Sunday, July 12, 2026
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छठ में इसलिए बनाते हैं चूल्हे पर प्रसाद

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छठ पूजा में छठ का प्रसाद चूल्हे पर बनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. व्रती खरना का प्रासद जैसे गुड़ की खीर , ठेकुआ और रोटी नए चूल्हे पर ही बनाते हैं। इसके पीछे ये मुख्य कारण और मान्यताएं हैं…
इसके अलावा अर्घ्य वाले दिन भी छठी मैय्या के लिए ठेकुआ, पूरी आदि प्रसाद नए चूल्हे पर ही बनाया जाते हैं।
कथित तौर पर इस दिन चूल्हे पर खाना बनाने की कई मान्यताएं जुड़ी है. मान्यता है कि जिस चूल्हे पर छठ का प्रसाद बनता है उसपर इससे पहले खाना नहीं बना होना चाहिए. यानी चूल्हा नया होना चाहिए और प्रसाद बनाने के लिए आम की लकड़ी ही जलाई जाती है।
आमतौर पर हम घर में जिस चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं उसमें प्याज-लहसुन या मांसाहार वाली चीजें बनी होती हैं. तो इसलिए इसपर छठ का प्रसाद नहीं बनाया जाता।
छठ में ऐसे चूल्हे या बर्तन का प्रयोग करना चाहिए जिसमें पहले कभी नमक वाली चीजें न बनी हों.
इसके अलावा छठ का प्रसाद हमेशा घर के बाहर छत पर या आंगन में खुले जगह पर बनाना चाहिए।
जहां प्रसाद बनाएं उस जगह को पानी से अच्छे से साफ कर लेना चाहिए. अगर मिट्टी की जगह पर चूल्हा बना रहे हैं तो इस जगह को गाय के गोबर से लीप लें।
अगर आपने छठ पर मिट्टी का चूल्हा नही बनाया तो बाजार से टीन का परंपरागत चूल्हा भी खरीद कर इस पर प्रसाद बना सकते हैं।
इसके अलावा तीन ईट को चूल्हे आकार में रख कर भी प्रसाद बनाया जा सकता है।

(साभार – पकवान गली)

देश – दुनिया को छठ से जोड़ बिहार की खुशबू फैलाते प्रवासी बिहारी

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सुषमा त्रिपाठी

छठ पूजा अब ग्लोबल हो रही है….दूर विदेशों तक जा रही है। गंगा मइया के घाट न सही….ताल – पोखर न सही….मगर जो जहाँ है…वहीं से छठी मइया को पुकार रहा है। छठ पूजा हर एक बिहारी का मान है…जो बिहार में हैं….उनके लिए तो बंगाल की दुर्गापूजा वाला उल् लास ही है मगर जो वहाँ नहीं हैं….उनके लिए छठ पूजा कसक है और इस कसक को वे उत्सव बना रहे हैं….बिहारी के दिल से आप बिहार को नहीं निकाल सकते…फ्लैट और अपार्टमेंट की बंद संस्कृति में छठ पूजा ताजा हवा के झोंके की तरह है जो सांस लेने का मौका देती है…प्रकृति के पास ले जाती है…अपने अंह के आसमान से उतर कर थोड़ी देर के लिए हम वो बनते हैं….जो हम वाकई है। छठ पूजा जमीन से जुड़ने का एहसास है जो हमें मजबूत और आस्थावान बनाता है…प्रदूषण के बोझ से हाँफते शहर में सूर्य की आराधना…उसकी उर्जा से खुद को भरना एक ऑक्सीजन की तरह है। छठ की छुट्टी पाने के लिए महीनों से तैयारी, बॉस को समझाना, ओवरटाइम करना और ठसाठस भरी ट्रेन में जाना….ये बताता हैै कि छठ बिहारियों के लिए क्या महत्व रखता है। ऐसा ही एक वीडियो इस बार वायरल हुआ है जिसमें छठ की छुट्टी न मिलने पर एक युवक बॉस को छठ पूजा के महत्व के बारे में बताता है और अंत में छुट्टी मंजूर हो जाती है।

