज के समय कहा गया था कि ये वायरस इनफ्लूएंजा की तरह दिखता तो है, पर ये वो नहीं, उससे कुछ अलग है। दो साल इस खोज को जर्नल ऑफ जनरल वायरोलाजी में प्रकाशित किया गया।
एचआईवी की पहली हाई क्वालिटी इमेज बनाने में मदद की
अल्मेडा के नाम कई उपलब्धियां रही हैं। उन्होंने एड्स के वायरस एचआईवी की पहली हाई-क्वालिटी इमेज बनाने में मदद की थी। हेपेटाइटिस वायरस के दो अलग-अलग हिस्से होते हैं, यह बात भी अल्मेडा ने दुनिया के सामने पहली बार रखी। हेपेटाइटिस की वैक्सीन तैयार करने में यह रिसर्च काफी मददगार साबित हुई थी।
1985 में योगा टीचर बनीं, 2007 में दुनिया से रुख्सत हुईं
विज्ञान के क्षेत्र में अल्मेडा लम्बे समय तक सक्रिय रहीं। 1985 में योग टीचर बनीं और रिटायर्ड वायरोलॉजिस्ट फिलिप गार्डनर से शादी की। 2007 में 77 साल की उम्र में इनका निधन हुआ।
मशहूर इलस्ट्रेटर जीन डाइच को कार्टून फिल्म मुनरो के लिए ऑस्कर भी मिल चुका है
जीन पहले उत्तरी अमेरिका में सेना से जुड़े हुए थे, वे पायलटों को प्रशिक्षण देते थे
टॉम एंड जैरी के इलस्ट्रेटर, ‘पोपाय द सेलर मैन’ और ‘मुनरो’ जैसी कार्टून फिल्म्स के निर्देशक और निर्माता जीन डाइच का 95 साल की उम्र में निधन हो गया। वे 16 अप्रैल को प्राग के अपने अपार्टमेंट में मृत मिले। जीन पहले उत्तरी अमेरिका में सेना से जुड़े हुए थे। वे पायलटों को ट्रेनिंग देने और सेना के लिए ड्राफ्टमैन का काम करते थे, लेकिन सेहत संबंधी परेशानियों के चलते उन्हें 1944 में सेना से हटा दिया गया। बाद में वे एनिमेशन के क्षेत्र से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने टॉम एंड जैरी कार्टून कैरेक्टर क्या सोचकर बनाया? एक इंटरव्यू में उन्होंने यह साझा किया था। आप भी पढ़िए।
चुनौती ऐसा कैरेक्टर बनाने की थी, जो बिना कुछ बोले सबको हँसा सके और सालों तक याद रहे
जीन डाइच ने बताया था कि मैं 1944 में अमेरिका में सेना की नौकरी छोड़कर हॉलीवुड के मशहूर एमजीएम प्रोडक्शन हाउस के साथ जुड़ गया। टॉम एंड जेरी की शुरुआत भी यहीं से हुई। इसे बनाने से पहले मेरे सामने यह चुनौती थी कि बिल्ली और चूहे की कभी न खत्म होने वाली इस लड़ाई में भाषा और किसी भी देश की सीमा से परे मैं ऐसा कैरेक्टर बनाऊं, जिसे लोग सालों तक याद रख सकें। यानी ऐसा कैरेक्टर, जो बिना कुछ बोले अपने भाव से सबको हँसा सके।
सपने में भी लड़ते हुए दिखते थे टॉम एंड जैरी- जीन
उन्होंने बताया कि इसी बीच, मेरी मुलाकात विलियम हन्ना और जोसेफ बारबरा से हुई। दोनों एमजीएम स्टूडियो में काम करते थे। दोनों बहुत मेहनती थे। मैंने टॉम एंड जैरी के कैरेक्टर्स पर उनके साथ मिलकर काम करना शुरू किया। एनिमेटर होने के नाते मुझे एक सीरिज में हजारों कार्टून स्ट्रिप बनाने पड़ते थे, क्योंकि तब कम्प्यूटर की तकनीक नहीं हुआ करती थी। जीन ने कहा था कि टॉम एंड जैरी का कैरेक्टर मेरे दिमाग में ऐसे घुस गया कि रात के सपने में भी मुझे वो आपस में लड़ते हुए दिखाई देते थे। सुबह उनकी लड़ाई को मैं कागज पर उकेर देता था।
1960 में टॉम एंड जैरी की 13 एपिसोड की नई श्रृंखला बनाई- जीन
1957 में एमजीएम स्टूडियो ने अपनी एनिमेशन यूनिट को बंद कर दिया। 1959 में मैं प्राग घूमने आया और यहीं बसने की ठान ली। इसके बाद हन्ना और बारबरा भी प्राग आ गए और यहां खुद का प्रोडक्शन हाउस खोला। 1960 में टॉम एंड जैरी की 13 एपिसोड की नई श्रृंखला और ‘पोपाय द सेलर मैन’ फिल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिए। यहां से मुझे प्रसिद्धि मिली। 1967 में मुनरो के लिए मुझे ऑस्कर भी मिला।
वाशिंगटन : भारतीय-अमेरिकी सांसद आर ओ खन्ना को व्हाइट हाउस कोरोना वायरस सलाहकार परिषद में नियुक्त किया गया है। खन्ना (43) व्हाइट हाउस के ‘ओपनिंग अप अमेरिका अगेन कांग्रेशनल ग्रुप’ में नामित एकमात्र भारतीय-अमेरिकी सांसद हैं, जिसमें रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों पार्टियों के सांसद और सीनेटर शामिल हैं।
समूह की पहली बैठक गत गुरुवार को फोन कॉल के माध्यम से आयोजित की गई थी।
