Wednesday, June 24, 2026
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समकालीन अंतर्विरोधों से मुठभेड़ करती कवितायेँ

श्रवण कुमार

प्रत्यंचा युवा कवयित्री पंखुरी सिन्हा का हिंदी में तीसरा कविता संग्रह है। इसमें १४६ कवितायेँ हैं. आकार की दृष्टि से कुछ कवितायेँ छोटी हैं, लेकिन भाव और उद्देश्य दोनों बड़े हैं. इस संग्रह की रचनाएं वर्तमान को जस का तस स्वीकार नहीं करना चाहती हैं बल्कि समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विसंगतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों के विरुद्ध सवाल दर सवाल खड़े करती हैं। भ्रूण हत्या शीर्षक कविता में वे कहती हैं–“औरत की देह को बनाने का नरक/हर ओर है नज़ारा/तुम जाओ न जाओ/डिस्पेंसरी आज/ लेकिन, मेरे दोस्त/तुम जगह के साथ साथ/अपनी देह को भी बना रहे हो नरक/रौंद कर सारी हरीतिमा……………..”
हर तरह के पुरुष वादी मापदंडों के खिलाफ प्रत्यंचा चढ़ाये युद्धरत कवयित्री सवाल करती हैं–“क्यों आकर ठहर जाती है/औरत की देह पर ही/जातिवाद, भाषावाद/क्षेत्रवाद और प्रांतीयता/की सब लड़ाइयां?”
युवा कवयित्री अपनी रचना के माध्यम से दलित उत्पीड़न के खिलाफ भी मज़बूती से आवाज़ उठाती हैं. यह आवाज़ प्रतिरोध की सीमा तक पहुँच जाती है. बतौर कवयित्री–“ये दलितों की बस्ती जलाना/ये उनकी औरतों का अपमान/कैसे है जायज़/इतने थानों के रहते हुए ज़िंदा?/और कहीं नहीं मिली है/उन पुरुषों को सजा देने की खबर/जिन्होंने तस्वीरें खींची/उतार कर औरतों के कपड़े/ये एक बड़ा जुर्म बनता जा रहा है/आये दिन बलात्कार की घटना के साथ/यह कैसा समाज है/जिसके लोग कुत्ते बनने पर उतारू हैं?”
आज की बाज़ारवादी एवं उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में सभी वस्तुएं बिकाऊ हो गयी हैं. समाज में एवं मीडिया की सुर्खिओं में वे ही लोग दिख रहे हैं जो या तो विक्रेता हैं या क्रेता। रिश्तों से लेकर वस्तुओं तक का पुराना ढांचा ध्वस्त हो रहा है. देश साम्राज्यवादी एवं हथियारों के व्यापारी युद्ध लोलुप अमेरिका और उनके सहयोगियों के पीछे भाग रहा है. और हम बाज़ार के पीछे। हम सब कुछ बेचने पर उतारू है–जल, ज़मीन, जंगल, अपना ज़मीर और अपनी कविता भी. ज़्यादातर रचनाकार पद, पुरस्कार और पैसे के पीछे भाग रहे हैं. बतौर कवयित्री—“बाज़ारू कर भाषा को/कविता को भी/कुछ लोग वाक़ई बाज़ार बन जाते हैं/और लगाते हैं कविता का हाट बाज़ार।”

