Thursday, March 19, 2026
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सबसे ज्यादा पापा की याद आती है

  • रेखा श्रीवास्तव

फादर्स डे यानी पापा दिवस की चर्चा आते ही आँखों में पापा की छवि बन गयी है। उनकी यादें आने लगी है। 14 साल पहले 3 सितंबर 2002 को अचानक पापा को मैंने खो दिया। पापा को खोना मेरे जीवन का पहला झटका था, अर्थात् उसके पहले मैंने मौत को इतने पास से महसूस नहीं किया था। सबसे बड़ी बात है कि वह बीमार भी नहीं थे, अचानक उन्हें ब्रेन हैमरेज का अटैक हुआ। जिस दिन उन्हें अटैक आया उस दिन मैं महानगर कार्यालय से हावड़ा वाले घर गई थी।  जैसे ही घर पहुँची कि बड़े भैया का फोन आया कि पापा की तबियत बहुत खराब हो गई है, जल्दी से तुम लोग चली जाओ। और जब तक वहाँ पहुँचे वह बेहोश हो चुके थे और उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी चल रही थी। अस्पताल में दो दिन रहने के बाद वह हमलोगों को छोड़ कर इस दुनिया से चले गये। मुझे उनसे अंतिम बार बात करने का मौका भी नहीं मिला। इसलिए मुझे काफी तकलीफ पहुँची और उनके जाने के बाद मैं बहुत बीमार पड़ गई। मैं अपने पापा की ज्यादा खास नहीं थी। माँ की दुलारी थी। फिर भी पापा और मेरा रिश्ता बहुत प्यारा था।  बचपन से ही हमलोगों को पापा काफी घुमाने ले जाते थे। मामा के यहाँ ले जाते थे। वह न जाने कैसे मेरी जरूरत बिना बोले ही, समझ लेते थे। मुझे बहुत दुख है कि उन्होंने न मेरी शादी देखी और न ही बच्चे तक उनसे मिल पाये और उनका आशीर्वाद ले पाये। मुझे पत्रकारिता से जोड़ने वाले भी मेरे पापा है। पापा ही महानगर न्यूजपेपर ले आये थे, जिसमें डीटीपी ऑपरेटर के लिए आवेदन निकला था और मैं उनके साथ ही महानगर कार्यालय में गई थी और वहाँ ज्वाइन की थी। उनका मुस्कुराता चेहरा आज भी आँखों के सामने आ जाता है। सबसे बड़ी बात है कि मैं उन्हें कभी गु्स्सा करते नहीं देखा, उत्तेजित होते नहीं देखा।  सबसे प्यार से बातें करते थे। आर्थिक समस्या होने के बावजूद वह कभी खींझते नहीं थे। आज इतने वर्षों के बाद भी जब मैं बहुत दुखी या परेशान होती हूँ, तो सबसे ज्यादा पापा को ही याद करती हूँ और न जाने कहाँ से  मेरे अंदर अचानक ताकत आ जाती है। पापा की एक बात मुझे हमेशा याद रहती है कि वह कहते थे, कि जब तक जियो, बिजी रहो। काम करते रहो । एक पल भी जायज न करो। और मैं कोशिश करती हूँ कि उनकी बातों पर अमल कर सकूँ।

