अब नॉन-एक्जीक्यूटिव चेयरमैन और डायरेक्टर होंगे
नयी दिल्ली : राहुल बजाज(75) बजाज ऑटो के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन का पद छोड़ेंगे। उनका कार्यकाल 31 मार्च 2020 को खत्म हो रहा है। इसके बाद राहुल बजाज नॉन एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर की भूमिका में आ जाएंगे यानी ग्रुप के फैसलों में उनका सीधा दखल नहीं होगा। बजाज ऑटो ने यह जानकारी दी। बोर्ड ने उन्हें अप्रैल 2015 में एग्जीक्यूटिव चेयरमैन नियुक्त किया था। उनका कार्यकाल 5 साल का था। कंपनी ने बताया कि कुछ प्रतिबद्धताओं की वजह से उन्होंने कंपनी के पूर्णकालिक डायरेक्टर के रूप में काम नहीं करने का फैसला लिया। राहुल बजाज की नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के तौर पर नियुक्ति हुई। बजाज ऑटो के बोर्ड मेंबर्स की बैठक में नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के तौर पर राहुल बजाज की नियुक्ति को मंजूरी दी गई। नए रोल में उनका कार्यकाल एक अप्रैल 2020 से शुरू होगा। सेबी के नियमों के मुताबिक, नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन के तौर पर नियुक्ति के लिए पोस्टल बैलट के जरिए शेयर होल्डर्स की मंजूरी ली जाएगी।
1965 में संभाला था बजाज ग्रुप का जिम्मा
राहुल बजाज ने 1965 में बजाज ग्रुप की जिम्मेदारी संभाली थी। उनकी अगुआई में बजाज ऑटो का टर्नओवर 7.2 करोड़ से 12 हजार करोड़ तक पहुंच गया और यह स्कूटर बेचने वाली देश की अग्रणी कंपनी बन गई। 2005 में राहुल ने बेटे राजीव को कंपनी की कमान सौंपनी शुरू की थी। तब उन्होंने राजीव को बजाज ऑटो का मैनेजिंग डायरेक्टर बनाया था, जिसके बाद ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कंपनी के प्रोडक्ट की मांग न सिर्फ घरेलू बाजार में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी बढ़ गयी।
50 साल बाद कार्यकारी भूमिका छोड़ेंगे राहुल बजाज
देसी पुरस्कार में विदेशी प्रायोजक, फिल्मफेयर को प्रायोजित करेगा अमेजन
मुम्बई : मनोरंजन के साधनों में से एक सिनेमा में पिछले कुछ ही सालों में एक क्रांति आई है, जिसमें बाहरी कंपनियों नेटफ्लिक्स और अमेजन ने भरपूर रुचि दिखाई है।
हाल ही में अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस ने भारत में अपनी जड़ें और मजबूती से जकड़ने की नीयत से भारत दौरा किया, और हिंदी सिनेमा के शीर्ष कलाकारों और फिल्मों से जुड़े लोगों से मुलाकात की। उनका मन तो भारत के हर क्षेत्र में पैर पसारने का था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे मुलाकात न करके जेफ के मंसूबों पर पानी फेर दिया। जेफ के इस भारत दौरे का असर अब दिख रहा है, जब भारतीय सिनेमा के प्रतिष्ठित सम्मान फिल्मफेयर के प्रायोजक में अमेजन ने पान पराग, जिओ डिजिटल और विमल पान मसाला को नीचे छोड़कर अपना स्थान टॉप पर हासिल कर लिया। यह पहला मौका है जब किसी बाहरी कंपनी ने सिनेमा के अवार्ड फिल्मफेयर में रुचि दिखाई है। भारतीय सिनेमा के लिए यह हो सकता है कि दुनियाभर के सिनेमा में आदान-प्रदान और कलाकारों को पारदर्शिता का अनुभव कराए, लेकिन भारतीय कंपनियों के लिए यह खतरे की घंटी हो सकती है।
जूट से ‘सफेद कोयला’; दो छात्रों का आविष्कार बना किसानों और पर्यावरण के लिए वरदान!
हम सब जानते हैं कि कोयला हमारे पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड गैस निकलता है, साथ ही इसे जलाने पर मरकरी और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे तत्व भी निकलते हैं। जिनसे स्वास्थ्य संबंधी बीमारी होने का खतरा रहता है। इन सब तथ्यों को जानते हुए भी हमारे यहाँ कोयले का खनन और उत्पादन काफी मात्रा में होता है। कोयले के प्लांट्स भारत में 72% बिजली उत्पादन करते हैं। कोयले पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए पिछले कुछ सालों में नवीनकरणीय ऊर्जा की तरफ न सिर्फ सरकार का बल्कि आम लोगों का रुझान भी बढ़ा है। कोयले के विकल्प के तौर पर ‘सफेद कोयला’ बनाने पर जोर दिया जा रहा है। एग्रो वेस्ट यानी कि जैविक कचरा, जैसे भूसी, सूखे छिलके, पत्ते, गोबर आदि से अधिक घनत्व और ऊर्जा वाले ब्रिकेट बनाए जाते हैं। इन ब्रिकेट को ‘सफेद कोयला’ कहते हैं और इन्हें बनाने की प्रक्रिया को बायो-कोल ब्रिकेटिंग कहते हैं!
