बलिया । कम्प्यूटर साइंस में बीटेक युवा किसान ने खेती में नए प्रयोग से सबको चौंका दिया है। जिले में पहली बार बड़े पैमाने पर काला नमक धान उगाकर उन्होंने दूसरों के लिए नजीर पेश की है। जिला मुख्यालय से महज छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित बसंतपुर गांव निवासी दुष्यंत सिंह ने 2017 में कंप्यूटर साइंस से बीटेक किया। कई प्राइवेट कंपनियों में जॉब भी किया, लेकिन इनका मन खेती-किसानी की तरफ आकर्षित हो रहा था। आखिरकार 2018 में सब कुछ छोड़कर गांव लौट आये । प्राकृतिक कृषि प्रेमी सुभाष पालेकर और आनंद से परामर्श लेकर प्रयोग के तौर पर धान की चर्चित प्रजाति काला नमक की खेती किया। यह फसल नई थी, लिहाजा पहले वर्ष बहुत कम मात्रा में काला नमक चावल की खेती किया। लेकिन दुष्यंत सिंह को जब लगा कि उनका यह प्रयोग सफल है तो इस वर्ष 60 बीघे में काला नमक खेती की। इस बार फसल काफी अच्छी है। युवा किसान दुष्यंत सिंह की मेहनत को देख अन्य युवा भी खेती की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।
फसल में करते हैं जीवामृत का इस्तेमाल
किसान दुष्यंत ने बताया कि इस फसल को उगाने में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसको उगाने के लिए जीवामृत तैयार किया जाता है जो गाय के मूत्र, गोबर, बेसन और गुड़ से तैयार होता है। कीटनाशक के लिए जमीन के दो फीट नीचे की काली मिट्टी और जल का प्रयोग किया जाता है। उन्होंने कहा कि काला नमक एक सुगंधित चावल है। यह काफी स्वास्थ्यवर्धक भी है जो इस जिले के लिए बहुत ही खास है। क्योंकि जनपद में इसकी खेती व्यापक पैमाने पर नहीं होती।
घर बैठे धान बेचते हैं युवा किसान दुष्यंत
युवा किसान दुष्यंत बताते हैं कि इस बार 60 बीघा में काला नमक धान की खेती की है। एक बीघा की खेती में लगभग चार से पांच हजार तक की लागत आयी है। इससे प्रति बीघा तकरीबन 60 हजार तक का फायदा होने की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि जैसे ही मेरा चावल तैयार होगा, इसके लिए ऑर्डर मिलने शुरू हो जाएंगे। ऑर्डर आने के बाद मैं ट्रकों के जरिए भेज दूंगा। कर्नाटक और तमिलनाडु के कुछ स्टार्टअप्स से ऑर्डर मिलने भी लगे हैं। बताया कि ऑर्डर प्राप्त करने के लिए मैं इंटरनेट का भी सहारा लेता हूं। ऑनलाइन जाकर ऑर्गेनिक स्टार्टअप्स के नम्बर निकालकर सम्पर्क करता हूं। जिसका मुझे काफी फायदा मिलता है। यही नहीं प्राकृतिक खेती के लिए देश भर में मशहूर सुभाष पालेकर के नेटवर्क से जुड़े लोगों के भी सम्पर्क में हूं। दुष्यंत ने बताया कि राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश को भी पिछले साल अपने खेत में उगाई काला नमक चावल भेंट स्वरूप दिया है। उन्होंने काफी सराहना की जो मेरे लिए प्रेरणा है।
बीटेक युवा किसान ने काला नमक की खेती कर पेश की नजीर
इस तरह सप्ताह भर से ज्यादा चलेंगी फ्रिज में रखी सब्जियां
हर रोज सब्जी मार्केट से खरीदकर लाने में काफी समय खर्च होता है। लेकिन उससे भी ज्यादा मेहनत वाला काम है सब्जी को फ्रिज में स्टोर करके रखना। सब्जियों को लंबे समय तक फ्रेश बनाकर रखना जरूरी है नहीं तो सब्जियों के पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं लेकिन फ्रिज में अगर आप सब्जियों को डायरेक्ट रख देंगी तो भी उनके खराब हो जाने का डर रहता है। इसलिए स्टोरेज टिप्स की मदद से फ्रिज में सब्जियों को हफ्तेभर से ज्यादा समय तक फ्रेश रखा जा सकता है।
