Thursday, October 1, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 761

हिन्दी मेला…नयी पीढ़ी का मंच और हम सबका ऑक्सीजन

बस एक साल और पूरे 25 साल हो जाएंगे….हिन्दी मेले को। पहली बार आई तो प्रतिभागी के रूप में…सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज में स्नातक की छात्रा थी और अब बतौर पत्रकार 15 साल होने जा रहे हैं और 20 साल हो रहे हैं मेले से जुड़े हुए। इन 20 सालों में उतार –चढ़ाव भी देखे मगर मेला और मेला परिवार हमेशा साथ रहा। सही है कि आज बहुत से लोग जा चुके हैं मगर मेला कल भी मिलवाता था और आज भी मिलवाता आ रहा है…मेले का तो काम ही यही है।

हमारे समय की बड़ी चुनौतियाँ भाषा और अपसंस्कृति तो है ही मगर उससे भी बड़ी चुनौती है युवाओं के साथ तमाम पीढ़ी को एक सृजनात्मक तथा संगठनात्मक राह पर लाना…मैं अपनी बात करूँ तो जब मेले में पहली बार आई तो ऐसे मोड़ पर थी जहाँ कोई राह नहीं सूझ रही थी..बहुत कुछ कहना था…बहुत कुछ करना था मगर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था…कई बार ऐसे मोड़ भी आये….जहाँ लगा कि हर रास्ता बंद हो चुका है…निराश हुई मगर हारी नहीं तो इसके पीछे यह एक मंच था जिसने साहित्य को किताबों से निकालकर जीवन से जोड़ा। हिन्दी मेला ऐसी जगह है जिसने कभी किसी रिप्लेस नहीं किया, कभी अजनबी नहीं बनाया, कभी किसी को बाँधा नहीं और बगैर भेद –भाव के सबकी बातें सुनीं और अपनाया।

मतभेद हुए मगर मनभेद नहीं बल्कि सब एक दूसरे की जरूरत में खड़े रहे…तमाम दिक्कतों और मतभेदों के बावजूद…परिवार इसे ही तो कहते हैं न। पत्रकारिता में जब मैं आयी तो स्पष्ट तौर पर कह सकती हूँ कि साहित्य को बेहद उपेक्षा से देखा जाता था…साहित्यिक विज्ञप्तियों की जगह कचरे के डब्बे में होती थी…साहित्यिक खबरें न के बराबर होती थीं और साहित्य का मतलब कहानियाँ भर होता था। कई बार मुझे कहा जाता कि साहित्य पढ़ने वाले अच्छे पत्रकार नहीं हो सकते क्योंकि वे संवेदनशील होते हैं और संवेदना के लिए अखबारों की खबरों में जगह नहीं होती…जाहिर है कि यह एक भी संघर्ष था। इस पर ये भी सच है कि ऐसे अखबार कम बेहद कम थे। अधिकतर अखबारों और मीडिया के बड़े  वर्ग का सहयोग हिन्दी मेले को मिला है। फिर भी जद्दोजहद और उपेक्षा के बीच पूरा एक दशक गुजरा और ऐसे मे हिन्दी मेला और मिशन मेरा ऑक्सीजन बने रहे और मेरी संवेदना और जीजिविषा अगर जिन्दा भी है तो इसका श्रेय हिन्दी मेले को जाता है।

अपनापन ही हिन्दी मेले  की संस्कृति है। आपको यहाँ भले ही तामझाम न मिले…बहुते ज्यादा सुविधाएं भी न मिलें मगर जो लगाव और अपनापन मिलेगा….वह आपको ऑक्सीजन देता है….मुझे भी मिला। हिन्दी मेले ने ऐसा परिवार दिया है जो तमाम शिकवे – शिकायतों के बीच आपको एक अपनेपन की मिठास देता है…आपकी सृजनात्मकता को मंच देता है। 

सर, राजेश भइया, ऋतेश भइया….मनोज भइया..ममता…..कितने नाम लूँ…..जगह कम पड़ जाएगी….। एक ऐसी जगह जो अपरिचित को भी परिचित बनाती है….जहाँ छोटे से छोटा और नये से नया व्यक्ति भी अपनी बात रख सकता है और सबसे अच्छी बात कि उसे न सिर्फ सुना जाता है बल्कि जरूरत पड़े तो अपनाया भी जाता है। आज संवेदनशीलता ने मेरी कलम को मजबूत बनाया है क्योंकि वह सोच सकती है…उपेक्षाओं के बीच लड़ने और जीतने की जिद भी हिन्दी मेले से मिली है…अभिव्यक्तिगत स्वतंत्रता युवाओं की ही नहीं सबकी जरूरत है। वो यहाँ मिलती है।