(यह संस्मरण है और लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

19 जून को ही पहली बार पिता दिवस मनाया गया था

  • रेखा श्रीवास्तव

फादर्स डे यानी पिता का दिन। बच्चा जिस दिन से दुनिया में आता है, उसी दिन से उसका रिश्ता पिता से बनता है और समय के साथ रिश्ता मजबूत हो जाता है। सदियों पहले पिता और बच्चे के रिश्ते में एक दूरी थी। एक सम्मान था। पिता केवल डांटने और अनुशासन के लिए जाने जाते थे। माँ अपने बच्चों को डराने के लिए भी कई बार पिता से शिकायत कर देने की धमकी भी दिया करती थी। पर अब पिता और बच्चों का रिश्ता बदल गया है। फिलहाल बच्चों और पापा के बीच का रिश्ता दोस्ती के रिश्ते के रूप में निखरा है। बच्चे माँ की तुलना में पापा से ज्यादा मिल-जुल कर रह रहे हैं। उनके रिश्ते के बीच एक खुलापन दिख रहा है। जिस समय अनुशासन होता है, तो अनुशासन होता है लेकिन जब दोस्ती होती है तो वे केवल दोस्त होते हैं। एक उम्र के बाद बच्चे अपने पापा को अपने मन की बात ज्यादा अच्छे से समझा पा रहे हैं और पिता भी इसे समझने में आगे बढ़ रहे हैं। पढ़ाई, खेल-कूद व इंटरटेनमेंट अर्थात् सारी दुनिया में ही पिता और उनके बच्चे साथ-साथ देखने को  मिल रहे हैं। बेटी और  पिता का संबंध तो और भी ज्यादा गहरा है। पिता की दुलारी होती है बिटिया। बिटिया अपनी सारी इच्छाओं को पापा के सामने रखती है और पापा उसे काफी हद तक पूरा करने की कोशिश करते हैं। और पापा भी बेटों की तुलना में बेटियों को ज्यादा प्यार करते हैं। वैसे बिटिया भी अपने पापा का ख्याल रखती है और पापा भी अपनी बेटी का नखरा उठाते हैं। पिता और बच्चों के बीच अच्छे रिश्ते के कई कारण हैं। फिलहाल एकल परिवार की संख्या ज्यादा है। एकल परिवार में बच्चों को केवल मम्मी और पापा का ही साथ मिल पा रहा है। दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-बुआ अब दूर रहने लगे हैं और वह अब परिवार की तरह नहीं, मेहमान का रूप ले चुके हैं। इसके अलावा आजकल माँ घर-गृहस्थी के साथ-साथ नौकरी, बिजनेस व अन्य क्षेत्र में भी पहुँच गयी है। इसलिए परिवार में रह रहे बच्चे माँ की तुलना  में पिता के साथ ज्यादा घुलमिल रहे हैं और सबसे बड़ी और अच्छी बात है कि आजकल के पिता भी अपने को पिता कम, बच्चों के दोस्त और उसके साथी बनकर रहते हैं। इससे एक अच्छा वातावरण मिल जाता है। उनके रिश्ते में मिठास भर रहा है। वैसे भी पिता बच्चों के लिए केवल जन्मदाता नहीं, बल्कि संस्कार को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचा रहे हैं।  बच्चों के लिए वैसे हर दिन ही माता-पिता का होता है, लेकिन फिर भी एक दिन पापा के नाम हो जाता है।

फादर्स डे पूरे विश्व में ही मनाया जा रहा है। इंडोनेशिया, फिनलैंड सहित कई देशों  में नवंबर महीने दूसरे रविवार को मनाया जा रहा है । वहीं इजराइल में मजदूर दिवस के दिन ही पिता का दिन मनाया जाता है। इसके अलावा कई देशों में अगस्त, सितंबर और अकटूबर महीने में भी फादर्स डे मनाया जाता है। आस्ट्रेलिया, ब्राजील, बेल्जियम, भारत सहित अधिकतर देशों में जून के तीसरे रविवार को ही पिता दिवस मनाया जा रहा है। इस वर्ष सबसे खास बात यह है कि फादर्स डे की शुरुआत 1909 में 19 जून को हुई थी, और इस वर्ष भी जून का तीसरा रविवार 19 जून को ही पड़ा है। पिछले सौ साल से भी ज्यादा समय से देशभर में पिता दिवस मनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत के बारे में कहा जाता है कि मई 1909 में वाशिंगटन के स्पोकेन की रहने वाली सोनोरा स्मार्ट डॉड ने तय किया कि वह अपने पिता को सम्मान देंगी। उसकी माँ एक दुर्घटना में मारी गयी थी, और उसके पिता सिविल वार वेटेरन उसे व उसकी पाँच भाई-बहनों की जिम्मेदारी निभा रहे थे। डॉड ने अपने पिता के जन्मदिन 5 जून को फादर्स डे मनाने की मांग की तथा उस दिन छुट्टी की भी मांग की।  उसके एक साल बाद अर्थात् 1910 में 19 जून को फादर्स डे मनाने की आज्ञा दी गयी। डोडा ने  चर्च में अपने पिता को गुलाब के फूलों का गुलदस्ता उपहार में दिया और उसी दिन से फादर्स डे मनाने की शुरुआत हुई। एक बात स्पष्ट होता है कि चाहे कोई भी देश हो या कोई भी महीना पर पिता दिवस रविवार के ही दिन अर्थात् छुट्टी के दिन ही मनाया जा रहा है। बच्चे अपने पापा के साथ इस दिन को भरपूर खुशियों के साथ मना पा रहे हैं। हमारे यहाँ ग्रीटिंग देना, गिफ्ट देने की परंपरा चल रही है और पिता भी अपने बच्चों के साथ इस दिन का भरपूर लुफ्त उठा रहे हैं।

 

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

समलैंगिकता और बाप – बेटे के बीच की कहानी है डियर डैड

पिता हमारी जिंदगी में बेहद खास रिश्ता है और इस रिश्ते के खट्टे – मीठे लम्हों को सजाती है डियर डैड। फिल्म समलैंगिकता पर भी बात करती है जो देश ममें फिलहाल स्वीकृत नहीं है मगर बहस का मुद्दा जरूर है। फिल्म की स्क्रीनिंग हाल ही में महानगर में की गयी जिसमें फिल्म की अभिनेत्री एक्वली खन्ना, निर्माता शान व्यास समेत कई अन्य लोगों ने भाग लिया। फिल्म की कहानी बाप – बेटे के इर्द – गिर्द घूमती है और यह उनके घर दिल्ली से मसूरी (उत्तराखंड) के सफर के दौरान अत्प्रत्याशित संशय, अजनबियों के दौरान अपनी कहानी कहती है। फिल्म में 14 साल का बेटा शिवम और उसके 45 साल के पिता स्वामीनाथन हैं और कहानी उन्हीं के रिश्तों को लेकर चलती है।