सचमुच रचनाकारों के भी दो वर्ग होते हैं या हमेशा से होते आये हैं—जनता के रचनाकार एवं सत्ताधारी वर्ग के चारण रचनाकार। इस दृष्टि से यह संग्रह समकालीन अंतर्विरोधों से मुठभेड़ करता दिखाई पड़ता है.
सुन्दर मुख्यपृष्ठ और आकर्षक आवरण में बंधी ये कवितायेँ, अधिकांशतः अपने तेवर में राजनैतिक हैं, अपने पर्यावरण सम्बन्धी सरोकारों में विशेषकर, एवं लचर होती व्यवस्था के भ्रष्टाचार की धज्जियाँ उड़ाती हैं.
हमारा समाज एक पुरुष प्रधान मनुवादी समाज है. प्रभु वर्ग ने हमारे चारो तरफ अपने रक्षार्थ बहुत सारा मायाजाल फैला रखा है. और हम हैं कि उसी कुएं में उलझे पड़े हैं. न निकलने का नाम लेते हैं और न कोशिश करते हैं. ये मायाजाल मोहजाल हमारी सभ्यता के विकास के सबसे बड़े रोडे हैं—“ हम कभी तो निकलेंगे/धर्म के जंजाल से/जातियों के मोहजाल से/कर्मकांडों के मायाजाल से/कि प्रगति सचमुच हमारी राह देखती है.”
इस संग्रह की एक कविता है ‘भड़कती अस्मिता’, जिसमें सामप्रदायिक उन्मादों के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करती है कवयित्री–“लेकिन किस मुंह से गौरक्षक पीट रहे हैं/गो मांस ले जाती गाड़ियों के चालकों को/जबकि उन्हीं की पार्टी के महानुभाव नेता/बीफ एक्सपोर्ट का कर रहे हैं/करोड़ों का बिज़नेस/आखिर ये क्या अर्थ तंत्र है/जिसमें दाल मंगा रहे हैं/अफ्रीका से/और अरब देशों को बेच रहे हैं जो मांस!”
वैसे तो १४६ कविताओं के इस संग्रह में सभी कवितायेँ पठनीय एवं उद्देश्य पूर्ण हैं लेकिन एक कविता ऐसी भी है जिसमें कवयित्री अपने पंखुरी नाम को विषय बनाकर बड़ी खूबसूरती से कुछ अनमोल बातें कहना चाहती हैं—“खुशबुओं का आलय मैं/दीप मुझमें जलते हैं/दिखा सकती हूँ तुम्हें राह/जब होती हूँ सफ़ेद भी/अँधेरे में चमक हूँ/रौशनी में ठंढक/”. इसी क्रम में वे आगे कहती हैं—“चिड़ियों का जीवन हूँ मैं/पराग मुझमें बसते हैं/मैं पंखुरी हूँ, मुझमें सृष्टि के अष्टयाम बजते हैं /मैं अधूरी नहीं/फूल मुझमें बनते हैं.”
इसके अलावे, झपसी महतो की चाय दुकान में बारिश का दिन, नॉन-ब्रांडेड शहद और नया जी एस टी कानून, बारिश के दिन की गोधूलि और ड्रैगन नृत्य, सब खाली है, मन वीराना, ठीक चुनाव के दिन, ज़िन्दगी का रंग, आलिशान मज़ार, कविता का हो जाना, प्रेम का ध्वंस राग, देह से उगेंगे वृक्ष, कौन सा राम राज्य, घास के घूस खोर, जंजीरों में जकड़े लोग, एक वैलेंटाइन डे सीरिया युद्ध बीच, रॉंग नंबर, प्रेम और समाप्ति आदि कवितायेँ हम जैसे पाठकों को अत्याधिक प्रभावित करती हैं।

यदि चिड़ियां होते हम !

साधना झा

कितना अच्छा होता
यदि चिड़ियां होते हम !
साथ चुगते दाना हरदम
हंसते हंसते हम !
चिहुंक चिहुंक कर बातें करते
उड़ते दूर तलक नील गगन में !
न तुम व्यस्त होते काम में
न होती व्यस्त मैं आपाधापी में !
कितना अच्छा होता
यदि चिड़ियां होते हम !
हम दोनों के दरम्यान न होते ये
टी.वी. कम्प्यूटर और मोबाईल !
न तुम देखते मूवी लैपटॉप पर
न करती मैं चैटिंग व्हाट्सएप पर !
कितना अच्छा होता
यदि चिड़ियां होते हम !
साथ चुनते तिनका और बनाते घोंसला साथ
वांचते अकथ कथा प्रेम की हम साथ साथ!

