Sunday, July 5, 2026
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काशी शिक्षा निकेतन ने धूमधाम से मनाया स्वर्ण जयंती समारोह

कोलकाता । गत 10 अक्टूबर को ‘काशी शिक्षा निकेतन’ ने अपनी स्थापना के 50वीं जयंती के उपलक्ष्य में स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन बड़े ही धूमधाम से विद्यालय प्रांगण में आयोजित किया। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में कोलकाता प्राथमिक विद्यालय पर्षद के सभापति कार्तिकचंद्र मन्ना और चक्र-2 की सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल श्वाति घोष उपस्थित थी। विद्यालय के शिक्षक प्रभारी विधानचंद्र यादव ने बताया कि यह विद्यालय 1974 में स्थापित हुआ था और तब से लगातार यह गरीब तथा मध्यवर्गीय परिवार के बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रहा है।

इस अवसर पर विद्यालय के भूतपूर्व अध्यापक बी. एन. त्रिपाठी और शिवशंकर शर्मा को स्मृति चिह्न, शॉल और पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया। शिक्षक प्रभारी विधानचंद्र यादव ने सभापति कार्तिकचंद्र मन्ना और सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल श्वाति घोष को अपने हाथों से स्मृति चिह्न तथा पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया। अतिथियों का स्वागत तिलक लगाकर विद्यालय की शिक्षिका प्रियंका साव और उमेशचंद्र शर्मा ने किया। विभिन्न विद्यालयों के शिक्षक भी इस समारोह में भारी संख्या में उपस्थित थे। उपस्थित रहने वाले शिक्षकों में श्री चितबहाल विद्यापीठ ( चक्र-1) से विनोद यादव, अरविंद शिक्षा निकेतन से राजीव सिंह, भारती उच्च प्राथमिक विद्यालय से शशि प्रकाश सिंह, श्री सनातन धर्म विद्यालय से सुरेश सिंह, पाइकपाड़ा राजा मनींद्र विद्यालय से कार्तिक माइती, श्री सूर्या हिंदी विद्यालय से राजेश पांडेय, हरिजन पाठशाला न-1 से फिरोज अहमद खान, बापू शिक्षा सदन से संजय साव, बापू बालिका शिक्षा सदन से विमल साव, भगवती शिक्षा निकेतन से जया प्रभा एक्का, भगवती बालिका शिक्षा निकेतन से विजय जयसवारा, शास्त्री विद्यापीठ से विनीता कुमारी, अमरासी विद्या मंदिर से लक्ष्मीकांत सिंह, आदर्श शिशु निकेतन से ओंकारनाथ सिंह आदि रहे। कार्यक्रम का संचालन विधानचंद्र यादव ने किया। विनोद यादव ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में विधानचंद्र यादव, उमेशचंद्र शर्मा, प्रियंका साव, शशि प्रकाश सिंह तथा विद्यालय के सभी छात्रों का विशेष सहयोग रहा।

23 साल में 20 हजार पोस्टमॉर्टम करने वाली बिहार की मंजू देवी

पटना: वो एक ऐसी महिला हैं जिनकी आपबीती सुन कर कोई भी दहल जाए। बिहार जैसे राज्य से आने वाली मंजू की कहानी सिर्फ डराने वाली ही नहीं, बल्कि एक मिसाल भी है। उनका जीवन देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक बिहार की गंभीर वास्तविकताओं की एक तस्वीर है। साथ ही साथ ये हर बाधा पर दृढ़ता से विजय पाने की कहानी भी है। मंजू देवी (48) की शादी कम उम्र में ही हो गई थी, 26 साल की उम्र में उनके पांच बच्चे थे और फिर उनके पति की मृत्यु हो गई। अब सवाल यही था कि पूरी उम्र कैसे कटेगी, बच्चों का पालन पोषण कैसे होगा। बिहार के समस्तीपुर में, छोटे बच्चों वाली एकल माताओं के लिए आजीविका के विकल्प लगभग शून्य ही हैं। ऐसे में मंजू देवी ने ऐसी नौकरी करनी मंजूर की, जिसके बारे में एक महिला सोच कर भी कांप उठे। उसने एक ऐसी नौकरी ली जो चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण थी, लेकिन गहरे सामाजिक पूर्वाग्रहों को देखते हुए, बहुत कम लोगों इसे करना चाहते हैं। एक पोस्टमॉर्टम सहायक की नौकरी आखिर करना भी कौन चाहेगा, वो भी एक महिला। लेकिन मंजू ने नौकरी के इस विकल्प को चुन लिया। अब 23 साल के बाद मंजू का अंदाजा है कि उन्होंने एक दो नहीं बल्कि कुल 20 हजार शवों के पोस्टमॉर्टम किए। मंजू एक पोस्टमॉर्टम को आज तक नहीं भूली हैं। वो उस दिन को याद करती है जब एक स्थानीय डॉन का शव पोस्टमॉर्टम के लिए आया था। गुस्साए गुंडे बाहर ही थे और शव उन्हें सौंपने की मांग कर रहे थे। वह कहती हैं, इस कठिन काम में उनका सबसे खराब दिन वह था, जब उन्हें एक युवा रिश्तेदार के शव पर काम करना पड़ा, जो जलने से मर गया था। मंजू देवी के अपने शब्द ही उनके काम का सबसे अच्छा वर्णन करते हैं। 23 साल पहले, समस्तीपुर के सदर अस्पताल में पोस्टमॉर्टम कक्ष में अपने पहले दिन को याद करते हुए, वह कहती हैं ‘मेरे पहले दिन, एक 22 वर्षीय दुर्घटना पीड़ित का पोस्टमॉर्टम करना था। मुझे ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने बताया कि उसके सिर को खोलना और शरीर को काटना था, ताकि अंदरुनी जांच की जा सके।’ मंजू के मुताबिक मैं कांप रही थी, रो रही थी… लेकिन मैंने छेनी-हथौड़ा उठाई और मुर्दे का सिर खोला। फिर मैंने निर्देशानुसार चाकू से उसकी छाती और पेट को खोला। काम पूरा हो गया, मैं घर लौट आई, लेकिन मैंने उस दिन कुछ नहीं खाया, न ही उस रात सोई। उस पल को मैं कभी नहीं भूल सकती।’ लेकिन अब वही मंजू देवी नौकरी पर अनुभव और प्रशिक्षण के चलते एक प्रोफेशनल बन गई हैं। लेकिन उनके औजार आज भी वैसे ही पुराने हैं। जबकि वो पोस्टमॉर्टम जैसे अहम काम को करती हैं। मंजू ने 26 साल की अपनी मेहनत के बाद पांच छोटे बच्चों को पढ़ाकर बड़ा कर दिया। वो या तो सफल पेशेवर बन गए हैं या उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। मंजू देवी के दोनों बेटे संगीत में प्रतिभाशाली थे, उन्होंने संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री ली और अब संगीत के छात्रों के लिए एक शिक्षण केंद्र चलाते हैं। वह कहती हैं कि वह खुद संगीत में प्रतिभाशाली थीं, लेकिन जिंदगी ने उन्हें मौका नहीं दिया। उनकी दोनों बेटियां स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में हैं और सिविल सेवाओं के लिए अध्ययन कर रही हैं। बेटियां और बेटे कहते हैं कि ‘उन्होंने बहुत दर्द सहा है,हमें उन पर गर्व है’।