अगर किसी लड़के को( जो किशोर हो चुका हो) पता चले कि उसका पिता समलैंगिक है तो उसकी क्या मानसिक हालत होगी? इसका जवाब पाने के लिए आप ‘डियर डैड’ फिल्म देख सकते हैं। तमिल फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता अरविंद स्वामी ने इसमें पिता (नितिन) की भूमिका निभाई है और हिमांशु शर्मा ने शिवम नाम के किशोर।

नितिन शादीशुदा है और एक बच्चे और एक बच्ची का पिता भी पर एक दिन वो तय करता है कि अपनी पत्नी से तलाक लेगा। तलाक के बाद वह अपनी पसंद की जिंदगी जिएगा। इस बात को अपने पिता से शेयर करने के लिए वह अपने बेटे के साथ कार से निकलता है। उसे अपने बेटे शिवम को उसके स्कूल छोड़ने होता है। रास्ते में नितिन अपने माता-पिता के यहां रूकता है और अपने बीमार पिता को अपनी यौनिकता के बारे में बताता है। इस बात को उसका बेटा शिवम भी सुन लेता है। इससे शिवम को मनोवैज्ञानिक धक्का लगता है और पिता से उसकी दूरी बन जाती है। क्या पिता और पुत्र फिर कभी मनोवैज्ञानिक रूप से एक दूसरे को समझ सकेंगे?

अरविंद स्वामी पिछले पंद्रह वर्षों से फिल्मों से अलग रहे है और एक बार फिर वे इस दुनिया में तब लौटे हैं, जब समलैंगिकता को लेकर समाज में बहस हो रही है। उनकी भूमिका प्रभावशाली जरूर है लेकिन पूरी फिल्म बहुत एकाआयामी और धीमी गति से चलती है। कुछ सीन अच्छे जरूर है। खासकर अंतवाला जिसमें नितिन अपने बेटे को स्कूल के गर्ल्स होस्टल में सीढ़ियां चढ़कर अपने गर्लफ्रेंड से अपनी भावनाओं की इजहार करने के लिए उकसाता है। बाकी फिल्म दर्शक को बांधने वाली नहीं है। बीच में एक बंगाली बाबा को भी लाया गया है जो समलैंगिकता को बीमारी मानता है। बाबा जड़ी बूटी से उसका इलाज करने के दावा करता है पर वह भी एक मजाकिया अंश बन कर ही रह गया है। पर हां समलैंगिकता की वकालत करने वालों को ये फिल्म अच्छी लगेगी।

निर्देशक- तनुज भ्रमर
कलाकार- अरविंद स्वामी, अमन उप्पल, हिमांशु शर्मा

 

दुनिया के सबसे बुजुर्ग ग्रेजुएट बने जापान के शिगेमी हिराता

टोक्यो। जापान के 96 वर्षीय शिगेमी हिराता दुनिया में सबसे अधिक उम्र में ग्रेजुएशन करने वाले शख्स बन गए हैं। उन्होंने क्योटो के विश्वविद्यालय से चीनी मिट्टी कला में स्नातक की परीक्षा पास की है। हिराता ने शुक्रवार को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की ओर से इसका प्रमाणपत्र भी प्राप्त किया।

मीडिया के अनुसार, हिराता ने इस वर्ष की शुरुआत में यूनिवर्सिटी ऑफ आर्ट एंड डिजायन से कला स्नातक की डिग्री हासिल की थी। 1919 में हिरोशिमा में जन्मे हिराता डिग्री पाने के बाद क्षेत्र में एक सेलेब्रिटी बन गए हैं।

उन्होंने जापान के योमिउरी समाचार पत्र को बताया, “जिन छात्रों का मैं नाम भी नहीं जानता उन्होंने भी मुझे बधाई दी है। इससे मुझे काफी ऊर्जा मिली है।” चीनी मिट्टी कला के अपने पाठ्यक्रम को 11 साल में पूरा करने वाले हिराता जोर देकर कहते हैं, “मैंने रिकॉर्ड नहीं बनाया है। मेरा लक्ष्य 100 साल तक जीने का है। अगर मैं तंदुरुस्त रहता तो कॉलेज जाना काफी मजेदार हो सकता था।”

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नौसेना में काम करने वाले हिराता के चार प्रपौत्र हैं। उन्होंने कहा, “मैं खुश हूं। इस उम्र में नई बातें सीखने में सक्षम होना मजेदार है।”

