Thursday, October 1, 2026
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अनूठा है गंगा सागर, लोकप्रिय गंगा सागर मेला

हिमाच्छादित हिमालय के हिमनद से आरम्भ होकर गंगा नदी, पर्वतों से नीचे उतरती है, और हरिद्वार से मैदानी स्थानों पर पहुँचती है| आगे बढ़ते हुए प्राचीन बनारस व प्रयाग से प्रवाहित होती हुई, बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। बंगाल में हुगली नदी के मुहाने पर जहाँ गंगा सहस्रों जलधाराओं में फूट पड़ती है तथा वहाँ पहुँचकर समुद्र में बह जाती है, उस स्थान को  सागर द्वीप कहा जाता है|

गंगासागर मेला पश्चिम बंगाल में आयोजित होने वाले सबसे बड़े मेलों में से एक है। इस मेले का आयोजन कोलकाता के निकट हुगली नदी के तट पर ठीक उस स्थान पर किया जाता है, जहाँ पर गंगा बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इस द्वीप में ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां मैन्ग्रोव की दलदल, जलमार्ग तथा छोटी छोटी नदियां,नहरें है| इस द्वीप पर ही प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ है। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के अवसर पर लाखों हिन्दू श्रद्धालुओं का तांता लगता है, जो गंगा नदी के सागर से संगम पर नदी में स्नान करने के इच्छुक होते हैं। इसीलिए इस मेले का नाम गंगासागर मेला है। यह मेला विक्रमी संवत के अनुसार प्रतिवर्ष पौष मास के अन्तिम दिन लगता है। यह मकर संक्रान्ति का दिन होता है|

यहाँ एक मंदिर भी है जो कपिल मुनि के प्राचीन आश्रम स्थल पर बना है।यहाँ लोग कपिल मुनि के मंदिर में पूजा अर्चना भी करते हैं। पुराणों के अनुसार कपिल मुनि के श्राप के कारण ही राजा सगर के ६० हज़ार पुत्रों की इसी स्थान पर तत्काल मृत्यु हो गई थी। उनके मोक्ष के लिए राजा सगर के वंश के राजा भगीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए थे और गंगा यहीं सागर से मिली थीं। कहा जाता है कि एक बार गंगा सागर में डुबकी लगाने पर 10 अश्वमेध यज्ञ और एक हज़ार गाय दान करने के समान फल मिलता है। जहां गंगासागर का मेला लगता है, वहां से कुछ दूरी पर उत्तर वामनखल स्थान में एक प्राचीन मंदिर है। उसके पास चंदनपीड़िवन में एक जीर्ण मंदिर है और बुड़बुड़ीर तट पर विशालाक्षी का मंदिर है|

गंगासागर में स्नान का महत्व

मकर संक्रांति के दिन किसी भी पवित्र नदी एवं तालाब में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। विशेष तौर पर इस दिन गंगा स्नान का खास महत्व है। इसलिए हर वर्ष गंगा तटों पर खासतौर पर हरिद्वार एवं प्रयाग में मकर संक्रांति के दिन मेला लगता है। लेकिन इससे कोलकाता स्थित गंगासागर का महत्व कमतर नहीं हुआ है। गंगा के सागर में मिलने के स्थान पर स्नान करना अत्यन्त शुभ व पवित्र माना जाता है। स्नान यदि विशेष रूप से मकर संक्रान्ति के दिन किया जाए, तो उसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है।

मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस अवसर पर यह स्थान बड़े मेले का केन्द्र बन जाता है। यहाँ पर यात्री व सन्न्यासी पूरे देश से आते हैं। गंगा में स्नान कर ये लोग सूर्य देव को अर्ध्य देते हैं। मान्यतानुसार यह स्नान उन्हें पुण्य दान करता है। अच्छी फ़सल प्रदान करने के लिए धन्यवाद स्वरूप सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। इस त्यौहार पर तिल व तेल का विशेष महत्व है, इसलिए लोग इस दिन चावल का ही विशेष भोजन करते हैं| शास्त्रों में कहा गया है कि मकर संक्रांति के दिन गंगासागर में स्नान और दान का जो महत्व है वह कहीं अन्यत्र नहीं है। इसलिए कहा जाता है “सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार”। कहने का तात्पर्य यह है कि सभी तीर्थों में कई बार यात्रा का जो पुण्य होता है वह मात्र एक बार गंगा सागर में स्नान और दान करने से प्राप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार गंगा सागर में एक डुबकी लगाने से 10 अश्वमेघ यज्ञ एवं एक हजार गाय दान करने का पुण्य मिलता है|

गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु ‘समुद्र देवता’ को नारियल और यज्ञोपवीत भेंट करते हैं। पूजन एवं पिण्डदान के लिए बहुत से पंडागण गाय–बछिया के साथ खड़े रहते हैं, जो उनकी इच्छित पूजा करा देते हैं। समुद्र में पितरों को जल अवश्य अर्पित करना चाहिए तथा स्नान के बाद कपिल मुनि का दर्शन कपिल मन्दिर में करना चाहिए। गंगासागर में स्नान–दान का महत्व शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है| स्थानीय मान्यतानुसार जो युवतियाँ यहाँ पर स्नान करती हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार वर तथा युवकों को स्वेच्छित वधु प्राप्त होती है।अनुष्ठान आदि के पश्चात् सभी लोग कपिल मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते हैं तथा श्रद्धा से उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मन्दिर में गंगा देवी, कपिल मुनि तथा भागीरथी की मूर्तियाँ स्थापित हैं|

छह साल बाद मकर संक्रांति पर बन रहा है यह योग

छह साल बाद मकर संक्रांति  रविवार को आ रही है। इसी दिन सर्वार्थसिद्धि एवं रवि प्रदोष का योग भी बन रहा है। ऐसे में सूर्योपासना करने एवं दान-पुण्य का कई गुना फल मिलेगा।

सूर्य भी उत्तरायण में होगा। संक्रांति पर सर्वार्थसिद्धि योग दिनभर मान्य रहेगा, क्योंकि शनिवार मध्य रात से यह योग शुरू हो जाएगा और दोपहर 1:13 बजे तक रहेगा। सूर्योदय के समय यह योग रहने से दिनभर पूजा-खरीदी भी की जा सकेगी। यह पर्व चूंकि सूर्य की उपासना से जुड़ा है। संयोग से इसी दिन सूर्य का दिन रविवार भी है। ऐसे में यह पर्व खास हो जाएगा। प्रदोष होने से रवि प्रदोष का भी संयोग बनेगा।

पं. अक्षय शास्त्री के अनुसार इससे पहले 2012 में भी रविवार को ही मकर संक्रांति आई थी। एक वर्ष में सूर्य क्रम से  राशि में भ्रमण करते हैं। इस तरह 12 वर्ष में 12 राशियों का भ्रमण करते हैं। राशि बदलने की प्रक्रिया को ही संक्रांति कहा जाता है। सूर्य अभी धनु राशि में हैं। आगे धनु से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे तो यह मकर संक्रांति कहलाएगी। यह परिवर्तन 14 जनवरी को होगा, इसलिए इस दिन पर्व मनाया जाएगा।

