विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से तुलसी और प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर ‘तुलसी एवं प्रेमचंद की प्रासंगिकता’विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पूर्व पी.जी. सेक्रेटरी डॉ. अब्दुर रहीम ने प्रेमचंद को भारतीयता का लेखक माना। डॉ. पंकज साहा ने कहा कि प्रेमचंद की अचर्चित कहानियां प्रासंगिक हैं, उनका नाटक ‘कर्बला’ सांप्रदायिक सद्भाव के लिए प्रासंगिक है। शिक्षक रणजीत सिन्हा ने कहा कि प्रेमचंद गांधी और तुलसी से ज्यादा प्रभावित हैं। प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि प्रेमचंद भारतीय समाज के प्रतिनिधि रचनाकार हैं, जिनकी रचनाओं में जीवन की समग्रता है। विभागीय अध्यक्ष प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि तुलसी और प्रेमचंद अपने युग के उच्च मूल्यों के वाहक हैं। इस अवसर पर रूकसार परवीन, प्रिया शर्मा, के. अनुषा, मो. अनुवर ने आलेख एवं शारदा महतो, सोनी कुमारी, मिथिलेश, पकंज सिंह, सुषमा सिंह, राहुल शर्मा, पुष्पा मल्ल, मधु सिंह, रूपल साव, मौसमी गोप, गायत्री रथो, सुनील आदि ने स्वरचित कविताओं का पाठ किया। प्रेमचंद पर आयोजित ज्ञान प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पुष्पा मल्ल, रूपल साव एवं मधु सिंह तथा द्वितीय स्थान के. अनुषा, प्रिया शर्मा एवं रोशनी जायसवाल ने प्राप्त किया। इसके साथ ही रोमा मांडेय, श्रावणी और नवोनीता दास ने काव्य संगीत एवं सोनाली, रेशमी कुमारी ने भाव नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का सफल संचालन विभाग के शोधार्थी विनोद कुमार यादव ने किया।
कविताओं पर परिचर्चा और साहित्यिकी पत्रिका के नये अंक का लोकार्पण
कोलकाता – भारतीय भाषा परिषद के सभाकक्ष में नगर की सुपरिचित संस्था साहित्यिकी द्वारा आयोजित संगोष्ठी में साहित्यिकी पत्रिका के नये अंक “साझा करते हुए’ का लोकार्पण श्रीमती सरोजिनी शाह ने किया। सुषमा त्रिपाठी के काव्यसंग्रह ‘अब वह आसमान तोड़ रही है’ और मीना चतुर्वेदी के काव्यसंग्रह ‘स्नेह स्मृति’ पर आयोजित इस परिचर्चा में श्रीमती रेणु गौरीसरिया ने सावन पर कविता पढ़कर अतिथियों का स्वागत किया। सुषमा त्रिपाठी और मीना चतुर्वेदी ने न केवल अपने अनुभवों को श्रोताओं से साझा किया बल्कि अपनी चुनिंदा कविताओं का भावपूर्ण पाठ भी किया। सुषमा त्रिपाठी के काव्यसंग्रह का विश्लेषण करते हुए इतु सिंह ने कहा सुषमा एक संवेदनशील और संभावनाशील कवयित्री हैं। उनकी आरंभिक कविताओं में अभिव्यक्ति की तीव्रता के साथ कच्चापन भी है। क्रमशः वह वृहद समाज से संवाद करती हैं। अपनी संवेदनाओं को संतुलित कर सुषमा अपने सृजन को परिपक्व बना सकती हैं। उनकी कविताओं में उम्मीद और आस्था का स्वर मुखरित होता है जहां वह खुद की रोशनी में खुद को देखती हैं । कवि का तटस्थ होना भी जरूरी है तभी वह स्वयं से पर तक की यात्रा करने में सफल होता है।
मीना जी की कविताओं पर अपनी बात रखते हुए वाणी श्री बाजोरिया ने कहा कि मीना जी की कविताओं में व्यक्ति परकता तो है ही पर सामाजिक समस्याएं भी उनकी निगाह से ओझल नहीं हुई हैं।। उनकी कविताओं में प्रिय के प्रति अनूठा समर्पण है। अपने सैनिक पति को याद करते हुए वह देशभक्ति की सुंदर बानगी पेश करती हैं। वहां दर्द तो है पर हताशा बिल्कुल नहीं है।
अध्यक्षीय वक्तव्य में किरण सिपानी ने दोनों कवयित्रियों को बधाई देते हुए कहा कि दोनों कवयित्रियां दो पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करती हैं और निसंदेह उनकी कविताओं से समाज को एक दिशा मिलेगी। इन कविताओं में स्त्री मन की पीड़ा के साथ उनका आक्रोश भी मुखरित हुआ है। मानसी चतुर्वेदी ने भी अपनी सास को बधाई देते हुए अपनी बात रखी। कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती विद्या भंडारी और धन्यवाद ज्ञापन गीता दूबे ने किया।
तुलसीदास के शब्द असीम शक्ति और प्रेरणा देते हैं: मनोज श्रीवास्तव