सब्जियों को साफ करके रखें
सब्जियों को फ्रिज में रखने से पहले अच्छी तरह से साफ करके सुखा लें। इससे ना केवल सब्जियों पर जमा बैक्टीरिया साफ हो जाएंगे। बल्कि इन बैक्टीरिया की वजह से सब्जियों के खराब होने का डर भी कम हो जाता है।
एयरटाइट कंटेनर का करें इस्तेमाल
हरी धनिया और हरे प्याज को धोकर अच्छी तरह से एयरटाइट कंटेनर में भरकर रख दें। साथ ही ध्यान रखें कि इस कंटेनर में हवा निकलने की भी थोड़ी जगह हो।
पेपर टॉवेल में लपेटकर रखें
बींस, ब्रोकली जैसी सब्जियों को पेपर टॉवेल में लपेटकर रखने से इनमे मॉइश्चर नहीं पैदा होता और ये फ्रिज में फ्रेश बनी रहती हैं। इसके अलावा पालक और पत्तेदार सब्जियों को पेपर टॉवेल में लपेटकर रखें।
लौकी-कद्दू ऐसे करें स्टोर
लौकी-कद्दू जैसी सब्जियों को स्टोर करने के लिए फ्रिज के सबसे निचले डार्क साइड वाले हिस्से को इस्तेमाल करें। जिससे इन्हें ज्यादा ठंड ना लगे और ये खराब ना होकर फ्रेश बनी रहें।
सब्जियों को काटकर फ्रिज में ना रखें
गाजर, आलू जैसी जड़ वाली सब्जियों को फ्रिज में काटकर ना रखें। इससे वो जल्दी खराब हो जाती है। आलू को फ्रिज में रखने की गलती ना करें।
जांच करते रहें सब्जियां
सब्जियों को पॉलीबैग या एयरटाइट कंटेनर में करके रखे हैं तो इन्हें एक दो दिन के अंतराल पर चेक करते रहें। अगर इनमे मॉइश्चर इकट्ठा हो रहा है तो बाहर निकालकर अच्छी तरह से सुखाकर फिर से रख दें। इससे सब्जियां हफ्तेभर से ज्यादा समय तक फ्रेश बनी रहेंगी।
इन सब्जियों को ना करें फ्रिज में स्टोर
आलू, प्याज, लहसुन, अदरक को फ्रिज में स्टोर करके ना रखें। ये सब्जियां मॉइश्चर की वजह से खराब हो जाती हैं।
जन्म प्रमाणपत्र बना एकल दस्तावेज
नयी दिल्ली । देश भर में 1 अक्टूबर 2023 से जन्म प्रमाणपत्र यानी जन्म प्रमाणपत्र यानी बर्थ सर्टिफिकेट सिंगल डॉक्यूमेंट यानी एकल दस्तावेज बन चुका है। ऐसे में आपके कई कामों के लिए बर्थ सर्टिफिकेट का होना जरूरी हो गया है। ज्यादातर जगहों पर आपको किसी भी दूसरे दस्तावेज की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर आपके पास बर्थ सर्टिफिकेट होगा तो आप आधार कार्ड से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस जैसे कई दस्तावेज भी आसानी से बनवा सकेंगे। इसके अलावा कई अन्य कामों के लिए भी बर्थ सर्टिफिकेट एक जरूरी दस्तावेज बन चुका है।
नहीं होगी किसी दूसरे दस्तावेज की जरूरत
देश में अभी तक आधार कार्ड को एक जरूरी दस्तावेज माना जाता था, जिसके बिना किसी काम को करवाना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, अब आधार कार्ड से भी ज्यादा जरूरी दस्तावेज बर्थ सर्टिफिकेट बन चुका है। राष्ट्रपति से जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 2023 को मंजूरी मिल गई है, जिसके बाद बर्थ सर्टिफिकेट भी एक जरूरी दस्तावेज बन चुका है। इसका इस्तेमाल आधार कार्ड को बनवाने के लिए भी जरूरी हो गया है। आधार कार्ड बनवाने , वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने शादी के पंजीकरण , शिक्षण संस्थान में प्रवेश और सरकारी नौकरी पाने के लिए बर्थ सर्टिफिकेट सिंगल डॉक्यूमेंट के तौर पर मान्य हो गया है।
जन्म प्रमाणपत्र क्या है?
