Sunday, March 22, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 125

हिंदी है भारत की बोली

गोपाल सिंह ‘नेपाली’

दो वर्तमान का सत्य सरल,
सुंदर भविष्य के सपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

यह दुखड़ों का जंजाल नहीं,
लाखों मुखड़ों की भाषा है
थी अमर शहीदों की आशा,
अब जिंदों की अभिलाषा है
मेवा है इसकी सेवा में,
नयनों को कभी न झंपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

 

क्यों काट रहे पर पंछी के,
पहुंची न अभी यह गांवों तक
क्यों रखते हो सीमित इसको
तुम सदियों से प्रस्तावों तक
औरों की भिक्षा से पहले,
तुम इसे सहारे अपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
श्रृंगार न होगा भाषण से
सत्कार न होगा शासन से
यह सरस्वती है जनता की
पूजो, उतरो सिंहासन से
इसे शांति में खिलने दो
संघर्ष-काल में तपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

जो युग-युग में रह गए अड़े
मत उन्हीं अक्षरों को काटो
यह जंगली झाड़ न, भाषा है,
मत हाथ पांव इसके छांटो
अपनी झोली से कुछ न लुटे
औरों का इसमें खपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो आपने आप पनपने दो

इसमें मस्ती पंजाबी की,
गुजराती की है कथा मधुर
रसधार देववाणी की है,
मंजुल बंगला की व्यथा मधुर
साहित्य फलेगा फूलेगा
पहले पीड़ा से कंपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो आपने आप पनपने दो

नादान नहीं थे हरिश्चंद्र,
मतिराम नहीं थे बुद्धिहीन
जो कलम चला कर हिंदी में
रचना करते थे नित नवीन
इस भाषा में हर ‘मीरा’ को
मोहन की माल जपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
प्रतिभा हो तो कुछ सृष्टि करो
सदियों की बनी बिगाड़ो मत
कवि सूर बिहारी तुलसी का
यह बिरुवा नरम उखाड़ो मत
भंडार भरो, जनमन की
हर हलचल पुस्तक में छपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

मृदु भावों से हो हृदय भरा
तो गीत कलम से फूटेगा
जिसका घर सूना-सूना हो
वह अक्षर पर ही टूटेगा
अधिकार न छीनो मानस का
वाणी के लिए कलपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
बढ़ने दो इसे सदा आगे
हिंदी जनमत की गंगा है
यह माध्यम उस स्वाधीन देश का
जिसकी ध्वजा तिरंगा है
हों कान पवित्र इसी सुर में
इसमें ही हृदय तड़पने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो

प्रो. अभिजीत भट्टाचार्य का निधन

कोलकाता । बेथुन कालेज, कोलकाता के हिंदी विभाग के प्रोफेसर रहे डॉ. अभिजीत भट्टाचार्य का शुक्रवार को घर पर ही सोते समय निधन हो गया। विद्यार्थियों और साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय अभिजीत भट्टाचार्य कई भाषाओं के जानकार थे। राहुल सांकृत्यायन पर उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से शोध भी किया था। अभिजीत भट्टाचार्य के असामयिक निधन पर पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज ने उनको श्रद्धांजलि देते हुए शोक संतप्त परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। वह बेथून कॉलेज के पहले प्रेसीडेंसी कॉलेज (अब यूनिवर्सिटी), जयपुरिया कॉलेज में भी प्राध्यापक रहे। उनके निधन से शिक्षा जगत के साथ ही साथ उनके विद्यार्थियों में शोक की लहर है।

संस्कृति की संवाहक होती हैं पुस्तकें –डॉ सत्या उपाध्याय 

कोलकाता । ‘आज के इस यांत्रिक समय में ‘मन की पीर’ और ‘विनय याचना’ जैसी  कविता पुस्तकों पर चर्चा मनुजता के कोमलतम् पक्ष के बचे रहने का संकेत है।पुस्तकें संस्कृति की संवाहक होती हैं ।इस तरह के कार्यक्रम के लिए आयोजक बधाई के पात्र है।’ ये उद्गार हैं कलकत्ता गर्ल्स कालेज की प्रिंसिपल डॉ सत्या उपाध्याय के जो श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के तत्वावधान में शनिवार को पुस्तकालय कक्ष में आयोजित ‘एक शाम किताबों के नाम ‘ के तीसरे आयोजन में बतौर अध्यक्ष बोल रहीं थी। डॉ. सत्या उपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में चयनित पुस्तकों की विशेषताओं पर चर्चा करते हुए उनके विषय वस्तु, शिल्प और भाषा के अनूठे प्रयोग को रेखांकित किया। इन पुस्तकों के समीक्षक वक्ताओं के समालोचना पर संतोष प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि ये नई पीढ़ी आश्वस्त करती है कि आने वाला समय उज्ज्वल होगा।
 कार्यक्रम में राजेन्द्र कानूनगो की कृति “विनय याचना’, जयकुमार रुसवा की काव्य कृति “मन की पीर’ तथा परमजीत पंडित की पुस्तक ‘जितेन्द्र श्रीवास्तव और उनकी जीवन दृष्टि’ पर विशेष चर्चा हुई। लेखकीय वक्तव्य के पश्चात समीक्षात्मक टिप्पणी प्रध्यापक रुद्रकांत झा, प्राध्यापिका दीक्षा गुप्ता एवं डॉ. विकास कुमार साव ने की।
कुमारसभा पुस्तकालय के अध्यक्ष महावीर प्रसाद बजाज ने इस कार्यक्रम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शताब्दी वर्ष मना चुकी महानगर की प्रतिष्ठित संस्था श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के अपने सारस्वत आयोजनों का ही एक नया आयाम है “एक शाम किताबों के नाम’। महानगर के साहित्यकारों की सद्य प्रकाशित पुस्तकों में किन्ही चयनित तीन रचनाकारों की कृतियों पर चर्चा हेतु इस मंच की स्थापना की गई है। इसमें हिन्दी के अतिरिक्त भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी एवं अन्य भाषाओं की कृतियों पर भी चर्चा होगा ।
कार्यक्रम के आरंभ में सुप्रसिद्ध  गजलकार दुष्यंत कुमार की जन्मशती का स्मरण करते  हुए शायर नन्दलाल रौशन ने  उनकी गजल की सस्वर प्रस्तुति दी । कार्यक्रम का कुशल संचालन किया डॉ. कमल कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन किया कुमारसभा के मंत्री बंशीधर शर्मा ने। इस गोष्ठी में महानगर के कई गणमान्य साहित्यकार तथा विद्वत जन एवं साहित्यप्रेमी सम्मलित हुए जिन्होंने इस सारस्वत आयोजन की सराहना की।
समारोह में सर्वश्री डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी, डॉ. तारा दुगड़, रावेल पुष्प, पवन धेलिया, ब्रह्मानंद बंग, योगेशराज उपाध्याय, सत्यप्रकाश राय, रविप्रताप सिंह, प्रो.मंटू दास,  डॉ  विक्रम साव, नेहा जयसवाल , श्रीमोहन तिवारी, रमाकांत सिन्हा, प्रो. दिव्या प्रसाद, अरविंद तिवारी, वेदप्रकाश गुप्ता, चन्द्रिका प्रसाद अनुरागी, आशाराज कानूनगो, जीवन सिंह, आलोक चौधरी, शैलेष बागड़ी, मनोज काकडा,राजकमल बांगड़, रंजीत  भारती, चन्द्रकुमार जैन, भागीरथ सारस्वत, रामपुकार सिंह एवं अरुण कुमार सिंह प्रभृति विशेष रूप से उपस्थित थे।