गत वर्ष जापान की ही मिएको नागाओका ने सौ साल की उम्र में 1,500 मीटर फ्रीस्टाइल तैराकी प्रतियोगिता पूरी की थी। इस उम्र में ऐसी प्रतियोगिता पूरी करने वाली वह दुनिया की पहली शख्स हैं। जापान में 2015 में करीब 59,000 व्यक्ति ऐसे थे, जिनकी उम्र सौ साल या उससे अधिक थी।

 

मुक्केबाजी की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद अली

दुनिया के सबसे बड़े मुक्केबाजों में से एक माने जाने वाले मोहम्मद अली का 74 साल की उम्र में अमेरिका के फीनिक्स में निधन हो गया। अपने प्रोफेशनल करियर में ज्यादातर फाइट नॉकआउट में जीतने वाले अली, पर्किंसन से हार गए। अली ने चार शादियां की थी जिनसे उन्हें सात बेटियां और दो बेटे थे. आइए आपको बताते हैं अली के बारे में दस बातें –

अली का जन्म 17 जनवरी 1942 को हुआ था. उनका शुरुआती नाम कैसियस मर्सेलुस क्ले जूनियर था।
अली ने 12 साल की उम्र में बॉक्सिंग ट्रेनिंग शुरू की थी और सिर्फ 22 साल की उम्र में 1964 में सोनी लिस्टन को हराकर उलटफेर करते हुए वर्ल्ड हैवीवेट चैंपियनशिप जीत ली थी।
इस जीत के कुछ ही वक्त बाद उन्होंने डेट्रॉएट में वालेस डी फ्रैड मुहम्मद द्वारा शुरू किया गया ‘नेशन ऑफ इस्लाम’ ज्वाइन कर अपना नाम बदल लिया।
अपनी मशहूर जीत के तीन साल बाद उन्होंने यूएस मिलिट्री ज्वाइन करने से इनकार कर दिया. इसके पीछे उन्होंने अमेरिका के वियतनाम युद्ध में भाग लेने के चलते अपनी धार्मिक मान्यताओं के आहत होने का हवाला दिया।
सेना को मना करने के चलते अली को गिरफ्तार कर उनका हैवीवेट टाइटल छीन लिया गया।
कानूनी पचड़ों के चलते अली अगले चार साल तक फाइट नहीं कर पाए। 1971 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पलट दी। अली के युद्ध के लिए ईमानदारी से मना करने के फैसले ने उन्हें ऐसे लोगों का नायक बना दिया जो युद्ध के खिलाफ थे।
कैसियस क्ले के नाम से मशहूर इस बॉक्सर ने 1975 में सुन्नी इस्लाम कबूल कर लिया. इसके तीस साल बाद उन्होंने सूफिज्म का रास्ता पकड़ लिया।
मशहूर पहलवान जॉर्ज वैग्नर से प्रभावित अली प्रेस कॉनफ्रेंस और इंटरव्यू के लिए किसी मैनेजर के भरोसे ना होकर इन्हें खुद ही हैंडल करते थे।
6 फीट 3 इंच लंबे अली ने अपने करियर में 61 फाइटें लड़ी और 56 जीतीं इनमें से 37 का फैसला नॉकआउट में हुआ। उन्हें अपने करियर में सिर्फ पांच बार हार का सामना करना पड़ा।
1अली के कई निकनेम्स में से सबसे मशहूर ‘द ग्रेटेस्ट, द पीपल्स चैंपियन और द लुइसविले लिप’ थे।

 

नीता अंबानी आईओसी में पहली भारतीय महिला

नीता अंबानी आईओसी में पहली भारतीय महिला बन गयी हैं। खेल, सिनेमा और राजनीतिक जगत की कई मशहूर हस्तियों ने उन्हें इसके लिए मुबारकबाद दी है।

केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने ट्वीट किया, “अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की पहली भारतीय महिला सदस्य नामित होने पर नीता अंबानी को मुबारकबाद।.”

बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख़ ख़ान ने लिखा, “ओलंपिक समिति में नामांकन के लिए नीता अंबानी को मुबारकबाद. ऑसम डार्लिंग. अब खेलों को ज़मीनी स्तर पर प्रोत्साहन मिलेगा।”

सचिन तेंदुलकर ने ट्वीट किया, “नीता अंबानी को ओलंपिक समिति में नामांकन के लिए मुबारकबाद। खेलों के विकास के लिए उनका जुनून प्रसंशनीय है। ये भारत और नारी शक्ति के लिए गर्व का क्षण है।.”

भारतीय मुक्केबाज मैरी कॉम ने ट्वीट किया, “नीता अंबानी को मुबारकबाद। वे ज़मीनी स्तर पर काम करके भारत का गौरव बढ़ा रहीं हैं और अब सर्वोच्च स्तर पर भी पहुँच गई हैं। उम्मीद है आपसे जल्द मुलाक़ात होगी।.”

टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस ने लिखा, “ओलंपिक समिति में नीता अंबानी से बेहतर भारत का प्रतिनिधि और कौन हो सकता है। नीता अंबानी आप पर गर्व है।”

भारत के ओलंपिक पदक विजेता निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा ने लिखा, “बॉलीवुड को नीता अंबानी के समर्थन में इतनी ताक़त से उतरते हुए देखकर अच्छा लग रहा है। ओलंपिक अभियान के लिए ये अभूतपूर्व प्यार है। एक नए युग की शुरुआत।.”

एक और ट्वीट में बिंद्रा ने लिखा, “नीता अंबानी भारत की ओर से ओलंपिक समिति की सदस्य होंगी क्यों न वो सद्भावना संकेत के तौर पर ओलंपिक की टीम को स्पान्सर कर दें।.”

टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा ने ट्वीट किया, “ओलंपिक समिति के लिए नामांकन भारत के कोने-कोने तक खेलों को पहुँचाने के नीता अंबानी के प्रयासों का सच्चा प्रमाण है।”

लेखिका शोभा डे ने लिखा, “नीता अंबानी को मुबारकबाद. हां, ये बड़ी बात है और भारत के लिए सम्मान भी.”

 

पिता की मौजूदगी ही हर कठिनाई से निकालती है

‘पिता’ शब्द ही संरक्षण का परिचायक है। जहां मां से निस्वार्थ ममता के आंचल की आशा की जाती है तो पिता से संरक्षण की। मां जन्मदाता है तो पिता से जीवनरूपी आशीष प्राप्त होता है। पिता के होने का अहसास ही हमें हर कठिनाई से निकालने में मदद करता है। हमें हर समय उस मजबूत सुरक्षा आवरण का आभास कराता है जिसे कोई भेद नहीं सकता।

पापा हैं तो कैसी चिंता

पिता के संरक्षण को सिर्फ उस एक उदाहरण से जाना जा सकता है जिसे अमूमन हर व्यक्ति ने देखा होगा और स्वयं भी महसूस किया होगा ‘पापा की गाड़ी पर पीछे बैठे बच्चे को’। पापा को कसकर पकड़े उसके नन्हें हाथ बताते हैं कि पापा हैं तो कोई डर नहीं। सबसे बेफिक्र वह अपनी ही दुनिया में आसपास के नजारे बड़े आत्मविश्वास के साथ देखता चलता है क्योंकि उसे मालूम है कि वह पापा के साथ है, तो फिर कैसी चिंता! मंजिल पर तो पहुंचना ही है।

यही सुरक्षा का अहसास बच्चे को मजबूत विश्वास वाला बनाता है। पिता भले ही अपनी पदवी से मां की तुलना में कठोर माने जाते हैं, मगर इस कठोरता के भीतर भी वह ढेर सारा प्यार छिपाए हुए रहते हैं क्योंकि प्रकृति ने ही उन्हें संरक्षणवादी और अनुशासनात्मक प्रवृत्ति का बनाया है। इसके लिए उन्हें इसी भूमिका में ही पहचान मिली है। जहां मां बच्चे की पहली शिक्षक होती है वहीं पिता पथप्रदर्शक। बच्चे की नन्हीं अंगुलियों को थामे पिता का हाथ ही उसे रास्तों पर चलने का हौसला दिलाता है।

मंजिल तक पहुंचने के लिए तमाम मुसीबतों, मुश्किलों से लड़ने का साहस भी पिता ही दिलाते हैं। कुल मिलाकर वे अपने अनुभवों से बच्चों को दुनियादारी के वह पाठ पढ़ाते हैं, जो उन्हें उनके भविष्य की मंजिल तक पहुंचने में मदद करते हैं।

मील के पत्थर की तरह सीख

बारीकी से गौर करो तो नजर आएगा कि पिता ने छोटी-छोटी बातों से ऐसे मील के पत्थर खड़े कर दिए जो आज जीवन की गाड़ी चलाने में हमें मदद करते हैं। बचपन में गुल्लक में रोज सिक्का भले ही शौक से डाला जाता हो और उत्साह रहता था कि एक दिन ये पैसे बहुत ज्यादा हो जाएंगे। मगर बड़े होकर हम जान पाते हैं कि वह सेविंग का सबक था, जो बड़े होकर हमें गृहस्थी चलाने के लिए आसान रास्ता बन गया।

जरा-सा बीमार हुए कि मां तीमारदारी में लग जाती हैं, मगर पिता तब भी हौसला देते हैं, घबराना नहीं बुखार है अभी भाग जाएगा और सच में शायद उन शब्दों को सुनकर हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अचानक बढ़ जाती है और बुखार को भी उल्टे पैर भागना ही पड़ता है। यही पिता का संबल होता है, जो खेल के मैदान में भी हारने के बावजूद हमें फिर कोशिश करने की सीख देता है कि जीत ज्यादा दूर नहीं…कोशिशें जारी रखो। और सही में जीत हमारे हिस्से में आती भी है।