कोई एक रिश्ता सारे रिश्तों की जगह नहीं ले सकता

जिन्दगी में अच्छे दोस्तों की जरूरत सबको पड़ती है फिर भले ही आप सिंगल हों या मिंगल। दोस्त होते भी हैं मगर आमतौर पर उनका साथ शादी के बाद कम हो जाता है और अगर दोस्ती महिलाओं और पुरुषों के बीच हुई तो खत्म ही हो जाती है। यकीन नहीं होता मगर एक अजनबीपन रिश्ते में तो आ ही जाता है क्योंकि अपने जीवनसाथी के सामने किसी महिला या पुरुष दोस्त के कंधे पर हाथ रखकर, या धौल मारकर आप खिलखिला नहीं सकते और न ही उसकी खिंचाई कर सकते हैं। सच तो यह है कि हम चाहते ही नहीं हैं कि हमारा जीवनसाथी हमारे दोस्तों के करीब हो या हमारी जिन्दगी के उन अनछुए पहलुओं को जाने जो हम छिपाकर रखना चाहते हैं। एक बात तो तय है कि शादी के बाद आपकी प्राथमिकता बदल जाती है क्योंकि सहेलियों या दोस्तों के साथ रहते हुए भी आप उनके साथ नहीं होते। आपकी जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं। सच तो यह है कि दोस्ती और प्यार या फिर शादी में लोग अपनी शादी बचाते हैं या फिर प्यार बचाते हैं। ये लड़कियों के साथ भी होता है और लड़कों के साथ भी होता है। जिन्दगी का एक लम्बा अरसा किसी शख्स के साथ गुजारने के बाद आप एक शख्स को इसलिए धोखा देने और छोड़ने पर मजबूर होते हैं क्योंकि आपका जीवनसाथी या परिवार उसे पसन्द नहीं करता और आप दोनों पर शक किया जाता है। हमारे समाज का ढांचा ही विचित्र है जो स्मार्ट फोन चलाता है मगर अपनी सोच को अपडेट करने की जरूरत नहीं समझता। इसके बाद जिन्दगी भर या तो खुदगर्ज होकर जीने पर मजबूर होते हैं या फिर अपराधबोध के साथ घुटते रहते हैं क्योंकि आपकी स्थिति ऐसी हो जाती है कि आप सैंडविच बन चुके होते हैं और अनायास ही आप अपने दोस्त को खो चुके होते हैं जो आपके हर अच्छे – बुरे वक्त में आपके साथ रहा, आपके दुःख में रोया और आपकी सफलता पर नाचा…जिसके कँधे पर सिर रखकर आप रोये..आप जानते हैं कि यह आपकी निजी क्षति है और आप इसकी भरपाई कभी नहीं कर सकेंगे और न ही आपका जीवनसाथी कर सकेगा।

लव यू जिन्दगी में एक संवाद है….हम अपने एक रोमांटिक रिश्ते पर सारे रिश्तों का बोझ डाल देते हैं और उसी से सारी अपेक्षायें रखते हैं मगर ये नहीं समझ पाते कि ऐसा नहीं हो सकता। जब ये उम्मीदें पूरी नहीं होतीं तो विश्वास दरकने में समय नहीं लगता और जब आपका त्याग कुंठा में बदलता जाता है। आप न चाहते हुए भी अपने साथी को दोषी मानते हैं और आपकी तल्खी आपके व्यवहार में दिखती है। आप चाहे किसी एक को चुनें या किसी एक को छोड़ें, वह क्षति तो आपकी ही है। जिन्दगी में हर रिश्ते की अपनी एक जगह है और एक रिश्ता दूसरे रिश्ते की कमी पूरी नहीं कर सकता। अगर दोस्त आपके जीवनसाथी नहीं बन सकते तो आपका जीवनसाथी हर बार आपका अच्छा दोस्त साबित हो या आपका हमराज बन जाये, यह जरूरी नहीं है। बेहतर हो कि दोस्ती का दायरा भी ऐसा ही विस्तृत हो और आपका साथी उसका हिस्सा बने। आप भी अपने साथी को उसका स्पेस दें और उसके पुराने दोस्तों से मिलवायें या खुद दोस्ती करें…मुश्किल है..मगर नामुमकिन नहीं है।

अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों होता है.कि शादी के बाद आप बदलते हैं या आपकी प्राथमिकतायें बदलती हैं। खुद से सवाल कीजिये कि क्या आपने कभी अपनी पत्नी या अपने पति को उसका स्पेस दिया है या उसके दोस्तों के बीच में आये हैं? ..जरा अपनी आदतों और बातचीत के तरीके पर गौर फरमाइये…अधिकतर लड़के या लड़कियों की शब्दावली अपने जीवनसाथी को लेकर कुछ ऐसी होती है कि मैं रखूँगा..मैं करवाऊंगा….मेरा होगा…मेरी पसन्अद चलेगी। अच्छा लगता है यह सुनने में मगर आपके ये शब्द अनायास ही वह स्पेस छीन रहे हैं कि जो कि उसका है। शादी के बाद क्या किसी का व्यक्तित्व खत्म हो जाना चाहिए…? लड़कों की बात करें तो यह सोच ही क्यों रहे कि उसके फैसले आप लेंगे और यही बात लड़कियों पर भी लागू होती है। कई लोग अपने साथी का सोशल प्रोफाइल से लेकर मोबाइल तक चेक करते हैं तो कुछ ऐसे होते हैं कि चाहते ही नहीं कि उसकी पत्नी फेसबुक या व्हाट्सऐप इस्तेमाल करे। अगर वह इस्तेमाल करती या करता है तो उसके दोस्तों पर नजर रखते हैं और अगर लड़कों या लड़कियों की संख्या ज्यादा हुई तो कई बार अकाउंट बंद करवा देते हैं। उस पर दोहरापन ये कि खुद लड़कियों से दोस्ती करेंगे तो ऐसी स्थिति में घर में अगर झगड़े नहीं होंगे तो क्या होगा? दूसरी ओर लड़कियाँ ऐसी होती हैं कि हर आधे घंटे पर फोन बजाकर पति की जासूसी करती हैं….या फिर उन पर नजर रखती हैं। कई लड़कियाँ ऐसी भी हैं जो इस हद तक शक्की होती हैं कि पति के दफ्तर में जाकर उसकी सहकर्मी से लड़ बैठती हैं। अब सवाल यह है कि क्या आप ऐसा करके अपनी गरिमा नहीं गिरा रहीं और क्या आपका यह कदम आपके पति को आपसे क्या दूर नहीं करेगा क्या उसकी सहानुभूति उस सहकर्मी के प्रति नहीं होगी? ये तमाशा आपकी समस्या का समाधान तो कतई नहीं है, आपको तमाशा जरूर बना देगा। इससे ये होगा कि आपके स्वभाव के कारण अगर कोई रिश्ता न भी हुआ तो बन बैठेगा और फिर आपके पास बचाने के लिए कुछ नहीं बचेगा। बतौर पति अपनी पत्नी को सात परदों में रखने की जगह आप उसके सपनों को पूरा करने में मदद करेंगे तो आपके प्रति विश्वास और गहरा होगा। पजेसिव होना हर बार प्यार नहीं होता बल्कि एक घुटन भर देता है। शादी के बाद पति की दोस्त या सहकर्मी लड़कियों को इसलिए खटकने लगती है क्योंकि पति उस दोस्त की बहुत इज्जत करता है या मानता है या चाहता है। हर चाहत का मतलब सिर्फ दैहिक भूख नहीं होती और न हर बार  प्यार का मतलब रोमांस होता है। कुछ रिश्ते विशुद्ध संवेदनात्मक और भावनात्मक होते हैं और उनका एक ही नाम होता है…इंसानियत….। जो रिश्ता आपकी ढाल बन सकता है, अनजाने में आप उसे कटार बना देती हैं और वह अंततः आपके पति के सीने से होती हुई आपको ही चीरती है। यह सिर्फ आपकी असुरक्षा के कारण होता है। अगर आप सारे रिश्तों का बोझ और अपेक्षायें सिर्फ अपने कंधों पर उठाएँगे तो कन्धे टूटेंगे…इन सारी मुश्किलों का एक ही समाधान है कि अपने जीवनसाथी को अपने जीवन के हर मोड़ पर शामिल करिए…स्पष्टवादी बनना एक समय के लिए बुरा होता है मगर आगे चलकर इसके नतीजे अच्छे ही होते हैं। बेहतर है कि आप अपने उस खास दोस्त के बारे में पहले से ही अपने साथी को बताकर रखें…उनसे मिलवायें और उनकी दोस्ती करवायें…। आपके जीवनसाथी का दोस्त आपके लिए वरदान भी बन सकता है क्योंकि ये तो सच है कि वह आपके पति को आपसे ज्यादा समझता या समझती है…आप उसकी मदद से अपने जीवनसाथी को बेहतर समझ सकेंगे जब आप रिश्तों में स्पेस देंगे तो विश्वास का बंधन ही मजबूत होगा और एक नैतिक जिम्मेदारी बनेगी। एक रिश्ता निभाने के लिए दूसरा रिश्ता तोड़ लेना अक्लमंदी का काम नहीं है और न ही इसमें ईमानदारी है…जरूरी है कि आपके साथ इस तरह की स्थिति हो तो आप स्पष्ट तौर पर अपने साथी और अपने दोस्त से खुलकर बात करें और बतायें कि आप दोनों की जगह तय है और एक रिश्ता कभी दूसरे रिश्ते की जगह नहीं ले सकेगा…आपको दोनों चाहिए। लड़कियों के मामले में यह मुश्किल हो सकता है मगर बेहतर यही है कि आपका दोस्त आप दोनों का दोस्त बनें और इसके लिए माहौल बनाना तो आपको ही होगा। सच तो यह है कि आपको यह समझना होगा कि आपकी एक सीमा है और आप अपने साथी उन तमाम रिश्तों की जगह न तो ले सकते हैं और न ही वह कमी पूरी कर सकते हैं जो आपके आने के पहले थी तो फिर ऐसी जिद किस काम की जो पूरी हो ही न सके। इसके साथ ही अगर आप दोस्त हैं तो यह आपको समझना होगा कि शादी के बाद आपके दोस्त की प्राथमिकतायें और जिम्मेदारियाँ बदलनी स्वाभाविक है…आपने दोस्ती निभायी मगर आप अपने दोस्त के पति या पत्नी की जगह नहीं ले सकते और न ही ऐसी कोशिश करनी चाहिए। शर्तें मत लादिये और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहिए और जब लगे कि आप तमाम उलझनों का कारण हैं तो बेहतर है कि अपने कदम आगे बढ़ा लें क्योंकि कई बार हमारे चाहने से चीजें हमारे हिसाब से नहीं ढलतीं। हमें उनके हिसाब से ढलना पड़ता है….अगर आप अपने दोस्त को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा..दोस्ती भी समझने का ही नाम है तो बेहतर है कि समय रहते एक गरिमामय दूरी बनाकर रखी जाए कि ताकि आपके हिस्से की कुछ अच्छी यादें बची रहें…जरा सा संयम और समझदारी हर बिगड़े काम को बना सकती है क्योंकि कोई एक रिश्ता सारे रिश्तों की जगह नहीं ले सकता।

17 साल के राजीव ने बनाया डेंगू से लड़ने वाला ड्रोन

उम्र कोई भी हो, आर्थिक हालात कैसे भी हों, अगर मंशा अच्छी हो और मन में समर्पण हो तो समाज के लिए कुछ बेहतर करने से आपको कोई नहीं रोक सकता है। इस बात को सही साबित करती है, सिलिगुड़ी के राजीव घोष की कहानी है। राजीव की उम्र महज 17 साल है और वह 11वीं कक्षा में पढ़ते हैं। उनकी आर्थिक हालत भी खराब है, लेकिन ऐसे विपरीत हालात में भी राजीव ने डेंगू जैसी बीमारी से लड़ने में मददगार एक ड्रोन बनाया है।

राजीव के पिता, रंजीत घोष 56 वर्ष के हैं और सिलिगुड़ी में चाय की एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। राजीव अपने पिता के काम में हाथ भी बंटाते हैं और साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी करते हैं। इस चुनौती की वजह से राजीव 10वीं कक्षा में अच्छे अंक नहीं ला सके और 11वीं में उन्हें साइंस स्ट्रीम नहीं मिली।

इसके बावजूद भी विज्ञान और तकनीक के लिए राजीव का लगाव बिल्कुल भी कम नहीं हुआ। पिछले साल उनके शहर में डेंगू के खतरे ने काफी आतंक मचा रखा था। इस बात को ध्यान में रखते हुए राजीव एक ऐसा ड्रोन बनाने की जुगत में लग गए, जो मच्छरों के खतरे से लोगों को सुरक्षित रख सके। उन्हें इस ड्रोन को बनाने के लिए 1.5 लाख रुपए की जरूरत थी। उन्होंने यह राशि अपने माता-पिता और पड़ोसियों की मदद से इकट्ठा की। राजीव ने सात महीनों की कड़ी मेहनत के बाद यह ड्रोन तैयार किया।

राजीव ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए बताया, ‘मेरे माता-पिता ने सहमत होने के बाद कुछ पैसा उधार लिया। मेरे कुछ पड़ोसियों ने अपनी ओर से मदद की। मैंने इस ड्रोन को बनाने में 1.5 लाख रुपए खर्च किए।’ राजीव ने इकट्ठा किए हुए पैसों की मदद से चीन और अमेरिका से, तकनीकी रूप से अडवांस उपकरण मंगवाए।

क्या है ड्रोन की खासियत

राजीव ने अपने इस खास ड्रोन में एक हाई रेजॉलूशन का कैमरा लगाया है। इस कैमरे की मदद से डेंगू फैलाने वाले मच्छर के लारवा को ट्रैक किया जा सकता है। यह ड्रोन 1.8 किमी. की ऊंचाई तक जा सकता है, लेकिन सुरक्षा कारणों की वजह से इसकी क्षमता को 200 मीटर तक ही सीमित रखा गया है। इतनी ऊंचाई पर कैमरे की मदद से राजीव का ड्रोन यह पता लगा सकता है कि कहां-कहां पानी का जमाव है और वहां पर डेंगू के मच्छर होने की संभावना है।

अपने ड्रोन का 6 महीने तक परीक्षण करने के बाद राजीव ने सिलिगुड़ी के मेयर अशोक भट्टाचार्य को अपना प्रयोग दिखाया, जिसे देखकर वह काफी आश्चर्यचकित हुए। अशोक ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब राजीव ने उन्हें ड्रोन के फंक्शन के बारे में बताया तो वह राजीव के हुनर के कायल हो गए। मेयर ने बताया कि नगर निगम ने तय किया है कि राजीव के ड्रोन को इस्तेमाल में लाया जाएगा और राजीव को जरूरत की सारी चीजें मुहैया कराई जाएंगी।