कोलकाता – गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस और सुन्दर काण्ड में राम और सीता के जिस रूप को प्रस्तुत किया है वह अतुलनीय है । उन्होंने कहा सुन्दर काण्ड हमारी संवेदना और संभावना को स्फूर्ति प्रदान करता है । हमारे जीवन में सघन अँधेरा क्यों न हो सुन्दर काण्ड का एक पाठ ही जीवन में प्रकाश पैदा कर देता है । कई शताब्दियों बाद भी तुलसीदास के शब्द असीम शक्ति और प्रेरणा देते हैं । सुन्दर काण्ड ऊर्जा का श्रोत है । ये उद्गार हैं मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग के मुख्य सचिव मनोज कुमार श्रीवास्तव के जो सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्वाधान में आयोजित तुलसी जयंती समारोह में बतौर विशिष्ठ अतिथि बोल रहे थे । समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कृष्णाबिहारी मिश्र ने कहा कि तुलसीदास का साहित्य आज हो रहे पाखण्ड में भी हमें रास्ता दिखा सकता है । भारतीय संस्कृति को समझना हो तो तुलसी साहित्य पढ़ना चाहिए क्योंकि उनके साहित्य में हमें संस्कृति की रक्षा का आश्वासन मिलता है ।
कार्यक्रम का शुभारम्भ सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से हुआ । पुस्तकालय के उपाध्यक्ष भरत कुमार जालान ने स्वागत भाषण देते हुए पुस्तकालय की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने किया । पुस्तकालय अध्यक्ष तुलाराम जालान ने धन्यवाद ज्ञापित किया ।
इस अवसर पर कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राजश्री शुक्ला, सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय की टीचर इंचार्ज इन्दरपाल कौर, मनीषा त्रिपाठी, हेमन्त कुमार जालान, अनुराधा जालान, दिव्या जालान, ईशान जालान, , कमलेश कृष्ण मिश्र, जयप्रकाश सिंह सहित अन्य गणमान्य उपस्थित थे । कार्यक्रम को सफल बनाने में श्रीराम तिवारी, श्रीमोहन तिवारी, आदि का सक्रिय योगदान रहा।
भारतीय भाषा परिषद और खिदिरपुर कॉलेज ने मनायी प्रेमचन्द जयंती
भारतीय भाषा परिषद और खिदिरपुर कॉलेज के सह आयोजन में हाल ही में प्रेमचंद जयंती मनायी गयी। इस अवसर पर प्रेमचंद के संबंध में विचार व्यक्त करते हुए कहा गया कि प्रेमचंद भारत में एक बनते हुए महान राष्ट्र के साक्षी थे जबकि आज हर तरफ पुल की जगह खाइयां पैदा की जा रही हैं। उनकी रचनाएं ‘ईदगाह’, ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ में आज भी प्रेरित करती हैं। वे हिंदी और उर्दू के बीच हमारे समय के सबसे बड़े पुल हैं। प्रेमचंद और आज के सवाल पर हुई चर्चा में लगभग बीस कॉलेजों और विभिन्न विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों और शोधार्थियों और शिक्षकों ने अपने वक्तव्य रखे। उनमें स्त्रियों की संख्या का ज्यादा होना यह साबित करने के लिए काफी था कि इस समय वे कितनी मुखर और स्वंतत्रता के लिए कितनी बेचैन हैं। रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अरुण कुमार ने इसे प्रेमचंद के साहित्य की विजय के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्रेम और वैचारिक स्वतंत्रता के बीच गहरा संबंध है जिसे आज मिटाने की कोशिश की जा रही है। सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज की प्रो. मधुलता गुप्त ने कहा कि प्रेमचंद एक मानवतावादी कथाकार थे और आज राष्ट्रवाद और मानवतावाद को जोड़ने की बहुत जरूरत है। प्रो. शहनाज नबी ने प्रेमचंद को एक महान कथाकार बताते हुए कहा कि प्रेमचंद उर्दू और हिंदी की एकता के प्रतीक हैं। प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के प्रो. वेदरमण ने कहा कि प्रेमचंद ने किसानों का जो प्रश्न अपने कथा साहित्य उठाया था वह आज फिर महत्वपूर्ण हो गया है। खिदिरपुर कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. इतु सिंह ने प्रेमचंद के पुनर्मूल्यांकन की जरूरत बताते हुए कहा कि आज हम जिन समस्याओं से घिरे हुए हैं प्रेमचंद का कथा साहित्य उनसे बाहर निकलने का मार्ग दिखाता है। बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. कफील अहमद नसीम ने बताया कि प्रेमचंद के कथा साहित्य के केंद्र में स्त्री और दलित हैं जो आज के विमर्शों के लिए रोशनी का काम करते हैं। इस अवसर पर अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देते प्रो. शंभुनाथ ने कहा कि प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ बाजारवाद के विरुद्ध विद्रोह है। यह बनावटी वस्तुओं की जगह हामिद के चिमटा की तरह की जरूरी वस्तुओं को चुनने की शिक्षा देती है। हमारा युग जब ‘सादा जीवन उच्च विचार’ से कृत्रिम जीवन निम्न विचार की ओर बढ़ रहा है प्रेमचंद का कथा साहित्य सादगी, सहिष्णुता और मानवता के आलोक स्तंभ की तरह दिखाई देता है। परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी, खिदिरपुर कॉलेज की डॉ. दीबा हाशमी और परिषद के मंत्री नंदलाल शाह ने अतिथियों का स्वागत किया। दो सत्रों के आयोजन का संचालन किया ज़ोहेब आलम और डॉ. अर्चना पांडेय ने। भाषण प्रतियोगिता में सगुफ्ता जहां (आलिया यूनिवर्सिटी), गायत्री कुमारी (बंगवासी कॉलेज), रुखसाना परवीन (मटियाबुर्ज कॉलेज) ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त किया।