भवानीपुर कॉलेज के शिक्षक बने विद्यार्थी 

कोलकाता । जुबली सभागार में आयोजित गत 5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षक विद्यार्थियों के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए। विद्यार्थी सर और मैडम बने और सभी शिक्षक और शिक्षिकाओं की अटेडेंस ली। शास्त्रीय संगीत नृत्य फिल्मों के नए पुराने नृत्य गीत अंग्रेजी हिंदी बांग्ला के गीत और लघु नाटिका प्रस्तुति दी गई जो विद्यार्थियों ने विशेषकर शिक्षक दिवस पर तैयार किए गए। सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम एक से बढ़कर एक रहे। शाहरूख खान की नई पुरानी फिल्मों की प्रेम थीम पर रैंप और नृत्य का शिक्षकों ने आनंद उठाया। इन-एक्ट फ्लेम, क्रिसेंडो, आर्ट इन मी आदि विभिन्न कलेक्टिव के विद्यार्थियों ने विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए ।
इस अवसर पर सभी शिक्षकगणों को उपहार नाश्ता और शुभकामनाएँ कार्ड दिए गए। उत्सव की शुरुआत शास्त्रीय नृत्य से ज्ञान की देवी सरस्वती के आह्वान से हुई। सुबह का उत्सव डॉ. सुमन मुखर्जी के भाषण के साथ संपन्न हुआ। शाम के सत्र में असंख्य छात्रों ने प्रदर्शन करते समय अपने शिक्षकों का उत्साहवर्धन किया और उनके निरंतर मार्गदर्शन के लिए उन्हें व्यक्तिगत रूप से धन्यवाद दिया। शाम को धन्यवाद ज्ञापन टीआईसी, डॉ. सुभब्रत गंगोपाध्याय, उपाध्यक्ष कला, सुश्री देबजानी गांगुली, डॉ. पिंकी साहा सरदार वी.पी विज्ञान विभाग द्वारा किया गया । पूरे दिन के इस कार्यक्रम में शिक्षकों के चेहरों पर खुशी और प्रसन्नता लाने के लिए विद्यार्थियों ने सराहनीय कार्यक्रम । उनकी उपस्थिति की न केवल सराहना की गई, बल्कि उसका जश्न भी मनाया गया, जो हमारे जीवन पर उनके गहरे प्रभाव के प्रमाण के रूप में काम करता है। अंत में, सभी ने याद किया कि शिक्षक हमारी शैक्षिक यात्रा के मार्गदर्शक सितारे हैं और इस दिन का उत्सव हमारे जीवन में जो प्रकाश लाते हैं, उसके प्रति हमारी असीम कृतज्ञता का एक छोटा सा प्रतीक था। यह एक ऐसा दिन था जब पुरानी यादों को सराहना मिली और शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंध मजबूत हुए। विद्यार्थियों ने शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त किया क्योंकि वे उनके भविष्य को आकार देते हैं और हर दिन को वास्तव में ज्ञानवर्धक अनुभव बनाते हैं।
प्रो दिलीप शाह ने सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव के विषय में मातृ संस्थान पर अपने विचार साझा किए। शिक्षक दिवस दो सत्रों में मनाया गया। इसकी रिपोर्ट रुचिका सचदेव और फोटोग्राफी पारस गुप्ता ने की। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

गुरुजी सी. कैलाश के साथ तनाव से मुक्ति पाने पर विशेष सत्र के आयोजन की घोषणा

कोलकाता । देश की पुण्य भूमि तिरूपति के निवासी गुरुजी श्री सी. कैलाश भारत के कई स्थानों पर तनाव से मुक्ति पाने और इससे हर पल दूर करने के लिए एक विशेष सत्र का आयोजन कर रहे हैं। इस तरह के आयोजन में अपने दैनिक जीवन की गतिविधियों में परिवर्तनकारी परिवर्तन देखने को मिलेगा। इस कार्यशाला में 150 से अधिक प्रतिभागियों के शामिल होने की उम्मीद है। आज के इस प्रगतिशील युग में हमारी जीवनशैली में काम के प्रति प्रतिबद्धताएं, छात्रों, पेशेवरों, व्यक्तियों में पढ़ाई का दबाव, सभी में एक सामान्य बात है। इस तरह के आयोजन में शामिल होने से तनाव को कम करने के साथ अपने जीवन को खुशमिजाज बनाया जा सकता है, जिससे व्यक्ति बेहतर संबंधों के साथ जीवन जी सके। इस इंटरैक्टिव सत्र से लाभ प्राप्त करने के लिए सभी को आमंत्रित किया जाता है। इस कार्यक्रम की मेजबानी और प्रस्तुतीकरण डेविड और गोलियथ शॉर्ट्स द्वारा ट्विस्टेड ट्रुथ्स द्वारा किया जाएगा। कोलकाता शहर के लिए तनाव को कम करने का इस तरह का सत्र का आयोजन करना समय की मांग है।

