Friday, March 27, 2026
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श्रीराम की बहन को जानते हैं क्या? इस मंदिर में होती है पूजा

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श्रीराम के माता-पिता, भाइयों के बारे में तो प्रायः सभी जानते हैं लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि राम की एक बहन भी थीं जिनका नाम शांता था। वे आयु में चारों भाइयों से काफी बड़ी थीं। उनकी माता कौशल्या थीं। उनका विवाह कालांतर में शृंग ऋषि से हुआ था। आज हम आपको शृंग ऋषि और देवी शांता की सम्पूर्ण कहानी बताएँगे।

राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री थी शांता

ऐसी मान्यता है कि एक बार अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी रानी वर्षिणी अयोध्या आए। उनके कोई संतान नहीं थी। बातचीत के दौरान राजा दशरथ को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने कहा, मैं मेरी बेटी शांता आपको संतान के रूप में दूंगा।

रोमपद और वर्षिणी बहुत खुश हुए। उन्हें शांता के रूप में संतान मिल गई। उन्होंने बहुत स्नेह से उसका पालन-पोषण किया और माता-पिता के सभी कर्तव्य निभाए।

एक दिन राजा रोमपद अपनी पुत्री से बातें कर रहे थे। तब द्वार पर एक ब्राह्मण आया और उसने राजा से प्रार्थना की कि वर्षा के दिनों में वे खेतों की जुताई में शासन की ओर से मदद प्रदान करें। राजा को यह सुनाई नहीं दिया और वे पुत्री के साथ बातचीत करते रहे।

द्वार पर आए नागरिक की याचना न सुनने से ब्राह्मण को दुख हुआ और वे राजा रोमपद का राज्य छोड़कर चले गए। वे इंद्र के भक्त थे। अपने भक्त की ऐसी अनदेखी पर इंद्र देव राजा रोमपद पर क्रुद्ध हुए और उन्होंने पर्याप्त वर्षा नहीं की। अंग देश में नाम मात्र की वर्षा हुई। इससे खेतों में खड़ी फसल मुर्झाने लगी।

इस संकट की घड़ी में राजा रोमपद शृंग ऋषि के पास गए और उनसे उपाय पूछा। ऋषि ने बताया कि वे इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करें। ऋषि ने यज्ञ किया और खेत-खलिहान पानी से भर गए। इसके बाद शृंग ऋषि का विवाह शांता से हो गया और वे सुखपूर्वक रहने लगे।

कश्यप ऋषि के पौत्र थे शृंग ऋषि

पौराणिक कथाओं के अनुसार ऋष्यशृंग विभण्डक तथा अप्सरा उर्वशी के पुत्र थे। विभण्डक ने इतना कठोर तप किया कि देवतागण भयभीत हो गये और उनके तप को भंग करने के लिए उर्वशि को भेजा। उर्वशी ने उन्हें मोहित कर उनके साथ संसर्ग किया जिसके फलस्वरूप ऋष्यशृंग की उत्पत्ति हुयी। ऋष्यशृंग के माथे पर एक सींग (शृंग) था अतः उनका यह नाम पड़ा।

बाद में ऋष्यशृंग ने ही दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया था। जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाये थे वह अयोध्या से लगभग 39 कि.मी. पूर्व में था और वहाँ आज भी उनका आश्रम है और उनकी तथा उनकी पत्नी की समाधियाँ हैं।

हिमाचल प्रदेश में है शृंग ऋषि और देवी शांता का मंदिर

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में शृंग ऋषि का मंदिर भी है। कुल्लू शहर से इसकी दूरी करीब 60 किमी है। इस मंदिर में शृंग ऋषि के साथ देवी शांता की प्रतिमा विराजमान है। यहां दोनों की पूजा होती है और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

ममा को बनाइए अपनी बेस्ट फ्रेंड

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दुनिया की भीड़ में ना जाने हमें कितने ही दोस्त मिले होंगे पर एक ऐसा भी है जो बचपन से जवानी तक हमारे साथ हमारे घर में है। सही पहचाना आपने हम मां की बात कर रहे है। आज अगर आपको लगता है कि आपकी मां पुराने फैैशन की है तो एक बार उनसे शेयर करके देखिए अपनी कुछ बातें। यकीन के साथ कह सकते है उनसे अच्छा दोस्त आपको कहीं और नहीं मिलेगा –

आपका पहला प्यार – आप किससे प्यार करते है। उन्हें इस बारें में सब बताएं। अगर आप ये सोच रहे है कि उन्हें कुछ नहीं पता तो देखिए हम आपको बता दें। मां सब जानती है।

बताइए अपनी परेशानी  – कई बार हम खुद ही ये मान के बैठ जाते है कि मां हमारी दिक्कतें नहीं समझेंगी पर एक बार जरा अपनी परेशानी शेयर करके तो देखिए कैसे फिर नए-नए आइडिया मिलते है प्रॉब्लम से निकलने के लिए।

फ्रेंड सर्कल के बारे में – आपका फ्रेंड सर्कल कैसा है, वो लोग क्या करते है। इन सबके बारे में उन्हें बताएं। क्या पता जब आपकी मॉम आपके फ्रेंड सर्कल से मिले तो आसानी ले घुल-मिल जाए।

कहां जाते हैं हैंगआउट करने – दोस्तों के साथ आप कहां घूमने जाते हैं। इसके बारे में भी उन्हें पता होना चाहिए, साथ ही कितने लोगों को साथ घूमने जाते हो और वहां कैसे मस्ती करते हो, इन सभी के बारें उन्हें बताएं।

घर से बाहर पहनने हो आधुनिक कपड़े – अगर आपको इस बात का डर सताता है कि ‘यार मां को अगर पता चल गया कि घर के परम्परागत और रूढ़िवादी माहौल में आप जींस और क्रेपी जैसे पश्चिमी कहे जाने कपड़े पहनती हैं तो वो क्या सोचेगी’. तो हम आपको बता दें आज के मॉर्डन यूथ को देखते हुए उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ेगा। अगर ऐसा कुछ है तो आप एक बार बताकर देखिए क्या पता आपके साथ एक- दो वनपीस वो भी अपने लिए खरीद लें।