एक ऐसा उत्सव जो कोलकाता के पूरे साहित्यिक जगत को एक छत के नीचे ला देता है…मरुस्थल में हरीतिमा जैसा है। यहाँ छोटों की बात सुनी जाती है तो बड़ों को भी सम्मान मिलता है… अखबार जब प्रमुखता से मेले की खबरों को स्थान देते हैं तो अजीब सा संतोष मिलता है। मेले ने हर कार्यक्षेत्र को प्रतिभाएं दी हैं और वे हर जगह अपनी छाप छोड़ रहे हैं। पत्रकारिता तो है ही मगर हमारी एक अटूट पहचान य़ह है कि हम हिन्दी मेले से बोल रहे हैं और यह पहचान काफी है। मीडिया और सांस्कृतिक जगत में बगैर मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए जगह तो है मगर पहचान नहीं…हिन्दी मेले की ओर से दिया जाने वाला पत्रकारिता, शिक्षा और नाट्य सम्मान इस कमी को पूरा करता है।

लगभग 20 साल तो हो रहे हैं मगर समाज को एक स्वस्थ और संवेदनात्मक वातावरण देना है तो ऐसे एक नहीं कई मेलों की जरूरत है। कम से कम इस मुहिम को मजबूत बनाना समय की ही नहीं हमारी भी जरूरत है….आइए न हाथ बढ़ाएं। जो जा चुके हैं….एक बार फिर लौटें….अपना मेला तो अपना ही है न तो आइए एक बार…..फिर अपनी जड़ों की ओर…