सिलिगुड़ी नगर निगम ड्रोन के साथ कुछ प्रयोग करने की योजना बना रहा है और उनकी प्राथमिकता है कि जल्द-जल्द से इसकी मदद से इलाके में काम शुरू किया जाए। राजीव चाहते हैं कि भविष्य में वह अपने ड्रोन में और भी बेहतर रेजॉलूशन का कैमरा इस्तेमाल करें। नगर निगम का सहयोग मिलने के बाद राजीव जल्द ही एक और ड्रोन बनाना चाहते हैं। ड्रोन के जरिए डेंगू के खतरे से बचने की यह तरीका कोलकाता में पहले से इस्तेमाल हो रहा है। कोलकाता में साउथ सिटी मॉल के आस-पास के इलाके में ड्रोन्स को इस काम के लिए तैनात किया गया है।

हिन्दी कहानी जगत के चार में से दूसरे यार दूधनाथ सिंह का निधन

हिन्दी कहानी जगत ‘‘चार यार’’ के नाम से मशहूर लेखकों में शामिल वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ सिंह का निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे।

पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि दूधनाथ सिंह पिछले कुछ समय से बीमार थे। वह प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त थे। उनका निधन इलाहबाद के एक निजी अस्पताल में हुआ। उनका अंतिम संस्कार आज इलाहाबाद में हुआ था। सिंह का जन्म 17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोबंथा में हुआ। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, संस्मरण, कविता, आलोचना, संपादन आदि विधाओं में अपना रचनाकर्म किया।

हिन्दी कहानी में दूधनाथ सिंह ‘चार यार’ में शामिल थे। इसके अन्य तीन कहानीकार रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन और काशीनाथ सिंह हैं। कालिया का भी निधन हो चुका है।

दूधनाथ सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया और यहीं वह हिंदी के अध्यापक नियुक्त हुए। 1994 में सेवानिवृत्ति के बाद से लेखन और संगठन में निरंतर सक्रिय रहे। उनका अंतिम उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ काफी चर्चित रहा। उनके अन्य उपन्यास ‘निष्कासन’ एवं ‘नमो अंधकारम्’ हैं।

उनके कहानी संग्रहों में ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखांत’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’, ‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’, ‘जलमुर्गिर्यों का शिकार’ शामिल हैं। ‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए (लंबी कविता)’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘एक अनाम कवि की कविताएँ’ उनके कविता संग्रह हैं। उन्होंने ‘यमगाथा’ नाम से एक नाटक लिखा था।

उन्होंने ‘निराला : आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध : साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ’ आदि आलोचना ग्रन्थ भी लिखे। सिंह को उत्तर प्रदेश के शीर्ष सम्मान भारत भारती से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें भारतेंदु सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

पीएम मोदी बने विश्व के तीसरे बड़े लोकप्रिय नेता, ट्रंप और जिनपिंग को पछाड़ा : सर्वे

पीएम मोदी देश ही नहीं दुनिया में लोकप्रिय हैं और यह बात हम नहीं बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे बताता है। इस सर्वे के अनुसार पीएम मोदी ने चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पछाड़ दिया है और दुनिया के तीसरे बड़े नेता बन गए हैं। गैलप इंटनरनेशल द्वारा यह सर्वे दुनिया के 50 देशों में किया गया था।

इस सर्वे में इन देशों के लोगों से अलग-अलग सवाल पूछे गए थे और उनसे मिले जवाबों के आधार पर गैलप ने पीएम मोदी को विश्व नेताओं के सर्वे में तीसरे स्थान पर रखा है। सर्वे में पहले नंबर पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुल मैक्रों और दूसरे नंबर पर जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल हैं। सर्वे में मैक्रों को 21, मर्केल को 20 और पीएम मोदी को 8 अंक मिले हैं।

इस सर्वे के लिए जिस तरीके का उपयोग किया गया उसमें गैलप ने अलग-अलग देशों के तहत कुल 53 हजार 769 लोगों ने अपनी राय दी है। सर्वे में 30 प्रतिशत लोगों ने पीएम मोदी के पक्ष में राय दी जबकि 22 प्रतिशत विपक्ष में थे। सर्वे में चौथे स्थान पर ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे हैं वहीं पांचवे नंबर पर चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग हैं। इनके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सर्वे में 11वें स्थान पर रहे।

किसान को बचाना, खुद को बचाना है, जिम्मेदारी सरकार की ही नहीं हम सबकी है

इस देश में कृषि और कृषक हमेशा से ही महत्वपूर्ण मगर उतने ही उपेक्षित और शोषित रहे हैं। हम उन बड़े किसानों की बात नहीं कर रहे जो सम्पन्न हैं मगर उनकी तादाद भी कम है। देश के हर कोने में किसान परेशान है, वह मर रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। सोशल मीडिया पर कृषक विमर्श की बाढ़ आ गयी है मगर यह सारा विमर्श आरोप – प्रत्यारोप में सिमट कर रह गया है। हर किसी ने अन्नदाता को अपने हिसाब से इस्तेमाल किया है। मुमकिन है कि दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन को लेकर आप सवाल उठाएं मगर आप उन कठिनाइयों और कटु सत्य से मुँह नहीं मोड़ सकते और न ही शहर में रहकर परिस्थिति को समझा जा सकता है। माँग ऋणमाफ करने की हो रही थी मगर न तो यह कृषकों की समस्याओं का स्थायी समाधान है और न ही अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत ही है। बावजूद इसके हर चुनाव के पहले ऋणमाफ करने को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। स्थिति को सुधारने के लिए केन्द्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, यह मानने के बावजूद राज्य की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। प्रदर्शन और ऋणमाफी से आगे बढ़कर ठोस नीतियों की जरूरत है कि निचले स्तर तक इन नीतियों का लाभ पहुँचे और इसमें सरकार की ही नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत, शिक्षाक्षेत्र से लेकर हम सबकी जिम्मेदारी है। ऐसा क्यों लग रहा है कि कृषि को महत्वपूर्ण मानने के बावजूद उद्योग की तुलना में उसे दोयम दर्जे का बनाया जा रहा है? हम किसानों के लिए रोते हैं और जब गाँवों के विकास को सरकार प्रमुखता देती है तो उस पर हाय – तौबा मचाने वाले भी हम ही होते हैं। जी हाँ, शहरों की शिक्षित और परिष्कृत जनता जो बहुरराष्ट्रीय कम्पनियों के मॉल से सब्जियाँ खरीदती है मगर पास जमीन पर बैठे दूर – दराज के गाँवों से आए एक कृषक से सब्जी या अनाज खरीदना उसकी शान के खिलाफ है। मनमानी कीमतों पर ब्रांडेड दाल, सब्जियाँ और फल खरीदने वाले लोग मोलभाव करते हैं और सोशल मीडिया पर आँसू बहाते हैं। खेती विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए महज एक प्रोजेक्ट वर्क है जिससे जरिए वे कुछ दिनों के लिए शहरों से ऊब कर गाँवों में जाते हैं मगर गाँवों में बसकर कृषि क्षेत्र के लिए कोई काम नहीं करना चाहता। आखिर ऐसे शोध क्यों नहीं हो रहे हैं जो कृषकों की मेहनत कम कर उसका उत्पादन बढ़ा सके और इसे एक बाजार उपलब्ध करवाए? कृषि से संबंधित इंजीनियरिंग, पशुओं को स्वस्थ रखने और दुधारू मवेशियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसी भी क्षेत्र में कितने लोग काम कर रहे हैं या अभिभावक कहाँ तक बच्चों को गाँवों में जाने या बसने की अनुमति दे रहे हैं? खुद युवा पीढ़ी क्या गाँवों में जाना चाहती है या गाँवों को बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहती है? क्यों सरकार जब पोस्टिंग किसी गाँव में करती है तो आन्दोलन और घेराव शुरू हो जाता है? कटु सत्य यह है कि सरकारी नौकरी प्राथमिकता इसलिए है क्योंकि वहाँ तय मोटा वेतन है और यह धारणा है कि आरामदायक जीवनशैली भी मिलेगी। अगर ऐसा है तो हर बात के लिए सरकार को दोष देना कहाँ तक सही है? आज किसान मर रहे हैं तो भागीदारी हमारी भी है। कॉरपोरेट क्षेत्र चाहें तो कृषि से सम्बन्धित उद्योगों से इस देश के कृषि और प्राकृतिक संसाधनों को नया जीवन दे सकते हैं। आप पतंजलि का मजाक उड़ा सकते हैं मगर सत्य तो यही है कि पतंजलि ने कृषि को बड़ी सहायता दी है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश हर काम के लिए सरकार पर क्यों निर्भर है? क्या हम हर बात के लिए राजनेताओं और सरकारों पर निर्भर नहीं होते जा रहे? दोहरापन कहीं और नहीं हमारे भीतर है।