दरअसल, छठ स्त्रियाँ मुख्य रूप से करती हैं मगर पुरुष भी शामिल होते हैं और वे छठ पूजा करते भी हैं…बिहारियों का ऐसा त्योहार जो पूरे परिवार को बाँधता है…परदेस में बैठे बेटों को वापस कुछ दिन के लिए घर लाता है….माओं के चेहरे की मुस्कान देता है…छठ पूजा सिर्फ बेटों के लिए नहीं होती…बेटियों के लिए भी होती है। देखने में अजीब लग सकता है मगर भुईपरी छठ की बाध्यता नहीं है बल्कि इसे लोग अपनी इच्छा से करते हैं और यह मन्नत पूरी होने पर की जाती है  मगर जैसा कि कवियित्री रश्मि भारद्वाज ने फेसबुक पर अपनी पोस्ट में लिखा कि समय के साथ कुछ बदलाव होने चाहिए जिससे इस पर्व में भी समानता का सूर्य उगे…तो वह बात सही है…छठ पूजा अब किसी एक राज्य का उत्सव नहीं है…बल्कि वह राष्ट्रीय और वैश्विक रूप धारण कर रही है और यह प्रवासी बिहारियों के कारण हुआ है जिन्होंने अपनी कर्मस्थली को ही बिहारमय बना दिया है। इसी तरह का एक वीडियो पिछले साल छठ पूजा पर आया था। उस गाने में मेट्रो में नौकरी करता एक लड़का छठ पर बहन का मैसेज देख, न जाते-जाते घर निकल जाता है। घाट पर बेटे को अचानक पाकर माँ की खुशी अनायास ही आपको भावुक कर जाती है।

हम शारदा सिन्हा के बारे में जानते हैं…उनके बगैर तो बिहार की लोकगीत परम्परा का इतिहास ही लिखना असम्भव है..भोजपुरी को बिहार से बाहर ले जाने और समसामायिक बनाने का प्रयास शारदा सिन्हा का ही है। जिस तरह होली और दिवाली किसी एक राज्य के नहीं हैं, उसी प्रकार छठ भी अब सिर्फ बिहार का नहीं रहा…वह पूरे देश का त्योहार बनता जा रहा है। मल्टीनेशनल कम्पनियों में काम कर रहे बिहारी बिहार और छठ की खुशबू हर जगह फैला रहे हैं और सोशल मीडिया के प्रसार ने इस अभियान को और तेज किया है।  कुछ सालों से क्रांति प्रकाश झा के प्रयास से यह मुहिम और तेज हो रही है…छठ पर उनके वीडियो एक नयी परम्परा रच रहे हैं और पूरे देश से इसको जोड़ रहे हैं। पिछले साल उनका एक वीडियो आया था जिसमें शारदा सिन्हा ने आवाज दी थी। इस वीडियो में विदेश में रह रहे एक शिक्षित और नौकरी करने वाले दम्पति को छठ करते हुए दिखाया गया है। वीडियो में पत्नी किसी और राज्य की है और पति बिहार का है।

https://youtu.be/Ba7hfsXDweM

माँ के फोन में छठ न कर पाने की कसक, पति का यादों को ताजा कर खुश होना और फिर उदासी…उस पर पत्नी का उधेड़बुन में पड़ना और दृढ़ निश्चय से परम्परा को थाम लेना..यह परम्परा को आधुनिकता से जोड़ देता है। वीडियो बेहद लोकप्रिय हुआ था। ये वीडियो उन लोगों के लिए भी एक सन्देश है जो ये सोचते हैं, ‘अरे छठ तो बिहार का उत्सव है। छठ सामूहिकता का उत्सव है और प्रकृति से जुड़ने का उत्सव है…कृतज्ञता ज्ञापित करने का उत्सव है…जुड़ना और जोड़ना ही जीवन की धारा को गति देता है।