22/06/18

कोरोना की लड़ाई में कोलकाता के आवासीय कॉम्प्लेक्स की पहल

कोलकाता : कोरोना से लड़ने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन है। स्थित को देखते हुए कई गाँवों में एकान्त यानी क्वारिनटाइन की पहल की गयी है। अब कोलकाता के राजारहाट के अनिमिका अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन ने भी इस दिशा में जरूरी कदम उठाया है। इस आवासीय परिसर में लोगों को उनके फ्लैट में रहने का आग्रह किया गया है। सेवा प्रदाता से लेकर किसी भी प्रकार की परिसेवा या ओला व उबेर तक को भी इस आवासीय परिसर में आने से रोक दिया गया है। इस दायरे में अतिथि भी आते हैं। आपात परिस्थिति में सम्बन्धित कार्यालय से सम्पर्क किया जा सकता है। किसी भी प्रकार की होम डिलिवरी या कुरियर दरवाजे पर जाकर लेनी होगी। एनकेडीए के निर्देशानुसार सभी सदस्यों को अपनी आवाजाही की पूरी जानकारी देनी होगी औऱ यह भी बताना होगा कि वे कहाँ से होकर आ रहे हैं। विदेश से आने वाले सदस्य को उनके फ्लैट में कम से कम 2 सप्ताह रहना होगा। यह जानकारी अनिमिका अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन के सचिव श्यामल कुमार सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति से मिली।

अखबार छूने से नहीं फैलता कोरोना वायरस

कोरोना वायरस (कोविड-19) संकट में अखबार अपने पाठकों के लिए प्रतिबद्ध हैं। अखबारों के जरिए कोरोना वायरस (कोविड-19) नहीं फैलता। WHO गाइडलाइंस के मुताबिक, अखबार जैसी चीजें लेना सुरक्षित है। मॉर्डन प्रिंटिंग तकनीक पूरी तरह ऑटोमेटेड है। व्यावसायिक सामान के दूषित होने की संभावना कम है। इसमें हाथों का इस्तेमाल नहीं होता। अखबार बांटने वाली हॉकर सप्लाई चेन पूरी तरह सैनिटाइज्ड होती है।

वीडियो साभार – टाइम्स ऑफ इंडिया

कोरोना जंग : बुजुर्गों के लिए सीनियेरिटी एंड डॉक्स ऐप ने जारी किया हेल्प लाइन नम्बर

                                                                                                  यह 24*7 काम करेगा

कोलकाता : कोरोना महामारी की आपदा के बीच उससे लड़ने की कोशिशें भी जारी हैं। इसे लेकर होने वाली अफवाहों से लड़ने के लिए सीनियेरिटी और डॉक्स ऐप ने हाथ मिलाया है। इस साझेदारी के जरिए कोरोना को लेकर जागरुकता फैलाई जाएगी और सही तथ्य मुहैया करवाये जायेंगे। इसके अतिरिक्त सीनियेरिटी अपने सदस्यों को डॉक्स ऐप्स के जरिए चिकित्सकीय सुविधा भी दे सकेगा। आपात स्थिति में कुशल मेडिकल पेशेवरों तक पहुँचने एक हेल्पलाइन नम्बर (080 4719 3443) भी जारी किया गया है। लोग ऑनलाइन परामर्श भी किसी भी विभाग के डॉक्टर से अपनी सुविधा के अनुसार प्राप्त कर सकेंगे। सीनिएरिटी के सह संस्थापक आयुष अग्रवाल और तपन मिश्रा ने उम्मीद जाहिर की कि इस साझेदारी से एक बड़े तबके तक पहुँचा जा सकेगा।

5 दिनों में डॉक्टरों के लिए बनाया ‘इंफेक्शन फ्री नल’!

फ़िलहाल, खुद को कोरोना वायरस से बचाने के लिए और यह ज्यादा ना फैले, इसके लिए हम जो उपाय कर सकते हैं वो है – अपने हाथों को अच्छी तरह से धोते रहना। डॉक्टरों का कहना है कि लोगों को अपने हाथ 20 सेकंड्स तक धोना चाहिए। लेकिन इस प्रक्रिया में भी कई समस्याएं हैं जैसे पानी बर्बाद होना और हाथ धोने के बाद फिर से उसी नल को बंद करना, जिसे आपने गंदे हाथों से छुआ था। इस तरह से डॉक्टरों, नर्स, साफ़-सफाई वाले और एम्बुलेंस ड्राईवरों के लिए Covid-19 के मरीज़ों को संभालना मुश्किल है। इस स्थिति को देखते हुए, लेह में दोमखार गाँव के एक इनोवेटर, तमचोस ग्युरमेत ने एक ‘इंफेक्शन फ्री नल’ बनाया है। इससे लोगों को नल खोलने या फिर बंद करने के लिए अपने हाथों का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। उन्हें बस अपने हाथ धोने हैं बाकी किसी जगह को छूने की ज़रूरत उन्हें नहीं है।तमचोस ने द बेटर इंडिया को बताया कि यह मशीन स्टील की बनी है और इसमें उन्होंने नीचे की तरफ दो बटन लगाए हैं, जिन्हें आप पैरों से दबा सकते हैं। जब आप दाएं तरफ के बटन को दबाते हैं तो आपके हाथ में लिक्विड सोप आएगा और बाएं तरफ के बटन को दबाने पर नल से पानी आता है। “डॉक्टरों ने कहा है कि आपको अपने हाथ 20 सेकंड्स तक धोने हैं। इतने समय में काफी पानी बर्बाद हो सकता है। इसलिए इस सिस्टम को मैंने इस तरह से बनाया है कि पानी का बहाव बहुत ज्यादा न हो और आपके हाथ भी धुल जाएं। पानी तभी आएगा जब आप नीचे के बटन को अच्छे से दबाएंगे। जैसे ही आप इस बटन को छोड़ेंगे, पानी आना बंद हो जाएगा,” उन्होंने आगे कहा।

