Thursday, September 24, 2026
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विजयादशमी से जुड़े हैं ये अनोखे तथ्य

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आखिर रावण किस बात का प्रतीक है? उसने सोने की लंका नहीं बसाई बल्कि अपने भाई कुबेर से उसकी नगरी छीन ली। उसने साधुओं को मारा और स्त्रियों के साथ दुराचार किया। उसने डर के द्वारा अपना साम्राज्य स्थापित किया। आखिर उसने सीता का अपहरण इसीलिए किया क्योंकि वह अपनी बहन के अपमान का बदला लेना चाहता था।

युद्ध में उसने स्वयं से पहले अपने पुत्रों और भाई को लड़ने के लिए भेजा। वह सीता को जीतना चाहता था और राम को भी। रावण केवल स्वयं के लिए जी रहा था। अपने आनंद को वह सबसे ऊपर रखता था। हालांकि वह योगी शिव का भक्त था। उन शिव का जिन्होंने संसार की भौतिकता और सभी वस्तुओं का त्याग कर रखा है।

रावण शिव की स्तुति करता रहा और उनके सामने नतमस्तक होता रहा लेकिन दस सिर होने के बावजूद उसने कभी भी शिव के ज्ञान की तरफ ध्यान नहीं दिया। संभव है कि उसने शिव के दर्शन को नहीं समझा, उसने शिव के दर्शन को समझा भी हो तो उनके बताए मार्ग पर चलने का सामर्थ्य रावण नहीं जुटा पाया। रावण के चरित्र की ये कमजोरियां सभी लोगों के लिए उदाहरण है कि वे अपनी इन कमजोरियों पर विजय पाने का प्रयास करें।

विजयादशमी पर यात्रा शुभ

विजयादशमी के दिन नवरात्र पर्व का समापन होता है। इस दिन पृथ्वी से मां दुर्गा अपने लोक के लिए प्रस्थान करती हैं। यही वजह है कि विजयादशी को यात्रा तिथि भी कहा गया है। इस दिन किसी भी दिशा में यात्रा करने पर दोष नहीं लगता है।

दशहरे के प्रमुख कृत्य

विजयादशमी यूं तो सर्वसिद्ध मुहूर्त है। इस दिन अपराजिता पूजन, शमी पूजन, सीमोल्लंघन, घर वापसी, नारी पूजन, नए वस्त्र व आभूषण धारण करना, राजाओं द्वारा अपने शस्त्र या संपदा का पूजन। राजाओं, सामंतों और क्षत्रियों के लिए यह विशेष महत्व का दिन है।

नीलकंठ के दर्शन शुभ

‘नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध-भात का भोजन करियो, हमरी बात राम से कहियो।” यह उक्ति गांव-गांव में चर्चित है। इसका अर्थ यही है कि नीलकंठ भगवान का प्रतिनिधि है। दशहरे पर यही कारण है कि इस पक्षी का दर्शन किया जाता है। भगवान शंकर ने विष का पान किया था और वे नीलकंठ कहलाए थे।

यह पक्षी भी नीलकंठ है तो इसलिए इसका दर्शन शुभ माना गया है। नीलकंठ को भारत में किसानों का मित्र भी माना गया है क्योंकि यह अनावश्यक कीड़ों-मकोड़ों को खाकर किसान की मदद करता है।

दशहरे पर बीड़ा क्यों

अक्सर रावण के दहन के पश्चात विजयादशमी पर्व पर पान खाने की परंपरा भी है। इसके पीछे लोगों का विश्वास ही मुख्य है। माना जाता है कि इस दिन लोग असत्य पर सत्य की जीत का उत्सव मनाते हैं और बीड़ा खाकर यह बीड़ा उठाते हैं कि वे हमेशा सत्य के मार्ग पर चलेंगे। इसका एक कारण यह भी है कि नवरात्र में श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास रखते हैं और दसवें दिन जब वे भोजन शुरू करते हैं उसके ठीक पाचन में बीड़ा मदद करता है।

शमी की पत्तियां लाना इसलिए शुभ

कथा है कि महर्षि वर्तन्तु का शिष्य था कौत्स। उसकी शिक्षा पूरी होने पर वर्तुन्तु ने उससे गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगी। इसका इंतजाम करने के लिए वह महाराज रघु के पास गया। रघु दान हेतु खजाना पहले ही खाली कर चुके थे।

उन्होंने कौत्स से तीन दिन का समय मांगा और इंद्र पर आक्रमण का विचार किया। इंद्र ने घबराकर कोषाध्यक्ष कुबेर को रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा का आदेश दिया।

उसी तिथि को विजयादशमी उत्सव मनाया गया। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शमी वृक्ष का संबंध शनि से भी है। शमी वृक्ष का पूजन शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव में सहायक है।

 

मुंशी प्रेमचंद के ऐतिहासिक घर को बचाया इस प्रोफेसर तथा उनके छात्रों ने !

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सन २००५ में डॉ. यादव मुंशी प्रेमचंद जी पर आधारित एक क्लास ले रहे थे। प्रेमचंद जी के घर को संरक्षित करने के लिए विद्यार्थियों का उत्साह देखकर डॉ. यादव बहुत प्रभावित हुए और इस बारे में उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जी से मुलाकात की।

डॉ विनय कुमार यादव १८ सालो से बिशप कॉटन वूमेन्स ख्रिस्तियन कॉलेज, बंगलुरु में हिंदी पढ़ाते है  और स्कूल में हिंदी विभाग के प्रमुख है। स्कूल में उन्हें वो दिन याद है जब वे मुंशी प्रेमचंद के बारे में पढ़ा रहे थे, जिससे सभी छात्रों के दिल और दिमाग पर पर गहरी छाप पड़ी।

डॉ यादव कहते है “कभी कभी क्लास के सभी विद्यार्थी होशियार और उत्साहित होते है। सन २००५-२००६ में मुझे यूनिवर्सिटी के कुछ विद्यार्थियो को पढ़ाने का मौका मिला। एक विषय का असर इस तरह से हुआ कि सभी विद्यार्थियो की सोच बदल गयी और साहित्य जगत में बड़ा बदलाव हुआ।“

डॉ यादव को प्रख्यात हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद की  लिखी हुई  सभी किताबे पसंद है। एक दिन वे ‘लम्ही- मुंशी प्रेमचंद का गाँव’ इस विषय पर पढ़ा रहे थे। उस लेख में लम्ही, उत्तर प्रदेश के एक गाँव, जहा मुंशी प्रेमचंद रहते थे, की तुलना लन्दन स्थित विलियम शेक्सपीअर के घर के साथ की गयी है।

डॉ. यादव कहते कि लेखक के अनुसार शेक्सपीयर का घर ब्रिटनवासियों ने अच्छी तरह से रखा है पर प्रेमचंदजी के घर की स्थिति बड़ी दयनीय है, इस बात से वो परेशान हुए।

