Monday, July 6, 2026
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उच्च शिक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है राजनीतिक हस्तक्षेप

भारतीय भाषा परिषद ने आयोजित किया शिक्षक सम्मान समारोह

कोलकाता । भारतीय भाषा परिषद के सभागार में आज पश्चिम बंगाल के विभिन्न विश्वविद्यालयों, कॉलेजों तथा स्कूलों के 21 शिक्षकों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। वर्ष 2023 का शिक्षा सम्मान पाने वाले पूर्व शिक्षक हैं- प्रो. मंजुरानी सिंह (विश्वभारती, शांनिनिकेतन), डॉ. सुनंदा राय चौधुरी (योगेशचंद्र चौधरी कॉलेज), डॉ. किरण सिपाणी (आचार्य जगदीश चंद्र बसु कॉलेज), डॉ. रेवा जाजोदिया (बंगबासी इवनिंग कॉलेज), डॉ. कुसुम राय (मानकर कॉलेज, बर्दवान)। वर्तमान वरिष्ठ प्रोफेसर और अध्यापक हैं- प्रो. रूपा गुप्ता (बर्दवान विश्वविद्यालय), प्रो. सुचरिता बंद्योपाध्याय, प्रो. जरीना जरीन (कलकत्ता विश्वविद्यालय),  मीनाक्षी चतुर्वेदी (भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी), डॉ. विभा कुमारी (कल्याणी विश्वविद्यालय), श्रीमती अल्पना नायक (श्री शिक्षायतन कॉलेज), डॉ. शुभ्रा उपाध्याय (खुदीराम बोस कॉलेज), डॉ. संजय कुमार (लालबाबा कॉलेज), ममता त्रिवेदी (योगेशचंद्र चौधरी कॉलेज), डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी (गोखले गर्ल्स कॉलेज),  रेखा शॉ (डानबास्को, पार्क सर्कस),  कविता कोठारी (श्री शिक्षायतन स्कूल), अमरजीत पंडित (हाजीनगर आदर्श हिंदी विद्यालय), बलवंत सिंह (लॉ मार्टिनियर) और  बलवंत यादव (लायला हाई स्कूल)।
इसके बाद हाल ही गुजरे दो शिक्षकों रेखा सिंह एवं अभिजीत भट्टाचार्य के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करते हुए एक मिनट का मौन धारण किया गया। इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने शिक्षा को पेशा के साथ एक विशिष्ट शैली भी माना। शिक्षा सम्मान का उद्घाटन करते हुए डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा कि सही शिक्षा वह है जिसमें हम अपनी आत्मा और सत्य को पहचान सकें। प्रो. राजश्री शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि परिषद पश्चिम बंगाल के इन सभी शिक्षकों को सम्मानित करते हुए गौरव का बोध कर रही है। संचालन करते हुए प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि शिक्षक हमारे चित्त की उच्चता की रक्षा करते हैं। वे समाज और बच्चों के मार्गदर्शक हैं
सम्मानित शिक्षकों के बीच से आभार व्यक्त करते हुए विश्वभारती की प्रो.मंजुरानी सिंह ने कहा कि शिक्षकों को सम्मानित करने की परंपरा का हम अभिनंदन करते हैं। यह सम्मान सारे शिक्षकों का है। उच्च शिक्षा के समक्ष चुनौतियां विषय पर परिचर्चा में भाग लेते हुए आईलीड के चेयरमैन श्री प्रदीप चोपड़ा ने कहा कि हमें शिक्षा प्रदान करने के तरीके में बदलाव की बहुत जरूरत है। अपनी शिक्षा को आजीविका के साथ जोड़ना होगा। भवानीपुर एजूकेशन सोसायटी कॉलेज के डीन-रैक्टर प्रो.दिलीप शाह ने कहा कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्र विदेश न जाएं इसके लिए यहां अवसर तैयार करना होगा। साथ ही कहा कि आज हर शिक्षक को हमेशा अपडेट रहने की जरूरत है।
हैरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर प्रो. बासव चौधरी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमारी शिक्षा को काफी ऊंचा करने की जरूरत है। हमें शिक्षा को निरंतर जीवन का अंग बनाना होगा तभी कोई बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं। हमें आज क्रिएटिव पिपुल तैयार करने की जरूरत है। स्वशिक्षण की बेहद आवश्यकता है। रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के इतिहास विषय के अध्यक्ष प्रो. हितेंद्र पटेल ने वर्तमान शिक्षा की समस्याओं पर बात की। उन्होंने रवींद्र और गांधी के संदर्भ में बात रखते हुए कहा कि आज भारत की शिक्षा-व्यवस्था को अकेडेमिनयन ने सत्यानाश कर दिया है। आज की क्राइसिस बनाई हुई क्राइसिस है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए विशिष्ट शिक्षाविद डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि एक सफल शिक्षक का काम विद्यार्थियों में विषय के प्रति जिज्ञासा और गहरा सरोकार पैदा करना है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि 10 सालों के बाद संभव है मेधारोबो, आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस की मशीनें ही प्रोफेसर बनेंगी। मंच पर परिषद के वित्त सचिव श्री घनश्याम सुगला भी उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन बिमला पोद्दार ने किया।

शिक्षा हमें स्वालंबी और स्वाभिमानी बनाती है : प्रो.दामोदर मिश्र

मिदनापुर । विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से शिक्षक दिवस के अवसर पर ‘शिक्षा का महत्व’ विषय पर आयोजित विभागीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.दामोदर मिश्र ने कहा शिक्षा हमें ज्ञानी और निर्भय बनाती है। विद्या एकल साधना है और इस साधना का कोई अन्य विकल्प इस धरा पर नहीं है।विद्या तभी सफल होती है जब हम वह हमारे व्यवहार, संस्कार और संस्कृति का हिस्सा बनती है।शिक्षा हमें स्वालंबी बनाने के साथ स्वाभिमानी बनाती है।उन्होंने मावत्से का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा के जरिए हम उस ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं,जहां राजनीति और व्यवस्था नहीं पहुंच सकती। विभागाध्यक्ष डॉ प्रमोद कुमार ने अपने संदेश में कहा कि शिक्षा का संबंध एक सुंदर समाज के निर्माण से है।इस अवसर पर सहायक प्रोफेसर डॉ संजय जायसवाल ने कहा एक शिक्षक अपने विधार्थियों के भीतर ज्ञान, संवेदना,कर्म और मनुष्यता का बीज बोता है। समकालीन परिदृश्य में शिक्षा को सफलता से जोड़ कर देखा जाता है जबकि शिक्षा कर्म के बिना अधूरा है। शिक्षा कर्म को नैतिकता से जोड़कर मनुष्यता को बचाते हुए जीवन को सार्थक बनाती है।डॉ श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि शिक्षा का संबंध व्यक्तित्व के विकास के साथ समाज के निर्माण से है।
इस अवसर पर विभाग की शोधार्थी उष्मिता गौड़ा, सोनम सिंह, रूपेश यादव, रिया श्रीवास्तव, टीना परवीन, सुषमा कुमारी ,एलुमनी अन्नू तिवारी तथा स्नातकोत्तर तृतीय सेमेस्टर के विद्यार्थी श्रेया सरकार,,नाजिया सनवर,निशा कुमारी, प्रिंशु कुमारी, पूजा कुमारी,,प्रिया कुंभकर,संगीता बिंद,मुस्कान अग्रवाल, सत्यम पटेल,कलाम कुरैशी, फिजां खातून,राया सरकार आदि ने आयोजन में विशेष सहयोग दिया।कार्यक्रम का सफल संचालन नेहा शर्मा ने किया।