व्हाइट हाउस ने बैठक के विवरण की जानकारी देते हुए कहा कि बातचीत में कई विषयों पर चर्चा हुई, जिनमें ‘पेचेक प्रोटेक्शन प्रोग्राम’ के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता, अंतरराष्ट्रीय और घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाएं, अर्थव्यवस्था को सक्रिय करने के तरीके, चिकित्सा बिलिंग, आवश्यक और गैर-आवश्यक श्रमिकों के बीच अंतर को स्पष्ट करना, मानसिक स्वास्थ्य और छोटे व्यवसायों के लिए राहत प्रदान करने संबंधी कई मुद्दे शामिल थे।
‘पेचेक प्रोटेक्शन प्रोग्राम’ अमेरिकी लघु व्यापार प्रशासन (एसबीएस) की तरफ से कारोबारियों को दिया जाने वाला कर्ज है ताकि कोरोनावायरस के इस दौर में उनके कर्मी काम करते रहें।
इसके अलावा समूह ने कोविड-19 इलाज और जांच, वेंटिलेटर, फेस मास्क और अन्य पीपीई किटों की शीघ्र व्यवस्था पर भी चर्चा की।
खन्ना ने कहा कि कोविड-19 के मद्देनजर परिषद के सदस्य के रूप में वह अमेरिकियों को राहत दिलाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे।
खन्ना ने कहा कि परिषद के सदस्य के रूप में, वह अमेरिकियों को कोरोना वायरस से निजात दिलाना चाहते हैं और वह इससे लड़ते रहेंगे।
नयी दिल्ली : जूम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग एप को लेकर सरकार ने चेतवानी दी है। गृह मंत्रालय ने कहा है कि जूम एप सुरक्षित नहीं है और इसके जरिए महत्वपूर्ण जानकारी हैकर्स तक पहुंच सकती है। भारत सरकार के अलावा अमेरिका जैसे कई देशों में ने भी जूम एप के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। गूगल ने भी अपने कर्मचारियों को जूम एप इस्तेमाल ना करने की सलाह दी है। तो अब सवाल यह है कि जूम एप के अलावा और कौन-कौन से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग एप हैं जिनसे ग्रुप वीडियो कॉलिंग हो सकती है, मीटिंग हो सकती है और प्राइवेसी का खतरा ना हो? आइए जानते हैं ऐसे एप्स के बारे में… मीट नाउ – माइक्रोसॉफ्ट स्काइप में मीट नाउ एप से आप आराम से वीडियो कॉलिंग कर सकते हैं। मीट नाउ का फायदा यह है कि इसके जरिए वे लोग भी वीडियो कॉलिंग कर सकते हैं जिनके पास स्काइप अकाउंट नहीं है। इसमें कॉल रिकॉर्डिंग, म्यूट और अनम्यूट माइक्रोफोन जैसे फीचर्स मिलते हैं। आप मीट नाउ पर 30 दिनों तक की रिकॉर्डिंग कर सकते हैं। इसमें आप प्रेजेंटेशन भी दे सकते हैं। सिस्को वेब एक्स – वेब एक्स (WebEx) पर एक साथ 50-100 लोगों के साथ वीडियो कॉलिंग की जा सकती है। खास बात यह है कि इसमें वीडियो कॉलिंग के लिए अनलिमिटेड समय मिलता है।
स्टारलीफ – स्टारलीफ से भी आप आसानी से वीडियो मीटिंग कर सकते हैं। स्टारलीफ एप पर अधिकतम 20 लोग वीडियो कॉलिंग में शामिल हो सकते हैं। इस एप के लिए आपको कोई पैसे भी नहीं देने हैं। जित्सी – जित्सी (Jitsi) एक ओपन सोर्स प्रोजेक्ट है जिस पर आप अधिकतम 75 लोगों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर सकते हैं। खास बात यह है कि इसमें बैकग्राउंड को ब्लर करने की भी सुविधा है। इसमें स्लैक, गूगल कैलेंडर और ऑफिस 365 का भी सपोर्ट है। वेयरबाई – इसके साथ खास बात यह है कि आपको ना एप डाउनलोड करना है और ना ही लॉगिन करना है। आप सीधे अपने फोन के ब्राउजर में whereby.com टाइप करके वीडियो कॉलिंग कर सकते हैं। इसमें 50 लोग एक साथ मीटिंग में शामिल हो सकते हैं। गूगल मीट– गूगल मीट को पहले हैंगआउट मीट के नाम से जाना जाता था लेकिन अब इसका नाम गूगल मीट हो गया है। इसमें एक साथ 49 लोग शामिल हो सकते हैं। वहीं जी सूट इंटरप्राइज यूजर्स एक साथ 250 लोगों के साथ मीटिंग कर सकते हैं। सिग्नल – सिग्नल एक काफी सिक्योर प्राइवेट मीटिंग एप है। खास बात यह है कि इस पर एडवर्ड स्नोडेन पर भी भरोसा करते हैं। यह एक फ्री एप है और इसमें स्केच, क्रॉप, फ्लिप और अन्य इमेज एडिटिंग फीचर्स हैं। माइक्रोसॉफ्ट मीट- माइक्रोसॉफ्ट मीट के जरिए 250 लोगों के साथ मीटिंग कर सकते हैं। इसमें आप मीटिंग को शिड्यूल भी कर सकते हैं।