हाथ धोते समय लोगों को लगता है कि अब साबुन वाले हाथों से कैसे नल बंद करें और इस वजह से पानी बहता ही रहता है। तमचोस का कहना है कि उनका सिस्टम लगभग 80% पानी बचाता है, जो हाथ धोते समय 20 सेकंड्स में बर्बाद हो जाता है। इस डिवाइस को खुद ऑपरेट करना पड़ता है और पानी के लिए इसके अंदर एक इंसुलेटेड टैंक रखा गया है।“इसमें लगा टैंक इंसुलेटेड ठंडे इलाकों के लिए सही है। हमारे यहाँ लोग हर सुबह पानी ठंडा होने की वजह से बहुत जल्दी-जल्दी हाथ धोते हैं। लेकिन, इस मशीन में एक इंसुलेटेड टैंक है जिसमें हम गर्म पानी भी डाल सकते हैं ताकि लोग अपने हाथ अच्छी तरह से धोएं,” उन्होंने बताया। लोग इस डिवाइस का कनेक्शन अपने घर के किसी भी नल से कर सकते हैं या फिर ज़रूरत के हिसाब से इस टैंक को भर सकते हैं। टैंक की क्षमता 20 लीटर पानी की है।

तमचोस आगे कहते हैं कि इस डिवाइस को बनाने के लिए सभी मटेरियल एक लोकल हार्डवेयर की दुकान, मैकेनिकल स्पेयर पार्ट्स की दुकान और स्क्रैपयार्ड से लिया गया है। पैर से दबाने के लिए जो बटन बनाए गए हैं उनमें टाटा ट्रक के पार्ट्स इस्तेमाल हुए हैं। इस टाटा ट्रक गाड़ी को बचपन में वे ‘पागल गाड़ी’ कहते थे। डिवाइस की बॉडी बनाने के लिए वह एक स्टील फैब्रिकेशन दुकान में गये और इसमें उन्हें कई दिन लगे। उन्होंने 5 दिनों में इस डिवाइस को बनाकर तैयार किया है और इसके लिए हर दिन वह सुबह साढ़े सात बजे से रात के साढ़े सात बजे तक काम करते थे।फिलहाल, यह मशीन लेह के सोनम नोरबू मेमोरियल अस्पताल के स्टाफ के लिए रखी गई है। पिछले कई दिनों से उन्हें कई नागरिकों, होटलों, एयरपोर्ट अथॉरिटी, डिफेंस संगठनों, और कारगिल के सरकारी अस्पताल से (जहाँ मरीज़ों को आइसोलेशन में रखा गया है)  इस मशीन के लिए ऑर्डर मिले हैं।

इस मशीन का वजन 70 किलोग्राम है लेकिन भविष्य में वह जो भी मशीन बनाएंगे, उनका वजन इससे कम होगा।

वह बताते हैं कि उनके पास इतना समय नहीं था कि वह इस डिवाइस को और भी एडवांस्ड तरीके से बना पाएं, क्योंकि वह जल्द से जल्द मेडिकल स्टाफ को यह देना चाहते थे। नहीं तो, वह इस डिवाइस में सीधा नल से कनेक्शन और तापमान नियंत्रित करने का सिस्टम लगाते। “निजी तौर पर मुझे इस डिवाइस को बनाने की प्रेरणा इस बात से मिली कि हम वायरस से लड़ रहे हैं और इसे हम देख भी नहीं सकते। इस महामारी के आते ही लेह में सबकुछ लॉकडाउन हो गया था और मैं एक एडवांस्ड लेवल के डिवाइस के लिए सभी मटेरियल इकट्ठा नहीं कर पाया,” उन्होंने कहा।

अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टरों और उनके सहायकों की चिंता ने तमचोस को बहुत प्रभावित किया और वह उनके लिए कुछ करना चाहते थे। जब वह इस इनोवेशन पर काम कर रहे थे तभी उन्हें खबर मिली कि एक डॉक्टर भी संक्रमित हो गये हैं। वह कहते हैं कि उनका यह इनोवेशन कोई बड़ी बात नहीं है।

“मैं कहता हूँ कि यह कोई असाधारण बात नहीं है। मैंने सिर्फ जान बचाने की कोशिश की है। मैं सिर्फ एक इंसान हूँ और अकेले ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। लेकिन अगर हम सभी साथ आ जाएं तो बहुत कुछ कर सकते हैं। लोग मास्क, सैनिटाइज़र और वेंटिलेटर जैसे अन्य महत्वपूर्ण उपकरण बाँट रहे हैं। आप देख सकते हैं कि ये लोग कितना बड़ा बदलाव ला रहे हैं। इसलिए, हम सभी को एक साथ आना होगा। यहां तक ​​कि एक मास्क भी एक जीवन बचा सकता है। इसी तरह, मेरा डिवाइस कुछ हद तक उनकी मदद कर सकता है जो सबसे आगे खड़े होकर काम कर रहे हैं,” उन्होंने अंत में कहा।

मूल लेख: रिनचेन नोरबू वांगचुक

(साभार – द बेटर इंडिया)

कोरोना वायरस पर मेरठ की चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी कराएगी डिप्लोमा कोर्स

एक तरफ देशभर में कोरोना को लेकर दहशत का माहौल है, तो वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के मेरठ की एक यूनिवर्सिटी सार्स-कोव 2 पर एक डिप्लोमा कोर्स शुरू करने क योजना बना रही हैं। मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी अपने डिजास्टर मैनेजमेंट प्रोग्राम के तहत सार्स-कोव 2 पर एक साल का डिप्लोमा कोर्स शुरू कर सकती है। इस बारे में यूनिवर्सिटी के वीसी एन के तनेजा ने जानकारी दी।
इसके अलावा यूनिवर्सिटी पहले से ही चल रहे तीन साइंस कोर्सेस में भी कोरोना वायरस की पढ़ाई को शामिल कर सकती है। वीसी के मुताबिक मौजूदा हालात में यह स्टडी काफी उपयोगी साबित होगी। यह कोर्स अगले दो महीने के अंदर शुरू किया जा सकता है, जिसके लिए इजाजत भी मिल चुकी है। इसके बाद अब इस कोर्स को आगे मंजूरी दिलाने के लिए यूनिवर्सिटी एकेडेमिक काउंसिल के सामने रखा जाएगा। इसे दो सेमेस्टर में बांटा जाएगा। पहले सेमेस्टर को बाढ़, भूस्सखलन आदि के साथ पढ़ाया जाएगा,जबकि दूसरे सेमेस्टर में इसे जूलॉजी और बायोलॉजी के डिपार्टमेंट में शामिल किया जाएगा। फिलहाल कोर्स की कोई फीस तय नहीं की गई है।
संक्रमण की बात करें तो देश में अब तक 19 राज्य को 177 लोग इसकी चपेट में आ चुके है। वहीं, एहतियातन कई राज्यों के सभी स्कूल-कॉलेज भी बंद किए जा चुके है। इससे पहले बुधवार को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सभी परीक्षा रद्द करने के आदेश के बाद सीबीएसई, आईसीएसई और एनटीए ने 31 मार्च तक अपनी सभी परीक्षा रद्द कर दी है। उत्तर प्रदेश में भी सभी प्रतियोगी परीक्षा 02 अप्रैल तक रद्द कर दी है। देश में कोरोना वायरस के लगातार बढ़ रहे मामलों के देखते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने कोरोना वायरस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए सभी शिक्षा नियामकों और सीबीएसई को सभी परीक्षाओं को रद्द करने और पेपर के मूल्यांकन को रोकने का निर्देश जारी किया था।