कुछ हासिल करना हो तो आपको सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलना पड़ता है
कहते हैं कि माँ बच्चे की प्रथम गुरु होती है, बच्चे में अपनी छाया खोज लेती है मगर कुछ मांएँ ऐसी भी होती हैं जो बच्चे के साथ अपना अस्तित्व भी निखार लेती हैं। मातृत्व उनके लिए ठहराव नहीं होता, मातृत्व उनके लिए बंधन भी नहीं होता, वह बच्चे के साथ अपनी अलग पहचान बना लेती हैं। नवनीत प्रिया लोढ़ा ऐसी ही माँ हैं जिन्होंने अपने बेटे प्रखर के साथ आत्मरक्षा की कला कराटे सीखी और आज कई प्रतियोगिताएँ जीत चुकी हैं। प्रिया एक कुशल ग्राफिक डिजाइनर भी हैं जो कई कम्पनियों के साथ काम कर चुकी हैं। अपराजिता आपसे इस बार नवनीत प्रिया लोढ़ा की मुलाकात करवा रही है और नवनीत की कहानी उनकी जुबानी पेश कर रही है –
ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर बहुत काम किए हैं
मैं पेशेवर ग्राफिक डिजाइनर हूँ। वेब मीडिया और प्रिंट मीडिया में ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर बहुत काम किए हैं। ऑनलाइन प्रोमो तैयार किए हैं जिनमें 2 डी एनिमेशन से लेकर किताबें, ब्रोशियर, बैनर, होर्डिंग्स की डिजाइनिग भी शामिल है। यहाँ तक कि बेटे के जन्म के एक दिन पहले तक मैंने नौकरी की है। अरीना मल्टीममीडिया और 123 इंडिया समेत कई कम्पनियों के साथ भी मैंने काम किया है।
मैं तभी काम कर पाती थी, जब मेरा बेटा सो रहा होता था
अगर अनुभवों की बात करूँ तो शुरु में फ्रीलांस करते समय बहुत हताशा का माहौल रहा क्योंकि जिन लोगों के साथ काम करती थी, उनको तुरंत काम चाहिए था। यह सम्भव नहीं था। मैं तभी काम कर पाती थी, जब मेरा बेटा सो रहा होता था। दिन भर की घरेलू जिमम्मेदारियों के साथ कई बार रात भर जाग कर भी काम करती थी। दरअसल डिजाइनिंग का जुनून ऐसा था कि रात को जगकर काम करने में भी दिक्कत नहीं होती थी।
बेटे की कराटे क्लास में जाकर फिर सपना जाग उठा
जब दसवीं कक्षा में थी तो कराटे हमारी आत्मरक्षा से संबंधित गतिविधियों में शामिल था। मेरी रुचि शुरू से ही थी मगर परिवार का सहयोग तब नहीं मिला इसलिए कोर्स पूरा नहीं कर सकी और बाद में अपनी पढ़ाई को लेकर व्यस्त हो गयी। मेरा बेटा जब साढ़े 3 साल का हो गया तो मैंने उसे कराटे सिखाने के बारे में सोचा जो उसके शारीरिक व मानसिक विकास में सहायक होता। तब दूसरे अभिभावकों की तरह मुझे भी कक्षा खत्म होने तक वहीं बैठकर इंतजार करना पड़ता था मगर यही वह समय था जब मुझे लगा कि किशोरावस्था में छूटे अपने उस सपने को पूरा कर सकूँ। बहुत बार सोचती थी कि मैं भी दाखिला ले लूँ मगर कक्षा में सिर्फ बच्चे ही थे। आखिरकार 2013 में मैंने इन्स्ट्रकर से इस बारे में पूछा और अनुमति माँगी। वे बहुत सकारात्मक थे और मेरा दाखिला कराटे की कक्षा में हो गया।
कुछ हासिल करना हो तो आपको सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलना पड़ता है
मेरे पति राजीव लोढ़ा और मेरी ससुरालवालों ने मेरा साथ दिया। यह आसान नहीं था। शुरु – शुरू में शरीर में काफी दर्द होता था जबकि मेरे प्रशिक्षक ने मेरे लिए कक्षा में अलग व्यवस्था की थी मगर एक समय ऐसा था कि एक साथ बहुत पत्नी, माँ और प्रोफेशनल होने की जिम्मेदारियाँ मेरे लिए निभाना बहुत मुश्किल था। इस पर अतिरिक्त समय निकालना बहुत कठिन था मगर कुछ हासिल करना हो तो आपको सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलना पड़ता है।
मेरे बेटे प्रखर ने कई चैम्पियनशिप जीती हैं
मैंने ऑल इंडिया शेईशिनकाईशितोरुयू कराटे डू फेडरेशन से सीखा है। मेरे बेटे प्रखर ने कई चैम्पियनशिप जीती हैं जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट भी शामिल है। मैंने कराटे एसोसिएशन ऑफ बंगाल द्वारा राज्य स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।
मेरा बेटा मुझे सुपरमॉम कहता है
मातृत्व ने मेरा जीवन बहुत बदला है और अगर आप मुझे अचीवर कहते हैं तो इसका कारण भी यही है कि मैं माँ हूँ। माँ की जिम्मेदारी निभाते हुए मैंने खुद को शक्तिशाली महसूस किया है। मैं अपने बेटे की आँखों में अपने लिए गर्व देखती हूँ तो वह पल मेरे लिए गौरव भरा होता है। मेरा बेटा मुझे सुपरमॉम कहता है।
महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 10 गुना काम करने की क्षमता रखती हैं
मैंने हमेशा से समय प्रबंधन पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया है और एक साथ बहुत सारे काम करती थी। कहीं पढ़ा था कि एक साथ कई चीजें सम्भालना आपकी दक्षता को बढ़ाता है और आप बहुत कुछ सीख सकते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 10 गुना काम करने की क्षमता रखती हैं और मैं इसमें विश्वास रखती हूँ। शायद यही वजह थी कि मैं एक गृहिणी के साथ ग्राफिक डिजाइनर की जिम्मेदारी भी निभा सकी।
समस्याओं से अधिक अपनी क्षमताओं और जिम्मेदारियों को पहचानें
मैं सभी महिलाओं और लड़कियों से कहना चाहूँगी कि वे अपनी समस्याओं से अधिक अपनी क्षमताओं और जिम्मेदारियों को पहचानें। महिलाओं में क्षमता होने का मतलब है समाज में क्षमता होना।
बातें करती हैं, मन खोलिए, भागीदारी बढ़ाइए, आपकी जरूरत है
त्योहारों का मौसम दस्तक दे चुका है मगर विवादों का मौसम साल भर छाया रहता है। मित्रता दिवस और रक्षाबंधन सप्ताह की शुरुआत में ही आ गए मगर देश के भाईचारे और मैत्री में नए सिरे से जान फूँकने की जरूरत पड़ रही है। त्योहार आ गये मतलब गृहिणियों की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ गयीं और वे बगैर किसी शिकायत के मन में तमाम असंतोष समेटे एक बार फिर खुशियों का स्वागत करने को तत्पर हैं। अपने लिए वक्त निकालना है या उनका कोई जीवन है, उनकी कोई जरूरत है, उनकी सहेलियाँ हैं, ये सब गृहस्थी की गाड़ी के पहिए में पिस जाता है। न वे मुँह खोलती हैं और न ही मन, एक अनजाना सा डर हमेशा उनका पीछा रहता है और सुपर मॉम बनाने के चक्कर में अपना चैन गँवा देती हैं। एक बार रुककर सोचिए तो ये खामोशी क्या सचमुच आपकी गृहस्थी को सुरक्षित रखेगी? क्या एक बड़ी वजह नहीं है कि आपकी कुंठा, आपका फ्रस्टेशन आपका परिवार, आपके बच्चे ही नहीं आपके विद्यार्थियों और और कर्मचारियों से लेकर सहयोगियों पर उतरता है। ये वही लोग हैं, जिनके लिए आप सब कुछ भूलकर जान दे रही हैं। अगर कोई आपसे बात करना चाहे तो आप कुछ नहीं या तुम नहीं समझोगे, कहकर बात टाल देती हैं। घर और बाहर का हर बोझ, शहीदों की तरह अपने कन्धे पर उठाए घूम रही हैं, सिर्फ इसलिए कि आपकी छवि अच्छी बनी रहे। अब सोचिए, क्या आपको आपकी जरूरत नहीं है, क्या आप खुद पर अन्याय करके या अन्याय सह कर, खामोश रहकर हर समाधान निकाल लेंगी। आपके दोस्त आपके आस – पास हैं, ये वहीं हैं, जिनसे आप हमेशा बातें करती हैं मगर सिर्फ काम की बातें करती हैं। दोस्त आपकी जिन्दगी से गायब होते जा रहे हैं। रुकिए, बातों के साथ मन खोलिए, क्या पता आप जो सोच रही हों, आप जिन बातों से परेशान हो, उसका कोई हल इन बातों में मिल जाए। सासू माँ को चाय पिलानी हो तो उनके साथ गप भी मारी जा सकती है। पति को बेड टी देना हो तो वह टहलते हुए भी किया जा सकता है और तब तक थोड़ी देर के लिए बच्चों को उनके साथ छोड़ा भी जा सकता है। बरतन रखते समय बेटी को शामिल किया जा सकता है और वॉशिंग मशीन सम्भालने की जिम्मेदारी बेटे को भी दी जा सकती है। मोबाइल का बिल भाई भी दे सकता है और केरोसिन की कतार में आपके जेठ जी भी खड़े हो सकते हैं। आप बाजार अपनी जेठानी और देवरानी के साथ भी जा सकती हैं और उनके साथ गोलगप्पे भी खा सकती हैं। हर रविवार आधे घंटे अपनी सहेलियों के साथ बातें करें, ध्यान लगाएं। मोहल्ले की औरतों के साथ अंताक्षरी खेलें और किसी सामाजिक गतिविधि से जुड़ें मगर ये सिर्फ आप ही कर सकती हैं। बातें करती रहती हैं, इस बार जरा मन भी खोल लीजिए। इस स्वाधीनता दिवस पर खुद को कुंठाओं और बंधनों से आजाद कीजिए और समाज में अपनी भागीदारी बढ़ाइए। अनुभव ही होगा, अच्छा न हुआ तो बुरा ही होगा मगर आप खुद को महसूस करेंगी। संवाद की जरूरत है हमें, हमारे देश को, हमारी राजनीति को, मोदी को राहुल को, नीतिश को, लालू को मगर संवाद के बाद सीमा में बंधने की नहीं बाँध देने की जरूरत है वैसे ही जैसे हमारी सेना चीन और पाकिस्तान को बाँध देने के लिए तत्पर है। व्यक्ति से समाज बनता है और आप मशीन नहीं, एक व्यक्ति हैं, इसे स्वीकार कीजिए, समस्याएँ तो बस चुटकी में सुलझ जाएँगी। अपराजिता की ओर से सारे मित्रों और सारी सखियों को मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, स्वतन्त्रता दिवस पर जय भारत।
बारिश की रिमझिम का आनंद बढाए चीला लाजवाब
चना दाल चीला