उपेक्षा, हिंसा, राजनीति और हिंसक आन्दोलन में फँसा विकास को तरसा पहाड़

भारत बेहद खूबसूरत देश है और इस देश की खूबसूरती इसकी विविधता में है। विविधता में एकता का संदेश इस देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है मगर आज इस संदेश को कोई समझने को तैयार नहीं है। कश्मीर में पत्थर चल रहे हैं तो अब तक बंगाल का हिस्सा रहा दार्जिलिंग जल रहा है। पहाड़ मुस्कुराना चाहता था मगर ऐसा लगता है जैसे वह अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहा है और यह लड़ाई हिंसक हो उठी है। जरा से सामंजस्य से जिस मसले को सुलझाया जा सकता था, वह सियासत की मेहरबानी से नासूर बन चुका है। देश की रक्षा में जान देने वाले गोरखा आज आत्मदाह की बात कर रहे हैं। अब वे गोरखालैंड की माँग पर दिल्ली में आमरण प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। देखा जाए तो आन्दोलन के तरीके की आलोचना की जा सकती है मगर इसके लिए जिम्मेदार सरकार ही नहीं कहीं न कहीं भारत की मुख्यधारा वाली मानसिकता ही है जो हर गोरखा को नेपाली समझती है। उत्तर – पूर्वी राज्यों के हमारे भाई – बहन, बहादुर, चाउमिन, चीनी, मैगी जैसे नामों से पुकारे जाते हैं। याद है कि पिंक में उत्तर – पूर्वी भारत की एक किरदार कहती है कि उसे किस तरह विकसित कहे जाने वाले शहरों में उत्तर – पूर्वी होने के कारण मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। यह एक कटु सत्य है कि उत्तर – पूर्वी और पहाड़ जैसे क्षेत्रों में न तो विकास पूरी तरह पहुँचा है और न ही उनको वैसी स्वीकृति है, जो कि भारत के अन्य राज्यों में प्राप्त है।

जहाँ तक मेरी समझ है तो इस समस्या की जड़ ही यही है कि हमने कभी भी इन क्षेत्रों की संस्कृति, भाषा और जीवनशैली का सम्मान नहीं किया। किसी भी राज्य की अपनी पसन्द या नापसन्द हो ही सकती है मगर उसे कोई अधिकार नहीं है कि वह अपनी मान्यता को उन क्षेत्रों पर जबरन थोपे जो उनकी संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं। क्षमा कीजिए मगर मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ कि बंगाल में होने के कारण मुझे बांग्ला या कोई और भाषा समझनी चाहिए जो मेरे मानस में नहीं है। ये सही है कि किसी भी भाषा की जानकारी सम्बन्धित राज्य में रहते – रहते हो जाती है, जीवनशैली और अपनी आवश्यकता के आधार पर भाषा सीखी जा सकती है मगर कोई मेरी भाषा की उपेक्षा कर बलात अपनी संस्कृति थोपना चाहेगा तो वह स्वीकार नहीं किया जा सकता।<strong> अपराजिता की पड़ताल इस बार इसी गोरखालैंड की माँग को लेकर है जो समस्या बना दी गयी है।  </strong>भाषा का प्रसार होना अच्छी बात है मगर आप उसे थोप नहीं सकते, उसे इस लायक बनाइए कि वह अपनी स्वीकृति खुद प्राप्त करे। गोरखालैंड और गोरखालैंड आन्दोलन का इतिहास बहुत पुराना है। अगर इस देश में विकास और भाषा का हवाला देकर छत्तीसगढ़, झारखंड और तेलगांना जैसे राज्य नहीं बनते तो गोरखालैंड की माँग अनुचित कही जा सकती थी मगर इस देश में ये सारे राज्य सिर्फ भाषायी और सांस्कृतिक राजनीति के आधार पर बने। गोरखालैंड की माँग उठती नहीं बल्कि खत्म हो सकती थी, अगर उसे समानता, विकास और भाषायी स्वतंत्रता के साथ रहने का अवसर दिया जाता मगर ऐसा नहीं हुआ। जरूरत इस बात की है कि वहाँ के लोगों के साथ राजनीति नहीं की जाए बल्कि उनको समझाया जाए क्योंकि अलग होना विकास की गारंटी नहीं है। इसके लिए आपको अपनी नीति बदलनी होगी, नजरिया बदलना होगा और इस समस्या को सुलझाने के तरीके बदलने होंगे। बांग्ला को थोपने की जिद छोड़नी होगी। दीदी, आप अपनी खुन्नस का ठीकरा चीन और पाकिस्तान के सिर पर नहीं मढ़ सकतीं क्योंकि ये सब आपकी विभाजक राजनीति के कारण हुआ है। जातियों के आधार पर अलग – अलग बोर्ड बनाकर आपने पहाड़ को बाँटा मगर गोरखा आपकी राजनीति समझ गए और एक गलती का नतीजा पूरा बंगाल भुगत रहा है। जरूरी है कि बंगाल और समूचे देश के बुद्धिजीवी, संस्थाएँ और खुद सरकार गोरखाओं को सम्मान दें जिसके वे हकदार हैं।