अब मेरा लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा

सुषमा त्रिपाठी

जीवन में आश्वस्ति हो तो संघर्ष आसान हो जाते हैं और पुस्तकालयाध्यक्ष आश्वस्त करने वाला हो तो किताबों तक पहुँचना आसान हो जाता है। जालान पुस्तकालय में वह आश्वस्त करने वाली कुर्सी सूनी हो गयी है…तिवारी सर नहीं हैं वहाँ पर। अब मुझसे कोई नहीं कहेगा – कहाँ हो आजकल। दिखायी नहीं पड़ती हो या कार्ड बनवा लिया….आज की दुनिया में ये शब्द बड़े अनमोल है, ऐसी दुनिया में जहाँ किसी के पास किसी के लिए कोई फुरसत नहीं है। मेरे जीवन में लाइब्रेरी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है…वह मेरी शरणस्थली है और एक ऐसी जगह जहाँ मुझे आश्वस्त करने वाले, सही राह दिखाने वाले लोग मिले हैं….किताबों के बीच से जिन्दगी को जीने का रास्ता निकला है…जालान गर्ल्स कॉलेज में मैंने पास कोर्स किया था और ऑनर्स नहीं होने के कारण एम ए में मेरा दाखिला उस समय नहीं हो पा रहा था इसलिए उन दिनों स्पेशल ऑनर्स करना पड़ता था मगर मुझे कोई जानकारी नहीं थी। होती भी कहाँ से, मेरी दुनिया घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक सीमित थी…मधुलता मैम ने सावित्री गर्ल्स कॉलेज के बारे में बताया मगर किसी कारणवश वहाँ भी मेरा दाखिला नहीं हो पा रहा था…ऐसी स्थिति में श्रीराम तिवारी सर देवदूत बनकर आए और मेरा दाखिला हो गया…तब से लेकर आज तक…सर हमेशा मेरे लिए आदरणीय रहे। कॉलेज के हर आयोजन में उनका सहयोग मिला। तिवारी सर मुझे कभी सिर्फ पुस्तकालयाध्यक्ष लगे ही नहीं, कभी एहसास ही नहीं हुआ कि पुस्तकालय में मैं एक आम लड़की हूँ… कभी कोई औपचारिकता महसूस ही नहीं होने दी उन्होंने और भइया ने। शायद यही वजह है कि परेशान होती हूँ तो सीधे लाइब्रेरी ही जाती हूँ…थोड़ी देर किताबों के बीच रहकर फिर खड़ी हो जाती रही हूँ और किताबों से प्रेम के पीछे यह स्नेह भी सम्बल बना है। हमेशा बेखटके फोन किया या सीधे लाइब्रेरी पहुँच गयी और कभी भी वे नाराज नहीं होते थे। उनका होना पिता की छाँव जैसी आश्वस्ति देता था और लाइब्रेरी एक परिवार की तरह थी जहाँ…नोक –झोंक में श्रीमोहन भइया को हम सहेलियाँ परेशान करतीं थीं और कई बार हमारे चक्कर में भइया को तिवारी सर से डाँट पड़ जाती…वे दिन दुर्लभ हैं और तमाम सफलताओं पर भारी हैं…वे जीवन के स्वर्णिम दिन हैं….भइया नियमों का हवाला देते तो तिवारी सर से बोलकर हम ज्यादा किताबें लिया करते…तब जीवन इतना जटिल नहीं था….पत्रकारिता जीवन में व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर कुछ मिनटों के लिए ही सही मैं लाइब्रेरी जाती रही हूँ…और वहाँ सर मुझे कुल्हड़ वाली चाय पिलाना नहीं भूलते थे। मेरे लाइब्रेरी कार्ड पर उनके हस्ताक्षर रहते…अब वह लाइब्रेरी कार्ड अधूरा रह जायेगा। सर मेरी खबरें पढ़ते थे और नाम भी खोजते थे…पिता भी तो ऐसे ही होते हैं। पिछले साल जब पुस्तकालयों को लेकर स्टोरी की तो सर का साक्षात्कार लिया था…इसके बाद प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय और बड़ाबाजार के संबंधों पर स्टोरी की तो सर ने फोन करके तारीफ की…तारीफें मिलती हैं मगर सर की तारीफ मेरे लिए बहुत खास है। वह महानगरीय पुस्तकालय परम्परा के स्तम्भ हैं…पुस्तकालय और कोलकाता के इतिहास को लेकर उनके पास जितनी जानकारी थी, उसका कोई विकल्प नहीं है। तिवारी सर का जाना मेरी ही नहीं इस परम्परा की क्षति है जिसकी भरपाई कर पाना आसान नहीं होगा। सर….जहाँ भी रहें….हम सब उनके लिए बच्चे ही थे…बच्चे ही रहेंगे…और वे हमेशा हमारे आस – पास हैं..।