सामग्री – 2 कप भिगोई हुई चना दाल, 1 कप बारीक कटी पालक, 1 कप कद्दूकस किया हुआ खीरा, 1 कद्दूकस की हुई गाजर, 2-3 हरी मिर्च, 1 इंच अदरक का टुकड़ा, 1 बड़ा चम्मच ईनो फ्रूट साल्ट, 4 बड़ा चम्मच दही, स्वादानुसार नमक, आवश्वयकतानुसार तेल
विधि – सबसे पहले गाजर को निचोड़कर इसका पानी निकाल दें। इसके बाद ग्राइंडर में चना दाल, मिर्च, अदरक डालकर पीस लें। अगर मिश्रण ज्यादा गाढ़ा हो तो इसमें थोड़ा सा पानी डाल लें। दाल के पेस्ट को एक बर्तन में निकाल लें. इसमें पालक, गाजर और खीरा मिला लें। जब चीले बनाने हों तो इस पेस्ट में दही, नमक और इनो डालकर अच्छी तरह मिला लें। मध्यम आंच पर नॉन स्टिक तवा गरम होने के लिए रखें. जब यह गरम हो जाए तो इसमें कुछ बूंदें तेल डाल लें। इसके बाद एक कड़ही मिश्रण डालकर इसे मीडियम आंच पर पकाएँ। जब एक साइड यह सुनहरा हो जाए तो इसे पलटकर दूसरी तरफ भी सेंक लें। इसी तरह सारे चीले बना ले। हरी चटनी या टोमैटो सॉस के साथ इन्हें खाएं और दूसरों को भी खिलाएं।
बेसन और पालक चीला
सामग्री – तीन कप बेसन, डेढ़ कप बारीक कटा पालक, आधा कप बारीक कटा प्याज, बारीक कटी हरी मिर्च, चटनी, एक चम्मच साबूत धनिया, आधा चम्मच लाल मिर्च, आधा चम्मच जीरा पाउडर, आधा चम्मच कसूरी मेथी, आधा चम्मच अजवाइन, नमक स्वादानुसार, पानी आवश्यकतानुसार, तलने के लिए तेल।
सजावट के लिए
विधि -टमाटर व खीरा. दही और नींबू के अचार या स्प्राउट्स के साथ सर्व करें। सभी सामग्रियों को बर्तन में डालकर मिलाएं और गाढ़ा घोल तैयार करें। नॉनस्टिक तवे पर तेल गर्म करें और आधा कप घोल डालकर चम्मच से फैलाएं। आंच तेज करके किनारे-किनारे से तेल डालें और हल्के भूरे रंग तक रोस्ट करें. पलटकर फिर पकाएं। इसे प्लेट पर परोसकर टमाटर व खीरे से गार्निश करें और दही व चटनी, नींबू के अचार या स्प्राउट्स और कॉफी के साथ सर्व करें।
गोस्वामी तुलसीदास की कुछ रचनाएँ
तुलसी के दोहे
श्री राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर ।
ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरू तुलसी तोर।1।
सीता लखन समेत प्रभु सेाहत तुलसीदास।
हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास।2।
पंचवटी बट बिटप तर सीता लखन समेत।
सोहत तुलसीदास प्रभु सकल सुमंगल देत।3।
श्री चित्रकूट सब िदन बसत प्रभु सिय लखन समेत।
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत।4।
पय अहार फल खाइ जपु राम नाम षट मास।
सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ।5।
राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।6।
हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम।
मनहुँ पुरट संपुट लसत लसत तुलसी ललित ललाम।7।
सगुल ध्यान रूचि सरस नहिं निर्गुन मन में दूरि।
तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि।8।
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।9।
नाम राम केा अंक है सब साधन हैं सून।
अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून।10।
अब लौं नसानी, अब न नसैहों
अब लौं नसानी, अब न नसैहों।
रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं॥
पायो नाम चारु चिंतामनि उर करतें न खसैहौं।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं॥
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन निज बस ह्वै न हँसैहौं।
मन मधुपहिं प्रन करि, तुलसी रघुपति पदकमल बसैहौं॥
मन पछितैहै अवसर बीते
मन पछितैहै अवसर बीते।
दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥
सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।
हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥२॥
सुत-बनितादि जानि स्वारथरत न करु नेह सबहीते।
अंतहु तोहिं तजेंगे पामर! तू न तजै अबहीते॥३॥
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़, त्यागु दुरासा जीते।
बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ, बिषयभोग बहु घी ते॥४
बड़े घर की बेटी
मुंशी प्रेमचन्द
बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल
थी, उन्हीं की कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं, इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ शेष न रहा था; पर दूध
शायद बहुत देती थी; क्योंकि एक न एक आदमी हाँड़ी लिये उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी
वर्तमान आय एक हजार रुपये वार्षिक से अधिक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी. ए. की डिग्री प्राप्त