जन्म प्रमाणपत्र में बच्चे के जन्म स्थान जन्मतिथि ,लिंग, माता-पिता का नाम आदि अन्य जरूरी जानकारी दर्ज की जाती है। इस दस्तावेज के जरिए बच्चे की पहचान के साथ माता-पिता की डिटेल्स भी मिलती है, जो उम्रभर काम आने वाला दस्तावेज होता है। अब आधार कार्ड होने पर भी जन्म प्रमाणपत्र एक जरूरी दस्तावेज हो गया है।
ग्लोबल इंडियन अवार्ड पाने वाली पहली महिला बनीं सुधा मूर्ति
टोरंटो । इंफोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति की पत्नी प्रसिद्ध लेखिका सुधा मूर्ति को इंडो-कैनेडियन समारोह में कनाडा इंडिया फाउंडेशन द्वारा ‘ग्लोबल इंडियन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया । ग्लोबल इंडियन अवार्ड हर साल एक प्रमुख भारतीय को दिया जाता है जिसने अपने चुने हुए क्षेत्र में एक प्रमुख छाप छोड़ी है. अवार्ड की राशि 50,000 डॉलर है । कनाडा इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष सतीश ठक्कर ने कहा, ‘हमें सुधा मूर्ति को ग्लोबल इंडियन अवार्ड प्रदान करते हुए बहुत खुशी हो रही है । उन्होंने अपना पूरा करियर आने वाली पीढ़ियों के लिए उनके द्वारा चुने गए क्षेत्र में सफलता पाने का मार्ग प्रशस्त करने में बिताया है और वह समाज को कुछ वापस देने के लिए उत्साहित हैं ।’ भारतीय उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा से पुरस्कार स्वीकार करते हुए सुधा मूर्ति ने कहा, ‘आपके देश से यह पुरस्कार पाना मेरे लिए सम्मान की बात है । ‘
इस पुरस्कार के लिए उन्हें चुनने के लिए कनाडा इंडिया फाउंडेशन (सीआईएफ) को धन्यवाद देते हुए मूर्ति ने कहा, ‘सीआईएफ महाभारत में कृष्ण की तरह है । कृष्ण देवकी के भी पुत्र हैं और यशोदा के भी. देवकी उनको जन्म देने वाली मां थीं और यशोदा ने उनका पालन-पोषण किया. आप भारत में पैदा हुए हैं लेकिन यहीं बसे हैं, यह यशोदा है और आपकी माता भारत है ।’ दोनों देशों के बीच एक सेतु के रूप में भारत-कनाडाई प्रवासियों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा, ‘आप एक अलग भूमि में भारतीय संस्कृति के वाहक हैं । कृपया इसे जारी रखें ।’ जैसा कि उनके पति को भी 2014 में यही पुरस्कार दिया गया था, सुधा मूर्ति ने हंसी के बीच कहा, ‘इस पुरस्कार के बारे में एक मजेदार बात है क्योंकि नारायण मूर्ति को भी यह पुरस्कार 2014 में मिला था और मुझे यह 2023 में मिला है. इसलिए पुरस्कार प्राप्त करने वाले हम पहले जोड़े हैं ।’
उन्होंने पुरस्कार राशि द फील्ड इंस्टीट्यूट (टोरंटो विश्वविद्यालय) को दान कर दी जो गणित और कई विषयों में सहयोग, नवाचार और सीखने को मजबूत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है । टोरंटो उत्सव कार्यक्रम में सुधा मूर्ति के साथ उनके दामाद और ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऋषि सुनक के माता-पिता भी थे ।
असम के समर्पण लामा ने जीती बेस्ट डांसर सीजन 3 की ट्रॉफी
कोलकाता । सोनी टीवी के डांस रियलिटी शो इंडियाज बेस्ट डांसर सीजन 3 की ट्रॉफी समर्पण लामा ने अपने नाम की है । आपको बता दें, भले ही आईबीडी के इस विजेता का जन्म असम में हुआ है । इंडियाज बेस्ट डांसर में शामिल होने से पहले समर्पण पुणे में काम करते थे । समर्पण के पिता 17 सालों से कतार में काम कर रहे हैं । उनका परिवार असम में रहता है । समर्पण ने इस तरह की कई बातों से जजों को खूब हसाया, लेकिन अपने डांस पर भी उन्होंने खूब मेहनत ली । उनके पहले ही प्रदर्शन को देख टेरेंस लुईस इतने प्रभावित हो गए थे कि उन्होंने अपनी सोने की चैन समर्पण को तोहफे में दी थी. जजों के साथ साथ जनता के सबसे ज्यादा वोट्स पाकर समर्पण इस शो के विजेता बन गए ।
रसोई में तिलचट्टे कर रहे हैं अगर परेशान तो यह रहा समाधान
तिलचट्टे से निपटना मुश्किल हो सकता है लेकिन कुछ आसान समाधान हैं जिन्हें आप आजमा सकते हैं। कई सामग्रियां अपनी तेज गंध या प्राकृतिक गुणों के कारण कॉकरोच को रोक सकती हैं। इन 7 सरल चीजों का उपयोग करें, जो कॉकरोच फ्री घर के लिए प्राकृतिक रूप में कार्य करते हैं।
1 तेजपत्ता: तेज पत्ते से ऐसी गंध निकलती है जो तिलचट्टे को नापसंद होती है। इन कीटों को दूर रखने के लिए उन्हें अलमारियां, दराजों और पेंट्री में रखें।
