Monday, April 27, 2026
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तिरुचिरापल्ली के जम्बूकेश्वर मंदिर में खुदाई, मिले कलश में भरे 505 सोने के सिक्के

तिरुचिरापल्ली : दक्षिण भारत के ज्यादातर मंदिर प्राचीन काल में बने हुए हैं। इनमें तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के तिरुवनैकवल स्थित जम्बूकेश्वर अखिलंदेश्वरी मंदिर भी है। इसका निर्माण चोल वंश के राजा कोचेन्गनन चोल ने करवाया था। इस शिव मंदिर में चल रही खुदाई के दौरान 504 छोटे सोने के सिक्कों और 1 बड़े सिक्के से भरा कलश निकला। मंदिर प्रशासन ने इन सिक्कों को पुलिस के हवाले कर दिया है।
पुलिस के अनुसार, कलश में मिले सोने के सिक्कों का वजन 1.716 किलो है। अनुमान है कि ये सिक्के करीब 10वीं-12वीं शताब्दी तक के हो सकते हैं। मंदिर के अधिकारियों के अनुसार सिक्कों पर अरबी लिपि के अक्षर हैं।
शिलालेख में मंदिर से जुड़े धन की जानकारी
मंदिर प्रशासन के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण करीब 1800 साल पहले चोल राजवंश के शासनकाल में हुआ था। मंदिर से जुड़े 156 शिलालेख मिले थे, जिनमें चोल राजवंश के शासक परांतक प्रथम के समय का शिलालेख सबसे पुराना है, जो कि नौवीं शताब्दी का है। इसमें ही मंदिर के जीर्णोद्धार और धन के बारे में जानकारी मिलती है। चोल राजाओं के बाद भी समय-समय पर इस मंदिर की देखरेख और पुननिर्माण का कार्य करवाया गया।
वर्तमान के तिरुवनैकवल में जहां मंदिर है, वहां प्राचीनकाल में जामुन के पेड़ों का जंगल था। मंदिर के पीछे एक चबूतरा बना है, जिस पर जामुन का प्राचीन पेड़ अभी भी है। मंदिर को प्राप्त शिलालेख के अनुसार, प्राचीनकाल में जामुन के पेड़ के नीचे ही भगवान शिव ने उनके दो भक्तों को दर्शन दिए थे। तब से वहां शिवलिंग स्थापित है। इसलिए, इस मंदिर का नाम जम्बूकेश्वर पड़ा। जम्बू का हिंदी अर्थ जामुन होता है।
शिव-पार्वती के मंदिरों के कारण कहा जाता है जम्बूकेश्वर अखिलंदेश्वरी मंदिर
तिरुवनैकवल में स्थित जम्बूकेश्वर अखिलंदेश्वरी मंदिर भगवान शिव-पार्वती का प्रमुख मंदिर है। इस शिवलिंग को पंचतत्व लिंगों में से एक जलतत्व लिंग के रूप में जाना जाता है। करीब सौ बीघा क्षेत्र में फैले इस मंदिर के तीन आंगन हैं। मंदिर प्रवेश करते ही जो आंगन है, वहां लगभग 400 स्तम्भ बने हैं। आंगन में दाहिनी ओर एक सरोवर है, जिसके मध्य में मंडप बना है।
श्री जम्बूकेश्वर मंदिर पांचवें घेरे में है। इस जगह श्री जंबूकेश्वर लिंग बहते हुए पानी के ऊपर स्थापित है और लिंगमूर्ति के नीचे से लगातार जल ऊपर आता रहता है। आदि शंकराचार्य ने यहां पर श्री जम्बूकेश्वर लिंग मूर्ति की पूजा अर्चना की थी। यहां शंकराचार्य की मूर्ति भी है। जम्बूकेश्वर मंदिर की तीसरी परिक्रमा में सुब्रह्मण्यम मंदिर है। यहां भगवान शिव का पंचमुखी लिंग भी स्थापित है।
जम्बूकेश्वर मंदिर के प्रांगण में देवी पार्वती का विशाल मंदिर है। यहां पर देवी की पूजा जगदम्बा रूप में की जाती है। इसलिए, इन्हें अखिलंदेश्वरी कहते हैं। इस मंदिर के पास ही गणेशजी का भी मंदिर है, जिसकी स्थापना आदिशंकराचार्य द्वारा की गई है। मंदिर प्रशासन द्वारा बताया जाता है कि पहले देवी की मूर्ति में बहुत तेज था, इस वजह से कोई दर्शन नहीं कर पाता था। लेकिन, आदिशंकराचार्य ने मूर्ति के कानों में हीरे से जड़े हुए श्रीयंत्र के कुंडल पहना दिए, जिससे देवी का तेज कम हुआ। इस मंदिर के आसपास मरिअम्मन और लक्ष्मी मंदिर के साथ अन्य मंदिर भी बने हुए हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