की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लालबिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा, चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सबेरे पी
जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी। इन नेत्रप्रिय गुणों को उन्होंने बी. ए.-इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर कर दिया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे
को कांतिहीन बना दिया था। इसी से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वैदिक औषधियों पर उनका अधिक विश्वास था। शाम-सबेरे से उनके कमरे से प्रायः खरल की सुरीली
कर्णमधुर ध्वनि सुनायी दिया करती थी। लाहौर और कलकत्ते के वैद्यों से बड़ी लिखा-पढ़ी रहती थी।
श्रीकंठ इस अँगरेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी अँगरेजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे। बल्कि वह बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। इसी से गाँव
में उनका बड़ा सम्मान था। दशहरे के दिनों में वह बड़े उत्साह से रामलीला में सम्मिलित होते और स्वयं किसी न किसी पात्रा का पार्ट लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे।
प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगान उनकी धार्मिकता का प्रधान अंग था। सम्मिलित कुटुम्ब के तो वह एकमात्र उपासक थे। आजकल स्त्रियों को कुटुम्ब में मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि
होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गाँव की ललनाएँ उनकी निंदक थीं। कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न
करती थीं। स्वयं उनकी पत्नी को ही इस विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि से घृणा थी, बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत
कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके, तो आये-दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलग पकायी जाये।
आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेटी,
और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यहाँ विद्यमान थे। नाम था भूपसिंह। बड़े उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे, पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी न था।
सात लड़कियाँ हुईं और दैवयोग से सब-की-सब जीवित रहीं। पहली उमंग में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोल कर किये; पर पंद्रह-बीस हजार रुपयों का कर्ज सिर पर हो गया, तो आँखें
खुलीं, हाथ समेट लिया। आनंदी चौथी लड़की थी। वह अपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर संतान को कदाचित्
उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसका विवाह कहाँ करें ? न तो यही चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न यही स्वीकार था कि उसे अपने
को भाग्यहीन समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ उनके पास किसी चंदे का रुपया माँगने आया। शायद नागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम से श्रीकंठ
सिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया।
आनंदी अपने नये घर में आयी, तो यहाँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहाँ नाम-मात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का तो
कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी स्लीपर साथ लायी थी, पर यहाँ बाग कहाँ। मकान में खिड़कियाँ तक न थीं। न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें। यह
एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थ का मकान था, किन्तु आनंदी ने थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानो उसने विलास के सामान कभी देखे ही न
थे।
2
एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला-जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है। आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह
नया व्यंजन बनाने बैठी। हाँड़ी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक न था। बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाने। उसने सब घी मांस में डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी
न था, बोला-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा ?
आनंदी ने कहा-घी सब मांस में पड़ गया। लालबिहारी जोर से बोला-अभी परसों घी आया है। इतना जल्द उठ गया ?