यह ब्रिकेट जैविक ईंधन है और पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल हैं। ये हल्के होते हैं और साथ ही, इन्हें स्टोर करना आसान है। भारत के अलग-अलग राज्यों में इन ब्रिकेट्स पर शोध हो रहे हैं। ऐसे में, दो इंजीनियरिंग छात्रों ने जूट से ऐसे ब्रिकेट बनाने की पहल की और उन्हें इस इनोवेशन के लिए सम्मानित भी किया गया है।
करण घोराई और कथा सूर अपनी ग्रैजुएशन के पहले साल में थे, जब एक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उन्होंने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। कोलकाता के नेताजी सुभाष इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे करण और कथा ऐसा कुछ करना चाहते थे जो कि ग्रामीण भारत में बदलाव ला सके।
“हम ग्रामीण इलाकों के लिए कुछ करना चाहते थे पर समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। मेरे पापा ने हमसे कहा कि सबसे पहले हमें गाँवों में जाकर वहां के लोगों से मिलना चाहिए, तभी हमें वहां की समस्याओं का पता चलेगा,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए 21 वर्षीय कथा ने बताया।
कथा के पिता कमल सूर का कहना था कि यदि उन्हें गाँवों के लिए कुछ करना है तो वहां जाकर उनकी ज़िन्दगी को देखना होगा। बिना वहां गये और सिर्फ शहरों में बैठकर हम गांवों की समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढ सकते।
करण बताते हैं कि कथा के पिता की बात सही निकली। उन्हें कोलकाता के आस-पास के गाँवों में जाकर और वहां के लोगों से बात करके न सिर्फ उनकी समस्या समझ आई बल्कि उन्होंने उसका हल भी खोजा।
“हमें वहां पता चला कि बहुत से किसान जूट उगाते हैं। लेकिन समस्या ये है कि उन्हें फाइबर बेचने के लिए तो बाज़ार मिल जाता है लेकिन जूट का सूखा कचरा जैसे कि जूट स्टिक आदि बच जाते हैं। जिन्हें या तो वे जला देते हैं या फिर यूँ ही कचरे के ढेर में डाल देते हैं,” कथा ने आगे कहा। करण और कथा ने अपनी रिसर्च में ये खोजना शुरू किया कि आखिर कैसे जूट स्टिक का सही इस्तेमाल किया जा सकता है? उनका उद्देश्य था कि वे कुछ ऐसा करें जिससे कि किसानों की आय बढ़े और एग्रो-वेस्ट का सही इस्तेमाल हो।
“हमें अपनी रिसर्च से पता चला कि जूट स्टिक बायोडिग्रेडेबल हैं और इन्हें जैविक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। हमने आगे इस पर काम किया और पता लगाया कि ऐसा क्या करे जिससे कि लोग आसानी से इसे ईंधन की तरह इस्तेमाल कर सकें,” उन्होंने बताया। उन्होंने अपने प्रोजेक्ट में कई शोध किए और आखिरकार उन्हें पता चला कि यदि इन जूट स्टिक को तोड़कर बुरादा बनाया जाए और फिर उस पर सही मात्रा में दबाव लगाया जाए तो वे इसे ब्रिकेट यानी कि सफेद कोयले का रूप दे सकते हैं।
वे बताते हैं कि जब उनका प्लान तैयार हो गया तो उन्हें अपने मेंटर से प्रोटोटाइप बनाने का सुझाव मिला। अब समस्या ये थी कि इसके लिए उन्हें ब्रिकेटिंग मशीन चाहिए थी और वो कोलकाता में मिलना आसान नहीं था। फिर भी उन्होंने अपनी तलाश शुरू की और उन्हें गुजरात की एक कंपनी के बारे में पता चला। ये कंपनी ब्रिकेटिंग मशीन का इस्तेमाल करती है।
कथा और करण ने अपने प्रोजेक्ट के बारे में इस कंपनी के अधिकारियों को ईमेल किया। वे आगे कहते हैं, “कंपनी ने हमसे पहले 80 किलोग्राम रॉ मटेरियल मतलब कि जूट स्टिक भेजने को कहा। वे लोग निश्चिंत होना चाहते थे कि हम वाकई कुछ कर रहे हैं। ये बहुत बड़ी चुनौती थी क्योंकि हमें लगा कि अब हम क्या करेंगे?”