सीवी रमन से लेकर मिसाइल वीमेन टेसी थॉमस….लम्बा है विज्ञान की प्रगति का सफर

हर साल 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस  मनाया जाता है। साल 1928 में 28 फरवरी के ही दिन भौतिक वैज्ञानिक सीवी रमन ने ‘रमन इफेक्ट’ का आविष्कार किया गया था, जिसके बाद साल 1986 से हर साल इस दिन को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है औऱ इस बार भी मनाया गया। पारदर्शी वस्तुओं से गुजरने पर प्रकाश की किरणों में आने वाले बदलाव पर की इस महत्‍वपूर्ण खोज के लिए सीवी रमन को 1930 में फिजिक्स के नोबेल पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया गया था। खास बात यह है कि फिजिक्स में नोबेल पुरस्‍कार पाने वाले सीवी रमन भारत ही नहीं बल्कि एशिया के भी पहले वैज्ञानिक थे। कुछ वैज्ञानिकों से मिलिए –
विज्ञान के क्षेत्र में महिलाएँ
रितु करिधल- इसरो में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत रितु करिदल चंद्रयान -2 की मिशन निदेशक रही हैं। वह मार्स ऑर्बिटर मिशन की डिप्टी ऑपरेशन डायरेक्टर भी रही हैं। इन्होंने चंद्रयान-2 की शुरुआत करने वाली महिला के रूप में प्रसिद्धि पाई।
नंदिनी हरिनाथ- बेंगलुरु में इसरो सैटेलाइट सेंटर के रॉकेट वैज्ञानिक, नंदिनी 20 साल से यहां अपनी पहली नौकरी के रूप में काम कर कर रही है। इस दौरान वह 14 मिशनों पर काम कर चुकीं हैं। मंगलयान मिशन के लिए वह डिप्टी ऑपरेशन डायरेक्टर थी।
डॉ. गगनदीप कांग- रॉयल सोसायटी ऑफ लंदन और अमेरिकन एकेडमी ऑफ माइक्रोबॉयोलॉजी की फेलो बनने वाली पहली भारतीय महिला डॉ. कांग, ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट की कार्यकारी निदेशक हैं। देश में बच्चों के हिसाब से डायरिया रोकने के लिए रोटावायरस वैक्सीन विकसित करने का श्रेय डॉ. गगनदीप कांग को जाता है।
डॉ. टेसी थॉमस- डीआरडीओ में वैज्ञानिकी प्रणाली की महानिदेशक डॉ. टेसी थॉमस 1988 में रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला हैदराबाद से जुड़ीं। इन्होने लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के लिए गाइडेड योजना तैयार की, जिसका प्रयोग सभी अग्नि मिसाइलों में किया जाता है।
डॉ. चंद्रिमा शाह- भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की पहली महिला अध्यक्ष बनने वाली चंद्रिमा राष्ट्रीय इम्यूनोलोजी संस्थान, दिल्ली में प्रोफेसर ऑफ एमिनेंस हैं और वे इस संस्थान की निदेशक भी रह चुकी हैं। उन्होंने 1980 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल बायोलॉजी से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी।