आनंदी ने उत्तर दिया-आज तो कुल पाव-भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस में डाल दिया।
जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है-उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक
कर बोला-मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो !
स्त्री गालियाँ सह लेती है, मार भी सह लेती है; पर मैके की निंदा उससे नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली-हाथी मरा भी, तो नौ लाख का। वहाँ इतना घी नित्य नाई-कहार खा
जाते हैं।
लालबिहारी जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और बोला-जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।
आनंदी को भी क्रोध आ गया। मुँह लाल हो गया, बोली-वह होते तो आज इसका मजा चखाते।
अब अपढ़, उजड्ड ठाकुर से न रहा गया। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटी थी। जब जी चाहता, उस पर हाथ साफ कर लिया करता था। खड़ाऊँ उठाकर आनंदी की ओर जोर से
फेंकी, और बोला-जिसके गुमान पर भूली हुई हो, उसे भी देखूँगा और तुम्हें भी।
आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सिर बच गया। पर उँगली में बड़ी चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भाँति काँपती हुई अपने कमरे में आ कर खड़ी हो गयी। स्त्री का बल
और साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घंमड होता है। आनंदी खून का घूँट पी कर रह गयी।
3
श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे। बृहस्पति को यह घटना हुई थी। दो दिन तक आनंदी कोप-भवन में रही। न कुछ खाया न पिया, उनकी बाट देखती रही। अंत में शनिवार को
वह नियमानुकूल संध्या समय घर आये और बाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार तथा कुछ नये मुकदमों आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस
बजे रात तक होता रहा। गाँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे
आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे! किसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठी। एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा-भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुँह सँभाल कर
बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायेगा।
बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर से साक्षी दी-हाँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मुँह लगें।
लालबिहारी-वह बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं हैं। श्रीकंठ ने चिंतित स्वर से पूछा-आखिर बात क्या हुई ?
लालबिहारी ने कहा-कुछ भी नहीं; यों ही आप ही आप उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोगों को कुछ समझतीं ही नहीं।
श्रीकंठ खा-पी कर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा-चित्त तो प्रसन्न है।
श्रीकंठ बोले-बहुत प्रसन्न है। पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा है ?
आनंदी की त्योरियों पर बल पड़ गये, झुँझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी। बोली-जिसने तुमसे यह आग लगायी है, उसे पाऊँ, तो मुँह झुलस दूँ।
श्रीकंठ-इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कहो।
आनंदी-क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है ! नहीं तो गँवार छोकरा, जिसको चपरासगिरी करने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर यों न अकड़ता।
श्रीकंठ-सब हाल साफ-साफ कहो, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं।
आनंदी-परसों तुम्हारे लाड़ले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हाँड़ी में पाव-भर से अधिक न था। वह सब मैंने मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा-दाल में घी क्यों
नहीं है। बस, इसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा-मुझसे न रहा गया। मैंने कहा कि वहाँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते हैं, और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी
बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊँ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाये। उसी से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है या झूठ।
श्रीकंठ की आँखें लाल हो गयीं। बोले-यहाँ तक हो गया, इस छोकरे का यह साहस !
आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी क्योंकि आँसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान और शंात पुरुष थे। उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था; स्त्रियों के आँसू पुरुषों
की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं। रात भर करवटें बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रातःकाल अपने बाप के पास जाकर बोले-दादा, अब इस घर में
मेरा निबाह न होगा।
इस तरह की विद्रोहपूर्ण बातें कहने पर श्रीकंठ ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को आड़े हाथों लिया था; परन्तु दुर्भाग्य, आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने मुँह से कहनी पड़ीं; दूसरों को
उपदेश देना भी कितना सहज है।
बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले-क्यों ?
श्रीकंठ-इसलिए कि मुझे भी अपनी मान-प्रतिष्ठा का कुछ विचार है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर-सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर
चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा, घर पर रहता नहीं। यहाँ मेरे पीछे स्त्रियों पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तक चिन्ता नहीं। कोई एक की दो कह ले, वहाँ तक मैं
सह सकता हूँ किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम न मारूँ।
बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे सके। श्रीकंठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देख कर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया। केवल इतना ही बोला-बेटा, तुम बुद्धिमान हो कर ऐसी
बातें करते हो ? स्त्रियाँ इस तरह घर का नाश कर देती हैं। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।
श्रीकंठ-इतना मैं जानता हूँ, आपके आशीर्वाद से ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझाने से, इसी गाँव में कई घर सँभल गये, पर जिस स्त्री की मान-प्रतिष्ठा
का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता हूँ, उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत् व्यवहार मुझे असह्य है। आप सच मानिए, मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड
नहीं देता।
अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बातें और न सुन सके। बोले-लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब कभी भूल-चूक हो, उसके कान पकड़ो लेकिन …
श्रीकंठ-लालबिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता।
बेनीमाधव सिंह-स्त्री के पीछे ?
