कोलकाता । गत 31 अक्टूबर 2023 को सुजाता देवी विद्या मंदिर के प्रांगण में लिटिल थिस्पियन का 19 वाँ रंग अड्डा संपन्न हुआ l अक्टूबर महीने के रंग अड्डा के मुख्य केंद्र में त्रिपुरारी शर्मा,शंकर शेष और उषा किरण खान रही । खिदिरपुर कॉलेज की पांचवें सत्र की विद्यार्थी सुनीता कुमारी बिंद ने त्रिपुरारी शर्मा का जीवन परिचय प्रस्तुत किया l त्रिपुरारी शर्मा जी के नाटक अक्स पहेली और बहू नाटक में मानसिक और बौद्धिक द्वंद विषय पर आलेख पार्वती कुमारी शॉ ने प्रस्तुत किया l पार्वती ने इस आलेख के माध्यम से हमें दिखलाया की रामायण और महाभारत की जो कहानी है, वह पुरुष के द्वारा लिखित कहानी है इसलिए उनमें जो सोच है, पुरुष पात्र को महत्वपूर्ण और बलशाली दिखलाता है और स्त्री को दयनीय दिखलाया गया है l पार्वती ने यह प्रश्न खड़ा किया कि अगर रामायण और महाभारत स्त्री कहानीकारों के द्वारा लिखा गया होता तो उसकी जो दृष्टि है वह स्त्रीवादी होती है और उसकी रूपरेखा कुछ अलग होती l उन्होंने रामायण और महाभारत की कहानी को एक नई दृष्टि से देखने की सोच पर बल दिया l नाटककार शंकर शेष का जीवन परिचय कलकत्ता विश्वविद्यालय की छात्रा निशा गुप्ता ने प्रस्तुत किया तथा शंकर शेष के नाटक एक और द्रोणाचार्य के ऊपर आलेख प्रस्तुत किया खिदिरपुर कॉलेज की छात्रा संध्या राम ने यह पंचम सत्र की छात्रा है l द्रोणाचार्य के माध्यम से वह शिक्षण संस्थानों पर प्रश्न खड़ा करने का प्रयास किया है l उषा किरण खान का जीवन परिचय की प्रस्तुत ज्योति शाह ने और उन पर आलेख प्रस्तुत किया कोलकाता विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा ज्योतिका प्रसाद ने उषा किरण खान के नाटक हीरा डोम में दलित विमर्श और धार्मिक निर्वाचन l ज्योतिका ने बतलाया की हीरा डोम की कविता, सरस्वती पत्रिका में सबसे पहले प्रकाशित हुई l सरस्वती पत्रिका में आए उनके नाम को आधार बनाकर हिरा डोम कहानी की रचना की है lजो दलित विमर्श के सबसे पहले लेखक है और इनका नाम हमें कहीं भी हिंदी साहित्य के इतिहास में दिखाई नहीं देता है l इन्हीं को आधार बनाकर उषा किरण खान जी ने अपना नाटक लिखा था हीरा डोम l इन सभी नाटककार कों छात्र जानते ही नहीं है l यह कुछ ऐसे नाम है जिसे छात्राओं ने या छात्रों ने पहली बार सुना था l वह नाटक तो पढ़ते हैं पर नाटक से उसे अर्थ से जुड़े नहीं होते हैं कि वह उनसे जुड़े नाटककारों तथा रंगमंच के अंतर्गत जो भी व्यक्ति है वह डायरेक्टर हों या रंगमंच से जुड़े अन्य व्यक्ति,लेखक, प्रकाश सज्जा करने वाले लोग l रंग अड्डा के माध्यम से विद्यार्थी इन सभी से जुड़ते हैं l यह अड्डा विद्यार्थियों को एक मंच देता है जिसके माध्यम से वह अपना बौद्धिक विकास कर सके l यह एक बहुत ही सराहनीय प्रयास है l 19 वें रंग अड्डे की प्रमुख अतिथि थी कूच बिहार पंचानन वर्मा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रीता चौधरी l उन्होंने कहा कि रंग अड्डा विद्यार्थियों को एक नई दृष्टि दे रही है और वह उनकी समझ विकसित हो रही है । वह इस अड्डे के माध्यम से वह एक उत्कृष्ट आलेख लिख पा रहे हैं और एक समझ विकसित कर पा रहे हैं l इस अड्डे में उषा किरण खान की कहानी साँझ भई का नाट्य अभिनयात्मक पाठ कोलकाता की प्रसिद्ध रंगकर्मी और लिटिल थेस्पियन की निर्देशक उमा झुनझुनवाला और उनकी कलाकार सुधा गौड़ ने किया l l कार्यक्रम के आरम्भ में त्रिपुरारी शर्मा के निधन पर मौन रखा गया । कार्यक्रम का संचालन संगीता व्यास ने किया l रंग अड्डा विद्यार्थियों को सवारने, सजाने, निखारने का काम करता है l विद्यार्थियों में आत्मविश्वास जगाने का काम करता है l इस रंग अड्डे की मुख्य विशेषता थी चालीस विद्यार्थी उपस्थित थे जिनमें से खिदिरपुर कॉलेज से ही 18 विद्यार्थी आये थे l यह लिटिल थेस्पियन की उपलब्धि रही l
स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता के प्रति जागरूक करेगा सोलेस ग्रुप
कोलकाता । सोलेस ग्रुप ऑफ कंपनीज ने स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन के प्रति जागरुकता लाने के लिए अभियान आरम्भ किया है। अभियान में आठवीं और नौवीं कक्षा की छात्राओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। यह पहल स्कूली छात्राओं को उनके मासिक धर्म को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए उपलब्ध मार्गदर्शन, सुविधाओं और सामग्रियों की महत्वपूर्ण कमी की समस्या का समाधान देगी। इस अभियान का प्राथमिक उद्देश्य मासिक धर्म के दौरान स्कूली लड़कियों के सामने आने वाली चुनौतियों और उचित एमएचएम शिक्षा की कमी से जुड़े संभावित जोखिमों और परिणामों के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। एमएचएम पर सटीक और पर्याप्त जानकारी और अभ्यास की सुविधा के क्षेत्र में कई लड़कियां अशिक्षित रह जाती हैं।