ब्रेकअप के बारे में बताना सबसे जरूरी – इससे पहले आप डिप्रेशन में चले जाओ, उससे पहले अपनी दोस्त जैसी मां को अपने ब्रेकअप के बारें में सब कुछ बता दो। वह आपका साथ देंगी।

करें चिट-चेट – जो बातें और मस्ती आप अपनी सहेलियों के साथ करती हैं, मम्मी के साथ करिए। गर्लफ्रेंड से पैचअप करना हो या उसके लिए तोहफे खरीदने हैं, ये आप अपनी मां के साथ कर सकते है और हंस सकते है।

मां नहीं सच्ची दोस्त है आपकी – इतने बिजी शेड्यूल में आपके किसी भी दोस्त के पास इतना समय नहीं है जो आपकी हर बात सुनें, लेकिन एक मां ही जो आपकी हर बात सुनने के लिए तैयार रहती है। फेसबुक पर नहीं बल्कि मां खोज निकालें एक सच्चा दोस्त।

 

तीन तलाक विवाह विच्छेद का सबसे खराब तरीका है: सुप्रीम कोर्ट

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने आज कहा कि मुस्लिम समाज में विवाह विच्छेद के लिये तीन तलाक देने की प्रथा ‘सबसे खराब’ है और यह ‘वांछनीय नहीं’ है, हालांकि ऐसी सोच वाले संगठन भी हैं जो इसे ‘वैध’ बताते हैं।

प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आज लगातार दूसरे दिन इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा, ‘‘ऐसे भी संगठन हैं जो कहते हैं कि तीन तलाक वैध है, परंतु मुस्लिम समुदाय में विवाह विच्छेद के लिये यह सबसे खराब तरीका है और यह वांछनीय नहीं है।
संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह ऐसा मसला नहीं है जिसकी न्यायिक जांच की जरूरत हो और वैसे भी महिलाओं को निकाहनामा में ही इस बारे में शर्त लिखवाकर तीन तलाक को ‘नहीं’ कहने का अधिकार है। सलमान खुर्शीद व्यक्तिगत हैसियत से इस मामले में न्यायालय की मदद कर रहे हैं।
न्यायालय ने खुर्शीद से कहा कि वह उन इस्लामिक ओैर गैर इस्लामिक देशों की सूची तैयार करें जिनमें तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाया गया है। पीठ को तब सूचित किया गया कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मोरक्को और सउदी अरब जैसे देश विवाह विच्छेह के लिये तीन तलाक की अनुमति नहीं देते हैं।
एक पीड़ित की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने अपनी बहस में अधिक बेबाकी दिखाई और समता के अधिकार सहित संविधान के विभिन्न आधारों पर तीन तलाक की परंपरा की आलोचना की।
जेठमलानी ने कहा, ‘‘तीन तलाक का अधिकार सिर्फ शौहर को ही उपलब्ध है और बीवी को नहीं और यह संविधान के अनुच्छेद 14 :समता का अधिकार: का हनन है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘तलाक देने के इस तरीके में किसी तरह का बचाव नहीं है। एक तरफा विवाह विच्छेद घिनौना है और इसलिए इससे बचा जा सकता है।
जेठमलानी ने कहा, ‘‘तीन तलाक लैंगिक आधार पर भेदभाव करता है और यह तरीका पवित्र कुरान के सिद्धांतों के भी खिलाफ है और इसके पक्ष में कितनी भी वकालत इस पापी और असंगत परपंरा को, जो संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है, बचा नहीं सकती है।’’ उन्होंने कहा कि कोई भी कानून एक पत्नी को पति की मर्जी पर पूर्व पत्नी बनने की इजाजत नहीं दे सकता और यह घोर असंवैधानिक आचरण है।

 

एक मात्र मंद‌िर जहां मुस्ल‌िम की ल‌िखी आरती से पूजा करते हैं ब्राह्मण

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ह‌िंदू धर्म में सद‌ियों से यह परम्परा चली आ रही है क‌ि मंद‌िर में पूजा स‌िर्फ ब्राह्मण ही करेंगे। वहीं पूजा के ल‌िए ज‌ितने भी ग्रंथ ल‌िखे गए हैं वे भी ब्राह्मणों ने ही ल‌िखे हैं। लेक‌िन एक मंद‌िर ऐसा भी है जहां पूजा स‌िर्फ मुस्ल‌िम के द्वारा ल‌िखी आरती से ही की जाती है।

चल‌िए हम आपको बताते हैं इस सांप्रदायिक सौहार्द की कहानी। भगवान बद्रीनाथ धाम को हिंदुओं का तीर्थ माना जाता है और यहां उनकी पूजा स‌िर्फ ब्राह्मण ही कर सकते हैं। लेकिन क्या आपको पता है क‌ि बद्रीव‌िशाल की आरती क‌िसने ल‌िखी है।

151 सालों से कपाट खुलने से बंद होने तक मंदिर में नित्य सुबह-शाम जो आरती गाई जाती है, उसे एक मुस्लिम शायर ने लिखा है और वह शायर है चमोली जिले के नंदप्रयाग निवासी फकरुद्दीन (बदरुद्दीन)।

बदरुद्दीन ने यह आरती वर्ष 1865 में लिखी थी । जब से ये आरती ल‌िखी गई है तब से भगवान बद्री विशाल की पूजा परंपराओं की शुरुआत इसी आरती के साथ होती है।

जब ये आरती फकररुद्दीन ने ल‌िखी थी तब उनकी उम्र महज 18 साल थी। इस आरती में बदरीनाथ धाम के धार्मिक महत्व के अलावा यहां की सुंदरता का भी वर्णन किया गया है।

बता दें क‌ि फकरुद्दीन तब नंदप्रयाग में पोस्टमास्टर हुआ करते थे और इस आरती को लिखने के बाद उन्होंने अपना नाम बदरीनाथ के नाम पर बदरुद्दीन रख लिया था।

104 वर्ष की उम्र में वर्ष 1951 में बदरुद्दीन का निधन हुआ। बदरुद्दीन के पोते अयाजुद्दीन सिद्दिकी के मुताब‌िक बद्रीनाथ धाम में मंदिर परिसर की दीवारों पर पहले पूरी की पूरी आरती लिखी गई थी। जिस व्यक्ति को यह आरती कंठस्थ नहीं होती, वह मंदिर की दीवारों पर देखकर आरती गाता था।

 