बच्चों की इच्छाओं के आगे पिता अपनी तमाम इच्छाओं को इतना बौना करके रखते हैं कि वह कभी बलवति होती ही नहीं। कड़ी मेहनत कर जो भी लाया जाए, उसमें पूरी होती हैं बच्चों की इच्छाएं क्योंकि पिता बनने के बाद सर्वोपरि रह जाती हैं बच्चों की ख्वाहिशें…।

 

अपने हिस्से की दुनिया तलाशतीं – वाह! ये औरतें

  •  सुषमा त्रिपाठी

इंसान चला जाए, अपनी गलियों को अपने भीतर सहेजे रखता है और बाहर की दुनिया में भी अपने हिस्से का कोना तलाश लेता है। लेखिका माधवीश्री के उपन्यास में नायिका के चरित्र में यह कोना नजर आता है। मां को समर्पित यह उपन्यास कल्पना पर आधारित हैं मगर लेखिका माधवी श्री के मुताबिक ही इसमें सभी कुछ कल्पना नहीं है।

लेखिका के अनुसार उपन्यास कोलकाता में लिखा गया था मगर इसे पढ़ने पर आपको आने वाले कल की औरतें दिखती हैं जो उनके जेहन में कहीं छुपी थीं और वक्त आते ही उपन्यास की शक्ल में जिंदा हो उठीं।

वाह ये औरतें, तीन सहेलियों की कहानी है। ऐसी औरतें जो हम अपने आस–पास देखते हैं मगर उनके अंदर का विद्रोह अनदेखा रह जाता है। चरित्र को नैतिकता के पलड़े पर न तोलकर सिर्फ उसे एक मानवीय पहलू से देखा जाए तो बात समझ में आती है। रमा उस कामकाजी औरत का चेहरा है जो सोशल गैदरिंग में खुशमिजाज और आत्मनिर्भर होने का दावा करती है और अपने टूटेपन को आत्मविश्वास के सहारे जोड़ने की कोशिश करती है। उमा लेखिका है, जो स्त्री विमर्श की बातें करने वाली आधुनिक स्त्री है। पूनम है, जो गृहस्थी की दुनिया में खुद को झोंक देने वाली और अमीर घर की महिला है जो परिवार की भव्यता को अपने कीमती कपड़ों और जेवरों के माध्यम से दिखाती है।

इन तीनों की कोशिश एक ही है, अपनी–अपनी दुनिया के कठघरों से अलग-अपने हिस्से का कोना तलाशना, जहां कोई बंधन न हो और जो हंसी निकले, भीतर की चट्टानों को तोड़कर निकले। एक ऐसी ख्वाहिश, जो लड़की से औरत बनी और अकेले रहने वाली हर महिला की ख्वाहिश है, जहां कंधा मिले मगर वह कंधा किसी मर्द का हो, यह बिल्कुल जरूरी नहीं है। ये तीन सहेलियां कुछ ही लम्हों में पूरी जिंदगी जीना चाहती हैं। कहानी वार्तालाप शैली में धाराप्रवाह चलती है। महसूस होता है कि कोई हमारे सामने बतिया रहा है और यही बात इस उपन्यास को भीड़ में से अलग करती है क्योंकि यहां अंदर का गुस्सा है, बतकही है मगर कोई आदर्श या किसी प्रकार का बौद्धिक बोझ नहीं है।

ये एक ऐसी दुनिया है जिसे न चाहते हुए भी कई बार औरतों में जीने की चाहत होती भी है मगर नैतिकता और आदर्श के बंधन में हम इन तमाम ख्यालों को पाप समझकर खुद से दूर रखते हैं। मसलन, रमा का खुद से 23 साल बड़े मर्द से शादी करना और उसके बाद भी एक प्रेमी रखना और उसका चालाकी से इस्तेमाल करना, पूनम का अपने देवर से संबंध बनाना और उमा का खुद से कम उम्र का ब्वायफ्रेंड रखना (जो अंत में उसे छोड़कर किसी और लड़की के साथ चला जाता है), ये सब किसी आम औरत के जेहन में नहीं आ सकता है और गलती से अगर आए तो वह इस ख्याल को धकेल देगी।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि रमा अपने पति के गुजरने के बाद ही यह कदम उठाती है यानि पत्नी वाली वफादारी उसमें है। इसके बावजूद वह जिस समाज में रहती है, उसे इसकी अनुमति नहीं है। रही बात उमा की तो वह भी अंत में कुणाल के मित्र कुशल से शादी करती है औऱ उसका कारण यह है कि कुणाल से शादी करने का मतलब रोमांस का खत्म हो जाना है। उमा को अंत में एक ही चीज याद रहती है स्वतंत्रता, और वह उसी के साथ जी रही है।