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डॉ. यादव छात्रों के इस उत्साह से बहुत खुश हुये। उन्होंने विद्यार्थियो से कहा की वे सब हस्ताक्षर अभियान शुरू करे और सभी छात्रों और  शिक्षको से हस्ताक्षर करने के लिये अनुरोध करे। उसके बाद हम उस पत्र को उत्तर प्रदेश सरकार को भेजेंगे। डॉ. यादव ने उन्हें एक पत्र लिखा जिसके तीन मुख्य विषय थे। प्रेमचंदजी के घर को म्यूजियम बना दिया जाये, वहा एक वाचनालय (लाइब्रेरी) शुरू करे और हिंदी साहित्य पढने वाले विद्यार्थीयो के लिये वहा अनुसन्धान (रिसर्च) संस्था शुरू करे।

डॉ. यादव कहते है “अभियान का इतना असर था कि लोगो ने एक दिन में २००० हस्ताक्षर किये। हमें सकारात्मक विकास दिखाई दिया। मुझे आशा थी कि एक दिन में इतने सारे लोग इससे जुड़े है तो कुछ ही दिनों में हम बहुत आगे बढ़ सकते है। सिर्फ २००० हस्ताक्षर के पत्र पर शायद सरकार गौर ना करे, पर अगर ज्यादा लोग शामिल हो तो सरकार जरुर सहायता करेगी।”

डॉ. यादव ने विद्यार्थियो से कहा कि इस अभियान को दोस्त, परिवार और सभी लोगो के पास पहुचाएं और ज्यादा से ज्यादा लोगो के हस्ताक्षर शामिल करे। इस दौरान डॉ. यादव ने तय किया कि वो लाम्ही में जाकर प्रेमचंदजी के घर की स्थिति का जायजा लेंगे।स्कूल की छुट्ठीयों में वे लाम्ही गये। वहा के ज्यादातर लोगो को प्रेमचंदजी के घर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी ये सुनकर वो हैरान हुये। बहोत कोशिश करने के बाद उन्हें प्रेमचंदजी का घर दिखाई दिया जो बहुत ही ख़राब अवस्था में था।

डॉ. यादव कहते है-“मैं घर की स्थिति देखकर परेशान हो गया। जिस लेखक ने हिंदी साहित्य को एक नयी दिशा दी, जिनके लेख से स्वतंत्रता सेनानी प्रभावित हुये, जिन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है, उनका घर इससे बेहतर स्थिति में होना चाहिये था। ”

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उन्होंने विद्यार्थी को दिखाने के लिए उस घर के कुछ फोटो लिये और बंगलुरु वापस आ गये। इसी बीच आवेदन पत्र पर १ लाख से भी ज्यादा हस्ताक्षर हुए।मुंशी प्रेम्चाद का घर कुछ इस अवस्था में पाया गया था। आवेदन पत्र पर इतने सारे हस्ताक्षर होना एक बहोत बड़ी जीत थी और अब डॉ. यादव इस पत्र को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री को देने के लिए तैयार थे।

मुख्यमंत्री से मिलने  के लिए उन्हें थोड़ी दिक्कत हुयी पर मिलने के बाद उनके हिंदी साहित्य और मुंशी प्रेमचंद के घर के प्रति लगाव को देखकर मुख्यमंत्री काफी प्रभावित हुये। मुख्यमंत्री ये जानकर बहुत खुश हुये कि डॉ. यादव दक्षिण से उत्तर की और आकर एक हिंदी साहित्य के महान लेखक के घर को संरक्षित करना चाहते है। इस कार्य के लिए मुख्यमंत्री ने एक करोड़ और २.५ एकड जमीन दे दी। पर उत्तरप्रदेश की सरकार बदलने के कारण शुरू किया गया मरम्मत का काम रुक गया। डॉ. यादव ने नयी सरकार को बहोत सारे पत्र लिखे पर कोई जवाब नहीं आया।

सन २०१३ में जब अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री बने तब डॉ. यादव को एक आशा की किरण दिखाई दी और उन्होंने अखिलेशजी से बात करके मरम्मत का काम फिरसे शुरू किया।अब तक  ९० प्रतिशत काम पूरा हुआ है और डॉ. यादव सरकार के इस काम पर निजी तौर पर ध्यान दे रहे है।

डॉ. यादव कहते है-“मैंने कई बार लम्ही में जाकर काम का मुआयना किया और वो ठीक तरह से चल रहा है। कुछ ही दिनों में काम पूरा हो जायेंगा”डॉ. यादव ने उत्तर प्रदेश सरकार को सुझाव दिया है कि प्रेमचंदजी का घर पर्यटन स्थल में शामिल करे ताकि ज्यादा से ज्यादा पर्यटक भेट दे सके। वो कहते है,“अगर पर्यटकसे १० रुपये टिकट के तौर पर लिया जाये तो घर की देखभाल के लिये मासिक आमदनी भी इकट्ठा हो सकती है”एक लेखक और उनके विद्यार्थियो को धन्यवाद देना चाहिये जिनके अथक प्रयत्न के बाद एक महान लेखक का घर संरक्षित किया गया जो सभी नये लेखको के लिये प्रेरणा स्थान बन रहा है।

डॉ. यादव कहते है प्रेेमचंदजी सामान्य लेखक नहीं थे। उनकी सारी कथाए सत्य घटनाओ पर आधारित थी, जो अमीरों से गरीब लोगो के उपर किये गये शोषण पर आधारित थी। उनके साहित्य दिल में एक जगह बना लेते है।” हिन्दी का संरक्षण सिर्फ वातानुकूलित घरों में होने वाली संगोष्ठियों से नहीं हो सकता और बल्कि  इसके लिए जनता तक जाने की जरूरत है। अपराजिता प्रो. यादव के इस प्रयास और उनकी जागरूकता को सलाम करती है।

 (साभार – द बेटर इंडिया)

 

धोनी के बाद शमी ने पेश की मिसाल, आईसीयू में बेटी को छोड़ खेला मैच

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भारत और न्यूजीलैंड के बीच कोलकाता में हुआ दूसरा टेस्ट मैच टीम इंडिया ने 178 रनों से जीत लिया। इस मैच में भारत के फास्ट बॉलर मोहम्मद शमी ने एक शानदार मिसाल पेश की। दरअसल शमी जब मैच में मेहमान बैट्समैन के विकेट ले रहे थे, उसी वक्त पर्सनल लाइफ में वे एक बड़ी परेशानी का सामना कर रहे थे।