क्या है रमन प्रभाव
रमन प्रभाव बताता है कि जब प्रकाश किसी पारदर्शी पदार्थ से गुजरता है तो उस दौरान प्रकाश की तरंगदैर्ध्‍य में बदलाव दिखता है। यानी जब प्रकाश की एक तरंग एक द्रव्य से निकलती है तो इस प्रकाश तरंग का कुछ भाग एक ऐसी दिशा में फैल जाता है जो कि आने वाली प्रकाश तरंग की दिशा से भिन्न है। प्रकाश के क्षेत्र में किए गए उनके काम का आज भी कई क्षेत्रों में प्रयोग हो रहा है। रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का इस्तेमाल दुनिया भर के केमिकल लैब में होता है, इसकी मदद से पदार्थ की पहचान की जाती है। औषधि क्षेत्र में कोशिका और उत्तकों पर शोध के लिए और कैंसर का पता लगाने तक के लिए इसका इस्तेमाल होता है। मिशन चंद्रयान के दौरान चांद पर पानी का पता लगाने के पीछे भी रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी का ही योगदान था।
एक यात्रा ने बदल दी थी जिंदगी
सी. वी. रमन ने ही पहली बार बताया था कि आसमान और पानी का रंग नीला क्यों होता है? दरअसल रमन एक बार साल 1921 में जहाज से ब्रिटेन जा रहे थे। जहाज की डेक से उन्होंने पानी के सुंदर नीले रंग को देखा।
उस समय से उनको समुद्र के पानी के नीले रंग पर रेलीग की व्याख्या पर शक होने लगा। जब वह सितंबर 1921 में वापस भारत आने लगे तो अपने साथ कुछ उपकरण लेकर आए।
सीवी रमन ने उपकरणों की मदद से आसमान और समुद्र का अध्ययन किया। वह इस नतीजे पर पहुंचे कि समुद्र भी सूर्य के प्रकाश को विभाजित करता है, जिससे समुद्र के पानी का रंग नीला दिखाई पड़ता है।
जब वह अपने लैब में वापस आए तो रमन और उनके छात्रों ने प्रकाश के बिखरने या प्रकाश के कई रंगों में बंटने की प्रकृति पर शोध किया।
उन्होंने ठोस, द्रव्य और गैस में प्रकाश के विभाजन पर शोध जारी रखा। फिर वह जिस नतीजे पर पहुंचे, वह ‘रमन प्रभाव’ कहलाया।
असिस्टेंट अकाउटेंट जनरल भी रहे सीवी रमन
सर सीवी रमन का जन्‍म ब्रिटिश काल के दौरान भारत में तत्‍कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी (तमिलनाडु) में सात नवंबर 1888 को हुआ था। उनके पिता गणित और भौतिकी के प्राध्यापक थे। उन्होंने मद्रास के प्रेसीडेन्सी कॉलेज से बीए किया और साल 1905 में वहां से गणित में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले वह इकलौते छात्र थे। इसके बाद उन्होंने इसी कॉलेज में एमए में एडमिशन लिया और मुख्य विषय के तौर पर फिजिक्स को चुना। हालांकि, विज्ञान के क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं होने के कारण सी.वी. रमन ने कोलकाता में 1907 में असिस्टेंट अकाउटेंट जनरल की नौकरी की। लेकिन विज्ञान के लिए उनका लगाव बना रहा और वह इंडियन एशोसिएशन फार कल्टीवेशन आफ साइंस और कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं में शोध करते रहे। साल 1928 में उन्होंने रमन प्रभाव का आविष्कार किया,जिसके के लिए 1930 में उन्हें नोबल पुरस्कार और 1954 में उनको सर्वोच्‍च सम्‍मान भारत रत्‍न से नवाजा गया था। सीवी रमन का 82 साल की आयु में 1970 में निधन हुआ था।

जीत का पर्व है फाल्गुन एकादशी, वहीं प्रेम और आनंद का त्योहार है होली

होली फाल्गुन महीने का आखिरी दिन होता है। फाल्गुन महीने का सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं है इसका मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। यह महीना हमें सीखाता है कि हमेशा सकारात्मक सोचें चाहे परिस्थितियां कैसी भी हो। इस मास के व्रत, त्योहारों में भी यही भाव छिपा है। इस महीने में आने वाले तीज-त्योहार सकारात्मक ऊर्जाओं और खुशियों से भरे होते हैं।
इस महीने से जुड़ी कुछ रोचक बातें
ऐसी मान्यता है कि इस माह की विजया एकादशी का महत्व भगवान राम से जुड़ा है। सीता हरण के बाद लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए जाते समय जब समुद्र बाधा बना। तब श्रीराम ने विजया एकादशी का व्रत कर सागर पार करने में सफलता पाई और युद्ध में विजयी हुए। इसलिए इस दिन भगवान वासुदेव की पूजा की जाती है।
इस माह की अंतिम तिथि को मनाए जाने वाला होली उत्सव का अत्यंत धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक महत्व है। यह आनंद, प्रेम, सद्भावना का पर्व है। यह भावनाओं के स्तर पर एक दूसरे के रंग में रंग जाने का अवसर है।
लिंगपुराण में होलीका उत्सव को फल्गुनिका के नाम से जाना जाता है। जिसे बालकों की क्रीड़ाओं से पूर्ण और सुख समृद्धि देने वाला बताया गया है।
इसी प्रकार वराहपुराण में भी इस उत्सव को पटवास विलासीनी अर्थात् चूर्णयुक्त खेल और लोक कल्याण करने वाली बताया गया है।
फाल्गुन माह और इसके पर्व, उत्सव का सामूहिक संदेश यही है कि जीवन में कर्मठता और सही दिशा को चुनें। हम आशा और आकांक्षा पैदा करें। हमारे अंदर आगे बढऩे और ऊपर उठने की जो भावना है, उसे मरने न दें क्योंकि जो कर्म करता है भगवान उसी का साथ देते हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