सीएम ममता कहती हैं कि  गोरखालैंड आदोलन को चीन का समर्थन प्राप्त है मगर उनके इस बयान को गोजमुमो (गोरखा जनमुक्ति मोर्चा) के महासचिव विनय तमाग ने सिरे से खारिज करते हुए सरकार की बौखलाहट बताया। उन्होंने कहा कि आदोलन का एकसूत्री एजेंडा गोरखालैंड राज्य का गठन है। इसके लिए हम किसी तरह के समझौते को तैयार नहीं हैं। इसको लेकर प. बंगाल सरकार में बौखलाहट है। इसकी पुष्टि मुख्यमंत्री के बयान से होती है। केंद्र सरकार हमारे आदोलन पर नजर रखे है। हंमारी सेना में गोरखा रेजिमेंट है, गोरखाओं के आन्दोलन के तरीके की आलोचना हो सकती मगर हम उनको अलगाववादी नहीं कह सकते और न ही कश्मीर के पत्थरबाजों से उनकी तुलना कर सकते हैं। यदि मुख्यमंत्री के बयान में तनिक सच्चाई होती तो हमारे उपर अभी तक कार्रवाई हो चुकी होती। हम भारतीय हैं। गोरखा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं। उन पर राष्ट्रद्रोही होने का आरोप मुनासिब नहीं है। गोरखालैण्ड की मांग करने वालों का तर्क है कि उनकी भाषा और संस्कृति शेष बंगाल से भिन्न है। गोरखालैण्ड की यह मांग हड़ताल, रैली और आंदोलन के रूप में भी समय-समय पर उठती रहती है।गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में गोरखालैंड के लिए दो जन आंदोलन (१९८६-१९८८) में हुए। इसके अलावा गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में (२००७ से अब तक) कई आंदोलन हुए। इस बार भी यह आन्दोलन हिंसक हो चुका है। सरकारी सम्पत्तियों को लगातार नुकसान पहुँचाया जा रहा है। विरोधी पार्टियों के कार्यालय फूँके जा रहे हैं जिसका समर्थन कतई नहीं किया जा सकता। इस समस्या की जड़ तक जाने के लिए जरूरी है कि इस क्षेत्र और गोरखालैंड की माँग का इतिहास समझा जाए।

भारतीय भाषाओं और अपनी बोलियों को सम्मान देकर ही देश की अपनी राष्ट्रभाषा बनेगी हिन्दी

दक्षिण भारत& जिसकी संस्कृति उत्तर भारत से अलग है जहाँ इस देश की राजभाषा को राजनीति ने अवांछनीय बना दिया है। दक्षिण भारत जिसका उसी अवांछनीय हिन्दी से एक रिश्ता है दिल का रिश्ता साहित्य का रिश्ता&#8230;और वह रिश्ता अपनापन खोज रहा है। आजतक क्या हमने सुना है कि राजनीति ने कभी एक किया हो? उसने तो हमेशा बाँटा है&#8230;.एक तो हमेशा संस्कृति ने किया है&#8230;भाषा कभी अलग नहीं करती&#8230;वह तो जोड़ती है। जरूरत बस हृदय से अपनाने की है। हम कहते हैं कि दक्षिण भारतीय भाषाएँ या यूँ कहें कि समस्त भारतीय भाषाएँ इस देश की भाषाएँ हैं&#8230;दक्षिण वाले हिन्दी को अपना नहीं समझते&#8230;.जरा सोचिए तो क्या आपने कभी उनको अपनाया है या सीखने की कोशिश की है। अगर की भी है तो उसमें भी जरूरत है या फिर मजबूरी&#8230;यही समस्या दक्षिण भारत की भी है और इसी को लेकर राजनीति भी हो रही है।

पिछले कई दिनों से कर्नाटक में हिंदी-विरोधी आंदोलन चल रहा है। रेल्वे स्टेशनों पर लगे हिंदी नामपटों को पोता जा रहा है। कर्नाटक के लिए एक अलग झंडे की मांग की जा रही है। अभी अलग झंडे की मांग को तो दरी के नीचे सरका दिया गया है, क्योंकि कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार इसका खुला समर्थन नहीं कर सकती। यदि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया किसी क्षेत्रीय पार्टी में होते तो इस मांग को वे हाथोंहाथ उठा लेते लेकिन हिंदी-विरोध का कर्नाटक में कोई विरोध नहीं कर रहा है। न तो सत्तारुढ़ कांग्रेस, न सत्ताकांक्षी भाजपा और न ही पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा का जनता दल !  कोई आश्चर्य नहीं कि यह हिंदी-विरोधी आंदोलन दक्षिण के अन्य राज्यों में भी जोर पकड़ ले। एक तरह से यह केंद्र के विरुद्ध दक्षिण के सभी विघ्नसंतोषी राज्यों को एक कर दे सकता है।

जरा सोचिए कि क्या वजह है कि जिस भाषा ने, जिस देश ने हमें 200 साल तक गुलाम बनाए रखा, वह भाषा आज भी राज कर रही है, वह इन राज्यों के लोगों के हृदय में विराजमान है&#8230;क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत एक दूसरे की भाषाओं को अपना ले। अँग्रेजी हो&#8230;जरूर हो&#8230;हमें सारी दुनिया से जुड़ना है मगर कोई पड़ोसी जिस तरह माँ और मौसी का विकल्प नहीं हो सकता, उसी तरह अँग्रेजी कभी भी हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विकल्प नहीं हो सकती। हम अँग्रेजी किसी भी अन्य विषय की तरह ही पढ़ेंगे&#8230;.जरूर पढ़ेंगे&#8230;.मगर प्राथमिकता अपनी भाषा ही होगी। अगर हम चाहते हैं कि लोग हिन्दी को अपनाएँ तो हमें स्थानीय भाषाओं को अपनाना चाहिए। इन भाषाओं का साहित्य हिन्दी में अधिक से अधिक उपलब्ध हो और हिन्दी के तुलसीदास, सूरदास&#8230;.अनुदित होकर तमिल या तेलगू में पहुँचें&#8230;..पाठ्यक्रम तक ले जाइए। हम रवीन्द्रनाथ को हिन्दी में पढ़ते हैं तो प्रेमचन्द, बिहार, आचार्य शुक्ल और अज्ञेय तमिल, तेलगू और कन्नड़ में पढ़ाएँ जाएँ। हम दोनों एक दूसरे के पूरक बने तो कोई अँग्रेजी हमें नहीं तोड़ सकती। अगर किसी राज्य में उसकी भाषा प्रथम स्थान पर है तो हिन्दी को दूसरी भाषा बनाइए मगर मामला अगर देश का हो तो हिन्दी को स्वीकार कीजिए&#8230;.। आपसी समझ और समन्वय ही समस्या का समाधान है।

