Tuesday, March 31, 2026
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कुछ हासिल करना हो तो आपको सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलना पड़ता है

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कहते हैं कि माँ बच्चे की प्रथम गुरु होती है, बच्चे में अपनी छाया खोज लेती है मगर कुछ मांएँ ऐसी भी होती हैं जो बच्चे के साथ अपना अस्तित्व भी निखार लेती हैं। मातृत्व उनके लिए ठहराव नहीं होता, मातृत्व उनके लिए बंधन भी नहीं होता, वह बच्चे के साथ अपनी अलग पहचान बना लेती हैं। नवनीत प्रिया लोढ़ा ऐसी ही माँ हैं जिन्होंने अपने बेटे प्रखर के साथ आत्मरक्षा की कला कराटे सीखी और आज कई प्रतियोगिताएँ जीत चुकी हैं। प्रिया एक कुशल ग्राफिक डिजाइनर भी हैं जो कई कम्पनियों के साथ काम कर चुकी हैं। अपराजिता आपसे इस बार नवनीत प्रिया लोढ़ा की मुलाकात करवा रही है और नवनीत की कहानी उनकी जुबानी पेश कर रही है –

ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर बहुत काम किए हैं

मैं पेशेवर ग्राफिक डिजाइनर हूँ। वेब मीडिया और प्रिंट मीडिया में ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर बहुत काम किए हैं। ऑनलाइन प्रोमो तैयार किए हैं जिनमें 2 डी एनिमेशन से लेकर किताबें, ब्रोशियर, बैनर, होर्डिंग्स की डिजाइनिग भी शामिल है। यहाँ तक कि बेटे के जन्म के एक दिन पहले तक मैंने नौकरी की है। अरीना मल्टीममीडिया और 123 इंडिया समेत कई कम्पनियों के साथ भी मैंने काम किया है।

मैं तभी काम कर पाती थी, जब मेरा बेटा सो रहा होता था

अगर अनुभवों की बात करूँ तो शुरु में फ्रीलांस करते समय बहुत हताशा का माहौल रहा क्योंकि जिन लोगों के साथ काम करती थी, उनको तुरंत काम चाहिए था। यह सम्भव नहीं था। मैं तभी काम कर पाती थी, जब मेरा बेटा सो रहा होता था। दिन भर की घरेलू जिमम्मेदारियों के साथ कई बार रात भर जाग कर भी काम करती थी। दरअसल डिजाइनिंग का जुनून ऐसा था कि रात को जगकर काम करने में भी दिक्कत नहीं होती थी।

बेटे की कराटे क्लास में जाकर फिर सपना जाग उठा

जब दसवीं कक्षा में थी तो कराटे हमारी आत्मरक्षा से संबंधित गतिविधियों में शामिल था। मेरी रुचि शुरू से ही थी मगर परिवार का सहयोग तब नहीं मिला इसलिए कोर्स पूरा नहीं कर सकी और बाद में अपनी पढ़ाई को लेकर व्यस्त हो गयी। मेरा बेटा जब साढ़े 3 साल का हो गया तो मैंने उसे कराटे सिखाने के बारे में सोचा जो उसके शारीरिक व मानसिक विकास में सहायक होता। तब दूसरे अभिभावकों की तरह मुझे भी कक्षा खत्म होने तक वहीं बैठकर इंतजार करना पड़ता था मगर यही वह समय था जब मुझे लगा कि किशोरावस्था में छूटे अपने उस सपने को पूरा कर सकूँ। बहुत बार सोचती थी कि मैं भी दाखिला ले लूँ मगर कक्षा में सिर्फ बच्चे ही थे। आखिरकार 2013 में मैंने इन्स्ट्रकर से इस बारे में पूछा और अनुमति माँगी। वे बहुत सकारात्मक थे और मेरा दाखिला कराटे की कक्षा में हो गया।

कुछ हासिल करना हो तो आपको सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलना पड़ता है

मेरे पति राजीव लोढ़ा और मेरी ससुरालवालों ने मेरा साथ दिया। यह आसान नहीं था। शुरु – शुरू में शरीर में काफी दर्द होता था जबकि मेरे प्रशिक्षक ने मेरे लिए कक्षा में अलग व्यवस्था की थी मगर एक समय ऐसा था कि एक साथ बहुत पत्नी, माँ और प्रोफेशनल होने की जिम्मेदारियाँ मेरे लिए निभाना बहुत मुश्किल था। इस पर अतिरिक्त समय निकालना बहुत कठिन था मगर कुछ हासिल करना हो तो आपको सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलना पड़ता है।

मेरे बेटे प्रखर ने कई चैम्पियनशिप जीती हैं

मैंने ऑल इंडिया शेईशिनकाईशितोरुयू कराटे डू फेडरेशन से सीखा है। मेरे बेटे प्रखर ने कई चैम्पियनशिप जीती हैं जिसमें एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट भी शामिल है। मैंने कराटे एसोसिएशन ऑफ बंगाल द्वारा राज्य स्तर पर आयोजित प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता।

मेरा बेटा मुझे सुपरमॉम कहता है

मातृत्व ने मेरा जीवन बहुत बदला है और अगर आप मुझे अचीवर कहते हैं तो इसका कारण भी यही है कि मैं माँ हूँ। माँ की जिम्मेदारी निभाते हुए मैंने खुद को शक्तिशाली महसूस किया है। मैं अपने बेटे की आँखों में अपने लिए गर्व देखती हूँ तो वह पल मेरे लिए गौरव भरा होता है। मेरा बेटा मुझे सुपरमॉम कहता है।

महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 10 गुना काम करने की क्षमता रखती हैं

मैंने हमेशा से समय प्रबंधन पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया है और एक साथ बहुत सारे काम करती थी। कहीं पढ़ा था कि एक साथ कई चीजें सम्भालना आपकी दक्षता को बढ़ाता है और आप बहुत कुछ सीख सकते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में 10 गुना काम करने की क्षमता रखती हैं और मैं इसमें विश्वास रखती हूँ। शायद यही वजह थी कि मैं एक गृहिणी के साथ ग्राफिक डिजाइनर की जिम्मेदारी भी निभा सकी।

समस्याओं से अधिक अपनी क्षमताओं और जिम्मेदारियों को पहचानें

मैं सभी महिलाओं और लड़कियों से कहना चाहूँगी कि वे अपनी समस्याओं से अधिक अपनी क्षमताओं और जिम्मेदारियों को पहचानें। महिलाओं में क्षमता होने का मतलब है समाज में क्षमता होना।

 

 