यह उपन्यास इस बात को सामने रखता है कि औरत भले ही एक मर्द के कंधे का सहारा तलाशती हो, खुद को उसे सौंपकर अपनी दुनिया उसमें देखती हो मगर उसका पूरा होना किसी मर्द पर या मातृत्व पर निर्भर नहीं करता। उसे अपने हिस्से का कोना चाहिए जो उसे रिश्तों की तमाम परिभाषाओं से अलग सिर्फ एक औरत से परे सिर्फ एक मनुष्य के तौर पर समझे, यही तलाश इन तीनों औरतों की है, हमारी और आपकी भी है।

उपन्यास में कई जगहों पर घर से लेकर कार्यस्थल पर औरतों के साथ होने वाली बदसलूकी और उपेक्षा खुलकर सामने आई है जिसमें दैहिक शोषण भी शामिल है और इसमें महिला पुलिस अधिकारियों का डर भी शामिल है। इसके साथ ही समाज के निचले तबके की औरतों का विद्रोह भी शामिल है। उपन्यास में उमा और कुणाल के साथ रीना औऱ सौमित्र का रिश्ता भी शिद्दत से मौजूद है मगर उमा और रीना में जो रिश्ता है, वह खींचता है। दिल्ली जब उमा के साथ बेरहम होती है तो रीना उसका सम्बल बनती है।

दरअसल, यह उपन्यास एक मर्द और औरत के रिश्ते की कहानी नहीं कहता बल्कि इसमें औरत के औरतपन से जन्मे अपनेपन के धागे हैं जो औरतों में एक खूबसूरत रिश्ता जोड़ते हैं। इनमें उमा, रमा और पूनम के साथ उमा और रीना का रिश्ता एक कड़ी है।उपन्यास में कोलकाता जहां भी नजर आया है, शिद्दत से नजर आया है मगर जिस दिल्ली ने गढ़ा, माधवी श्री उसे भी नहीं भूलीं। एक मां की तरह जिसे अपने दोनों बच्चे प्यारे हैं। प्रूफ की गलतियां हैं मगर उपन्यास की धाराप्रवाह शैली के कारण कई बार इन पर ध्यान नहीं जाता। नई दिल्ली के श्री प्रकाशन ने इसे छापा है। लेखिका यह पहला उपन्यास है और इसे पढ़ा भी जा रहा है। खुद से बतियाना हो और अपना कोना तलाशने की कसक हो तो ये उपन्यास पढ़ा जा सकता है।

 

पुस्तक –  वाह! ये औरतें

लेखिका – माधवी श्री

प्रकाशक – श्री प्रकाशन

 

दिल्ली का स्ट्रीट फ़ूड सुरक्षित बना रही है ये संस्था

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है, कि राह चलते किसी स्ट्रीट फ़ूड पर नज़र पड़ते ही आपकी भूख बढ़ गयी हो, पर आपने उस ठेले वाले के गंदे हाथ देखकर अपना इरादा बदल लिया और आगे बढ़ गए हों? ऐसी परेशानी से यह दुकानवाले अक्सर गुज़रते हैं, और इसी को दूर करने के लिए ‘ वन रूपी फाउंडेशन’ नाम की संस्था ने इन लोगो में दस्ताने (gloves) बांटने की मुहीम चलायी है।

व‘न रूपी फाउंडेशन‘ के संस्थापको में से एक, तरुण भरद्वाज बताते हैं, ” हमने कई ठेले वालों को देखा जो बिना दस्तानो के खाना बना कर बेच रहे थे। तभी हमने सोचा कि इन्हें अन्य रेस्तरां के रसोइयो द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले दस्ताने दिए जाएँ, जिससे यह अपने काम को स्वच्छता पूर्वक कर सकें।”

यह संस्था अन्य कई प्रोजेक्ट पर काम कर चुकी है। जैसे- पेड़ लगाने की मुहीम, गरीब बच्चो के बीच कपडे वितरित करना, झुग्गियो में दंत चिकित्सा के कैंप लगवाना, पुस्तकालयों में किताबें दान करवाना, कैंसर के रोगियों के लिए रक्दान शिविर लगवाना आदि।

तरुण और उसके मित्र अरविन्द वत्स ने इस संस्था की शुरुआत नौ महीने पहले की थी। इसका उद्देश्य दान को इच्छुक लोगों से प्रतिदिन 1 रुपये ले कर ज़रुरतमंदो के जीवन में बदलाव लाना है। हर ठेले वाले को 20 जोड़ों के हिसाब से इन्होने अब तक 2000 दस्ताने बांटें हैं। 15 दिनों बाद वे वापिस इनके पास जा कर स्थिति की जानकारी लेंगे फिर इसी आधार पर वे इस मुहीम को आगे बढ़ाएंगे।