क्रांति प्रकाश झा का इस साल भी नया वीडियो आया है जिसमें बिहार की युवती को दिखाया गया है। उसका विवाह पंजाबी परिवार में हुआ है। वह माँ बनने वाली है और उसके लिए पूरा परिवार छठ करता है जिसमें पति, सास और श्वसुर सब शामिल हैं…ऐसे में यह वीडियो सामूहिकता के साथ एकता का संदेश देता है। इसमें सबसे अच्छा दृश्य तब का है जब पति पत्नी को कहता है कि घर के परम्परा खत्म न होई और व्रत भी वही करता है पूरे परिवार के साथ। एक  दूसरे की संस्कृति को अपनाना और उसका सम्मान करना ही तो हमें जोड़ेगा। कल्पना पटवारी मूल रूप से असम की गायिका हैं जिनका विवाह एक मुस्लिम परिवार में हुआ है। उनकी आवाज की मिठास आपको एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है। वह भिखारी ठाकुर पर भी काम कर रही हैं। उनके ताजा वीडियो में एक मुस्लिम परिवार को पूरी श्रद्धा के साथ यह पर्व करते दिखाया गया है। यह पर्व अब राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी बनता जा रहा है।

दरअसल, अश्लील गीतों ने भोजपुर की संस्कृति को ऐसी चोट पहुँचाई है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है मगर भोजपुरी में ऐसे तमाम गीत हैं जो रूढ़ियों को तोड़ने और परम्परा की बात करते हैं…सस्ती लोकप्रियता पाने वालों ने इस पर ध्यान नहीं दिया मगर इसका तोड़ हम बिहारियों को निकालना होगा जो इन गीतों के कारण बिहार और भोजपुरी के नाम पर तड़प उठते हैं। क्रांति प्रकाश ने इसे एक ग्लैमर दिया है..बॉलीवुड को जोड़ा है..ऐसी कोशिश हम भी कर सकते हैं। भोजपुरी की रचनात्मकता को खोजिए…ऐसे गीत लिखिए जो भोजपुरी समाज में जागरुकता की हवा को आग दें…यह कोई और नहीं करेगा…हमको और आपको करना होगा।

लिटरेरिया 2017 : सृजनात्मक का भरोसा दे गये हिमाकत के चार दिन

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नीलांबर द्वारा आयोजित चार दिवसीय साहित्योत्सव लिटरेरिया एक नयी उम्मीद और विश्वास की जमीन देता गया। साहित्योत्सव की शुरुआत राष्ट्रीय परिसंवाद से हुई। इस परिसंवाद में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, इतिहास बोध तथा वर्चस्व की राजनीति विषय पर सारगर्भित चर्चा हुई। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए आलोचक तथा प्रोफेसर पंकज चर्तुवेदी ने फासीवाद के बढ़ते खतरों से अवगत करवाया। उन्होंने कहा  कि  हमें प्रतिक्रियावादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से बचाना होगा। प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तथा आलोचक वेद रमण पांडेय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की व्याख्या करते उसे यूरोप की देन बताया और प्रख्यात आलोचक रामविलास शर्मा के उद्धरण के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा ने भारत में राष्ट्रवाद की मुक्कमल तस्वीर रखी।

विश्व में एक छवि बनाने के लिए भारत को एक पहचान की जरूरत है और परम्परा को समझने के लिए संस्कृत सीखनी चाहिए। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में सबकी सम्मिलित भागीदारी जरूरी है और वह किसी एक राजनीतिक पार्टी की देन नहीं है। युवा आलोचक राहुल सिंह ने कहा कि आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भूमिका वर्चस्ववादी राजनीति तय कर रही है। परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक तथा वरिष्ठ आलोचक डॉ. शम्भुनाथ ने कहा कि भारत एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है, यहां की सर्वसमावेशी संस्कृति ही हमारी एकता की आत्मा है।