बातें करती हैं, मन खोलिए, भागीदारी बढ़ाइए, आपकी जरूरत है

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त्योहारों का मौसम दस्तक दे चुका है मगर विवादों का मौसम साल भर छाया रहता है। मित्रता दिवस और रक्षाबंधन सप्ताह की शुरुआत में ही आ गए मगर देश के भाईचारे और मैत्री में नए सिरे से जान फूँकने की जरूरत पड़ रही है। त्योहार आ गये मतलब गृहिणियों की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ गयीं और वे बगैर किसी शिकायत के मन में तमाम असंतोष समेटे एक बार फिर खुशियों का स्वागत करने को तत्पर हैं। अपने लिए वक्त निकालना है या उनका कोई जीवन है, उनकी कोई जरूरत है, उनकी सहेलियाँ हैं, ये सब गृहस्थी की गाड़ी के पहिए में पिस जाता है। न वे मुँह खोलती हैं और न ही मन, एक अनजाना सा डर हमेशा उनका पीछा रहता है और सुपर मॉम बनाने के चक्कर में अपना चैन गँवा देती हैं। एक बार रुककर सोचिए तो ये खामोशी क्या सचमुच आपकी गृहस्थी को सुरक्षित रखेगी? क्या एक बड़ी वजह नहीं है कि आपकी कुंठा, आपका फ्रस्टेशन आपका परिवार, आपके बच्चे ही नहीं आपके विद्यार्थियों और और कर्मचारियों से लेकर सहयोगियों पर उतरता है। ये वही लोग हैं, जिनके लिए आप सब कुछ भूलकर जान दे रही हैं। अगर कोई आपसे बात करना चाहे तो आप कुछ नहीं या तुम नहीं समझोगे, कहकर बात टाल देती हैं। घर और बाहर का हर बोझ, शहीदों की तरह अपने कन्धे पर उठाए घूम रही हैं, सिर्फ इसलिए कि आपकी छवि अच्छी बनी रहे। अब सोचिए, क्या आपको आपकी जरूरत नहीं है, क्या आप खुद पर अन्याय करके या अन्याय सह कर, खामोश रहकर हर समाधान निकाल लेंगी। आपके दोस्त आपके आस – पास हैं, ये वहीं हैं, जिनसे आप हमेशा बातें करती हैं मगर सिर्फ काम की बातें करती हैं। दोस्त आपकी जिन्दगी से गायब होते जा रहे हैं। रुकिए, बातों के साथ मन खोलिए, क्या पता आप जो सोच रही हों, आप जिन बातों से परेशान हो, उसका कोई हल इन बातों में मिल जाए। सासू माँ को चाय पिलानी हो तो उनके साथ गप भी मारी जा सकती है। पति को बेड टी देना हो तो वह टहलते हुए भी किया जा सकता है और तब तक थोड़ी देर के लिए बच्चों को उनके साथ छोड़ा भी जा सकता है। बरतन रखते समय बेटी को शामिल किया जा सकता है और वॉशिंग मशीन सम्भालने की जिम्मेदारी बेटे को भी दी जा सकती है। मोबाइल का बिल भाई भी दे सकता है और केरोसिन की कतार में आपके जेठ जी भी खड़े हो सकते हैं। आप बाजार अपनी जेठानी और देवरानी के साथ भी जा सकती हैं और उनके साथ गोलगप्पे भी खा सकती हैं। हर रविवार आधे घंटे अपनी सहेलियों के साथ बातें करें, ध्यान लगाएं। मोहल्ले की औरतों के साथ अंताक्षरी खेलें और किसी सामाजिक गतिविधि से जुड़ें मगर ये सिर्फ आप ही कर सकती हैं। बातें करती रहती हैं, इस बार जरा मन भी खोल लीजिए। इस स्वाधीनता दिवस पर खुद को कुंठाओं और बंधनों से आजाद कीजिए और समाज में अपनी भागीदारी बढ़ाइए। अनुभव ही होगा, अच्छा न हुआ तो बुरा ही होगा मगर आप खुद को महसूस करेंगी। संवाद की जरूरत है हमें, हमारे देश को, हमारी राजनीति को, मोदी को राहुल को, नीतिश को, लालू को मगर संवाद के बाद सीमा में बंधने की नहीं बाँध देने की जरूरत है वैसे ही जैसे हमारी सेना चीन और पाकिस्तान को बाँध देने के लिए तत्पर है। व्यक्ति से समाज बनता है और आप मशीन नहीं, एक व्यक्ति हैं, इसे स्वीकार कीजिए, समस्याएँ तो बस चुटकी में सुलझ जाएँगी। अपराजिता की ओर से सारे मित्रों और सारी सखियों को मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, स्वतन्त्रता दिवस पर जय भारत।

बारिश की रिमझिम का आनंद बढाए चीला लाजवाब

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चना दाल चीला

सामग्री – 2 कप भिगोई हुई चना दाल, 1 कप बारीक कटी पालक, 1 कप कद्दूकस किया हुआ खीरा, 1 कद्दूकस की हुई गाजर, 2-3 हरी मिर्च, 1 इंच अदरक का टुकड़ा, 1 बड़ा चम्मच ईनो फ्रूट साल्ट, 4 बड़ा चम्मच दही, स्वादानुसार नमक, आवश्वयकतानुसार तेल

विधि – सबसे पहले गाजर को निचोड़कर इसका पानी निकाल दें। इसके बाद ग्राइंडर में चना दाल, मिर्च, अदरक डालकर पीस लें। अगर मिश्रण ज्यादा गाढ़ा हो तो इसमें थोड़ा सा पानी डाल लें। दाल के पेस्ट को एक बर्तन में निकाल लें. इसमें पालक, गाजर और खीरा मिला लें।   जब चीले बनाने हों तो इस पेस्ट में दही, नमक और इनो डालकर अच्छी तरह मिला लें। मध्यम आंच पर नॉन स्टिक तवा गरम होने के लिए रखें. जब यह गरम हो जाए तो इसमें कुछ बूंदें तेल डाल लें। इसके बाद एक कड़ही मिश्रण डालकर इसे मीडियम आंच पर पकाएँ। जब एक साइड यह सुनहरा हो जाए तो इसे पलटकर दूसरी तरफ भी सेंक लें।  इसी तरह सारे चीले बना ले। हरी चटनी या टोमैटो सॉस के साथ इन्हें खाएं और दूसरों को भी खिलाएं।

 

 

 

बेसन और पालक चीला

 

सामग्री – तीन कप बेसन, डेढ़ कप बारीक कटा पालक, आधा कप बारीक कटा प्याज, बारीक कटी हरी मिर्च, चटनी, एक चम्मच साबूत धनिया, आधा चम्मच लाल मिर्च, आधा चम्मच जीरा पाउडर, आधा चम्मच कसूरी मेथी, आधा चम्मच अजवाइन, नमक स्वादानुसार, पानी आवश्यकतानुसार, तलने के लिए तेल।

सजावट के लिए

विधि -टमाटर व खीरा. दही और नींबू के अचार या स्प्राउट्स के साथ सर्व करें। सभी सामग्रियों को बर्तन में डालकर मिलाएं और गाढ़ा घोल तैयार करें। नॉनस्टिक तवे पर तेल गर्म करें और आधा कप घोल डालकर चम्मच से फैलाएं। आंच तेज करके किनारे-किनारे से तेल डालें और हल्के भूरे रंग तक रोस्ट करें. पलटकर फिर पकाएं। इसे प्लेट पर परोसकर टमाटर व खीरे से गार्निश करें और दही व चटनी, नींबू के अचार या स्प्राउट्स और कॉफी के साथ सर्व करें।