सेना के जवानों ने बनाई हैंड्स फ्री सैनिटाइजिंग मशीन

नयी दिल्ली : कोरोनावायरस से लड़ाई में देश लॉकडाउन है। लोगों से दूरिया बनाने रखने और खुद को सैनिटाइज किए जाने के संदेश सोशल मीडिया में भरे पड़े हैं। हाथ धोने के कई तरीके बताए जा रहे हैं। ऐसे में भारतीय सेना का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें एक मशीन का जिक्र है। यह बिना हाथ से छुए पानी और सैनिटाइजर उपलब्ध कराती है। इसे पैरों से ऑपरेट किया जाता है। इसकी मदद से व्यक्ति अपने हाथों को धो सकता है। इसके लिए नल और सैनिटाइजर की बॉटल को हाथ से नहीं छूना पड़ता।
यह वीडियो सांसद गौरम गंभीर ने शेयर किया है। उन्होंने लिखा- ‘‘इनोवेशन भारतीय सेना का नाम है। सुपरकूल हैंड सैनिटाइजिंग मशीन। शानदार काम।’’ इस वीडियो को साढ़े 6 हजार से ज्यादा लाइक्स और 31 हजार के करीब व्यूज मिल चुके हैं। इसे 1 हजार बार से अधिक रिट्वीट भी किया गया। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है।
दावा है, मशीन पब्लिक प्लेस में लगाई जा सकती है
वीडियो में एक जवान मशीन के बारे में जानकारी देता है। जबकि पास खड़ा दूसरा जवान इसके इस्तेमाल करना सिखाता है। वीडियो के मुताबिक, इसे सेना के हेडक्वार्टर एसएमटी वर्कशॉप में तैयार किया गया है। इसे हैंड्स फ्री मैकेनिज्म कहा गया है। इसे कोरोनावायरस से लड़ाई में सहायक होने का दावा किया जा रहा है जो कि पब्लिक प्लेस पर इस्तेमाल के लिए लगाई जा सकती है।

टोक्यो ओलिंपिक 1 साल टला; 124 साल के इतिहास में यह गेम्स 3 बार रद्द हुए और पहली बार टले

कोरोनावायरस के कारण टोक्यो ओलिंपिक को 1 साल के लिए टाल दिया गया। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक संघ के अध्यक्ष थॉमस बाक के साथ मंगलवार को हुई बातचीत के बाद यह जानकारी दी। अब यह खेल 2021 की गर्मियों में होंगे। तारीख बाद में तय की जाएंगी। यह पहला मौका नहीं है, जब टोक्यो में होने वाले ओलिंपिक को टाला गया। 1940 में इस शहर को पहली बार इन खेलों की मेजबानी मिली थी। लेकिन, चीन से युद्ध की वजह से यह गेम्स रद्द हो गए। ओलिंपिक के 124 साल के इतिहास में ओलिंपिक 3 बार रद्द हुए हैं और पहली बार टले हैं। पहले विश्व युद्ध के चलते बर्लिन (1916), टोक्यो (1940) और लंदन (1944) गेम्स को रद्द करना पड़ा था। टोक्यो ओलिंपिक 24 जुलाई से 9 अगस्त के बीच होने थे।

तीन बार विश्व युद्ध के कारण ओलिंपिक रद्द हुए

बर्लिन ओलिंपिक : 1916 के ओलिंपिक बर्लिन में होने थे। 27 और 28 जून 1914 को बर्लिन स्टेडियम में टेस्ट इवेंट भी हो गए थे लेकिन ऑस्ट्रेलिया के आर्कड्यूक फ्रेंक फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की साराजेवो में हत्या कर दी गई थी। इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया और इन खेलों को रद्द कर दिया गया।
टोक्यो ओलिंपिक : 2020 से 80 साल पहले भी टोक्यो को इन खेलों की मेजबानी मिली थी। उसने बार्सिलोना, रोम और हेलसिंकी को पीछे छोड़ते हुए पहली बार यह मौका हासिल किया था। लेकिन चीन के साथ युद्ध के कारण उसे मेजबानी से पीछे हटना पड़ा। इसके बाद हेलसिंकी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। हालांकि 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने के कारण गेम्स रद्द करने पड़े।
लंदन ओलिंपिक : 1940 का टोक्यो ओलिंपिक रद्द होने के बाद आईओसी की बैठक में 1944 के ओलिंपिक की मेजबानी लंदन को सौंपी गई। अगर सब ठीक रहता है तो लंदन 36 साल बाद दूसरी बार इन खेलों को आयोजित करता। लेकिन मेजबानी मिलने के 3 महीने बाद ही ब्रिटेन ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। इस वजह से खेल हुए ही नहीं। इसके बाद इटली में यह गेम्स होने थे। लेकिन इन्हें भी बाद में रद्द कर दिया गया।
जापान और आईओसी तय शेड्यूल के मुताबिक गेम्स कराने पर अड़े थे