लेकिन उन दोनों ने इस चुनौती को भी पार कर लिया क्योंकि उनके कॉलेज प्रशासन ने उनका साथ दिया। अपने इस प्रोजेक्ट के लिए उन्हें कॉलेज से ज़रूरी फंडिंग भी मिली। करण बताते हैं कि उन्होंने गाँवों में जाकर किसानों से बात की और जूट की लकड़ियाँ इकट्ठा करना शुरू किया। ये वाकई हैरत की बात थी कि उन्होंने कुल 110 किलोग्राम जूट स्टिक इकट्ठा की और कंपनी को भेजीं।
फिर जैसे ही उन्हें कंपनी ने अपने यहाँ आकर काम करने की इजाज़त दी, वे दोनों खुद गुजरात पहुँच गये। उन्होंने अपनी आँखों के सामने जूट से ब्रिकेट बनवाये और फिर टेस्टिंग के बाद अपने प्रोजेक्ट को 3M- CII के कम्पटीशन के लिए भेजा।
उन्हें 3M- CII इनोवेशन चैलेंज अवॉर्ड 2019 में प्रोडक्ट इनोवेशन कैटेगरी में सम्मानित किया गया। साथ ही, हर किसी ने उनके इस प्रोजेक्ट की सराहना की।
अपने इस सफेद कोयले की खासियत के बारे में बताते हुए वे कहते हैं कि इसकी कैलोरिफिक वैल्यू लगभग 4000 किलो कैलोरी प्रति ग्राम है जो सामान्य कोयले के बराबर ही है। लेकिन सफेद कोयले में सल्फर जैसा कोई प्रदूषक तत्व नहीं है।
प्रदूषण और ऊर्जा के साथ-साथ, ये किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है। अगर हमारे देश में इसी तरह से सफेद कोयले के उत्पादन पर जोर हो तो खेतों में बचने वाले जैविक कचरे को भी बाज़ार मिलेगा। इससे किसानों को अतिरिक्त आय होगी। साथ ही, पराली जलाने की समस्या से भी देश मुक्त होगा।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए करण और कथा आने वाले समय में अपने इस प्रोजेक्ट को एक सफल व्यवसाय में बदलना चाहते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें काफी फंडिंग चाहिए होगी। आखिर में वे बस यही उम्मीद करते हैं कि उन्हें जल्द ही कोई इन्वेस्टर मिल जाए, जिसे उनके प्रोजेक्ट पर भरोसा हो और ये प्रोजेक्ट देश भर के जूट किसानों के लिए बेहतर साबित हो।
(साभार – द बेटर इंडिया)
नटी विनोदिनी : अपमान सहकर जिन्होंने रंगमंच को दिया स्टार थियेटर
एक वक़्त था जब थिएटर और सिनेमा में महिला का किरदार भी पुरुष कलाकार निभाते थे। उस जमाने में महिलाओं का इस क्षेत्र में काम करना बहुत ही ओछा माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलीं और महिलाओं ने रंगमंच पर कदम रखना शुरू किया। कहते हैं कि बंगाली थिएटर ने अंग्रेज़ी थिएटर से भी पहले अपने नाटकों में महिला कलाकारों को स्टेज पर उतारा। उस शुरुआती दौर की पहली चंद कलाकारों में से एक थीं बिनोदिनी दासी।
अपने अभिनय और कला से बिनोदिनी ने बंगाली थिएटर को नए आयाम दिए और आज भी बंगाल में वे ‘नटी बिनोदिनी’ के नाम से लोगों के दिलों में बसती हैं। समय-समय पर बंगाली थिएटर और टीवी धारावाहिकों में उनकी कहानी को दोहराया जाता रहा है। उनका नाम उन भारतीय अभिनेत्रियों में शामिल होता है, जिन्होंने अपने अभिनय से लोगों को किरदारों से जुड़ने के लिए मजबूर कर दिया।
उन्होंने कलाकारों के कॉस्टयूम और मेक-अप में रचनात्मक और क्रियात्मक प्रयोग किए। यह मशहूर अभिनेत्री शिक्षा के महत्व को भी समझती थीं और इसलिए कहा जाता है कि बिनोदिनी घंटों कुछ न कुछ पढ़ने में व्यस्त रहती थीं।