 

 

 

 

गोस्वामी तुलसीदास की कुछ रचनाएँ

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तुलसी के दोहे

श्री राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर ।

ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरू तुलसी तोर।1।

सीता लखन समेत प्रभु सेाहत तुलसीदास।
हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास।2।

पंचवटी बट बिटप तर सीता लखन समेत।
सोहत तुलसीदास प्रभु सकल सुमंगल देत।3।

श्री चित्रकूट सब िदन बसत प्रभु सिय लखन समेत।
राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत।4।

पय अहार फल खाइ जपु राम नाम षट मास।
सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ।5।

राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।6।

हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम।
मनहुँ पुरट संपुट लसत लसत तुलसी ललित ललाम।7।

सगुल ध्यान रूचि सरस नहिं निर्गुन मन में दूरि।
तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि।8।

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।9।

नाम राम केा अंक है सब साधन हैं सून।
अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून।10।

 

 

अब लौं नसानी, अब न नसैहों

अब लौं नसानी, अब न नसैहों।

रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं॥

पायो नाम चारु चिंतामनि उर करतें न खसैहौं।

स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं॥

परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन निज बस ह्वै न हँसैहौं।

मन मधुपहिं प्रन करि, तुलसी रघुपति पदकमल बसैहौं॥

 