आबे और आईओसी पिछले कुछ महीने से लगातार कह रहे थे कि गेम्स तय शेड्यूल के मुताबिक 24 जुलाई से शुरू होंगे। लेकिन कोविड-19 के बढ़ते खतरे के साथ आईओसी पर इन खेलों को स्थगित करने का दबाव बढ़ने लगा था। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया पहले ही ओलिंपिक में हिस्सेदारी से इनकार कर चुके थे।
कनाडा ने 1 साल खेल टालने की माँग की थी
कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने इन खेलों से हटते हुए कहा था कि अगर टोक्यो ओलिंपिक शेड्यूल के मुताबिक 24 जुलाई से 9 अगस्त के बीच होते हैं तो वे अपने खिलाड़ी जापान नहीं भेजेंगे। कनाडा ने कहा था- हम ओलंपिक खेलों को एक साल के लिए टालने की मांग करते हैं। अगर ओलंपिक को स्थगित किया जाता है तो हम उनका पूरा समर्थन करेंगे। हमारे लिए एथलीट्स के स्वास्थ्य और सुरक्षा के अलावा कुछ महत्वपूर्ण नहीं है।
अमेरिका के 70 फीसदी खिलाड़ी ओलिंपिक को टालने के पक्ष में थे
अमेरिका के 70 फीसदी से ज्यादा खिलाड़ी ओलिंपिक टालने के पक्ष में थे। अमेरिकी अखबार यूएसए टुडे ने 300 अमेरिकी खिलाड़ियों से ओलिंपिक के आयोजन पर सवाल पूछे थे। 70 फीसदी खिलाड़ियों ने कहा था कि गेम्स स्थगित होने चाहिए। 23 फीसदी ने कहा था कि यह उस समय के हालात पर निर्भर करेगा कि गेम्स होने चाहिए या नहीं। जब उन खिलाड़ियों से पूछा गया कि टोक्यो ओलिंपिक तय समय पर होना चाहिए तो 41 फीसदी ने कहा था कि यह सही आइडिया नहीं है।
आर्थिक नुकसान कितना?
सीएनबीसी के मुताबिक, 2016 से अब तक आईओसी ने टोक्यो ओलिंपिक 2020 के लिए 5.7 अरब डॉलर (40 हजार 470 करोड़ रुपए) रेवेन्यू जुटाया। इसका 73 फीसदी हिस्सा मीडिया राइट्स से आया। बाकी 27 फीसदी प्रायोजकों यानी स्पॉन्सर्स से मिला। अगर खेल रद्द होते हैं तो आईओसी को यह रकम लौटानी होगी। इतना ही नहीं आईओसी दुनियाभर में एथलीट्स के लिए स्कॉलरशिप, एजुकेशन प्रोग्राम्स के साथ ही फेडरेशन्स से जो फंड जुटाता है, वो भी उसे लौटानी होगी। लिहाजा, खेल टाले गए हैं। इन्हें रद्द नहीं किया गया।
जापान ने 12.6 अरब डॉलर खर्च किए
टोक्यो ओलिंपिक 2020 की मेजबानी जापान के पास है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वह तैयारियों पर अब तक 12.6 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। कुल अनुमानित खर्च इसका दो गुना यानी करीब 25 अरब डॉलर है।

लॉकडाउन को बच्चों के लिए बनाएं दिलचस्प, ऑनलाइन कुछ नया सिखाएं

                   अलग-अलग गतिविधि और रोजमर्रा के कामों में व्यस्त रखें
                             उन्हें रोटी बनाना, टेबल सेट करना, पौधों में पानी डालना, कपड़े तह करना जैसी चीजें सिखाने की कोशिश करें