विश्व हितैषी स्वामी विवेकानन्द

शुभांगी उपाध्याय

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ६, मंत्र ७१)
यह नीति वाक्य सदियों से हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति और भारतवर्ष के श्रेष्ठ चरित्र का परिचायक है। विश्व के इतिहास में एक स्वर्णिम कालखण्ड ऐसा भी रहा है जब भारत समस्त मानव जाति का नेतृत्व करता था। हर क्षेत्र में भारत सर्वोच्च शिखर पर हुआ करता था। सर्वशक्तिमान होने के पश्चात भी हमने कभी भी अपना-पराया नहीं किया वरन् सबको अपना माना। सबकी सहायता, सबके विकास के लिए सदैव तत्पर इस महान शांतिप्रिय राष्ट्र ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। परन्तु दुर्भाग्यवश हम पर सदैव ही चहुं दिस आक्रमण हुए और परिणाम स्वरूप एक दिन यह देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा गया।
परतंत्रता रूपी इस अंधकार ने भारत के स्वाभिमान को ऐसा ग्रहण लगाया कि भारतवासी अपना आत्म-विश्वास ही खो बैठे। क्रूर अंग्रेजी शासकवर्ग भौतिकवाद से ग्रस्त थे और अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति हेतु सब पर अमानवीय अत्याचार करते थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों प्रेम, करुणा, उदारता, संवेदनशीलता, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता जैसे मूल्य अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे। ऐसे में, सन् 1863, 12 जनवरी को भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में ऐसे सूर्य का उदय हुआ जिसके ज्ञान के प्रकाश से युगों- युगों तक दुनिया आलोकित होती रहेगी।
19वीं शताब्दी के इस महानायक को हम सभी स्वामी विवेकानन्द के रूप में याद करते हैं। स्वामीजी प्राचीनता और आधुनिकता का मिश्रण थे। उनमें प्राचीन भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन और अपने पूर्वजों के प्रति जहां अपार श्रद्धा थी वहीं उनके आधुनिक विचार तत्कालीन रूढ़िगत परंपराओं का खण्डन भी करते थे। बचपन में उनके घर पर विभिन्न जातियों एवं संप्रदायों के लोगों की आवाजाही होती थी अतएव सभी को भिन्न-भिन्न हुक्के दिए जाते थे। स्वामीजी ने प्रत्येक हुक्के से एक-एक कश केवल जिज्ञासावश लगाया कि यदि जातिगत नियमों को तोड़ दिया जाए तो क्या परिणाम होंगे ?
11 सितम्बर 1893 (भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, विक्रम संवत 1949, युगाब्द 4995), पश्चिमी क्षितिज पर भारत के ज्ञानोदय का अविस्मरणीय और ऐतिहासिक दिवस बन गया। अमेरिका के शिकागो शहर में ‘विश्व धर्म संसद’ का आयोजन हुआ था जिसमें दुनियाभर के दस प्रमुख संप्रदायों के अनेक प्रतिनिधि पूर्ण तैयारी से आए हुए थे, जिसमें यहूदी, हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, ताओ, कन्फ्यूशियस, शिन्तो, पारसी, कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट इत्यादि शामिल थे। ‘आर्ट इंस्टीट्यूट’ का विशाल सभागार लगभग 7000 श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था। भारत के हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए जब मात्र 30 वर्षीय नवयुवक, स्वामी विवेकानन्द स्वागत का उत्तर देने हेतु मंच पर जाते हैं तब माता सरस्वती को स्मरण कर वह बोल उठते हैं, “अमेरिका वासी बहनों और भाइयों!” स्वामीजी के केवल इतना कहते ही सभी लोग खड़े हो गए और पूरा सभागार अगले 2 मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।


यह घोर करतल नाद उस संन्यासी के सम्मान में हुआ था जिसे कुछ क्षण पूर्व हीन भावना से देखा गया था, जिसने अमेरिका की भीषण ठंड में स्वयं की रक्षा हेतु रात भर रेलवे के माल यार्ड में पड़े बक्से में बिताया, जिनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया, रंगभेद का शिकार बनाया गया, नीग्रो, काला कुत्ता आदि अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया गया। इन सभी कठिनाइयों का सामना कर, अपार सहनशीलता के साथ इस महायोगी ने समस्त संसार को “विश्वबन्धुत्व” का ही अमृत संदेश प्रदान किया।
कुल 17 दिनों (11 से 27 सितंबर, 1893) तक चलने वाले विश्व धर्म संसद में स्वामीजी ने 6 व्याख्यान दिए,। क्रमशः स्वागत का उत्तर ( 11 सितम्बर), हम असहमत क्यों हैं (15 सितम्बर), हिन्दुत्व पर शोध-प्रपत्र (19 सितम्बर), धर्म भारत की मुख्य आवश्यकता नहीं (20 सितम्बर), बौद्ध धर्म – हिन्दू धर्म की पूर्णता (26 सितंबर), अंतिम सत्र में संबोधन (27 सितम्बर)।

एक ओर जहां वैश्विक मंच पर अन्य धर्मावलंबियों ने केवल अपने ही धर्म को सच्चा बताया और बाकी धर्मों की निंदा की वहीं, स्वामीजी ने अपने वक्तव्य में अपने गौरवशाली हिन्दू धर्म के विषय में कहा कि, “मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।”
भारत सदैव सर्वे भवन्तु सुखिन: की सोच रखता है और विपदा में मित्र की भांति सबका साथ देने वाला देश रहा है, जिसका वर्तमान युग में भी प्रचुर उदाहरण मिल जायेगा! वैश्विक महामारी कोरोना के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में विश्व के 120 देशों में बिना किसी शर्त और मूल्य के भारतीय वैक्सीन भेजकर उन्हें संकट से उबारा, तुर्की देश जो कई मुद्दों पर भारत का घोर विरोधी रहा है, में भूकंप के समय यथोचित सहायता पहुँचाना इत्यादि। भारत की इसी बंधुत्व भावना को उजागर करते हुए स्वामीजी आगे कहते हैं,
“मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है।”
“हिन्दुत्व पर शोध-प्रपत्र” विषय पर स्वामी विवेकानन्द ने 19 सितम्बर को जो भाषण दिया वह अत्यन्त महत्वपूर्ण और चर्चित भाषण था। मानो इसी कार्य के लिए उन्हें अपने गुरु ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का आदेश और भारत माता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। उनके आह्वान के ओजस्वी शब्दों की शक्ति थी वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता की पावन वाणी! स्वामीजी के प्रत्येक भाषण का अमेरिकी जनमानस पर अद्वितीय प्रभाव पड़ा। प्रशंसा करते हुए कुछ ने यह भी कहा, “ऐसे विद्वान राष्ट्र में मिशनरी भेजना तो निरी मूर्खता है। वहाँ से तो हमारे देश में धर्मप्रचारक भेजे जाने चाहिए।” हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन हैनरी राइट ने तो यहां तक कहा कि, “स्वामीजी, आपसे आपकी योग्यता का प्रमाण-पत्र माँगना, तो सूर्य से उसके चमकने का अधिकार पूछने जैसा है।”

महर्षि अरविन्द ने कहा था, “स्वामी विवेकानन्द का पश्चिम में जाना, विश्व के सामने पहला जीता जागता संकेत था कि भारत जाग उठा है, न केवल जीवित रहने के लिए बल्कि विजयी होने के लिए।” स्वामीजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पश्चिम में भारतीय सनातन संस्कृति, वेदान्त दर्शन और योग को केवल प्रस्तुत ही नहीं अपितु प्रतिष्ठित भी किया। अमेरिका के विभिन्न प्रान्तों में उनके बड़े-बड़े पोस्टर लगे, दुनिया भर के समाचार पत्र उनकी प्रशंसा और वंदन से भरे हुए थे। धर्म संसद के पहले ही भाषण से स्वामीजी विश्व विख्यात हो गए थे! उनके सम्मान में उस रात राजोचित सत्कार का आयोजन किया गया। स्वामीजी का कक्ष भौतिक सुख-सुविधाओं से लैस था परन्तु एक संन्यासी को उस विलासितापूर्ण बिछौने पर नींद कहां आती! उनका कोमल हृदय तो अपनी मातृभूमि की दशा पर द्रवित हो उठा, जिसे विगत 5 वर्षों तक भ्रमण के दौरान उन्होंने स्वयं अनुभव किया था! सारी रात वह शिशु के समान फूट-फूट कर रोते रहे और ईश्वर के सम्मुख अपने भारत के पुनरुत्थान की प्रार्थना करते रहे।
स्वामीजी का विशाल हृदय केवल भारत ही नहीं अपितु अन्य देश के पतितों और दीनों के लिए भी क्रंदन करता था। एक बार एक रेलवे स्टेशन पर जब वे गाड़ी से उतर रहे थे, उनका भव्य स्वागत किया जा रहा था, तभी वहां एक नीग्रो कुली ने आगे बढ़कर उनसे हाथ मिलाते हुए कहा, “बधाई! मुझे बेहद खुशी है कि मेरी जाति के एक व्यक्ति ने इतना बड़ा सम्मान प्राप्त किया है। इस देश के पूरे नीग्रो समुदाय को आप पर गर्व है।” स्वामीजी ने उससे स्नेहपूर्वक हाथ मिलाया और विनम्रता से कहा, “धन्यवाद भाई धन्यवाद!” वास्तव में इतनी प्रसिद्धि होने के पश्चात भी स्वामीजी को कई बार अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ा था। अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में नीग्रो समझकर कई होटलों में उन्हें प्रवेश करने से रोका गया परन्तु उन्होंने कभी यह उजागर नहीं किया की वे नीग्रो नहीं हैं या वे भारतीय हैं। एक पश्चिमी शिष्य ने उनसे पूछा कि ऐसी स्थितियों में वे सत्य जाहिर क्यों नहीं करते? जिस पर स्वामीजी ने तनिक क्रोधित स्वर में उत्तर दिया, “क्या! दूसरों को नीचा दिखाकर मैं ऊपर उठूँ! मैं इस पृथ्वी पर इसलिए नहीं आया हूँ।”
स्वामीजी ने वैश्विक स्तर पर पराधीन भारत का मान बढ़ाकर, उसके सोए हुए आत्म विश्वास को पुनः जागृत कर नवशक्ति का संचार किया। इस चराचर जगत के कण-कण में ईश्वर दर्शन करने वाले इस दिव्य पुरुष ने अपने भारतवासियों का आह्वान करते हुए कहा, “मेरे भारत! जागो! और जनसमूह का उद्धार करो।” वर्तमान समाज सांप्रदायिकता की अग्नि में झुलस रहा है। कोई देश अपनी सीमाओं के विस्तार हेतु अतिक्रमण कर रहा है तो कहीं धर्म के नाम पर जिहाद हो रहा है। सब अपने को श्रेष्ठ और महान बताने की होड़ में लगे हुए हैं। ऐसे में स्वामीजी के “विश्वबन्धुत्व” का सन्देश ही मानवीय मूल्यों की रक्षा करने की क्षमता रखता है क्योंकि यह संसार को सहिष्णुता और सार्वभौम स्वीकृति की सीख देता है।
(लेखिका शुभांगी उपाध्याय, कलकत्ता विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. शोधार्थी हैं ।)