आज के बहुत से लेखक उन्हें अपने समय की ‘फेमिनिस्ट’ कहते हैं क्योंकि उनके सपने और महत्वकांक्षाएँ उन्हें अपने समकालीन कलाकारों से बहुत अलग करते थे। बिनोदिनी सिर्फ एक स्टेज तक सीमित नहीं थीं बल्कि वह तो अपनी एक अलग पहचान चाहती थीं, अपना एक थिएटर, जहां वह कला की दुनिया को सजा सकें। हालांकि, उनके सपने दकियानूसी सोच की भेंट चढ़ गए। वह एक तवायफ की बेटी थीं और इसलिए कला से संपन्न होने के बावजूद समाज़ ने उन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया।
साल 1862 में कोलकाता में जन्मी बिनोदिनी ने बचपन से अगर कुछ देखा तो सिर्फ गरीबी। उनके छोटे भाई की मात्र 5 साल की उम्र में शादी कर दी गयी ताकि दहेज़ में मिले गहने आदि को बेचकर घर का खर्च चल सके। बिनोदिनी के नाजुक कंधों पर भी घर चलाने की ज़िम्मेदारी थी। इसलिए मात्र 12 साल की उम्र से ही उन्होंने थिएटर करना शुरू कर दिया था। थिएटर की दुनिया से उनकी पहचान उस समय की एक थिएटर गायिका, गंगाबाई ने करवाई थी। गंगाबाई उनके घर में किराए पर रहने आई थीं और उन्होंने छोटी बिनोदिनी को गायन सिखाना शुरू किया।
उन्होंने ही बिनोदिनी की मुलाक़ात कोलकाता थिएटर के दिग्गज कलाकार और निर्देशक, गिरीश चंद्र घोष से करवाई थी। घोष ने ही बिनोदिनी को अपने नेशनल थिएटर के एक नाटक, ‘बेनी संहार’ से स्टेज पर उतारा। इस नाटक में बिनोदिनी ने एक छोटी सी भूमिका निभाई थी। पर इस छोटे से किरदार के बाद बिनोदिनी थिएटर की दुनिया में आगे बढ़ती रही।
गिरीश ने बिनोदिनी को रंगमंच की बारीकियाँ सिखाईं या फिर यूँ कहे कि उन्होंने ही बिनोदिनी की कला को तराश उनके भीतर के हीरे को निकाला। बिनोदिनी ने हमेशा ही घोष को अपने गुरु और मार्गदर्शक होने का श्रेय और सम्मान दिया। कहते हैं कि बिनोदिनी किसी भी पात्र को सिर्फ ऊपर-ऊपर से नहीं निभाती थीं, बल्कि वह उसे स्टेज पर जीवंत कर देती थीं। घंटों रिहर्सल करना, किरदार को बार-बार पढ़ना और उसमें रम जाना- बिनोदिनी के कुछ गुर थे जिससे वह अपनी कला को और निखारती थीं।
उन्होंने बहुत बार एक ही नाटक में कई अलग-अलग भूमिकाएँ निभाईं और हर एक को इस तरह पेश किया कि दर्शक बिनोदिनी को किरदार के बाहर कभी न देख पाए। ‘मेघनाद वध’ में उन्होंने छह अलग-अलग भूमिकाएँ निभाईं – परिमाला, बरुनी, रती, माया, महामाया और सीता। इसके अलावा ‘दुर्गेश नंदिनी’ नामक नाटक में भी तीन किरदारों को जीया।
उनका सबसे चर्चित नाटक ‘चैतन्य लीला’ रहा क्योंकि इसमें उन्होंने किसी महिला का नहीं बल्कि संत चैतन्य का किरदार किया। जिस ज़माने में पुरुष महिलाओं की भूमिका निभाते थे, उस ज़माने में एक महिला कलाकार ने पुरुष का किरदार निभाने की चुनौती स्वीकारी।
‘चैतन्य लीला’ में उनके अभिनय की चर्चा पूरे बंगाल में हुई। दर्शकों को यूँ लगा कि मानो खुद संत चैतन्य उनके सामने हैं। यह नाटक और भी एक वजह से चर्चा में रहा। दरअसल, महान समाज सुधारक रामकृष्ण परमहंस, खुद इस नाटक को देखने के लिए आए थे। वह इस कदर बिनोदिनी की कला से प्रभावित हुए कि खुद जाकर बिनोदिनी से मिले और उनकी कला की सराहना कर आर्शीवाद दिया।
कहते हैं कि ‘चैतन्य लीला’ के बाद बिनोदिनी का थिएटर करियर अपने शीर्ष पर था। हर तरफ अभिनय की दुनिया में उनका ही नाम था। लेकिन इसके ठीक दो साल बाद, 1887 में उन्होंने अपना आखिर किरदार ‘बेल्लिक बाज़ार’ नाटक के ज़रिए निभाया और महज़ 24 साल की उम्र में रंगमंच की दुनिया को अलविदा कह दिया।
शुरुआती स्टार्टअप के लिए सीड फंडिंग की घोषणा, साथ ही बनेंगे एडवाइजरी सेल