आगामी 18-19 नवंबर 2023 को कोलकाता में प्रमुख सत्र का आयोजन किया गया है।कोलकाता के सैटरडे क्लब में आयोजित इस आयोजन के कर्टेन रेज़र में इसकी विस्तृत जानकारी दी गई कि, दर्शक तनाव को कैसे कम कर तनाव मुक्त और खुशमिजाज रह सकते हैं। इस कार्यक्रम में शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक तनाव के प्रभावों पर भी ध्यान केंद्रित किया जायेगा। इस सत्र में लोगों के बीच संतुलन, बिना झुके चुनौतियों और दबावों का सामना करने की ताकत भी ऐसे विषय थे जिन पर चर्चा होगी।

इस कार्यक्रम में श्री गुरुजी सी. कैलाश की प्रशिक्षित शिष्या एवं प्रवक्ता सीमा जी का परिचय, गुरुजी के साथ सीमा जी की यात्रा और तनाव प्रबंधन के क्षेत्र में उनके अनुभव पर संक्षिप्त जानकारी दी जाएगी। “प्रकटीकरण की भूमि” के रूप में तिरूपति के महत्व और गुरुजी की शिक्षाओं पर भी प्रकाश डाला जायेगा। गुरुजी सी. कैलाश ने कहा, “आपको ऐसा लग रहा होगा कि आप अपने तनाव के स्तर के को लेकर कुछ नहीं कर सकते, लेकिन जितना आप सोच सकते हैं, उससे कहीं अधिक आपके पास इसे कम करने का नियंत्रण है। यदि आप उच्च स्तर के तनाव के साथ जी रहे हैं, तो आप अपनी संपूर्ण जीवन को को खतरे में डाल रहे हैं। तनाव आपके भावनात्मक संतुलन के साथ-साथ आपके समग्र शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर कहर बरपाता है। यह आपकी स्पष्ट रूप से सोचने, प्रभावी ढंग से कार्य करने और जीवन का आनंद लेने की क्षमता को कम कर देता है।आपके तनाव के स्तर को प्रबंधित करने के लिए हमारे पास आपके लिए सबसे अच्छा समाधान है।”

बॉर्न 2 डांस डांसर्स पैराडाइज़ भव्य नृत्य प्रतियोगिता का ग्रैंड फिनाले संपन्न

कोलकाता । भारत की सबसे बड़ी डांस चैंपियनशिप – “बॉर्न 2 डांस – डांसर्स पैराडाइज” हाल ही में आयोजित की गयी ।बॉर्न 2 डांस डांसर्स पैराडाइज प्रतियोगिता के ग्रैंड फिनाले को बॉलीवुड कोरियोग्राफर टेरेंस लुईस और डीआईडी फेम सौरभ बंगानी ओर विवेक जायसवाल बतौर निर्णायक उपस्थित थे । इस अवसर पर अभिनेत्री तृणा साहा साहा, अभिनेता नील भट्टाचार्य, डीआईडी फेम कलाकार कमलेश पटेल  के साथ आर जे प्रवीण और समाज की कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां मौजूद थीं । डीआईडी फेम, सौरभ और विवेक ने कहा, बॉर्न 2 डांस का काफी बेहतरीन तरीके से समापन किया गया है। इस आयोजन में नृत्य कौशल के मामले में हमारे लिए वास्तविक और बेहतरीन प्रतिभा का आकलन करना काफी मुश्किल था। हमने चैंपियन ऑफ चैंपियंस को एक शानदार ट्रॉफी के साथ-साथ एक लाख रुपये की नकद राशि पुरस्कार के तौर पर देकर सम्मानित किया है। चूंकि हम कई रियलिटी शो का हिस्सा रहे हैं, इसलिए हम इसका हिस्सा बनने की कठिनाई को बखूबी समझते हैं। इसलिए, हमने बॉर्न 2 डांस लॉन्च करने का फैसला किया, जहां दुनिया भर के लोग एक डांस प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं और रियलिटी शो का हिस्सा बनने में सक्षम होने के लिए हमारे द्वारा तैयार और प्रशिक्षित होने का मौका पा सकते हैं। इस आयोजन का एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के माध्यम से योग्य नृत्य उम्मीदवारों की प्रतिभा को एक मंच प्रदान करके सामने लाना था। 1 से 3 सितंबर तक चले इस डांस कार्निवल में 5000 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लेकर अपनी प्रतिभा दिखाई । बॉलीवुड कोरियोग्राफर टेरेंस लुईस ने कहा, “बॉर्न 2 डांस, फेम – डीआईडी डबल्स फाइनलिस्ट, सौरभ और विवेक के दिमाग की उपज है, जो खुद कई रियलिटी शो का हिस्सा रहे हैं और उनमें से कई में विजयी भी हुए हैं। बॉर्न 2 डांस न केवल भविष्य के विशेषज्ञ नृत्य कलाकारों को ढूंढेगा और उनके नृत्य को एक अलग स्तर पर ले जाकर इस क्षेत्र के अग्रणी विशेषज्ञों के सामने प्रदर्शन करने का अवसर प्रदान करेगा।

ग्रैंड फिनाले के विजेता: • चैंपियंस ऑफ चैंपियंस – योगी हिमु (डुएट) • सोलो ए (3 वर्ष से 8 वर्ष) – प्रथम – सायन द्युति भौमिक, द्वितीय – आशी हरीश पुनिकर, तृतीय – पहल ठक्कर

• सोलो बी (9 वर्ष से 15 वर्ष) – प्रथम – बलदेव सिंह, द्वितीय – सौम्यजीत पाल, तृतीय – सुभांगी दास

• सोलो सी (16 वर्ष से आगे) – प्रथम – सुशांत सिंह, द्वितीय – सुभाशीष मलिक, तृतीय (टाई) – भूषण टांडेकर + सौविक मंडल

• डुएट (कोई आयु सीमा नहीं) – प्रथम – योगीहिमु, दूसरा – प्यारे मित्र (सत्यम और सिमरन), तीसरा – कुंतल और भास्कर