समरसता के प्रतीक श्रीकृष्ण

शुभांगी उपाध्याय

भारतवर्ष ने जहां एक ओर विदेशी आक्रांताओं का दंश झेला, अत्याचार सहे वहीं दूसरी ओर इस पुण्यभूमि पर अनेकों महापुरुषों, ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया। इस देवभूमि को तो साक्षात ईश्वर की माता कहलाने का भी गौरव प्राप्त है और हम भरतवंशियों को ईश्वर का वंशज कहलाने का परम सौभाग्य मिला है। भारतीय संस्कृति में अनेक अवतार हुए परन्तु श्रीकृष्ण उनमें सबसे लोकप्रिय हैं। भक्तवत्सल भगवान श्री हरि विष्णु जी के आठवें अवतार श्रीकृष्ण 64 कलाओं के ज्ञाता थे इसी कारण उन्हें पूर्ण पुरुष भी कहा जाता है। श्रीकृष्ण प्रेम की मूरत हैं। उनके नटखट बाल स्वरूप की तो दुनिया दीवानी है। उनके जन्म के हजारों वर्षों पश्चात भी प्रभु की सुमधुर बाल लीलाएं इतनी प्रसिद्ध हैं कि भारत की हर माता वात्सल्य में अपने लाल को कान्हा ही पुकारती है। आज भी “मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो” जनमानस का प्रिय भजन है ।

आज भी राधाजी और  श्रीकृष्ण  की प्रेम कहानी प्रेमियों के लिए आदर्श है। मित्रता की जब भी चर्चा होती है तो यहां सर्वप्रथम द्वारिकाधीश और सुदामा का ही उदाहरण दिया जाता है। उनकी मित्रता की करुण कथा से सबकी आँखें नम हो जाती हैं। स्त्री अस्मिता पर जब आँच आती है तो सुदर्शन चक्रधारी का न्याय याद आता है। श्रीकृष्ण के नारीवाद के समक्ष संसार के समस्त तथाकथित नारीवाद फीके पड़  जाते हैं। प्रभु ने हर रिश्ते को  जी भर जिया है और समाज के समक्ष श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत किया है । जब श्रीकृष्ण धरती पर मनुज रूप में अवतरित हुए तब साधारण मनुष्य की भांति ही उनका भी जीवन कष्टों, संघर्षों और पग-पग पर चुनौतियों से भरा हुआ था। उनके जन्म से पूर्व ही उन्हें मारने का षड्यंत्र रच दिया जाता है। राजकुमार होते हुए भी कारागृह में जन्म और तत्क्षण अपने माता-पिता से वियोग सहना पड़ता है ।प्रतिक्षण मृत्युका सामना करने वाले बालगोपाल सदैव आनंदित ही रहते थे। वह जो भी कार्य करते उसमें जनकल्याण का भाव छिपा रहता । यही कारण है कि “माखन चो री से लेकर महाभारत  युद्ध ”को भी प्रभु की लीला ही कहा जाता है ।

माखन चोरी का उद्देश्य : भक्तगण तो माखन चोरी  को मात्र अपने कन्हैया की लीला समझकर वात्सल्य रस में डूब जाते हैं परन्तु  गुणीजनों ने इस संदर्भ की विविध प्रकार से व्याख्या की है ।तत्कालीन परिस्थिति यह थी कि मथुरा में अत्याचारी कंस का शासन था । नंदगांव, बरसाना, गोकुल, वृंदावन और आस -पास के इलाकों में अहीर अथवा यादव दुग्ध का व्यापार करते थे, पशुपालन, गौ पालन करते थे ।अपने क्रूर राजा के आदेशानुसार वे लोग घी, दही, छाछ, मक्खन, मलाई बनाते थे परन्तु उसका एक छटांक भी वे अपने परिवार के लिए नहीं रख पाते । भयवश मक्खन आदि के पात्र को मटके में भरकर बच्चों की पहुँच से दूर, रस्सी में बांध कर लटका दिये जाते । ।समय आने पर सभी वस्तुओं को मथुरा भेज दिया जाता जहां बड़े- बड़े घरों में लोग दूध पान करते, कंस  की दोनों  रानियां अपने सौन्दर्य  के लिए  मक्खन का लेप करती, दुग्ध स्नान करती । अपने अधिकार को जताने हेतु ही श्रीकृष्ण ने बाल-सखाओं के साथ मिलकर माखन चोरी की लीला की थी। इस लीला में चार मण्डल बने। सबसे पहले हृष्ट-पुष्ट बालकों का समूह खड़ा होता, जो आज के संदर्भ में मजदूर वर्ग हैं अर्थात शारीरिक श्रम करने वाले लोग जिनमें अथाह बल होता है। उसके ऊपर सबकी सुरक्षा करने वाला क्षत्रिय वर्ग,  उसके ऊपर वैश्य वर्ग जिनके व्यापार के कारण ही हमें तमाम आवश्यक वस्तुएं प्राप्त होती हैं और अंत में ब्राह्मण वर्ग जो अमूमन शारीरिक रूप से बहुत बलिष्ठ नहीं होता । इन सबके ऊपर सबकी रक्षा और सम्मान करने वाले भगवान श्रीकृष्ण चढ़ते और मटकी फोड़कर जो भी नवनीत प्राप्त होता वह सब में बांट देते । इसीलिए तो उन्हें योगेश्वर भी कहा जाता है ।

इस लीला से यह सन्देश मिलता है कि यदि किसी व्यक्ति को समाज का मक्खन अर्थात शिक्षा, सम्मान, यश, वैभव,धन-दौलत, प्राप्त हुआ है तो उसका कर्तव्य बनता है कि समाज के हर वर्ण के साथ वह उसे बांटे। क्योंकि उसने जो भी पाया है समाज के हर वर्ग से पाया है। सरलतम शब्दों में इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि यदि अन्नदाता किसान खेती करना छोड़ दे तो अपार धन-संपदा का स्वामी होने के पश्चात भी क्या अन्न का एक दाना भी नसीब हो सकता है? यदि सफाई कर्मचारी हमारे द्वारा फैलाई गंदगी को साफ करने से मना कर देतो क्या उस  परिवेश में जीवित रहा जा सकता है?  यदि सेना राष्ट्र रक्षा करना छोड़ दे तो क्या कोई चैन की नींद सो पाएगा? यदि शिक्षक ज्ञान धारा को रोक दे तो क्या कोई ज्ञानी बन सकता है?