यहाँ लोग उठाते हैं कुंवारेपन का सबसे ज्यादा लुत्फ, सबसे पीछे भारत

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युवा कितनी उम्र में शादी करना ठीक मानते हैं, वर्ल्ड बैंक ने एक हाल ही में इसके आंकड़े पेश किये हैं। ये जानकर आप हैरान रह जाएंगे कि भारत के युवा सबसे कम उम्र में शादी के बंधन में बंध जाते हैं जबकि जर्मनी के युवा अपनी लाइफ को सिंगल रहकर ही एंजॉय करना पसंद करते हैं और सबसे ज्यादा उम्र में शादी करते हैं।

बता दें रिसर्च में सामने आया है कि जर्मनी के युवा 34.2 की उम्र में शादी करते हैं वहीं यहां कि महिलाए 32 की उम्र को शादी के लिए ठीक मानती हैं। भारत में ये उम्र युवाओं में 24.9 और महिलाओ में 20.7 दर्ज की गई है।

रिसर्च में ये भी साफ कर दिया गया है दुनिया भर में भारत के लोग सबसे कम उम्र में शादी करते हैं। फ्रांस में 33.6 की उम्र में युवा और 32 की उम्र में लड़कियां शादी करना पसंद करती हैं। इटली में ये आकड़ा 34.6 और 31.3 का दर्ज किया गया है।

साउथ अफ्रीका में सामने आया है कि 33 साल में पुरुष और 30.6 साल की उम्र में महिलाएं, ब्राजील में 31.9 साल में लड़के और 29.7 में लड़किया, जापान में 31.2 में लड़के और 29.7 में लड़कियां शादी करना पसंद करते हैं। वहीं इस लिस्ट में स्पेन, यूके, चाइना और रूस के बाद भारत आखिरी नंबर पर रहा।

 

पीएचडी की और खेत में काम कर रखते हैं 40 लाख की ऑडी

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पढ़ाई पूरी करने के बाद अच्छा कैरियर बनाने का सपना किस नौजवान का नहीं होता। जिस काम को लेकर आज के युवा कतराते हैं उसे इस नौजवान ने चुना है। जिसके दम पर वो 40 लाख की ऑडी में घूमता है।

यमुनानगर के निकटपुर गांव के निर्मल सिंह ट्रिपल एमए, एमएड, एमफिल और पीएचडी होते हुए भी खेती कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की नौकरी का ऑफर छोड़कर वे किसान बने। खेती को घाटे का सौदा बताने वालों की धारणा के उलट उन्होंने खेती से अच्छी कमाई की और अब वे 40 लाख की ऑडी में घूमते हैं।

निर्मल सिंह के पास 40 एकड़ जमीन है। 60 एकड़ ठेके पर लेकर वे पूरे 100 एकड़ में हर साल सिर्फ बासमती चावल की ही पैदावार लेते हैं। 1997 से अब तक धान की फसल निर्मल सिंह ने कभी मंडी में नहीं बेची।

निर्मल सिंह के पास 40 एकड़ जमीन है। 60 एकड़ ठेके पर लेकर वे पूरे 100 एकड़ में हर साल सिर्फ बासमती चावल की ही पैदावार लेते हैं। 1997 से अब तक धान की फसल निर्मल सिंह ने कभी मंडी में नहीं बेची।
छोटी-सी उम्र में पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण निर्मल सिंह ने हिम्मत नहीं हारी। परिवार का बोझ कंधों पर आते ही नौकरी की बजाए खेती को तरजीह दी। वे कहते हैं कि अगर सही ढंग से खेती की जाए तो इससे बढ़िया कोई कारोबार नहीं है। वे ही किसान कर्ज की वजह से आत्महत्या करते हैं जो कर्ज का सही इस्तेमाल नहीं करते।

निर्मल सिंह खेती के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। धान की रोपाई से पहले ट्रैक्टर से खेत को समतल नहीं करते, इससे खर्च की बचत होती है। रोपाई से पहले खेत में पानी छोड़ दिया जाता है। लेकिन ट्रैक्टर कभी नहीं चलाया। निर्मल सिंह बताते हैं कि इस तकनीक से जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। पानी की खपत भी आधी रह जाती है।

 

 

 

केवल माँ ही ले पाती है बचपन को जीने का आनन्द दोबारा 

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रश्मिका

दुनिया के 99 प्रतिशत लोगों की यही इच्छा होती है कि काश! बचपन लौट आये। बचपन की तरह भोलापन, सरलपन और चिंता से मुक्त जीवन हमें दुबारा मिलें। पर सभी यह जानते भी हैं कि यह हमें दुबारा नहीं मिलता है।  मेरा मानना है कि केवल माँ को ही बचपन फिर से जीने को मिल जाता है। अर्थात् जब एक लड़की माँ बनती है, तो उसके ऊपर जिम्मेदारियाँ तो बहुत बढ़ जाती है, पर उन जिम्मेदारियों के साथ उसे एक तोहफा मिलता है। वह है अपने बच्चों के साथ फिर से बचपन को जी लेने का। अपने बचपन की धुंधली यादों को ताजा कर लेने का। कई इच्छाएँ ऐसी होती है कि हम अपने बचपन में नहीं कर पाते हैं। उन इच्छाओं को भी पूरा करने का मौका मिलता है केवल एक माँ को ही। माँ शब्द जितना मीठा है उतना ही गहरा है। केवल एक अक्षर से बने माँ शब्द में जैसे पूरी दुनिया समायी हुई है। एक बच्चे के लिए भी और एक माँ के लिए भी। सबसे बड़ी बात है कि बच्चे जैसे जैसे बड़े होते जाते हैं, यह शब्द उतना ही अच्छा लगने लगता है। एक माँ के लिए वह दिन सबसे ज्यादा खास होता है जब उसका बच्चा उसे पहली बार माँ पुकारता है। और यह शब्द जैसे उसे दिन भर सुनाई देता रहता है। उसके बाद से जैसे रोज-रोज इस शब्द में मिश्री घुल जाती है। बच्चे जब स्कूल से आते हैं, और माँ पुकारते हैं तो दिनभर की थकान पलभर में खत्म हो जाती है। माँ जब ऑफिस से घर पहुँचती है, तो अपने बच्चे को गले से लगाती है और माँ शब्द सुनती है तो उसके अंदर रक्त संचार तेजी से होने लगता है। एक माँ ही है, जो अपने बच्चों की तुतली-तुतली आवाजों को भी आसानी से समझ पाती है। उसके साथ नये-नये गेम खेलती है। उसको पढ़ाते हुए नयी-नयी चीजों के बारे में जानती है। उसकी मीठी और प्यारी सी बातों में ही न जाने कितना कुछ सीख जाती है। और अगर बच्चों में बेटियाँ हुई तो समझिये कि माँ को नया बचपन और भी निखार के साथ मिलता है। माँ और बेटी का रिश्ता बहुत प्यारा होता है। आज के समय के बारे में उसकी राय, उसकी बातें, कक्षाएँ में हो रही पढ़ाई, शिकायतें सब कुछ माँ को ही जानने को मिलता है।  स्मार्ट मोबाइल में गेम, टीवी में प्रसारित होने वाले कार्टूनों, गानों को सुनने का मौका फिर से मिल जाता है। जैसे -जैसे बच्चे बड़े होते हैं, माँ फिर से बच्चों के साथ बड़ी होती है। फिर वह स्कूल से कॉलेज तक का सफर तय करती है। अर्थात् मिल गया ना माँ को फिर से बचपन। प्यारा सा बचपन।  सबसे बड़ी बात है कि माँ पहले बेटी होती है, और उसे अपनी माँ से इतना प्यार, दुलार, ममता मिली हुई होती है कि वह सब कुछ अपने बच्चों  को देने में खुशी महसूस करती है।