– भारत और न्यूजीलैंड के बीच दूसरा टेस्ट मैच 30 सितंबर से शुरू हुआ था और इसके एक दिन बाद ही शमी की 14 महीने की बेटी आयरा को हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा।
– शमी की बेटी को ना केवल तेज बुखार था बल्कि सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी जिसके बाद उसे ICU में रखा गया था।
– बेटी की तबीयत खराब होने की वजह से शमी काफी तनाव में थे, लेकिन इसका जरा भी असर उन्होंने अपनी परफॉर्मेंस पर नहीं पड़ने दिया।
– वे टीम इंडिया के लिए लगातार बॉलिंग करते रहे और एक के बाद एक विकेट लेते रहे। यहां तक कि इस बात को उन्होंने अपने साथियों से भी शेयर नहीं किया।
– हर दिन मैच खत्‍म होते ही शमी अपनी बेटी का हाल जानने पहुंच जाते और फिर रात में वापस आकर टीम के साथ रुक जाते।
– मैच में उनकी परफॉर्मेंस को देखकर लग रहा था कि वे भी चाहते हैं कि मैच जल्द से जल्द खत्म हो, ताकि वे पूरा टाइम अपनी बेटी को दे सकें।

भारत को दिलाई ऐतिहासिक जीत

– इस मैच में मो. शमी ने दोनों इनिंग्स को मिलाकर 6 विकेट चटकाए और मेहमान टीम को संभलने का मौका नहीं दिया।
– भारत के लिए ये टेस्ट इसलिए भी इतना खास था, क्योंकि ईडन गार्डन में भारत का ये 250वां टेस्ट था।
– साथ ही इसे जीतने के साथ ही भारत को सीरीज में 2-0 की अपराजेय बढ़त भी मिल गई।
– इसके अलावा इस टेस्ट को जीतकर भारत एकबार फिर टेस्ट रैंकिंग में नंबर वन टीम बन गई।
– मैच खत्म होते ही शमी की बेटी भी हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो गई।
– इससे पहले टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भी कुछ ऐसी ही मिसाल पेश कर चुके हैं।
– धोनी जब पिता बने थे, तब वे टीम इंडिया के साथ खेल रहे थे, और इसी बात कहा हवाला देते हुए उन्होंने बेटी को देखने के लिए घर लौटने से इनकार कर दिया था।

 

दशहरे पर 65 Cr का जलेबी-फाफड़ा खा जाते हैं गुजराती, 2000 करोड़ का है गरबे का कारोबार

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अहमदाबाद.‌देश-दुनिया से लोग गरबा देखने गुजरात आते हैं। इसी साल अकेले अहमदाबाद में 700 एनआरआई और 250 विदेशी टूरिस्ट पहुंचे हैं। पूरे राज्य में यह संख्या ढाई हजार से ज्यादा है। नवरात्रि के खर्चों के आंकड़े देखें तो हर प्लॉट के हिसाब से रोज 2 से 5 लाख रुपए का किराया होता है। इसके अलावा लाइट और साउंड पर भी 3 से 5 लाख रुपए खर्च होते हैं। 9 दिन के इस त्यौहार का कुल बिजनेस करीब 2 हजार करोड़ का होता है। यही नहीं एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल दशहरे पर गुजरात के लोग 65 से 70 करोड़ का सिर्फ जलेबी-फाफड़ा खा जाते हैं। पढ़िए गुजरात के गरबा बिजनेस पर एक रिपोर्ट…

– गरबा सिर्फ आस्था और उत्साह का ही मामला नहीं है, बल्कि यह बड़ा बिजनेस बन चुका है। हालांकि इस बार बारिश ने इसमें खलल पैदा किया है।

– थीम के मुताबिक मेन्टेनेंस का खर्च, जूते, कपड़े, ज्वेलरी, खाने पीने का कारोबार आदि मिलाया जाए तो 9 दिनों में करीब 2000 करोड़ का बिजनेस होता है।
– परंपरा ऐसी कि सिर्फ दशहरे पर ही लोग 65 से 70 करोड़ की जलेबी और फाफड़ा खा जाते हैं। इस बार बारिश के चलते टिकट की बिक्री 25% तक ही रही है।
– एक टिकट की कीमत 200 से 500 रुपए तक रहती है। एक अनुमान के मुताबिक बारिश से इस बार गरबा कारोबार को करीब 500 करोड़ का नुकसान हुआ।
गरबा ड्रेस 120 करोड़ का चनिया-चोली मार्केट

– अहमदाबाद में रानी का हजीरा, लॉ-गार्डन और नेहरू नगर में चनिया-चोली का बाजार लगता है। इनका सालाना कारोबार 25 से 30 करोड़ है।
– पूरे राज्य का ये आंकड़ा 120 करोड़ को पार कर जाता है। कच्छ की कढ़ाई-बुनाई और सौराष्ट्र के ग्रामीण कपड़े की डिमांड सबसे ज्यादा होती है।
– इसकी कीमत ही 15 हजार से शुरू होती है। सादा चणिया-चोली की कीमत भी 2500 से 3000 हजार के बीच होती है। विदेशी टूरिस्ट अपने और परिचितों के लिए 10 से 15 नग खरीदते हैं।

मेकअप पर 55 लाख रुपए करते हैं खर्च

– कॉस्मेटिक इंडस्ट्रीज की आवक हर साल नवरात्र शुरू होने से पहले और इस दौरान में 50 से 55 लाख होती है। छोटे ब्यूटी पॉर्लर से लेकर बड़े पॉर्लर तक में प्री बुकिंग रहती है।
– ज्यादातर पॉर्लर 10 दिन के पैकेज की एडवांस बुकिंग कर लेते हैं। इसलिए इस बारिश से उन्हें ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है।

आर्टिफिशियल ज्वेलरी की बिक्री 35 करोड़ रु. तक 

– मेकअप के बाद गरबों के लिए सबसे ज्यादा डिमांड आर्टिफिशियल ज्वेलरी की होती है।

– पूरे गुजरात में करीब 35 करोड़ के आसपास इसकी बिक्री होती है। बारिश की वजह से इस बार 20 प्रतिशत तक गिरावट है।

150 करोड़ रुपए का लाइटिंग कारोबार

अहमदाबाद के बाजारों में नवरात्र-दीपावली के दिनों में बिक्री 2 से 3 गुना बढ़ जाती है। यहां पूरे साल बिजनेस रहता है।

– सामान्यत: अहमदाबाद में 200 से 300 करोड़ रुपए का कारोबार होता है। इसी एक महीने में ही पूरे साल की कमाई का 50 प्रतिशत यानी डेढ़ सौ करोड़ से अधिक का कारोबार होता है।
– एडवांस बुकिंग से यहां नुकसान कम दिखा है।

म्यूजिक और सिंगर्स पर 3.5 करोड़ खर्च

– सबसे ज्यादा डिमांड गरबा गायकों, ऑर्केस्ट्रा पार्टी वालों की होती है। इसके अलावा बड़े-बड़े साउंड सिस्टम भी महीनों पहले से बुक हो जाते हैं।
– नवरात्र के दौरान रोज की कमाई 35 से 40 लाख है। यानी 9 दिनों में गीत-संगीत पर साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा खर्च किए जाते हैं।
– हालांकि बारिश की वजह से इस बार म्यूजिक इंडस्ट्री को 10 लाख रुपए रोज का नुकसान उठाना पड़ा है।