सोलेस ग्रुप ऑफ कंपनीज के संचालन प्रमुख संजीब कुंडू ने इस अभियान की असली महत्व को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि इस परियोजना के लिए हमारा मुख्य लक्ष्य और आदर्श वाक्य केवल मुफ्त सैनिटरी नैपकिन के वितरण से परे है। हम लड़कियों को शैली से सैनेटरी नैपकिन का उपयोग करने के रूप में शिक्षा देने और प्रोत्साहित करने का इरादा रखते हैं। इसे प्राप्त करने के लिए, हम उन्हें विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों और कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल करेंगे। इस अवसर पर बंगाल के पैडमैन के नाम से चर्चित शोभन मुखर्जी, प्रकृति चक्रवर्ती, “द फिटनेस वंडर”, क्षेत्रीय विजेता योग ओलंपियाड 2023, संगीतकार एवं कलकत्ता क्वायर के संस्थापक सदस्य कल्याण सेन बारात के अतिरिक्त 57 नम्बर वार्ड के पार्षद जीवन साहा, टाकी हाउस बॉय्स के प्रशासक 28 नम्बर वार्ड के पार्षद अयन चक्रवर्ती उपस्थित थे ।
दिसान हॉस्पिटल ने मनोविकास केंद्र के बच्चों को करवाई दुर्गा पूजा परिक्रमा
कोलकाता । समावेशिता और सामुदायिक भावना के एक हार्दिक संकेत में, दिसान हॉस्पिटल, कोलकाता ने मनोविकास केंद्र के 20 बच्चों के लिए एक यादगार दुर्गा पूजा परिक्रमा का आयोजन किया । गत 17 अक्टूबर को मनोविकास केंद्र, विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की देखभाल और पुनर्वास के लिए समर्पित केंद्र, एक असाधारण दिन का गवाह बना जब दिसान हॉस्पिटल ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। बच्चे, समर्पित देखभाल करने वालों और कर्मचारियों के साथ, पूरे कोलकाता में दुर्गा पूजा पंडालों की भव्यता देखने के लिए एक विशेष यात्रा पर निकले।
दिसान हॉस्पिटल की निदेशक सुश्री शाओली दत्ता ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, “हम इन अद्भुत बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने का अवसर पाकर रोमांचित हैं। दुर्गा पूजा उत्सव मनाने और एक समुदाय के रूप में एक साथ आने का समय है, और हम यह सुनिश्चित करना चाहता था कि ये बच्चे हर किसी की तरह उत्सव में भाग ले सकें। यह हम सभी के लिए एक हृदयस्पर्शी अनुभव था।”
मनोविकास केंद्र के बच्चे दुर्गा पूजा पंडालों के जीवंत रंगों, कलात्मक सजावट और आध्यात्मिक माहौल से सराबोर होकर खुशी और उत्साह से भर गए। डेसन हॉस्पिटल, कोलकाता की पहल ने इस शुभ त्योहार के दौरान खुशियाँ फैलाते हुए करुणा और समावेश की भावना का उदाहरण दिया।
दिसान हॉस्पिटल व्यक्तियों और समुदायों के जीवन में सकारात्मक प्रभाव डालने के अपने मिशन के लिए प्रतिबद्ध है, न केवल चिकित्सा देखभाल के माध्यम से बल्कि दयालुता और समर्थन के कार्यों के माध्यम से भी, जैसे कि इस हृदयस्पर्शी दुर्गा पूजा परिक्रमा के माध्यम से।
चित्रों में समाचार – 50 फीट के रावण के पुतले का दहन
सॉल्टलेक में स्थित सेंट्रल पार्क में रावण के 50 फीट के पुतले का दहन किया गया । इस कार्यक्रम में शामिल होनेवाले समाज की प्रतिष्ठित हस्तियों में देव (अभिनेता और संसद सदस्य), सुजीत बोस (अग्निशमन विभाग के मंत्री, पश्चिम बंगाल), श्री सब्यसाची दत्ता (बिधाननगर नगर निगम के अध्यक्ष), रुचिका गुप्ता (सन्मार्ग की निदेशक), संजय अग्रवाल (साल्टलेक सांस्कृतिक संसद के अध्यक्ष), ललित बेरीवाला (साल्टलेक सांस्कृतिक संसद के ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष), अमित पोद्दार (साल्टलेक सांस्कृतिक संसद के सचिव), उदित तोदी (कार्यकारी निदेशक, लक्स इंडस्ट्रीज), साकेत तोदी (कार्यकारी निदेशक, लक्स इंडस्ट्रीज) के अलावा कई अन्य उपस्थित रहे ।
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मोहम्मद अली पार्क में यूथ एसोसिएशन की पूजा में सिन्दूर खेला के साथ माँ की विदाई
‘अपूर्वा’ 15 नवम्बर को डिज़्नी+हॉटस्टार पर होने जा रही है रिलीज़
भवानीपुर कॉलेज के शिक्षा विभाग द्वारा ‘एक और बिथोवेन’ का मंचन