2 सिरका: सिरके की तेज गंध तिलचट्टे को भगाने के रूप में काम करती है। सफेद सिरके और पानी को बराबर मात्रा में मिलाएं। फिर इस घोल का उपयोग सतहों को साफ करने के लिए करें। रसोई में इसका इस्तेमाल जरूर करें।
3 लहसुन: लहसुन की तेज गंध तिलचट्टे को पसंद नहीं होती है। उन जगहों पर लहसुन की कलियां या कीमा बनाया हुआ लहसुन डालें, जहां ये कीड़े छिपे हों।
4 नींबू: सतहों पर नींबू की सुगंध वाले क्लीनर का प्रयोग करें या नींबू के छिलकों को कोनों और अलमारियां में रखें।
5 बेकिंग सोडा: बेकिंग सोडा और चीनी को बराबर मात्रा में मिला लें। चीनी कॉकरोचों को आकर्षित करती है जबकि बेकिंग सोडा उनकी पाचन प्रक्रिया को बाधित करता है।
6 सुगन्धित तेल: पेपरमिंट, यूकेलिप्टस और लैवेंडर जैसे इसेंशियल ऑयल कॉकरोचों को दूर रखते हैं। पानी में कुछ बूंदें मिलाकर एक स्प्रे बना लें। इसका उपयोग उन्हें भगाने के लिए करें।
7 दालचीनी: दालचीनी की तेज खुशबू तिलचट्टे को पसंद नहीं होती है। उन क्षेत्रों में दालचीनी पाउडर छिड़कें, जहां से वे प्रवेश करते हैं या छिपते हैं।
14 मिनट में साफ़ कर दी गईं कई वंदे भारत ट्रेनें, बन गया अनोखा रिकॉर्ड
नयी दिल्ली । गत एक अक्टूबर से देश में स्वच्छता अभियान की शुरुआत हुई है। देशभर में सफाई अभियान चलाये गए। अभी मुहीम की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में एक पार्क की सफाई करके की। इसके बाद भारतीय रेलवे ने एक अनोखा रिकॉर्ड कायम किया। दरअसल भारतीय रेलवे ने ’14 मिनट चमत्कार’ योजना शुरू की। इसके तहत पूरे देश में वंदे भारत ट्रेनों को 14 मिनट के रिकॉर्ड समय में एक साथ साफ किया गया।
रेलवे के मध्य रेल संभाग ने पर सोलापुर-मुंबई, मुंबई-साईनगर शिरडी और बिलासपुर-नागपुर वंदे भारत ट्रेनों की क्रमश सीएसएमटी, साईनगर शिरडी और नागपुर स्टेशनों पर 14 मिनट में सफाई की गई। रेलवे ने सीएसएमटी में सोलापुर-सीएसएमटी-सोलापुर वंदे भारत एक्सप्रेस, साईंनगर शिरडी में सीएसएमटी-साईनगर शिरडी-सीएसएमटी वंदे भारत एक्सप्रेस और नागपुर में बिलासपुर-नागपुर-बिलासपुर वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनों को 14 मिनट में साफ़ किया।
14 मिनट में साफ़ हुई ट्रेन
सीएसएमटी के प्लेटफॉर्म नंबर 8 पर ट्रेन के आगमन और सभी यात्रियों के उतरने के बाद 12.42 बजे सफाई अभियान शुरू हुआ। इसे रिकॉर्ड 14 मिनट के भीतर 12.56 बजे पूरा किया गया। इन ट्रेनों को तीन टीमों ने मिलकर साफ़ किया। इस दौरान इन्होंने शौचालयों, रैक, पैनल, सीटों, फर्श और कोच के बाहरी हिस्से सहित अंदरूनी हिस्सों की गहरी सफाई की। 8 कर्मचारियों वाली टीम ए ने शौचालय में पैन सीट, ग्लास आदि की सफाई की और ट्रेन में से कचरे को साफ़ किया।
सफाई के लिए बनाई गई थी 32 लोगों की टीम
इसके अलावा 32 कर्मचारियों वाली टीम बी ने कोचों में सीटों की सफाई, स्नैक टेबल, साइड पैनल की सफाई और कोच के फर्श की सफाई की। इसके अलावा 4 कर्मचारियों वाली टीम सी ने सभी कोचों की खिड़कियों की सफाई की। यह सब 14 मिनट के रिकॉर्ड समय में किया गया। इस दौरान बैग में कचरा इकट्ठा करने के लिए 2 मिनट, सीटों और स्नैक टेबल की सफाई के लिए 3 मिनट, पैनल और कोच की सफाई के लिए 3 मिनट और कोच के फर्श की सफाई के लिए 6 मिनट रखे गये थे ।
जानिए कॉरपोरेट एफ डी के बारे में
भारत में, फिक्स्ड डिपॉजिट हमेशा से निवेश का पसंदीदा प्रकार रहा है। यात्रा के लिए बचत से लेकर सेवानिवृत्ति के लिए बचत तक, वे सर्व-उद्देश्यीय समाधान रहे हैं। अब, तमाम पक्षपात के बावजूद, फिक्स्ड डिपॉजिट दीर्घकालिक लक्ष्यों के लिए उपयुक्त नहीं है। लेकिन, यदि लक्ष्य अल्पावधि के लिए है या ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए इंतजार नहीं किया जा सकता है, तो ऐसे मामलों में एफडी एक अच्छा विकल्प हो सकता है। और, ऐसा केवल इसलिए है क्योंकि यह गारंटीशुदा रिटर्न के आश्वासन के साथ आता है।
हालाँकि, यदि आप बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की गिरती ब्याज दरों से चिंतित हैं, तो आपके पास कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट का विकल्प है। इस ब्लॉग में, हम कॉर्पोरेट एफडी क्या है, बैंक एफडी के साथ इसकी समानताएं और इसके फायदों के बारे में विस्तार से बताएंगे। हम कॉरपोरेट एफडी से जुड़े जोखिमों के बारे में भी बात करेंगे।