तरुण कहते हैं, ” यह स्वच्छता और रोग नियंत्रण की और एक बड़ा कदम होने के साथ-साथ, इन दुकानदारों की आय में वृद्धि का भी कारण बन सकता है। कई लोग जो सिर्फ इस कारण इनके हाथ का खाना पसंद नहीं करते थे क्यूंकि इनके पास दस्ताने नहीं थे, अब वे भी निश्चिन्त हो कर बाहर का खाना खा सकेंगे।तरुण मानते हैं कि शुरुआत में कई दुकानदार इन दस्तानो को पहनने के इच्छुक नहीं थे। वे बताते हैं, ” हमने उनमे से एक से इस दस्ताने को पहनकर बर्फ का गोला बनाने को कहा। उसने किया और हमने उसे बडे चाव से खाया। ऐसा करने से उस दुकानवाले के अन्दर आत्मविश्वास आया और वह दस्ताने इस्तेमाल करने लगा।

(साभार – द बेटर इंडिया)

 

 

 

 

आंखों की गंभीर समस्या है रेटिनल डिटैचमेंट

रेटिनल डिटैचमेंट एक ऐसी अवस्था है, जिसमें रेटिना आंख की पिछली दीवार से अलग हो जाती है। इससे रेटिना तक खून के संचार के साथ-साथ पोषण का स्रोत घटने लगता है। रेटिना अगर ज्यादा समय तक अलग रहे, तो व्यक्ति अपनी दृष्टि हमेशा के लिए खो सकता है।

ये होते हैं लक्षण

अगर किसी व्यक्ति को नजर के सामने अलग सी रोशनी की किरणें या धागे जैसी हिलने वाले वस्तुएं दिखे तो उसे हल्के में न लें। साथ ही अगर किसी को किनारों से चीजें अंधेरी सी दिखाई दे, तो बिना किसी देरी के एक अच्छे रेटिना विशेषज्ञ को दिखाएं।

तीन प्रकार के होते हैं

रेटिनल ब्रेक या टीअर : इसे चिकित्सकीय शब्दों में रेग्मैटोजिनस रेटिनल डिटैचमेंट कहते है। इसमें आंख के मध्य में मौजूद तरल जिसे विट्रियस कहते हैं, रेटिनल टीअर से निकलने लगता है, जिसके कारण रेटिना अपने स्थान से हटने या उठने लगता है।

एक्सुडेटिव रेटिनल डिटैचमेंट : यह रेटिना से तरल के रिसाव के कारण होता है। ज्यादातर मामलों में ट्यूमर या किसी सूजन संबंधी विकार के कारण एक्सुडेटिव रेटिनल डिटैचमेंट होता है।

ट्रैक्शन रेटिनल डिटैचमेंट : ऐसा प्रोलिफरेटिव डायबिटिक रेटिनोपैथी के कारण होता है। इसमें रेटिना विट्रियस कैविटी में मौजूद संवहनी ऊतक से अलग हो जाती है।

इनको रहता है अधिक खतरा

जिनकी पास की नजर कमजोर होती है, उनमें रेटिनल डिटैचमेंट का खतरा ज्यादा होता है। इसके अलावा अगर किसी को अतीत में कभी आंख पर चोट लगी हो या मोतियाबिंद की जटिल सर्जरी हुई हो, तो उन्हें भी रेटिनल डिटैचमेंट के होने की आशंका अधिक होती है। इसके अलावा अगर आपके परिवार में किसी को रेटिनल डिटैचमेंट की समस्या हो, तब भी आपको यह बीमारी हो सकती है।

इलाज है आसान

रेटिनल डिटैचमेंट के इलाज में प्रयोग होने वाली सबसे पुरानी और सबसे अधिक उपयोग होने वाली विधि है स्क्लेरल बक्कल। इस तकनीक का प्रयोग ऐसे मरीजों पर किया जाता है, जिनकी समस्या बहुत जटिल नहीं होती है। ऑपरेशन के फौरन बाद ही व्यक्ति अपने घर जा सकता है और कुछ दिनों बाद अपने काम पर भी।

सामान्य सर्जरी के 2-3 हफ्ते तक व्यक्ति को थकान महसूस हो सकती है। इसके अलावा अगर आपकी आंख में गैस का बुलबुला है, तो गाड़ी चलाने या हवाईजहाज की यात्रा से बचें। कई बार सर्जरी के 2-3 दिन तक आंख में असहजता या खुरदुरापन महसूस हो सकता है।

आंख के पूरी तरह स्वस्थ हो जाने तक किसी भी ऐसी गतिविधि से बचें, जिससे नजर पर दबाव पड़े। इस बात की आशंका हमेशा रहती है कि यदि एक आंख में रेटिनल डिटैचमेंट है, तो दूसरी आंख में भी यह समस्या हो सकती है। डायबिटीज होने पर साल में एक बार आंखों की पूरी जांच करवाना और भी जरूरी हो जाता है।