मन पछितैहै अवसर बीते

मन पछितैहै अवसर बीते।

दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु, करम, बचन अरु हीते॥१॥

सहसबाहु, दसबदन आदि नप बचे न काल बलीते।

हम हम करि धन-धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥२॥

सुत-बनितादि जानि स्वारथरत न करु नेह सबहीते।

अंतहु तोहिं तजेंगे पामर! तू न तजै अबहीते॥३॥

अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़, त्यागु दुरासा जीते।

बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ, बिषयभोग बहु घी ते॥४

बड़े घर की बेटी

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 मुंशी प्रेमचन्द

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल
थी, उन्हीं की कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं, इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ शेष न रहा था; पर दूध
शायद बहुत देती थी; क्योंकि एक न एक आदमी हाँड़ी लिये उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी
वर्तमान आय एक हजार रुपये वार्षिक से अधिक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी. ए. की डिग्री प्राप्त
की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लालबिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था। भरा हुआ मुखड़ा, चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सबेरे पी
जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी। इन नेत्रप्रिय गुणों को उन्होंने बी. ए.-इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर कर दिया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे
को कांतिहीन बना दिया था। इसी से वैद्यक ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वैदिक औषधियों पर उनका अधिक विश्वास था। शाम-सबेरे से उनके कमरे से प्रायः खरल की सुरीली
कर्णमधुर ध्वनि सुनायी दिया करती थी। लाहौर और कलकत्ते के वैद्यों से बड़ी लिखा-पढ़ी रहती थी।
श्रीकंठ इस अँगरेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी अँगरेजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे। बल्कि वह बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। इसी से गाँव
में उनका बड़ा सम्मान था। दशहरे के दिनों में वह बड़े उत्साह से रामलीला में सम्मिलित होते और स्वयं किसी न किसी पात्रा का पार्ट लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे।
प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगान उनकी धार्मिकता का प्रधान अंग था। सम्मिलित कुटुम्ब के तो वह एकमात्र उपासक थे। आजकल स्त्रियों को कुटुम्ब में मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि
होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गाँव की ललनाएँ उनकी निंदक थीं। कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न
करती थीं। स्वयं उनकी पत्नी को ही इस विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि से घृणा थी, बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत
कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके, तो आये-दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी खिचड़ी अलग पकायी जाये।
आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेटी,
और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यहाँ विद्यमान थे। नाम था भूपसिंह। बड़े उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे, पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी न था।
सात लड़कियाँ हुईं और दैवयोग से सब-की-सब जीवित रहीं। पहली उमंग में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोल कर किये; पर पंद्रह-बीस हजार रुपयों का कर्ज सिर पर हो गया, तो आँखें
खुलीं, हाथ समेट लिया। आनंदी चौथी लड़की थी। वह अपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर संतान को कदाचित्
उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसका विवाह कहाँ करें ? न तो यही चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न यही स्वीकार था कि उसे अपने
को भाग्यहीन समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ उनके पास किसी चंदे का रुपया माँगने आया। शायद नागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम से श्रीकंठ
सिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया।
आनंदी अपने नये घर में आयी, तो यहाँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहाँ नाम-मात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का तो
कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी स्लीपर साथ लायी थी, पर यहाँ बाग कहाँ। मकान में खिड़कियाँ तक न थीं। न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें। यह
एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थ का मकान था, किन्तु आनंदी ने थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानो उसने विलास के सामान कभी देखे ही न
थे।
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एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला-जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है। आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह
नया व्यंजन बनाने बैठी। हाँड़ी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक न था। बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाने। उसने सब घी मांस में डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी
न था, बोला-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा ?
आनंदी ने कहा-घी सब मांस में पड़ गया। लालबिहारी जोर से बोला-अभी परसों घी आया है। इतना जल्द उठ गया ?
आनंदी ने उत्तर दिया-आज तो कुल पाव-भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस में डाल दिया।
जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है-उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक
कर बोला-मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो !
स्त्री गालियाँ सह लेती है, मार भी सह लेती है; पर मैके की निंदा उससे नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली-हाथी मरा भी, तो नौ लाख का। वहाँ इतना घी नित्य नाई-कहार खा
जाते हैं।
लालबिहारी जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और बोला-जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।
आनंदी को भी क्रोध आ गया। मुँह लाल हो गया, बोली-वह होते तो आज इसका मजा चखाते।
अब अपढ़, उजड्ड ठाकुर से न रहा गया। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटी थी। जब जी चाहता, उस पर हाथ साफ कर लिया करता था। खड़ाऊँ उठाकर आनंदी की ओर जोर से
फेंकी, और बोला-जिसके गुमान पर भूली हुई हो, उसे भी देखूँगा और तुम्हें भी।
आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सिर बच गया। पर उँगली में बड़ी चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भाँति काँपती हुई अपने कमरे में आ कर खड़ी हो गयी। स्त्री का बल
और साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घंमड होता है। आनंदी खून का घूँट पी कर रह गयी।
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श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे। बृहस्पति को यह घटना हुई थी। दो दिन तक आनंदी कोप-भवन में रही। न कुछ खाया न पिया, उनकी बाट देखती रही। अंत में शनिवार को
वह नियमानुकूल संध्या समय घर आये और बाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार तथा कुछ नये मुकदमों आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस
बजे रात तक होता रहा। गाँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे
आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे! किसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठी। एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा-भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुँह सँभाल कर
बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायेगा।
बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर से साक्षी दी-हाँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मुँह लगें।
लालबिहारी-वह बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं हैं। श्रीकंठ ने चिंतित स्वर से पूछा-आखिर बात क्या हुई ?
लालबिहारी ने कहा-कुछ भी नहीं; यों ही आप ही आप उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोगों को कुछ समझतीं ही नहीं।
श्रीकंठ खा-पी कर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा-चित्त तो प्रसन्न है।
श्रीकंठ बोले-बहुत प्रसन्न है। पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा है ?
आनंदी की त्योरियों पर बल पड़ गये, झुँझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी। बोली-जिसने तुमसे यह आग लगायी है, उसे पाऊँ, तो मुँह झुलस दूँ।
श्रीकंठ-इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कहो।
आनंदी-क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है ! नहीं तो गँवार छोकरा, जिसको चपरासगिरी करने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर यों न अकड़ता।
श्रीकंठ-सब हाल साफ-साफ कहो, तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं।
आनंदी-परसों तुम्हारे लाड़ले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हाँड़ी में पाव-भर से अधिक न था। वह सब मैंने मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा-दाल में घी क्यों
नहीं है। बस, इसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा-मुझसे न रहा गया। मैंने कहा कि वहाँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते हैं, और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी
बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊँ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाये। उसी से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच है या झूठ।
श्रीकंठ की आँखें लाल हो गयीं। बोले-यहाँ तक हो गया, इस छोकरे का यह साहस !
आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी क्योंकि आँसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान और शंात पुरुष थे। उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था; स्त्रियों के आँसू पुरुषों
की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं। रात भर करवटें बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रातःकाल अपने बाप के पास जाकर बोले-दादा, अब इस घर में
मेरा निबाह न होगा।
इस तरह की विद्रोहपूर्ण बातें कहने पर श्रीकंठ ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को आड़े हाथों लिया था; परन्तु दुर्भाग्य, आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने मुँह से कहनी पड़ीं; दूसरों को
उपदेश देना भी कितना सहज है।
बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले-क्यों ?
श्रीकंठ-इसलिए कि मुझे भी अपनी मान-प्रतिष्ठा का कुछ विचार है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर-सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर
चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा, घर पर रहता नहीं। यहाँ मेरे पीछे स्त्रियों पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तक चिन्ता नहीं। कोई एक की दो कह ले, वहाँ तक मैं
सह सकता हूँ किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम न मारूँ।
बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे सके। श्रीकंठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देख कर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह गया। केवल इतना ही बोला-बेटा, तुम बुद्धिमान हो कर ऐसी
बातें करते हो ? स्त्रियाँ इस तरह घर का नाश कर देती हैं। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।
श्रीकंठ-इतना मैं जानता हूँ, आपके आशीर्वाद से ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझाने से, इसी गाँव में कई घर सँभल गये, पर जिस स्त्री की मान-प्रतिष्ठा
का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता हूँ, उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत् व्यवहार मुझे असह्य है। आप सच मानिए, मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड
नहीं देता।
अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये। ऐसी बातें और न सुन सके। बोले-लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब कभी भूल-चूक हो, उसके कान पकड़ो लेकिन …
श्रीकंठ-लालबिहारी को मैं अब अपना भाई नहीं समझता।
बेनीमाधव सिंह-स्त्री के पीछे ?
श्रीकंठ-जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।
दोनों कुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे। लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसी बीच में गाँव के
और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने वहाँ आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ पत्नी के पीछे पिता से लड़ने को तैयार है, तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर
वाणियाँ सुनने के लिए उनकी आत्माएँ तिलमिलाने लगीं। गाँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे-श्रीकंठ अपने
बाप से दबता है, इसीलिए वह दब्बू है। उसने विद्या पढ़ी, इसलिए वह किताबों का कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकी मूर्खता है। इन
महानुभावों की शुभकामनाएँ आज पूरी होती दिखायी दीं। कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखाने आ कर बैठ गया। बेनीमाधव सिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को
ताड़ गये। उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछ ही क्यों न हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा। तुरंत कोमल शब्दों में बोले-बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तुम्हारा जो जी चाहे
करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।
इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथकंडों की उसे क्या खबर ? बाप ने जिस
मतलब से बात पलटी थी, वह उसकी समझ में न आयी। बोला-लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।
बेनीमाधव-बेटा, बुद्धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो कुछ भूल हुई, उसे तुम बड़े हो कर क्षमा करो।
श्रीकंठ-उसकी इस दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वही घर में रहेगा, या मैं ही। आपको यदि वह अधिक प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं अपना भार आप सँभाल लूँगा।
यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहाँ चाहे चला जाये। बस यह मेरा अंतिम निश्चय है।
लालबिहारी सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत आदर करता था। उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर
बैठ जाय, हुक्का पी ले या पान खा ले। बाप का भी वह इतना मान न करता था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह
इलाहाबाद से आते, तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्योढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल
में पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित हो कर अखाड़े में ही जाकर उसे गले से लगा लिया था, पाँच रुपये के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हृदय-विदारक बात सुन कर
लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह फूट-फूट कर रोेने लगा। इसमें संदेह नहीं कि अपने किये पर पछता रहा था। भाई के आने से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ
भैया क्या कहते हैं। मैं उनके सम्मुख कैसे जाऊँगा, उनसे कैसे बोलूँगा, मेरी आँखें उनके सामने कैसे उठेंगी। उसने समझा था कि भैया मुझे बुला कर समझा देंगे। इस आशा के विपरीत
आज उसने उन्हें निर्दयता की मूर्ति बने हुए पाया। वह मूर्ख था। परंतु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ उसे अकेले में बुला कर दो-चार बातें कह
देते; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित् उसे इतना दुःख न होता; पर भाई का यह कहना कि अब मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया। वह
रोता हुआ घर आया। कोठरी में जाकर कपड़े पहने, आँखें पोंछीं, जिससे कोई यह न समझे कि रोता था। तब आनंदी के द्वार पर आकर बोला-भाभी, भैया ने निश्चय किया है कि वह मेरे
साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा। मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।
यह कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।
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जिस समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ा था, उसी समय श्रीकंठ सिंह भी आँखें लाल किये बाहर से आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से आँखें फेर लीं, और
कतरा कर निकल गये। मानो उसकी परछाईं से दूर भागते हों।
आनंदी ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी। वह स्वभाव से ही दयावती थी। उसे इसका तनिक भी ध्यान न था कि बात इतनी बढ़ जायगी। वह मन
में अपने पति पर झुँझला रही थी कि यह इतने गरम क्यों होते हैं। उस पर यह भय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझसे इलाहाबाद चलने को कहें, तो कैसे क्या करूँगी। इस बीच में जब
उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूँ, मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, क्षमा करना, तो उसका रहा-सहा क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का
मैल धोने के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकंठ को देख कर आनंदी ने कहा-लाला बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।
श्रीकंठ-तो मैं क्या करूँ ?
आनंदी-भीतर बुला लो। मेरी जीभ में आग लगे। मैंने कहाँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ-मैं न बुलाऊँगा।
आनंदी-पछताओगे। उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।
श्रीकंठ न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर कहा-भाभी, भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते। इसलिए मैं भी अपना मुँह उन्हें न दिखाऊँगा।
लालबिहारी इतना कह कर लौट पड़ा। और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदी कमरे से निकली और उसका हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और आँखों में
आँसू भरे बोला-मुझे जाने दो।
आनंदी-कहाँ जाते हो ?
लालबिहारी-जहाँ कोई मेरा मुँह न देखे।
आनंदी-मैं न जाने दूँगी ?
लालबिहारी-मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आनंदी-तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।
लालबिहारी-जब तक मुझे यह न मालूम हो जाय कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।
आनंदी-मैं इश्वर को साक्षी दे कर कहती हूँ कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अब श्रीकंठ का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आ कर लालबिहारी को गले लगा लिया। दोनों भाई खूब फूट-फूटकर रोये। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा-भैया, अब कभी मत कहना कि
तुम्हारा मुँह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।
श्रीकंठ ने काँपते हुए स्वर से कहा-लल्लू ! इन बातों को बिलकुल भूल जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा अवसर न आवेगा।
बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देख कर आनंद से पुलकित हो गये। बोल उठे-बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।
गाँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा-‘बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं।’