समारोह का उद्घाटन अहाना ठाकुरता के नृत्य से हुआ। स्वागत भाषण नीलांबर के अध्यक्ष डॉ. विमलेश त्रिपाठी ने दिया। परिसंवाद का संचालन खिदिरपुर कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ. इतू सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन संजय जायसवाल ने दिया।

13 अक्टूबर लिटरेरिया के दूसरे दिन कविता कोलाज, माइम, ‘एक रोज’ नाटक का मंचन और काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इस कविता कुम्भ में वरिष्ठ कवि मंद्राकांता सेन, मदन कश्यप, कुमार अम्बुज, पंकज चतुर्वेदी, शहंशआह आलम, पूनम विश्वकर्मा, विनय सौरभ, विरू सोनकर, पंखुरी सिन्हा, प्रशांत विप्लवी, हेमन्त देवलेकर, नीलकमल, रश्मि भारद्वाज, मनीषा झा,राज्यवर्द्धन, कल्पना झा, निशांत, समेत कई वरिष्ठ कवियों ने कविता पाठ किया। दूसरी तरफ विहाग वैभव, गौरव पांडेय, मुकेश कुमार, अंकिता रासुरी अन्य युवा कवियों ने भी प्रभावित किया। इस अवसर पर कवि हेमन्त देवलेकर के काव्य संग्रह गुल मकई का लोकार्पण भारतीय भाषा परिषद के निदेशक तथा वरिष्ठ आलोचक शम्भुनाथ ने किया। हेमन्त देवलेकर की इस कविता संग्रह की कुछ कविताओं पर एक नीलांबर द्वारा  कविता कोलाज प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त माइम और नाटक “एक रोज” का मंचन भी किया गया। ममता पांडेय द्वारा निर्देशित नाटक एक रोज में – नीलू पांडेय ने एकल अभिनय किया तथा माइम में सुशांत दास, पंकज सिंह, प्रियंका सिंह, निधि पांडेय, मधु सिंह, स्नेहा सिंह, और उर्मि ने अभिनय किया ।

लिटरेरिया के तीसरे दिन एक सांझ कहानी के अंतरगत वंदना राग और चंदन पांडेय की कहानियों पर आधारित फिल्मों की प्रदर्शनी हुई । जिसमें ऋतेश पांडेय, विमलेश त्रिपाठी, कल्पना झा, आशा पांडेय, विशाल पांडेय ने अभिनय किया । इसके साथ ही विहान ड्रामा वर्क्स द्वारा नाटक हास्यचूड़ामणि का मंचन हुआ । कार्यक्रम का सफल संचालन आनंद गुप्ता, निर्मला तोदी, संजय जायसवाल एवं ममता पांडेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन मनोज झा ने दिया।

लिटरेरिया कोलकाता के चौथे दिन शरत सदन सभागार में अ टेल आफ फिश माइम की प्रस्तुति हुई। सुशांत दास ने इसमें एकल अभिनय किया। नीलाम्बर के सदस्यों की ओर से अष्टभुजा शुक्ल की कविता पर आधारित कविता कोलाज प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर युवा लेखक विमलेश त्रिपाठी की किताब केदारनाथ सिंह, लोक संस्कृति और आधुनिकता का द्वंद्व का विमोचन कवि कुमार अम्बुज ने किया।

रश्मि बंद्योपाध्याय के निर्देशन में एक अभिनव भाव नृत्य की प्रस्तुति हुई। नीलाम्बर संस्था की ओर से प्रख्यात नाट्यकर्मी रवि दवे की स्मृति में रवि दवे स्मृति सम्मान – 2017 कोलकाता की नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन को रंगमंच में विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया।

इस अवसर पर भोपाल की नाट्य संस्था विहान ड्रामा ने अमृता प्रीतम के जीवन पर आधारित नाटक अमृता का मंचन किया गया। इस आयोजन में देश के अलग अलग हिस्से से आए साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया।