कोलकाता । भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के शिक्षा विभाग द्वारा आईडीसी के प्रथम सेमेस्टर के छात्र छात्राओं द्वारा ‘एक और बिथोवेन’ नाटक के मंचन प्रस्तुति दी गई ।विभागाध्यक्ष डॉ रेखा नारिवाल के संयोजन में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आर्ट्स सेक्शन की वाइस प्रिंसिपल डॉ देवजानी गांगुली ने अपने वक्तव्य में शिक्षा के पुराने और आधुनिक शिक्षा पद्धति पर विविध संदर्भों पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान समय के बदलते स्वरूप पर चर्चा की। रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में कई नए कौशल विकास करने के लिए जागरूकता चाहिए और हमें अपनी मुटठी को बंद नहीं खुली रखने की आवश्यकता है।
इस अवसर पर थियेटर कलाकार पलाश चतुर्वेदी के निदेशन में ‘एक और बिथोवेन ‘ नाटक का सफलतापूर्वक मंचन किया गया। किसी भी अंग से अयोग्य बच्चे को कमतर नहीं समझना चाहिए। समाज की दकियानूसी परंपराओं को बदलने की जरूरत है। अवसर प्रदान करने पर वह अयोग्य बच्चा भी एक नई प्रतिभा के साथ समाज को बहुत कुछ दे सकता है। कार्यक्रम का उद्घाटन और संयोजन शिक्षा विभागाध्यक्ष डॉ रेखा नारिवाल ने भगवद्गीता के श्लोक द्वारा किया और अपने वक्तव्य में नाटक के उद्देश्यों पर चर्चा करते हुए कहा कि
भगवद्गीता के अनुसार, बुद्धिमान व्यक्ति के लिए हर कोई समान है। समावेशी शिक्षा एक क्रांतिकारी अवधारणा है जो शिक्षण और सीखने की प्रक्रिया में सभी की भागीदारी चाहती है।
भवानीपुर कॉलेज का शिक्षा विभाग समावेशिता को एक ऐसे दर्शन के रूप में परिभाषित करता है जो एक स्वागत योग्य माहौल को बढ़ावा देता है जहां सभी सदस्य अपनेपन की भावना महसूस करते हैं। विविधता का जश्न मनाते हुए एक-दूसरे के लिए परस्पर सम्मान है। जब हर व्यक्ति का खुली बांहों से स्वागत किया जाता है तो वह सुरक्षित और स्वस्थ महसूस करता है। मारिया मोंटेसरी ने ठीक ही कहा है ‘इंद्रियाँ, दुनिया की खोजकर्ता होने के नाते, ज्ञान का मार्ग खोलती हैं।’
महान बीथोवेन ने ठीक ही कहा है कि ‘गलत नोट बजाना महत्वहीन है। बिना जुनून के खेलना अक्षम्य है।’
इसी जोश और उत्साह के साथ शिक्षा विभाग ने एक और बिथोवेन का मंचन कर जागरूकता का संदेश दिया। शिक्षा विभाग की प्रो अशनाया त्रिपाठी ने संचालन किया और प्रो सायनदिता राय ने स्वागत वक्तव्य दिया। धन्यवाद देते हुए डॉ रेखा नारिवाल ने पूरी थियेटर टीम को शुभकामनाएँ दी। इस अवसर पर पलाश चतुर्वेदी को सम्मानित किया गया और सभी छात्र छात्राओं को सर्टिफिकेट और कलम दिए गए। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
भवानीपुर कॉलेज ने मनाया इंटर कॉलेज गीत संगीत समारोह यूफोनियस 23
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज (बीईएससी) ने इंटरकॉलेजिएट म्यूजिकल फेस्टिवल, यूफोनियस 23 की मेजबानी की। कॉलेज का संगीत समूह, ‘क्रेसेन्डो’ द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम कॉलेज परिसर के कॉन्सेप्ट और जुबली हॉल में हुआ। माधुर्य से भरे इस आयोजन का उद्घाटन समारोह प्रोफेसर दिलीप शाह के उत्साहवर्धक शब्दों से संपन्न हुआ। प्रो. शाह ने छात्रों को संगीत के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हुए स्वयं सिंथेसाइज़र पर कुछ भावपूर्ण धुनें बजाकर विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुति देकर अपने संगीत कौशल को सामने रखा। 6अक्टूबर 2023 को प्रातः काल 9 बजे से शाम 6.30 तक चलने वाले इंटर कॉलेज संगीत गीत महोत्सव में भाग लेने के लिए कोलकाता से कई कॉलेजों को आमंत्रित किया गया था। जेवियर्स कॉलेज, जादवपुर विश्वविद्यालय, द हेरिटेज कॉलेज, श्री शिक्षायतन कॉलेज, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, हेरम्बा चंद्रा कॉलेज, एनएसएचएम और अन्य कॉलेज ने आयोजित कार्यक्रमों में सक्रिय भाग लिया और संबंधित श्रेणियों में अच्छा प्रदर्शन किया। विशेष अतिथि गायक और संगीतकार के रूप में कृष्णा मुखर्जी, डॉ. कौस्तव बनर्जी, सागर पॉल, मंडी सिंघा (कैप्टन सिंह ए) रहे। सबसे योग्य उम्मीदवार का चयन करने के लिए सौरभ चतुर्वेदी (दिलफेक), सौत्रिक बनर्जी और सुभाजीत गोस्वामी को प्रमुख निर्णायकों के रूप में आमंत्रित किया गया।
यूफ़ोनियस को कई उप-श्रेणियों में डिज़ाइन किया गया जिसमें सोलो ईस्टर्न: हेरंबा चंद्र कॉलेज पहले स्थान पर, जादवपुर विश्वविद्यालय दूसरे स्थान पर और श्री शिक्षायतन कॉलेज तीसरे स्थान पर रहा।सोलो वेस्टर्न: बीईएससी के थियो व्रीक गुप्ता ने जीत हासिल की, जबकि स्कॉटिश चर्च कॉलेज दूसरे और श्री शिक्षायतन तीसरे स्थान पर रहे।
एकल वाद्ययंत्र: बीईएससी (मुख्य) के सुजल सोनकर ने प्रथम पुरस्कार जीता, जबकि स्कॉटिश चर्च कॉलेज को प्रथम उपविजेता और बीईएससी (ओटीएसई) को द्वितीय उपविजेता घोषित किया गया।