डांडिया देखने आए 2500 एनआरआई
– नवरात्र में गुजरात आने वाले एनआरआई एवं विदेशी टूरिस्टों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ गई है। इस साल अहमदाबाद में ही 700 से अधिक एनआरआई और 250 विदेशी टूरिस्ट गरबा देखने पहुंचे हैं।
– राज्यभर में ये संख्या 2500 से ज्यादा है। इन 9 दिनों के दौरान अहमदाबाद और राज्य की तमाम बड़ी होटलों की बुकिंग 80 प्रतिशत से ज्यादा रहती है।

400 गुना बढ़ जाता है रेस्रां-होटल्स कारोबार

– होटल एवं रेस्त्रां के साथ-साथ फूड जॉइंट्स, रात्रि के खान-पान बाजारों में देर रात में भीड़ लगती है। गरबा प्रेमी समूहों के साथ चाय-नाश्ता करते हैं।
– इससे रात्रि खान-पान बाजार में बिक्री दो से तीन गुनी बढ़ जाती है। होटल भी पूरी रात खुले रहते हैं। दिन के मुकाबले रात में 300 से 400 गुना ज्यादा कारोबार होता है।
– होटलों में मिडनाइट मील की स्कीमें दी जाती हैं।

नवरात्र में हर व्यक्ति औसतन 1 से 3 हजार रुपए तक खर्च करता है

– नवरात्र में हिस्सा लेने वाला एक व्यक्ति औसतन 1,000 से 3 हजार रुपए खर्च करता है। इसमें गरबा ग्राउंड में एंट्री के लिए टिकट, पेट्रोल और नाश्ते का खर्च शामिल है।

– नवरात्र में ट्रेडिशनल ड्रेस भी किराए पर खूब मिलती है। प्रति ड्रेस के हिसाब से 500 से 3,000 तक चार्ज किया जाता है। आर्टिफिशियल ज्वेलरी भी किराए पर मिलती है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

घर से कार्यस्थल तक, नहीं होगा एचआईवी पीड़ित के साथ भेदभाव, बिल में बदलाव को मंजूरी

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने एचआईवी और एड्स बिल, 2014 में बदलावों को मंजूरी दे दी है। नया ड्राफ्ट एचआईवी/एड्स पीड़ितों के लिए सेफगार्ड्स की तरह काम करेगा। बिल अगर कानून बनता है तो शिकायत मिलने पर उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकेगी जो एड्स पीड़ितों भेदभाव करते हैं। बदलावों में ये बातें शामिल…

– बिल के नए ड्राफ्ट में भेदभाव के कई आधारों को शामिल किया गया है। इसमें एचआईवी पॉजिटिव और उनके साथ रहने वालों के साथ किए जाने वाले बुरे बर्ताव को रोकने की कोशिश की गई है।
– साथ ही उन्हें इम्प्लॉइमेंट, एजुकेशन, हेल्थ केयर सर्विसेस, प्रॉपर्टी, पब्लिक या प्राइवेट ऑफिस और इंश्योरेंस में सामान्य लोगों की तरह फैसिलिटी दिए जाने की बात कही गई।
– कैबिनेट की मीटिंग के बाद जारी बयान में कहा गया है कि नौकरी पाने, इलाज कराने या किसी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में दाखिले के लिए एचआईवी टेस्ट कराना गलत होगा।

नए ड्राफ्ट में ये भी सिफारिशें
– बिल में किए गए अमेंडमेंट्स के मुताबिक, ‘किसी भी शख्स को एचआईवी स्टेटस बताना जरूरी नहीं होगा। अगर ये जरूरी होगा तो ये कोर्ट के ऑर्डर से तय होगा।’
– प्रपोजल के मुताबिक, ‘एचआईवी से पीड़ित या प्रभावित कोई शख्स 18 साल से कम उम्र का है तो उसे किसी के साथ घर और सारी फैसिलिटी शेयर करने का हक होगा।’
– ‘किसी को भी ऐसी कोई जानकारी छापने या उसे सपोर्ट करने का अधिकार नहीं होगा जिससे एचआईवी पीड़ित या उसके साथ रह रहे लोगों की भावनाओं को ठेस लगे।’

नाबालिगों के लिए भी प्रोविजन
– ड्राफ्ट के मुताबिक, 12 से 18 साल के ऐसे बच्चे जो एड्स पीड़ित या उससे प्रभावित परिवार की तकलीफ समझते हैं, उन्हें अन्य नाबालिगों के गार्जियन बनने का हक होगा।
– ये प्रोविजन किसी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में दाखिले, बैंक अकाउंट्स खुलवाने, प्रॉपर्टी और इलाज के लिए होगा।

 

गर्ल्स कॉलेज के पास ठेला लगाता है ये शख्स, पेटीएम से लड़कियां करती हैं भुगतान  

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पटना.बिहार में पटना के मगध महिला कॉलेज के पास गोलगप्पे का हाथ ठेला पर एक बोर्ड देखकर पलभर के लिए किसी का चौंकना लाजिमी है। दरअसल, हाथ ठेला लगाने वाला एक लड़का बड़े शोरूम मालिकों की तरह कैश के साथ ही पेटीएम के जरिए भी कस्टमर्स से पेमेंट लेता है। इस लड़के का नाम सत्यम है। वह 12वीं पास है और एक साधारण किसान का बेटा है। फिलहाल सत्यम अगले साल ग्रैजुएशन में एडमिशन लेने की तैयारी कर रहा है। सत्यम ऐसा करने वाला इकलौता हाथ ठेला वाला नहीं है। यहां कई और छोटे-मोटे दुकानदार पेटीएम से कैश ले रहे हैं। जानिए क्यों पेटीएम से लेता है पेमेंट…

– स्मार्टफोन पर नई-नई तकनीक आने से छोटे-मोटे कारोबारी भी हाईटेक हो रहे हैं। सत्यम भी उन्हीं में से एक है। सत्यम के ठेले पर गोलगप्पे खाकर “पेटीएम’ के ई-वॉलेट से आप भुगतान कर सकते हैं।

– सत्यम का कहना है कि इससे खुल्ले पैसे के लिए चिकचिक नहीं होती है। साथ ही, सत्यम का कहना है कि इसके लिए कैश रखने की भी मजबूरी नहीं होती है।

– उसने बताया कि कॉलेज की छात्राएं ठेले के पास खड़े होकर गोलगप्पे खाती हैं और उसका पेमेंट ‘पेटीएम’ के माध्यम से करती हैं। वह बताता है कि लड़कियों में पेटीएम का बहुत क्रेज है।

– कम से कम 20 रुपए का पेमेंट छात्राओं को ठेले पर करना पड़ता है। सत्यम के अलावा गांधी मैदान इलाके में कुछ और ठेलेवाले भी पेटीएम से पैसे ले रहे हैं।

क्या कहती हैं कॉलेज की लड़कियां ?