कार्यक्रम का संचालन कल्पना झा और धन्यवाद ज्ञापन रितेश पांडे ने दिया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में ममता पांडे, भरत साव, अवधेश, दीपक ठाकुर, राहुल शर्मा, विशाल पांडे, पूनम सिंह, सुजीत राय, पंकज सिंह, प्रिया पांडे, निधि पांडे, मधु सिंह, प्रियंका सिंह आदि ने भरपूर सहयोग दिया।

किदांबी श्रीकांत ने जीता डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज खिताब, कोरियाई खिलाड़ी को दी मात

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 ओंडेसे : भारत के नंबर एक पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी किदांबी श्रीकांत ने रविवार को डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज खिताब अपने नाम कर लिया। फाइनल मुकाबले में श्रीकांत ने दक्षिण कोरियाई खिलाड़ी ली ह्यून इल  को सीधे सेटों में 21-10, 21-5 से मात दी।

एक तरफा रहे फाइनल मुकाबले में श्रीकांत ने कोरियाई खिलाड़ी को कोई मौका नहीं दिया। शानदार फॉर्म में चल रहे किदांबी ने आसानी से ली ह्यून इल को रौंदकर इस साल तीसरे सुपर सीरीज खिताब पर कब्जा किया।

श्रीकांत ने शुरुआत से ही अपने विरोधी खिलाड़ी पर दबाव बनाए रखा। पहले गेम में भले ही ली ह्यून 4-4 की बराबरी पर थे लेकिन श्रीकांत ने शानदार खेल दिखाते हुए पहला गेम 21-10 से अपने नाम कर लिया और 1-0 की बढ़त बना ली। दूसरे गेम में भी किदांबी ने अपनी रिदम को बरकरार रखा और 21-05 से जीत दर्ज कर खिताब अपने नाम कर लिया।

 

मलेशिया को हराकर भारत ने दस साल बाद जीता एशिया कप

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ढाका, 22 अक्तूबर (भाषा) भारत ने एशिया कप हाकी चैंपियनशिप में आज यहां मलेशिया की कड़ी चुनौती के बावजूद 2-1 से जीत दर्ज करके दस साल बाद इस महाद्वीपीय प्रतियोगिता में अपना परचम लहराया और कुल तीसरी बार खिताब अपने नाम किया। भारत ने इससे पहले 2007 में चेन्नई में एशिया कप जीता था। उसने 2003 में कुआलालम्पुर में पहली बार यह टूर्नामेंट अपने नाम किया था।

भारत पहली बार फाइनल में मलेशिया के खिलाफ फाइनल में खेल रहा था तथा रमनदीप सिंह (तीसरे मिनट) और ललित उपाध्याय (29वें मिनट) के गोल की बदौलत वह तीसरी बार यह खिताब जीतकर चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान की बराबरी करने में सफल रहा। दक्षिण कोरिया ने सर्वाधिक चार बार एशिया कप जीता है।

मलेशिया की टीम ने हालांकि आखिर तक भारत को कड़ी चुनौती दी। उसकी तरफ से एकमात्र गोल शाहरिल सबाह ने 50वें मिनट में किया। विश्व में छठे नंबर की टीम भारत के लिये अंतिम दस मिनट काफी बैचेनी भरे रहे क्योंकि मलेशिया ने इस दौरान लगातार हमले करके भारतीय रक्षापंक्ति को व्यस्त रखा।

भारतीय रक्षकों ने भी हालांकि अच्छा प्रदर्शन किया और मलेशिया के तमाम प्रयासों को नाकाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इस तरह से भारत पहली ऐसी टीम बन गयी है जिसने एक समय में एशिया के तीनों महत्वपूर्ण खिताब एशियाई खेलों का स्वर्ण, एशियाई चैंपियन्स ट्राफी और एशिया कप अपने नाम किये हैं। भारत ने 2014 में इंचियोन एशियाई खेलों के फाइनल में पाकिस्तान को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से और पिछले साल कुआंटन में एशियाई चैंपियनशिप ट्राफी के फाइनल में भी अपने इस पड़ोसी को 3-2 से हराया था।