कोलकाता में अभी मनुष्य बसते हैं

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            शंभुनाथ
मैंने 1970 के दशक में कोलकाता के लेखकों का प्रचंड व्यवस्था-विरोध देखा है, जो अब एक मरती हुई भावना है।हिंदी और बांग्ला लेखकों के बीच तब नमस्कार-भालोबासा कहीं नहीं तो देशी शराब के एक चर्चित अड्डे खलासीटोला में दिख जाता था, जहां दोनों भाषाओं के लेखक आते थे और घुल-मिल जाते थे।
उन बांग्ला लेखकों में अहं नहीं था, नखरे नहीं थे। वे अपनी भाषा और संस्कृति से सदा प्रेम करते रहे हैं, चाहे जितने क्रांतिकारी विचारों के हों। यह प्रेम हिंदी में नहीं दिखता।
एक बार महाश्वेता देवी के लेखक बेटे नवारुण भट्टाचार्य के साथ टैक्सी में घर लौट रहा था। टैक्सी वाले ने उन्हें पहचान लिया। भीड़ में भी लेखक दिखता है, यदि उसके जन सरोकारों में ईमानदारी और निरंतरता हो।  इस दिन मेरा विस्मय और बढ़ा, जब नवारुण ने बताया कि प्रसिद्ध बांग्ला कवि शक्ति चट्टोपाध्याय एक रात 11.30 बजे के करीब कोलकाता की एक सड़क पर नशे में हिलते-डुलते चल रहे थे कि गैरेज की ओर खाली लौटती एक डबल डेकर बस के ड्राइवर ने उन्हें पहचान लिया। इसने उन्हें बस में बैठाया और यह विशाल बस अकेले उन्हें लेकर उनके घर के दरवाजे तक पहुंची।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में लेखक की पहचान दुनिया के अन्य नगरों की तरह कोलकाता में भी धूमिल हुई है। यदि वह राजनीतिज्ञों या फिल्मी अभिनेताओं के साथ खड़ा नहीं है तो उसे कोई नहीं देखता। काफी हाउस के पहले जैसे अड्डे नहीं हैं। लेखक अपने घर से बाहर नहीं निकलते। शहर में हर तरफ रोशनी इतनी ज्यादा है कि आंखें कुछ देख न सकें। खाने-पीने की मस्त दुकानें खुल गई हैं। अब अकेलेपन को महसूस करते हुए टहलने की कोई जगह नहीं है। पहले की तरह भटकन नहीं है, और खोज नहीं है, गंतव्य इतने स्पष्ट हैं।
कोलकाता अब न जुलूसों-प्रदर्शनों से गूंजता राजनीतिक शहर है और न बहसों से उत्तप्त सांस्कृतिक शहर। जुलूसों की जगह अभिजात किस्म के रोड शो हैं। साहित्यिक बहसों की जगह लिटरेरी फेस्टिवल हैं। पिछली फरवरी में ऐसे ही एक फेस्टिवल में आए लेखकों के लिए डिनर का प्रबंध शहर के सबसे महंगे होटल द हयात में था।
वहां से केदारनाथ सिंह, अरुण माहेश्वरी और निर्मला तोदी के साथ मैं अधखाया लौटा था। ज्यादातर लेखक ऐसे थे जो मीडियाकर किस्म के थे। मीडियाकरों का कभी समाज नहीं होता। प्रश्न उठता है, आज लेखक संगठित क्यों नहीं हो पाते हैं? क्या इतना भीषण सामाजिक अंतर्द्वंद्व इसलिए है कि शहर शिकारियों से भरता जा रहा है? यदि आदमी शिकारी नहीं है, तो बस किसी का शिकार है।
कोलकाता में एक समय तर्क का तूफान था, वह बुद्धिवाद का युग था। आज तर्क की जगह जुमले हैं। बुद्धिवाद अब व्यावसायिक बुद्धिवाद और तकनीकी बुद्धिवाद में सीमित हो चुका है। कोलकाता एक व्यावसायिक नगर है, जहां शिक्षा और चिकित्सा में व्यवसाय का सबसे भयंकर रूप है। यह मानवता का एक बड़ा सिरदर्द है। बुद्धिवाद के दीर्घ इतिहास से संबंधविच्छेद का नतीजा है कि एक तरफ अतीत से अंध-राष्ट्रवादी संबंध बना है तो दूसरी तरफ व्यावसायिक मुनाफाखोरी के लिए कुछ सनसनीखेज कहने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
कुछ लोग “अतीतबद्ध राष्ट्रवादी” हैं तो कुछ “अतीतविहीन ग्लोबल” हैं। ये दोनों ही नव-औपनिवेशिक तत्व हैं। क्या महानगर में बुद्धिपोषित महान भाव फिर लौटेंगे? यह सवाल इस शहर के “आत्म” को रि-डिस्कवर करने से जुड़ा है।
यहां की कुछ चीजें खास तौर पर प्रसिद्ध रही हैं — रसगुल्ला, फुटबाल और बुद्धिजीवी। रसगुल्ला अब कैडवरीज की मिठाइयों में डूब गया। फुटबाल के उत्तेजक मैच फीके पड़ गए, मोहन बगान-ईस्ट बंगाल की लड़ाई आइपीएल के मजे में खो गई। बंगाल लोकल है या एकदम ग्लोबल । बुद्धिजीवी महत्वाकांक्षी हो गए हैं। जहां नए मूल्यों का जन्म हुआ, वहां मूल्यबोध अब कोई मुद्दा नहीं है।
कोलकाता के बारे में कहा जाता है कि कोलकाता में अनेक कोलकाता हैं, उनके बीच से अपना कोलकाता ढूंढ़ लेना होता है। यह खास शहर है जहां फिर भी प्रेम और कृतज्ञता का अभी  पूरी तरह अंत नहीं हुआ है। इस शहर ने जिसे पकड़ लिया, वह इसके आकर्षण से बाहर नहीं निकल सका, भले अब यहां बहुत कलह है, हिंसा है और जीवन पहले से ज्यादा असुरक्षित है। सभ्यता की नकाब में हिंसा आदमीयत को ज्यादा खाती है, पर कोलकाता में ऐसे काफी लोग हैं जो अभी इस तरह से सभ्य नहीं हैं। कई शहर मनुष्य की वापसी के इंतजार में हैं, जबकि कोलकाता में अभी मनुष्य बसते हैं।
अब एक खास तरह के शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और लेखकों से कोलकाता खाली-खाली लगता है। वे लोग व्यवस्था में कहीं शरीक होते हुए भी पूरी तरह उसमें डूबे नहीं होते थे। वे  मेहनती थे, जागरूक थे और जोखिम उठाते थे। उन क्रांतिकारी प्रतिरोधों को भूलना आसान नहीं है जो कोलकाता की अविस्मरणीय घटनाएं हैं। नव-उदारवाद ने विभिन्न स्तरों पर सबकुछ निगल लिया — प्यार, गुस्सा, आत्मविश्वास, हार्दिकता। मुक्तिबोध ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि तुम्हारे पास और हमारे पास क्या है, सिर्फ ” ईमान का डंडा है, बुद्धि का बल्लम है,अभय की गेती है, हृदय की तगारी है तसला है– नए-नए बनाने के लिए भवन—आत्मा के, मनुष्य के”। वामपंथी अति-उत्साह में पहले ईमानदारी और समझदारी का संबंधविच्छेद हुआ, ईमानदारी की तुलना में समझदारी ज्यादा जरूरी चीज मानी गई। फिर निर्भयता की जगह वफादारी ने ले ली। निर्भयता और कायरता में कायरता का पलड़ा भारी पड़ता गया। खुदगर्जी पनपी। हृदय का अभाव होता गया। राजनीति के केंद्र में जब गधे आ गए,इन्होंने सब कुछ चरना शुरू कर दिया — प्रेम, गुस्सा,आत्मविश्वास, निर्भयता, हार्दिकता– हर अच्छी चीज। जीवन में “श्रेष्ठ”, “मूल्यप्रवण” और “तर्कसंगत” को बचाने की कोशिशें जब मूर्तियों, स्मारकों के निर्माण और महापुरुषों की छवियों पर माल्यार्पण तक सीमित हो जाती हैं ये महज सांस्कृतिक बाह्याडंबर के चिह्न होते हैं।
कोलकाता में बांग्ला लेखकों के अड्डे घटे हैं। अखबारों में साहित्यिक घटनाओं के लिए जगह सिकुड़ी है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श जैसे मामले नदारद हैं। मीडिया में राजनीतिक खबरों के बाद फिल्म, क्रिकेट, अपराध और एलीट मनोरंजन ही हावी हैं। किसी जमाने में साहित्य की प्रधानता थी। अब लघु पत्रिकाएं हैं और कुछ पत्रिकाओं ने अच्छे प्रकाशन खड़े कर लिए हैं। यह हिंदी में दुर्लभ है। सभी तरफ लेखकों में बिखराव है।