कमजोरियों से भागकर हम इतिहास नहीं बदल सकते

साल की उल्टी गिनती आज से शुरू हो चुकी है और ऐसा लग रहा है जैसे हमारे विकास और प्रगतिशीलता की उल्टी गिनती शुरू हो रही है। परम्परा के नाम पर वर्चस्व की राजनीति करने वाले तमाम लोग एकजुट हो रहे हैं और बहाना है एक फिल्म। बहाना कहें या निशाना ही सही शब्द है और ये चिन्ता तमाम सतही बातों को लेकर ही है या यूँ कहें कि उनके हाथ में एक हथियार मिल गया है…जन भावना…जनभावना…सम्मान और प्रतिष्ठा की धुरी में पिस रहे इस देश और समाज ने क्या खो दिया है…उसे खुद अन्दाजा नहीं है। कभी – कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि ये परम्परा…इज्जत और धर्म इतने नाजुक क्यों हैं कि जरा सी चोट से खुद को बचा नहीं पाते। याद रखिए कि धर्म और समाज के ठेकेदारों ने इसी जनभावना का हवाला देकर लम्बे समय तक शोषण चक्र और वर्चस्व को जिन्दा रखा है…और आज हर राजनीतिक पार्टी यही कर रही है…कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग हो और सिद्धांत तो वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना बनकर रह गए हैं…आप यह नहीं देख रहे कि आप किस चीज की वकालत कर रहे हैं….सती प्रथा की या जौहर की या उसके नाम पर होने वाली हिंसा की….क्या इतिहास को चाटुकारिता में बदलना चाहिए। आपका इतिहास गौरवशाली रहा होगा मगर आप अपनी हार को भूलते हैं तो आपको जीत की प्रेरणा कभी नहीं मिलेगी। आदिम समय से ही कमजोरों खासकर स्त्रियों को दंडित करने के लिए उनका अंग – भंग करना, दबाना..या बलात्कार कर देना वर्चस्ववादी सत्ता की नीति रही है और आज भी यही चला आ रहा है। सोशल मीडिया पर यह जुबानी गंदगी तो छायी रहती है….आप कल्पना कीजिए कि हमें कहाँ बढ़ना था और हम कहाँ तक गिर रहे हैं….इस राष्ट्र ने कभी भी एक विशेष विचारधारा को कभी प्रश्रय नहीं दिया और अगर दिया होता तो वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा नहीं रही होती। जिस देश में पूरी वसुधा को समेटने की शक्ति है…उसे किसी एक धर्म, सम्प्रदाय और में समेटना ही ही परम्परा का अपमान है और राष्ट्रवाद के नाम पर यही हो रहा है। आप एक परिवार की परिकल्पना कीजिए जिसमें बहुएँ बाहर से ही आती हैं…सम्बन्ध बाहर से ही जुड़ते हैं..क्या आप यह कह सकते हैं कि परिवार के इन सदस्यों को घर में रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि ये बाहर से हैं या आप उनको अपने परिवार का हिस्सा नहीं मानते। यही बात इस देश रूपी विशाल परिवार पर भी लागू होती है..हो सकता है कि हिन्दू या द्रविड़ सभ्यता यहाँ रही हो..और अन्य जातियाँ बाहर से हों मगर अब वे इस देश की संस्कृति का हिस्सा हैं…इसलिए यह देश उनका भी है जैसे कि आपका है और वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा का निर्वाह ही आपकी जड़ों को मजबूत करेगा…धर्म जड़ता नहीं है…समय के साथ वह खुद को कट्टर नहीं बल्कि उदार बनाता है। जो लोग लव जेहाद की बातें करते हैं…उनको एक बार इतिहास पर नजर डालनी चाहिए क्योंकि विदेशियों से विवाह तो तभी से चला आ रहा है…। अपनी कमजोरियों से भाग कर हम कभी मजबूत नहीं बन सकते। कला और साहित्य हमें आइना दिखाते हैं तो इसका सम्मान कीजिए और अगर कुछ गलत है तो उसका प्रतिवाद भी सृजनात्मक तरीके से ही होना चाहिए….दबाकर विद्रोह को रोका नहीं जा सकता…और न ही इतिहास चाटुकारिता में बदलेगा मगर आपकी हरकतें आपको एक अँधी और क्रूर याद के रूप में कैद जरूर कर देंगी। इतिहास को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से नहीं ढाल सकते क्योंकि उसमें आपकी अच्छाई और बुराई दोनों समाहित है।

अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है

नया साल, नयी उम्मीदों का साल। पुरानी स्मृतियों से सीखने की सीख देता नया साल। हिंसा, कड़वाहटों और निराशा के बीच नये साल का आगमन उम्मीदें भरता है और इनको पूरा करने की जिम्मेदारी भी है। गुजरा साल हिंसा, कड़वाहटों, शिकायतों और रक्त से भरा रहा…..इस साल ऐसा बिलकुल न हो…इसकी तो कल्पना हम नहीं कर सकते मगर थोड़ा प्रेम, संवेदना, सहानुभूति की कोंपल तो हम अपने हृदय में रख ही सकते हैं..इनको पुष्पित पल्लवित होने दें…तो क्या एक सुन्दर दुनिया बनाना इतना कठिन कार्य होगा?

इस समय तो न जाने कितनी नाराजगी भरी है…थोड़ी हमारे अन्दर और थोड़ी आपके भीतर…इन शिकायतों और नाराजगी को हम सृजनात्मक रूप भी तो दे सकते हैं।

पता है कि अभी यह यूटोपिया ही है मगर यूटोपिया भी सच में बदल सकती है…जरूरत शुरुआत करने की है….अगर टूटी सड़कों से शिकायत है तो सरकार का इन्तजार करने की जगह हम और आप मिलकर बना दें…क्योंकि टूटी सड़कों से हमको और आपको गुजरना है। बच्चों को सरकार सीट नहीं देती तो हम और आप उनको बसों में बैठा सकते हैं। कहने को छोटी –छोटी बातें हैं मगर बड़े बदलावों की आधारशिला ऐसी ही छोटी बातों से होती है। नाराजगी है तो पास बैठाकर एक – दूसरे की बात सुनिए और सुनाइए…यह जरूरी है क्योंकि अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है..तमाम शिकायतों और नाराजगी के बीच। अपराजिता की ओर से