• ग्रुप (न्यूनतम 3) – प्रथम – द फ्लो इंडिया, दूसरा – द डार्क डायनेस्टी, तीसरा (टाई) – यूडी गैंग + एस्ट्रा डांस एंड फिटनेस सेंटर

• माँ और दादी माँ – प्रथम – काबेरी रॉय, द्वितीय – मुनमुन रॉय, तृतीय – निशा उपाध्याय

उच्च शिक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है राजनीतिक हस्तक्षेप

भारतीय भाषा परिषद ने आयोजित किया शिक्षक सम्मान समारोह

कोलकाता । भारतीय भाषा परिषद के सभागार में आज पश्चिम बंगाल के विभिन्न विश्वविद्यालयों, कॉलेजों तथा स्कूलों के 21 शिक्षकों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। वर्ष 2023 का शिक्षा सम्मान पाने वाले पूर्व शिक्षक हैं- प्रो. मंजुरानी सिंह (विश्वभारती, शांनिनिकेतन), डॉ. सुनंदा राय चौधुरी (योगेशचंद्र चौधरी कॉलेज), डॉ. किरण सिपाणी (आचार्य जगदीश चंद्र बसु कॉलेज), डॉ. रेवा जाजोदिया (बंगबासी इवनिंग कॉलेज), डॉ. कुसुम राय (मानकर कॉलेज, बर्दवान)। वर्तमान वरिष्ठ प्रोफेसर और अध्यापक हैं- प्रो. रूपा गुप्ता (बर्दवान विश्वविद्यालय), प्रो. सुचरिता बंद्योपाध्याय, प्रो. जरीना जरीन (कलकत्ता विश्वविद्यालय),  मीनाक्षी चतुर्वेदी (भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी), डॉ. विभा कुमारी (कल्याणी विश्वविद्यालय), श्रीमती अल्पना नायक (श्री शिक्षायतन कॉलेज), डॉ. शुभ्रा उपाध्याय (खुदीराम बोस कॉलेज), डॉ. संजय कुमार (लालबाबा कॉलेज), ममता त्रिवेदी (योगेशचंद्र चौधरी कॉलेज), डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी (गोखले गर्ल्स कॉलेज),  रेखा शॉ (डानबास्को, पार्क सर्कस),  कविता कोठारी (श्री शिक्षायतन स्कूल), अमरजीत पंडित (हाजीनगर आदर्श हिंदी विद्यालय), बलवंत सिंह (लॉ मार्टिनियर) और  बलवंत यादव (लायला हाई स्कूल)।
इसके बाद हाल ही गुजरे दो शिक्षकों रेखा सिंह एवं अभिजीत भट्टाचार्य के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करते हुए एक मिनट का मौन धारण किया गया। इस अवसर पर आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने शिक्षा को पेशा के साथ एक विशिष्ट शैली भी माना। शिक्षा सम्मान का उद्घाटन करते हुए डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा कि सही शिक्षा वह है जिसमें हम अपनी आत्मा और सत्य को पहचान सकें। प्रो. राजश्री शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि परिषद पश्चिम बंगाल के इन सभी शिक्षकों को सम्मानित करते हुए गौरव का बोध कर रही है। संचालन करते हुए प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि शिक्षक हमारे चित्त की उच्चता की रक्षा करते हैं। वे समाज और बच्चों के मार्गदर्शक हैं
सम्मानित शिक्षकों के बीच से आभार व्यक्त करते हुए विश्वभारती की प्रो.मंजुरानी सिंह ने कहा कि शिक्षकों को सम्मानित करने की परंपरा का हम अभिनंदन करते हैं। यह सम्मान सारे शिक्षकों का है। उच्च शिक्षा के समक्ष चुनौतियां विषय पर परिचर्चा में भाग लेते हुए आईलीड के चेयरमैन श्री प्रदीप चोपड़ा ने कहा कि हमें शिक्षा प्रदान करने के तरीके में बदलाव की बहुत जरूरत है। अपनी शिक्षा को आजीविका के साथ जोड़ना होगा। भवानीपुर एजूकेशन सोसायटी कॉलेज के डीन-रैक्टर प्रो.दिलीप शाह ने कहा कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्र विदेश न जाएं इसके लिए यहां अवसर तैयार करना होगा। साथ ही कहा कि आज हर शिक्षक को हमेशा अपडेट रहने की जरूरत है।
हैरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डायरेक्टर प्रो. बासव चौधरी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमारी शिक्षा को काफी ऊंचा करने की जरूरत है। हमें शिक्षा को निरंतर जीवन का अंग बनाना होगा तभी कोई बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं। हमें आज क्रिएटिव पिपुल तैयार करने की जरूरत है। स्वशिक्षण की बेहद आवश्यकता है। रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के इतिहास विषय के अध्यक्ष प्रो. हितेंद्र पटेल ने वर्तमान शिक्षा की समस्याओं पर बात की। उन्होंने रवींद्र और गांधी के संदर्भ में बात रखते हुए कहा कि आज भारत की शिक्षा-व्यवस्था को अकेडेमिनयन ने सत्यानाश कर दिया है। आज की क्राइसिस बनाई हुई क्राइसिस है। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए विशिष्ट शिक्षाविद डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि एक सफल शिक्षक का काम विद्यार्थियों में विषय के प्रति जिज्ञासा और गहरा सरोकार पैदा करना है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि 10 सालों के बाद संभव है मेधारोबो, आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस की मशीनें ही प्रोफेसर बनेंगी। मंच पर परिषद के वित्त सचिव श्री घनश्याम सुगला भी उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन बिमला पोद्दार ने किया।