– कॉलेज की एक स्टूडेंट मांडवी कहती है- थोड़ा-थोड़ा करके बहुत पैसे खर्च हो जाते हैं। खाने-पीने की चीजों का पेमेंट करने के लिए पेटीएम का उपयोग करती हूं।

– बीकॉम की एक दूसरी स्टूडेंट पूजा कहती हैं कि कई बार कम पैसे होने की स्थिति में पेटीएम का यूज करती हूं। एक अन्य स्टूडेंट ने कहा, पेटीएम से पेमेंट करते समय खुले पैसे का झंझट नहीं रहता।
क्या है ई-वॉलेट ?

– पेटीएम एक ई-वॉलेट है। यह सीधे आपके बैंक खाते से कनेक्ट होता है। इसके जरिए आप कपड़े से लेकर खाने-पीने और ट्रैवल व हजारों तरह की शॉपिंग कर सकते हैं।

– मोबाइल रिचार्ज, डीटीएच, गैस, बिजली बिल, किराना, कपड़े आदि की दुकानों पर पेटीएम से भुगतान कर सकते हैं। कैब या बस सर्विस लेते वक्त भी इसका यूज किया जा सकता है।

– कई ऑटो चालक भी अपने पैसेंजर्स को इसकी फैसिलिटी दे रहे हैं।

ऐसे काम करता है

– मोबाइल पर पेटीएम ऐप डाउनलोड करने के बाद उस पर अपना अकाउंट बनाया जाता है।

– उसके बाद जिस भी जगह आपको पेटीएम का उपयोग करना है, वहां मौजूद पेटीएम के बार कोड को अपने मोबाइल से स्कैन किया जाता है।

– उसके बाद मोबाइल पर आए ओटीपी को डाल कर पेमेंट किया जा सकता हैं। इसके लिए पहली बार आपको अपने बैंक अकाउंट की जानकारी देनी होती है।

– पेटीएम वॉलेट का उपयोग करने के लिए उसमें अपने बैंक अकाउंट से पहले ही कुछ पैसा जमा कर दिया जाता है।

 

बाजार और रोजगार के क्षेत्र में विस्तार कर रही है हिन्दी

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आज भी हिन्दी को साहित्य तक ही सीमित किया जा रहा है और युवाओं में इस भाषा में अपने भविष्य को लेकर एक संशय है जिसका समाधान दुर्भाग्यवश शिक्षण संस्थान नहीं कर रहे। अधिकतर लोगों के लिए हिन्दी पढ़ने का मतलब प्रोफेसर, अनुवादक या राजभाषा अधिकारी बनना भर ही है मगर बदलते समय के साथ अब हिन्दी में रोजगार का दायरा भी बढ़ रगहा है क्योंकि साहित्य हिन्दी का महत्वपूर्ण अंग अवश्य है मगर हिन्दी का दायरा सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं है। कविता, कहानी और कथा वाचन की दुनिया से निकल कर हिन्दी रोजगार की शक्ल में ढल रही है। सरकारी दफ्तरों के बाबुओं से लेकर निजी कंपनियों के मैनेजिंग डायरेक्टर्स तक को रोजगार और कारोबार को विस्तार देने के लिए हिन्दी की जरूरत पड़ रही है। नयी प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने और उसे आम लोगों के बीच जमाने के लिए हिन्दी अब कॉरपोरेट जगत के लिए हथियार बन चुकी है।

कल तक तकनीक के क्षेत्र में अंग्रेजी का बोलबाला था, पर अब हिन्दी भी इसमें अपनी पैठ बना रही है। कंपनियों का विज्ञापन हो या बैकिंग सेवा का विस्तार, इनका हिन्दी के बिना काम नहीं चल पा रहा। आर्थिक विकास की ओबाहवा में हिन्दी को सहभागी बनाना एक अनिवार्य कदम बन गया है। उदारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी के दौर में कारोबार के विस्तार और विकास ने हिन्दी जानने वालों के लिए रोजगार के कई नए अवसर पैदा किए हैं। इस भाषा पर पकड़ रखने वाले लोगों को आज सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों में अपने पैर मजबूती से जमाने का मौका मिल रहा है क्योंकि हिन्दी आज साहित्य की ही नहीं जनता और बाजार की भाषा भी है इसलिए हिन्दी आज की जरूरत भी है।

हिन्दी में रोजगार की दुनिया विविध और बहुरंगी है। इसमें करियर बनाने की चाह रखने वालों के लिए यह जरूरी है कि इसे जानें और क्षेत्र विशेष में पेशेवर रुख अपना कर आगे बढ़ें।

अध्यापन 

अध्यापन के क्षेत्र में नर्सरी से लेकर स्कूल और कॉलेज तक ही नहीं, कोचिंग सेंटर्स तक में हिन्दी के जानकारों के लिए ढेरों अवसर हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भी हिन्दी एक विषय के रूप में जारी है। इसे पढ़ाने के लिए ऐसे शिक्षकों की जरूरत है, जिन्होंने इस विषय के साथ टीचर ट्रेनिंग भी की हो। चाहे वह नर्सरी टीचर ट्रेनिंग हो, जूनियर बेसिक टीचर ट्रेनिंग, बीएड और एमएड। नए और पुराने, दोनों तरह के कॉलेजों में हिन्दी का अध्यापन चल रहा है। इस माध्यम से नए-नए कोर्स खुल रहे हैं। कोचिंग संस्थानों में भी विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं में हिन्दी पेपरों की तैयारी करवाने के लिए ट्य़ूटर व टीचर रखे जाते हैं।

विदेशों में हिन्दी अध्यापन

वैश्वीकरण के दौर में भारत की बहुरंगी संस्कृति को जानने की ललक ने विदेशियों में हिन्दी सीखने का क्रेज पैदा किया है। संस्कृति के अलावा जो विदेशी कंपनियां भारत में अपने बाजार और कारोबार का विस्तार चाहती हैं, वे भी अपने कर्मचारियों को हिन्दी सीखने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित कर रही हैं। इस रूप में इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, जर्मनी, रूस, चीन और कोरिया जैसे कई देशों में हिन्दी पढ़ने-पढ़ाने का काम चल पड़ा है। यहां पैठ रखने वाले भारतीयों को इसके जरिए रोजगार मिल रहा है।

बैकिंग सेवा

देश में निजी और सरकारी बैंकों ने हाल के वर्षों में अपने कारोबार में बेतहाशा बढ़ोत्तरी की है। जगह-जगह बैकिंग सेवा के विस्तार ने हिन्दी में दक्ष युवाओं को भी रोजगार प्रदान किया है। यहां संस्थान की पत्रिका का प्रकाशन हो या बैकिंग सेवा के बारे में हिन्दी भाषी जनता को जानकारी देने का, दोनों के लिए विशेष तौर पर हिन्दी अधिकारी और कर्मचारी रखे जा रहे हैं। प्रबंधकों को भी जनता से बेहतर संपर्क कायम करने के लिए हिन्दी में निपुण बनाया जा रहा है।