इजरायल से भारतीयों को वापस लाने के लिए सरकार ने शुरू किया ‘ऑपरेशन अजय’

इजरायल (Israel) पर फलस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास  के बीच जारी भीषण जंग के बीच भारत अपने नागरिकों की सुरक्षित वतन वापसी के लिए अभियान शुरू करने जा रहा है। इस अभियान का नाम ‘ऑपरेशन अजय’  रखा गया है। विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस्राइल से वापस लौटने की इच्छा रखने वाले हमारे नागरिकों की वापसी की सुविधा के लिए ‘ऑपरेशन अजय’ लॉन्च किया जा रहा है। इसके लिए विशेष चार्टर उड़ानों और अन्य की व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

विदेश में हमारे नागरिकों की सुरक्षा और भलाई के लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। इस्राइल में करीब 18,000 भारतीय नागरिक काम या पढ़ाई के सिलसिले में रह रहे हैं। यहां रहने वाले भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा देखभाल करने वालों के रूप में काम करता है, लेकिन वहां लगभग एक हजार छात्र, कई आईटी पेशेवर और हीरा व्यापारी भी हैं। इस बीच हमास से लड़ने के लिए इस्राइल ने पक्ष और विपक्ष को मिलाकर बुधवार को एक आपातकालीन साझा सरकार का गठन किया।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पूर्व रक्षा मंत्री व मध्यमार्गी विपक्षी दल के नेता बेनी गैंट्ज के साथ बैठक में साझा सरकार बनाने पर सहमति जताई जो पूरी तरह से युद्ध पर ध्यान केंद्रित करेगी। गैंट्ज की नेशनल यूनिटी पार्टी की तरफ से जारी संयुक्त बयान में यह जानकारी दी गई है। यह सरकार ऐसे समय में बनी है जबकि, हमास की सैन्य शाखा अल कासम ब्रिगेड ने दावा किया है कि उसके लड़ाके अभी इस्राइल के अंदर बने हुए हैं और लड़ाई जारी रखे हैं।

दरअसल, इस्राइल ने गाजा पर शासन करने वाले इस्लामिक चरमपंथी समूह हमास के हमले के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। हमास के लड़ाकों ने सात अक्तूबर को देश के दक्षिण में घुसकर भीषण हमले किए थे। इस दौरान इस्राइल पर 5000 से ज्यादा रॉकेट दागे गए थ। इस्राइल की सेना के मुताबिक, इस्राइल में 155 सैनिकों सहित 1200 से अधिक लोग मारे गए हैं। वहीं, गाजा में अधिकारियों का दावा है कि जंग में 260 बच्चों और 230 महिलाओं सहित 950 लोग मारे गए हैं।

बंगाल का सुंदरबन इलाका बना 1 से 4 साल के बच्चों की कब्रगाह

दुनिया में सबसे ज्यादा यहीं डूबकर मर रहे बच्चे

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में 1 से 4 साल की आयु के बच्चों की डूबने से होने वाली मौत की दर दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। यहां प्रति लाख आबादी में 243 मौतें दर्ज की गई हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह आंकड़ा 2016 से 2019 के बीच जुटाया गया है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि इस क्षेत्र में 5 से 9 वर्ष की आयु के बच्चों में मृत्यु दर 38.8 प्रति लाख आबादी है। अक्टूबर 2016 से सितंबर 2019 तक सामने आई घटनाओं पर क्षेत्र के 19 प्रखंडों में यह अध्ययन किया गया था। इन 19 प्रखंडों में से 13 दक्षिण 24 परगना में जबकि छह उत्तर 24 परगना में हैं। यह अध्ययन हाल में प्रकाशित हुआ है।अध्ययन में कहा गया है, ‘लड़कों और लड़कियों के बीच मृत्यु दर में कोई अंतर नहीं है। अधिकतर बच्चे अपने घरों के 50 मीटर के भीतर तालाबों में डूब गए। घटना के समय उनकी प्राथमिक देखभाल करने वाले लोग घरेलू कामकाज में लगे हुए थे और उनके साथ नहीं थे।’तटीय सुंदरवन क्षेत्र में बच्चों डूबने की समस्या की भयावहता का अंदाजा लगाने के लिए गैर-सरकारी संगठन चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट (सीआईएनआई) ने वैश्विक एजेंसियों रॉयल नेशनल लाइफबोट इंस्टीट्यूशन (आरएनएलआई) और द जॉर्ज इंस्टीट्यूट (टीजीआई) के साथ मिलकर यह अध्ययन किया है।पश्चिम बंगाल के दक्षिण पूर्वी हिस्से में और बांग्लादेश के दक्षिण पश्चिमी भाग में सुंदरबन मैन्ग्रोव क्षेत्र है। मैन्ग्रोव क्षेत्र में छोटे पेड़ या झाड़ी उगती है। समुद्र तट के किनारे दलदली भूभाग में उगने की वजह से इन छोटे पेड़ों या झाड़ियों की जड़ें अक्सर नमक वाले पानी के नीचे, तलछट में होती हैं।ज्यादातर बस्तियां दूर-दराज में हैं और चिकित्सा सुविधाओं से बेहद दूर हैं। सुंदरबन के जल निकायों में मॉनसून के दौरान जल स्तर बढ़ जाता है जबकि तटीय क्षेत्र में भी चार से पांच साल के अंतराल में बाढ़ की घटनाएं होती हैं। बच्चों के डूबने की समस्या पर चिंता जताते हुए पश्चिम बंगाल के सुंदरबन मामलों के मंत्री बंकिम चंद्र हाजरा ने कहा कि राज्य सरकार इस समस्या के समाधान का प्रयास कर रही है। हाजरा ने कहा कि यह स्वीकार करने में हमें कोई हिचक नहीं है कि डूबने से बच्चों की मौत के मामले सामने आए हैं। फिलहाल विस्तृत रिपोर्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि सुंदरबन के निवासियों को डूबने के खतरे के बारे में उसी तरह जागरुक करना चाहिए जिस तरह उन्हें डेंगू, मलेरिया या बाल विवाह को लेकर जागरुक किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह समय की मांग है। हर साल हम कई युवाओं को डूब कर जान गंवाते देखते हैं। लोगों से इस समस्या के हल के बारे में पूछा जाना चाहिए।