आज 14 मई (मई महीने के दूसरे रविवार) को भारत में माँ दिवस मनाने की तैयारी चल रही है। एक तरफ गर्मी चरम पर है, बच्चों की गर्मी की छुट्टी हो चुकी है। ऐसे में बच्चे पूरी तरह से इस दिन को मनाने के लिए उत्साह से भरे पड़े हैं। नये-नये तरीके से माँ को खुश और सरप्राइज करने की तैयारी कर रहे हैं बच्चे।  ग्रीटिंग्स कार्ड, माँ के मनपसंद खाने और उन्हें तोहफा देने के लिए हर उम्र के बच्चे जुटे हुए हैं। नन्हें-नन्हें बच्चों से लेकर कॉलेज तक के बच्चे अपनी माँ को  खुश करने के लिए, उन्हें सम्मान देने के लिए तैयारी करने में जुटे हुए हैं।

आजकल मदर्स डे (माँ दिवस) मनाने की प्रथा शहरों  और गांवों तक पहुँच चुका है। हर बच्चे अपनी माँ के लिए कुछ करना चाहते हैं। गिफ्ट देकर प्यार जताने की प्रथा जोरों पर है। आजकल सोशल साइट्स पर भी इसका जादू चल रहा है। इस दिन माँ भी बहुत खुश होती हैं, पर एक माँ के लिए माँ बनने से लेकर अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक ही माँ दिवस होता है और वह हर पल अपने बच्चों के बारे में सोचती रहती है और उनकी कामयाबी की प्रार्थना करती रहती है।  माँ  और बच्चे का रिश्ता दिल से जुड़ा होता है। एक दिन के माध्यम से इस दिन को कुछ अलग तरह से मनाने की प्रथा है, पर हमारे यहाँ तो हर बच्चे के लिए, माँ के लिए हर दिन ही माँ दिवस होता है।

 

 

माँ !

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  • रेखा श्रीवास्तव

जब आती है जीवन में कोई खुशी या गम

मन करता है अपने मन की सारी बातें

करूँ तुमसे माँ

जब कोई अपनी माँ को माँ पुकारता है तो

मेरा भी मन करता है कि मैं भी पुकारूँ माँ

और पल भर में माँ मुझे सीने से लगा ले

जैसे लगा लिया करती थी वर्षों पहले

जब किसी की माँ करती है अपनी बेटी का इंतजार

तो मेरा भी मन करता है मेरी माँ भी करे मेरा इंतजार

और मैं जल्दी से उनसे मिलने जाऊँ

मुझे याद है आफिस जाने के लिए निकलती थी जब मैं

बस स्टैंड तक पहुँचाने आती थी तुम

बार-बार मना करने पर भी

मुझे बस पर चढ़ा कर टाटा-बायँ-बायँ करती रहती थी तुम

मेरी बस अगर आगे रुक जाती थी, तो माँ तुम भी रुक जाती थी

और हाथ हिलाती रहती थी माँ

और शाम को सबसे ज्यादा तुम ही करती थी मेरा इंतजार

कभी-कभी तो गली तक भी पहुँच जाती थी तुम माँ

मैं मना करती थी, कभी-कभी गुस्सा भी करती थी

क्यों परेशान होती हो माँ

पर आज मन करता है कि माँ तुम मुझे पहुँचाने आओ

और मेरा इंतजार भी करो माँ

जब कुछ पल मिलते हैं फुर्सत के

तो मोबाइल उठाकर मन करता है

कुछ बातें कर लूँ अपनी माँ से

फिर याद आता है माँ नहीं है अब हमारे पास

नहीं है उनका प्यार, नहीं है उनका दुलार

मेरा संसार सूना-सूना है माँ तुम्हारे बिना

मेरा आंगन सूना-सूना है माँ तुम्हारे बिना

 

समाज को बदलना है तो बड़ों को सोच बदलकर नयी पीढ़ी को समझना होगा

अपराजिता फीचर डेस्क

इस देश में संस्कृति, परिवार, परम्परा, इज्जत और समाज पर बहुत जोर दिया जाता है। माता – पिता, भाई, बहन…ये सब राजश्री फिल्म्स की फिल्मों में अच्छे लगते हैं मगर भारत में परिवार बच्चों की परवरिश नहीं करता बल्कि उसे नियंत्रित करता है। इसका सीधा सम्बन्ध हमारे देश के विकास से इसलिए है क्योंकि दमन के शिकार युवा कभी मानसिक तौर पर स्वस्थ समाज नहीं खड़ा कर सकते। आपकी मुश्किल यह है कि आपके बच्चों की जिन्दगी के निजी फैसले भी आपकी नाक का सवाल बन जाते हैं। अगर बच्चे दहेज न लेना चाहें तो आप बेटी की शादी का हवाला देते हैं, बेटी अगर विरोध करे तो समाज और नाक का हवाला देकर उसे चुप करवा देते हैं।