नयी दिल्ली : स्टार्टअप देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा रोल अदा कर रहे हैं और इसे ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने इस बजट में स्टार्टअप के लिए सीड फंड की बड़ी घोषणा की है। वित्त मंत्री ने अपने भाषण में स्टार्टअप के लिए सीड फंड की बड़ी घोषणा की है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2020-2021 के अपने भाषण में कहा कि उद्यमिता हमेशा “भारत की ताकत” रही है और इसी के साथ उन्होने भारतीय स्टार्टअप्स के लिए कारोबार करने में आसानी सुनिश्चित करने के लिए उपायों का एक प्रस्ताव रखा, जिसमें शुरुआती चरण का समर्थन करने के लिए सीड फंड भी शामिल है। इन उपायों के अलावा, उद्यमियों के लिए एक निवेश मंजूरी और सलाहकार सेल की स्थापना की भी बात कही है। भारत के उद्यमियों को “जॉब क्रिएटर्स” कहते हुए, वित्त मंत्री ने कहा कि भारत के युवा और महिलाएं आज भारत में नए व्यवसायों और रोजगार के अवसर पैदा रहे हैं, इसी के साथ वे आर्थिक विकास सुनिश्चित कर रहे हैं। इस दौरान वित्तमंत्री ने उद्यमियों के लिए एक निवेश मंजूरी और सलाहकार सेल की घोषणा की और राज्य और केंद्र स्तर पर व्यवसायों के लिए तेजी से मंजूरी की सुविधा प्रदान करने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल की घोषणा करते हुए कहा, “भारत के युवा नौकरी मांगने वाले नहीं बल्किनौकरी देने वाले हैं।” वित्तमंत्री ने आगे कहा, “डेटा अब स्पष्ट रूप से नया तेल है। मैं पूरे देश में डेटा सेंटर फ़ार्म स्थापित करने के लिए एक नीति का प्रस्ताव करती हूं। यह विचार मूल्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण में डेटा को कुशलता से शामिल करने के लिए है।” इसी के साथ वित्त मंत्री ने भारत नेट कार्यक्रम के तहत पूरे भारत में डिजिटल कनेक्टिविटी पर ध्यान देने के साथ 6,000 करोड़ रुपये के आवंटन का प्रस्ताव रखा। वित्तमंत्री ने आईपी निर्माण और संरक्षण के महत्व पर जोर दिया और बौद्धिक संपदा संरक्षण के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू करने की घोषणा की। यह मंच सहज आवेदन की सुविधा देगा और आईपी के लिए जटिलता और इनोवेशन पर काम करने के लिए एक केंद्र स्थापित किया जाएगा। उन्होने ज्ञान हस्तांतरण क्षेत्रों का भी प्रस्ताव रखा, जो कॉन्सेप्ट और उत्पादों के निर्माण में मदद करेगा। सीतारमण ने कहा कि युवा इन स्टार्टअप के पीछे की ताकत हैं, इसी के साथ उन्होने कौशल विकास के लिए 3,000 करोड़ रुपये आवंटित किए। निर्मला सीतारमण का यह दूसरा बजट है। जुलाई 2019 में अपने पहले बजट भाषण में, उसने स्टार्टअप्स के लिए एक विशेष टीवी चैनल की घोषणा की थी। पिछले बजट में एंजल टैक्स के कारण शुरू होने वाले मुद्दों का प्रशासन करने के लिए एक अलग समिति बनाने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया था।
देश में काम करने् की चाह,19 साल के युवा वैज्ञानिक ने ठुकराया नासा का प्रस्ताव
भागलपुर : बिहार के भागलपुर के रहने वाले युवा वैज्ञानिक गोपाल जी ने देश में रहकर काम करने के लिए नासा का ऑफर ठुकरा दिया। गोपाल को आबुधाबी में होने जारी सबसे बड़े साइंसफेयर में बतौर मुख्य आमंत्रित किया गया है। युवा वैज्ञानिक गोपाल जी अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा में काम करने के सपने कौन नहीं देखता, लेकिन बिहार के एक युवा वैज्ञानिक ऐसे भी हैं जिन्होने देश में रहकर शोध करने के लिए नासा का ऑफर ठुकरा दिया। ये शख्स हैं बिहार के भागलपुर निवासी गोपाल जी। 