श्रीकंठ-जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।
दोनों कुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे। लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसी बीच में गाँव के
और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने वहाँ आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने को तैयार है, तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर
वाणियाँ सुनने के लिए उनकी आत्माएँ तिलमिलाने लगीं। गाँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे-श्रीकंठ अपने
बाप से दबता है, इसीलिए वह दब्बू है। उसने विद्या पढ़ी, इसलिए वह किताबों का कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकी मूर्खता है। इन
महानुभावों की शुभकामनाएँ आज पूरी होती दिखायी दीं। कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखाने आ कर बैठ गया। बेनीमाधव सिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को
ताड़ गये। उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछ ही क्यों न हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा। तुरंत कोमल शब्दों में बोले-बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तुम्हारा जो जी चाहे
करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।
इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथकंडों की उसे क्या खबर ? बाप ने जिस
मतलब से बात पलटी थी, वह उसकी समझ में न आयी। बोला-लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।
बेनीमाधव-बेटा, बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो कुछ भूल हुई, उसे तुम बड़े हो कर क्षमा करो।
श्रीकंठ-उसकी इस दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वही घर में रहेगा, या मैं ही। आपको यदि वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना भार आप सँभाल लूँगा।
यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहाँ चाहे चला जाये। बस यह मेरा अंतिम निश्चय है।
लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत आदर करता था। उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर
बैठ जाय, हुक्का पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह इतना मान न करता था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह
इलाहाबाद से आते, तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्योढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल
में पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित हो कर अखाड़े में ही जाकर उसे गले से लगा लिया था, पाँच रुपये के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हृदय-विदारक बात सुन कर
लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह फूट-फूट कर रोेने लगा। इसमें संदेह नहीं कि अपने किये पर पछता रहा था। भाई के आने से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ
भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सम्मुख कैसे जाऊँगा, उनसे कैसे बोलूँगा, मेरी आँखें उनके सामने कैसे उठेंगी। उसने समझा था कि भैया मुझे बुला कर समझा देंगे। इस आशा के विपरीत
आज उसने उन्हें निर्दयता की मूर्ति बने हुए पाया। वह मूर्ख था। परंतु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ उसे अकेले में बुला कर दो-चार बातें कह
देते; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित् उसे इतना दुःख न होता; पर भाई का यह कहना कि अब मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया। वह
रोता हुआ घर आया। कोठरी में जाकर कपड़े पहने, आँखें पोंछीं, जिससे कोई यह न समझे कि रोता था। तब आनंदी के द्वार पर आकर बोला-भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे
साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा। मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।
यह कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।
4
जिस समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ा था, उसी समय श्रीकंठ सिंह भी आँखें लाल किये बाहर से आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से आँखें फेर लीं, और
कतरा कर निकल गये। मानो उसकी परछाईं से दूर भागते हों।
आनंदी ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी। वह स्वभाव से ही दयावती थी। उसे इसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इतनी बढ़ जायगी। वह मन
में अपने पति पर झुँझला रही थी कि यह इतने गरम क्यों होते हैं। उस पर यह भय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझसे इलाहाबाद चलने को कहें, तो कैसे क्या करूँगी। इस बीच में जब
उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूँ, मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, क्षमा करना, तो उसका रहा-सहा क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का
मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकंठ को देख कर आनंदी ने कहा-लाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।
श्रीकंठ-तो मैं क्या करूँ ?
आनंदी-भीतर बुला लो। मेरी जीभ में आग लगे। मैंने कहाँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ-मैं न बुलाऊँगा।
आनंदी-पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।
श्रीकंठ न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर कहा-भाभी, भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते। इसलिए मैं भी अपना मुँह उन्हें न दिखाऊँगा।
लालबिहारी इतना कह कर लौट पड़ा। और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदी कमरे से निकली और उसका हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और आँखों में
आँसू भरे बोला-मुझे जाने दो।
आनंदी-कहाँ जाते हो ?
लालबिहारी-जहाँ कोई मेरा मुँह न देखे।
आनंदी-मैं न जाने दूँगी ?
लालबिहारी-मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आनंदी-तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।
लालबिहारी-जब तक मुझे यह न मालूम हो जाय कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।
आनंदी-मैं इश्वर को साक्षी दे कर कहती हूँ कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अब श्रीकंठ का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आ कर लालबिहारी को गले लगा लिया। दोनों भाई खूब फूट-फूटकर रोये। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा-भैया, अब कभी मत कहना कि
तुम्हारा मुँह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।
श्रीकंठ ने काँपते हुए स्वर से कहा-लल्लू ! इन बातों को बिलकुल भूल जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा अवसर न आवेगा।
बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देख कर आनंद से पुलकित हो गये। बोल उठे-बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।
गाँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा-‘बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।’
