प्रेम करे तो बाकायदा इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं, पढ़ाई छुड़वाते हैं, घर में कैद करते हैं और अनचाही शादी के बंधन में बाँधते हैं और इस पर भी बात न बने तो उसे मार डालते हैं। बहू को मिलने वाला प्यार उसके मायके से आने वाले दहेज की मात्रा पर निर्भर करता है, बेटी को दी जाने वाली आजादी और प्रोत्साहन उसकी ससुराल की मर्जी पर निर्भर करता है और आप कहते हैं कि आप जो भी करते हैं, अपने बच्चों के लिए करते हैं, मान लीजिए, यह सबसे बड़ा झूठ है। अपनी जिद और अकड़ नहीं छोड़ने वाले आप अपने बच्चों से उम्मीद करते हैं कि वह उनके लिए अपना सब कुछ छोड़ दे तो यह कुछ और नहीं बल्कि उस परवरिश की कीमत है क्योंकि आपने बच्चों के व्यक्तित्व को स्वीकार नहीं किया, वे आपके लिए निवेश थे। जानकर रख लीजिए, ऐसे में बच्चे आपका लिहाज करें भी तो आप उनकी नजर में अपना सम्मान खो चुके होते हैं। आपकी जिम्मेदारी समझाने तक है, जबरदस्ती करने का अधिकार नहीं है मगर बच्चों को आपका किया हुआ याद रहता है, इसलिए वे झुकते हैं और आप इसे अपनी जीत समझते हैं, दरअसल यह आपकी हार है।

ऐसे बहुत से युवाओं को जानती हूँ, जिनकी जिन्दगी उनके अभिभावकों की एक हाँ बदल सकती थी और वे बहुत सृजनात्मक हो सकते थे मगर वे नहीं है। हमारे भविष्य का एक बड़ा हिस्सा अगर घुटन में जी रहा हो तो देश का विकास कैसे होगा, ये सोचने वाली बात है। ऐसे युवाओं को दुनिया में हो रही किसी अच्छी बात पर विश्वास नहीं होता, उनको लगता ही नहीं कि उनकी दुनिया में कुछ सकारात्मक हो सकता है। वे जिन्दगी को जीते नहीं, ढोते हैं और आपको लगता है कि आपका घर खुशहाल है, खुशफहमी है ये और कुछ नहीं। एक आपकी जिद के कारण वह धोखा देता है, जिन्दगी से भागता है, कई बार नशे में चूर होता है, टूटता है और हिंसा करता है, अभिभावकों, यह सब आपका तोहफा है इन युवाओं को, जो कुछ करना चाहते थे मगर अब टूटे खिलौनों की तरह हैं।

 

प्रेम की बातें कहीं जाती हैं किताबों में, कविताओं में और हमारी परम्परा में भी ढेरों प्रेम कहानियाँ हैं मगर जब उनको जीवन में उतारने की बारी आती है तो उपरोक्त सारे फलसफे दीवार बनकर संवेदनाओं को चूर कर जाते हैं और इनमें सबसे बड़ी भूमिका उसी परिवार और अभिभावकों की होती है जो समाज, रिश्तेदारों और अपनी या अपने घर की इज्जत का हवाला देकर अपने बच्चों के सपनों की बलि दे देते हैं। उस पर भी उम्मीद ये की जाती है कि वह युवा जिन्दगी से प्रेम करे, उनका सम्मान करे, उनसे प्रेम करे और उनकी नाक को ऊँचा करता रहे। इस देश में युवाओं की जिम्मेदारी की बातें बहुत की जाती हैं मगर उनके अधिकार अक्सर दबा दिए जाते हैं, विद्रोह करें तो गोली मार दी जाती है या सूली पर लटका दिया जाता है।

मजे की बात यह है कि प्रेम को दबाने और कुचलने वाले ही प्रेम गीत और रोमांटिक फिल्में भी देखते हैं। खलनायक को गालियाँ देते हैं मगर अपनी जिन्दगी में कभी कुछ भी नहीं सीखते। इस दोहरे संस्कारों और दोहरे मापदंडों वाले समाज का भविष्य भी कुंठा भरा ही होगा और आपको उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि आपका बच्चा आपसे प्यार करेगा या आपका सम्मान करेगा। ऐसे वातावरण में, ऐसे परिवार में सिर्फ घुटन होती है और आप अपनी घृणा का जहर आने वाली पीढ़ी को यह समझकर दे रहे हैं कि वह इसे अमृत समझे, वह नहीं समझेगी, उसे समझना भी नहीं चाहिए। आप तय कीजिए कि आपने बच्चों को बड़ा किया है या एटीएम मशीन खरीदी है। ये कैसा स्टेटस और अहंकार है जो जिन्दगी पर भी भारी पड़ता है। आप किसी को घुटते देख सकते हैं मगर अपने अहंकार से समझौता नहीं कर सकते बल्कि साजिश रचकर उसे झुकाने की कोशिश करते हैं, अगर ये परिवार और, ममता और प्यार है तो इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता।

कई अभिभावक तो यह भी तय करते हैं कि उनकी बहू, बेटी या बेटे को उनके दोस्तों, कार्यालय के सहकर्मियों और ससुराल से कैसे पेश आना चाहिए और यहाँ तक कि उनके कितने बच्चे और कब होने चाहिए….यह बात कड़वी है मगर एक समय के बाद आपके बच्चों की जिन्दगी में आपका दखल खत्म होना जरूरी है वरना वे कभी आगे नहीं बढ़ेंगे। आप अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीए या अभिभावकों के दबाव में, वह आपका फैसला था मगर आप अपने बच्चों की जिन्दगी का रिमोट अपने हाथ में रखना चाहते हैं, तो यह आपकी जबरदस्ती भले हो सकती है मगर आपका अधिकार नहीं है।

 

बच्चों को आपने मोल्डिंग मशीन समझ रखा है, वह पहने आपके हिसाब से, जीए आपके हिसाब से, पढ़े हिसाब से, कार्यक्षेत्र भी आपकी मर्जी से चुने और जीवनसाथी भी आपके स्टेटस के हिसाब से और यही इस देश की अधिकतर समस्याओं की जड़ है। बाल विवाह बच्चे खुद नहीं करते, दहेज भी आप ही बच्चों के जरिए अपनी नाक के लिए लेते और देते हैं, उनके प्रेम में दीवार बनकर ऑनर किलिंग भी आप ही करते हैं।