19 वर्षीय गोपाल बचपन से ही मेधावी थे, हालांकि ऐसा नहीं था कि उनके लिए सब आसान था। साल 2008 में आई बाढ़ ने उनके गाँव में भीषण तबाही मचाई और तब सब बर्बाद हो गया। इस परेशानी भरे माहौल में भी गोपाल ने हिम्मत नहीं हारी। साल 2014 में जब गोपाल 10वीं में थे, तभी उन्होने बनाना बायो सेल कि खोज कि और इस खोज के लिए उन्हे इंस्पायर्ड अवार्ड से नवाजा गया। गोपाल साल 2017 में प्रधानमंत्री मोदी से मिले और पीएम मोदी ने उन्हे एनआईएफ़ अहमदाबाद भेज दिया, जहां उन्होने कुल 6 आविष्कार किए। गोपाल की गिनती दुनिया के 30 स्टार्टअप वैज्ञानिकों में भी होती है। गोपाल फिलहाल देहारादून में बनी लैब में शोध और अनुसंधान कर रहे हैं, लेकिन वे झारखंड में लैब विकसित कर शोध करना चाहते हैं। अगले महीने आबूधाबी में विश्व का सबसे बड़ी विज्ञान प्रदर्शनी आयोजित होनी है और गोपाल को उस आयोजन में बतौर मुख्य वक्ता आमंत्रित किया गया है। इस विज्ञान प्रदर्शनी में विश्व भर से करीब 6 हज़ार से अधिक वैज्ञानिक शामिल होंगे। दैनिक भास्कर के अनुसार गोपाल ने हर साल 100 बच्चों की मदद करने का फैसला किया है, इसी के साथ गोपाल अबतक 8 बच्चों के आविष्कारों का पेटेंट भी करा चुके हैं। गोपाल ने अबतक को कमाल के आविष्कार किए हैं उनमें पेपर बायो सेल, किसी भी ताप पर आकार न बदलने वाला गोपोनियम एलोय, 5 हज़ार डिग्री सेल्सियस तक का ताप उत्पन्न करने वाला जी स्टार पाउडर, बनाना नैनो फाइबर और सोलर माइल समेत कई आविष्कार शामिल हैं।
(योर स्टोरी)
कोलकाता पुस्तक मेले में पैरोकार की साहित्यिक परिचर्चा
कोलकाता : पैरोकार की साहित्यिक मासिक परिचर्चा “पाठक वर्ग की जिम्मेदारी” विषय पर कोलकाता पुस्तक मेले में दिल्ली के वाणी प्रकाशन स्टॉल पर शनिवार को आयोजित की गयी। इस परिचर्चा बतौर मुख्य अतिथि प्रो० विजय कुमार भारती ने पाठक के जिम्मेदारी पर बात करते हुए कहा कि पाठक के दो वर्ग है पहला बाज़ारकेन्द्रित पाठक , दूसरा जिम्मेदार पाठक । उन्होंने कहा कि पाठक एक जिम्मेदाराना पद है, जिम्मेदार पाठक पाठ को जीता है , पाठ के समस्या को समझ कर लेख़क द्वारा सुझाये गए मार्ग को भी समझता है। पाठक का दायरा बहुत बड़ा है विद्यार्थी से लेकर लेखक तक सभी क्योंकि एक अच्छा लेखक एक अच्छा पाठक भी होता है।उन्होंने नामवर सिंह और मैनेजर पांडे के मतों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पढ़ना एक रचनात्मक कार्य है और पाठक वर्ग की समस्या वर्तमान में अत्यंत गंभीर होती जा रही है। वहीं महाराजा श्रीश्चंद्र कॉलेज के सहायक प्रोफेसर डॉ० कार्तिक चौधरी ने पाठक वर्ग की समस्याओं पर चर्चा करते हुए पूर्वाग्रह और विरोधी आलोचको को भी दर्शाया । पाठक के सामने चुनौती भी है क्योकि कई बार पुस्तक की समीक्षा को देख कर किताबें तो पाठक खरीद लेता है लेकिन पढ़ने के बाद ठगा हुआ महसूस करता है ।पाठक को विवेकता से पुस्तकों को पहचानना होगा। श्यामाप्रसाद कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीनिवास यादव ने जिम्मेदार पाठक बनने के पहले पाठक से अच्छे पाठक बनने की प्रेरणा दी। केंद्रीय हिन्दी निदेशालय से आये प्रदीप ठाकुर ने बताया कि आज पाठक उन्मादित हो गए है और स्वविवेक का उनमें लोप हो गया है अतः आज पाठक को सर्वप्रथम बौद्धिक होना होगा।सिटी कॉलेज से आये संदीप प्रसाद जी ने बताया कि तकनीक और प्रिंट माध्यम ने पाठकों की संख्या बढ़ा दी है और आज पाठक वर्ग की जिम्मेदारी से ज्यादा जरूरी लेखक और प्रकाशक वर्ग की है।