केरल / डिजिटल बुक और ई-लैंग्वेज लैब से अंग्रेजी  सीखेंगे विद्यार्थी

ऑडियो-वीडियो प्रारूप में होगी पाठ्यपुस्तक
बच्चों की इंग्लिश लर्निंग को और मजबूत करने के मकसद से केरल इंफ्रास्ट्रचर एंड टेक्नोलॉजी ऑफ एजुकेशन (केआईटीई) ने स्कूलों में हाई टेक लैब की शुरुआत की है। इंग्लिश सुधारने के लिए शुरू हुई इस मुहिम को ई3 (इंजॉय, एनहांस और एनरिच) नाम दिया गया है। इस बारे में बताते हुए राज्य के शिक्षा मंत्री सी.रवींद्रनाथ ने बताया कि इसके लिए सभी शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जायेगा।  इसके बाद इस सत्र ,से ही नयी प्रणाली को शुरू कर दिया जाएगा।
वहीं केआईटीई के सीईओ के अनवर सदत ने कहा कि इस परियोजना का मकसद विद्यार्थियों में अंग्रेजी भाषा की समझ को और विकसित करना हैं। इसके लिए केरल के स्कूलों में तकनीक का इस्तेमाल कर इसे मजेदार बनाने की कोशिश की जा रही है। इस प्रोजेक्ट के तहत बच्चों को समग्र ई-लाइब्रेरी और डिजिटल बुक जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी। यह बुक ऑडियो और वीडियो दोनों प्रारूप के उपलब्ध रहेगी। इसके अलावा समग्र ई-लाइब्रेरी में करीब 200 डिजिटल मल्टीकलर स्टोरी बुक भी अपलोड की जा चुकी हैं।
साथ ही इसमें एक ई-लैंग्वेज लैब भी होगा जिसमें मौजूद लैंग्वेज लैब सॉफ्टवेयर बच्चों को इंग्लिश की ग्रामर,वोकेबुलरी,राइटिंग,स्पीकिंग,लिसनिंग, रीडिंग आदि विकसित करने का मौका देगी। इस प्रोजेक्ट के तहत बच्चों के लिए मल्टीमीडिया प्रोग्राम भी उपलब्ध होगा, जिसमें ब्रॉडकास्ट लेसन के जरिए वह बातचीत और कोर्स में प्रयुक्त अंग्रेजी के बारे में इंटरेक्टिव मोड में सीख सकेंगे। केआईटीई और एससीईआरटी मिलकर स्कूलों में शुरू किए जाने वाले इस प्रोजेक्ट की निगरानी भी करेंगे।