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं….नव वर्ष ही नहीं पूरा साल मंगलमय हो…..सुस्वागतम 2018

नासा ने खोजा आठ ग्रहों वाला सौरमंडल

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने महत्वपूर्ण खोज की है। एजेंसी ने पहली बार हमारे सौरमंडल की तरह ही आठ ग्रहों वाला नया सोलर सिस्टम ढूंढ़ने का दावा किया है। नासा ने गुरुवार को इसकी घोषणा करते हुए बताया कि केप्लर टेलीस्कोप की मदद से सुदूर अंतरिक्ष में आठ ग्रहों वाला नया सौरमंडल ढूंढ़ा गया है। अमेरिकी सामाचारपत्र इंडीपेंडेंट ने यह जानकारी दी है। अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में यह महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। प्रारंभिक आकलन में यह मनुष्यों के रहने योग्य नहीं है।

नासा वैज्ञानिकों ने केप्लर टेलीस्कोप से भेजे गए आंकड़ों का विश्लेषण करने में गूगल की आर्टीफिशियल तकनीक की मदद लेने की बात कही है। केप्लर टेलीस्कोप सूर्य सरीखे स्टार और उसके सौरमंडल के बारे में पहले ही पता लगा चुका था। लेकिन, अब नए ग्रहों की मौजूदगी का पता चला है। ऐसे में नए सौरमंडल में कुल आठ ग्रह हो गए हैं। हमारे सौरमंडल को छोड़ कर अंतरिक्ष में आठ ग्रहों वाला यह पहला सोलर सिस्टम है। नासा ने बताया कि एआई की मदद से केप्लर द्वारा मुहैया डाटा का नए तरीके से विश्वलेषण संभव हो सका है। नए सौरमंडल में केप्लर-90आई सबसे छोटा ग्रह है। यह नया ग्रह पृथ्वी की तुलना में 30 प्रतिशत ज्यादा बड़ा है। टेक्सास यूनिवर्सिटी (ऑस्टिन) के एस्ट्रोनॉमर एंड्रयू वांडरबर्ग ने बताया कि नया ग्रह पृथ्वी से बड़ा जरूर है, लेकिन वहां कोई जाना नहीं चाहेगा। हालांकि, इसकी मदद से अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में और जानकारी जुटाने की उम्मीद जताई जा रही है।

केप्लर टेलीस्कोप को वर्ष 2009 में अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था। तब से यह पृथ्वी स्थित नियंत्रण कक्ष को डाटा भेज रहा है। इसकी मदद से हमारे सौरमंडल के बाहर कई सोलर सिस्टम का पता लगाया जा चुका है। केप्लर टेलीस्कोप अब तक 4,034 ग्रह या उसके समान आकाशीय पिंडों का पता लगा चुका है। इनमें से 2,335 की बाहरी ग्रह के तौर पर पुष्टि की जा चुकी है। इनमें से 30 पृथ्वी के आकार के हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों ने प्याज के छिलके से बनाई बिजली

दुनिया के कई देश कृषि के कचरे से बिजली का उत्पादन कर रहे हैं। ऐसे में भारतीय इससे कहां पीछे रहने वाले। जी हां, आईआईटी खड़गपुर के विज्ञानियों ने प्याज के छिलके से बिजली बनाने वाली एक सस्ती डिवाइस का इजाद किया है। यह डिवाइस शरीर के मूवमेंट से ग्रीन बिजली उत्पन्न कर सकती है। इस बिजली का इस्तेमाल पेसमेकर, स्मार्ट गोलियां और पहनने योग्य इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों में किया जा सकता है।पश्चिम बंगाल स्थित आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर भानू भूषण खातुआ ने कहा कि गैर-विषाक्त, बायोडिग्रेडेबल और बायोकॉम्पसिबेटेड डिवाइस प्याज के छिलकों से उपयुक्त पाइजेइलेक्ट्रिक गुणों का फायदा उठाते हैं।