स्वामीनाथन ने रखी आधुनिक और प्रगतिशील कृषि की नींव

प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन अब हमारे बीच नहीं हैं। देश ने एक ऐसे दूरदर्शी व्यक्ति को खोया है, जिन्होंने भारत के कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। उनका योगदान स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। स्वामीनाथन चाहते थे कि हमारा देश और किसान समृद्धि के साथ जीवनयापन करें। वे अकादमिक रूप से प्रतिभाशाली थे और किसी भी कॅरिअर का विकल्प चुन सकते थे, लेकिन 1943 के बंगाल के अकाल से इतने द्रवित हुए कि कृषि क्षेत्र का कायाकल्प करने की ठान ली। बहुत छोटी उम्र में, वे डॉ. नॉर्मन बोरलॉग के संपर्क में आए और उनके काम को गहराई से समझा। 1950 के दशक में, अमेरिका में एक फैकल्टी के तौर पर जुड़ने का आग्रह उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। आजादी के बाद के दो दशक में हम कई चुनौतियों का सामना कर रहे थे और उनमें से एक थी- अन्न की कमी। 1960 के दशक की शुरुआत में, भारत अकाल से जूझ रहा था। इसी दौरान, प्रोफेसर स्वामीनाथन की दृढ़ प्रतिबद्धता और दूरदर्शिता ने कृषि क्षेत्र के एक नए युग की शुरुआत की। कृषि और गेहूं प्रजनन जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में उनके अग्रणी कार्यों से गेहूं उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ऐसे प्रयासों का ही परिणाम था कि भारत अनाज में आत्मनिर्भर राष्ट्र बन गया। इस शानदार उपलब्धि की वजह से उन्हें ‘भारतीय हरित क्रांति के जनक’ की उपाधि मिली। हरित क्रांति में भारत की “कुछ भी असंभव नहीं है” की भावना झलकती है। अगर हमारे सामने करोड़ों चुनौतियां हैं, तो उन चुनौतियों पर विजय प्राप्त करने के लिए नवोन्मेष की लौ जलाने वाले करोड़ों प्रतिभाशाली लोग भी हैं। हरित क्रांति शुरू होने के पांच दशक बाद, भारतीय कृषि पहले से अधिक आधुनिक और प्रगतिशील हो गई है। लेकिन, प्रोफेसर स्वामीनाथन द्वारा रखी गई नींव को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
प्रोफेसर स्वामीनाथन ने आलू की फसलों को प्रभावित करने वाले कीटों से निपटने की दिशा में भी प्रभावी अनुसंधान किया था। उनके शोध ने आलू की फसलों को ठंड के मौसम का सामना करने में भी सक्षम बनाया। आज, दुनिया सुपर फूड के रूप में मिलेट्स या श्रीअन्न के बारे में बात कर रही है, लेकिन प्रोफेसर स्वामीनाथन ने 1990 के दशक से ही मिलेट्स को प्रोत्साहित किया था। 2001 में मैंने गुजरात के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला। तब सूखे, चक्रवात और भूकंप ने राज्य की विकास यात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया था। उसी दौर में हमने सॉइल हेल्थ कार्ड की पहल की थी, ताकि किसानों को मिट्टी को बेहतर ढंग से समझने और समस्या के अनुसार समाधान करने में मदद मिले। इसी सिलसिले में मेरी मुलाकात प्रोफेसर स्वामीनाथन से हुई। उन्होंने अपने बहुमूल्य सुझाव दिए। इस योजना ने गुजरात में कृषि क्षेत्र की सफलता का सूत्रपात कर दिया।
मेरे मुख्यमंत्री रहने के दौरान और उसके बाद जब मैंने प्रधानमंत्री का पद संभाला, तब भी हमारी बातचीत चलती रही। मैं उनसे 2016 में इंटरनेशनल एग्रो-बायोडाइवर्सिटी कांग्रेस में मिला और 2017 में, मैंने उनकी लिखी पुस्तक श्रृंखला लॉन्च की। ‘कुरल’ ग्रंथ के मुताबिक किसान वो धुरी हैं, जिसके चारों तरफ पूरी दुनिया घूमती है। ये किसान ही हैं, जो सब का भरण-पोषण करते हैं। प्रो. स्वामीनाथन इस सिद्धांत को अच्छी तरह समझते थे। वे एक सच्चे किसान वैज्ञानिक थे, यानी किसानों के वैज्ञानिक। उनके दिल में किसान बसता था। स्वामीनाथन ने छोटे किसानों के जीवन को बेहतर बनाने और उन तक नवोन्मेष का लाभ पहुंचाने पर बहुत जोर दिया। वे विशेष रूप से महिला किसानों के जीवन को बेहतर बनाने के प्रति समर्पित थे।
स्वामीनाथन के व्यक्तित्व का एक और पहलू भी है। वो नवोन्मेष और संरक्षण को बढ़ावा देते थे। जब उन्हें 1987 में पहला वर्ल्ड फूड प्राइज मिला, तो उन्होंने इसकी पुरस्कार राशि का उपयोग एक गैर-लाभकारी रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना में किया। उन्होंने अनगिनत प्रतिभाओं को निखारा और उनमें सीखने और इनोवेशन के प्रति जुनून पैदा किया। स्वामीनाथन एक ऐसे दिग्गज व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने जीवन की शुरुआत में ही यह तय कर लिया था कि वो कृषि को मजबूत करेंगे और किसानों की सेवा करेंगे। उन्होंने इस संकल्प को बेहद ही रचनात्मक तरीके से और जुनून के साथ निभाया।
कृषिगत नवोन्मेष और सस्टेनेबिलिटी पर उनका योगदान हमें प्रेरित व मार्गदर्शन प्रदान करता रहेगा। हमें उनके सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते रहना होगा। इनमें किसानों के हितों की वकालत करना, वैज्ञानिक नवोन्मेष को कृषि विस्तार की जड़ों तक पहुंचना और आने वाली पीढ़ियों के लिए विकास, स्थिरता एवं समृद्धि को बढ़ावा देना शामिल है।

 