प्रकाशन संस्थान

देश में प्रकाशन उद्योग का धंधा विकास की नई सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। इन उद्योगों का एक बड़ा कारोबार हिन्दी पट्टी से भी जुड़ा है। पारंपरिक प्रकाशन संस्थान अपने कारोबार को नित नए आयाम दे रहे हैं। इनके अलावा हिन्दी के बाजार में अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान भी अपने पैर जमा रहे हैं, चाहे वह पेंग्विन हो या हॉपर कॉलिन्स। इस उद्योग में हिन्दी संपादक और अनुवादक की आज अच्छी-खासी जरूरत है। विदेशी भाषाओं की किताबें भी इन प्रकाशन संस्थानों से हिन्दी माध्यम में अनूदित होकर आ रही हैं।

सिविल सर्विस

राज्य स्तरीय सिविल सर्विस परीक्षा हो या केन्द्र स्तर पर, इनमें अब हिन्दी माध्यम के छात्र भी अच्छी-खासी संख्या में बुलंदी के शिखर पर पहुंच रहे हैं। 2009 में छत्तीसगढ़ की किरण कौशल ने जहां हिन्दी माध्यम से सिविल सर्विस परीक्षा में तीसरा रैंक हासिल किया, वहीं 2010 के रिजल्ट में जयप्रकाश मौर्य ने नौवां रैंक। रिजल्ट में टॉप टेन में हिन्दी वालों को पहले से ज्यादा तवज्जो मिल रही है। इस आबोहवा के कारण हिन्दी माध्यम से और हिन्दी को एक विषय के रूप में चुन कर सैकड़ों युवा राज्य और केन्द्र की सिविल सर्विस परीक्षा में आ रहे हैं। सिविल सर्विस परीक्षा में परीक्षार्थियों की उमड़ी भीड़ को देखते हुए दिल्ली, इलाहाबाद और पटना जैसी जगहों पर कई कोचिंग संस्थान भी उग आए हैं। हिन्दी में स्टडी मैटीरियल तैयार कराने से लेकर पढ़ाने तक का कारोबार करोड़ों रुपयों में पहुंच गया है।

पब्लिक रिलेशन

नगरों और महानगरों में आज पीआर कंपनियां भी अपने कारोबार स्थापित कर रही हैं। इन कंपनियों में बेहतर हिन्दी के साथ लैस युवाओं की खासी जरूरत है।

ये युवा संस्थान के कारोबार को मीडिया के माध्यम से कायम करते हैं। कई बार सीधे-सीधे लोगों के बीच भी किसी कंपनी की छवि और उसके उत्पाद को प्रचारित करते हैं। रोजगार का यह नया क्षेत्र दिनोदिन खूब बढ़ रहा है।

मैनेजमेंट

अंग्रेजी में एमबीए कराने और इससे जुड़े संस्थान चलाने के कारोबार में हिन्दी ने भी अपनी दस्तक दी है। जिस तरह अंग्रेजी चैनलों की दुनिया में हिन्दी चैनलों ने अपनी जगह बनाई, उसी तरह हिन्दी माध्यम से एमबीए भी अपनी जगह बना रहा है। बाजार में ऐसे प्रशिक्षित प्रबंधकों को पैदा करने के लिए ही महात्मा गांधी हिन्दी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ने हिन्दी माध्यम में एमबीए का कोर्स शुरू किया है। विश्वविद्यालय यह कोर्स देशभर में विभिन्न सेंटरों के माध्यम से चला रहा है।

अनुवाद

अनुवाद के क्षेत्र में हिन्दी दिन दुगनी रात चौगुनी के लिहाज से बढ़ रही है। निजी और सरकारी, दोनों तरह के संस्थानों में अनुवादकों की जरूरत पड़ रही है। इसके लिए आउटसोर्सिंग का काम भी जोरों पर है। अनुवाद ब्यूरो इन जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थापित हुए हैं। भारत सरकार ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद ब्यूरो बनाने की योजना बनाई है। कर्मचारी चयन आयोग सरकारी कार्यालयों में अनुवादकों की मांग को देखते हुए हर साल परीक्षा भी आयोजित करता है। इसमें जूनियर और वरिष्ठ, दोनों तरह के अनुवादक चयनित होते हैं। अनुवाद के साथ दुभाषिया भी रखे जा रहे हैं। विदेशी फिल्मों की हिन्दी में डबिंग हो या संसद में अंग्रेजी भाषा से हिन्दी में रूपांतरण या विदेश शिष्टमंडल की भाषा का हिन्दी में रुपांतरण, इन सभी कामों के लिए दुभाषियों की जरूरत होती है। दुभाषिए को रोजगार के अलग से अवसर भी मिल रहे हैं।

राजभाषा संस्थान

केन्द्र स्तर पर राजभाषा के रूप में हिन्दी को बढ़ावा देने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए राजभाषा संस्थान में भी हिन्दी से जुड़े लोगों को काम के अवसर मिल रहे हैं। यहां राजभाषा अधिकारी, हिन्दी सहायक व हिन्दी टाइपिस्ट जैसे पदों पर काम करने के अवसर मुहैया कराए जाते हैं।

मीडिया

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, दोनों के अभूतपूर्व विस्तार ने रोजगार के ढेरों अवसर मुहैया कराए हैं। दोनों में संपादन और लेखन का काम प्रमुख है। इस उद्योग का विस्तार भी जारी है। एफएम रेडियो, कम्युनिटी रेडियो और इंटरनेट मीडिया के नए क्षेत्र हैं, जहां आए दिन कंटेन्ट तैयार करने और स्क्रिप्ट लेखन का काम प्रमुखता से होता है। मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता पढ़ाने और उसके लिए सामग्री तैयार करने का काम भी तेजी से बढ़ा है।

विज्ञापन उद्योग

हिन्दी में आकर्षक और प्रभावी विज्ञापन तैयार करने के लिए युवाओं की मांग बढ़ी है। प्रसून जोशी जैसे कई लेखकों ने विज्ञापन की दुनिया में एक अलग पहचान कायम की है। इंटरनेट पर कंटेन्ट राइटिंग और अनुवाद के लिए भी हिन्दी के विशेषज्ञों और भाषाविदों की जरूरत बढ़ाई है।

भाषा विशेषज्ञ

विभिन्न सॉफ्टवेयर कंपनियां हिन्दी में लोकप्रियता हासिल करने के लिए भाषाविदों को अपने यहां अवसर मुहैया करा रही हैं। माइक्रोसॉफ्ट, एडोब, आईबीएम, क्वॉर्क एक्सप्रेस जैसे नाम प्रमुख हैं। गूगल और याहू जैसी कंपनियां अपने यहां स्तरीय सामग्री उपलब्ध कराने के लिए हिन्दी भाषाविदों को काम के अवसर मुहैया करा रही हैं।