स्वामी विवेकानंद कहते थे, “ जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी है; तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उनकी ओर ध्यान नहीं देता ।”स्पष्ट है कि हम सब अपने समाज  के ऋणी होते हैं। अपने देश का ऋण सबसे बड़ा ऋण होता है, यदि इसका एकांश भी चुका पाए तो बाकी सब ऋण स्वतःही उतर जाता है। अतः हमें अपने भीतर सेवा, करुणा और संवेदनशीलता और दायित्वबोध को बढ़ाना होगा।“ जीवने या वदादानंस्यात्प्रदानं ततोऽधिकम्” जैसे महामंत्र को मन में धारण कर परमार्थ में जुटना होगा। यही हमारा कर्म भी है और धर्म भी ।

रासलीला का सन्देश :- सदैव स्थिरप्रज्ञ रहने वाले योगेश्वर श्रीकृष्ण परमानंद की मूर्ति  थे ।वह कहते थे की  जीवन को उत्सव के समान जीना चाहिए। रासलीला का परिदृश्‍य ऐसा है की चारों ओर संकटों के बादल मंडराए हुए थे। दुराचारी कंस, जरासंध और उसके आसुरी मित्रों का आतंक अपने चरम पर था ।नित नवीन षड्यंत्र रचकर श्रीकृष्ण की हत्या का प्रयास किया जाता। ऐसी विकट परिस्थिति में भी मुरलीधर ने अपनी बंसी पर तान छेड़कर गोपियों के साथ आनंदित हो नृत्य किया । कान्हा जी हमें छोटे-छोटे क्षणों का आनन्द उठाना सिखलाते हैं। भविष्य की चिंता न करके वर्तमान में जीना सिखलाते हैं। हर प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं पर नियंत्रण, विधाता पर विश्वास, सकारात्मकता, शांति और आनंद बनाए रखना ही रास कहलाता है। हम सब गोपियां ही तो हैं जो कुंठित हैं और यदि ईश्वर में चित्त लगा लें तो सदा के लिए आनंद की अमृतधारा म डूब जायेंगे और यह समझ जायेंगे की संकट अस्थायी है और बिना विचलित हुए भी उसका सामना किया जा सकता है । श्रीभगवान गीता में स्वयं ही अपने जन्म का कारण बताते हुए कहते हैं,

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4-8॥”

महाभारत काल  में जब युद्ध से पहले ही भटके हुए योद्धा अर्जुन ने हथियार डाल दिए थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे मार्ग पर लाने के लिए जो ज्ञान की गंगा बहाई उसे हम गीता कहते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है वरन् प्राणी मात्र के कल्याण का दुर्लभ ग्रंथ है। संसार भर के विभिन्न क्षेत्र के दिग्गजों, विद्वानों और महापुरुषों ने इस ग्रंथ को अपना जीवन आदर्श और प्रेरणा माना है । जीवन रूपी  महासमर में हम सब भी उसी भटके हुए अर्जुन के समान हैं परन्तु हम वीर,पराक्रमी योद्धा अर्जुन की तरह शारीरिक, मानसिकऔर आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं हैं । अतः प्रत्यक्ष रूप से तो ईश्वर हमारे लिए प्रकट नहीं हुए तथापि गीता के रूप में अवश्य हमारे सारथी बनकर आए हैं। यह ग्रंथ समस्त वेद, पुराणों का सार है । इसे विश्व का पहला मनोवैज्ञानिक ग्रंथ कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः इसमें जीवन के हर रहस्य, हर प्रश्न का उत्तर व्याप्त है। जिस प्रकार कलियुग के प्रत्येक पात्र को महाभारत में ढूंढा जा  सकता है उसी प्रकार इस युग की हर समस्या का निदान गीता जी में व्याप्त है।

गोपियों की भांति एक दिन के लिए नृत्य करके, सज-संवर के सोशल मीडिया पर सेल्फी डालकर, लड्डू गोपाल जी को झूला झुलाकर, स्वयं के स्वाद हेतु केक, चॉकलेट, बिस्कुट, कोल्ड ड्रिंक आदि अशोभनीय पदार्थों का तथाकथित भोग लगाने जैसा अशास्त्रीय आचरण करके भगवद् प्राप्ति हो या न हो किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर निश्चित रूप से परम ब्रह्म की अनुभूति की जा सकती है। जीवन जीने की कला गीता पढ़कर ही आएगी, सफल और सार्थक जीवन का मंत्र हमें उसी से प्राप्त होगा ।अतः इस जन्माष्टमी श्री गीता जी को लाल कपड़े में लपेटकर, धूप-बत्ती जलाकर मन्दिर में न सजाएं अपितु संकल्प लें की दैनिक जीवन में नित्य इसका पाठ करेंगे और एक सार्थक जीवन की ओर अग्रसर होंगे।

(लेखिका,कलकत्ता विश्वविद्यालय में  पी.एच.डी शोधार्थी हैं। )

जन्माष्टमी पर बनाएं विशेष भोग

मावा मिश्री
सामग्री– 1/2 कप घी, 4-5 बर्फ के टुकड़े, 3 बड़े चम्मच मिश्री, मक्खन
विधि – आप मक्खन मिश्री बनाने के लिए सफेद और ताजा मक्खन भी ले सकते हैं। लेकिन अगर मक्खन न हो तो घी में बर्फ डालकर उसे अच्छी तरह फेंट लें। घी फेंटते हुए आपको मक्खन अलग होता दिखेगा। इससे बर्फ निकाल लें और बने हुए मक्खन में मिश्री डालकर अच्छी तरह से मिलाएं । आपका प्रसाद तैयार है।

ओट्स वाले लड्डू


सामग्री – एक कप ओट्स, आधा कप मूंगफली, आधा कप गुड़, एक चम्मच सफेद तिल, आधा कप कटे हुए बादाम, काजू और पिस्ता, एक कटोरी पानी
विधि – सबसे पहले एक पैन को गर्म करें और उसमें मूंगफली को भून लें। अब इसका छिलका निकाल दरदरा पीस लें। उसी पैन में तिल भी ब्राउन होने तक भूनें और फिर ओट्स को भी भून लें। अब एक बाउल में इन चीजों को मिक्स करें। एक दूसरे पैन को गर्म कर उसमें पानी और गुड़ डालकर पका लें। गुड़ पिघल जाने के बाद उसमें ड्राई फ्रूट्स डालें और जब यह थोड़ा थिक हो जाए तो इसमें ओट्स, मूंगफली और तिल का मिश्रण डालें और मिला लें। इसे ठंडा करने के बाद, उसके लड्डू बना लें। आपके ओट्स के लड्डू तैयार हैं। आप इसमें कसा हुआ नारियल भी डाल सकते हैं।

जन्माष्टमी विशेष : श्री कृष्ण के ऐतिहासिक और साहित्यिक वर्णन तथा उनके जीवन से जुड़े रोचक तथ्य

