Monday, July 6, 2026
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गणित की शिक्षिका से बनीं करोड़पति किसान, हजारों की जिंदगी बदली!

भोपाल । गणित में डिग्री। भोपाल के स्कूलों में सालों के शिक्षण का अनुभव। लोगों ने सोचा नहीं था कि प्रतिभा तिवारी करोड़ों रुपये का मुनाफेदार कृषि कारोबार खड़ा कर देंगी। यही नहीं, लगभग 1400 किसानों को ऑर्गेनिक फार्मिंग से उनकी आय दोगुनी करने में सहायता भी करेंगी। शादी के बाद प्रतिभा पति के साथ भोपाल में बस गईं। दोनों वहीं काम करने लगे। हालांकि, उनके पति के परिवार के पास भोपाल से 150 किमी दूर हरदा में 50 एकड़ जमीन थी। जब प्रतिभा हरदा आती थीं तो वह किसानों को अपनी ज्‍यादातर जमीन पर रसायन का इस्‍तेमाल करके फसल उगाते देखती थीं। एक छोटे से क्षेत्र में वे ऑर्गेनिक खेती करते थे। जब उन्होंने किसानों से भूमि के एक छोटे से टुकड़े पर जैविक फसलें उगाने का कारण पूछा तो जवाब मिला कि वे फसलें उनके खुद के उपभोग के लिए थीं। रसायनों का इस्‍तेमाल करके उगाई गई फसलें बाजार में बिक्री के लिए। इसने उन्‍हें बेचैन कर दिया। किसान अपनी फसलों में बहुत सारे रसायनों का उपयोग करते थे। प्रतिभा ने राज्य सरकार के कृषि विभाग की ओर से जैविक खेती पर आयोजित कार्यशालाओं और सेमिनारों में हिस्‍सा लेना शुरू किया। उन्होंने दिल्ली में ऑर्गेनि‍क खेती के एक कोर्स में भी दाखिला लिया। अपने पति और परिवार को भी जैविक खेती की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वे सभी झिझक रहे थे। इसलिए प्रतिभा ने सुझाव दिया कि वे एक छोटे से क्षेत्र में जैविक खेती करके शुरुआत करें। 2016 में उन्होंने जमीन के एक छोटे से हिस्से पर गेहूं उगाना शुरू कर दिया। पारंपरिक खेती से जैविक खेती में स्थानांतरित होने में लगभग तीन से पांच साल लगते हैं। कारण है कि भूमि को जहरीले रसायनों से छुटकारा पाना होता है। जैविक चीजों उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित और सुधारना होता है।

शुरुआत में हाथ लगी निराशा

प्रतिभा शुरुआत में जिस जमीन पर जैविक खेती कर रही थीं वहां गेहूं की पैदावार 18 क्विंटल प्रति एकड़ से घटकर लगभग 10 क्विंटल प्रति एकड़ रह गई। उन्होंने जमीन के कुछ हिस्सों पर मूंग उगाने की भी कोशिश की। लेकिन कीटों ने पूरी फसल नष्ट कर दी। यह निराशाजनक था। लेकिन, उन्‍होंने इस झटके को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। जैविक उत्पादन की ओर बढ़ते हुए प्रतिभा ने साथ ही अपना जैविक उत्पाद ब्रांड ‘भूमिषा’ भी लॉन्च किया। उन्होंने 2016 में भोपाल में अपना स्टोर ‘भूमिषा ऑर्गेनिक्स’ शुरू किया। जहां गेहूं, चावल, दालें, मसाले, अचार, जड़ी-बूटियां, आटा, क्विनोआ जैसे खाद्य बीज और कोल्ड प्रेस्ड तेल सहित 70 प्रकार के जैविक खाद्य उत्पाद बेचे जाते हैं। भोपाल, दिल्ली और मुंबई में उनका लगभग 400 लोगों का कस्‍टमर बेस है। 2019 तक प्रतिभा ने अपनी पूरी जमीन को जैविक में बदल दिया। सरकार से सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया। वह गेहूं, कुलथी दाल, चने और अरहर जैसी फलियां उगाती हैं। उन्होंने रोजेला, मोरिंगा, हिबिस्कस और एलोवेरा जैसे औषधीय पौधे भी लगाए हैं। जैसे-जैसे मिट्टी कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध होती गई, उसकी उपज में धीरे-धीरे सुधार हुआ। जैविक खेती के तहत फसल उत्पादन पारंपरिक खेती के बराबर हो गई। आज खेती और कृषि संबंधी गतिविधियों से उनका सालाना टर्नओवर एक करोड़ रुपये से ज्यादा है।

बंगाल में 40 हजार रुपये बढ़ा विधायकों का वेतन

कोलकाता । पश्चिम बंगाल के विधायकों के लिए बड़ी खुशखबरी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधायकों के वेतन को लेकर बड़ी सौगात दी है। बता दें कि राज्य विधानसभा के मानसून सत्र के आखिरी दिन मुख्यमंत्री ममता ने विधायकों व मंत्रियों का वेतन 40 हजार रुपये प्रतिमाह बढ़ाने का एलान किया।

क्या मुख्यमंत्री का भी बढ़ेगा वेतन?

विधायकों का वेतन बढ़ाने का एलान करते हुए मुख्यमंत्री ममता ने कहा कि पहले देश में सबसे कम बंगाल के विधायकों का वेतन था। दरअसल, बंगाल के विधायकों को 10 हजार रुपये प्रतिमाह मिलता था, लेकिन ममता बनर्जी के एलान के बाद उनका वेतन बढ़कर 50 हजार रुपये प्रतिमाह हो गया, जबकि मंत्रियों को प्रतिमाह 51 हजार रुपये मिलेंगे।

इसी के साथ ही सवाल उठने लगे कि क्या मुख्यमंत्री के वेतन में भी बढोतरी होगी? हालांकि, मुख्यमंत्री ममता ने सदन को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि मुख्यमंत्री के वेतन में कोई संशोधन नहीं होगा, क्योंकि वह लंबे समय से वेतन नहीं ले रही हैं।

बता दें कि राज्य मंत्रियों को 10,900 रुपये मिलते थे, जो अब 50,900 रुपये होंगे। पूर्ण प्रभार वाले कैबिनेट मंत्रियों को 11 हजार रुपये मिलते थे, जो अब 51,000 रुपये होंगे। कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और विधायक मासिक वेतन के अलावा जो अन्य अतिरिक्त भत्ते पाने के हकदार हैं, वे वही रहेंगे।

सरकार की वेतन संरचना के अनुसार, राज्य के विधायकों को वेतन, भत्ते और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए अबतक मासिक कुल 81,000 रुपये मिलते थे। बढ़ोतरी के बाद अब से उन्हें कुल एक लाख 21 हजार रुपये मिलेंगे। इसी तरह अब से मंत्रियों को मिलने वाला वास्तविक मासिक भुगतान 1.10 लाख रुपये प्रतिमाह से बढ़कर लगभग 1.50 लाख रुपये प्रतिमाह हो जाएगा।