पाकिस्तान ने आज इससे पहले दक्षिण कोरिया को तीसरे स्थान के प्लेआफ मैच में 6-3 से हराकर कांस्य पदक जीता।

भारत के नये कोच मारिन सोर्ड के लिये यह शानदार शुरूआत है। राष्ट्रीय सीनियर पुरूष टीम का जिम्मा संभालने के बाद यह उनका पहला टूर्नामेंट था।

शीर्ष रैंकिंग का भारत इस टूर्नामेंट में अजेय रहा। उसने केवल सुपर चार में एक मैच दक्षिण कोरिया के खिलाफ 1-1 से ड्रा खेला था। इसके अलावा उसने अपने सभी मैच जीते। आज की जीत मलेशिया पर इस टूर्नामेंट में भारत की दूसरी जीत है। उसने सुपर चार चरण में अपने इस प्रतिद्वंद्वी को 6-2 से हराया था।

मलेशिया का यह टूर्नामेंट में सर्वश्रेष्ठ परिणाम है। उसने इससे पहले 2007 में कांस्य पदक जीता था।

भारत ने शुरू में ही आक्रामक तेवर अपनाये और तीसरे मिनट में ही रमनदीप के गोल से बढ़त बना दी। एसवी सुनील का शाट पोस्ट से टकराने के बाद गेंद रमनदीप के पास पहुंची थी जिन्होंने रिबाउंड पर गोल किया। इसके तुरंत बाद चिंगलेनसना का करीब से जमाया गया शाट बाहर चला गया और इस तरह से भारत ने गोल करने का सुनहरा मौका गंवाया।

मलेशिया ने 13वें मिनट में पहला पेनल्टी कार्नर हासिल किया लेकिन वह इस पर गोल नहीं कर पाया। इसके बाद राजी रहीम ने हरमनप्रीत सिंह के प्रयास को नाकाम किया। इसके एक मिनट बाद मलेशियाई गोलकीपर कुमार सुब्रहमण्यम ने आकाशदीप और अमित रोहिदास को भी गोल करने से रोका।

ललित ने मध्यांतर से ठीक पहले भारत की बढ़त दोगुनी कर दी। उन्होंने सुमित के रिवर्स हिट क्रास पर बड़ी खूबसूरती से गोल किया। तीसरे क्वार्टर में ललित और रमनदीप के पास अच्छे मौके थे लेकिन डी के अंदर से जमाये गये उनके शाट बाहर चले गये।

दो गोल से पिछड़ने के बाद मलेशिया ने चौथे और अंतिम क्वार्टर में तीखे तेवर अपनाये। सबाह ने बेहद करीब से गोल दागकर अपनी टीम को वापसी भी दिलायी। इसके बाद भारतीय रक्षापंक्ति दबाव में आ गयी। मलेशिया को इसके बाद तीसरा पेनल्टी कार्नर भी मिला। उसके पास मैच को शूट आउट में ले जाने का अच्छा मौका था लेकिन भारतीय रक्षापंक्ति ने भी दमदार खेल दिखाया।

आखिरी क्षणों में मलेशिया ने एक अतिरिक्त खिलाड़ी को उतारने के लिये गोलकीपर को भी बाहर भेजा लेकिन उसका यह दांव नहीं चल पाया।

अब सचिन तेंदुलकर की सर्वश्रेष्ठ पारियों पर कॉमिक्स

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सचिन तेंदुलकर क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं लेकिन उनके प्रशंसकों की संख्या में कमी नहीं हो रही है। अब सचिन एक नई भूमिका में लोगों के बीच पेश होंगे। मीडिया के अनुसार सचिन की बेस्ट पारियों पर अब कॉमिक्स प्रकाशित की जाएगी। यानी क्रिकेट के भगवान अब मैदान से बाहर कॉमिक्स पर छक्के-चौके मारते नजर आएंगे। यह कॉमिक्स 25 पन्नों की होगी तथा इसमें सचिन के करियर से जुड़ी दो यादगार पारियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाएगी।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार एक कॉमिक पब्लिकेशन ने सचिन पर इस तरह की जानकारी देने का फैसला किया है। सचिन तेंदुलकर की पुरानी यादगार पारियों को कॉमिक्स में बेहतर ग्राफिक्स के साथ पेश किया जाएगा। कॉमिक्स में मुश्किल क्षणों में खेली गई सचिन की पारियों के अलावा उनकी जिंदगी से जुड़े अहम पहलुओं के बारे भी बताया जाएगा। इस कॉमिक्स में सचिन एक हीरो के रूप में पेश किए जाएंगे।