हिन्दू धर्म में श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु के 8वें अवतार के रूप में पूजा जाता हैं। उन्हें कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी जाना जाता है। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष, युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है। भगवद्गीता में कृष्ण और अर्जुन का संवाद आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस उपदेश के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है।
जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण के जीवनकाल का विस्तृत विवरण सबसे पहले महाकाव्य महाभारत में मिलता है, जिसमें कृष्ण को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में दर्शाया गया है।
महाभारत के कई अंशों में कृष्ण को केंद्र में रखा गया है। श्री कृष्ण भगवत गीता महाकाव्य के छठे पर्व ( भीष्म पर्व ) के अठारहवे अध्याय में, वासुदेव कृष्ण युद्ध के मैदान में अर्जुन को महान ज्ञान देते हैं। महाभारत के अलावा के परिशिष्ट में भी कृष्ण के बचपन और युवावस्था का एक विस्तृत संस्करण है। इसके अलावा भी दूसरे महाकाव्यों तथा ऐतिहासिक पुस्तकों में भी वासुदेव श्री कृष्ण का आंशिक अथवा विस्तृत वर्णन मिलता है।
भारतीय-यूनानी मुद्रण: लगभग 180ईसा पूर्व इंडो-ग्रीक राजा एगैथोकल्स  ने देवताओं की छवियों पर आधारित वैष्णव दर्शन से संबंधित कुछ सिक्के जारी किये थे। इन सिक्कों पर शंख और सुदर्शन चक्र धारण किये हुए, भगवान विष्णु के अवतार वासुदेव कृष्ण तथा गदा और हल के साथ बलराम को देखा जा सकता है।
प्राचीन संस्कृत वैयाकरण पतंजलि (Patanjali): ने भी अपने महाभाष्य में वासुदेव कृष्ण और उनके सहयोगियों के कई प्रसंगों का उल्लेख किया है। पाणिनी की श्लोक संख्या 3.1.26 में भी एक टिप्पणी के माध्यम से कंस वध अथवा कंस की हत्या से सम्बन्धित किंवदंतियों का वर्णन किया गया है।
हेलियोडोरस शिलालेख (Heliodorus inscription): पुरातत्वविदों द्वारा मध्य भारतीय राज्य मध्य प्रदेश में औपनिवेशिक काल के, ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेख के साथ एक स्तंभ की खोज की थी। यह शिलालेख “वासुदेव” को समर्पित है जो भारतीय परंपरा में कृष्ण का दूसरा नाम है।
हाथीबाड़ा शिलालेख: हेलियोडोरस शिलालेख के अलावा राजस्थान राज्य में स्थित 19वीं सदी ईसा पूर्व के तीन हाथीबाड़ा शिलालेख और एक घोसूंडी शिलालेख मे भी कृष्ण का उल्लेख किया गया है। कई पुराणों में भी भगवान कृष्ण के जीवन के कुछ संदर्भों को विस्तार पूर्वक बताया गया है, अथवा इस पर प्रकाश डाला गया है। भागवत पुराण और विष्णु पुराण में कृष्ण के जीवनकाल की सबसे विस्तृत जानकारी है।
एक ब्रिटिश राजनयिक, औपनिवेशिक प्रशासक और वनस्पतिशास्त्री, सर चार्ल्स एलियट (Sir Charles Eliot) द्वारा भी हिंदू धर्म पुस्तक तथा विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध साहित्यिक साक्ष्य के आधार पर कृष्ण की कथा की उत्पत्ति का पता लगाने की कोशिश की गई है। उन्होंने विभिन्न स्रोतों से कृष्ण की ऐतिहासिक उत्पत्ति का पता लगाने का हर संभव प्रयास किया। उनके निष्कर्षों के अनुसार विष्णु के अन्य महान अवतार कृष्ण, भारतीय देवताओं में सबसे विशिष्ट व्यक्तियों में से एक हैं। लेकिन अभी भी उनकी ऐतिहासिक उत्पत्ति अस्पष्ट बनी हुई है। ऋग्वेद में कृष्ण के लिए काले अथवा गहरा नीले रंग वाला शब्द प्रयोग किया गया है। छांदोग्य उपनिषद में, देवकी के पुत्र कृष्ण का उल्लेख अंगिरसा वंश के ऋषि घोर द्वारा शिक्षित किए जाने के रूप में किया गया है, अतः यह संभव है की कृष्ण भी उन्हीं के वंश के थे। कृष्ण का एक प्रसिद्ध नाम वासुदेव भी है, और यह पाणिनि का एक सूत्र भी है। पतंजलि द्वारा किये गए उल्लेखों पर गौर किया जाए तो, ऐसा लगता है कि यह एक कबीले का नाम नहीं है, बल्कि एक देवता का नाम है। यदि ऐसा है तो संभव है की वासुदेव को ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में एक देवता के रूप में मान्यता दी गई होगी। उनका उल्लेख दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास के शिलालेखों में भी मिलता है। श्री कृष्ण का नाम और इतिहास सदैव रहस्यमयी रहा है, किंतु उनके जीवन की कई ऐसी अनसुनी कहानियां और रोचक तथ्य भी हैं, जो रहस्यमयी होने के साथ-साथ संदेशपूर्ण भी हैं।
1. गायों का स्वर्ग और वैकुंठ: प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण के भक्त, कभी भी उन्हें मृत नहीं मानते। बल्कि उनका मानना है की, लीलाओं को समाप्त करने के पश्चात ये दोनों वैकुंठ को लौट गए। राम कृष्ण से अलग हैं, क्योंकि राम नहीं जानते कि वह विष्णु हैं, जबकि कृष्ण कहते हैं की वह विष्णु हैं। मान्यताओं के अनुसार राम विष्णु के सातवें अवतार हैं और कृष्ण आठवें हैं। कुछ भक्त वैकुंठ को सबसे ऊपर मानते हैं तो, कई भक्तों के लिए कृष्ण का गोलोक का स्वर्ग विष्णु के वैकुंठ के स्वर्ग से ऊंचा है। माना जाता है की वैकुंठ दूध के सागर में स्थित है, लेकिन यह सारा दूध गोलोक में स्थित गायों के थन से आता है। ये गायें कृष्ण की बांसुरी से मंत्रमुग्द होकर स्वेच्छा से अपना दूध देती हैं।
2. स्थानीय रूप में वैश्विक कृष्णा: महाराष्ट्र के कवि-संतों जैसे एकनाथ, तुकाराम और ज्ञानेश्वर ने कृष्ण को जन-जन तक पहुंचाया। महाराष्ट्र में लोग कृष्ण की छवि को पंढरपुर के विठोबा के रूप में देखते हैं। राजस्थान और गुजरात में कृष्ण का दर्शन नाथद्वारा के श्रीनाथजी के माध्यम से होता है। ओडिशा के लोग पुरी मंदिर में जगन्नाथ की स्थानीय छवि के माध्यम से कृष्ण से जुड़ते हैं। असम में, कृष्ण के चित्र नहीं हैं किंतु यहां कृष्ण को जप, गायन, नृत्य और प्रदर्शन के माध्यम से पूजा जाता है।
4. बौद्धिक भगवद गीता और भावनात्मक भागवत पुराण: यह तथ्य विवादस्पद प्रतीत होता है किंतु, महाभारत को पारंपरिक रूप से अशुभ माना जाता है, क्योंकि यह रक्तपात और पारिवारिक युद्ध को दर्शाता है। यही कारण है कि लोग भागवत पुराण से कृष्ण के बचपन और युवावस्था की कहानियों को उनकी मां यशोदा और उनकी प्यारी गोपियों के साथ सुनाना पसंद करते हैं। महाभारत का एकमात्र शुभ हिस्सा भगवद गीता है, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में कृष्ण द्वारा अर्जुन को सुनाई गई हिंदू दर्शन का सारांश है। अगर भगवद गीता नहीं होती, तो संभवतः लोग कृष्ण के जीवन के उत्तरार्ध को इतना महत्व नहीं देते।
5. जैन और बौद्धों के कृष्ण: बौद्ध और जैन परंपराओं में कृष्ण की कई कहानियां प्रचलित हैं। जैन महाभारत में युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नहीं बल्की द्वारका के कृष्ण और मगध के सम्राट जरासंध के बीच होता है, जिसमें पांडव कृष्ण का समर्थन करते हैं और कौरव जरासंध का समर्थन करते हैं।
6. अत्याचारियों के प्रति दया: अत्याचारियों पर दया और करुणा करने के संदर्भ में कृष्ण की कई कहानियां प्रचलित हैं। कंस, जरासंध और दुर्योधन कृष्ण विद्या के तीन मुख्य खलनायक हैं। कहा जाता है कि इन तीनों का बचपन बेहद दर्दनाक था। कंस की मां ने उसे जन्म देते ही अस्वीकार कर दिया था। जरासंध जन्म के समय विकृत (deformed) पैदा होता है, उसके पिता की दो रानियाँ उसके आधे शरीर को जन्म देती हैं, और उसके बाद दो हिस्सों को जरा नामक राक्षसी द्वारा आपस में जोड़ दिया जाता है। दुर्योधन की मां अपने अंधे पति के साथ एकजुटता में आंखों पर पट्टी बांधकर रखती है, इसलिए वह जीवन भर अपने माता-पिता द्वारा अनदेखा किया जाता है। यह तर्क इस ओर इशारा करते हैं कि समाज में जिन लोगों को बुरा माना जाता है, उनके साथ अक्सर अन्याय होता है, जो उन्हें इतना असुरक्षित बनाता है, कि वे असंवेदनशील और अमानवीय हो जाते हैं।
भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव, कृष्ण जन्माष्टमी के दौरान देशभर के कृष्ण मंदिर में भक्तों की भरी भीड़ जुटती है। हमारे शहर रामपुर में भी इस पावन अवसर पर पुराना गंज स्थित हरिहर मंदिर, जोकीराम का मंदिर, पीपल टोला स्थित मंदिर, मनोकामना मंदिर और मांई का थान मंदिर में पूजा आराधना की जाती है। आमतौर पर सभी मंदिरों में जन्माष्टमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है, और भगवान श्री कृष्ण की देर रात तक पूजा अर्चना होती है।
(साभार – प्रारंग वेबसाइट)

क्या चीनी की जगह मधुमेह को नियंत्रित रखता है गुड़ ?