 

अंतरिक्ष की महाशक्ति बनेगा भारत, इसरो बनाएगा आसमान में दुनिया का तीसरा स्पेस स्टेशन

बंगलुरू । चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर इसरो ने एक ऐसा इतिहास रचा जिसकी दुनिया कायल हो गई । अब हमारा देश जल्द ही अंतरिक्ष की महाशक्ति के तौर पर जाना जाएगा. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और चीन के तियागोंग स्पेस स्टेशन के बाद भारत दुनिया का तीसरा स्पेस स्टेशन बनाएगा । चंद्रयान-3 मिशन के बाद भारत आदित्य L-1 मिशन लांच कर चुका है । अब बारी भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मिशन गगनयान की है जो इसरो का पहला मानव मिशन होगा । ठीक इसके बाद भारत स्पेस स्टेशन प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने वाला है जो उसे दुनिया की टॉप स्पेस एजेंसी की कतार में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर देगा ।

कैसा होगा भारत का स्पेस स्टेशन

भारत की ओर से जो स्पेस स्टेशन बनाया जाएगा उसका भार 20 टन होगा, जबकि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का भार तकरीबन 450 टन और चीनी स्पेस स्टेशन का वजन तकरीबन 80 टन तक है । इसरो की योजना इसे इस तरह तैयार करने की है ताकि इसमें 4-5 अंतरिक्ष यात्री रह सकें. इसे धरती की निम्न ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा. इसे लियो कहते हैं जो तकरीबन 400 किलोमीटर दूर है ।

2030 तक पूरा होगा सपना

भारत के स्पेस स्टेशन का ऐलान इसरो के निवर्तमान अध्यक्ष के सिवन ने 2019 में किया था । ये भी बताया था कि गगनयान मिशन के बाद भारत 2030 तक इस सपने को पूरा करेगा । दरअसल गगनयान मिशन इसका पहला चरण है जिसमें अंतरिक्ष यात्रियों को धरती से 400 किलोमीटर लियो कक्षा में भेजा जाएगा । जहां तक गगनयान मिशन जाएगा वहीं पर भारत ने स्पेस स्टेशन को स्थापित करने की योजना बनाई है।  खास बात ये है कि भारत सरकार की ओर से स्पेस डॉकिंग जैसी तकनीक पर रिसर्च के लिए बजट में प्रावधान होने के बाद इस उम्मीद को और बल मिला । यह तकनीक स्पेस स्टेशन में प्रयोग की जाती है ।

अमेरिका देगा भारतीय एस्ट्रोनॉट को ट्रेनिंग

भारत का स्पेस स्टेशन बनकर तैयार होने से पहले ही अमेरिका भारतीय एस्ट्रोनॉट को प्रशिक्षण देगा. इसके लिए  नासा और इसरो के बीच करार भी हो चुका है. 2024 में भारत के दो अंतरिक्ष यात्री इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में भी जा सकते हैं। इससे पहले इन्हें अमेरिका के ह्यूस्टन में स्थित जॉनसन स्पेस सेंटर में ट्रेनिंग दी जाएगी। चंद्रयान-3 की लांचिंग के वक्त व्हाइट हाउस की ओर से जो बयान जारी किया गया था. उसमें भी इसकी पुष्टि की गई थी। व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि भारत ने आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, चंद्रयान-3 की जानकारी इस मिशन के काम आएंगी और नासा भारत के एस्ट्रोनॉट को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने की ट्रेनिंग देगा. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी अपने बयान में कहा था कि गगनयान मिशन के बाद एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग लेने जाएंगे।

क्या होता है स्पेस स्टेशन

स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में ऐसा स्थान है जहां रहकर वैज्ञानिक तरह-तरह के रिसर्च करते हैं । यह स्टेशन लगातार धरती की ऑर्बिट में चक्कर लगाता रहता है । आम तौर पर एक एस्ट्रोनॉट को यहां 6 माह तक रहना होता है, उसके बाद दूसरा दल भेज दिया जाता है और पहला दल वापस आ जाता है । हर समय इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर कम से कम 7 एस्ट्रोनॉट रहते हैं, कभी-कभार इनकी संख्या बढ़ भी जाती है । इस इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को 15 देशों ने मिलकर तैयार किया था । इसमें नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, कैनेडियन स्पेस एजेंसी, जापानी एयरोस्पेस एक्सपोरेशन एजेंसी और रूस की रॉसकॉसमॉस प्रमुख हैं. पहले इसे 2024 तक रहता था, लेकिन हाल ही में नासा ने इसे 2030 तक के लिए बढ़ा दिया है ।

हिन्दी दिवस विशेष – हिन्दी की अस्मिता को पहचान देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा

नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी भाषा और साहित्य तथा देवनागरी लिपि की उन्नति तथा प्रचार और प्रसार करनेवाली भारत की अग्रणी संस्था है। भारतेन्दु युग के अनन्तर हिन्दी साहित्य की जो उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ रही हैं उन सबके नियमन, नियन्त्रण और संचालन में इस सभा का महत्वपूर्ण योग रहा है। सभा का प्रधान कार्यालय वाराणसी में है और इसकी शाखाएँ नयी दिल्ली और हरिद्वार में। नागरीप्रचारिणी सभा के ही तत्वावधान में हिन्दी विश्वकोश, हिन्दी शब्दसागर तथा पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण हुआ। सभा ने आर्यभाषा पुस्तकालय और मुद्रणालय स्थापित किया तथा सरस्वती नामक प्रसिद्ध पत्रिका का श्रीगणेश किया। हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज और संरक्षण के लिये सन् १९०० से सभा ने अन्वेषकों को गाँव-गाँव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरम्भ किया कि किनके यहाँ कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं। सभा के ही प्रयत्न से सन् १९०० से उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रदेश) में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया। अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का संगठन और सर्वप्रथम उसका आयोजन भी सभा ने ही किया था। भारत कला भवन नामक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्व और चित्रसंग्रह का संरक्षण, पोषण और संवर्धन आरम्भिक नौ वर्षों तक यह सभा ही करती रही।
स्थापना
काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना का विचार क्वीन्स कालेज, वाराणसी के नवीं कक्षा के तीन छात्रों – बाबू श्यामसुंदर दास, पं॰ रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कालेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी। बाद में १६ जुलाई १८९३ को इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने निर्धारित की और आधुनिक हिन्दी के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए। काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थी। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले ही वर्ष जो लोग इसके सदस्य बने उनमें महामहोपाध्याय पं॰ सुधाकर द्विवेदी, जार्ज ग्रियर्सन, अम्बिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत ख्याति के विद्वान् थे। यह वह समय था जब अंग्रेज़ी, उर्दू और फारसी का बोलबाला था तथा हिंदी का प्रयोग करनेवाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। तत्कालीन परिस्थितियों में सभा को अपनी उद्देश्यपूर्ति के लिए आरम्भ से ही प्रतिकूलताओं के बीच अपना मार्ग निकालना पड़ा। किन्तु तत्कालीन विद्वन्मण्डल और जनसमाज की सहानुभूति तथा सक्रिय सहयोग सभा को आरम्भ से ही मिलने लगा था, अतः अपनी स्थापना के अल्प समय बाद ही सभा ने बड़े ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेना आरम्भ कर दिया।
कार्य एवं उपलब्धियाँ
अपनी स्थापना के अनन्तर ही सभा ने बड़े ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेना आरम्भ कर दिया। अपने जीवन के विगत वर्षों में सभा ने जो कुछ कार्य किया है उसका संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है :
राजभाषा और राजलिपि
सभा की स्थापना के समय तक उत्तर प्रदेश के न्यायालयों में अंग्रेजी और उर्दू ही विहित थी। सभा के प्रयत्न से, जिसमें स्व. महामना पं॰ मदनमोहन मालवीय का विशेष योग रहा, सन् १९०० से उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रदेश) में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया।
नागरी कोर्ट कैरेक्टर
सन् 1896 में ब्रिटिश सरकार ने सरकारी दफ्तरों और अदालतों में फारसी अक्षरों की जगह रोमन लिपि लिखने का एक आदेश निकाला। सरकार के इस आदेश से नागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी सेवियों के बीच काफी उथल-पुथल मच गई। नागरी भाषा के समर्थकों को इस बात का भय था कि यदि अदालतों और सरकारी दफ्दरों में रोमन लिपि लागू कर दी गई तो अदालतों में नागरी भाषा का द्वार हमेशा के लिए बन्द हो सकता है। नागरी प्रचारिणी सभा ने अदालतों में रोमन लिपि के विरोध में आन्दोलन करना शुरू कर दिया। बाबू श्यामसुन्दर दास आन्दोलन को मुखर बनाने के लिए मुजफ्फरपुर गए; वे वहां परमेश्वर नारायण मेहता और विश्वनाथ प्रसाद मेहता से मिलाकर कुछ धन इक्ठ्ठा कर काशी लौट आए। इधर बाबू राधाकृष्ण दास ने नागरी कैरेक्टर लेख तैयार किया। बाबू श्यामसुन्दर दास ने इस लेख के पैम्पलेट छपवाकर लोगों में बटवा दिए। नागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी सेवियों के आन्दोलन का असर यह हुआ कि सरकार ने जुलाई 1896 में आज्ञापत्र जारी कर अदालतों में रोमन लिपि लिखने पर रोक लगा दी। नागरी प्रचारिणी सभा के सदस्य इस बात पर गहन विचार और विमर्श कर रहे थे कि नागरी भाषा को अदालतों में कैसे लागू करवाया जाए। सन् 1896 में भारतीय भवन का वार्षिक अधिवेशन हुआ जिसके सभापति जस्टिस नाक्स थे। इन्होंने सभा और पंडित मदनमोहन मालवीय से कहा कि आप लोग को अदालतों में नागरी भाषा को लागू करवाने के लिए प्रयास करना चाहिए। पंडित मदनमोहन मालवीय ने ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज एण्ड अवध’ (Court Character and Primary Education N.W. Provinees and Oudh) बड़े परिश्रम और लगन से तैयार किया। सन् 1898 बाबू श्यामसुंदर दास ने इस मेमोरियल का सार संक्षेप हिन्दी में ‘पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में अदालती अक्षर और प्राइमरी शिक्षा’ शीर्षक से नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से प्रकाशित कर नागरी के पक्ष में माहौल निर्मित करने में अहम भूमिका निभाई। इस लेख में नागरी भाषा को अदालतों में लागू करने के पक्ष में तमाम उदाहरण और दलीले पेश की गई थी और यह भी कहा गया था कि पश्चिमोत्तर प्रान्त की अदालतों में नागरी भाषा के लागू न होने से जनता को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
‘पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में अदालती अक्षर और प्राइमरी शिक्षा’ लेख में कोर्ट आफ डाइरेक्टर के 30 सितबंर 1830 के आज्ञापत्र का उल्लेख करते हुए बताया गया कि यहाँ के निवासियों को जज की भाषा सीखने के बदले जज को भारतवासियों की भाषा सीखना बहुत सुगम होगा, अतएव हम लोगों की सम्मति है कि न्यायलयों की समस्त कार्यवाई उस स्थान की भाषा में हो।
नागरी प्रचारिणी सभा के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न शहरों में घूम-घूम कर साठ हजार व्यक्तियों के नागरी कोर्ट मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाए। नागरी कोर्ट मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाने में केदारनाथ पाठक ने बड़ा योगदान किया था। उन्होने ब्रिटिश सरकार की परवाह किए बगैर कानपुर, लखनऊ, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर, इटावा, अलींगढ़, मेरठ, हरदोई, देहरादून, फैजाबाद आदि शहरों में घूम-घूम कर लोगों के मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाए। इस दौरान उनको राजद्रोह का मुकदमा भी झेलना पड़ा और जेल भी जाना पड़ा। ‘नागरी कोर्ट कैरेक्टर मेमोरियल’ साठ हजार व्यक्तियों के हस्ताक्षर सहित सोलह जिल्दों में पश्चिमोत्तर प्रांत के लेफ्टीनेंट गर्वनर एंटोनी मैकडानेल को सौंपे जाने का विचार किया गया। मैकडानेल को मेमोरियल देने के लिए सत्रह व्यक्तियों का एक प्रतिनिधिमंडल बनाया गया। इस प्रतिनिधि मंडल में जिन सत्रह व्यक्तियों को शामिल किया गया उनकी सूची सरस्वती पत्रिका के अप्रैल 1900 के अंक में छपे ‘पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में नागरी अक्षर का प्रचार’ नामक लेख में दी गई है। वह सूची इस प्रकार है-
1. महाराज सर प्रतापनारायण सिंह बहादुर, के. सी. आई. ई., अयोध्या
2. राजा रामप्रताप सिंह बहादुर, माँडा इलाहाबाद
3. राजा घनश्याम सिंह, मुरसान, अलीगढ
4. राजा रामपाल सिंह मेम्बर लेजिसलेटिव कौंसिल, रापपुर, प्रतापगढ
5. राजा सेठ लक्ष्मणदास, सी. आई. ई., मथुरा
6. राजा बलवंत सिंह, सी. आई. ई., एटा
7. राय सिद्धेश्वरी प्रसाद नारायण सिंह बहादुर, गोरखपुर
8. राय कृष्ण सहाय बहादुर, सभापति देवनागरी प्रचारिणी सभा, मेरठ
9. राय कंवर हरिचरण मिश्र बहादुर, बरेली
10. राय निहालचन्द बहादुर, मुजफ्फर नगर
11. आनरेबल राय श्रीराम बहादुर, एम.ए.बी.एल. एडवोकेट अवध, मेम्बर प्रांतिक लेजिसलेटिव कौंसिल, तथा फेलो इलाहाबाद युनिर्वसिटी, लखनऊ
12. राय प्रमदादास मित्र बहादुर, फेलो इलाहाबाद युनिर्वसिटी
13. आनरेबल सेठ रघुबरदयान, मेम्बर प्रांतिक लेजिसलेटिव कौंसिल, सीतापुर
14. मुन्शी माधवलाल, रईस, काशी
15. मुन्शी रामनप्रसाद, एडवोकेट तथा सभापति कायस्थ पाठशाला कमेटी, इलाहाबाद
16. पंडित सुन्दरलाल बी.ए. एडवोकेट तथा फेलो इलाहाबाद युनिर्वसिटी
17. पंडित मदनमोहन मालवीय, बी.ए. एल.एल.बी., वकील हाईकोर्ट, तथा प्रतिनिधि काशी नागरी प्रचारिणी सभा।
2 मार्च 1898 को मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में सत्रह व्यक्तियों के प्रतिनिधि मंडल ने पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध के लेफ्टीनेंट गर्वनर एंटोनी मैकडानेल को ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज’ सौंप दिया। नागरी प्रचारिणी सभा और महामना के नेतृत्व में चले इस आन्दोलन ने पश्चिमोत्तर प्रांत में कचहरियों और प्राइमरी स्कूलों में हिन्दी भाषा के लिए द्वार खोल दिया। 18 अप्रैल 1900 को पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध के लेफ्टीनेंट गर्वनर एंटोनी मैकडानेल ‘बोर्ड आफ रिवेन्यु’ और हाई कोर्ट तथा ‘जुडिशियल कमिशनर अवध’ से सम्मति लेकर आज्ञापत्र जारी कर दिया।[1]