सरकार से लेखकों-कलाकारों के मधुर रिश्ते रखने का चस्का लंबे समय से है। उनका राजनैतिक समायोजन पहले से बढ़ा है। ऐसे ही दृश्य हिंदी में भी हर तरफ हैं। यह अब विरोधों का युग नहीं है, अवसरों की तलाश का समय है। गाय घास खाकर दूध देती है, पर कर्इ लेखक-शिक्षक दूध-मलाई खा कर घास दे रहे हैं। नोटबंदी का ज्यादा असर न हो, नेटबंदी का व्यापक दुष्प्रभाव है। लोग घर में भी हर समय इंटरनेट पर हैं। सारी बौद्धिकता सोशल मीडिया पर खलास हो जाती है। इसने लोगों को असामाजिक बनाया है और लेखकों के सृजनात्मक पंख कतर डाले हैं। यहां भी हिंसा है। कोई शहर राजनैतिक झुंडों से भर जाए, अंध-राष्ट्रवाद का ज्वार हो और साहित्यिक वस्तु भी पुल न हो कर दीवार होती जाए तो यह उस शहर का घृणा में पागल होना है। पहले के पागल कितने अच्छे थे — टोबाटेक सिंह (मंटो),बावनदास (रेणु), जरनैल सिंह (भीष्म साहनी) जैसे पागल! अब ऐसे पागल ढूंढ़े नहीं मिलते।
पार्क स्ट्रीट से लेकर न्यू टाउन तक तुच्छ ही विराट है — विराट भवन, विराट रास्ते, विराट बाजार और विदेशी ब्रांड की वस्तुएं। बेरोजगारी और अपराध का अनंत। ऐसी घड़ियों में शहर अपनी कृतियों से नहीं कृत्रिम सजावटों से पहचाने जाने लगते हैं।
कोलकाता का लंबा इतिहास रह-रह कर पुकारता है। उसमें आधुनिक हिंदी के निर्माण का इतिहास भी है। यहां हिंदी का पहला अखबार छपा। यहां निराला हुए। यहां से “मतवाला”, “विशाल भारत”,”ज्ञानोदय” आदि पत्रिकाएं निकलीं। अब इतिहास कोई न ढोता है और न बनाता है। अपने इतिहास से बाहर निकल रहा है कोलकाता,इतिहास द्वारा बार-बार पुकारा जाता हुआ भी। अकेले शहर कोलकाता में बांग्ला लेखकों के नाम पर जितने पुल,सड़कें और स्मारक हैं, दस राज्यों के हिंदी क्षेत्र में हिंदी साहित्यकारों के नहीं होंगे।
गंगा कोलकाता के इतने करीब बहती है, पर यह शहर भूल चुका है कि गंगा कहां से बहते हुए आती है। वह कभी विभाजित नहीं की जा सकी। उसकी छाती पर नावों की जगह अब बड़े-बड़े जहाज हैं। विलासिता पूर्ण क्रूज हैं — गंगा के फोड़े की तरह। फिर भी जेटी से अब भी कूदते हैं नंग-धड़ंग बच्चे। इन्हें नागार्जुन ने 1984 में हावड़ा के बिचाली घाट से चालीस कवियों के साथ देखा था– बाबा और चालीस कवि!
एक शहर तब मरता है जब बहसें अवरुद्ध हो जाती हैं और लोकतांत्रिक परिसर सिकुड़ जाता है, भले वह आसमान छूते हुए अपनी चौहद्दी का लगातार विस्तार करता जाए। कोलकाता में बहस अब अंग्रेजों के जमाने में बने सटर्डे क्लब, टालीगंज क्लब जैसी लाखों रुपयों की सदस्यता वाली जगहों पर सेलेब्रिटी व्यक्तियों के पैनेल डिस्कशन में खिलखिलाती है। वह वेशकीमती होती है — ग्लैमर भरी। आम तौर पर बहस वहीं संभव है, जहां संवाद बचा हो। अब हर झुंड में श्रोता बन कर आज्ञा पालन में खड़े लोग हैं। तर्क करने वाले को अकेले हो जाना होगा। कोलकाता तब जिंदा रहता है सिर्फ अकेलेपन की पीड़ाओं में और युवा कलरवों में!
कोलकाता ट्राम, हावड़ा पुल और विक्टोरिया मेमोरियल के लिए प्रसिद्ध रहा है और इन सबसे अधिक रवींद्रनाथ ठाकुर के लिए। उन्होंने कहा था, “हृदय भय शून्य हो और सिर हमेशा ऊंचा उठा रहे!”
कोलकाता में निर्भय होकर आत्मसम्मान के साथ आज भी जिया जा सकता है। कहा गया है, “यदि साफ और हरा-भरा शहर देखना हो दिल्ली को देखो। यदि अमीर और एक-दूसरे से बेखबर लोगों का शहर देखना हो तो मुंबई जाओ। यदि हाई-टेक शहर चाहिए तो तुम्हारे लिए बेंगलुरु है, पर यदि ऐसे शहर में जाना चाहते हो जहां आत्मा हो तो कलकत्ता आओ।” आज भी यदि अनजानों के बीच कोई मुसीबत में पड़ जाए, एक न एक अपरिचित का हाथ सहायता के लिए बढ़ जाता है। इस मानव भावना ने ही कोलकाता को जिंदा रखा है।
अमेरिका के कंसास शहर में जब एक अमेरिकी ने दो भारतीयों पर यह कह कर गोली चलाई, “तुम बाहरी हो,अमेरिका से निकल जाओ”, चौबीस साल का एक श्वेत अमेरिकी युवक उन्हें बचाने के लिए बंदूकधारी पर टूट पड़ा था। वह भी गोली से घायल हुआ। उस अमेरिकी युवा का भारतीयों से न मजहब का रिश्ता था और न देश का। यह मानव भावना ट्रंपवाद की जयजयकार के बावजूद संसार में बची है। इसके बिना संसार चल नहीं सकता। इसे सार्वभौमिकता कह कर कोई सभ्यता खोना नहीं चाहेगी। भारत के शहरों में भी “बाहरी” को लेकर घृणा इधर बढ़ी है, पर यह मानव भाव भी है। कोलकाता में भी यह है। यह भाव ही किसी शहर की आत्मा है।
नजीर अकबराबादी के “आदमीनामा” की लाइनें हैं, “यां आदमी पे जान को वारे है आदमी/ और आदमी पे तेग को मारे है आदमी/ पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी/ चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी/ और सुन के जो दौड़ता है वह भी आदमी।” शहर में चीख सुनने पर दौड़े आने की तमीज अभी बची है, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। अपनों की सहायता करने वाले तो हर जगह मिलते हैं। कोलकाता में सदियों की संस्कृति है, अपरिचितों के  विपत्ति में पड़ने पर भी किसी न किसी के अंदर मनुष्य भाव जग जाता है। एक बुरा और बदमाश  आदमी भी तब थोड़ी देर के लिए इन्सान बन जाता है
मेरा जीवन कोलकाता में बीता है। इसलिए मन ऐसा है, “जैसे उड़ि जहाज से पंछी पुनि जहाज पै आवै।” कोलकाता से मैं ज्यादा साल बाहर नहीं रह सका। दिल्ली-आगरा से एक दूसरे शिखर की ओर राह बनाने की जगह अपने घर लौट आया।
अब कोलकाता ऐसा शहर नहीं है, जहां सच के लिए जीने-मरने का पहले-सा जज्बा है। राजनैतिक संकीर्णताओं ने इस शहर में अजनबीपन का बोध बढ़ाया है, लोग मन मार कर  शांतिपूर्वक रहते हैं। आपस में दूरियां बढ़ी हैं, जिसके कारण सृजनात्मकता और विकास दोनों प्रभावित हुए हैं। परिवर्तन की जगह प्रतीकवाद आ गया है। यह “पोस्ट ट्रुथ” का समय है। हर तरफ झूठ की चमचमाहट है। महत्वाकांक्षाओं के लिए मानवीय संबंधों को रौंद डालने का नया रिवाज बन गया है। पहले जहां पेड़ के पक्षी भी पहचानते थे, वहां आसमान इतना सिकुड़ गया है कि अब संकरी होती गई गलियों में चांद दिखाई नहीं देता। भीड़ में लोग इतने बदल गए हैं कि अपनेपन की तलाश की जगह आशाओं में भटकती उदास आखें  होती हैं — कभी कुछ पातीं, कभी कुछ नहीं पातीं।
हर शहर ऐसे हो गए हैं जहां लोग शिवाजी और अफजल खां की तरह मिलते हैं। फिर भी हर शहर में कुछ ऐसा होता है जो मानव भाव को खत्म होने नहीं देता। इतिहास की तेजस्विता मनुष्य की अंत:शक्ति में छिपी होती है। कोलकाता तो मां की गोद की तरह है। यहां गंगा बहती है। इसका हृदय कितना विशाल है, इस पर कितने अधिक पुल हैं!
   ( हिन्दी मासिक ‘सबलोग’ के मार्च 2017   तथा अनहद में प्रकाशित)
(लेखक वरिष्ठ आलोचक, कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर तथा फिलहाल भारतीय भाषा परिषद के निदेशक हैं।)