दावत में बनाइए कुछ खास

शाही भरवां दम आलू

सामग्री – दम आलू के लिए – 10-12 छोटे छोटे आलू, 1 कप ताजा दही, 2 बड़े चम्मच खाना पकाने का तेल, 1 चम्मच जीरा, 1 तेज पत्ता, 2-3 हरी इलायची की फली, 2-3 लौंग, 1 इंच दालचीनी की छड़ी, 1 चम्मच अदरक-लहसुन का पेस्ट, 1 चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 1/2 चम्मच हल्दी पाउडर, 1 चम्मच गरम मसाला, नमक स्वादानुसार, कटी हुई धनिया पत्ती
शाही भरावन के लिए – 1/2 कप काजू, 1/2 कप किशमिश, 1/2 कप कसा हुआ पनीर, 2 बड़े चम्मच ताजी क्रीम, /2 चम्मच इलायची पाउडर, नमक स्वादानुसार
विधि – छोटे आलूओं को अच्छी तरह धो लें और उन्हें तब तक उबालें जब तक वे कांटे की तरह नरम न हो जाएं । एक बार उबलने के बाद, उन्हें छील लें और भरने के लिए एक गुहा बनाने के लिए बीच से निकाल लें।
अब शाही भरावन बनाने के लिए एक पैन में थोड़ा सा तेल गर्म करें और उसमें काजू और किशमिश डालें । इन्हें तब तक भूनिए जब तक काजू सुनहरे न हो जाएं और किशमिश फूल न जाएं । कसा हुआ पनीर, ताजी क्रीम, इलायची पाउडर और एक चुटकी नमक डालें। अच्छी तरह मिलाएँ और कुछ मिनट तक पकाएँ। आंच से उतार लें और भरावन को ठंडा होने दें। तैयार शाही भराई को छोटे आलू के गड्ढों में सावधानी से भरें । आलूओं में भरावन धीरे से दबाकर उन्हें सील कर दें। ग्रेवी बनाने के लिए एक पैन में तेल गरम करें और उसमें जीरा, तेजपत्ता, हरी इलायची, लौंग और दालचीनी डालें । जब मसाला चटकने लगे तो इसमें अदरक-लहसुन का पेस्ट डालें और खुशबू आने तक भून लें। लाल मिर्च पाउडर, हल्दी पाउडर, गरम मसाला और नमक डालें। अच्छी तरह से मलाएं। ताजा दही को फेंटें और धीरे-धीरे इसे पैन में डालें, लगातार हिलाते रहें जब तक कि तेल अलग न हो जाए। भरवां आलू को सावधानी से ग्रेवी में डालें । पैन को ढक दें और उन्हें धीमी आंच पर लगभग 15-20 मिनट तक उबलने दें, जिससे उनका स्वाद पिघल जाए। अपने शाही भरवां दम आलू को कटी हुई हरी धनिया से सजाएं।

तवा नान


सामग्री – 150 ग्राम मैदा , 100 ग्राम आटा , 1/4 कप दही , 1 बड़ा चम्‍मच तेल, 1/2 छोटा चम्मच बेकिंग सोडा , छोटा चम्मच शक्‍कर, 1/2 छोटा चम्मच नमक
विधि – तवा नान रेसिपी के लिए सबसे पहले मैदा और आटा को छान लें। फिर दही में शक्कर, बेकिंग सोडा और नमक डाल कर मिक्‍स कर लें। इसके बाद दही के मिश्रण को आटे में डाल कर मिला लें। इसके बाद गुनगुने पानी मी मदद से आटा गूंथ लें। ये आटा एकदम नरम रहना चाहिए। अब हथेली में थोड़ा सा तेल लगाएं और आटे को मसल-मसल कर अच्‍छी तरह से गूंथ कर चिकना कर ले। इसके बाद आटे को ढक कर किसी गरम जगह पर 3 घंटे के लिए रख दें। तब तक आटा फूल जाएगा और नान के लिए तैयार हो जाएगा। आटा तैयार होने पर एक बार उसे और हल्‍के हाथ से गूंथ लें। फिर उसकी 6 लोई बना लें। फिर उन्‍हें सूखे आटे में लपेट लें और कपड़े से ढक कर रख दें। अब तवा को गैस पर रख कर गरम करें। जब तक तवा गरम हो रहा है एक लोई लेकर उसे आटे में लपेटें और बेल लें। बेली हुई लोई हल्‍की मोटी रहनी चाहिए, तभी वह नान की तरह बन पाएगी। अब हाथ में थोड़ा सा पानी लेंकर बेली हुई लोई की ऊपरी लेयर पर लगाएं और उसे बराबर से फैला दें। इसके बाद लोई को पानी वाली से साइड से तवे पर रखें और मीडियम आंच पर सेकें। लोई में पानी लगे होने की वजह से वह तवा से चिपक जाएगी। इसे छुड़ाए नहीं। जब नान की ऊपर की लेयर हल्‍की सी सिक जाए, तवे का हैंडल पकड उसे उठाएं और तवा को उलटा कर लें। अब तवे में चिपकी हुई लोई को गैस की आंच पर ले जाएं और घुमा-घुमा कर चित्‍तीदार होने तक सेंक लें। सिंकने के बाद तवा को सीधा कर लें और कलछी की मदद से नान को तवे से अलग कर लें।