पाइजेइलेक्ट्रिक सामग्री में रोजमर्रा के यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदलने की क्षमता होती है। विज्ञानियों ने अपने नए शोध में सस्ते दर पर बिजली उत्पादन करने में सफलता पाई है। एक आम व्यक्ति इस डिवाइस की मदद से प्याज के छिलकों से काफी किफायती बिजली का उत्पादन कर सकता है।

तीन बहनों ने खोला महानगर में निःशुल्क पुस्तकालय

अक्सर हम सुनते हैं कि किताबों की दुनिया से बच्चे दूर भाग रहे हैं। सोशल मीडिया, टीवी और फिल्मों की मनमोहक दुनिया में कैद बच्चे को अक्षरों की दुनिया नहीं लुभाती, ये भी हम देख रहे हैं। ऐसे में दो बच्चियाँ पुस्तकालय खोलने के बारे में सोचें और खोलकर दिखा भी दें। यह हैरत में डालने वाली सुखद उम्मीद है। महानगर में सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में पढ़ने वाली दो बहनों 12 साल की मनस्वी और 9 साल की सुहासिनी दूगड़ ने निःशुल्क पुस्तकालय खोला है और किताबों की शौकीन और अपनी बहनों में पढ़ने की आदत डालने वाली बड़ी बहन यशस्वी ने इस पुस्तकालय को संवारने और इंटीरियर और डिजिटल कार्यों का जिम्मा सम्भाला। तीनों बहनें ब्रिटिश काउंसिल में जाती रही हैं, वहाँ की लाइब्रेरी में पढ़ती भी रही हैं।

मनस्वी बताती है कि वह जब भी लाइब्रेरी जाती, उसे महसूस होता कि बहुत से बच्चों को पढ़ने का मौका नहीं मिल पाता। वह कहती है कि पढ़ना एक अच्छी आदत है और सबको किताबें पढ़नी चाहिए। मनस्वी की माँ शीतल कहती हैं कि ये मनस्वी की इच्छा थी और इन बहनों के आग्रह को देखकर शीतल और उनके पति ने पुस्तकालय खोलने में मदद दी। तीनों बहनों के पापा के दफ्तर का एक अतिरिक्त कमरा पुस्तकालय में बदला गया। किताबें रखने के लिए आलमारी लायी गयी और साहित्यकारों की तस्वीरों से उसको सजाया गया। अब रीडर्स प्लानेट पुस्तकालय बनकर तैयार है और इसमें 15 साल तक संचित किया गया किताबों का खजाना शामिल है। पुस्तकालय में 1 हजार किताबें हैं। बालीगंज फांड़ी के डोवर रोड स्थित इस 300 वर्ग फीट जगह में स्थित इस रीडर्स प्लानेट में विज्ञान, इतिहास, भूगोल, सामान्य ज्ञान, नैतिक शिक्षा और अँग्रेजी की किताबें भी शामिल हैं। वैसे तो यह पुस्तकालय सभी के लिए है मगर जरूरतमंद बच्चों खासकर 5 से 5 साल की उम्र के बच्चों को विशेष रूप से ध्यान में रखा गया है। पुस्तकालय में इन किताबों में पढ़ने के शौकीन मगर किताबों से वंचित हर बच्चे के लिए यह पुस्तकालय किसी वरदान से कम नहीं है। मनस्वी को इनसाइक्लोपीडिया पढ़ने में दिलचस्पी है जबकि खेलों की शौकीन सुहासिनी को फैंटेसी पढ़ना अच्छा लगता है। यशस्वी को हमेशा से पढ़ने का शौक रहा है और उसके निजी पुस्तकालय में 150 से ऊपर किताबें हैं। सिडनी में मार्केटिंग और फाइनेंस की पढ़ाई कर रही यशस्वी बताती है कि यहाँ पर बच्चों के लिए स्टोरी टेलिंग और लेखन पर कार्यशालाएँ भी आयोजित होंगी और वह खुद भी इस तरह की कार्यशालाएँ आयोजित करेगी। माँ शीतल दूगड़ को हिन्दी पसन्द है इसलिए हिन्दी किताबों का एक अलग सेक्शन है? रीडर्स प्लानेट सोमवार से शनिवार तक सुबह 11 से शाम 7 बजे तक खुला  रहेगा।