सोलो बॉलीवुड: बीईएससी के प्रियांशु दत्ता ने जीत हासिल की, जबकि जादवपुर यूनिवर्सिटी दूसरे और हेरंबा चंद्रा कॉलेज तीसरे स्थान पर रहा।
सोलो रैपिंग: बीईएससी के आर्यन नसीम ने विजयी खिताब जीता, जबकि जादवपुर विश्वविद्यालय को प्रथम उपविजेता घोषित किया गया।
वेस्टर्न बैंड: जैसे ही बीईएससी वेस्टर्न बैंड ने विजेता ट्रॉफी हासिल की तो सिर ऊंचा हो गया।
बॉलीवुड बैंड: सेंट जेवियर्स कॉलेज ने विजेता ट्रॉफी अपने नाम की, जबकि बीईएससी ने दूसरा और जादवपुर विश्वविद्यालय ने तीसरा स्थान हासिल किया।
हमसुफी बैंड के सदस्यों (निर्णायक के रूप में आमंत्रित) ने दर्शकों के लिए “हल्का हल्का सुरूर” और “तेरी दीवानी” जैसे गाने प्रस्तुत किए। कैप्टन सिंह ए और दिलफेक ने शानदार अतिथि प्रस्तुतियां दीं और भीड़ को आश्चर्यचकित कर दिया। उन्होंने कहा, “हमने पहले भी यहां प्रदर्शन किया है और दोबारा प्रदर्शन करने में हमें हमेशा खुशी होगी।”निर्णायकों ने सभी भाग लेने वाले कॉलेजों की प्रशंसा की और विशेष रूप से उनमें से कुछ का उल्लेख करते हुए कहा, “यूफोनियस आत्मविश्वास पैदा करने, प्रतिभा को चित्रित करने और व्यावसायिकता की ओर बढ़ने का एक अद्भुत मंच है।” दर्शकों ने राग भैरवी, राग खमाज, जब दीप जले (राग यमन पर आधारित) जैसे “रागों” की जबरदस्त सुंदर प्रस्तुतियाँ भी सुनी ।प्रतिभागियों द्वारा विभिन्न गीतों की प्रस्तुतियां दी जैसे 1 सुन ले जरा, मितवा, ओ रे पिया, दिल से रे, आई वांट टू ब्रेक फ्री, स्पीचलेस, स्टिल लविंग यू, चंदेलियर कुछ ऐसे गाने थे जिन्होंने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया। सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाले क्षणों में से एक सोलो वेस्टर्न श्रेणी में टाई-ब्रेकर था जहां स्कॉटिश चर्च कॉलेज, जादवपुर विश्वविद्यालय और श्री शिक्षायतन कॉलेज ने दूसरे और तीसरे स्थान को सुरक्षित करने के लिए एक-दूसरे के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
यूफोनियस’23 पुरस्कार वितरण समारोह के साथ समाप्त हुआ। प्रोफेसर शाह ने अपने वक्तव्य में कहा कि सफलता अंतिम नहीं होती और असफलता घातक नहीं होती और सभी प्रतिभागियों को उनकी उत्कृष्ट खेल भावना के लिए प्रोत्साहन और बधाई दी। समग्र श्रेणियों में बीईएससी ने जीत हासिल की जबकि जादवपुर विश्वविद्यालय ने दूसरा पुरस्कार हासिल किया। इस दिलचस्प और मनमोहक संगीतमय यात्रा ने हर किसी के चेहरे पर एक व्यापक मुस्कान छोड़ दी और उनके दिलों को जबरदस्त खुशी से भर दिया। यह आयोजन कॉलेज प्रतिनिधि देवांग नागर, एंकर तुशिता चुघानी, अक्षित रे, लक्ष्य शर्मा, निष्ठा शाह, आतिथ्य टीम और पीसीएस स्वयंसेवकों के पूर्ण समर्थन के बिना संभव नहीं होता।कार्यक्रम की रिपोर्ट धृति मेहता और समृद्ध नंदी और फोटोग्राफी पारस गुप्ता, साग्निक घोष, सुवम गुहा ने मिलकर की। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
भवानीपुर कॉलेज ने किया मांँ दुर्गा का किया आह्वान
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन कॉलेज में धमाल कार्यक्रम में नवदुर्गा का आवाह्न किया इस अवसर पर गरबा की पूजा नलिनी पारेख के संयोजन से गुजराती परंपरा के अनुरूप गरबा की पूजा की गी। इसके पश्चात माँ दुर्गा की आरती की गई। भवानीपुर कॉलेज के अध्यक्ष रजनीकांत दानी ने इस अवसर पर दीप प्रज्वलित किया। साथ में मैनेजमेंट के प्रमुख पदाधिकारियों में शालिनी शाह, प्रदीप सेठ, बुलबुल भाई, उमेद भाई, राजू भाई रेणुका भट्ट, सोहिला भाटिया और उनके परिवार के साथ सभी ने आरती का शुभारम्भ किया। उसके बाद प्रसाद वितरण किया गया। भारी संख्या में छात्र छात्राओं ने आरती की। सभी को पेड़ों का प्रसाद वितरित किया गया। सभी विद्यार्थियों को आरती की थाली दी गई। उन्होंने अपने भविष्य के लिए मां दुर्गा का आशीर्वाद लिया। मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और विश्वास प्रकट किया। गरबा का आरंभ सभी पदाधिकारियों और शिक्षक शिक्षिकाओं के गरबा नृत्य से हुआ। प्रोफेसर दिलीप शाह ने पूरे कार्यक्रम का संयोजन किया और सभी वालंटियर विद्यार्थियों ने पूरे कार्यक्रम को बहुत ही सुंदर व्यवस्था में परिणत किया। इस अवसर पर सभी ने रंग-बिरंगे पारंपरिक वेशभूषा गुजराती पहनावे और आधुनिक पहनावे सभी तरह के पहनावे से मां दुर्गा के सामने धुनूची नृत्य करके उन्हें श्रद्धा अर्पित की। सभी ने इस कार्यक्रम को बहुत ही ऊर्जा से भरा नृत्य और अंत में डीजे के साथ सभी विद्यार्थियों और शिक्षक गणों ने आनंद लिया ।इस कार्यक्रम में सभी विद्यार्थियों को अपने आईडी कार्ड और हाथ बैंड से ही प्रवेश दिया गया। बहुत ही स्वस्थ वातावरण में धमाल कार्यक्रम किया गया। पूरे कार्यक्रम का आयोजन डीन और रेक्टर प्रो दिलीप शाह प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी के निर्देशन में किया गया ।प्रो दिव्या उदेशी और प्रो समीक्षा खंडूरी और सभी शिक्षकों का भरपूर सहयोग रहा। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