‘सरस्वती’ के अप्रैल 1900 के अंक में ‘पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में नागरी अक्षर का प्रचार’ लेख में गर्वनर एंटोनी मैकडानेल के आदेश को अक्षरशः प्रकाशित किया गया। वह इस प्रकार है-
(१) सम्पूर्ण मनुष्य प्रार्थनापत्र और अर्जीदावों को अपनी इच्छा के अनुसार नागरी या फारसी के अक्षरों में दे सकते हैं।
(२) सम्पूर्ण सम्मन, सूचनापत्र और दूसरे प्रकार के पत्र जो सरकारी न्यायालयों वा प्रधान कर्मचारियों की ओर से देश भाषा में प्रकाशित किए जाते हैं, फरसी और नागरी अक्षरों में जारी होंगे और इन पत्रों की शेष भाग की खानापूरी भी हिन्दी भाषा में उतनी ही होगी जितनी फारसी अक्षरों में की जाए।
(३) अंग्रेजी अफसरों को छोड़कर आज से किसी न्यायालय में कोई मनुष्य उस समय तक नहीं नियत किया जायगा जब तक वह नागरी और फारसी अक्षरों को अच्छी तरह से लिख और पढ़ न सकेगा।
आर्यभाषा पुस्तकालय
सभा का यह पुस्तकालय देश में हिंदी का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। ठाकुर गदाधर सिंह ने अपना पुस्तकालय सभा को प्रदान किया और उसी से इसकी स्थापना सभा में सन् १८९६ ई. में हुई। १९०३-०४ में यह विशेशरगंज स्थित अपने वर्तमान भवन में आया। विशेषतः १९वीं शताब्दी के अंतिम तथा २०वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षो में हिंदी के जो महत्वपूर्ण ग्रंथ और पत्रपत्रिकाएँ छपी थीं उनके संग्रह में यह पुस्तकालय बेजोड़ है। हस्तलेखों का इतना बड़ा संग्रह कहीं और नहीं है। अनुपलब्ध और दुर्लभ ग्रंथों का ऐसा संकलन भी कहीं और मिलना मुश्किल है।
मुद्रित पुस्तकें डयूई की दशमलव पद्धति के अनुसार वर्गीकृत हैं। इसकी उपयोगिता एकमात्र इसी तथ्य से स्पष्ट है कि हिंदी में शोध करनेवाला कोई भी विद्यार्थी जब तक इस पुस्तकालय का आलोकन नहीं कर लेता तब तक उसका शोधकार्य पूरा नहीं होता। स्व. पं॰ महावीरप्रसाद द्विवेदी, स्व. जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, स्व. पं॰ मयाशंकर याज्ञिक, स्व. डॉ॰ हीरानंद शास्त्री तथा स्व. पं॰ रामनारायण मिश्र ने अपने अपने संग्रह भी इस पुस्तकालय को दे दिए हैं जिससे इसकी उपादेयता और बढ़ गई हैं।
हस्तलिखित ग्रंथों की खोज
स्थापित होते ही सभा ने यह लक्ष्य किया कि प्राचीन विद्वानों के हस्तलेख नगरों और देहातों में लोगों के बेठनों में बँधे बँधे नष्ट हो रहे हैं। अतः सन् १९०० से सभा ने अन्वेषकों को गाँव-गाँव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरम्भ किया कि किनके यहाँ कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश में तो यह कार्य अब तक बहुत विस्तृत और व्यापक रूप से हो रहा है। इसके अतिरिक्त पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी यह कार्य हुआ है। इस खोज की त्रैवार्षिक रिपोर्ट भी सभा प्रकाशित करती है। सन् १९५५ तक की खोज का संक्षिप्त विवरण भी दो भागों में सभा ने प्रकाशित किया है। इस योजना के परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य का व्यवस्थित इतिहास तैयार हो सका है और अनेक अज्ञात लेखक तथा ज्ञात लेखकों की अनेक अज्ञात कृतियाँ प्रकाश में आई हैं। आज सभा के पास 20 हजार से अधिक पांडुलिपियां, 50 हजार से अधिक पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार है। हिंदी की इस थाती के संरक्षण के लिए संस्था के पास पर्याप्त धन नहीं है।
प्रकाशन
उत्तमोत्तम ग्रंथों और पत्रपत्रिकाओं का प्रकाशन सभा के मूलभूत उद्देश्यों में रहा है। अब तक सभा द्वारा भिन्न-भिन्न विषयों के लगभग ५०० ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। त्रैमासिक ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ सभा का मुखपत्र तथा हिंदी की सुप्रसिद्ध शोधपत्रिका है। भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य विषयक शोधात्मक सामग्री इसमें छपती है और निर्व्यवधान प्रकाशित होती रहनेवाली पत्रिकाओं में यह सबसे पुरानी है। मासिक ‘हिंदी’, ‘विधि पत्रिका’ और ‘हिंदी रिव्यू’ (अंगरेजी) नामक पत्रिकाएँ भी सभा द्वारा निकाली गई थीं किंतु कालांतर में वे बंद हो गई। सभा के उल्लेखनीय प्रकाशनों में हिंदी शब्दसागर, हिंदी व्याकरण, वैज्ञानिक शब्दावली, सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, भिखारीदास, पद्माकर, जसवंसिंह, मतिराम आदि मुख्य मुख्य कवियों की ग्रंथावलियाँ, कचहरी-हिंदी-कोश, द्विवेदी अभिनंदनग्रंथ, संपूर्णानंद अभिनंदनग्रंथ, हिंदी साहित्य का इतिहास और हिंदी विश्वकोश आदि ग्रंथ मुख्य हैं।
हिन्दी विश्वकोश तथा हिन्दी शब्दसागर
उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त हिन्दी विश्वकोश का प्रणयन सभा ने केंद्रीय सरकार की वित्तीय सहायता से किया है। इसके बारह भाग प्रकाशित हुए हैं। हिंदी शब्दसागर का संशोधन-परिवर्धन केंद्रीय सरकार की सहायता से सभा ने किया है जो दस खंडों में प्रकाशित हुआ है। यह हिंदी का सर्वाधिक प्रामाणिक तथा विस्तृत कोश है। दो अन्य छोटे कोशों ‘लघु शब्दसागर’ तथा ‘लघुतर शब्दसागर’ का प्रणयन भी छात्रों की आवश्यकतापूर्ति के लिए सभा ने किया है। सभा देवनागरी लिपि में भारतीय भाषाओं के साहित्य का प्रकाशन और हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों में प्रकाशित करने के लिए योजनाबद्ध रूप से सक्रिय हैं। प्रेमचंद जी के जन्मस्थान लमही (वाराणसी) में उनका एक स्मारक भी बनवाया है।
पारिभाषिक शब्दावली