सबसे पहले, आइए समझें कि कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट क्या है
बैंकों की तरह, कई कंपनियों और एनबीएफसी को भी निर्धारित ब्याज दर पर एक निश्चित अवधि के लिए जमा एकत्र करने की अनुमति है। ऐसी जमा राशि को कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट कहा जाता है। बैंकों की तरह ही वे गारंटीशुदा रिटर्न और कार्यकाल चुनने के लचीलेपन के आश्वासन के साथ आते हैं। साथ ही, कॉर्पोरेट एफडी बैंक एफडी की तुलना में अधिक ब्याज दर प्रदान करते हैं।
आइए अब कॉरपोरेट एफडी और बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट में समानताएं देखें
नंबर 1: कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट गारंटीशुदा रिटर्न प्रदान करते हैं
कॉरपोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की तरह ये भी गारंटीशुदा रिटर्न का आश्वासन देते हैं। मान लीजिए कि आपने कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट में 1 लाख रुपये का निवेश किया है और संबंधित एनबीएफसी/कॉर्पोरेट आपको प्रति वर्ष 7 प्रतिशत ब्याज देने का वादा करता है। फिर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाजार कैसे चलता है या ब्याज दरों में कैसे उतार-चढ़ाव होता है, साल के अंत में आपको वादे के मुताबिक 1.07 लाख रुपये मिलेंगे।
साथ ही, निवेश के समय ही आपको परिपक्वता पर मिलने वाली सटीक राशि का पता चल जाता है। यह एक बड़ा लाभ आपको अपनी भविष्य की वित्तीय योजनाओं को और अधिक आत्मविश्वास से बनाने में मदद करता है। आप फिक्स्ड डिपॉजिट कैलकुलेटर का उपयोग करके अपने एफडी रिटर्न की जांच कर सकते हैं और अपनी संभावित कमाई का अनुमान लगा सकते हैं
नंबर 2: वरिष्ठ नागरिकों के लिए ऊंची दरें
अधिकांश बैंक जमाओं की तरह, अधिकांश कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट वरिष्ठ नागरिकों के लिए थोड़ी अधिक ब्याज दर प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक गैर-वरिष्ठ नागरिक कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट से 6 प्रतिशत रिटर्न अर्जित करता है, तो आमतौर पर एक वरिष्ठ नागरिक को उसी निवेश पर 6+ प्रतिशत मिलेगा।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए जो सेवानिवृत्त हैं और आय के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट रिटर्न पर निर्भर हैं, यह एक अतिरिक्त लाभ है।
नंबर 3: कार्यकाल चुनने की लचीलापन:
कॉरपोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट की अवधि आमतौर पर एक से पांच साल के बीच होती है। और आपके पास उस सीमा के भीतर कोई भी अवधि चुनने की सुविधा है। इसलिए यदि आपका लक्ष्य एक वर्ष दूर है, तो आप एक वर्ष के लिए निवेश कर सकते हैं; यदि यह 2.5 वर्ष दूर है, तो आप तदनुसार अपना कार्यकाल चुन सकते हैं। हालाँकि, ब्याज दर तदनुसार अलग-अलग होगी, अर्थात अवधि जितनी अधिक होगी, ब्याज दर उतनी ही अधिक होगी।
अब जब हमने कॉरपोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक एफडी के बीच समानताएं देख ली हैं, तो आइए बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की तुलना में इसके फायदों पर नजर डालें।
बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की तुलना में कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट के 2 फायदे यहां दिए गए हैं
#1: कॉर्पोरेट एफडी की ब्याज दरें बैंक एफडी से अधिक हैं:
आरबीआई दिशानिर्देशों के अनुसार, सभी फिक्स्ड डिपॉजिट पर न्यूनतम 3 महीने की जुर्माना अवधि होनी चाहिए। यानी अगर आप पहले तीन महीने के भीतर अपना पैसा निकालते हैं तो आपको जल्दी निकासी पर जुर्माना देना होगा। इसके अलावा, यह बैंक/एनबीएफसी/कंपनी पर निर्भर है कि उसकी जुर्माना अवधि कितनी लंबी होगी। कॉरपोरेट एफडी के लिए जुर्माने की अवधि आमतौर पर बैंक एफडी से कम होती है। उदाहरण के लिए, एसबीआई के मामले में यदि आप परिपक्वता अवधि से पहले कभी भी अपना पैसा निकालने का निर्णय लेते हैं तो आपको जुर्माना देना होगा।
क्या कॉर्पोरेट एफडी में अधिक जोखिम होता है?