भवानीपुर कॉलेज लाइब्रेरी में पढी़ गईं रस्किन बांड की कहानियाँ
कोलकाता । भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों ने कॉलेज लाइब्रेरी के बुक रिडिंग सेशन के अंतर्गत रस्किन बांड की कहानियाँ पढ़ीं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य है विद्यार्थियों को पुस्तकें पढ़ने और लेखक के विषय में जानकारी मिले और पुस्तकों के प्रति रुचि बढ़े।कार्यक्रम का संचालन उज्जवल करमचंदानी और प्रो. सोहेल अहमद ने किया। कार्यक्रम का संयोजन डॉ वसुंधरा मिश्र और चंपा श्रीनिवासन ने किया।
उज्जवल करमचंदानी ने लेखक का परिचय देते हुए कहा कि 19 मई 1934 में जन्मे रस्किन बांड अंग्रेजी भाषा के एक नब्बे वर्षीय विश्वप्रसिद्ध भारतीय लेखक हैं। उनके पिता, ऑब्रे अलेक्जेंडर बॉन्ड भारत में तैनात रॉयल एयर फ़ोर्स (RAF) के एक अधिकारी थे। उन्होंने शिमला के बिशप कॉटन स्कूल में पढ़ाई की। उनके पहले उपन्यास, द रूम ऑन द रूफ को 1957 में जॉन लेवेलिन राइस पुरस्कार मिला। 1992 में हमारे पेड़ स्टिल ग्रो इन द डेहरा, अंग्रेजी में उनके उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। बॉन्ड ने बच्चों के लिए सैकड़ों लघु कथाएँ, निबंध, उपन्यास और किताबें लिखी हैं। 1999 में पद्मश्री और 2014 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।वह अपने दत्तक परिवार के साथ मसूरी के लंढौर में रहते हैं।
प्रातःकालीन कॉमर्स सत्र के प्रो सोहेल अहमद ने रस्किन बांड की कहानियों के शिल्प और बुनावट पर अपने विचार व्यक्त किए और आइज आर नॉट हियर कहानी का पाठ किया। इस कहानी ने अंत तक विद्यार्थियों को बांधे रखा उसमें निहित संदेश बहुत ही सुंदर था। प्रो सोहेल ने रस्किन बांड की रचनाधर्मिता पर विस्तार से जानकारी दी। प्रो सुभाषिश दासगुप्ता ने रस्किन बांड की कहानी के छोटे से अंश सुनाया जिसमें प्रौढ लोगों के लिए कुछ प्रश्न उठाए गए। प्रो रीना जोपट ने कहा कि बांड आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी कहानियों पर फिल्म बनी है। विद्यार्थियों में कशिश साह ने रस्किन बांड की कहानी द ब्लू अमब्रेला सुनाई। गांव में रहने वालों के लिए एक नीली छतरी कितनी मूल्यवान है इस बात को दर्शाया गया है। छोटी-छोटी चीजों का कितना महत्व होता है इस पर चर्चा की। श्रेयांस ने कहानियों के प्रति अपनी रुचि के विषय में बताया।
देवांग नागर ने अपने बचपन में पढी़ गईं रस्किन बांड की विभिन्न कहानियों की खूबसूरती को बताया। उन्होंने बताया कि रस्किन बांड की कहानियों को पढ़ते समय समुद्र या उसका किनारा नहीं आता बल्कि मसूरी देहरादून कसौली के पहाड़ चिड़िया पेड़ पौधे झरने आदि आते हैं। लेखक के रूप में उनकी सृजनात्मकता विशिष्ट लेखन है। बांग्ला विभाग की प्रो सम्पा सिन्हा ने कहा कि पुस्तकें हमारे विचारों को प्रेरित करती हैं। हमारी रचनात्मकता को बढ़ाती हैं।
इस अवसर पर कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों और शिक्षकों का स्वागत किया। हमारे कॉलेज के लिए रस्किन बांड विथ बांड और कई पुस्तकों की चर्चा की। पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित किया।डीन प्रो दिलीप ने उत्साहवर्धन किया जिसके कारण विद्यार्थियों की उपस्थिति बड़ी संख्या में हुई। प्रो चंपा श्रीनिवासन ने कार्यक्रम के आरंभ में सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों का का स्वागत और धन्यवाद किया और कहा कि रस्किन बांड आज भी प्रासंगिक है। कहा कि बांड का साहित्य युग और समय से परे है।
अंत में, डॉ वसुंधरा मिश्र ने कहा कि लेखक और उसके लेखन को जानने से उसे पूर्णता में जानना है। लाइब्रेरी में होने वाले बुक रिडिंग सेशन के अंतर्गत हिंदी अंग्रेजी उर्दू और गुजराती आदि सभी भाषाओं में किताबों को पढ़ने के लिए आमंत्रित किया जाता रहा है। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
गरिमा भाटी ‘गौरी’ संपादित कहानी संग्रह ‘पहल’ पर ऑनलाइन परिचर्चा