स्क्रिप्ट और कंटेन्ट लेखन

टीवी सीरियल हो फिल्म की दुनिया, विज्ञापन संस्थाएं, कोचिंग सेंटर, प्रकाशन संस्थान या अन्य निजी कंपनियां, अपने यहां स्क्रिप्ट लेखन और कंटेन्ट राइटिंग के लिए हिन्दी के लेखकों को ढेरों अवसर मुहैया करा रही हैं। बॉलीवुड में इन दिनों स्क्रिप्ट लेखकों की अच्छी-खासी मांग है।

कॉल सेंटर

बाजार पर पकड़ बनाने के लिए अब कॉल सेंटरों में भी अच्छी हिन्दी जानने और बोलने वालों को काम के अवसर मुहैया कराए जा रहे हैं। रोजगार का यह क्षेत्र अभी शुरुआती दौर में है।

हिन्दी में वेबसाइट तथा ऐप डेवलपर

हालांकि इसकी माँग है मगर इस दिशा में काम बहुत कम हुआ है। अगर हिन्दी साहित्य, तकनीक अथवा रोजमर्रा की जानकारी आप डिजिटल माध्यम पर उपलब्ध करवाते हैं तो यह बड़ा बाजार है। डिजिटल माध्यमों में भी लेखकों और विषय विशेषज्ञों की माँग बढ़ती जा रही है। खासकर हर सरकारी विभाग का एक हिन्दी संस्करण अवश्य होता है जहाँ आप काम कर सकते हैं या काम दे भी सकते हैं।

 

अपराधियों के लिए खौफ का दूसरा नांम हैं हरप्रीत कौर, प्रियंका चोपड़ा को भी प्रेरित किया

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रोहतास।उग्रवादियों और अपराधियों को सबक सिखाने वाली “लेडी सिंघम” के नाम से चर्चित कैमूर की SP हरप्रीत कौर को आंतरिक सुरक्षा पदक से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान किसी IPS को तब मिलता है जब वह दो वर्ष से अधिक समय तक नक्सल क्षेत्र में रहकर शांति व्यवस्था कायम रख सकें। कड़क पुलिस ऑफिसर की है छवि..

बिहार के भभुआ में तैनात IPS अधिकारी हरप्रीत कौर को लोग कड़क पुलिस ऑफिसर के रूप में जानते हैं। शराबबंदी में अहम भूमिका निभाने के लिए राज्य सरकार उत्पाद पदक से भी नवाज चुकी हैं। SP हरप्रीत कौर अपने कामों से लगातार सुर्खियों बनी रहती हैं।

प्रियंका चोपड़ा ने किया था हरप्रीत को फॉलो
प्रकाश झा की फिल्म ‘जय गंगाजल’ में SP आभा माथुर की भूमिका निभाते समय अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के कैमूर SP हरप्रीत कौर को फॉलो किया था। प्रियंका की भूमिका हरप्रीत कौर की रियल लाइफ की तरह थी। फिल्म में जिस तरह से प्रियंका अपराध में शामिल लोगों पर कार्रवाई करती हैं, कमोबेश उसी तरह हरप्रीत का व्यवहार अपराधियों के साथ रहता है।

बचपन से IPS बनना चाहती थीं हरप्रीत

26 जून 1980 को पंजाब प्रान्त के बरनाला जिला के छोटे से गांव अलकड़ा में जन्मी आईपीएस हरप्रीत कौर के पिता जोगिन्दर सिंह शिक्षक हैं और माता जस्मिल कौर गृहिणी। हरप्रीत कौर कहती हैं कि उनके पिता उन्हें बचपन से ही बड़ी होकर पुलिस अफसर के वर्दी में देखना चाहते थे। कमोबेश उनका भी यही सपना था।

परेशानी के बाद भी डटी रहीं एसपी कौर

कैमूर में बतौर एसपी के पद पर तैनात 2009 बैच की महिला आईपीएस हरप्रीत कौर 31 जनवरी 2016 को भभुआ थाना क्षेत्र के सिगठी गांव में अहले सुबह एक छात्र की हत्या के बाद गांव में विधि-व्यवस्था बिगड़ने की सूचना पर मौके पर दल-बल के साथ पहुंची। स्थिति इतनी बेकाबू थी कि एसपी कौर ने अगर सूझबूझ से काम नहीं लिया होता तो एसपी समेत मौजूद पुलिस-प्रशासन के साथ बड़ी घटना हो सकती थी।

पुआल के ढेर में छुपा कर रखा था हथियार

करीब 6 घंटे तक चले आंदोलन के दौरान एसपी हरप्रीत कौर पीने के पानी व वॉशरूम जैसी व्यवहारिक परेशानियों को दरकिनार करते हुए गांव में ही छुपे छात्र की हत्या मामले के अपराधियों को गिरफ्तार करने से लेकर अपराधियों की निशानदेही पर हत्या के मुख्य आरोपी के घर के सामने पुआल के ढेर में छुपा कर रखे गए अवैध चार हथियारों को बारी-बारी से बाहर निकाल कर बहादुरी व सूझबूझ का परिचय दिया। उस वक्त के मौजूदा हालात यह थे कि अगर मौके से अपराधियों की गिरफ्तारी और छात्र की हत्या में प्रयोग की गई हथियार बरामद नहीं होते तो शायद आक्रोशितों का बवाल थम नहीं पाता।

महिला जवान के सामने आती हैं संसाधनों की कमी की समस्या

एसपी कौर की मानें तो एक महिला जवान के साथ व्यवहारिक परेशानियों की समस्या अमूमन हर दिन आड़े आती हैं। थानों में महिला वॉशरूम होने के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है। वे कहती हैं कि महिला पुलिस जवान आन्दोलन या फिर किसी ऑपरेशन के दौरान आने वाली व्यवहारिक परेशानियों को उस वक्त दमन कर जाना ही मुनासिब समझती हैं। कारण कि वैसे जगहों पर समुचित संसाधन नहीं होते।

कई कारनामों से चर्चित हैं हरप्रीत कौर

एसपी हरप्रीत कौर जहानाबाद में बतौर एसपी के पद पर करीब 1 साल तैनात रही। इस दौरान लेवी के साढ़े 27 लाख रुपए के साथ महिला नक्सली को गिरफ्तार करने के साथ बेगूसराय में 15 माह के कार्यकाल के दौरान मूर्ति तस्करों की गिरफ्तारी करने के अलावे कई चर्चित कारनामें कर चुकी हैं।  कैमूर में एसपी के पद पर तैनाती के दौरान कुदरा और हाटा में बिगड़े कम्युनल मामले को काबू पाने के साथ हाल के दिनों में सिगठी में छात्र की हत्या मामले को सुलझा कर बहादुरी का परिचय दिया था।