शिक्षा हमें स्वालंबी और स्वाभिमानी बनाती है : प्रो.दामोदर मिश्र

मिदनापुर । विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से शिक्षक दिवस के अवसर पर ‘शिक्षा का महत्व’ विषय पर आयोजित विभागीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.दामोदर मिश्र ने कहा शिक्षा हमें ज्ञानी और निर्भय बनाती है। विद्या एकल साधना है और इस साधना का कोई अन्य विकल्प इस धरा पर नहीं है।विद्या तभी सफल होती है जब हम वह हमारे व्यवहार, संस्कार और संस्कृति का हिस्सा बनती है।शिक्षा हमें स्वालंबी बनाने के साथ स्वाभिमानी बनाती है।उन्होंने मावत्से का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा के जरिए हम उस ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं,जहां राजनीति और व्यवस्था नहीं पहुंच सकती। विभागाध्यक्ष डॉ प्रमोद कुमार ने अपने संदेश में कहा कि शिक्षा का संबंध एक सुंदर समाज के निर्माण से है।इस अवसर पर सहायक प्रोफेसर डॉ संजय जायसवाल ने कहा एक शिक्षक अपने विधार्थियों के भीतर ज्ञान, संवेदना,कर्म और मनुष्यता का बीज बोता है। समकालीन परिदृश्य में शिक्षा को सफलता से जोड़ कर देखा जाता है जबकि शिक्षा कर्म के बिना अधूरा है। शिक्षा कर्म को नैतिकता से जोड़कर मनुष्यता को बचाते हुए जीवन को सार्थक बनाती है।डॉ श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि शिक्षा का संबंध व्यक्तित्व के विकास के साथ समाज के निर्माण से है।
इस अवसर पर विभाग की शोधार्थी उष्मिता गौड़ा, सोनम सिंह, रूपेश यादव, रिया श्रीवास्तव, टीना परवीन, सुषमा कुमारी ,एलुमनी अन्नू तिवारी तथा स्नातकोत्तर तृतीय सेमेस्टर के विद्यार्थी श्रेया सरकार,,नाजिया सनवर,निशा कुमारी, प्रिंशु कुमारी, पूजा कुमारी,,प्रिया कुंभकर,संगीता बिंद,मुस्कान अग्रवाल, सत्यम पटेल,कलाम कुरैशी, फिजां खातून,राया सरकार आदि ने आयोजन में विशेष सहयोग दिया।कार्यक्रम का सफल संचालन नेहा शर्मा ने किया।

विश्व हितैषी स्वामी विवेकानन्द

शुभांगी उपाध्याय

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैवकुटुम्बकम् ॥ (महोपनिषद्, अध्याय ६, मंत्र ७१)
यह नीति वाक्य सदियों से हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति और भारतवर्ष के श्रेष्ठ चरित्र का परिचायक है। विश्व के इतिहास में एक स्वर्णिम कालखण्ड ऐसा भी रहा है जब भारत समस्त मानव जाति का नेतृत्व करता था। हर क्षेत्र में भारत सर्वोच्च शिखर पर हुआ करता था। सर्वशक्तिमान होने के पश्चात भी हमने कभी भी अपना-पराया नहीं किया वरन् सबको अपना माना। सबकी सहायता, सबके विकास के लिए सदैव तत्पर इस महान शांतिप्रिय राष्ट्र ने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। परन्तु दुर्भाग्यवश हम पर सदैव ही चहुं दिस आक्रमण हुए और परिणाम स्वरूप एक दिन यह देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा गया।
परतंत्रता रूपी इस अंधकार ने भारत के स्वाभिमान को ऐसा ग्रहण लगाया कि भारतवासी अपना आत्म-विश्वास ही खो बैठे। क्रूर अंग्रेजी शासकवर्ग भौतिकवाद से ग्रस्त थे और अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति हेतु सब पर अमानवीय अत्याचार करते थे। ऐसा प्रतीत होता था मानों प्रेम, करुणा, उदारता, संवेदनशीलता, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता जैसे मूल्य अपना अस्तित्व खोते जा रहे थे। ऐसे में, सन् 1863, 12 जनवरी को भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता में ऐसे सूर्य का उदय हुआ जिसके ज्ञान के प्रकाश से युगों- युगों तक दुनिया आलोकित होती रहेगी।
19वीं शताब्दी के इस महानायक को हम सभी स्वामी विवेकानन्द के रूप में याद करते हैं। स्वामीजी प्राचीनता और आधुनिकता का मिश्रण थे। उनमें प्राचीन भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन और अपने पूर्वजों के प्रति जहां अपार श्रद्धा थी वहीं उनके आधुनिक विचार तत्कालीन रूढ़िगत परंपराओं का खण्डन भी करते थे। बचपन में उनके घर पर विभिन्न जातियों एवं संप्रदायों के लोगों की आवाजाही होती थी अतएव सभी को भिन्न-भिन्न हुक्के दिए जाते थे। स्वामीजी ने प्रत्येक हुक्के से एक-एक कश केवल जिज्ञासावश लगाया कि यदि जातिगत नियमों को तोड़ दिया जाए तो क्या परिणाम होंगे ?
11 सितम्बर 1893 (भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, विक्रम संवत 1949, युगाब्द 4995), पश्चिमी क्षितिज पर भारत के ज्ञानोदय का अविस्मरणीय और ऐतिहासिक दिवस बन गया। अमेरिका के शिकागो शहर में ‘विश्व धर्म संसद’ का आयोजन हुआ था जिसमें दुनियाभर के दस प्रमुख संप्रदायों के अनेक प्रतिनिधि पूर्ण तैयारी से आए हुए थे, जिसमें यहूदी, हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, ताओ, कन्फ्यूशियस, शिन्तो, पारसी, कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट इत्यादि शामिल थे। ‘आर्ट इंस्टीट्यूट’ का विशाल सभागार लगभग 7000 श्रोताओं से खचाखच भरा हुआ था। भारत के हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए जब मात्र 30 वर्षीय नवयुवक, स्वामी विवेकानन्द स्वागत का उत्तर देने हेतु मंच पर जाते हैं तब माता सरस्वती को स्मरण कर वह बोल उठते हैं, “अमेरिका वासी बहनों और भाइयों!” स्वामीजी के केवल इतना कहते ही सभी लोग खड़े हो गए और पूरा सभागार अगले 2 मिनट तक तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।