कोलकाता । प्रगति प्रकाशन (कोलकाता) द्वारा गरिमा भाटी ‘गौरी’ द्वारा संपादित पुस्तक ‘पहल: बढ़ते कदम कामयाबी की ओर’ पर ऑनलाइन परिचर्चा का आयोजन 23 अक्टूबर 2023 को 3 बजे गूगल मीट के माध्यम से किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ. यति शर्मा जी ने की। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि प्रसिद्ध लेखिका एवं शिक्षिका डॉ. वंदना गोसाईं जी रहीं। कार्यक्रम का आरंभ संपादक गरिमा भाटी ‘गौरी’ द्वारा पुस्तक के परिचय के साथ किया गया और इसके बाद सह-संपादक डॉ. मीना घुमे ‘निराली’ ने सभी लघु कथाओं का सार प्रस्तुत किया। अदिति श्रीवास्तव, मंजू गुप्ता, नयन भादुले, अनामिका सिंह, सोनू मिश्रा ने अपने अनुभव सांझा करते हुए कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इस ऑनलाइन परिचर्चा में देश के विभिन्न प्रांतों से कई श्रोता भी जुड़े हुए थे। जिनमें मुख्य रूप से प्रिया श्रीवास्तव, रुद्रकांत झा, प्रीति सिंह, पद्माकर व्यास, सुनीता बुंदेले, लक्ष्मी साह आदि की गरिमामय उपस्थिति रही। प्रगति प्रकाशन के मुख्य विनोद यादव ने अपने उत्साह भरे शब्दों से सभी रचनाकारों का उत्साहवर्द्धन किया तथा प्रकाश त्रिपाठी ने भविष्य में भी प्रगति प्रकाशन की ओर से इसी प्रकार सहयोग देने का वादा किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन सोनिया शर्मा ने किया।
आज के डिजिटल युग में फोटोग्राफर नहीं, कैमरा बोलता है
सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया
मुझे सर मत कहा कीजिए…ये सर – वर सुनना पसन्द नहीं है । यह 2004 की बात है जब पत्रकारिता के क्षेत्र में मैंने कदम रखा ही था । सन्मार्ग में फोटो बाबू और गुरू जी के नाम से प्रख्यात सुधीर जी ने स्पष्ट शब्दों में यह बात तब कही थी जब अपने पहले असाइन्मेंट को लेकर गयी थी और छायांकन की जिम्मेदारी उनकी थी । अक्खड़ कहिए फक्कड़ कहिए..तब बहुत अजीब लगा था कि ये ऐसे बात क्यों कर रहे हैं । यह भी सुना कि वह नाराज बहुत जल्दी होते हैं…पत्रकारिता के क्षेत्र में जब दो दशक बीत रहे हैं तब समझ आ रहा है कि उनकी नाराजगी एक जायज नाराजगी थी । बहरहाल, मैंने उनका निर्देश मानकर हमेशा उनको सुधीर जी कहा…वह सबकी मदद करते थे…आपके प्रति उनका व्यवहार आपके व्यवहार पर निर्भर करता है मगर मेरे लिए वह सदैव आदर के पात्र रहे । हां…अपने अंतिम समय से कुछ साल पहले एक दुःखद घटना के कारण मेरे प्रति उनकी नाराजगी के बाद भी…क्योंकि उनकी जगह कोई भी होता तो यही करता…पत्रकारिता में कुछ लोग पिता की तरह रहे…सुधीर जी उनमें से एक रहे । वह नारियल की तरह थे…अन्दर से सख्त मगर अन्दर मिठास भरी थी। आपने उनको जब समझ लिया तो उनके अन्दर करुणा भरा हृदय भी था । खिलखिलाकर बच्चों की तरह हंसते । मेरे पूर्व संस्थान में इस्तीफा देकर निकलने वालों पर कर्फ्यू लगा दिया जाता था कि कोई बात करे तो उसकी खैर नहीं…इसलिए कुछ बोलने से पहले भी सोचना पड़ता मगर सुधीर जी को देखकर लगता कि किसी बड़े -बुजुर्ग की छाया है…मैं किसी के सामने सिर नहीं झुकाती…पर उनको देखकर आंखों से ही प्रणाम हो जाता और वह प्रति उत्तर भी दिया करते । स्वाभिमानी, अनुभवी…वह पत्रकारिता और फोटो पत्रकारिता का चलता – फिरता संस्थान थे, इतिहास थे । मेरे लिए हिन्दी फोटो पत्रकारिता के पितामह ।
हिन्दी अखबारों में 60 के दशक में फोटो छायाकार न के बराबर थे क्योंकि आज भी पत्रकारिता की दुनिया में बांग्लाभाषी फोटो छायाकारों का वर्चस्व है। ऐसी स्थिति में सुधीर उपाध्याय ऐसे फोटो पत्रकार रहे जो कई ऐतिहासिक घटनाओं के न सिर्फ साक्षी रहे हैं बल्कि उनको अपने कैमरे में भी उन्होंने कैद किया है। सुधीर जी ने पत्रकारिता के बदलते दौर को करीब से देखा ..और उनकी लेखनी भी खूब चली है। इनके घर में ही पत्रकारिता का माहौल था। बाबू मूलचन्द अग्रवाल ने 1916 में जिस विश्वमित्र की स्थापना की, वहीं से सुधीर जी का सफर भी आरम्भ हुआ। उन दिनों हिन्दी पत्रकारिता में कुछ ही अखबारों में स्थायी पत्रकार हुआ करते थे। सुधीर जी पुराने दिनों को याद करते हुए बताते थे कि एक समय था जब फोटोग्राफर को ‘मैन बिहाइन्ड द कैमरा’ कहा जाता था। आज के डिजिटल युग में कैमरा बोलता है। अब ‘कैमरा इनफ्रन्ट ऑफ द मैन’ का युग है। तब तस्वीरें खींचना इतना आसान नहीं होता था, यह एनलॉ़ग फोटोग्राफी का दौर था…तेजी से बदली इस तकनीक और उम्र, दोनों को मात देते गुरु जी कहीं भी आपको जिस मुस्तैदी से नजर आते …वह बताता है कि उनके लिए फोटो पत्रकारिता कितनी महत्वपूर्ण रही। लगातार 40 साल से उन्होंने लगातार गंगासागर मेला कवर किया । न सिर्फ तस्वीरें लीं बल्कि आलेख भी लिखे। फोटोग्राफी उन्होंने पंकज दत्त से सीखी और फोटो पत्रकारिता के गुण – अवगुण स्टेट्समैन के चीफ फोटोग्राफर सुब्रत पात्रनबीस से सीखे। पत्रकारिता जगत में सुधीर जी को फोटो पत्रकारिता के भीष्म पितामह और गुरुजी जैसे शब्दों से सम्बोधित किया जाता है। सुधीर जी ने पत्रकारिता के लंबे पेशेवेर जीवन में 1971 का बांग्लादेश मुक्ति युद्ध, महावीर कोलियरी खदान दुर्घटना, तीन बीघा आन्दोलन, कांग्रेस के 7 अधिवेशन, 1993 का बऊबाजार बम विस्फोट कांड, सिंगुर आन्दोलन के अतिरिक्त क्रिकेट और फुटबॉल के कई विश्व कप कवर किये। सुधीर जी एकमात्र इस दौर के एकमात्र हिन्दीभाषी फोटो पत्रकार रहे जो आजीवन सक्रिय रहे हैं । मेरी सदैव इच्छा थी उनके अवदान को सामने लाने के लिए, आम जनता तक पहुंचाने के लिए उनका एक साक्षात्कार लूं…वह चाहते नहीं थे…भरसक उन्होंने मुझे टालने का प्रयास किया…पर मेरे प्रति उनका स्नेह था और आनंद भइया से लगाव कि वह साक्षात्कार हुआ..पर बड़े अखबारों की संकीर्ण मानसिकता ने इस सौभाग्य को मेरे लिए ऐसी पीड़ा और कसक बना दिया जो आजीवन मुझे सालती रहेगी । जो भी हो…सुधीर जी अपने पीछे जो विरासत छोड़ गये हैं…उसका संरक्षण हर हाल में करने की जरूरत है । अंत में सिर्फ इतना ही कि अगर किसी को सम्मान देना हो तो उसके रहते दीजिए..उसके श्रम का, अनुभव का…आदर कीजिए वरना सम्मान के नाम पर खानापूर्ति कर देना आपको नृशंस बनाता है । हमें पत्रकारों के साथ फोटो पत्रकारों के भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि आपके समाचार की प्रामाणिकता के साक्षी कई बार आपसे अधिक छायाकार ही करते हैं । सुधीर जी एक थे, एक ही रहेंगे…..और मुझे पूरा विश्वास है कि वह जहां भी रहेंगे….हम सबको राह दिखाते रहेंगे । हार्दिक श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनका वही साक्षात्कार आपके समक्ष जो 2018 को सलाम दुनिया में प्रकाशित हुआ था
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पत्रकारिता के इतिहास में सुधीर उपाध्याय एक पूरा युग हैं और फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में पूरा संस्थान। पत्रकारों के परिवार से सम्बन्ध रखने वाले उपाध्याय जी को ‘गुरुजी’ यूँ ही नहीं कहा जाता। सुधीर जी को स्वातन्त्रयोत्तर पत्रकारिता का इतिहास कहा जाये तो अतिशियोक्ति नहीं होगी। उनकी तस्वीरें ही नहीं बल्कि उनकी रपट भी उनके अनुभव का खजाना हैं। उन्होंने कई ऐसी घटनाओं को कवर किया जो अब इतिहास का दुर्लभ हिस्सा हैं। वरिष्ठ पत्रकार और फोटो पत्रकार सुधीर उपाध्याय से सलाम दुनिया की प्रतिनिधि सुषमा त्रिपाठी ने मुलाकात की, पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश –
प्र. हिन्दी पत्रकारिता के बदलते दौर के बारे में क्या कहेंगे?
हिन्दी पत्रकारिता की जन्मभूमि कोलकाता है। हिन्दी समाचार पत्रों के प्रकाशन में बांग्लाभाषी भी सक्रिय थे। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, बनारसी दास चतुर्वेदी, बाबू मूलचन्द अग्रवाल, अनन्त मिश्र, हरिशंकर द्विेदी और अन्त में रमाकान्त उपाध्याय जैसे सम्पादक इस क्षेत्र में एक उद्देश्य के साथ आए थे। देश की सेवा करना ही उनका लक्ष्य था। सातवें दशक तक सम्पादक वही हुआ करते थे जो सम्पादकीय लिख सकते हों। आज 2018 के दौर में सम्पादक तो हैं मगर सम्पादकीय से उनका सरोकार नहीं है। एक – या दो, अपवाद हो सकते हैं मगर आज हिन्दी अखबारों में पेड़ न्यूज का वर्चस्व है।
प्र. इस पेशे में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
मेरे बाबा होतीलाल उपाध्याय, पिता हरिप्रसाद उपाध्याय ‘प्रेमी’, दोनों लेखक व पत्रकार थे इसलिए कह सकता हूँ कि हमारे घर में पत्रकारिता की खेती होती थी। मैं, मेरा भाई, मेरे बच्चे, सब प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में सक्रिय हैं। पढ़ाई खत्म होने के बाद मैंने कुछ दिनों तक भारतीय ज्ञानपीठ के कोलकाता स्थित कार्यालय तथा मर्चेन्ट चेम्बर ऑफ कॉमर्स में भी काम किया मगर पत्रकारिता करनी थी इसलिए नौकरी छोड़ दी। 1965 -66 में दैनिक विश्वमित्र से शुरुआत की। तब हिन्दी पत्रकारिता में सन्मार्ग को छोड़कर कहीं भी स्थायी पत्रकार नहीं हुआ करते थे मगर यहाँ भी यह परम्परा कुछ समय तक ही जारी रही। फिर अनुबन्ध का समय आया और अब दासानुदास का समय है और पत्रकार इसी के अनुसार काम कर रहे हैं। 1970 के दशक में हिन्दी के पत्रकार साहित्य के जरिए ज्ञान परोसते थे मगर आज का पत्रकार पाठकों को अज्ञान परोस रहा है।
प्र. फोटोग्राफी की दुनिया में आपने कब पदार्पण किया और किस अखबार से? तब और आज के हालात में क्या फर्क देखते हैं?