८ वर्ष के परिश्रम से काशी नागरी प्रचारणी सभा ने १८९८ में पारिभाषिक शब्दावली प्रस्तुत की। हिंदी में पारिभाषिक शब्द निर्माण के इस सर्वप्रथम सर्वाधिक सुनियोजित, संस्थागत प्रयास में गुजराती, मराठी और बंगला में हुए इसी प्रकार के कार्यों का समुचित उपयोग किया गया। सभा का यह कार्य देश में सभी प्रचलित भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली और साहित्य के निर्माण की शृंखलाबद्ध प्रक्रिया का सूत्रपात करनेवाला सिद्ध हुआ।
मुद्रणालय
सन् १९५३ से सभा अपना प्रकाशन कार्य समुचित रूप से चलाते रहने के उद्देश्य से अपना मुद्रणालय भी चला रही है। पुरस्कार पदक – विभिन्न विषयों के उत्तमोत्तम ग्रंथ अधिकाधिक संख्या में प्रकाशित होते रहें, इसे प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सभा प्रति वर्ष कई पुरस्कार एवं स्वर्ण तथा रजत पदक ग्रंथकर्ताओं को दिया करती है जिनका हिंदी-जगत में अत्यंत समादर है।
अन्यान्य प्रवृत्तियाँ
अपनी समानधर्मा संस्थाओं से संबंधस्थापन, अहिंदीभाषी छात्रों को हिंदी पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति देना, हिंदी की आशुलिपि (शार्टहैंड) तथा टंकण (टाइप राइटिंग) की शिक्षा देना, लोकप्रिय विषयों पर समय-समय पर सुबोध व्याख्यानों का आयोजन करना, प्राचीन और सामयिक विद्वानों के तैलचित्र सभाभवन में स्थापित करना आदि सभा की अन्य प्रवृत्तियाँ हैं।
सन् १९०५ में, काशी में कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर एक भाषा सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता रमेशचन्द्र दत्त ने की और उसमें नागरीप्रचारिणी सभा के प्रांगण में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने यह घोषणा की कि हिन्दी ही भारत की भाषा हो सकती है और देवनागरी लिपि वैकल्पिक रूप से भारत की सभी भाषाओं के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए तथा यह कार्य सभा को करना चाहिए। सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका सरस्वती का श्रीगणेश और उसके संपादनादि की संपूर्ण व्यवस्था आरंभ में इस सभा ने ही की थी। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संमेलन का संगठन और सर्वप्रथम उसका आयोजन भी सभा ने ही किया था। इसी प्रकार, संप्रति हिंदू विश्वविद्यालय में स्थित भारत कला भवन नामक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्व और चित्रसंग्रह का एक युग तो संरक्षण, पोषण और संवर्धन यह सभा ही करती रही। अंततः जब उसका स्वतंत्र विकास यहाँ अवरुद्ध होने लगा और विश्वविद्यालय में उसकी भविष्योन्नति की संभावना हुई तो सभा ने उसे विश्वविद्यालय को हस्तांतरित कर दिया।
स्वर्ण जयन्ती और हीरक जयन्ती
संवत् २००० वि. (सन १९४३) में सभा ने अपनी स्वर्ण जयन्ती और महाराज विक्रमादित्य की द्विसहस्स्राब्दी जयन्ती मनाया। इसी तरह जीवन के ६० वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में सं. २०१० (सन १९५३ ई) में अपनी हीरक जयन्ती के आयोजन बड़े समारम्भपूर्वक किए। इन दोनों आयोजनों की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह रही की ये आयोजन उत्सव मात्र नहीं थे, प्रत्युत इन अवसरों पर सभा ने बड़े महत्वपूर्ण, ठोस तथा रचनात्मक कार्यों का समारंभ किया। उदाहरणार्थ, स्वर्णजयंती पर सभा ने अपना ५० वर्षों का विस्तृत इतिहास तथा नागरीप्रचारिणी पत्रिका का विक्रमांक (दो जिल्दों में) प्रकाशित किया। ५० वर्षों की खोज में ज्ञात सामग्री का विवरण एवं भारत कला भवन तथा आर्यभाषा पुस्तकालय में संगृहीत सामग्री की व्यवस्थित सूची प्रकाशित करने की भी उसकी योजना थीं, किन्तु ये कार्य खंडशः ही हो पाए। परिव्राजक स्वामी, सत्यदेव जी ने अपना आश्रम सत्यज्ञान निकेतन इसी अवसर पर देश के पश्चिमी भागों में प्रचार कार्य का केंद्र बनाने के निमित्त, सभा को दान कर दिया। इसी प्रकार हीरक जयंती पर सभा के ६० वर्षीय इतिहास के साथ हिंदी तथा अन्यान्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का इन ६० वर्षों का इतिहास, नारीप्रचारिणी पत्रिका का विशेषांक, हिंदी शब्दसागर का संशोधन-परिवर्धन तथा आकर ग्रंथों की एक पुस्तकमाला प्रकाशित करने की सभा की योजना थी। यथोचित राजकीय सहयोग भी सभा को सुलभ हुआ, परिणामतः सभा ये कार्य सम्यक् रूप से संपन्न कर रही है।
बौद्धिक तथा आर्थिक सहयोग
नाग्रीप्रचारिणी सभा से देश के अनेक नेता जुडे और इसकी बौद्धिक एवं आर्थिक सहायता की। सर आशुतोष मुखर्जी सभा के न्यासी मण्डल के अध्यक्ष बने और बाद में लाला लाजपत राय इस पद पर आये। सर तेजबहादुर ‍‌सप्रू ने उस युग में सभा की आर्थिक एवं नैतिक सहायता की जो तब कई सहस्र रुपयों की थी। गोविन्दवल्लभ पन्त सन् १९०८ से प्रतिमाह डेढ़ रुपये से सभा की सहायता करने लगे। उन्होंने अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत अपनी संस्था ‘प्रेम सभा’ को नागरीप्रचारिणी सभा से सम्बद्ध करके की। उस समय के राजा-महाराजाओं में काशी, उदयपुर, ग्वालियर, खेतड़ी, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, बूँदी, रीवाँ आदि के राजाओं जहाँ इसे आर्थिक सहायता पहुँचाई, वहीं मोहनदास करमचंद गाँधी ने भी इसकी कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सहायता की और सन् 1१९३४ में यंग इंडिया में उन्होंने सभा की सहायता के लिए अपने हस्ताक्षर से अपील की। मोतीलाल नेहरू ने भी सभा की धन से सहायता की। सी.वाई. चिन्तामणि ने विधान परिषद् में सभा के भाषा के संबंध में विचारों का बराबर समर्थन किया तथा सर सुन्दरलाल आदि ने इसकी भरपूर सहायता की।