मानसी जवेरी, एडिटर, किड्सस्टॉपप्रेस डॉट कॉम
एक सप्ताह से अधिक होने को आया है कि हम घरों में बंद हैं और परिवार में हर कोई पहले से ही परेशान है। ये वक्त मुश्किल जरूर है, लेकिन इस वक्त हम सभी को जादुई चीज की ज़रूरत है, जो हमें घर पर बच्चों के साथ दिनभर की योजना बनाने में मदद करेगी, ताकि दिन के आखिर में किसी का भी चेहरा उतरा हुआ न हो। कोरोना वायरस के चलते हममें से कोई भी आउटिंग या वीकेंड के लिए बाहर नहीं जा सकता है। ये निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण समय है और ऐसे में पेरेंट्स को सुझाव चाहिए कि वो कैसे अपने बच्चों को इन स्थितियों में भी खुश रख सकें। एक मां के रूप में, मैंने घर पर हल्का और खुश माहौल बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए हैं। हम सभी को मानना चाहिए कि हम इस समय को अपने बच्चों के साथ अपने संबंध को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

योजना बनाएं
भले ही आप घर पर क्यों न हों, हर चीज की तैयारी बहुत जरूरी है। चाहे ऑफिस के लिए हो या किचन के लिए मेरी हर चीज को प्लान करने की आदत है। बच्चों के लिए तो मैं सुनिश्चित तौर पर एक रात पहले से ही योजना बना लेती हूँ कि ताकि मुझे पता रहे कि अगले दिन मैं उन्हें किस एक्टिविटी में उलझाए रखूंगी और उन्हें उसके लिए किन-किन चीजों की आवश्यकता होगी। ताकि मैं जब अपना काम कर रही हूं तो बच्चे मुझे परेशान न करें। ऐसा करने से आप भी सुनिश्चित कर सकती हैं कि आने वाला दिन बच्चों के लिए मजेदार बना सकें।

उन्हें रोजमर्रा के काम सिखाएं
इस समय अपने बच्चों को रोजमर्रा के काम सिखाएं क्योंकि ये लड़के और लड़की दोनों के लिए ही बेहद जरूरी है। ये कौशल जीवन में कभी न कभी सभी को काम आते हैं। इस समय आप बच्चों को ये भी सिखा सकती हैं कि कोई काम ऐसा नहीं होता जो केवल लड़कियों के लिए हो या केवल लड़कों के लिए। यही वह समय है जब बच्चे ये सब सीखते हैं। उन्हें रोटी बनाना, टेबल सेट करना, पौधों में पानी डालना, कपड़े तह करना जैसी चीजें सिखाने की कोशिश करें।

स्कूल बंद, लेकिन सीखना अभी भी चालू
स्कूल बंद होने का ये मतलब नहीं है कि बच्चे अब कुछ भी नहीं सीख सकते। ऐसे कई यूट्यूब चैनल हैं, जैसे- चैनल मम, टूनीआर्क्स, चूच टीवी आदि, एआर ऐप्स, जैसे कि स्पेसवॉर अपराइजिंग, किडोपिया आदि और लर्निंग वेबसाइट्स जैसे- किड्सवेबइंडिया, चंदामामा, स्टारफॉल आदि, जिनके जरिए आप अपने बच्चों को कई बेहतर कोर्स की पढ़ाई करवा सकती हैं। ये सुनिश्चित करें कि ऐसे वक्त में उनके कुछ नया सीखने का नुकसान न हो।
बच्चों को ‘काउच पोटैटो’ बनने से बचाएं
कई दिलचस्प एनिमल फ्लो योग हैं जो बच्चों को व्यायाम के साथ-साथ उन्हें फिट रहने के लिए भी मदद कर सकते हैं। अपने दिन की शुरुआत परिवार के साथ एक्सरसाइज से करेंगे तो बेहतर रहेगा। याद रखें आप अभी जो बच्चों को सिखाएंगी, वो उनकी आदत बन सकती है। आप बच्चों को शांत करने के लिए काम (Calm) और ब्रीद (Breathe) जैसे ऐप्स का इस्तेमाल भी कर सकती हैं।

(दैनिक भास्कर से साभार)