कामकाजी लड़कियां ऐसे रखें त्वचा का ख्याल

घर पर काम करने वाली महिलाओं के लिए त्वचा की देखभाल के टिप्स: चमकती और स्वस्थ त्वचा कौन नहीं चाहता? व्यस्त जीवनशैली और आगे बढ़ने की भागदौड़ के कारण अक्सर त्वचा की देखभाल करना मुश्किल हो जाता है। खासतौर पर उन महिलाओं के लिए जिन्हें निजी एवं पेशेवर जीवन, दोनों को एक साथ सम्भालना होता है। ऐसी स्थितियों में, महिलाएं अक्सर अपनी त्वचा देखभाल की दिनचर्या से बचती हैं या छोड़ देती हैं। लंबे समय तक त्वचा की अनदेखी करने से काले धब्बे, बेजान त्वचा, मुंहासे निकलना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इससे महीन रेखाएं और झुर्रियां भी हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि आप अपनी त्वचा का खास ख्याल रखें। तो आज इसी विषय पर बात करते हुए जानते हैं कामकाजी महिलाओं के लिए कुछ खास स्किन केयर टिप्स।
हर दिन मेकअप न लगाएं – कई बार काम की वजह से आपको मेकअप करना पड़ता है। लेकिन अगर हर दिन मेकअप करना एक आदत बन गई है तो आपको ध्यान देने की जरूरत पड़ सकती है। हर दिन मेकअप का उपयोग करने से रसायन त्वचा कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे त्वचा बेजान हो सकती है और मुंहासे निकल सकते हैं। साथ ही हैवी मेकअप की जगह हल्का मेकअप करने की आदत बनाएं ताकि त्वचा को नुकसान न पहुंचे।
सफाई से परहेज न करें – अक्सर ज्यादातर महिलाएं सफाई करने से बचती हैं, जिसके कारण उन्हें त्वचा संबंधी समस्याएं होने लगती हैं। दिन में दो बार क्लींजिंग करना बहुत जरूरी है ताकि त्वचा गहराई से साफ हो सके। इसलिए नहाते समय और ऑफिस से आने के बाद अपना चेहरा साफ करना न भूलें। इससे चेहरे की गंदगी अच्छे से साफ हो जाएगी और त्वचा संबंधी समस्याओं का खतरा भी कम हो जाएगा।
रात में त्वचा की देखभाल भी जरूरी है – सुबह की त्वचा की देखभाल की तरह, रात की त्वचा की देखभाल की दिनचर्या का पालन करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। दरअसल, रात में भी त्वचा को ठीक होने का समय मिलता है। इसलिए रात्रिकालीन त्वचा देखभाल दिनचर्या भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। रात को सोने से पहले मेकअप जरूर हटाएं और त्वचा को साफ और मॉइस्चराइज करना न भूलें।
स्वस्थ जीवनशैली को अपनी आदत बनाएं – आप स्वस्थ जीवनशैली की आदतें अपनाकर अपनी त्वचा को स्वस्थ रख सकते हैं। अपने आहार में जूस, फल और भरपूर मात्रा में सब्जियां अवश्य शामिल करें। साथ ही 6 से 7 घंटे की पर्याप्त नींद लें। ये आदतें त्वचा को स्वस्थ और सक्रिय रहने में मदद करेंगी।
सनस्क्रीन लगाना न भूलें – सनस्क्रीन आपकी त्वचा की देखभाल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। यह न केवल त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाता है, बल्कि त्वचा को नुकसान से भी बचाता है। इसलिए ऑफिस जाने से पहले सनस्क्रीन लगाना न भूलें।
घरेलू नुस्खे आज़माएं – दादी-नानी के पुराने घरेलू नुस्खे आज भी त्वचा के लिए फायदेमंद माने जाते हैं। ये प्राकृतिक उत्पाद हैं जिनका कोई साइड इफेक्ट नहीं है। इस घरेलू नुस्खे को हफ्ते में दो बार आजमाएं। आप अपने चेहरे के लिए बेसन, चंदन, गुलाब जल, एलोवेरा जैसी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

शारदीय नवरात्रि विशेष : आखिर 9 दिनों की क्यों होती है नवरात्रि

प्रत्येक वर्ष में चार बार आने वाली नवरात्रि सभी के लिए खास होती है। इसमें से दो गुप्त नवरात्रि होती है। सनातन धर्म में इन नौ दिनो का विशेष महत्व है। यह त्योहार माता रानी की पूजा-अर्चना के लिए समर्पित है। नवरात्रि में माता रानी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। मंदिर से लेकर पूजा पंडाल व घर-बाहर हर जगह नवरात्रि की धूम रहती है। कुछ लोग इस दौरान अखंड ज्योत भी जलाते है। यहीं नहीं नवरात्रि में कलश की स्थापना करना शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा की विधि पूर्वक उपासना करने से वह भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। साथ ही घर परिवार में धन-वैभव व सुख समृद्धि की बढ़ोत्तरी होती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से नवरात्रि के पर्व को मनाया जाता है। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि, आखिर क्यों नवरात्रि नौ दिन ही मनाई जाती है? इसके पीछे का कारण क्या है? चलिए जान लेते हैं।
नवरात्रि 9 दिन तक क्यों मनाई जाती है
कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि, माता भगवती देवी दुर्गा ने महिषासुर नाम के असुर के साथ पूरे नौ दिन तक युद्ध किया था। इसके बाद नवमी की रात्रि को उस असुर का वध किया था। तभी से मां दुर्गा की शक्ति को समर्पित नवरात्रि का व्रत करते हुए इनके 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है।
नवरात्रि की 9 शक्तियां
नवरात्रि में मां दुर्गा के पूरे नौ रूप की पूजा की जाती है। इन्हें नवदुर्गा के रूप में भी जाना जाता है- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, और सिद्धिदात्री।
15 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि – इस बार शारदीय नवरात्रि की शुरुआत रविवार 15 अक्तूबर 2023 से हो रही है। मंगलवार 23 अक्तूबर 2023 को नवरात्रि समाप्त होगी। फिर 24 अक्तूबर को विजयादशमी या दशहरा का पर्व मनाया जाएगा।
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त – पंचांग के अनुसार, शारदीय नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 15 अक्तूबर को 11:48 मिनट से लेकर दोपहर 12:36 तक है।
शारदीय नवरात्रि 2023 तिथियां
15 अक्तूबर 2023 – मां शैलपुत्री
16 अक्तूबर 2023 – मां ब्रह्मचारिणी
17 अक्तूबर 2023 – मां चंद्रघंटा
18 अक्तूबर 2023 – मां कुष्मांडा
19 अक्तूबर 2023 – मां स्कंदमाता
20 अक्तूबर 2023 – मां कात्यायनी
21 अक्तूबर 2023 – मां कालरात्रि
22 अक्तूबर 2023 – मां महागौरी (आठवां दिन) दुर्गा अष्टमी
23 अक्तूबर 2023 – महानवमी, (नौवां दिन) शारदीय नवरात्रि व्रत पारण, महानवमी, मां सिद्धिदात्री
24 अक्तूबर 2023 – मां दुर्गा प्रतिमा विसर्जन, दशमी तिथि (दशहरा) ।