अगर अनचाही शादी या गलत शादी के होने के कारण आपका बेटा या बेटी कहीं बाहर प्यार तलाशता है, नशा करता है, अपने जीवनसाथी के साथ हिंसा करता है तो भले ही वह गुनहगार वह है और यह भले ही आपकी नजर में अवैध हो मगर इस गुनाह के तार भी आपसे ही जुड़े हैं। कई बार कन्याभ्रूण की हत्या और बेटियों से होने वाला पक्षपात, लड़कों को अपराधी बनने की हद तक शह देना कि वह निर्भया सा कांड कर डाले, यह आप ही की देन है इसलिए समाज को बदलना चाहते हैं तो सबसे पहले खुद को बदलिए। दोहरेपन से मुक्त होकर अपने बच्चों को खुली हवा में साँस लेने दीजिए वरना आप बच्चों की नजर में ही नहीं आने वाली पीढ़ी के भविष्य में जहर घोलने वाले गुनहगार से अधिक कुछ नहीं होंगे।

निर्भया से लेकर बिलकिस….सजा से जुड़े सवाल और बँधी उम्मीद

सुषमा त्रिपाठी

16 दिसम्बर 2012, भारत के इतिहास का वह काला दिन जिसे हम कभी नहीं भूल सकेंगे। 17 दिसम्बर की हताशा भरी वह भयावह सुबह और इसके बाद एक आग….जो ऐसी फैली कि इस देश में कानून बदला मगर बलात्कार की घटनाएं नहीं रुकीं। दरिंदगी बदस्तूर जारी है और तब तक जारी रहेगी जब तक हम नहीं बदलते, हमारे घरों में परवरिश का तरीका नहीं बदलता। इस घटना के बाद 5 साल बीत गए मगर हमारे राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक पुरोधा औरतों को उनकी औकात बताने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। पिछले साल 16 दिसम्बर को एक टीवी चैनल पर निर्भया की बरसी पर आयोजित एक कवरेज देख रही थी और कैमरा वह तमाम खाली जगहें दिखा रहा था जहाँ से उम्मीद की रोशनी निकली मगर बीच रास्ते में खो गयी। हमारी याददाश्त बहुत कमजोर है…..हमें बलात्कार और तेजाब से जले चेहरों के बीच रहने की आदत हो गयी है, जलती हुई औरतें अच्छी लगने लगी हैं और हम सभ्य होते जा रहे हैं। जब निर्भया कांड के आरोपी पवन गुप्ता की बहन अपने भाई की दरिंदगी को भुलाकर उसे एक मौका देने की बात कहती है और जब वह यह कहती है कि लड़के हमेशा गलत नहीं होती….लड़की हँसी तो फँसी तो लगता है कि लड़कियों को समाज की थोपी हुई सोच से निकालना कितना मुश्किल मगर जरूरी काम है। जब लेज्ली उडविन की इंडियाज डॉटर में मुकेश सिंह अच्छी लड़कियों की परिभाषा तय करता है और यह कहता है कि निर्भया को विरोध नहीं कर बलात्कार होने देना चाहिए था और अब बलात्कारी लड़कियों को मार ही डालेंगे तो उस सड़ांध का एहसास होता है और उस पर भी हैरत होती है जब ब्रिटेन की यह महिला एक बलात्कारी को हीरो बनाने की कोशिश करती है। हैरत होती है जब ए.पी. सिंह सा कथित तौर पर शिक्षित (?????) वकील लड़कियों को फार्म हाउस में जलाने की बात करता है और एक बलात्कारी के मानवाधिकारों की बात करता है। जिस बाल अपराधी ने सबसे अधिक क्रूरता दिखायी, उसे उम्र के कारण छोड़ दिया जाना भी सवाल उठाता है, जब अपराध करते समय उम्र नहीं देखी तो सजा के समय उम्र को बहाना क्यों बनाया जाना चाहिए? जो भी हो, निर्भया कांड के अपराधियों की फाँसी से बहुत कुछ न भी बदले मगर एक संदेश जाएगा और इसकी बहुत जरुरत है। अब ऐसे ही एक अन्य मामले में अपराधियों को उम्रकैद सुनायी गयी। बिलकिस बानो केस में बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए 12 आरोपियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। 12 आरोपियों को ट्रायल कोर्ट की ओर से उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी, जिसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की थी।

कोर्ट ने इस मामले में 5 पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया। बता दें कि गोधरा दंगों के बाद बिलकिस बानो पर हमला किया गया था। हमले के दौरान अहमदाबाद के रंधिकपुर में रहनेवाली बिलकिस बानो के परिवार में 8 लोगों की हत्या कर दी गई थी। बिलकिस बानो उस समय मात्र 19 साल की थी, और 5 माह की गर्भवती थी। उनके साथ गैंगरेप किया गया था।
बिलकिस के साथ जब 2002 में बलात्कार हुआ तो उस समय वो गर्भवती थीं। उनकी तीन साल की बेटी सालेहा की भी बेहरमी से हत्या कर दी गई। आज बिलकिस के बच्चों में बड़ी बेटी हाजरा, दूसरी फातिमा और बेटा यासीन है। लेकीन उनकी सबसे छोटी बेटी उनके लिए खास है क्योंकि उसका नाम उन्होंने सालेहा रखा है, अपनी उस बेटी की याद में जिसकी हत्या उनकी नज़रों के सामने हुई थी। इस फैसले को लेकर सवाल उठ रहे हैं मगर हमें याद ऱखना होगा कि ये फैसले अदालत के फैसले हैं। निर्भया कांड में भी फाँसी की सजा पर मुहर लगने में 2 साल गए और बिलकिस के सामने अब भी सर्वोच्च अदालत जाने का रास्ता खुला हुआ है। अच्छा होगा कि फिलहाल हम इस बात पर संतोष करें कि कम से कम फैसला हुआ मगर कोशिश करनी होगी कि इतने साल न लगें।

 