और अगली पीढ़ी के पाठकों के लिए पढ़ाई का वातावरण बनाने के लिए प्रेरित करना होगा।तो वही श्रीरामपुर गर्ल्स कॉलेज से आयी दीपा कुमारी ने पाठकों को पूर्वाग्रह से बचने की सलाह दी। और दैनिक जागरण के पत्रकार अनवर हुसैन ने पढ़ने की संस्कृति बचाने की बात की और बताया कि तकनीक का पाठकों पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। परिचर्चा में मौजूद विद्यार्थियों में प० ब० विवि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान के विद्यार्थी अजय चौधरी ने पाठकों को समय का सदुपयोग कर वर्तमान समय की चुनौतियों को स्वीकार कर पढ़ने की बात कही। महाराजा श्रीशचंद्र कॉलेज के विद्यार्थी मुकुल ने कहा कि पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा । सुशील ने सही पुस्तकों के चुनावों की समस्या को सामने रखा, बिक्रम ने मोटी-मोटी किताबो को पढ़ने में अरुचिकर होने की बात कही तो वही विजय और चंदन ने भी पाठकों को तकनीक के माध्यम से जुड़ने और अपने मस्तिष्क की सीमा बढ़ाने की भी बात कही। इस साहित्यिक परिचर्चा में सभी शिक्षक और विद्यार्थियों ने मिल कर इस विषय पर चर्चा की और निष्कर्ष यह निकला कि पाठक एक जिम्मेदाराना पद है और उसे सभी किताबों को पढ़ने के बाद ही समझ आएगा कि सही किताब कौन सी है।धन्यवाद ज्ञापन वाणी प्रकाशन के चंदन चौधरी ने किया।
द हेरिटेज स्कूल में गणतन्त्र दिवस समारोह
कोलकाता : द हेरिटेज स्कूल में गणतन्त्र दिवस समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर ध्वजारोहण मुख्य अतिथि नेशनल कैडेट कॉर्प के ग्रुप कमांडर कॉमडोर आलोक चटर्जी ने किया। उनके साथ उनकी पत्नी श्रृति चटर्जी भी मौजूद थीं। कल्याण भारती ट्रस्ट के निदेशक प्रवीर राय तथा केबीटी के सीईओ प्रदीप अग्रवाल भी उपस्थित थे। विद्यार्थियों ने देशभक्तिपरक कविताएँ, भाषण प्रस्तुत किये। इस अवसर पर नृत्य तथा गीत की प्रस्तुति भी हुई।
‘इंसुलिन इंजेक्शन डे’ : बीडी-इंडिया द्वार इंसुलिन इंजेक्शन का जागरूकता अभियान
विशेषज्ञों का कहना है कि इंसुलिन इंजेक्शन की सही तकनीक मधुमेह के देखभाल के लिये अहम होती है
कोलकाता : अक्सर डायबिटीज की देखभाल के लिये इंसुलिन थैरेपी एक अहम हिस्सा होती है। ग्लाइसेमिक के प्रभावी नियंत्रण के लिये, टाइप 2 डायबिटीज में आखिरकार इंसुलिन थैरेपी की जरूरत होती है। इसमें इंजेक्शन थैरेपी अभी भी उतनी ही अहम है। इंसुलिन इंजेक्शन की सुरक्षित आदतों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिये, बीडी-इंडिया द्वारा एजुकेशनल कैम्पेन का आयोजन किया गया। यह अभियान प्रमुख एंडोक्राइनोलॉजिस्ट के साथ ‘इंसुलिन इंजेक्शन डे’ के दिन कई शहरों में आयोजित किया गया। ‘इंसुलिन इंजेक्शन डे’ की शुरुआत 11 जनवरी 1922 को इंसुलिन के सबसे पहले सफलतापूर्वक इस्तेमाल की 98वीं वर्षगांठ के अवसर पर, कनाडा के ‘टोरंटो जनरल हॉस्पिटल’ में मनाया गया।
कांफ्रेंस में, कोलकाता डायबिटीज एंड एंडोक्राइन फाउंडेशन के प्रेसिडेंट और एंडोक्राइन सोसायटी ऑफ इंडिया के पूर्व प्रेसिडेंट प्रोफेसर देबाशीष माजी ने कहा, ‘’इंसुलिन इंजेक्शन थैरेपी की सफलता और इसका पालन, कुछ कारणों पर निर्भर करता है, जैसे काउंसलिंग के साथ सहजता से इंसुलिन लगाने की प्रक्रिया के बारे में जानना ताकि सुईयों का डर कम हो सके, इंसुलिन रीजिम, सुई की लंबाई और इसे लगाने का तरीका। यह याद रखना जरूरी है कि इंसुलिन ट्रीटमेंट ब्लड