महिला आरक्षण कानून……..पथरीली राह, अड़चनें हजार, लक्ष्य अब भी बाकी है

शुभजिता फीचर्स डेस्क
संसद के विशेष सत्र के दौरान पास हुए महिला आरक्षण बिल को राष्‍ट्रपति की मंजूरी मिल गई है । राष्‍ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने इस बिल पर अपने हस्‍ताक्षर कर दिया है, जिसके बाद इसने कानून की रूप ले लिया है । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की सहमति मिलते ही भारत सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक के लिए एक गजट अधिसूचना जारी कर दी है । इसके साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने देश की आधी आबादी से किए अपने वादे को पूरा कर दिया है । बता दें कि संसद में इस बिल को ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ के नाम से पेश किया गया था, जो अब कानून बन गया है । महिला आरक्षण कानून बनने के बाद अब देश की संसद के दोनों सदन – लोकसभा और राज्‍यसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो गई हैं. साथ ही देश के तमाम राज्‍यों की विधानसभाओं में भी महिलाओं को 33 प्रतिशत रिजर्वेशन का हक मिल गया है । अब देश की संसद सहित सभी विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कर दी गई हैं । इससे पहले सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के कई नेताओं ने महिलाओं के लिए आरक्षण पर जोरदार वकालत की थी । पर रास्ता इतना भी आसान नहीं था…रास्ता अब भी आसान नहीं है….फिर भी चलिए पलटते हैं पन्नों को और देखते हैं बिल के कानून बनने तक की यात्रा –
मार्च 2010 की दोपहर। राज्यसभा में अफरा-तफरी मची थी । समाजवादी पार्टी के सांसद नंद किशोर यादव और कमाल अख्तर चेयरमैन हामिद अंसारी की टेबल पर चढ़ गए और माइक उखाड़ने की कोशिश की । राष्ट्रीय जनता दल के राजनीति प्रसाद ने बिल की कॉपी फाड़कर चेयरमैन की तरफ उछाल दी। लोकजनशक्ति पार्टी के साबिर अली और निर्दलीय सांसद एजाज अली ने भी डिस्कशन रोकने की कोशिश की । 8 मार्च 2010 को राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी की टेबल से महिला आरक्षण विधेयक की कॉपी खींचने और माइक तोड़ने की कोशिश करते सांसद। ये तस्वीर राज्यसभा टीवी के प्रसारण के दौरान लिया गया स्क्रीनशॉट है।
8 मार्च 2010 को राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी की टेबल से महिला आरक्षण विधेयक की कॉपी खींचने और माइक तोड़ने की कोशिश करते सांसद। ये तस्वीर राज्यसभा टीवी के प्रसारण के दौरान लिया गया स्क्रीनशॉट है।
ये लोग महिला आरक्षण विधेयक का विरोध कर रहे थे। अगले दिन यानी 9 मार्च 2010 को हंगामा करने वाले सभी 7 सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया और मार्शल उन्हें पकड़कर बाहर ले गए। इसके बाद विधेयक पर वोटिंग हुई। इसके पक्ष में 186 मत पड़े और विरोध में सिर्फ 1 वोट। BSP वॉकआउट कर गई थी और TMC ने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया। पहली बार प्रस्तावित होने के 14 साल बाद महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया। उसके बाद से 13 साल हो गए, ये बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। अब 2023 में मोदी सरकार ने भी इसे लोकसभा में पेश कर दिया है। अब ये पारित हो गया, राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अब यह कानून बन चुका है । लोकसभा और विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित होने जा रही है ।

यूनाइटेड फ्रंट सरकारः पहली कोशिश की, लेकिन सुझावों में अटकी
1996 में 13 दलों की गठबंधन वाली यूनाइडेट फ्रंट सरकार ने इस दिशा में पहली कोशिश की थी। उस समय के कानून मंत्री रमाकांत डी खलप ने संविधान में 81वें संशोधन के लिए संसद में एक बिल पेश किया। इसके तहत संविधान में दो नए कानून अनुच्छेद 330A और 332A जोड़ा जाना था ।
जनता दल समेत सरकार को समर्थन देने वाली कई पार्टियों ने इस बिल का विरोध कर दिया। इस विरोध से सरकार घबरा गई। आखिरकार बिल को 31 सांसदों वाले एक संयुक्त समिति के पास विचार करने के लिए भेज दिया गया । भाकपा नेता गीता मुखर्जी इस कमेटी की अध्यक्ष थीं। नीतीश कुमार, मीरा कुमार, ममता बनर्जी, सुमित्रा महाजन, शरद पवार, उमा भारती, राम गोपाल यादव, सुशील कुमार शिंदे जैसे सांसद इस कमेटी के सदस्य थे। इस कमेटी ने कई सुझाव दिए…
इस बिल में ज्यादा आपत्ति महिला आरक्षण को लेकर लिखे गए एक शब्द ‘एक तिहाई से कम नहीं’ को लेकर थी। उनका कहना था कि ये शब्द अस्पष्ट है। इस शब्द की व्याख्या अलग-अलग तरह से हो सकती है । इस शब्द को ‘एक तिहाई के जितना करीब संभव हो सके’ लिखा जाना चाहिए।

राज्यसभा और विधान परिषदों में महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए। इसके साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC को भी आरक्षण का उचित लाभ मिलना चाहिए। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण लागू होने से लेकर सिर्फ 15 साल के लिए होने चाहिए। उसके बाद यह समीक्षा की जाए कि आगे महिलाओं को इस आरक्षण की जरूरत है या नहीं है।
जिन राज्यों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए तीन से कम सीटों पर आरक्षण लागू है, वहां इसे रोटेशन के आधार पर लागू किया जाए। मान लीजिए ए, बी, सी तीन आरक्षित सीट हैं तो पहली बार ए फिर बी और फिर अगली बार सी सीट को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाए।
संसद के तर्ज पर ही दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित करने की बात की। बिल में एस सी, एस टी के साथ ओबीसी महिलाओं को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने आबादी के अनुपात में महिलाओं को आरक्षण देने की बात कही थी।
इस बिल के विरोध में सांसद शरद यादव ने कहा था- ‘कौन महिला है, कौन नहीं है। केवल छोटे बाल रखने वाली महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिलने देंगे।’ यूनाइटेड फ्रंट सरकार अपने ही समर्थक दलों के इस विरोध की वजह से इस बिल को पास नहीं करा पाई।
वाजपेयी सरकार: कई बार कोशिशें की, लेकिन सफल नहीं हुए
1998 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने सदन से इस बिल को पास कराने की कोशिश कई बार की थी। पहली बार 13 जुलाई 1998 में कानून मंत्री एम थंबी दुरई ने लोकसभा में इस बिल को पेश किया था। जिसका राजद, सपा समेत कई दलों ने विरोध किया। राजद सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने स्पीकर जीएमसी बालयोगी के हाथ से बिल की कॉपी को छीनकर फाड़ दिया था । बिहार सरकार में अभी के मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव ने इस बिल के फाड़ने पर कहा था कि बीआर अंबेडकर ने उनके सपने में आकर ऐसा करने के लिए कहा था। इस बिल को 14 जुलाई को एक बार फिर से लोकसभा में पेश करने की कोशिश हुई। हालांकि राजनीतिक दलों के हंगामे और सहमति नहीं बन पाने की वजह से ऐसा संभव नहीं हो सका।
11 दिसंबर 1998 को फिर लोकसभा में इस बिल को पेश करने की कोशिश हुई। तब सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर के पोडियम तक पहुंच गए। इस वक्त धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई । आखिरकार सरकार ने एक बार फिर अपना हाथ पीछे खींच लिया। 23 दिसंबर 1998 को आखिरकार सदन में इस बिल को पेश करने में सरकार कामयाब रही। इस समय भी सपा, बसपा समेत कई दलों ने जोरदार विरोध दर्ज कराया। एनडीए सरकार को समर्थन देने वाली नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने एक बार फिर विरोध किया। एक बार फिर पहले की तरह ये बिल सदन में पास नहीं हो सका।
अटल बिहारी सरकार में उस समय के कानून मंत्री राम जेठमलानी ने 23 दिसंबर 1999 को एक बार फिर से सदन में इस बिल को पेश किया। एक बार फिर सपा, बसपा और राजद के सांसदों ने इस बिल का जोरदार विरोध किया । वाजपेयी सरकार ने इसके बाद तीन बार – 2000, 2002 और 2003 में इस विधेयक को आगे कानून बनाने की कोशिश की। हालांकि हर बार की तरह इन सभी मौकों पर अटल सरकार को कामयाबी नहीं मिली। जुलाई 2003 में भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई, लेकिन असफल रहे। इस वजह से विधेयक पास नहीं हो पाया ।
मनमोहन सरकारः राज्यसभा में पारित करा लिया, लेकिन लोकसभा में नहीं
2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। उस वक्त के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2004 में दिए अपने संयुक्त संसदीय भाषण में महिलाओं के आरक्षण को लेकर सरकार की प्रतिबद्धिता को दोहराया।
यूपीए सरकार ने 6 मई 2008 को इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया। उस दौरान सपा सांसद अबू आजमी ने कानून मंत्री एचआर भारद्वाज की तरफ दौड़कर बिल फाड़ने की कोशिश की थी।
बिल पेश होने के बाद पार्लियामेंट की स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया। कमेटी ने दिसंबर 2009 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। सुझाव दिया गया कि इस बिल को मौजूदा स्वरूप में ही पारित किया जाना चाहिए। 9 मार्च 2010 को राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक भारी बहुमत से पारित हुआ। बीजेपी, वाम पार्टियों और जेडीयू ने बिल का समर्थन किया था। इसका विरोध करने वालों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल शामिल थीं। हालांकि यूपीए सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया। कांग्रेस को डर था कि अगर उसने बिल को लोकसभा में पेश किया तो उसकी सरकार खतरे में पड़ सकती है। राज्यसभा स्थायी सदन है। ये कभी भंग नहीं होता। इसलिए ये विधेयक अभी भी जिंदा है। अब ये बिल विधानसभाओं में भेजा जाएगा। इसे लागू होने के लिए देश की 50% विधानसभाओं में पास होना जरूरी है। लोकसभा में फिलहाल 82 महिला सांसद हैं, नारी शक्ति वंदन कानून के तहत लोकसभा में 181 महिला सांसद रहेंगी।