विराट का वर्चस्व, मिताली ने भी खुद को स्थापित किया

प्रतिद्वंद्वी टीमों को लगातार रौंदने से विराट कोहली की महानता में इस वर्ष तेजी से बढ़ोतरी हुई जबकि भारतीय महिला टीम को भी अपने शानदार विश्व कप अभियान की बदौलत अंतत: ‘क्रिकेट को लेकर जुनूनी’ देश से प्यार और सम्मान मिला।

‘किंग कोहली’ लगातार नौ सीरीज जीतने के बाद अब अगले 18 महीनों में मिलने वाली चुनौती के लिये तैयार हैं जबकि पिछले छह महीनों में मिताली राज महिला क्रिकेट टीम की कप्तान से अब एक ब्रांड बन गयी हैं।

भारतीय महिला टीम भले ही मेजबान इंग्लैंड से विश्व कप के रोमांचक फाइनल में हार गयी हों, लेकिन इस प्रदर्शन की बदौलत उन्हें देश में लोगों का प्यार और वित्तीय प्रोत्साहन मिला जिससे महिला टीम देश में सुर्खिंयों में रहीं। यह पहली बार है जब देश में महिला क्रिकेट को इतनी गम्भीरता से लिया गया और आज महिला खिलाड़ियों को हर जगह देखा जाने लगा है जिसका श्रेय मिताली की लाजवाब कप्तानी को जाता है।

वहीं प्रतिद्वंद्वी टीमों के लिये भारतीय पुरूष टीम के बेहतरीन सफर को रोकना नामुमकिन रहा।

हालांकि भारतीय टीम ने अपने ज्यादातर मैच घरेलू मैदान पर ही खेले लेकिन लगातार नौंवी टेस्ट सीरीज जीतना और लगातार आठ वनडे सीरीज अपने नाम करना कोई उपलब्धि से कम नहीं।

कोहली और उनकी टीम को हालांकि कुछ मौकों पर परीक्षा से भी गुजरना पड़ा जैसे आस्ट्रेलिया के खिलाफ पुणे टेस्ट में मिली हार या ईडन गार्डंस में श्रीलंका के खिलाफ तेज गेंदबाजों के मुफीद पिच पर पहली पारी में सिमटना मुश्किल मौके रहे। लेकिन ऐसा एकाध बार ही हुआ।

इस इतने शानदार वर्ष में सबसे निराशाजनक प्रदर्शन चैम्पियंस ट्राफी का फाइनल रहा जिसमें उसे पाकिस्तान से हार का मुंह देखना पड़ा जबकि भारतीय टीम इसमें गत चैम्पियन के तौर पर खेल रही थी।

लेकिन इस हार के बाद जो विवाद भारतीय टीम से जुड़ा, वह भारतीय क्रिकेट इतिहास के भुलाने वाले अध्याय में शामिल हो गया। कोहली और कोच अनिल कुंबले के बीच बढ़ता विवाद खुले में आ गया जिसके बाद कुंबले को एक साल के सफल कार्यकाल के बाद इस्तीफा देने के लिये बाध्य होना पड़ा।

इस पूरे प्रकरण से हालांकि इस बार की फिर से पुष्टि हो गयी कि भारतीय टीम में केवल एक ही ‘बॉस’ है और वो कप्तान है।

हालांकि कोहली-कुंबले ब्रेक-अप से टीम के मैदानी प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ा और थोड़े ही समय में यह सामान्य हो गया तथा ड्रेसिंग रूम में पसंदीदा रवि शास्त्री ने इस महान स्पिनर की जगह वापसी की।

मैदान के बाहर उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति ने चार लोगों के साथ बीसीसीआई का काम शुरू किया लेकिन बाद में लोगों की संख्या घटकर दो हो गयी। रामचंद्र गुहा ने सीओए के काम करने के तरीके पर कड़वाहट भरा पत्र लिखकर असंतुष्टि व्यक्त करते हुए इस पद से इस्तीफा दे दिया।

मैदान में कप्तान के प्रदर्शन पर जरा भी असर नहीं पड़ा और उनका रनों का अंबार लगाना जारी रहा, जिसमें उन्होंने टेस्ट और वनडे में 11 शतक जुटाये जिसमें पांच दिवसीय प्रारूप में तीन दोहरे शतक शामिल थे।

रोहित शर्मा का भी चोट के बाद वर्ष शानदार रहा, उन्होंने सत्र में वनडे में तीसरा दोहरा शतक जड़ने के अलावा श्रीलंका के खिलाफ टी20 सीरीज के दौरान सबसे तेज शतक भी जड़ा।