ग्लूकोज के नियंत्रण के लिये जरूरी होता है और इंजेक्शन लगाने की कुशलता में किसी प्रकार की कमी से डोज की मात्रा और इसका प्रभाव प्रभावित हो सकता है। किस तरह और कहां आपको इंजेक्शन लगाना है उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि आपको किसके साथ इंजेक्शन लेना है उसके बारे में जानना। सुईयों को दोबारा इस्तेमाल ना करने की सलाह दी जाती है क्योंकि भोथी सुईयां टिशूज को क्षति पहुंचा सकती हैं और परेशानियां खड़ी कर सकती हैं। मुझे इस बात की खुशी है कि बीडी ‘इंसुलिन इंजेक्शन डे’ के मौके पर जागरूकता अभियान में सहयोग दे रहा है। इससे इंसुलिन इंजेक्शन को सही तरीके से लेने की प्रेरणा मिलेगी और मरीजों को बेहतर जीवन जीने में मदद मिलेगी।‘’
प्रोफेसर निलांजन सेनगुप्ता, प्रोफेसर एवं हेड, एंडोक्राइनोलॉजी डिपार्टमेंट-एनआरएस, मेडिकल कॉलेज, कोलकाता और वाइस प्रेसिडेंट, डायबेटिक एसोसिएशन ऑफ इंडिया (डीएआइ), पश्चिम बंगाल ने कहा, ‘’ग्लाइसेमिक पर सही तरीके से नियंत्रण करने के लिये इंजेक्शन की सही तकनीक बहुत ही जरूरी होती है और इससे इंसुलिन पर निर्भर डायबिटीज मरीजों को परेशानियों से बचाव होता है। यदि इंजेक्शन डिवाइस जैसे सुई को गलत तरीके से या फिर दोबारा इस्तेमाल किया जाये तो इसकी वजह से दर्द के साथ ब्लीडिंग और जख्म हो सकते हैं और सुई का टूटना अन्य परेशानी खड़ी कर सकती है। बीडी के ‘इंसुलिन इंजेक्शन डे’ अभियान के माध्यम से, इंजेक्शन की उचित तकनीक सीखने के लिये जागरूकता लाना भी उतना ही महत्पूर्ण होता है, जिसमें इंजेक्शन लगाने की जगह और साइट रोटेशन शामिल है।‘’
विशेषज्ञ इस बात पर भी जोर देते हैं कि इंसुलिन इंजेक्शन तकनीक के गलत तरीके की वजह से लिपोहाइपेट्रोफी हो सकती है, जोआमतौर पर मरीज के इंजेक्शन लगाने वाली जगह पर त्वचा के अंदर रबर जैसी सूजन होती है। लिपोहाइपेट्रोफी की वजह से ग्लाइसेमिक का सही रूप में नियंत्रण ना हो पाना, हाइपोग्लाइसेमिया और ग्लाइसेमिक वेरियेबिलिटी की समस्या हो सकती है।
एफआईटीटीईआर इंसुलिन इंजेक्शन के कुछ सुझाव
साइट रोटेशन
मरीज को शुरुआत से ही रोटेशन स्कीम का पालन करने का एक आसान तरीका बताना चाहिये
सुई/सिरींज की स्वच्छता
सुईयों का दोबारा इस्तेमाल ना करें। हर इंजेक्शन के लिये एक नई सुई का प्रयोग करें।
लिपोहाइपेट्रोफी – हर बार डॉक्टर के पास जाने पर इंजेक्शन लगाने वाली जगह की जांच की जानी चाहिये। मरीजों को भी इंजेक्शन वाली जगह को खुद देखना सिखाना चाहिये और साथ ही किस तरह लिपोहाइपेट्रोफी का पता लगाया जाता है उसकी ट्रेनिंग दी जानी चाहिये।
इंजेक्शन की जगह
इंजेक्शन साफ जगह पर और साफ हाथों से दिया जाना चाहिये।
इंजेक्शन लगाने से पहले उस जगह पर टटोल कर लिपोहाइपेट्रोफी और जख्म, खरोंच या फफोलों की जांच कर लेनी चाहिये।
फोरम फॉर इंजेक्शन तकनीक एंड थैरेपी एक्सपर्ट रिकंमडेशंस (एफआईटीटीईआर) इंडिया द्वारा बताये गये उपाय इस प्रकार हैं: डी-इंडिया के विषय में :बीडी दुनिया में सबसे बड़ी ग्लोबल मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपिनयों में से एक है और यह चिकित्सकीय खोजों, परीक्षण और देखभाल को बेहतर बनाकर स्वास्थ्य की दुनिया को उन्नत बना रही है। बीडी ग्राहकों को परिणाम को बेहतर बनाने, खर्च को कम करने, क्षमता को बढ़ाने, सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद की है और साथ ही हेल्थ केयर तक पहुंच को विस्तार देने में।