भारत और जापान दोनों को कवि सूरदास से प्रेरणा लेने की जरूरत 

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कोलकाता – जापान के हिंदी विद्वान प्रो. तेजी सकाता ने भारतीय भाषा परिषद में ‘ब्रज संस्कृति और सूरदास’ पर बोलते हुए कहा कि भारत और जापान शांतिप्रिय देश हैं और दोनों देशों की संस्कृतियाँ प्रेम और भाईचारे पर टिकी हैं। ब्रज संस्कृति ने इस देश में प्रेम का महान आदर्श एक ऐसे समय उपस्थित किया जब इसकी सबसे अधिक जरूरत थी। मैंने गोवर्धन की ब्रजभूमि की पूरी परिक्रमा पैदल की है और सूरदास से बहुत प्रभावित हूँ। वल्लभाचार्य की प्रेरणा से ही सूरदास ने अंधा होने के बावजूद कृष्ण के सौंदर्य का ऐसा वर्णन किया जो आँख वाले भी नहीं कर सकते।  रविप्रभा वर्मन ने उनसे संवाद करते हुए पूछा कि आखिरकार ब्रज संस्कृति ने उन्हें क्यों प्रभावित किया तो इसके जवाब में तेजी सकाता ने कहा कि उन्हें ब्रज भूमि ने ही भारत से प्रेम करना सिखाया। मुख्य अतिथि के रूप में बांग्ला के प्रमुख प्रकाशक सुधांशु शेखर दे ने अपने वक्तव्य में कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सूरदास को अपनी एक कविता में नमन किया है। चैतन्य सूरदास से नौ साल छोटे थे और दोनों ने ही भारत में प्रेम का गान किया।