जब कॉरपोरेट एफडी में निवेश की बात आती है, तो बहुत से लोग डरते हैं कि चूंकि ये जमा असुरक्षित हैं, इसलिए कंपनी के डिफॉल्ट करने पर उन्हें पैसे का नुकसान हो सकता है। यहां यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सभी एनबीएफसी/कंपनियां जो जमा एकत्र करना चाहती हैं, उन्हें आरबीआई/कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) द्वारा निर्धारित कड़े नियमों और दिशानिर्देशों का पालन करना होगा। इसलिए, हालांकि भारत में 10,000 से अधिक एनबीएफसी हैं, उनमें से केवल मुट्ठी भर ही जनता से जमा स्वीकार कर सकते हैं। ऐसे उपाय यह सुनिश्चित करते हैं कि जब कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट में पैसा लगाने की बात आती है तो निवेशकों के लिए जोखिम न्यूनतम हो।
आइए इन विनियमों और दिशानिर्देशों को अधिक विस्तार से देखें।
कौन सी कंपनियां/एनबीएफसी जमा एकत्र कर सकती हैं?
जब एनबीएफसी को जनता से जमा एकत्र करने की अनुमति देने की बात आती है तो आरबीआई बेहद सतर्क रहता है। सबसे पहले, आरबीआई के साथ एनबीएफसी के रूप में पंजीकृत होना पर्याप्त नहीं है, जमा स्वीकार करने के लिए उनके पास वैध लाइसेंस होना चाहिए। फिर, कंपनी जिस वित्तीय संपत्ति का प्रबंधन कर रही है वह कम से कम 5,000 करोड़ रुपये होनी चाहिए। इनके अलावा एनबीएफसी को जनता से जमा स्वीकार करने के लिए कुछ अन्य दिशानिर्देशों का भी पालन करना होगा। और, वे यहाँ हैं:
फिक्स्ड डिपॉजिट लॉन्च करने के लिए एनबीएफसी को आरबीआई के दिशानिर्देशों का पालन करना होगा
- फिक्स्ड डिपॉजिट की अवधि न्यूनतम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष होनी चाहिए।
- एक एनबीएफसी जो कुल जमा एकत्र कर सकती है वह एक अनुमेय सीमा तक हो सकती है, जो अलग-अलग एनबीएफसी के लिए अलग-अलग होती है।
- फिक्स्ड डिपॉजिट के लिए ब्याज दर आरबीआई द्वारा निर्धारित दर से अधिक नहीं हो सकती है, जिसे समय-समय पर संशोधित किया जाता है
- फिक्स्ड डिपॉजिट के संबंध में सभी प्रासंगिक जानकारी आरबीआई को बतानी होगी
- वे जमाकर्ता को कोई अतिरिक्त लाभ या उपहार नहीं दे सकते
इस बीच, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) से जमा एकत्र करने के लिए विशिष्ट परमिट या लाइसेंस वाली आवास वित्त कंपनियां केवल जनता से जमा स्वीकार कर सकती हैं, लेकिन एक निश्चित सीमा तक। आरबीआई या एमसीए से आवश्यक लाइसेंस के बिना जनता से जमा एकत्र करना एक संघीय अपराध है।
लेकिन वह सब नहीं है। एनबीएफसी/कंपनियों को जमा एकत्र करने के लिए न्यूनतम क्रेडिट रेटिंग बनाए रखनी होगी
क्रिसिल और आईसीआरए जैसी रेटिंग एजेंसियां उन कंपनियों को रेटिंग देती हैं जो जनता से जमा एकत्र कर सकती हैं। ये एजेंसियां कंपनी के ट्रैक रिकॉर्ड को देखती हैं, जमा इकट्ठा करते समय निवेशकों को ब्याज दर और पुनर्भुगतान कार्यक्रम के बारे में बताया जाता है या नहीं आदि। वे प्रत्येक मानदंड पर कितने मजबूत हैं, इसके आधार पर कंपनियों को एएए, एए जैसी रेटिंग दी जाती है। , बीबीबी, इत्यादि। एएए उच्चतम रेटिंग है और यह दर्शाता है कि कंपनी के पास एक ठोस बैलेंस शीट है। एनबीएफसी/कंपनियों को जनता से जमा एकत्र करने के लिए न्यूनतम बीबीबी रेटिंग बनाए रखनी होगी। उदाहरण के लिए, बजाज फाइनेंस और एचडीएफसी दो एएए कंपनियां हैं जो जनता से जमा एकत्र कर सकती हैं। और इन वर्षों में, उनके फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों को समय पर भुगतान प्राप्त हुआ और उनके पास ब्याज दरों और भुगतान अनुसूची के बारे में हमेशा स्पष्टता थी। इसलिए, डिफ़ॉल्ट के जोखिम को कम करने के लिए, किसी को एएए-रेटेड कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट पर बने रहना चाहिए। आरबीआई और एमसीए के ये उपाय सुनिश्चित करते हैं कि जब कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश की बात आती है तो आपका निवेश सुरक्षित है।