सरकार ने 5 दिन का विशेष सत्र बुलाया था, इसी में बिल पेश किया
सरकार ने 18 से 22 सितंबर तक संसद का विशेष सत्र बुलाया था। इसका एजेंडा नहीं बताया गया था, इसको लेकर विपक्ष ने आलोचना भी की थी। 18 सितंबर की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की मीटिंग बुलाई। मीटिंग के बाद कोई प्रेस ब्रीफिंग नहीं की गई। अंदर से खबर आई कि सरकार 19 सितंबर को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल ला सकती है। बात सही निकली। 19 सितंबर को सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन बिल पेश कर दिया।
20 सितंबर को लोकसभा में बिल पर 7 घंटे चर्चा हुई। इसमें 60 सांसदों ने भाग लिया। शाम को पर्ची से हुई वोटिंग में बिल पास हो गया। समर्थन में 454 और विरोध में 2 वोट पड़े । 21 सितंबर को बिल पर राज्यसभा में चर्चा हुई। यहां बिल सर्वसम्मति से पास हो गया और किसी ने बिल के खिलाफ वोट नहीं दिया। हाउस में मौजूद सभी 214 सांसदों ने बिल का समर्थन किया था। नयी संसद में कामकाज के पहले दिन यानी 19 सितंबर को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन विधेयक) पेश किया गया। इस बिल के मुताबिक, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% रिजर्वेशन लागू किया जाएगा। लोकसभा की 543 सीटों में से 181 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। ये रिजर्वेशन 15 साल तक रहेगा। इसके बाद संसद चाहे तो इसकी अवधि बढ़ा सकती है। यह आरक्षण सीधे चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए लागू होगा। यानी यह राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों पर लागू नहीं होगा। लोकसभा में बिल पर चर्चा में 60 सांसदों ने अपने विचार रखे ।
परिसीमन के बाद ही लागू होगा बिल
नए विधेयक में सबसे बड़ा पेंच यह है कि यह डीलिमिटेशन यानी परिसीमन के बाद ही लागू होगा। परिसीमन इस विधेयक के पास होने के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर होगा। 2024 में होने वाले आम चुनावों से पहले जनगणना और परिसीमन करीब-करीब असंभव है। इस फॉर्मूले के मुताबिक विधानसभा और लोकसभा चुनाव समय पर हुए तो इस बार महिला आरक्षण लागू नहीं होगा। यह 2029 के लोकसभा चुनाव या इससे पहले के कुछ विधानसभा चुनावों से लागू हो सकता है।
शताब्दी पुरानी है महिला आरक्षण की माँग
महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण की मांग आजादी से पहले से उठ रही है। 1931 में बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू ने इस संबंध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था। इसमें महिलाओं के लिए राजनीति में समानता की मांग की गई थी । संविधान सभा की बहसों में भी महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब इसे यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि लोकतंत्र में खुद-ब-खुद सभी समूहों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।
1971 में नेशनल एक्शन कमेटी ने भारत में महिलाओं के घटते राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा की। कमेटी के कई सदस्य विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ थे। हालांकि उन्होंने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन किया। इसके बाद देशभर के कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण की घोषणा की।
1988 में महिलाओं के लिए नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी। इन सीटों में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति यानी SC और अनुसूचित जनजाति यानी ST की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