यह घोर करतल नाद उस संन्यासी के सम्मान में हुआ था जिसे कुछ क्षण पूर्व हीन भावना से देखा गया था, जिसने अमेरिका की भीषण ठंड में स्वयं की रक्षा हेतु रात भर रेलवे के माल यार्ड में पड़े बक्से में बिताया, जिनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया, रंगभेद का शिकार बनाया गया, नीग्रो, काला कुत्ता आदि अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया गया। इन सभी कठिनाइयों का सामना कर, अपार सहनशीलता के साथ इस महायोगी ने समस्त संसार को “विश्वबन्धुत्व” का ही अमृत संदेश प्रदान किया।
कुल 17 दिनों (11 से 27 सितंबर, 1893) तक चलने वाले विश्व धर्म संसद में स्वामीजी ने 6 व्याख्यान दिए,। क्रमशः स्वागत का उत्तर ( 11 सितम्बर), हम असहमत क्यों हैं (15 सितम्बर), हिन्दुत्व पर शोध-प्रपत्र (19 सितम्बर), धर्म भारत की मुख्य आवश्यकता नहीं (20 सितम्बर), बौद्ध धर्म – हिन्दू धर्म की पूर्णता (26 सितंबर), अंतिम सत्र में संबोधन (27 सितम्बर)।

एक ओर जहां वैश्विक मंच पर अन्य धर्मावलंबियों ने केवल अपने ही धर्म को सच्चा बताया और बाकी धर्मों की निंदा की वहीं, स्वामीजी ने अपने वक्तव्य में अपने गौरवशाली हिन्दू धर्म के विषय में कहा कि, “मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।”
भारत सदैव सर्वे भवन्तु सुखिन: की सोच रखता है और विपदा में मित्र की भांति सबका साथ देने वाला देश रहा है, जिसका वर्तमान युग में भी प्रचुर उदाहरण मिल जायेगा! वैश्विक महामारी कोरोना के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में विश्व के 120 देशों में बिना किसी शर्त और मूल्य के भारतीय वैक्सीन भेजकर उन्हें संकट से उबारा, तुर्की देश जो कई मुद्दों पर भारत का घोर विरोधी रहा है, में भूकंप के समय यथोचित सहायता पहुँचाना इत्यादि। भारत की इसी बंधुत्व भावना को उजागर करते हुए स्वामीजी आगे कहते हैं,
“मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्त्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है।”
“हिन्दुत्व पर शोध-प्रपत्र” विषय पर स्वामी विवेकानन्द ने 19 सितम्बर को जो भाषण दिया वह अत्यन्त महत्वपूर्ण और चर्चित भाषण था। मानो इसी कार्य के लिए उन्हें अपने गुरु ठाकुर श्रीरामकृष्ण परमहंस देव का आदेश और भारत माता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। उनके आह्वान के ओजस्वी शब्दों की शक्ति थी वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता की पावन वाणी! स्वामीजी के प्रत्येक भाषण का अमेरिकी जनमानस पर अद्वितीय प्रभाव पड़ा। प्रशंसा करते हुए कुछ ने यह भी कहा, “ऐसे विद्वान राष्ट्र में मिशनरी भेजना तो निरी मूर्खता है। वहाँ से तो हमारे देश में धर्मप्रचारक भेजे जाने चाहिए।” हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. जॉन हैनरी राइट ने तो यहां तक कहा कि, “स्वामीजी, आपसे आपकी योग्यता का प्रमाण-पत्र माँगना, तो सूर्य से उसके चमकने का अधिकार पूछने जैसा है।”

महर्षि अरविन्द ने कहा था, “स्वामी विवेकानन्द का पश्चिम में जाना, विश्व के सामने पहला जीता जागता संकेत था कि भारत जाग उठा है, न केवल जीवित रहने के लिए बल्कि विजयी होने के लिए।” स्वामीजी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पश्चिम में भारतीय सनातन संस्कृति, वेदान्त दर्शन और योग को केवल प्रस्तुत ही नहीं अपितु प्रतिष्ठित भी किया। अमेरिका के विभिन्न प्रान्तों में उनके बड़े-बड़े पोस्टर लगे, दुनिया भर के समाचार पत्र उनकी प्रशंसा और वंदन से भरे हुए थे। धर्म संसद के पहले ही भाषण से स्वामीजी विश्व विख्यात हो गए थे! उनके सम्मान में उस रात राजोचित सत्कार का आयोजन किया गया। स्वामीजी का कक्ष भौतिक सुख-सुविधाओं से लैस था परन्तु एक संन्यासी को उस विलासितापूर्ण बिछौने पर नींद कहां आती! उनका कोमल हृदय तो अपनी मातृभूमि की दशा पर द्रवित हो उठा, जिसे विगत 5 वर्षों तक भ्रमण के दौरान उन्होंने स्वयं अनुभव किया था! सारी रात वह शिशु के समान फूट-फूट कर रोते रहे और ईश्वर के सम्मुख अपने भारत के पुनरुत्थान की प्रार्थना करते रहे।
स्वामीजी का विशाल हृदय केवल भारत ही नहीं अपितु अन्य देश के पतितों और दीनों के लिए भी क्रंदन करता था। एक बार एक रेलवे स्टेशन पर जब वे गाड़ी से उतर रहे थे, उनका भव्य स्वागत किया जा रहा था, तभी वहां एक नीग्रो कुली ने आगे बढ़कर उनसे हाथ मिलाते हुए कहा, “बधाई! मुझे बेहद खुशी है कि मेरी जाति के एक व्यक्ति ने इतना बड़ा सम्मान प्राप्त किया है। इस देश के पूरे नीग्रो समुदाय को आप पर गर्व है।” स्वामीजी ने उससे स्नेहपूर्वक हाथ मिलाया और विनम्रता से कहा, “धन्यवाद भाई धन्यवाद!” वास्तव में इतनी प्रसिद्धि होने के पश्चात भी स्वामीजी को कई बार अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ा था। अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में नीग्रो समझकर कई होटलों में उन्हें प्रवेश करने से रोका गया परन्तु उन्होंने कभी यह उजागर नहीं किया की वे नीग्रो नहीं हैं या वे भारतीय हैं। एक पश्चिमी शिष्य ने उनसे पूछा कि ऐसी स्थितियों में वे सत्य जाहिर क्यों नहीं करते? जिस पर स्वामीजी ने तनिक क्रोधित स्वर में उत्तर दिया, “क्या! दूसरों को नीचा दिखाकर मैं ऊपर उठूँ! मैं इस पृथ्वी पर इसलिए नहीं आया हूँ।”
स्वामीजी ने वैश्विक स्तर पर पराधीन भारत का मान बढ़ाकर, उसके सोए हुए आत्म विश्वास को पुनः जागृत कर नवशक्ति का संचार किया। इस चराचर जगत के कण-कण में ईश्वर दर्शन करने वाले इस दिव्य पुरुष ने अपने भारतवासियों का आह्वान करते हुए कहा, “मेरे भारत! जागो! और जनसमूह का उद्धार करो।” वर्तमान समाज सांप्रदायिकता की अग्नि में झुलस रहा है। कोई देश अपनी सीमाओं के विस्तार हेतु अतिक्रमण कर रहा है तो कहीं धर्म के नाम पर जिहाद हो रहा है। सब अपने को श्रेष्ठ और महान बताने की होड़ में लगे हुए हैं। ऐसे में स्वामीजी के “विश्वबन्धुत्व” का सन्देश ही मानवीय मूल्यों की रक्षा करने की क्षमता रखता है क्योंकि यह संसार को सहिष्णुता और सार्वभौम स्वीकृति की सीख देता है।
(लेखिका शुभांगी उपाध्याय, कलकत्ता विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. शोधार्थी हैं ।)