अंग्रेजी बोलती बुजुर्ग महिला का वीडियो वायरल 

नयी दिल्ली :  सोशल मीडिया पर सफेद शर्ट और लाल साड़ी पहने एक बुजुर्ग महिला का अंग्रेजी में महात्मा गांधी के बारे में बोलते हुए वीडिया वायरल हो रहा है। उनका नाम भागवनी देवी है। वीडियो में वह कह रही हैं, ‘‘महात्मा गांधी दुनिया में महातम इंसान थे। वह बहुत साधारण आदमी थे…साधारण खाना खाते थे। बकरी का दूध पीते थे। वह हिंदू और मुसलमान दोनों से प्यार करते थे और राष्ट्र के पिता हैं। उनकी समाधि राजघाट में है।’ वायरल वीडियो को आईपीएस अधिकारी अरुण बोथरा ने रविवार को शेयर किया। उन्होंने लिखा, ‘देखना दिलचस्प होगा कि शशि थरूर इन्हें 10 में कितने अंक देते हैं।’ बता दें, कॉग्रेस नेता शशि थरूर अपनी अंग्रेजी के लिए भारत में खासे चर्चित हैं। एक यूजर ने लिखा- आखिर में शशि थरूर के लिए प्रतियोगिता और कठिन होने वाली है।
वीडियो को 2.8 लाख लोग देख चुके
यह क्लिप तेजी से वायरल हो रही है। लोगों इस वीडियो को खूब लाइक कर रहे है। अब तक 2.8 लाख लोग देख चुके हैं। वीडियो को 15 हजार से ज्यादा लाइक्स और 3 हजार से ज्यादा रि-ट्वीट्स बार रि-ट्वीट किया गया हैं।

नवरात्र से नयी जगह पर होंगे रामलला के दर्शन, तैयार होगा राम मंदिर का ब्लूप्रिंट

अयोध्या : वासंतिक नवरात्र से रामलला के दर्शन नए स्थान पर होंगे। रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के निर्माण एव प्रशासनिक इकाई समिति के चेयरमैन नृपेन्द्र मिश्र ने रामलला के स्थान परिवर्तन को हरी झंडी दे दी है। इस नए स्थान पर रामलला की सुरक्षा व्यवस्था का नया ढांचा तैयार किया जा रहा है। वहीं, श्री राम जन्मभूमि परिसर में राम मंदिर निर्माण के लिए रामनवमी से पहले ब्लू प्रिंट तैयार किया जाएगा। इसके लिए तकनीकी विशेषज्ञों ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से 25 मार्च तक का समय मांगा है। तकनीकी विशेषज्ञों की ओर से 70 एकड़ के राम जन्मभूमि परिसर के लिए मास्टर प्लान भी तैयार किया जाएगा।
नृपेन्द्र मिश्र गत शनिवार को तकनीकी विशेषज्ञों के साथ रामजन्मभूमि पहुंचे। सबसे पहले उन्होंने विराजमान रामलला को उनके गृर्भगृह में जाकर नमन किया। इसके उपरांत रामलला के स्थान परिवर्तन के लिए प्रस्तावित नवीन स्थल का न्यासियों व अधिकारियों के साथ निरीक्षण किया। उन्होंने हनुमानगढ़ी के भी दर्शन किए।
प्रस्तावित स्थल पर उनके निरीक्षण के पूर्व ही स्थान को पूरी तरह साफ कर समतल बना दिया गया था। चूनाकारी से रामलला के अस्थाई मंदिर के स्थान को रेखांकित किया गया। दर्शनार्थियों की लेन व सड़क को भी रेखांकित किया गया। श्री मिश्र व उनके साथ तकनीकी विशेषज्ञों के पहुंचने पर रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने उन्हें पूरी भूमिका समझाई। इसके बाद मानस भवन में हुई बैठक में अधिकारियों ने सुरक्षा व्यवस्था का खाका प्रस्तुत किया। इस खाके का अनुमोदन केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से किया जाना है। बैठक में प्रस्तावित स्थल पर रामलला के भोग-राग की व्यवस्था के लिए कोठार व भंडार को लेकर भी आवश्यक विमर्श किया गया।
रामजन्मभूमि के विस्तृत परिसर का भूभाग अलग-अलग टापुओं की तरह स्थित है। इसका एक सिरा त्रिदंडदेव संस्कृत महाविद्यालय पर है तो दूसरा गोकुल भवन। तीसरा क्षीरेश्वरनाथ महादेव मंदिर के आगे यूसुफ आरा मशीन है तो चौथा पुराना विश्वामित्र आश्रम। इन हिस्सों में निगरानी व सुरक्षा व्यवस्था की दृष्टि से बुलेटप्रूफ कार ले जाने के लिए पाथ-वे बनाया गया है। निर्माण कमेटी के चेयरमैन ने ट्रस्ट के महासचिव व तकनीकी विशेषज्ञों के साथ अधिकतम क्षेत्र का अवलोकन इसी पाथ-वे पर कार से चलकर किया। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने पूरी जमीन और उसकी चौहद्दी से पूरी टीम को अवगत कराया। निर्माण कमेटी के चेयरमैन व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी नृपेन्द्र मिश्र व राम मंदिर मॉडल के मुख्य वास्तुकार चंद्रकांत भाई सोमपुरा के बीच मुलाकात मार्च में होनी है। इसकी पुष्टि ट्रस्ट के महासचिव श्री राय ने की है। भेंट की तिथि होली के बाद तय होगी। इस भेंट के दौरान तकनीकी विशेषज्ञों की टीम भी मौजूद रहेगी और उसके बाद यह टीम मुख्य वास्तुकार श्री सोमपुरा के साथ रामजन्मभूमि परिसर का निरीक्षण करेगी।