उच्चतम न्यायालय ने बलात्कार और हत्या मामले के चार दोषियों की मौत की सजा बरकरार रखते हुये कहा कि इस अपराध ने चारों ओर सदमे की सुनामी ला दी थी और यह बिरले में बिरलतम अपराध की श्रेणी में आता है जिसमें बहुत ही निर्दयीता और बर्बरता के साथ 23 वर्षीय छात्रा पर हमला किया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषियों ने पीड़ित की अस्मिता लूटने के इरादे से उसे सिर्फ मनोरंजन का साधन समझा और यही सच भी है कि इस देश में औरत अब भी उपभोग, मनोरंजन और परिवार चलाने की मशीन से अलग एक अदद इंसान अब भी नहीं समझी जा रही है।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खडपीठ ने दो अलग अलग लेकिन परस्पर सहमति व्यक्त करते हुये सर्वसम्मति के निर्णय में दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला बरकरार रखा जिसने चारों दोषियों को मौत की सजा देने के निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि की थी। इस निर्णय के बाद अब मुकेश, पवन, विनय शर्मा आरै अक्षय कुमार सिंह को मौत की सजा दी जायेगी।

इस सनसनीखेज वारदात के छह अभियुक्तों में से एक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी जबकि छठा अभियुक्त किशोर था। उसे तीन साल तक सुधार गृह में रखने की सजा सुनायी गयी थी।

पीठ ने अपने फैसले में दोषियों के हाथों सामूहिक बलात्कार की शिकार हुयी इस छात्रा के साथ इस अपराध के बाद उसके गुप्तांग में लोहे की राड डालने, चलती बस से उसे और उसके पुरूष मित्र को फेंकने और फिर उन पर बस चढाने का प्रयास करने जैसे दिल दहलाने वाले अत्याचारों के विवरण का जिक्र किया है।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की तीन सदस्यीय खंडापीठ ने 27 मार्च को इस मामले में दोषियों की अपील पर सुनवाई पूरी की थी। इस मामले में न्यायमूर्ति मिश्रा और न्यायमूर्ति भानुमति ने अलग अलग परंतु सहमति के फैसले सुनाये।

न्यायालय ने कहा कि इस अपराध की किस्म और इसके तरीके ने सामाजिक भरोसे को नष्ट कर दिया और यह बिरले में विरलतम की श्रेणी में आता है जिसमें मौत की सजा दी जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि पीड़ित ने संकेतों के सहारे मृत्यु से पूर्व अपना बयान दिया क्योंकि उसकी हालत बहुत ही खराब थी परंतु उसके इस बयान में तारतम्यता थी जो संदेह से परे सिद्ध हुयी। पीठ ने यह भी कहा कि पीडित और दोषियों की डीएनए प्रोफाइलिंग जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य भी घटना स्थल पर उनके मौजूद होने के तथ्य को सिद्ध करते हैं।

पीठ ने कहा कि चारों दोषियों, राम सिंह और किशोर की आपराधिक साजिश साबित हो चुकी है। इस वारदात के बाद उन्होंने पीडित और उसके दोस्त को बस से बाहर फेंकने के बाद उनपर बस चढा कर सबूत नष्ट करने का प्रयास किया।।

न्यायालय ने यह भी कहा कि पीडित के साथ बस में यात्रा करने वाले उसके मित्र और अभियोजन के पहले गवाह की गवाही अकाट्य और भरोसेमंद रही। चारों दोषियों ने अपनी अपील में दिल्ली उच्च न्यायालय के 13 मार्च, 2014 के फैसले को चुनौती दी थी। इस फैसले में उच्च न्यायालय ने चारों दोषियों को मौत की सजा सुनाने के निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि की थी।

एक नजर निर्भया कांड के पूरे घटनाक्रम पर

16 दिसंबर, 2012: पैरामेडिकल छात्रा के साथ एक निजी बस में छह लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया और उसके साथ बर्बरतापूर्वक मारपीट की। इसके बाद उसे एवं उसके दोस्त को चलती बस से बाहर फेंक दिया। उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया।

17 दिसंबर: आरोपियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। 17 दिसंबर: पुलिस ने चार आरोपियों की पहचान की – बस चालक राम सिंह, उसका भाई मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता।

18 दिसंबर: राम सिंह और तीन अन्य गिरफ्तार।

20 दिसंबर: पीड़िता के दोस्त ने बयान दिया।

21 दिसंबर: मामले में आरोपी किशोर को दिल्ली के आनंद विहार बस टर्मिनल से पकड़ा गया। पीड़िता के दोस्त ने मुकेश नाम के एक दोषी की पहचान की। पुलिस ने छठे आरोपी अक्षय ठाकुर को पकड़ने के लिए हरियाणा एवं बिहार में छापे मारे।

21-22 दिसंबर: ठाकुर को बिहार के औरंगाबाद से गिरफ्तार किया गया और दिल्ली लाया गया। पीड़िता ने अस्पताल में एसडीएम के सामने बयान दिया।

23 दिसंबर: विरोध प्रदर्शनकारियों ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया, सड़कों पर उतरे। विरोध प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए ड्यूटी पर तैनात दिल्ली पुलिस कांस्टेबल सुभाष तोमर को गंभीर रूप से घायल होने के बाद अस्पताल ले जाया गया।

25 दिसंबर: लड़की की हालत नाजुक। कांस्टेबल तोमर ने दम तोड़ा।

26 दिसंबर: दिल का दौरा पड़ने के बाद पीड़िता को सरकार ने एयर एंबुलेंस से सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल भेजा।

29 दिसंबर: पीड़िता ने देर रात दो बजकर 15 मिनट पर दम तोड़ा। पुलिस ने प्राथमिकी में हत्या का मामला जोड़ा।

दो जनवरी, 2013: तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने यौन अपराध मामले में त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक अदालत :एफटीसी: का उद्घाटन किया।

तीन जनवरी: पुलिस ने हत्या, सामूहिक बलात्कार, हत्या की कोशिश, अपहरण, अप्राकृतिक अपराध एवं डकैती सहित कई आरोपों को लेकर पांच वयस्क आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया।

पांच जनवरी: अदालत ने आरोपपत्र का संज्ञान किया।

सात जनवरी: अदालत ने बंद कमरे में कार्यवाही का आदेश दिया।

17 जनवरी: एफटीसी ने पांच वयस्क आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की।

निर्भया कांड पर सुप्रीम कोर्ट की तल्‍ख टिप्पणी

1. जजों ने 2 बजकर 3 म‌िनट पर फैसला पढ़ना शुरु क‌िया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चारों आरोपियों ने निर्भया के साथ जिस तरह का बर्बरता पूर्ण व्यवहार किया उससे ये साबित होता है कि अपने तरह का अनोखी घटना है।