समरसता के प्रतीक श्रीकृष्ण

शुभांगी उपाध्याय

भारतवर्ष ने जहां एक ओर विदेशी आक्रांताओं का दंश झेला, अत्याचार सहे वहीं दूसरी ओर इस पुण्यभूमि पर अनेकों महापुरुषों, ऋषि-मुनियों ने जन्म लिया। इस देवभूमि को तो साक्षात ईश्वर की माता कहलाने का भी गौरव प्राप्त है और हम भरतवंशियों को ईश्वर का वंशज कहलाने का परम सौभाग्य मिला है। भारतीय संस्कृति में अनेक अवतार हुए परन्तु श्रीकृष्ण उनमें सबसे लोकप्रिय हैं। भक्तवत्सल भगवान श्री हरि विष्णु जी के आठवें अवतार श्रीकृष्ण 64 कलाओं के ज्ञाता थे इसी कारण उन्हें पूर्ण पुरुष भी कहा जाता है। श्रीकृष्ण प्रेम की मूरत हैं। उनके नटखट बाल स्वरूप की तो दुनिया दीवानी है। उनके जन्म के हजारों वर्षों पश्चात भी प्रभु की सुमधुर बाल लीलाएं इतनी प्रसिद्ध हैं कि भारत की हर माता वात्सल्य में अपने लाल को कान्हा ही पुकारती है। आज भी “मैय्या मोरी मैं नहीं माखन खायो” जनमानस का प्रिय भजन है ।

आज भी राधाजी और  श्रीकृष्ण  की प्रेम कहानी प्रेमियों के लिए आदर्श है। मित्रता की जब भी चर्चा होती है तो यहां सर्वप्रथम द्वारिकाधीश और सुदामा का ही उदाहरण दिया जाता है। उनकी मित्रता की करुण कथा से सबकी आँखें नम हो जाती हैं। स्त्री अस्मिता पर जब आँच आती है तो सुदर्शन चक्रधारी का न्याय याद आता है। श्रीकृष्ण के नारीवाद के समक्ष संसार के समस्त तथाकथित नारीवाद फीके पड़  जाते हैं। प्रभु ने हर रिश्ते को  जी भर जिया है और समाज के समक्ष श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत किया है । जब श्रीकृष्ण धरती पर मनुज रूप में अवतरित हुए तब साधारण मनुष्य की भांति ही उनका भी जीवन कष्टों, संघर्षों और पग-पग पर चुनौतियों से भरा हुआ था। उनके जन्म से पूर्व ही उन्हें मारने का षड्यंत्र रच दिया जाता है। राजकुमार होते हुए भी कारागृह में जन्म और तत्क्षण अपने माता-पिता से वियोग सहना पड़ता है ।प्रतिक्षण मृत्युका सामना करने वाले बालगोपाल सदैव आनंदित ही रहते थे। वह जो भी कार्य करते उसमें जनकल्याण का भाव छिपा रहता । यही कारण है कि “माखन चो री से लेकर महाभारत  युद्ध ”को भी प्रभु की लीला ही कहा जाता है ।

माखन चोरी का उद्देश्य : भक्तगण तो माखन चोरी  को मात्र अपने कन्हैया की लीला समझकर वात्सल्य रस में डूब जाते हैं परन्तु  गुणीजनों ने इस संदर्भ की विविध प्रकार से व्याख्या की है ।तत्कालीन परिस्थिति यह थी कि मथुरा में अत्याचारी कंस का शासन था । नंदगांव, बरसाना, गोकुल, वृंदावन और आस -पास के इलाकों में अहीर अथवा यादव दुग्ध का व्यापार करते थे, पशुपालन, गौ पालन करते थे ।अपने क्रूर राजा के आदेशानुसार वे लोग घी, दही, छाछ, मक्खन, मलाई बनाते थे परन्तु उसका एक छटांक भी वे अपने परिवार के लिए नहीं रख पाते । भयवश मक्खन आदि के पात्र को मटके में भरकर बच्चों की पहुँच से दूर, रस्सी में बांध कर लटका दिये जाते । ।समय आने पर सभी वस्तुओं को मथुरा भेज दिया जाता जहां बड़े- बड़े घरों में लोग दूध पान करते, कंस  की दोनों  रानियां अपने सौन्दर्य  के लिए  मक्खन का लेप करती, दुग्ध स्नान करती । अपने अधिकार को जताने हेतु ही श्रीकृष्ण ने बाल-सखाओं के साथ मिलकर माखन चोरी की लीला की थी। इस लीला में चार मण्डल बने। सबसे पहले हृष्ट-पुष्ट बालकों का समूह खड़ा होता, जो आज के संदर्भ में मजदूर वर्ग हैं अर्थात शारीरिक श्रम करने वाले लोग जिनमें अथाह बल होता है। उसके ऊपर सबकी सुरक्षा करने वाला क्षत्रिय वर्ग,  उसके ऊपर वैश्य वर्ग जिनके व्यापार के कारण ही हमें तमाम आवश्यक वस्तुएं प्राप्त होती हैं और अंत में ब्राह्मण वर्ग जो अमूमन शारीरिक रूप से बहुत बलिष्ठ नहीं होता । इन सबके ऊपर सबकी रक्षा और सम्मान करने वाले भगवान श्रीकृष्ण चढ़ते और मटकी फोड़कर जो भी नवनीत प्राप्त होता वह सब में बांट देते । इसीलिए तो उन्हें योगेश्वर भी कहा जाता है ।