मुझे सरकारी मान्यता प्राप्त किये 48 साल हो गये। एक समय था जब फोटोग्राफर को ‘मैन बिहाइन्ड द कैमरा’ कहा जाता था। आज के डिजिटल युग में कैमरा बोलता है। यह ‘ कैमरा इनफ्रन्ट ऑफ द मैन’ का युग है। सब कुछ तब फोटोग्राफर के हाथ में होता था, वह तय करता था। आज के डिजिटल युग में कैमरा ही प्रधान है। तब महज 3 -4 ही छायाकार यानी फोटोग्राफर हुआ करते थे। कोई भी स्थायी नहीं था, हमारा काम भी ‘नो वर्क, नो पे’ वाला ही रहा था। तब गुरुचरण साव, रामचन्द्र शर्मा, राजकुमार प्रसाद जैसे फोटोग्राफर थे मगर वे भी तकलीफों को झेल नहीं सके। आज एकमात्र मैं ही एकमात्र हिन्दीभाषी हूँ जो इतने सालों से लगातार सक्रिय रहा। लिखना इसलिए बंद कर दिया क्योंकि तब हिन्दी के बड़े अखबार हिन्दी के लेखकों, कवियों और स्तम्भकारों को मात्र 15 -20 रुपये का ही पुरस्कार देते थे। मुझे लगा कि जितना समय मैं इनके लिए लिखने में बिता दूँगा, उतने समय में 2 तस्वीरें खींचकर इससे ज्यादा कमा लूँगा और कमाया भी है। तब से फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में ही सक्रिय रहा।
प्र. फोटोग्राफी और पत्रकारिता के गुर आपने कहाँ से सीखे?
फोटोग्राफी में मेरे गुरु दत्त बाबू थे। फोटो पत्रकारिता के गुण – अवगुण मैंने स्टेट्समेन के चीफ फोटोग्राफर सुब्रत पट्टनवीस से सीखे। हिन्दी पत्रकारिता में राम अवतार गुप्त और रमाकान्त उपाध्याय से काफी कुछ सीखा। बाद में रमाकान्त जी की विदाई जिस तरह से हुई, उस घटना ने सिहरन पैदा कर दी, मैं बहुत आहत हुआ।
प्र. फोटोग्राफी में अब तक आपको कितने सम्मान प्राप्त हुए हैं?
मैंने अपने जीवन में महावीर कोलियरी खदान दुर्घटना, 1971 का बांग्लादेश युद्ध, तीन बीघा आन्दोलन, कांग्रेस के 7 अधिवेशन, 1993 का बऊबाजार बम विस्फोट कांड, सिंगुर आन्दोलन के अतिरिक्त क्रिकेट और फुटबॉल के कई विश्व कप कवर किये। फोटोग्राफी में कोई भी विधा छूटी नहीं है मगर इससे मेरा परिवार अशान्त रहा। जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर अब दुःख ही नहीं पश्चाताप भी होता है। जो स्थापित फोटोग्राफर रहे, उन्होंने पुस्तकें प्रकाशित कीं और उनके द्वारा खींची गयी तस्वीरों की प्रदर्शनी भी लगायी। मुझे भी बहुत से सम्मान मिले हैं मगर मैं दो का उल्लेख करना चाहूँगा। सांध्य दैनिक सेवा संसार का ओर से मुझे सम्मानित किया गया था। प्रशस्ति पत्र 5 हजार रुपये नकद मिले थे। इसके बाद स्पोर्ट्स फोटोग्राफर एसोसिएशन ऑफ बंगाल ने लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड दिया जिसमें एक लाख रुपये और प्रशस्ति पत्र मिले। वहीं एक भी हिन्दी भाषी संस्था ने अब तक न इस बारे में सोचा है और न ही इसकी जरूरत समझी। 34 साल के वाममोर्चा शासन और अब की वर्तमान तृणमूल सरकार ने भी इस बारे में नहीं सोचा और इसकी वजह यह है कि मैं हिन्दी अखबार से जुड़ा हूँ। हिन्दी अखबारों के सम्पादकों को सांसद बनाना सरकारों की मजबूरी थी मगर एक भी सम्पादक या पत्रकार के बारे में किसी भी सरकार ने कभी भी नहीं सोचा।
प्र. पत्रकारिता में महिलाओं की मौजूदगी को लेकर क्या कहना चाहेंगे?
60 के दशक में महिला पत्रकार न के बराबर थीं। हिन्दी के अखबारों में 2005 के बाद महिला पत्रकारों की तादाद बढ़ी है। आज महिला फोटोग्राफरों के सामने भी कई चुनौतियाँ हैं। कुछ हद तक इनका मुकाबला सम्भव है मगर यह कहाँ तक सम्भव हो सकेगा, मैं नहीं कह सकता।
प्र. आप अपनी बेबाक बयानी के लिए जाने जाते हैं, आज के दौर में क्या यह खतरनाक नहीं है और क्या आप अपने पेशे से सन्तुष्ट हैं?
आज की पत्रकारिता चाटुकारिता पर निर्भर है। आपके पास डिग्री हो तो भी लिख पाओगे, यह जरूरी नहीं है। पत्रकारिता में काम करना अलग बात है मगर पत्रकार होना और पत्रकार बनना और पत्रकार बनकर जीना, दो अलग – अलग बातें हैं। मैं अपने पेशे से सन्तुष्ट हूँ मगर आस – पास के माहौल से सन्तुष्ट नहीं हूँ। मेरे मित्र एच. एन. सिंह कहा करते थे –
झूठ का सारा सामान, दोपहर होते तक बिक गया
मैं एक सच को लेकर शाम तक बैठा रह गया।