द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता एथलेटिक्स कोच जोगिंदर सैनी का निधन

पटियाला : अनुभवी एथलेटिक्स कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता जोगिंदर सिंह सैनी का रविवार को बढ़ती उम्र से संबंधित परेशानियों के कारण निधन हो गया। वह 90 बरस के थे। सैनी को भारत के कुछ प्रतिष्ठित ट्रैक एवं फील्ड खिलाड़ियों को निखारने का श्रेय जाता है। सैनी पिछले कुछ दिनों से बीमार थे। वह 1970 से 1990 के दशक के बीच कई वर्षों तक राष्ट्रीय एथलेटिक्स टीम के मुख्य कोच रहें।
एएफआई अध्यक्ष आदिले सुमारिवाला ने कहा, ”मुझे अपने साथी, अपने मुख्य कोच और मेंटर जेएस सैनी के निधन की खबर सुनकर बेहद दुख हुआ।” उन्होंने अपने संदेश में कहा, ”उन्हें एथलेटिक्स से प्यार था और अपने अंतिम दिन तक उन्होंने भारतीय एथलेटिक्स महासंघ को योगदान दिया। वह मेरे मित्र और मार्गदर्शक थे और अपनी सलाह से एएफआई अध्यक्ष की मेरी भूमिका में उन्होंने काफी मदद की।”जोगिंदर सैनी ने अपने युवा दिनों में बाधा दौड़ में हिस्सा लिया और एनआईएस तथा राष्ट्रीय शिविर में भारत के कुछ शीर्ष खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दी। सैनी ने 1962 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले गुरबचन सिंह रंधावा को डेकाथलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने इसके अलावा दिग्गज मैराथन धावक शिवनाथ सिंह को भी ट्रेनिंग दी।

गोला के यतीश ने तोड़ा एक और विश्व रिकॉर्ड, 28 घंटे पढ़ी श्रीमद्भागवत पुराण

लखीमपुर-खीरी : पुराने विश्व रिकॉर्ड विजेता यतीश शुक्ला ने एक और विश्व कीर्तिमान बनाया है। उन्होंने बिना एक मिनट भी थमे लगातार 28 घंटे पांच मिनट तक लगातार पुराण पढ़कर कानपुर के अलाउद्दीन का रिकॉर्ड तोड़ दिया। गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के इंडिया हेड आलोक कुमार ने उनको इस रिकॉर्ड का प्रमाणपत्र प्रदान किया। जुनूनी और धुन के पक्के यतीश शुक्ला के नाम कई विश्व रिकॉर्ड हैं। कानपुर में उन्होंने लगातार पढ़ाने का, गोला में किताबें बांचने का और लखीमपुर में भाषण देने का विश्व रिकॉर्ड बनाया था। इस बार उन्होंने नए रिकॉर्ड की धुन शुरू कर दी। इस बार का टारगेट बड़ा था।
इससे पहले यतीश ने जो भी विश्व रिकॉर्ड बनाए थे, उनमें हर घंटे में पांच मिनट का ब्रेक मिलता था। पर इस बार कहानी दूसरी थी। इस बार ब्रेक नहीं लेना था। यानी जिस समय से रिकॉर्ड की शुरुआत करती है और टाइम मशीन ऑन होनी है, एक मिनट भी उठना नहीं है। यह आसान नहीं था। यतीश ने शनिवार सुबह सात बजे से रिकॉर्ड की तैयारी की। यह संकल्प लिया कि वह बिना ब्रेक लिए पढ़ने का विश्व रिकॉर्ड बना लेंगे। यतीश ने श्रीमद्भागवत पुराण पढ़नी शुरू की। हिन्दी और संस्कृत में वह इसे बांच रहे थे। इस दौरान उन्होंने बिना रुके-थमे क्रम जारी रखा। कार्यक्रम के जज उन पर नजर बनाए हुए थे। रविवार सुबह एक बजे उन्होंने 28 घंटे पांच मिनट तक पुराण पढ़कर यतीश ने विश्व कीर्तिमान बना लिया।
कानपुर के नाम था रिकॉर्ड – यह विश्व रिकॉर्ड कानपुर के अलाउद्दीन के नाम था। अलाउद्दीन ने लगातार 27 घंटे तक पढ़कर यह विश्व रिकार्ड अगस्त 2019 में बनाया था। अलाउद्दीन ने इस रिकार्ड की जानकारी फेसबुक पर डालकर एक चैलेंज भी दिया था कि बिना ब्रेक के पढ़ना आसान नहीं है। उस रिकार्ड को यतीश ने तोड़ दिया।
यतीश के नाम दर्ज रिकार्ड