 

भारतीय सेना का हाल बयां करते हुए रो पड़ीं शिल्पा, छलके आंसू

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मुंबई।एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी इन दिनों टीवी पर रियलिटी शो ‘सुपर डांसर’ की जज के किरदार में नजर आ रही हैं। हाल ही में पाकिस्तानी आतंकियों के हमले में शहीद हुए इंडियन आर्मी के जवानों को गुवाहाटी की लड़की मासूम ने अपने परफॉरमेंस में ट्रिब्यूट दिया। मासूम बच्ची और उसके पिता के एक्ट को देखकर शिल्पा इमोशनल हो गईं और उनकी आंखों में आंसू छलक उठे। जवानों को इतनी भी लग्जरी नहीं है कि वो छुट्टी ले पाएं…

दरअसल, एक्ट में एक पिता अपनी बेटी के साथ डांस करते हुए नजर आते हैं। लेकिन तभी सीमा पर युद्ध की घोषणा हो जाती है। इस पर बेटी कहती है, डैडी प्लीज 5 मिनट और रुक जाओ ना। बस फिर क्या, परफॉरमेंस खत्म होने के बाद फीडबैक देते वक्त शिल्पा इमोशनल हो गईं। शिल्पा ने कहा- आज मैं काम पे जा रही थी, तो मेरे बेटे ने बोला कि आज काम पे मत जाओ। जो हमारी सरहद पे लड़ रहे हैं उनके पास ये लग्जरी भी नहीं है कि वो छुट्टी ले पाएं। यह कहते-कहते शिल्पा का गला भर आया और उनकी आंखों से आंसू टपकने लगे। शिल्पा को देखकर वहां मौजूद सभी लोग इमोशनल हो गए।

वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिल्पा किसी एक्ट को देखकर इतनी इमोशनल हुई हैं। इससे पहले 9 साल के फिजिकली चैलेंज्ड (दिव्यांग) बच्चे देव वार्ष्णेय की परफॉरमेंस और उसकी सरवाइवल स्टोरी सुनकर भी शिल्पा इमोशनल हो गई थीं। बता दें कि शिल्पा के साथ इस शो को डायरेक्टर अनुराग बासु और कोरियोग्राफर गीता कपूर भी जज कर रही हैं।

 

अपनों की बेरुख़ी के शिकार बुजर्गों का सहारा बनी, 100 साल की अरुणा

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बुढ़ापे में जिन बुज़ुर्गों को अपनों ने ही बाहर का रास्ता दिखा दिया, उन लोगों की ज़िन्दगी की तन्हाइयों को बाँटने और उन्हें आसरा देने के लिए असम की एक 100 वर्षीय वृद्धा अरुणा मुख़र्जी उनकी हमदर्द और मसीहा बनी हैं।

असम की 100 वर्षीय अरुणा मुख़र्जी ने गुवाहाटी नागरिक प्रशाशन से एक वृद्धाश्रम खोलने की अनुमति माँगी है। इस वृद्धाश्रम का संचालन वो खुद ही करेंगी।

अरुणा ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया, “ मेयर ने मुझसे पूछा कि इस वृद्धाश्रम का संचालन कौन करेगा, मैंने ज़वाब दिया- ‘मैं’। ये सुनकर उनके चेहरे के भाव देखने लायक थे।“ मेयर मृगेन सरनिया और उनके सहकर्मी अरुणा के इस कदम से इतने प्रभावित है कि वे इस वृद्धाश्रम को खोलने की साड़ी कार्यवाही जल्द से जल्द पूरा करने की कोशिश में जुट गए है ताकि अरुणा इसे अक्टूबर महीने से ही शुरू कर सके।

मृगेन कहते है, “100 साल की उम्र में भी अरुणा में इतना उत्साह है कि वो उम्र के इस पड़ाव में जो कर रही हैं वो लोग अपनी युवावस्था में भी नहीं कर पाते, यह प्रशंशनीय है। “

अरुणा अपनी क्षेत्र की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता है। वे चार वोकेशनल इंस्टिटुएस चलाती हैं जहाँ कि निःशुल्क पेंटिंग बनाने का, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, ज़रदोज़ी और सॉफ़्ट टॉयज बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। 100 साल की आयु पार करने के बावज़ूद उनकी दिनचर्या बहुत ही सक्रिय और उत्साह से भरी होती है और उनका स्वस्थ्य भी बहुत अच्छा है। बस ढ़लती उम्र की वजह से उनकी नज़र ज़रा कमज़ोर और सुनने की शक्ति थोड़ी कम हो गयी है। इसके बावजूद वो अपना सारा काम खुद करतीं हैं।

अरुणा के बारे में सबसे दिलचस्प बात ये है कि वो पिछले 70 सालों से सिर्फ़ चाय और बिस्कुट खा कर ही जीवित हैं। उन्हें संतरे भी बहुत पसंद हैं और वो संतरों के मौसम में संतरे भी खाती हैं। उन्होंने 1947 में बांग्लादेश ( पूर्वी पाकिस्तान ) के शरणार्थियों को देख कर ये खानपान अपनाया। अरुणा का जन्म ढाका में हुआ था पर 80 साल पहले जादुलाल मुख़र्जी से विवाह होने पर वो उन्हीं के साथ आ कर असम में बस गयीं, उनके पति गुवाहाटी कॉटन कॉलेज में रासायन विभाग में थे।

अरुणा ने द न्यू ई इंडियन एक्सप्रेस से साक्षात्कार में बताया, “मैंने बांग्लादेश से भागे सैकड़ों भूखे शरणार्थियों को गुवाहाटी रेल्वे स्टेशन पर शरण लिए हुए देखा। मैंने छोटे-छोटे बच्चों को भूख से बिलखते देखा, तो उनके लिए खाना बना कर उन्हें खाने के लिये दिया। धन जुटाने के लिए मैंने कागज़ की थैलियाँ बना कर बेचे ताकि मैं उन पैसों से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को खाना खिला सकूँ…..कुछ समय बाद वो लोग कहीं और चले गये पर मैं ये कभी नहीं भूल पायी कि भूखे रहने का एहसास कैसा होता है। इसलिए मैं आज तक बिस्कुट और चाय के अलावा कुछ नहीं लेती।“

अरुणा अपने बच्चों से अलग स्वतंत्र रूप से रहती हैं। उनका एक बेटा और बेटी कनाडा में रहते हैं और तीन बेटे गुज़र चुके हैं।अरुणा की ज़िन्दगी पर फ़िल्म बना रही, डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर बबिता शर्मा ने कहा, “100 साल की उम्र में भी उनका ये जज़्बा कायम है। वो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जाती हैं और बाढ़ पीड़ितों की मदद करती हैं।“

(साभार – द बेटर इंडिया)