इस लीला से यह सन्देश मिलता है कि यदि किसी व्यक्ति को समाज का मक्खन अर्थात शिक्षा, सम्मान, यश, वैभव,धन-दौलत, प्राप्त हुआ है तो उसका कर्तव्य बनता है कि समाज के हर वर्ण के साथ वह उसे बांटे। क्योंकि उसने जो भी पाया है समाज के हर वर्ग से पाया है। सरलतम शब्दों में इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि यदि अन्नदाता किसान खेती करना छोड़ दे तो अपार धन-संपदा का स्वामी होने के पश्चात भी क्या अन्न का एक दाना भी नसीब हो सकता है? यदि सफाई कर्मचारी हमारे द्वारा फैलाई गंदगी को साफ करने से मना कर देतो क्या उस  परिवेश में जीवित रहा जा सकता है?  यदि सेना राष्ट्र रक्षा करना छोड़ दे तो क्या कोई चैन की नींद सो पाएगा? यदि शिक्षक ज्ञान धारा को रोक दे तो क्या कोई ज्ञानी बन सकता है?

स्वामी विवेकानंद कहते थे, “ जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञानी है; तब तक मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हूँ जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उनकी ओर ध्यान नहीं देता ।”स्पष्ट है कि हम सब अपने समाज  के ऋणी होते हैं। अपने देश का ऋण सबसे बड़ा ऋण होता है, यदि इसका एकांश भी चुका पाए तो बाकी सब ऋण स्वतःही उतर जाता है। अतः हमें अपने भीतर सेवा, करुणा और संवेदनशीलता और दायित्वबोध को बढ़ाना होगा।“ जीवने या वदादानंस्यात्प्रदानं ततोऽधिकम्” जैसे महामंत्र को मन में धारण कर परमार्थ में जुटना होगा। यही हमारा कर्म भी है और धर्म भी ।

रासलीला का सन्देश :- सदैव स्थिरप्रज्ञ रहने वाले योगेश्वर श्रीकृष्ण परमानंद की मूर्ति  थे ।वह कहते थे की  जीवन को उत्सव के समान जीना चाहिए। रासलीला का परिदृश्‍य ऐसा है की चारों ओर संकटों के बादल मंडराए हुए थे। दुराचारी कंस, जरासंध और उसके आसुरी मित्रों का आतंक अपने चरम पर था ।नित नवीन षड्यंत्र रचकर श्रीकृष्ण की हत्या का प्रयास किया जाता। ऐसी विकट परिस्थिति में भी मुरलीधर ने अपनी बंसी पर तान छेड़कर गोपियों के साथ आनंदित हो नृत्य किया । कान्हा जी हमें छोटे-छोटे क्षणों का आनन्द उठाना सिखलाते हैं। भविष्य की चिंता न करके वर्तमान में जीना सिखलाते हैं। हर प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं पर नियंत्रण, विधाता पर विश्वास, सकारात्मकता, शांति और आनंद बनाए रखना ही रास कहलाता है। हम सब गोपियां ही तो हैं जो कुंठित हैं और यदि ईश्वर में चित्त लगा लें तो सदा के लिए आनंद की अमृतधारा म डूब जायेंगे और यह समझ जायेंगे की संकट अस्थायी है और बिना विचलित हुए भी उसका सामना किया जा सकता है । श्रीभगवान गीता में स्वयं ही अपने जन्म का कारण बताते हुए कहते हैं,

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4-8॥”

महाभारत काल  में जब युद्ध से पहले ही भटके हुए योद्धा अर्जुन ने हथियार डाल दिए थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे मार्ग पर लाने के लिए जो ज्ञान की गंगा बहाई उसे हम गीता कहते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं है वरन् प्राणी मात्र के कल्याण का दुर्लभ ग्रंथ है। संसार भर के विभिन्न क्षेत्र के दिग्गजों, विद्वानों और महापुरुषों ने इस ग्रंथ को अपना जीवन आदर्श और प्रेरणा माना है । जीवन रूपी  महासमर में हम सब भी उसी भटके हुए अर्जुन के समान हैं परन्तु हम वीर,पराक्रमी योद्धा अर्जुन की तरह शारीरिक, मानसिकऔर आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं हैं । अतः प्रत्यक्ष रूप से तो ईश्वर हमारे लिए प्रकट नहीं हुए तथापि गीता के रूप में अवश्य हमारे सारथी बनकर आए हैं। यह ग्रंथ समस्त वेद, पुराणों का सार है । इसे विश्व का पहला मनोवैज्ञानिक ग्रंथ कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः इसमें जीवन के हर रहस्य, हर प्रश्न का उत्तर व्याप्त है। जिस प्रकार कलियुग के प्रत्येक पात्र को महाभारत में ढूंढा जा  सकता है उसी प्रकार इस युग की हर समस्या का निदान गीता जी में व्याप्त है।

गोपियों की भांति एक दिन के लिए नृत्य करके, सज-संवर के सोशल मीडिया पर सेल्फी डालकर, लड्डू गोपाल जी को झूला झुलाकर, स्वयं के स्वाद हेतु केक, चॉकलेट, बिस्कुट, कोल्ड ड्रिंक आदि अशोभनीय पदार्थों का तथाकथित भोग लगाने जैसा अशास्त्रीय आचरण करके भगवद् प्राप्ति हो या न हो किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर निश्चित रूप से परम ब्रह्म की अनुभूति की जा सकती है। जीवन जीने की कला गीता पढ़कर ही आएगी, सफल और सार्थक जीवन का मंत्र हमें उसी से प्राप्त होगा ।अतः इस जन्माष्टमी श्री गीता जी को लाल कपड़े में लपेटकर, धूप-बत्ती जलाकर मन्दिर में न सजाएं अपितु संकल्प लें की दैनिक जीवन में नित्य इसका पाठ करेंगे और एक सार्थक जीवन की ओर अग्रसर होंगे।

(लेखिका,कलकत्ता विश्वविद्यालय में  पी.एच.डी शोधार्थी हैं। )