पहला रिकार्ड गोरखपुर में 148 घंटे पढ़ाने का बनाया था।
124 घंटे किताब पढ़ने का विश्व रिकॉर्ड उनके नाम है।
जुलाई 2019 में 106 घंटे तक भाषण देने का रिकॉर्ड कायम किया था।

25 साल बाद महिलाओं के लिए खुला पेशावर की सुनहरी मस्जिद का दरवाजा

अदा कर सकेंगी जुमे की नमाज
पेशावर : पेशावर के सुनहरी मस्जिद में महिलाएं 25 साल के अंतराल के बाद समूह में जुमे की नमाज अदा कर सकेंगी, क्योंकि खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सफल सैन्य अभियानों की शुरुआत के बाद से कानून-व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। एक मीडिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।
‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ ने शनिवार (29 फरवरी) को रिपोर्ट में कहा कि 1990 के दशक के मध्य तक, महिलाएं पेशावर कैंटोन्मेंट में स्थित सुनहरी मस्जिद में समूह में जुमे की नमाज अदा करती थीं, लेकिन प्रांतीय राजधानी के आतंकवाद से बुरी तरह प्रभावित होने के बाद ऐसा होना बंद हो गया था।
मस्जिद के पास दर्जनों आतंकवादी हमले हुए, जिसके कारण लगभग 25 साल पहले महिलाओं के लिए मस्जिद के दरवाजे बंद कर दिए गए। साल 2016 में, सदर के भीड़ भरे बाजार में मस्जिद के पीछे ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों को ले जा रही बस के शक्तिशाली बम की चपेट में आ जाने से 16 लोग मारे गए थे और दर्जनों घायल हो गए थे। अब, सुरक्षा स्थिति में पर्याप्त सुधार के साथ, अधिकारियों ने महिलाओं के लिए मस्जिद में नमाज अदा करने को फिर से शुरू करने का फैसला किया है और समूह में महिलाओं के नमाज करने को लेकर व्यवस्था को अंतिम रूप दिया गया है। अधिकारियों ने मस्जिद के बाहर एक बैनर भी लगा रखा है, जिसमें संदेश दिया गया है कि ‘सुनहरी मस्जिद में जुमे की नमाज अदा करने के लिए अब महिलाओं का स्वागत है।’

नहीं रहे मशहूर शायर कमर पीलीभीती

मशहूर शायर कमर पीलीभीती नहीं रहे। गत रविवार को देर रात में उन्होंने अपने आवास पर आखिरी सांस ली। वह 80 वर्ष के थे। शहर के मोहल्ला सरायखाम निवासी कमरुज्जमा खां कमर पीलीभीती पिछले कुछ समय से बीमार थे। वह अपने पीछे एक बेटा और तीन बेटियां छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी वर्षों पहले दुनिया से चल बसी थी, बच्चों की परवरिश उन्होंने अकेले ही की।
शायरी की दुनिया के वह एक सशक्त हस्ताक्षर थे। जब वह माइक पर शायरी करते थे तो उनकी आवाज का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोलता था। उनके इस शेर को अक्सर उनके चाहने वाले गुनगुनाते मिलते हैं। ठोकरें खाता हूं, मैं गिर के संभल जाता हूं। यह मेरी मां की दुआओं का असर लगता है। उन्हें सोमवार को इशां की नमाज के बाद सुपुर्दे खाक किया गया।