हिंदी है भारत की बोली

गोपाल सिंह ‘नेपाली’

दो वर्तमान का सत्य सरल,
सुंदर भविष्य के सपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

यह दुखड़ों का जंजाल नहीं,
लाखों मुखड़ों की भाषा है
थी अमर शहीदों की आशा,
अब जिंदों की अभिलाषा है
मेवा है इसकी सेवा में,
नयनों को कभी न झंपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

 

क्यों काट रहे पर पंछी के,
पहुंची न अभी यह गांवों तक
क्यों रखते हो सीमित इसको
तुम सदियों से प्रस्तावों तक
औरों की भिक्षा से पहले,
तुम इसे सहारे अपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
श्रृंगार न होगा भाषण से
सत्कार न होगा शासन से
यह सरस्वती है जनता की
पूजो, उतरो सिंहासन से
इसे शांति में खिलने दो
संघर्ष-काल में तपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

जो युग-युग में रह गए अड़े
मत उन्हीं अक्षरों को काटो
यह जंगली झाड़ न, भाषा है,
मत हाथ पांव इसके छांटो
अपनी झोली से कुछ न लुटे
औरों का इसमें खपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो आपने आप पनपने दो

इसमें मस्ती पंजाबी की,
गुजराती की है कथा मधुर
रसधार देववाणी की है,
मंजुल बंगला की व्यथा मधुर
साहित्य फलेगा फूलेगा
पहले पीड़ा से कंपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो आपने आप पनपने दो

नादान नहीं थे हरिश्चंद्र,
मतिराम नहीं थे बुद्धिहीन
जो कलम चला कर हिंदी में
रचना करते थे नित नवीन
इस भाषा में हर ‘मीरा’ को
मोहन की माल जपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
प्रतिभा हो तो कुछ सृष्टि करो
सदियों की बनी बिगाड़ो मत
कवि सूर बिहारी तुलसी का
यह बिरुवा नरम उखाड़ो मत
भंडार भरो, जनमन की
हर हलचल पुस्तक में छपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

मृदु भावों से हो हृदय भरा
तो गीत कलम से फूटेगा
जिसका घर सूना-सूना हो
वह अक्षर पर ही टूटेगा
अधिकार न छीनो मानस का
वाणी के लिए कलपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
बढ़ने दो इसे सदा आगे
हिंदी जनमत की गंगा है
यह माध्यम उस स्वाधीन देश का
जिसकी ध्वजा तिरंगा है
हों कान पवित्र इसी सुर में
इसमें ही हृदय तड़पने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

प्रो. अभिजीत भट्टाचार्य का निधन

कोलकाता । बेथुन कालेज, कोलकाता के हिंदी विभाग के प्रोफेसर रहे डॉ. अभिजीत भट्टाचार्य का शुक्रवार को घर पर ही सोते समय निधन हो गया। विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय अभिजीत भट्टाचार्य कई भाषाओं के जानकार थे। राहुल सांकृत्यायन पर उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से शोध भी किया था। अभिजीत भट्टाचार्य के असामयिक निधन पर पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। वह बेथून कॉलेज के पहले प्रेसीडेंसी कॉलेज (अब यूनिवर्सिटी), जयपुरिया कॉलेज में भी प्राध्यापक रहे। उनके निधन से शिक्षा जगत के साथ ही साथ उनके विद्यार्थियों में शोक की लहर है।