भारतीय भाषा परिषद विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद का मंच बन रही है, यह कोलकाता के लिए एक गौरव की बात है। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने जापानी विद्वान तेजी सकाता का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी विश्‍व में ऐसे विद्वानों की वजह से प्रचारित और प्रसारित हो रही है। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी ने तेजी सकाता के ब्रज प्रेम और सूरदास के उद्गारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सूरदास ने कृष्ण भक्ति को प्रसारित करने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस संवाद सभा का संचालन श्रीमती बिमला पोद्दार ने किया। मंच पर उपस्थित थे श्री राजीव लोचन कानोड़िया। परिषद के मंत्री नंदलाल शाह पुष्पगुच्छ से सभी अतिथियों का स्वागत किया।

श्वेता मेहता बनी एमटीवी के ‘रोडीज राइजिंग’ की विजेता

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एमटीवी के रियलिटी शो रोडीज राइजिंग की विजेता श्वेता मेहता बन गई हैं। कई हफ्तों तक कड़ी मेहनत करने के बाद आखिरकार नेहा धूपिया की टीम की श्वेता मेहता रोडीज राइजिंग की विजेता बनी। बता दें कि श्वेता का मुकाबला प्रिंस नरुला टीम के बसीर अली से था।

झांसी से शुरू हुआ रोडीज का ये सफर ग्वालियर, आगरा, अमरोहा और पानीपत से होते हुए कुरुक्षेत्र में खत्म हुआ। श्वेता मेहता को विनिंग अमाउंट के तौर पर एक रेनॉल्ट डस्टर कार मिली और साथ ही 5 लाख रुपये इनाम में मिले।

28 साल की श्वेता मेहता एक इंजीनियर हैं। श्वेता जेराई वुमेन फिटनेस मॉडल चैंपियनशिप भी जीत चुकी हैं।

 

शानदार शतक के बाद रेलवे हरमनप्रीत को पदोन्नति देगा

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मुंबई : स्टार बल्लेबाज हरमनप्रीत कौर का इंतजार पदोन्नति और सम्मान कर रहे हैं जिन्होंने आईसीसी महिला विश्व कप के सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया की बेहद मजबूत टीम के खिलाफ शानदार शतक जड़कर भारत को फाइनल में जगह दिलाई।
सेमीफाइनल में 28 साल की इस दायें हाथ की बल्लेबाज ने 115 गेंद में 171 रन की पारी खेली जिससे भारत ने गत चैंपियन आस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में प्रवेश किया जहां उसका सामना आज इंग्लैंड से होगा।

हरमनप्रीत के नियोक्ता पश्चिम रेलवे के मुंबई संभाग ने कहा है कि इस बल्लेबाज ने असाधारण प्रतिभा दिखाई इसलिए उनकी पदोन्नति की सिफारिश रेलवे बोर्ड से की जाएगी।

पश्चिम रेलवे के मुख्य पीआरओ रविंदर भाकर ने कहा, ‘‘निश्चित तौर पर हम पदोन्नति के लिए उसके नाम की सिफारिश रेल मंत्रालय को करेंगे। उसके वापस आने पर हम उसका सम्मान भी करेंगे।’’ उन्होंने बताया कि हरमनप्रीत फिलहाल मुंबई में चीफ आफिस सुपरीटेंडेंट हैं।

भाकर ने कहा, ‘‘जब भी हमारे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, हम उनके नाम की सिफारिश पदोन्नति के लिए करते हैं।’’ मध्य रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी और रेलवे की महिला क्रिकेट टीम चुनने वाली समिति के प्रमुख सुनील उदासी ने कहा कि रेलवे हमेशा अपने खिलाड़ियों का ख्याल रखता है और उन्हें उचित ट्रेनिंग मुहैया कराता है। उन्होंने बताया कि मौजूदा भारतीय राष्ट्रीय टीम में शामिल कप्तान मिताली राज, एकता बिष्ट, पूनम राउत, वेदा कृष्णमूर्ति, पूनम यादव, सुषमा देवी, मोना मेशराम, राजेश्वरी गायकवाड़ और नुजहत परवीन रेलवे से हैं।

 

रामनाथ कोविंद बनेगें देश के अगले राष्ट्रपति

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नयी दिल्ली : राष्ट्रपति चुनाव में राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने 65 फीसदी से अधिक वोट प्राप्त कर जीत दर्ज की। वह देश के 14वें राष्ट्रपति होंगे। वह 25 जुलाई को शपथ ग्रहण करेंगे।

राष्ट्रपति चुनाव के लिये निर्वाचन अधिकारी अनूप मिश्रा ने संवाददाताओं को बताया कि कोविंद को 65 . 65 प्रतिशत मत मिले जबकि विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 34.35 फीसदी वोट मिले। कोविंद ने करीब 31 प्रतिशत मतों के अंतर से मीरा कुमार को पराजित किया । 71 वर्षीय कोविंद दूसरे दलित नेता हैं जो इस शीर्ष संवैधानिक पद को सुशोभित करेंगे । कोविंद को 2930 मत प्राप्त हुए जिसका मूल्य 7,02,044 मत है। उनसे पूर्व के. आर नारायणन दलित समुदाय से देश के पहले राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। कोविंद भाजपा के पहले सदस्य हैं जो राष्ट्रपति निर्वाचित हुए हैं।

मीरा कुमार भी दलित समुदाय से आती हैं और उन्हें 1844 मत प्राप्त हुए जिसका मूल्य 3,67,314 है।

कोविंद को 522 सांसदों के वोट मिले जिसका मूल्य 369576 है जबकि कुमार को 225 सांसदों के मत प्राप्त हुए जिसका मूल्य 159300 है।

राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल में 4,896 मतदाता है जिसमें से 4,120 विधायक और 776 सांसद शामिल हैं। राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद को 702044 मत और विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 367314 मत हासिल हुए हैं। रामनाथ कोविंद ने मीरा कुमार को 3.34 लाख मतों से हराया है।

राष्ट्रपति चुनाव में राज्यवार प्राप्त मतों के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में कोविंद को 22490 और मीरा कुमार को 18867, छत्तीसगढ़ में कोविंद को 6708 एवं मीरा कुमार को 4515, झारखंड में कोविंद को 8976 एवं मीरा को 4576, आंध्र प्रदेश में रामनाथ कोविंद को 27189 और मीरा कुमार को शून्य मत प्राप्त हुए ।

इसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश में कोविंद को 448 एवं मीरा कुमार को 24, असम में कोविंद को 10556 एवं मीरा कुमार को 4060, गोवा में कोविंद को 500 एवं मीरा को 220, गुजरात में कोविंद को 19404 एवं मीरा को 7203 तथा हरियाणा में कोविंद को 8176 एवं मीरा को 1792 मत प्राप्त हुए । हिमाचल प्रदेश में कोविंद को 1530 मत एवं मीरा को 1887 मत, जम्मू एवं कश्मीर में कोविंद को 4032 एवं मीरा को 2160 मत प्राप्त हुए ।

रामनाथ कोविंद को 522 सांसदों का और मीरा कुमार को 225 सांसदों का समर्थन मिला जबकि 21 सांसदों के मत रद्द हो गये हैं।