गीता मुखर्जी… जिन्होंने संसद में 27 साल पहले बोया था महिला आरक्षण का बीज
संसद में महिला आरक्षण विधेयक के पेश होने पर देश भर में खुशी मनाई जा रही है। ऐसे में बंगाल की एक मृदुभाषी महिला की कहानी फिर से चर्चा में है। बंगाल के तत्कालीन अविभाजित मेदिनीपुर जिले के पांशकूड़ा निर्वाचन क्षेत्र (अब परिसीमन के कारण अस्तित्वहीन) से सात बार भाकपा की लोकसभा सदस्य रहीं स्वर्गीय गीता मुखर्जी पहली सांसद थीं, जिन्होंने सितंबर 1996 में संसदीय और विधायी सीटों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए संसद के पटल पर एक निजी सदस्य का विधेयक पेश किया था।
महिला आरक्षण बिल की पहली योद्धा – गीता मुखर्जी ने 12 सितंबर 1996 को सदन के पटल पर निजी सदस्य विधेयक पेश किया। यह शुरुआत थी और उस ऐतिहासिक दिन के 27 साल बाद 19 सितंबर 2023 को नारी शक्ति वंदना अधिनियम के नाम और शैली में विधेयक पेश किया गया था। गीता मुखर्जी को करीब से जानने वाले दिग्गजों को याद है कि वह महिला सशक्तीकरण के बारे में कितनी ईमानदार थीं और उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक संसद और विधानमंडल में महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं होगा तब तक सशक्तीकरण हासिल नहीं किया जा सकेगा।
बेहद लोकप्रिय थीं गीता मुखर्जी – मुखर्जी अक्सर अपनी पार्टी के साथियों और मीडियाकर्मियों के बीच गीता-दी के नाम से बेहद लोकप्रिय थीं। उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि महिलाओं को समाज निर्माण में उनकी उचित पहचान मिले और वे पर्याप्त संख्या बल के साथ संसदीय और विधायी मंचों पर अपने अधिकारों की आवाज उठाएं।
सादगी भरा था जीवन – प्रसिद्ध भारतीय सांसद और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री स्वर्गीय इंद्रजीत गुप्ता की छोटी बहन और प्रतिष्ठित भारतीय कम्युनिस्ट स्वर्गीय बिश्वनाथ मुखर्जी की पत्नी गीता मुखर्जी बिना किसी सुनियोजित प्रचार के अपनी बेहद विनम्र जीवनशैली के लिए जानी जाती थीं। वह 4 मार्च 2000 को अपने देहावसान तक नई दिल्ली और हावड़ा के बीच यात्रा करते समय साधारण थ्री-टीयर स्लीपर क्लास में यात्रा करना पसंद करती थीं।
सात बार लोकसभा सदस्य थीं गीता मुखर्जी – अत्यंत मृदुभाषी और लो प्रोफाइल वाली गीता मुखर्जी 1980 से 2000 तक तत्कालीन अविभाजित मेदिनीपुर जिले के पांशकूड़ा निर्वाचन क्षेत्र से सात बार लोकसभा सदस्य थीं। अंतिम बार वह 1999 में चुनी गई थीं। एक सांसद के रूप में, सार्वजनिक उपक्रमों पर संसदीय समिति, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण पर समिति और आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 1980 पर संयुक्त समिति के सदस्य के रूप में उनके गठन को श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।

“द ई एंड यू एजुकेशन समिट 2023” का  आयोजन

कोलकाता । एजुकेशन एंड यू (ईएंडयू) की संस्थापक प्रियंवदा अग्रवाल ने फेसेस के सहयोग से  “शिक्षा शिखर सम्मेलन” का सफल आयोजन किया। इसमें शिक्षाविदों के साथ बड़ी संख्या में शिक्षकों के अलावा समाज के अन्य गणमान्य लोगों ने भाग लिया। ईएंडयू एजुकेशन समिट में एजुकेशन एंड यू की अंदरूनी कहानी को प्रदर्शित किया गया है। जिसके बाद इस संस्थान की पुन: डिजाइन की गई वेबसाइट www.educationandyou.in को लॉन्च किया गया। इसके बाद कार्यक्रम में एक पैनल चर्चा हुई, जिसका विषय था “आज के डिजिटल युग में शिक्षा का भविष्य: वरदान या अभिशाप?” इस कार्यक्रम में कई प्रतिष्ठित वक्ताओं और अतिथियों में प्रो. सुमन कुमार मुखर्जी (निदेशक, द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज), डॉ. अनुराधा दास (निदेशक, गार्डन हाई इंटरनेशनल स्कूल), डॉ. ब्रतती भट्टाचार्य (शिक्षाविद और शिक्षाउद्यमी) के साथ प्रोफेसर डॉ. ध्रुबज्योति चट्टोपाध्याय (कुलपति, सिस्टर निवेदिता विश्वविद्यालय) शामिल हुए। पैनल का सफल संचालन  प्रियंवदा अग्रवाल (एजुकेशन एंड यू की संस्थापक) ने किया। इस आयोजन में आईपीएस जगमोहन (डीजी, सिविल डिफेंस, पश्चिम बंगाल पोलिस) और श्री इमरान जकी (फेसेस के अध्यक्ष) के साथ समाज की कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों ने इस कार्यक्रम में शामिल थे ।  एजुकेशन एंड यू की संस्थापक प्रियंवदा अग्रवाल ने कहा, हम शिक्षक, छात्रों के भविष्य के निर्माता हैं। छात्रों के प्रति हमारा समर्पण, जुनून और नवीन शिक्षण पद्धतियाँ अगली पीढ़ी को सही राह पहचानने की भावना और सोच उनके मन में जगाती हैं। इस अवसर पर, एजुकेशन एंड यू के सलाहकार सदस्य अंकुर अग्रवाल ने कहा कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म न केवल इंटरनेट पर एक आभासी स्थान का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि यह अनंत संभावनाओं, ज्ञान और कनेक्शन की दुनिया का एक प्रवेश द्वार भी है। ईएंडयू के सलाहकार सदस्य और कलकत्ता उच्च न्यायालय में प्रैक्टिसिंग वरिष्ठ वकील, श्री आनंद बसु ने कहा, मैं शिक्षा क्षेत्र के पीछे की प्रेरक शक्ति, शिक्षकों के प्रति अपना आभार व्यक्त करना चाहता हूं। आपकी अटूट प्रतिबद्धता और हमारे युवाओं की शिक्षा के माध्यम से भविष्य को आकार देना हमारी गहरी प्रशंसा का पात्र है। आप शिक्षण प्रणाली की दिल और आत्मा हैं, इसलिए हम आपको तहे दिल से सलाम करते हैं। इस अवसर पर फेसेस के अध्यक्ष  इमरान जकी ने कहा, एजुकेशन एंड यू ने दिसंबर 2014 में अपनी सेवाएं शुरू की थी। तब से लेकर अब तक लगभग 9+ साल हो गए हैं। जैसे-जैसे साल बीतते गए, उन्होंने नई ऊंचाइयां हासिल कीं और अपनी टीम का विस्तार लगातार कर रहे हैं। जब उन्होंने इस इस संस्था की शुरुआत की थी, तब इसमें काफी गिने चुने छात्र थे, लेकिन तब से लेकर अब तक उन्होंने देशभर के 7,000 से अधिक छात्रों और प्रोफेशनल को परामर्श दिया है और उनके करियर को आकार देने में मदद की है। इस कार्यक्रम से जुड़ना मेरे और फेसेस के लिए खुशी की बात है।