अगर हिन्दी को देश के हर कोने में जाना है तो उसे साबित करना होगा कि वह जोड़ने की क्षमता रखती है। अगर कोई मराठी मराठी लहजे में हिन्दी बोलता है तो उसका स्वागत कीजिए, अगर कोई बांग्ला के लहजे में बोलता है तो उसका उत्साह बढ़ाइए&#8230;अगर कोई मणिपुरी तरीके से बोलता है तो उसका सम्मान कीजिए, अगर कोई हिन्दी में डोगरी मिलाता है तो मिलने दीजिए, अगर किसी की हिन्दी में तमिल, तेलगू या कन्नड़ है तो गले लगाइए। इसी प्रकार सभी भारतीय भाषाएँ भी हिन्दी को खुद में समाहित होने दें। अपनी सहोदर और सहचर भाषाओं के साथ मिलकर हिन्दी समृद्ध ही होगी&#8230;.कम से ये बहनें हैं&#8230;.पड़ोसी नहीं है। मुझे अँग्रेजी और हिन्दी के हिंग्लिश से ये बेहतर यह जुगलबन्दी लगती है जिसका सुर मेरे देश का सुर बनाता है। अगर अँग्रेजी से लोहा लेना है तो हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को एक साथ लाना होगा। आपको हिन्दी का प्रसार करना है तो बताइए कि स्थानीय भाषाएँ किसी एक राज्य में चल सकती हैं, कोई अँग्रेजी सीखे भी तो गाँवों तक नहीं पहुँच सकता मगर हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संसद से सड़क तक, होटलों से गाँव की चौपाल तक आपका साथ देगी&#8230;और अपनेपन से देगी। यह सही है कि आज हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है मगर हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है। नेताओं से मुद्दा छीनिए&#8230;.वह भाषा के नाम पर आन्दोलन खड़ा करें, उसके पहले ही उनके हाथ से भाषा छीनिए। वैसे भी कोई भी भाषा राजनीति के भरोसे आगे कभी नहीं बढ़ती, उसे जनता आगे बढ़ाती है, सरकार तो बस संरक्षण दे सकती है&#8230;.तो यह संरक्षण भी बराबरी का हो। हिन्दी के साथ 50 प्रतिशत राशि स्थानीय भाषाओं के विकास पर खर्च हो&#8230;.उनके विस्तार और प्रसार को भी प्राथमिकता मिले। अगर आप हाथ बढ़ाएँगे तभी कोई आपका हाथ थाम सकता है। दक्षिण में हमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम का डटकर समर्थन करना चाहिए। वहां रहने वाले हिंदीभाषियों को भी ये भाषाएं सीखनी चाहिए। उत्तर भारत के नेता जब दक्षिण में जाएं तो उन्हें उन्हीं भाषाओं के अपने भाषण देवनागरी में लिखवाकर बोलना चाहिए। दक्षिण के नेता हिंदी सीखते हैं या नहीं ? देवेगौड़ाजी हिंदी में लिखे भाषणों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। दिल्ली में रहते हुए अब वे थोड़ी-बहुत हिंदी बोल लेते हैं। दक्षिण भारत में जाकर आप अँग्रेजी नहीं बल्कि तमिल, कन्नड़, तेलगू और मलयालम बोलिए..और उसके बीच में हिन्दी भी डालिए। .उसी तरह उत्तर भारत आने वाले हिन्दी के साथ पंजाबी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और भोजपुरी बोलें। ऐसा ही प्रयोग प्रशासनिक और विधानसभा या लोकसभा में हो।

राजनीतिक स्तर पर यदि कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्त्ता दक्षिण की भाषाओं का डटकर समर्थन करें और अंग्रेजी के नामपट पोतने लगें तो क्या होगा ? हिंदी को लाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। वह अपने आप आ जाएगी। त्रिभाषा-सूत्र तत्काल खत्म करें और प्रांतीय भाषाओं को प्रथम स्थान दें तो अखिल भारतीय संपर्क हिंदी के बिना कैसे संभव होगा ? यदि हम प्रांतीय भाषाओं को सिर पर बिठाएं तो वे हिंदी को गोद में जरुर बिठाएंगी।

सच तो यह है कि वर्तमान में जिस प्रकार दक्षिण में हिंदी को रोजगारमूलक भाषा मानकर इसके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। यदि उनकें राज्यों की जनता हिंदी सीख कर या मात्र बोलनें सुननें भर की क्षमता विकसित करके यदि अपनी व्यावसायिक निपुणता या पेशेवर दक्षता बढ़ा पाती है तो इसमें दोष क्या है? वोटों की खातिर क्षुद्र राजनीति करनें वाले इन हिंदी विरोधी नेताओं को समझना चाहिए कि दक्षिण भारत का शेष भारत की संस्कृति और भाषा के प्रति अपना आदरभाव का और विनम्र अनुगामी भाव  का अपना गरिमामय और आदरणीय इतिहास रहा है। उत्तर भारत के तीर्थों के प्रति अपनें पूज्य भाव के कारण यहाँ का सनातनी और हिन्दू समाज हिंदी भाषा सीखनें और माता पिता के गंगा स्नान करा लेनें को सदा उत्सुक रहा है!! हिंदी सीख लेनें की रूचि के आधार पर ही1918 में मद्रास में ‘हिंदी प्रचार आंदोलन’ को प्रारम्भ हुआ था और इसी वर्ष में स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन मद्रास कार्यालय  आगे चलकर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के रूप में स्थापित हुआ। बाद में तमिल और अन्य दक्षिणी राज्यों की जनता की भावनाओं का आदर करते हुए ही इस संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया।

वर्तमान में इस संस्थान के चारों दक्षिणी राज्यों में प्रतिष्ठित शोध संस्थान है, और बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय इस संस्थान से हिंदी में दक्षता प्राप्त कर हिंदी की प्राणपण से सेवा कर रहें हैं। इसी क्रम में केरल में 1934 में केरल हिंदी प्रचार सभा, आंध्र में 1935 में हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और कर्नाटक में 1939 में कर्नाटक हिंदी प्रचार समिति, 1943 में मैसूर हिंदी प्रचार परिषद तथा 1953 में कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की स्थापना हुई। इन संस्थानों में लाखों छात्र हिंदी की परीक्षाओं में सम्मिलित व् उत्तीर्ण होतें हैं. तमिलनाडु में तथाकथित और पूर्वाग्रही विरोध के कारण भले ही शासकीय शिक्षण संस्थानों में हिंदी की उपेक्षा हो रही हो, किन्तु कई निजी संस्थानों में हिंदी की पढ़ाई जारी है, और इनकी परीक्षाओं में छात्रों की संख्या लाखों में रहती है। जनसामान्य में असंतोष है कि निजी विद्यालयों में पढ़नें वाले बच्चे तो हिंदी पढ़कर अपनी रोजगार की संभावनाएं प्रबल कर लेतें हैं किन्तु शासकीय विद्यालयों के विद्यार्थी हिंदी पीछे रह जातें हैं। दक्षिणी राज्यों में हिंदी को आजीविका का साधन विकसित करनें का एक प्रबल माध्यम माननें का ही परिणाम है कि यहाँ कई सेवाभावी संस्थाएं निःशुल्क हिंदी कक्षाओं का संचालन, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, गोष्ठियों का आयोजन निरंतर कराती रहतीं हैं। मुम्बईया हिंदी फिल्मों और हिंदी गीतों की लोकप्रियता के कारण भी हिंदी अब दक्षिणी राज्यों में एक सहज सामान्य रूप से बोली सुनी जानें लगी है। आज हैदराबाद, बैंगलूर तथा चेन्नई नगरों से दसियों बड़े और कई छोटे हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित हो रहें हैं। यहाँ यह कतई न समझा जाए कि दक्षिण भारत में हिंदी का चलन कुछ दशकों की देन है! दक्षिण के सभी राज्यों में हिंदी का अपना दीर्घ और समृद्ध इतिहास रहा है, दो सौ वर्ष पूर्व भी केरल में ‘स्वाति तिरुनाल’ के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा राम वर्मा (1813-1846) ने हिंदी की कालजयी कृतियाँ रचीं थी जो वहां के जनजीवन में अब भी परम्परागत रूप से आदर पूर्वक बोली सुनी जाती हैं. दशकों पूर्व से कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से ‘युग प्रभात’ नाम के अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक हिंदी पत्र  और हिंदी विद्यापीठ (केरल) से ‘संग्रथन’ मासिक पत्रिका और कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की ओर से “हिंदी प्रचार वाणी” का प्रकाशन हो रहा है। हिंदी समर्थक पहल को वापिस लेनें के स्थान पर आज अधिक आवश्यक हो गया है कि दक्षिण के जनसामान्य की भावनाओं को न समझनें वालें और अनावश्यक हिंदी विरोध की राजनीति करनें वालों के प्रति कठोर रूख रखा जाए और ऐसे असंतोष उपजा रहे दक्षिणी नेताओं पर कठोरता से अंकुश भी लगाया जाए।