मधुमेह की बीमारी लोगों को तेजी से अपना शिकार बना रही है । आम बोलचाल की भाषा में इसे शुगर की बीमारी भी कहा जाता है. लगातार लोगों को अपना शिकार बनाने वाली इस बीमारी को लेकर ऐसी कुछ बातें कहीं जाती है जिससे पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल है । ऐसी ही एक बात यह है कि डायबिटीज के मरीज चीनी की जगह गुड़ खाएंगे तो उनका शुगर लेवल नियंत्रित रहेगा । गुणवत्ता की दृष्टि से आज मिलने वाला गुड़ लाभ नहीं, अपितु हानि पहुंचाता है ।
मधुमेह के कारण – आज के समय में अगर कोई व्यक्ति अपनी खानपान की आदतों के साथ खिलवाड़ कर रहा है तो इसस आने वाले समय में उसे कई तरह के मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है इसलिए खाने में विटामिन, मिनरल और जरूरी पोषक तत्व होने चाहिए. ताकि मधुमेह का खतरा न रहे ।
खराब जीवनशैली – खराब जीवनशैली आपके शरीर को अंदर तक खराब कर देती है । आज के समय में सोने-जागने का कोई सही वक्त नहीं है जिसके कारण लोग व्यायाम भी नहीं करते हैं, बाद में जाकर वह मधुमेह के मरीज हो जाते हैं ।
शरीर में कफ – किसी व्यक्ति के शरीर में काफी ज्यादा कफ बन रहा है तो वह मधुमेह का कारण हो सकता है । इसका आयुर्वेद से ही इलाज संभव है । किसी व्यक्ति के शरीर में काफी ज्यादा कफ बन रहा है तो वक्त रहते जरूर इलाज करवाएं ।
प्रदूषण – तेजी से प्रदूषण बढ़ने के कारण मधुमेह बनने का खतरा हमेशा बना हुआ रहता है. शुद्ध हवा में रहने की कोशिश करें ।
ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहें – मधुमेह के मरीज जितना ज्यादा सक्रिय रहेंगे उन पर मधुमेह उतना ही अपना प्रभाव कम करेगा इसलिए जरूरी है कि शारीरिक रूप से ज्यादा से ज्यादा सक्रिय रहें ।

आदित्य की ओर चला आदित्य एल – 1

आदित्य एल1 सूर्य का अध्ययन करने वाला पहला अंतरिक्ष आधारित भारतीय मिशन होगा। अंतरिक्ष यान को सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के लाग्रेंज बिंदु 1 (एल1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में रखा जाएगा, जो पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किमी दूर है। एल1 बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में रखे गए उपग्रह को सूर्य को बिना किसी आच्छादन/ग्रहण के लगातार देखने का प्रमुख लाभ है। यह वास्तविक समय में सौर गतिविधियों और अंतरिक्ष मौसम पर इसके प्रभाव को देखने का अधिक लाभ प्रदान करेगा। अंतरिक्ष यान वैद्युत-चुम्बकीय और कण और चुंबकीय क्षेत्र संसूचकों का उपयोग करके फोटोस्फीयर, क्रोमोस्फीयर और सूर्य की सबसे बाहरी परतों (कोरोना) का निरीक्षण करने के लिए सात नीतभार ले जाएगा। विशेष सहूलियत बिंदु एल1 का उपयोग करते हुए, चार नीतभार सीधे सूर्य को देखते हैं और शेष तीन नीतभार लाग्रेंज बिंदु एल1 पर कणों और क्षेत्रों का यथावस्थित अध्ययन करते हैं, इस प्रकार अंतर-ग्रहीय माध्यम में सौर गतिकी के प्रसार प्रभाव का महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन प्रदान करते हैं। आदित्य एल1 नीतभार के सूट से कोरोनल तापन, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर गतिविधियों और उनकी विशेषताओं, अंतरिक्ष मौसम की गतिशीलता, कण और क्षेत्रों के प्रसार आदि की समस्या को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करने की उम्मीद है।
आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख विज्ञान उद्देश्य हैं:
सौर ऊपरी वायुमंडलीय (क्रोमोस्फीयर और कोरोना) गतिकी का अध्ययन।
क्रोमोस्फेरिक और कोरोनल तापन, आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल मास इजेक्शन की शुरुआत, और फ्लेयर्स का अध्ययन
सूर्य से कण की गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले यथावस्थित कण और प्लाज्मा वातावरण का प्रेक्षण
सौर कोरोना की भौतिकी और इसका ताप तंत्र।
कोरोनल और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान: तापमान, वेग और घनत्व।
सी.एम.ई. का विकास, गतिशीलता और उत्पत्ति।
उन प्रक्रियाओं के क्रम की पहचान करें जो कई परतों (क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना) में होती हैं जो अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।
कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप।
हवा की उत्पत्ति, संरचना और गतिशीलता

चन्द्रमा के आंगन में उतरा चन्द्रविजेता भारत

शुभजिता फीचर डेस्क

23 अगस्त 2023 भारत के स्वर्णिम इतिहास का एक अध्याय बन चुका है । इतिहास का वह अध्याय…जिस पर वर्तमान ही नहीं बल्कि आने वाला समय भी सदैव गर्व करता रहेगा । विश्व के तमाम विकसित देशों द्वारा अवहेलित भारत ने आज वह अध्याय रच दिया है कि वह समाज आज भारत की ओर देख रहा है । पराक्रम सिर्फ शस्त्र दिखाना या युद्ध करना नहीं होता बल्कि अपनी मेधा, अपने श्रम, अपनी अदम्य साहसिक चेतना और असाधारण कृतत्व से अपना लक्ष्य प्राप्त करना है और यह पराक्रम हमारे वैज्ञानिकों ने कर दिखाया है । 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 का लैंडर विक्रम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा है। किसी भी प्रक्षेपण यान के किसी ग्रह पर उतरने पर उस उतरने वाले स्थान को एक नाम देने की परंपरा है। यह परंपरा सभी देश और संस्थान निभाते हैं। जिस स्थान पर चंद्रयान 3 का विक्रम लैंडर उतरा था उस स्थान का नाम भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शिव शक्ति पॉइंट रखा है। जहां चन्द्रयान 2 उतरा था, वह प्वाइंट तिरंगा कहलाएगा । 23 अगस्त का दिन अब अंतरिक्ष दिवस के नाम से मनाया जाएगा । ये उनके आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शाता है। “शिव” में मानव कल्याण का संकल्प समाहित हैं, और “शक्ति” से हमें उन संकल्पो को पूरा करने का सामर्थ्य हासिल होता है। शक्ति एक माध्यम है, जिससे हम किसी भी सपने को पूरा करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। भारत के प्रधान मंत्री के अनुसार; शक्ति नाम हिमालय (शिव का प्रतिनिधित्व करता है) से कन्याकुमारी (शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है) तक भारत देश का प्रतिनिधित्व करता है। शिव शक्ति प्वाइंट भारत की वैज्ञानिक और दार्शनिक सोच का गवाह बनेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-3 चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करता है। इस अवसर पर पीएम मोदी ने भारतीय वैज्ञानिकों के सामर्थ्य पर खुशी जताते हुए इसे भारत के लिए ऐतिहासिक और समृद्ध कदम बताया। पीएम मोदी ने कहा, “हमने धरती पर संकल्प किया और चांद पर उसे साकार किया…भारत अब चंद्रमा पर है।”इसरो के तीसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग पर पीएम मोदी ने कहा, “जब हम ऐसे ऐतिहासिक क्षण देखते हैं तो हमें बहुत गर्व होता है। यह नए भारत की सुबह है।” चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान में एक प्रणोदन मॉड्यूल (वजन 2,148 किलोग्राम), एक लैंडर (1,723.89 किलोग्राम) और एक रोवर (26 किलोग्राम) शामिल है।कुछ दिन पहले लैंडर प्रोपल्शन मॉड्यूल से अलग हो गया और अब दोनों अलग-अलग कक्षाओं में चंद्रमा का चक्कर लगा रहे हैं। हाल ही में, चंद्रमा लैंडर ने चंद्रयान -2 मिशन के ऑर्बिटर के साथ संचार लिंक स्थापित किया है, जो 2019 से चंद्रमा की परिक्रमा कर रहा है और इस तरह एक बैकअप टॉकिंग चैनल है। चंद्रयान-3 में महिलाओं का अहम योगदान : भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भले ही चंद्रयान-2 मिशन के विपरीत चंद्रयान-3 मिशन का नेतृत्व पुरुषों द्वारा किया जा रहा है, लेकिन बड़ी संख्या में इसमें महिलाओं का योगदान हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर आईएएनएस को बताया, “लगभग 54 महिला इंजीनियर/वैज्ञानिक हैं, जो चंद्रयान-3 मिशन पर काम कर रही है। वे अलग-अलग केंद्रों पर काम करने वाले विभिन्न प्रणालियों के सहयोगी और उप परियोजना निदेशक और परियोजना प्रबंधक हैं।”
छात्रों ने इसरो के चंद्रयान-3 चंद्रमा मिशन के लिए महत्वपूर्ण मोटर का किया निर्माण : चंद्रमा पर भारत के तीसरे मिशन – चंद्रयान-3 – के प्रक्षेपण की उलटी गिनती सुचारू रूप से आगे बढ़ रही है और लाखों लोग सांस रोककर इंतजार कर रहे हैं, छात्रों की एक टीम ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्वदेशी अंतरिक्ष यान के लिए एक महत्वपूर्ण मोटर बनाई है।इसरो ने अपने अंतरिक्ष मिशन के लिए तमिलनाडु के सेलम में सोना कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी की सौनास्‍पीड टीम को विभिन्न प्रकार की मोटरों के निर्माण का काम सौंपा था। अंतरिक्ष एजेंसी ने आखिरकार चंद्रयान-3 को लॉन्च करने के लिए लॉन्च व्हीकल मार्क-तीन (एलवीएम 3) में उपयोग के लिए बनाई गई एक स्टेपर मोटर को खरीद लिया। अंतरिक्ष में यात्रा के लिए, चंद्रयान-3 प्रक्षेपण यान, एलवीएम 3 को चंद्रमा मिशन के साथ सफलतापूर्वक एकीकृत किया गया है।