संस्कृति की संवाहक होती हैं पुस्तकें –डॉ सत्या उपाध्याय 

कोलकाता । ‘आज के इस यांत्रिक समय में ‘मन की पीर’ और ‘विनय याचना’ जैसी  कविता पुस्तकों पर चर्चा मनुजता के कोमलतम् पक्ष के बचे रहने का संकेत है।पुस्तकें संस्कृति की संवाहक होती हैं ।इस तरह के कार्यक्रम के लिए आयोजक बधाई के पात्र है।’ ये उद्गार हैं कलकत्ता गर्ल्स कालेज की प्रिंसिपल डॉ सत्या उपाध्याय के जो श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के तत्वावधान में शनिवार को पुस्तकालय कक्ष में आयोजित ‘एक शाम किताबों के नाम ‘ के तीसरे आयोजन में बतौर अध्यक्ष बोल रहीं थी। डॉ. सत्या उपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में चयनित पुस्तकों की विशेषताओं पर चर्चा करते हुए उनके विषय वस्तु, शिल्प और भाषा के अनूठे प्रयोग को रेखांकित किया। इन पुस्तकों के समीक्षक वक्ताओं के समालोचना पर संतोष प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि ये नई पीढ़ी आश्वस्त करती है कि आने वाला समय उज्ज्वल होगा।
 कार्यक्रम में राजेन्द्र कानूनगो की कृति “विनय याचना’, जयकुमार रुसवा की काव्य कृति “मन की पीर’ तथा परमजीत पंडित की पुस्तक ‘जितेन्द्र श्रीवास्तव और उनकी जीवन दृष्टि’ पर विशेष चर्चा हुई। लेखकीय वक्तव्य के पश्चात समीक्षात्मक टिप्पणी प्रध्यापक रुद्रकांत झा, प्राध्यापिका दीक्षा गुप्ता एवं डॉ. विकास कुमार साव ने की।
कुमारसभा पुस्तकालय के अध्यक्ष महावीर प्रसाद बजाज ने इस कार्यक्रम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शताब्दी वर्ष मना चुकी महानगर की प्रतिष्ठित संस्था श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के अपने सारस्वत आयोजनों का ही एक नया आयाम है “एक शाम किताबों के नाम’। महानगर के साहित्यकारों की सद्य प्रकाशित पुस्तकों में किन्ही चयनित तीन रचनाकारों की कृतियों पर चर्चा हेतु इस मंच की स्थापना की गई है। इसमें हिन्दी के अतिरिक्त भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी एवं अन्य भाषाओं की कृतियों पर भी चर्चा होगा ।
कार्यक्रम के आरंभ में सुप्रसिद्ध  गजलकार दुष्यंत कुमार की जन्मशती का स्मरण करते  हुए शायर नन्दलाल रौशन ने  उनकी गजल की सस्वर प्रस्तुति दी । कार्यक्रम का कुशल संचालन किया डॉ. कमल कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन किया कुमारसभा के मंत्री बंशीधर शर्मा ने। इस गोष्ठी में महानगर के कई गणमान्य साहित्यकार तथा विद्वत जन एवं साहित्यप्रेमी सम्मलित हुए जिन्होंने इस सारस्वत आयोजन की सराहना की।
समारोह में सर्वश्री डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी, डॉ. तारा दुगड़, रावेल पुष्प, पवन धेलिया, ब्रह्मानंद बंग, योगेशराज उपाध्याय, सत्यप्रकाश राय, रविप्रताप सिंह, प्रो.मंटू दास,  डॉ  विक्रम साव, नेहा जयसवाल , श्रीमोहन तिवारी, रमाकांत सिन्हा, प्रो. दिव्या प्रसाद, अरविंद तिवारी, वेदप्रकाश गुप्ता, चन्द्रिका प्रसाद अनुरागी, आशाराज कानूनगो, जीवन सिंह, आलोक चौधरी, शैलेष बागड़ी, मनोज काकडा,राजकमल बांगड़, रंजीत  भारती, चन्द्रकुमार जैन, भागीरथ सारस्वत, रामपुकार सिंह एवं अरुण कुमार सिंह प्रभृति विशेष रूप से उपस्थित थे।

भवानीपुर कॉलेज के शिक्षक बने विद्यार्थी 

कोलकाता । जुबली सभागार में आयोजित गत 5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षक विद्यार्थियों के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए। विद्यार्थी सर और मैडम बने और सभी शिक्षक और शिक्षिकाओं की अटेडेंस ली। शास्त्रीय संगीत नृत्य फिल्मों के नए पुराने नृत्य गीत अंग्रेजी हिंदी बांग्ला के गीत और लघु नाटिका प्रस्तुति दी गई जो विद्यार्थियों ने विशेषकर शिक्षक दिवस पर तैयार किए गए। सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम एक से बढ़कर एक रहे। शाहरूख खान की नई पुरानी फिल्मों की प्रेम थीम पर रैंप और नृत्य का शिक्षकों ने आनंद उठाया। इन-एक्ट फ्लेम, क्रिसेंडो, आर्ट इन मी आदि विभिन्न कलेक्टिव के विद्यार्थियों ने विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए ।
इस अवसर पर सभी शिक्षकगणों को उपहार नाश्ता और शुभकामनाएँ कार्ड दिए गए। उत्सव की शुरुआत शास्त्रीय नृत्य से ज्ञान की देवी सरस्वती के आह्वान से हुई। सुबह का उत्सव डॉ. सुमन मुखर्जी के भाषण के साथ संपन्न हुआ। शाम के सत्र में असंख्य छात्रों ने प्रदर्शन करते समय अपने शिक्षकों का उत्साहवर्धन किया और उनके निरंतर मार्गदर्शन के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद दिया। शाम को धन्यवाद ज्ञापन टीआईसी, डॉ. सुभब्रत गंगोपाध्याय, उपाध्यक्ष कला, सुश्री देबजानी गांगुली, डॉ. पिंकी साहा सरदार वी.पी विज्ञान विभाग द्वारा किया गया । पूरे दिन के इस कार्यक्रम में शिक्षकों के चेहरों पर खुशी और प्रसन्नता लाने के लिए विद्यार्थियों ने सराहनीय कार्यक्रम । उनकी उपस्थिति की न केवल सराहना की गई, बल्कि उसका जश्न भी मनाया गया, जो हमारे जीवन पर उनके गहरे प्रभाव के प्रमाण के रूप में काम करता है। अंत में, सभी ने याद किया कि शिक्षक हमारी शैक्षिक यात्रा के मार्गदर्शक सितारे हैं और इस दिन का उत्सव हमारे जीवन में जो प्रकाश लाते हैं, उसके प्रति हमारी असीम कृतज्ञता का एक छोटा सा प्रतीक था। यह एक ऐसा दिन था जब पुरानी यादों को सराहना मिली और शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंध मजबूत हुए। विद्यार्थियों ने शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त किया क्योंकि वे उनके भविष्य को आकार देते हैं और हर दिन को वास्तव में ज्ञानवर्धक अनुभव बनाते हैं।
प्रो दिलीप शाह ने सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव के विषय में मातृ संस्थान पर अपने विचार साझा किए। शिक्षक दिवस दो सत्रों में मनाया गया। इसकी रिपोर्ट रुचिका सचदेव और फोटोग्राफी पारस गुप्ता ने की। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

गुरुजी सी. कैलाश के साथ तनाव से मुक्ति पाने पर विशेष सत्र के आयोजन की घोषणा

कोलकाता । देश की पुण्य भूमि तिरूपति के निवासी गुरुजी श्री सी. कैलाश भारत के कई स्थानों पर तनाव से मुक्ति पाने और इससे हर पल दूर करने के लिए एक विशेष सत्र का आयोजन कर रहे हैं। इस तरह के आयोजन में अपने दैनिक जीवन की गतिविधियों में परिवर्तनकारी परिवर्तन देखने को मिलेगा। इस कार्यशाला में 150 से अधिक प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है। आज के इस प्रगतिशील युग में हमारी जीवनशैली में काम के प्रति प्रतिबद्धताएं, छात्रों, पेशेवरों, व्यक्तियों में पढ़ाई का दबाव, सभी में एक सामान्य बात है। इस तरह के आयोजन में शामिल होने से तनाव को कम करने के साथ अपने जीवन को खुशमिजाज बनाया जा सकता है, जिससे व्यक्ति बेहतर संबंधों के साथ जीवन जी सके। इस इंटरैक्टिव सत्र से लाभ प्राप्त करने के लिए सभी को आमंत्रित किया जाता है। इस कार्यक्रम की मेजबानी और प्रस्तुतीकरण डेविड और गोलियथ शॉर्ट्स द्वारा ट्विस्टेड ट्रुथ्स द्वारा किया जाएगा। कोलकाता शहर के लिए तनाव को कम करने का इस तरह का सत्र का आयोजन करना समय की मांग है।