2. यह मामला रेयरेस्ट आफ रेयर है। केस की मांग थी कि न्यायपालिका समाज के सामने एक मिसाल पेश करे।

3. निर्भया कांड में कोर्ट का फैसला आते ही अदालत कक्ष में तालियां बजीं।

4. अदालत ने कहा इस मामले में कोई रियायत नहीं दी जा सकती।

5. निर्भया कांड सदमे की सुनामी थी। जिस तरह से अपराध हुआ है वह एक अलग दुनिया की कहानी लगती है।

6.दोषियों ने हिंसा, सेक्स की भूख की वजह से अपराध किया।

7. वारदात को क्रूर और राक्षसी तरीके से अंजाम दिया गया।

8. उम्र, बच्चे, बूढ़े मां-बाप ये कारक राहत की कसौटी नहीं।

9. इस अपराध ने समाज की सामूहिक चेतना को हिला दिया।
10. पीडि़ता का मृत्यु पूर्व बयान संदेह से परे

अदालत ने विवेकानंद का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के विकास को मापने का सबसे अच्छा थर्मामीटर है कि हम महिलाओं के साथ कैसे पेश आते हैं।

तीन जजों की बेंच में से एक जज भानुमति का फैसला शेष दो जजों से अलग है। जस्ट‌िस भानुमत‌ि ज‌िनका फैसला अन्य जजों से अलग रहा उन्होंने कहा क‌ि हमारे यहां एजुकेशन स‌िस्टम ऐसा होना चाह‌िए ज‌िससे क‌ि बच्चे मह‌िलाओं के साथ कैसा व्यवहार करना है ये सीख सकें। जस्ट‌िस भानुमत‌ि ने स्वामी व‌िवेकानंद के एक कोट को रेफर करते हुए कहा क‌ि कैसे परंपराएं ज्ञान और श‌िक्षा के साथ म‌िलकर समाज में मह‌‌िलाओं के न्याय द‌िलाने का काम करती हैं।

निर्भया की मां बोलीं, ‘मेरी बेटी को ही नहीं देश को भी मिला इंसाफ

ऐतिहासिक फैसले पर निर्भया के परिजन काफी खुश हैं। पीड़िता की मां ने कहा कि ये मेरी बेटी निर्भया को ही नहीं, पूरे देश को इंसाफ मिला है। उन्होंने कहा कि भले ही फैसला आने में देरी हुई है, लेकिन हमारी बेटी को फैसला मिला है। निर्भया की मां ने मीडिया और लोगों का धन्यवाद किया और कहा कि ऐसी उम्मीद की जाती है कि देश की बाकी बच्चियों को भी ऐसे ही इंसाफ मिलेगा।
ये फैसला सिर्फ हमारा नहीं, पूरे देश का है, समाज का है और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट, समाज और मीडिया का धन्यवाद देती हूं। हम सबको इंसाफ मिला। जो हादसा मेरी बेटी के साथ हुआ उसका मन में मलाल रहेगा, जब तक जीएंगे, तब तक रहेगा। कानूनी प्रक्रिया लचर जरूर है, लेकिन उसमें देर हैं, पर अंधेर नहीं। निर्भया के पिता ने भी कहा कि वे कोर्ट के फैसले से बेहद खुश हैं मगर सवाल यह भी है कि  कितने परिवारों और कितनी माँओं में अपनी बेटी को न्याय दिलाने का हौसला सालों बरकरार रहे। क्या हमारा परिवेश इतना संवेदनशील है कि ऐसी लड़कियों, परिवारों की लड़ाई का साथ दे। बंगाल के मध्यमग्राम में वातावरण और प्रताड़ना के कारण एक किशोरी को दोबारा बलात्कार की पीड़ा से गुजरना पड़ा, अंततः उसने खुद को आग लगा ली मगर हमारा राज्य मामले को रफा – दफा करने में जुटा रहा। किशोरी का टैैक्सी चालक पिता राज्य को हताशा के साथ छोड़ चुुका है और ऐसे कई अपराधी घूम रहे हैं।

आखिरकार निर्भया को न्याय मिला : सोशल मीडिया

पोस्ट और ट्वीट में आम तौर पर कहा गया, ‘‘आखिरकार निर्भया को न्याय मिला।’’ एक उपयोगकर्ता ने इस ट्वीट के साथ एक तस्वीर साझा करते हुए कहा, ‘‘करीब चार वषर्, चार माह, 18 दिन, विरोध, दर्द और संघर्ष के बाद अब भारत की बेटी और भारतीयों की बहन की आत्मा को शांति मिलेगी।’’ एक अन्य उपयोगकर्ता ने लिखा, ‘‘यह निर्भया के लिए न्याय है लेकिन असल मायने में ऐसा तभी हो पाएगा जब समाज दूसरी निर्भया नहीं होने दे। जय हो।’’ आज फैसला सुनाए जाने के दौरान खचाखच भरे न्यायालय कक्ष में तालियों की गड़गड़ाहट सुनी जा सकती थी और न्यायाधीशों ने घटना को विरले से विरलतम करार दिया। सोशल मीडिया पर भी कमोबेश इसी तरह की भावनात्मक टिप्पणी देखने को मिली और लोगों ने ट्विटर और फेसबुक पर निर्णय की सराहना की।
इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले कुछ लोगों ने पीड़िता को उसके असली नाम से पुकारने की मांग की, जिस बात की चाह उसके माता-पिता जता चुके हैं। दूसरी ओर उपयोगकर्ताओं के एक धड़े ने पूछा कि वर्ष 2002 में गुजरात में हुए मुस्लिम विरोधी हिंसा के पीड़ितों बिलकिस बानो और एहसान जाफरी के मामले में भी ऐसा क्यों ना किया जाए। यह जीत जरूरी थी मगर हमारी लड़ाई लम्बी हैै और रास्ता पथरीला हैै….इस पथरीले समाज को सड़ांध भरी मानसिकता से निकालना ही आज युवाओं की जिम्मेदारी हैै, या यूँ कहें कि हम सबकी जिम्मेदारी है।

(इनपुट – विभिन्न समाचार पत्र तथा पीटीआई)