यह रही मिशन चन्द्रयान को सफल बनाने वाली टीम
गत 14 जुलाई को क़रीब 2:35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से चन्द्रयान लांच किया गया था । इस मिशन का बजट महज 615 करोड़ रुपये रहा । इस मिशन को सफल बनाने के लिए इसरो की टीम ने कड़ा परिश्रम किया । 2019 की असफलता से वैज्ञानिकों का दिल टूटा जरूर मगर उस असफलता को सफलता में इन वैज्ञानिकों ने बदला । तब के. सिवन इसरो के चेयरमैन थे और अब एस. सोमनाथ हैं मगर यह सफलता तमाम विफलताओं को सफलता में बदलने की यात्रा है । चन्द्रयान -3 को चांद पर भेजने के लिए एलवीएम -3 लांचर का उपयोग किया गया । यह सफलता इसरो के सैकड़ों वैज्ञानिकों के अनथक परिश्रम का परिणाम है तो आज मिलते हैं चन्द्रयान -3 की टीम से –
1. एस. सोमनाथ – इसरो के चेयरमैन एस. सोमनाथ को इस चन्द्र अभियान का मष्तिष्क माना जाता है । एस. सोमनाथ गगनयान और आदित्य-एल1जैसे मिशन का भी मुख्य हिस्सा रहे हैं । उन्होंने टीकेएम कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (कोल्लम) से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है । इसके साथ ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (बंगलुरू) से एरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है । इसरो के अध्यक्ष बनने से पहले एस. सोमनाथ लिक्विड प्रोप्लशन सिस्टम सेंटर एनं विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के निदेशक भी रह चुके हैं ।
2. पी. वीरमुथुवेल – पी वीरमुथुवेल ने साल 2019 में चंद्रयान-3 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर की ज़िम्मेदारी ली थी. वर्तमान पद से पहले वो इसरो हेडक्वार्टर के स्पेस इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोग्राम ऑफिस के उप निदेशक थे । पी. वीरमुथुवेल चंद्रयान 2 मिशन के भी मुख्य वैज्ञानिकों में से एक थे । पी.वीरमुथुवेल तमिलनाडु के रहने वाले हैं और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मद्रास) के विद्यार्थी रह चुके हैं ।
3. एस. उन्नीकृष्णन नायर – विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर का प्रमुख बनने से पहले एस. उन्नीकृष्णन नायर और उनकी वैज्ञानिकों की टीम कई महत्वपूर्ण मिशन के मूल दायित्व वहन कर चुकी है । जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, जिसे बाद में लॉन्च व्हीकल मार्क – 111 नाम दिया गया था, वह इसी केन्द्र में विकसित किया गया था । उन्नीकृष्णन ने मार एथेंशियस कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बी.टेक की पढ़ाई की है । इसके अतिरिक्त आईआईएससी, बंगलुरू से एम. ई, एरोस्पेस इंजीनियरिंग और आईआईटी मद्रास से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की है ।
4. ए. राजराजन – ए. राजराजन एक सफल वैज्ञानिक और वर्तमान में सतीश धवन स्पेस सेंटर (एसडीएससी एसएसएआर) के निदेशक हैं । ए. राजराजन कॉम्पोजिट क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं । इन्होंने 1987 में मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया । वहीं, 2015 में इन्हें इसरो मेरिट अवार्ड से सम्मानित किया गया था , साथ ही 2010, 2011 और 2015 में इन्हें इसरो टीम एक्सीलेंस अवार्ड दिया गया था ।
5. एम. शंकरन – साल 2021 में एम. शंकरन ने यू आर राव सैटेलाइट सेंटर के डायरेक्टर का पद संभाला था । यह सेंटर सैटेलाइट के निर्माण और एसोसिएटेड सैटेलाइट तकनिक के विकास के लिए एक अग्रणी केंद्र है । इन्होंने भारतीदसान यूनिवर्सिटी (तिरुचिरापल्ली) से फिजिक्स से मास्टर डिग्री प्राप्त की है । साथ ही इन्हें 2017 में इसरो का पर्फामेंस एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है । इसके अलावा, 2017 और 2018 में इन्हें इसरो टीम एक्सीलेंस अवार्ड भी दिया गया था ।
6. एस. मोहन कुमार – एस. मोहन कुमार एलवीएम 3 -एम 4 / चन्द्रयान 3 के मिशन डायरेक्टर हैं । एस. मोहन कुमार । मोहन कुमार विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं । ये एलवीएम3 – एम3 मिशन (वन वेब इंडिया 2 सैटेलाइट्स ऑन बोर्ड) के भी निदेशक भी रह चुके हैं.
7. रितु करिधाल श्रीवास्तव – रितु कारिधाल लखनऊ की रहने वाली हैं, जिन्हें रॉकेट विमेन ऑफ इंडिया के नाम से जाना जाता है. रितु इसरो इसरो की वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं. वहीं, इससे पहले वे चंद्रयान-2 समेत कई बड़े अंतरिक्ष अभियानों का हिस्सा रह चुकी हैं । इन्हें इसरो का युवा वैज्ञानिक पुरस्कार भी मिल चुका है ।
8. डॉ. के. कल्पना – . डॉ. के. कल्पना चंद्रयान-3 मिशन की डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं । वह लम्बे समय से इसरो के मून मिशन पर काम कर रही हैं । कोविड महामारी के दौरान भी उन्होंने इस मिशन पर काम करना जारी रखा । वो इस प्रोजेक्ट पर पिछले 4 साल से काम कर रही हैं । डॉ. के. कल्पना वर्तमान में यूआरएससी की डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं । इन मुख्य वैज्ञानिकों के अलावा चंद्रयान-3 मिशन से क़रीब 54 महिला इंजीनियर्स और वैज्ञानिक भी जुड़ी हुई थीं ।

अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया चन्द्रयान नाम
क्या आपको पता है कि जिस चंद्रयान-3 पर सबकी निगाहें टिकी रहीं, उस मिशन का नाम शुरुआत में सोमयान था, जिसे बाद में बदलकर चंद्रयान कर दिया गया। 1999 में जब चंद्र मिशन को मंजूरी दी गई थी उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। वाजपेयी ने ही अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को चंद्रमा पर खोज करने के लिए प्रेरित किया था। जिाके बाद चांद पर मिशन की तैयारी की गई। रिपोर्ट की मानें तो अटल बिहारी वाजपेयी ने जब सोमयान की जगह चंद्रयान नाम का सुझाव दिया तो वैज्ञानिक समुदाय को यह खास पसंद नहीं आया। दरअसल, सोमयान नाम एक संस्कृत श्लोक से प्रेरित था। संस्कृति में चंद्रमा का ही दूसरा नाम सोम है। उस समय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के तत्कालीन अध्यक्ष के. कस्तूरीरंगन ने बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मिशन को सोमयान नहीं, बल्कि चंद्रयान कहना चाहिए। उन्होंने बताया कि वाजपेयी ने कहा था कि देश आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है और मिशन आगे चंद्रमा पर कई खोजपूर्ण यात्राएं करेगा । इसरो के मुताबिक, चंद्र मिशन की अवधारणा 1999 में भारतीय विज्ञान अकादमी में चर्चा से आई और 2000 में एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया में आगे की बातचीत हुई। के. कस्तूरीरंगन ने बताया कि मिशन की योजना बनाने में 4 साल और लागू करने में करीब 4 साल लगे।
तारीखों में मिशन चंद्रयान-3 
6 जुलाई : भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बहुप्रतीक्षित मिशन चंद्रयान-3 की लॉन्चिंग की तारीख का एलान किया। इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने बताया कि चंद्रयान-3 मिशन 14 जुलाई को 2:35 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में दूसरे लॉन्च पैड से उड़ान भरेगा। इसरो इस योजना पर बीते चार साल से काम कर रहा था। इससे एक दिन पहले एजेंसी ने बताया था कि श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में चंद्रयान-3 युक्त एनकैप्सुलेटेड असेंबली को एलवीएम3 के साथ जोड़ा गया। वहीं सभी वाहन विद्युत परीक्षण सात जुलाई को सफलतापूर्वक संपन्न हुए।
11 जुलाई : इसरो ने चंद्रयान-3 को सफलतापूर्वक चंद्रमा पर उतारने का पूर्वाभ्यास किया। इसरो की ओर से एक ट्वीट में बताया कि लॉन्च की पूरी तैयारी और प्रक्रिया का डमी रूप में 24 घंटे का पूर्वाभ्यास सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
14 जुलाई : भारत के तीसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-3’ को लॉन्च किया गया। चंद्रयान-3 ने दोपहर 2:35 बजे चंद्रमा की ओर उड़ान भरा। मिशन को भेजने के लिए LVM-3 लॉन्चर का इस्तेमाल किया गया।
15 जुलाई : चंद्रयान-3 ने पहली कक्षा पूरी की। मतलब उसकी पहली कक्षा बदली। अंतरिक्ष यान 41762 किमीx 173 किमी की कक्षा में पहुंचा। तब इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया कि 41 दिन बाद 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग की तैयारी के क्रम में चंद्रयान-3 की पृथ्वी के साथ दूरी बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की गई।
17 जुलाई : भारत के अंतरिक्ष मिशन चंद्रयान-3 ने सफलतापूर्वक पृथ्वी की दूसरी कक्षा में प्रवेश किया। तब चंद्रयान-3 पृथ्वी से 41,603 किलोमीटर x226 किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वी की कक्षा में मौजूद था।
18 जुलाई : चंद्रयान-3 ने पृथ्वी की तीसरी कक्षा में प्रवेश किया। चंद्रयान-3 पृथ्वी से 51,400 किलोमीटर x228 किलोमीटर दूर स्थित पृथ्वी की कक्षा में मौजूद था।
20 जुलाई : अंतरिक्ष यान को 71351 किमी x 233 किमी की चौथी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया।
25 जुलाई : चंद्रयान-3 के कक्षा बदलने की पांचवीं प्रक्रिया (अर्थ बाउंड ऑर्बिट मैन्यूवर) सफलतापूर्वक पूरी हो गई। यह कार्य बंगलूरू इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) से किया गया। तब चंद्रयान पृथ्वी से 127609 किलोमीटर x 236 किलोमीटर दूर कक्षा में पहुंचा।
1 अगस्त : चंद्रयान-3 को पृथ्वी की कक्षा से निकालकर सफलतापूर्वक चांद की कक्षा की तरफ रवाना किया गया। इसरो ने कहा कि ‘चंद्रयान-3 ने पृथ्वी की कक्षा का चक्कर पूरा कर लिया है और अब यह चांद की तरफ बढ़ रहा है।’ चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के चारों ओर 288 किमी x 369328 किमी की कक्षा में प्रवेश किया।
5 अगस्त : चंद्रयान-3 164 किमी x 18074 किमी की दूरी पर चंद्र कक्षा में पहुंचा।
6 अगस्त : चंद्रमा के चारों ओर मिशन की कक्षा घटाकर 170 किमी x 4,313 किमी कर दी गई।
9 अगस्त : धीरे-धीरे इसकी गति को घटाते हुए चंद्रमा की अगली कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया जारी रही। दोपहर दो बजे के आसपास इसे तीसरी कक्षा में प्रवेश कराया गया।
14 अगस्त : चंद्रयान-3 को चौथी कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया की गई। इस दिन मिशन 151 x 179 किलोमीटर की कक्षा के गोलाकार चरण पर पहुंच गया।
16 अगस्त : पांचवीं कक्षा में पहुंचाने की प्रक्रिया पूरी हुई। फायरिंग के बाद अंतरिक्ष यान 153 किमी x 163 किमी की कक्षा में पहुंच गया।
17 अगस्त : लैंडिंग मॉड्यूल को इसके प्रपल्शन मॉड्यूल से अलग कर दिया गया। लैंडिंग मॉड्यूल में प्रज्ञान रोवर और विक्रम लैंडर शामिल हैं।
18 अगस्त : ‘डीबूस्टिंग’ प्रक्रिया को अंजाम दिया जिसने इसकी कक्षा को 113 किमी x 157 किमी तक कम कर दिया। दरअसल, डीबूस्टिंग यान की गति धीमा करने की एक विधि है।
20 अगस्त : चंद्रयान-3 ने अपना अंतिम डीबूस्ट ऑपरेशन पूरा किया, जिससे विक्रम लैंडर की कक्षा 25 किमी x 134 किमी तक नीचे आ गई।
23 अगस्त : शाम 6.04 मिनट पर विक्रम लैंडर चांद की सतह पर उतरा और चांद के दक्षिण ध्रुव पर उतरने वाला भारत पहला देश बना । तब से लेकर अब तक चन्द्रमा से जुड़े अनेकों तथ्य इसरो ने हमसे साझा किये हैं ।

अब तक क्या पता चला

1. तापमान
27 अगस्त को इसरो ने चंद्रमा की सतह पर तापमान भिन्नता का एक ग्राफ जारी किया और अंतरिक्ष एजेंसी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने भी चंद्रमा पर दर्ज किए गए उच्च तापमान पर आश्चर्य व्यक्त किया है। अंतरिक्ष एजेंसी ने एक अपडेट साझा करते हुए कहा कि चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर पर चंद्रा के सरफेस थर्मोफिजिकल एक्सपेरिमेंट (ChaSTE) पेलोड ने चंद्रमा की सतह के थर्मल व्यवहार को समझने के लिए ध्रुव के चारों ओर चंद्र ऊपरी मिट्टी के तापमान प्रोफाइल को मापा। समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुएइसरो के वैज्ञानिक बीएचएम दारुकेशा ने कहा, “हम सभी मानते थे कि सतह पर तापमान 20 डिग्री सेंटीग्रेड से 30 डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास हो सकता है, लेकिन यह 70 डिग्री सेंटीग्रेड है। यह आश्चर्यजनक रूप से हमारी अपेक्षा से अधिक है।”
2. 4-मीटर व्यास वाला गड्ढा
27 अगस्त को, चंद्रमा की सतह पर चलते समय, चंद्रयान -3 रोवर को 4-मीटर व्यास वाले गड्ढे के सामने आने पर एक बाधा का सामना करना पड़ा। इसरो के एक अपडेट में कहा गया कि गड्ढा अपने स्थान से 3 मीटर आगे स्थित था। इसके बाद इसरो ने रोवर को अपने पथ पर वापस लौटने का आदेश देने का निर्णय लिया और सूचित किया कि रोवर अब सुरक्षित रूप से एक नए पथ पर आगे बढ़ रहा है।
3. चंद्रमा पर तत्व
30 अगस्त को, चंद्रयान -3 के ‘प्रज्ञान’ रोवर पर लेजर-प्रेरित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप उपकरण ने दक्षिणी ध्रुव के पास चंद्र सतह में सल्फर की उपस्थिति की ‘स्पष्ट रूप से पुष्टि’ की। एल्युमीनियम (Al), कैल्शियम (Ca), आयरन (Fe), क्रोमियम (Cr), टाइटेनियम (Ti), मैंगनीज (Mn), सिलिकॉन (Si), और ऑक्सीजन (O) जैसे अन्य तत्वों का भी पता लगाया जाता है। अंतरिक्ष एजेंसी ने आगे कहा कि हाइड्रोजन (एच) की खोज जारी है। इस बीच, वैज्ञानिकों ने कहा है कि रोवर वर्तमान में “समय के खिलाफ दौड़” में है और इसरो छह पहियों वाले वाहन के माध्यम से अज्ञात दक्षिणी ध्रुव की अधिकतम दूरी को कवर करने के लिए काम कर रहा है। “हमारे पास इस मिशन के लिए कुल मिलाकर केवल 14 दिन हैं, जो चंद्रमा पर एक दिन के बराबर है, इसलिए चार दिन पूरे हो चुके हैं। बचे हुए दस दिनों में हम जितना अधिक प्रयोग और शोध कर पाएंगे, वह महत्वपूर्ण होगा। हम समय के खिलाफ दौड़ में हैं क्योंकि इन 10 दिनों में हमें जो करना है अधिकतम काम और इसरो के सभी वैज्ञानिक इस पर काम कर रहे हैं, “अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक नीलेश एम देसाई ने रविवार को एएनआई को बताया।