जमीनी स्तर: इसलिए यदि आपका कोई लक्ष्य है जिसे 1 से 5 साल के भीतर हासिल करना है, तो कॉर्पोरेट फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करें। यह आपको एक निश्चित आय साधन की सुरक्षा प्रदान करता है और बैंक एफडी की तुलना में अधिक रिटर्न भी प्रदान करता है।
दो युवाओं ने कबाड़ से लिखी कामयाबी की कहानी
भोपाल । आपने शायद ही कामयाबी की ऐसी कोई कहानी सुनी जिसकी शुरुआत कूड़े से हुई हो। ये ऐसे दो युवाओं की कहानी है जिनके पास इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस भरने लायक पैसे भी नहीं होते थे । परिवार ने संघर्षों से जूझकर उन्हें इंजीनियर बनाया, लेकिन वे ‘कबाड़ीवाला’ बन गए । आज उनके स्टार्टअप का सालाना टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से ज्यादा है। वे खुद तो आथिक रूप से समृद्ध हैं ही, उनकी कंपनी 300 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी उपलब्ध करा रही है।
कूड़े से लिखी कामयाबी की कहानी
ये कहानी भोपाल के स्क्रैप बेस्ड स्टार्टअप ‘द कबाड़ीवाला’ की है। कूड़े से हुई शुरुआत इतनी कामयाब हुई कि कुछ महीने पहले उन्हें मुंबई के एक इन्वेस्टर कंपनी से 15 करोड़ रुपये की बड़ी फंडिंग मिली है। एमपी के इतिहास में यह पहला मौका है जब किसी स्क्रैप बिजनेस स्टार्टअप को इतनी बड़ी फंडिंग मिली । इसकी शुरुआत भोपाल के आईटी इंजीनियर अनुराग असाटी और रविंद्र रघुवंशी ने की है, जिन्होंने ‘द कबाड़ीवाला’ के जरिए युवाओं के लिए एक उदाहरण गए है। कामयाबी की ऐसी मिसाल पेश की है जो आने वाले समय में युवाओं के लिए प्रेरणा बन सकती है।
फीस भरने के नहीं थे पैसे
अनुराग असाटी के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। वे आठवीं कक्षा में थे, जब मां का निधन हो गया। पापा जनरल स्टोर में काम करते थे। उन्होंने भोपाल के ओरिएंटल कॉलेज में इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन लिया। ऐसा समय भी आया जब उनके पास फीस भरने तक के लिए पैसे नहीं थे।
ऐसे मिला द कबाड़ीवाला का विचार
एक दिन में कॉलेज के बाहर बैठे थे, तभी अचानक कबाड़ी का ठेला कॉलेज के बाहर से निकला। यह देखकर उनके दिमाग में आया कि लोगों को कबाड़ बेचने के लिए भी इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने सोचा कि कोई ऐसा एप हो जिससे लोगों को कबाड़ीवाले के लिए इंतजार न करना पड़े । उनके पास यह सुविधा हो कि वे फोन लगाकर कबाड़ीवाले को घर बुलाएं। उन्होंने इसके लिए एक वेबसाइट तैयार की और एक्शन मोड में आ गए।
खुद घरों से उठाया कबाड़
अनुराग और रविन्द्र ने जब इसकी शुरुआत की तो दो साल तक खुद घरों से आने वाली बुकिंग पर कबाड़ उठाते थे। उनके घर के लोग भी इस बारे में कुछ नहीं जानते थे। जब काम आगे बढ़ा और प्रोग्रेस होने लगी तो उन्होंने घर के लोगों को इस बारे में बताया । उन्हें समझाया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब 3% हिस्सा कबाड़ का है। इसके बाद फैमिली ने भी उन्हें सपोर्ट किया। फिर उन्होंने ‘द कबाड़ीवाला’ के नाम से स्टार्टअप लॉन्च किया।
दोस्त और परिवार से उधार लिए पैसे
इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करने के बाद परिवार का खर्च चलाने के लिए नौकरी की। फिर 2015 में नौकरी छोड़ दी। शुरुआत में परिवार और दोस्तों की मदद से 25 लाख रुपए का निवेश किया अपने बिजनेस आइडिया से संबंधित प्रेजेंटेशन तैयार कर इन्वेस्टर को फंडिंग करने के लिए राजी किया । 2019 में एंजल इन्वेस्टर ने तीन करोड़ रुपये निवेश किए थे। अनुराग ने बताया कि उनके स्टार्टअप के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित केंद्रीय गृह मंत्री गिरिराज सिंह भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।