कहीं भी कोई क्षेत्र महानगर का स्वरूप ले पाता है, जब उनमें सह-अस्तित्व की भावना हो। बेंगलुरु ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया। आप याद कर सकते हैं,बरसों पहले शिवसेना ने किस तरह दक्षिण भारतीयों और हिंदी भाषियों को जलील करने की कोशिश की थी, पर वह सिरे से नाकाम रही। कोलकाता और चेन्नई में भी कभी हिंदी विरोध का दावानल फूटा करता था, पर अब वह अतीत का किस्सा है। राजनेता बंबई को मुंबई, बंगलोर को बेंगलुरु, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता को कोलकाता या गुड़गांव को गुरुग्राम बना सकते हैं, मगर सिर्फ बोर्ड पर नया नाम पोत देने से शहरों की आत्मा नहीं बदला करती।

1991 के आर्थिक उदारीकरण की बड़ी देन है। इससे हिन्दुस्तान में कॉरपोरेटीकरण को बढ़ावा मिला और नई तकनीक के आगमन से बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम, नोएडा जैसे ‘हब’ विकसित हुए। इन उभरते महानगरों का विकास यह भी जताता है कि हमें अपने मानसिक अवरोधों से मुक्ति पाने की कितनी जरूरत है? हर नया आगंतुक अपने साथ अपनी संस्कृति के मूल तत्व लेकर आता है और जहां जा बसता है, वहां उसके पौधे रोपता चलता है।

आप गौर करें, तो पाएंगे कि इधर हिंदी ने अन्य भाषाओं के शब्द बड़ी तेजी से ग्रहण किए हैं। यही हाल अन्य भारतीय भाषाओं का है। जरूरत है, तो बस इसमें तेजी लाने की, क्योंकि भाषा अलगाव के अवरोधों को सबसे पहले खत्म करने की क्षमता रखती है। कहने का तात्पर्य यह है कि अँग्रेजी अपने प्रसार का एक माध्यम भर होना चाहिए&#8230;मगर इसके साथ जरूरी है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ साथ आएँ, एक दूसरे के साथ चलें, एक दूसरे की शाब्दिक, साहित्यिक, सामाजिक विरासत को खुले दिल से अपनाएँ तो हिंग्लिश खुद ही खत्म हो जाएगी। हिन्दीवालों को समझना होगा कि हिन्दी सिर्फ हिन्दी प्रदेश की भाषा नहीं है और उसका अस्तित्व और विकास भी अन्य भारतीय भाषाओं और उसकी तमाम बोलियों के साथ जुड़ा है। जाहिर सी बात है कि अगर आप राष्ट्रभाषा बनने की बात करते हैं तो वह संकुचित हृदय, शुद्धिवादिता की जिद के साथ नहीं होगा। भारतीय भाषाओं और हिन्दी को एक दूसरे के साहित्य को अपने पाठ्यक्रमों में जगह देनी होगी। मुझे विश्वास है कि अपने भाषायी क्षेत्र में तमाम बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं को जगह देकर हिन्दी जन – जन की भाषा बन सकती है और वह बनेगी, जरूर बनेगी।

बड़ों की महत्वाकांक्षा और संवेदनहीनता के बीच पिस रहा बचपन

अपराजिता फीचर्स डेस्क

जब हम बच्चे थे तो बड़ों की हर बात बुरी लगती थी और आज जब हम बड़े हो चुके हैं तो हम बच्चों को समझना नहीं चाहते। हम उनकी हर बात को वैसे ही समझना चाहते हैं, जैसे हम समझना चाहते हैं हमने बच्चों के लिए ऐसी दुनिया तैयार कर दी है जहाँ हम कभी खुद नहीं रहना चाहेंगी..बच्चे घृणा झेल रहे हैं और हम अपनी नफरतों को उन पर थोप रहे हैं। बच्चों की दुनिया में हम बड़ों ने अपनी नफरत और महत्वाकांक्षा का जहर घोल रखा है। वे बच्चे भी खुश नहीं हैं जो समृद्ध हैं और जो महंगे स्कूलों में जाते हैं। प्रद्युम्न की हत्या के मामले में ग्यारहवीं कक्षा के छात्र का नाम आता है और वजह यह है कि वह परीक्षा को टालना चाहता था इसलिए उसे हत्या ही एकमात्र विकल्प सूझ अब जरा सोचिए क्या ये इस अभियुक्त छात्र का दोष है  ये दोष हमारा है हमारी शिक्षा प्रणाली का है हमने क्या हाल कर रखा है और परीक्षा कितनी बड़ी दहशत बन गयी है जो एक सामान्य बात है मगर इसके पीछे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा और बच्चे पर अत्यधिक दबाव डालने वाली प्रवृति है जिसने एक मासूम को अपराधी बनाकर छोड़ दिया है। अच्छा&#8230;जरा सोचिए तो हम सिखा क्या रहे हैं& मुफ्त में सामान बटोरना& मेहनत और सच बोलने को बेवकूफी समझना&#8230;.रिश्वत देना और तलवे चाटना& हर बुरी चीज हमें अच्छी लगने लगी है इसलिए संजय दत्त और सलमान खान जैसे लोग आदर्श बन जाते हैं जो कानून को अपने हाथ में लिए घूमते हैं आप जब झूठ बोलते हैं, हिंसा करते हैं तो वह सब आपके बच्चे देख रहे हैं होते हैं। आप घर में शराब की पार्टी करेंगे तो आपको आवेश जैसे बच्चों से कैसे बात करेंगे& जो शराब को आम सी चीज समझते हैं हर मां – बाप चाहता है कि उसका बच्चा एक अच्छा  इंसान बने& उसकी इज्जत करे मगर क्या हर मां – बाप अपनी जिन्दगी में ये सारे सिद्धांत लेकर चलता है मॉल कल्चर में आप प्रकृति को खत्म किए जा रहे हैं तो बच्चा पेड़ लगाना कैसे सीखेगा? बच्चा सिर्फ मां – बाप से नहीं सीखता& उसके भाई –बहन, बुआ..मासी..नानी& चाचा& सब उसकी जिन्दगी का हिस्सा है..बच्चा अगर गालियां देता है चोरी करता है तो उसे पीटने से पहले एक बार अपनी जिंदगी पर नजर डालिए। सीरिया और पाकिस्तान जैैसे आतंकपोषित देश में बच्चों की स्थिति कैसी है&#8230;यह बताने की जरूरत नहीं है और यह तोहफा हम बड़ों ने ही दिया है।