आगामी 18-19 नवंबर 2023 को कोलकाता में प्रमुख सत्र का आयोजन किया गया है।कोलकाता के सैटरडे क्लब में आयोजित इस आयोजन के कर्टेन रेज़र में इसकी विस्तृत जानकारी दी गई कि, दर्शक तनाव को कैसे कम कर तनाव मुक्त और खुशमिजाज रह सकते हैं। इस कार्यक्रम में शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक तनाव के प्रभावों पर भी ध्यान केंद्रित किया जायेगा। इस सत्र में लोगों के बीच संतुलन, बिना झुके चुनौतियों और दबावों का सामना करने की ताकत भी ऐसे विषय थे जिन पर चर्चा होगी।

इस कार्यक्रम में श्री गुरुजी सी. कैलाश की प्रशिक्षित शिष्या एवं प्रवक्ता सीमा जी का परिचय, गुरुजी के साथ सीमा जी की यात्रा और तनाव प्रबंधन के क्षेत्र में उनके अनुभव पर संक्षिप्त जानकारी दी जाएगी। “प्रकटीकरण की भूमि” के रूप में तिरूपति के महत्व और गुरुजी की शिक्षाओं पर भी प्रकाश डाला जायेगा। गुरुजी सी. कैलाश ने कहा, “आपको ऐसा लग रहा होगा कि आप अपने तनाव के स्तर के को लेकर कुछ नहीं कर सकते, लेकिन जितना आप सोच सकते हैं, उससे कहीं अधिक आपके पास इसे कम करने का नियंत्रण है। यदि आप उच्च स्तर के तनाव के साथ जी रहे हैं, तो आप अपनी संपूर्ण जीवन को को खतरे में डाल रहे हैं। तनाव आपके भावनात्मक संतुलन के साथ-साथ आपके समग्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर कहर बरपाता है। यह आपकी स्पष्ट रूप से सोचने, प्रभावी ढंग से कार्य करने और जीवन का आनंद लेने की क्षमता को कम कर देता है।आपके तनाव के स्तर को प्रबंधित करने के लिए हमारे पास आपके लिए सबसे अच्छा समाधान है।”

बॉर्न 2 डांस डांसर्स पैराडाइज़ भव्य नृत्य प्रतियोगिता का ग्रैंड फिनाले संपन्न

कोलकाता । भारत की सबसे बड़ी डांस चैंपियनशिप – “बॉर्न 2 डांस – डांसर्स पैराडाइज” हाल ही में आयोजित की गयी ।बॉर्न 2 डांस डांसर्स पैराडाइज प्रतियोगिता के ग्रैंड फिनाले को बॉलीवुड कोरियोग्राफर टेरेंस लुईस और डीआईडी फेम सौरभ बंगानी ओर विवेक जायसवाल बतौर निर्णायक उपस्थित थे । इस अवसर पर अभिनेत्री तृणा साहा साहा, अभिनेता नील भट्टाचार्य, डीआईडी फेम कलाकार कमलेश पटेल  के साथ आर जे प्रवीण और समाज की कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद थीं । डीआईडी फेम, सौरभ और विवेक ने कहा, बॉर्न 2 डांस का काफी बेहतरीन तरीके से समापन किया गया है। इस आयोजन में नृत्य कौशल के मामले में हमारे लिए वास्तविक और बेहतरीन प्रतिभा का आकलन करना काफी मुश्किल था। हमने चैंपियन ऑफ चैंपियंस को एक शानदार ट्रॉफी के साथ-साथ एक लाख रुपये की नकद राशि पुरस्कार के तौर पर देकर सम्मानित किया है। चूंकि हम कई रियलिटी शो का हिस्सा रहे हैं, इसलिए हम इसका हिस्सा बनने की कठिनाई को बखूबी समझते हैं। इसलिए, हमने बॉर्न 2 डांस लॉन्च करने का फैसला किया, जहां दुनिया भर के लोग एक डांस प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं और रियलिटी शो का हिस्सा बनने में सक्षम होने के लिए हमारे द्वारा तैयार और प्रशिक्षित होने का मौका पा सकते हैं। इस आयोजन का एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के माध्यम से योग्य नृत्य उम्मीदवारों की प्रतिभा को एक मंच प्रदान करके सामने लाना था। 1 से 3 सितंबर तक चले इस डांस कार्निवल में 5000 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लेकर अपनी प्रतिभा दिखाई । बॉलीवुड कोरियोग्राफर टेरेंस लुईस ने कहा, “बॉर्न 2 डांस, फेम – डीआईडी डबल्स फाइनलिस्ट, सौरभ और विवेक के दिमाग की उपज है, जो खुद कई रियलिटी शो का हिस्सा रहे हैं और उनमें से कई में विजयी भी हुए हैं। बॉर्न 2 डांस न केवल भविष्य के विशेषज्ञ नृत्य कलाकारों को ढूंढेगा और उनके नृत्य को एक अलग स्तर पर ले जाकर इस क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञों के सामने प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान करेगा।

ग्रैंड फिनाले के विजेता: • चैंपियंस ऑफ चैंपियंस – योगी हिमु (डुएट) • सोलो ए (3 वर्ष से 8 वर्ष) – प्रथम – सायन द्युति भौमिक, द्वितीय – आशी हरीश पुनिकर, तृतीय – पहल ठक्कर

• सोलो बी (9 वर्ष से 15 वर्ष) – प्रथम – बलदेव सिंह, द्वितीय – सौम्यजीत पाल, तृतीय – सुभांगी दास

• सोलो सी (16 वर्ष से आगे) – प्रथम – सुशांत सिंह, द्वितीय – सुभाशीष मलिक, तृतीय (टाई) – भूषण टांडेकर + सौविक मंडल

• डुएट (कोई आयु सीमा नहीं) – प्रथम – योगीहिमु, दूसरा – प्यारे मित्र (सत्यम और सिमरन), तीसरा – कुंतल और भास्कर

• ग्रुप (न्यूनतम 3) – प्रथम – द फ्लो इंडिया, दूसरा – द डार्क डायनेस्टी, तीसरा (टाई) – यूडी गैंग + एस्ट्रा डांस एंड फिटनेस सेंटर

• माँ और दादी माँ – प्रथम – काबेरी रॉय, द्वितीय – मुनमुन रॉय, तृतीय – निशा उपाध्याय