आज 10 करोड़ का सालाना टर्नओवर
अनुराग ने बताया कि स्टार्टअप की शुरुआत के बाद उन्हें कई उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। भोपाल के लोग कबाड़ीवाले को लेकर अच्छा भाव नहीं रखते। वे उन्हें घृणा के नजरिए से देखते हैं। लेकिन आज “द कबाड़ीवाला” का सालाना टर्नओवर 10 करोड़ से अधिक है। देश के 5 शहरों भोपाल, इंदौर, लखनऊ, रायपुर और नागपुर में यह चल रहा है। करीब 300 लोग इसमें काम कर रहे हैं। अनुराग ने बताया कि आगे चलकर वे 30 से 40 शहरों में इसे शुरू करने की योजना बना रहे हैं ।
लाल बहादुर शास्त्री जयंती विशेष : इस तरह बने शास्त्री जी हमारे प्रधानमंत्री
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 यूपी के मुगलसराय में हुआ था। लाल बहादुर शास्त्री गांधी से काफी प्रभावित थे। लाल बहादुर शास्त्री का पार्टी में शीर्ष नेताओं के बीच प्रमुखता से छा जाना ये कोई अचानक नहीं हुआ थी बल्कि इसके पीछे कई कारण थे। आइए जानते हैं कि लाल बहादुर शास्त्री कैसे प्रधानमंत्री बने थे?
ये बात है साल 1964 की, जब 27 मई को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का निधन हो गया, तब देश में उनके उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण बहस चल रही थी। देश की नई व्यवस्था में उत्तराधिकारी पहले से तय करने की कोई परंपरा या सिद्धांत नहीं था। ऐसे में देश के दूसरे प्रधानमंत्री बनने के कई दावेदार खड़े हो गए थे। बता दें कि शास्त्री का प्रधानमंत्री बनना संयोग तो कहा जा सकता, लेकिन नेहरू का उत्तराधिकारी बनना बिल्कुल स्वाभाविक भी नहीं था। ऐसा कहा जाता है कि नेहरू ने अपने अंतिम दिनों में प्रधानमंत्री रहते हुए शास्त्री को अपनी काफी जिम्मेदारियां देनी शुरू कर दीं थीं, जिससे पार्टी में ये संदेश जाने लगा था कि वो उन्हें अगले प्रधानमंत्री पद के रूप में तैयार कर रहे हैं।
कौन-कौन थे दावेदार
लेकिन ये राह इतनी आसान थोड़ी थी, उस समय प्रधानमंत्री पद की दौड़ में गुलजारी लाल नंदा, जय प्रकाश नारायाण और मोरारजी देसाई शामिल थे, जो शास्त्री को कड़ी टक्कर दे रहे थे। उस समय गुलजारी लाल नंदा थे तत्कालीन गृह मंत्री थे और इस लिहाज से मंत्रिमंडल में भी वो दूसरे स्थान पर थे। वहीं, मोरारजी देसाई भी थे, जिनका मंत्रिमंडल के बाहर बहुत गहरी छाप थी और जय प्रकाश नारायण भी अपने करिश्माई व्यक्तित्व के लिए शुमार थे। नेहरू के बाद ऐसे तो बहुत से नाम आगे आए लेकिन धीरे-धीरे बात मोरारजी देसाई और शास्त्री पर आकर रूक गई। उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष कामराज की सबसे बड़ी चिंता थी पार्टी की एकता को बनाए रखना।
शास्त्री जी ऐसे बने प्रधानमंत्री
शास्त्री और मोरारजी के बीच शास्त्री का पलड़ा भारी होने की दो वजहें थी, एक तो तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष कामराज मोरारजी देसाई के खिलाफ ही थे। दूसरा अखबारों में एक खबर छपी कि मोरारजी देसाई के पक्ष में उनके समर्थक दावेदारी कर रहे हैं। इससे पार्टी में यह संदेश गया कि मोरारजी पीएम बनेंगे तो पार्टी के नेता नाराज हो सकते हैं, यही खबर ही मोररजी के खिलाफ गई और शास्त्री के नाम पर मुहर लग गई। फिर 31 मई 1964 को लाल बहादुर शास्त्री के रूप में देश को दूसरा प्रधानमंत्री मिल गया। खास बात यह थी कि उस दौरान खुद शास्त्री भी अपने आपको पीएम पद का दावेदार नहीं मानते थे उनका मानना था कि नेहरू का उत्तराधिकारी इंदिरा या फिर जेपी नारायण हो सकते हैं। पर इतिहास को कुछ और मंजूर था।
(साभार – इंडिया टीवी)