25 दिसंबर को ही क्यों मनाया जाता है क्रिसमस

25 दिसंबर को हर साल क्रिसमस डे के रुप में मनाया जाता है। इस साल भी ढेर सारी खुशियों और सेलिब्रेशन को लेकर क्रिसमस का त्योहार आ गया है। ईसाई समुदाय की मान्यता के अनुसार क्रिसमस से रौशनी का आरंभ होता है। इस दिन को यीशू मसीह के जन्मदिवस के रुप में मनाया जाता है। इस उत्सव पर अपने प्रियजनों को गिफ्ट्स देना, चर्च में आयोजन और सजावट करना शामिल होता है। क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर की शाम को ही इस पर्व का उल्लास अपने चरम पर पहुंच जाता है। इसी के साथ इस दिन पेड़ सजाने की परंपरा है और गिफ्ट्स, लाइट आदि से सजे हुए पेड़ को क्रिसमस ट्री के नाम से जाना जाता है।

25 दिसंबर को ईसाई समुदाय के लोग यीशू मसीह के जन्मदिवस के रुप में मनाते हैं। मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि इस दिन ईसा मसीह का का जन्म नहीं हुआ था। चौथी शताब्दी से पहले ईसाई समुदाय इस दिन को त्योहार के रुप में नहीं मनाते थे, लेकिन चौथी शताब्दी के बाद इस दिन ईसाईयों का प्रमुख त्योहार मनाया जाने लगा। माना जाता है कि यूरोप में गैर ईसाई समुदाय के लोग सूर्य के उत्तरायण के मौके पर त्योहार मनाते थे। इस दिन सूर्य के लंबी यात्रा से लौट कर आने की खुशी मनाई जाती है, इसी कारण से इसे बड़ा दिन भी कहा जाता है। इस दिन की प्रमुखता देखते हुए ही ईसाई समुदाय ने इस दिन को ईशू के जन्मदिन के रुप में चुना। क्रिसमस से पहले ईस्टर का पर्व ईसाई समुदाय का प्रमुख त्योहार माना जाता था।

क्रिसमस का त्योहार पूरे विश्व में लोग धूमधाम से मनाते हैं। ईसाई समुदाय के साथ गैर ईसाई समुदाय के लोग भी इस दिन इकठ्ठे होते हैं और एक दूसरे को गिफ्ट्स देते हैं। भारत में पाइन के पेड़ों की जगह लोग आम और केले के पेड़ों को भी सजाया जाता है। बच्चे इस दिन गिफ्ट्स पाने के लिए बहुत ही उत्सुक रहते हैं। क्रिसमस के दिन बच्चों में सांता क्लॉज को लेकर उत्सुकता रहती है। सांता निकोलस को सांता क्लॉज के नाम से जाना जाता है। इनका जन्म ईसा मसीह की मृत्यु के लगभग 280 साल बाद मायरा नामक जगह पर हुआ था। उन्हें लोगों की मदद करना और सेवा करना बेहद पसंद था, वो यीशू के कदमों पर चलते थे। इसी कारण वो यीशू के जन्मदिन पर रात के अंधेरे में बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे।

नए साल में सुखी और सफल रहे जीवन, लें कुछ ऐसे संकल्प

नए साल 2018 में प्रवेश हम कर चुके हैं। हममें से अधिकतर लोग ऐसे भी होंगे जो कि  यह संकल्प लेंगे कि जो उन्होने बीते वर्ष में गलतियां की या कुछ भी गलत किया हो, वैसा इस आने वाले साल में न करें। माना जाता है नए साल का संकल्प हम सभी अपनी किसी खामी को दूर करने के लिए लेते हैं। कोई जिम में वर्कआउट करने का संकल्प लेता है तो कोई सिगरेट छोड़ने का। कोई अपनी पढ़ाई अच्छे से करने का संकल्प लेता है तो कोई अपने शौक पूरे करने का संकल्प लेता है।

ऐसे ही संकल्पों की लंबी फेहरिस्त है। आपको अपना कोई संकल्प चुनने में कोई परेशानी हो रही है तो आप इनमें से कोई चुन सकते हैं। तो चलिए देखते हैं 2018 में आप क्या संकल्प ले सकते हैं।