सचिन ने अप्रैल 1998 में शारजाह में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दो शानदार पारियां खेली थी। इन दोनों पारियों का उल्लेख इस कॉमिक्स में किया जाएगा। हाल ही में सचिन के जीवन पर एक फिल्म ‘सचिन ए बिलियन ड्रीम्स’ भी प्रसारित हुई थी। जिसमें सचिन की जिंदगी से जुड़े कुछ अहम पहलुओं को दिखाया गया था। फैन्स के लिए यह नई जानकारी थी। जिसका जिक्र इससे पहले मीडिया में कभी नहीं हुआ था।

 

लैंगिक भेदभाव समाप्त करने के लिए सरकार ने शुरू किया ‘आई एम दैट वुमन’ अभियान

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महिलाओं के खिलाफ लैंगिक आधार पर किये जाने वाले भेदभाव को समाप्त करने के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय ने एक आनलाइन अभियान आई एम दैट वुमैन की शुरूआत की है। इस अभियान के माध्यम से मंत्रालय महिलाओं की मदद के लिए खड़ी होने वाली महिलाओं से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालना चाहता है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने लोगों से महिलाओं द्वारा अन्य महिलाओं को हानि पहुंचाने वाली महिलाओं से दूर रहने का अनुरोध किया है।

ट्विटर और फेसबुक यूजर्स से फोटो के साथ महिलाओं द्वारा महिलाओं की मदद करने वाली कहानियों को साझा करने और उन्हें आई एम दैट वुमैन के हैशटैग के साथ ऑनलाइन पोस्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इस अभियान के जरिए महिलाएं किसी भी तरह की मदद के लिए आवाज दे सकेंगी और उनकी जरूरत करने में सक्षम महिलाएं उनका सहारा बन सकेंगी। कैंपेन के पोस्टर में ‘डॉटर इन लॉ’ और ‘मदर इन लॉ’ में से ‘लॉ’ शब्द को हटाने की बात कही गई है। कई महिलाओं ने अपनी बहू की फोटो के साथ अपनी तस्वीर साझा की है और कहा है कि वे उन्हें बेटी के जैसे मानती हैं।

एक सरकारी बयान के अनुसार महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका संजय गांधी ने कहा, जब किसी महिला को उसके स्त्रीत्व का समर्थन मिलता है, तो वह अजेय हो सकती है। इस अभियान के माध्यम से हमारा उद्देश्य महिलाओं द्वारा महिलाओं के लिए किए गए भारी योगदान पर प्रकाश डालना है। एक सास अपनी बहू की सबसे अच्छी साथी हो सकती है। अब समय आ गया है कि हम बहू को बहू ना मानकर बेटी मानें। लोगों ने इस हैशटैग का इस्तेमाल भी करना शुरू कर दिया है। कई सारी महिलाओं ने हैशटैग के साथ अपनी तस्वीरें और कहानियां साझा की हैं।

उन्होंने कहा, एक महिला प्रबंधक बहुत आसानी से अपनी कनिष्ठ महिलाकर्मी के साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार कर सकती है और उसे सफलता की सीढ़ी चढ़ने में मदद कर सकती है। इसी प्रकार, एक महिला मकान मालकिन अपनी महिला किरायेदार के साथ प्रेम भरा व्यवहार करके उस युवा लड़की को घर से दूर घर जैसा ही वातावरण उपलब्ध करा सकती है। इ आई एम दैट वुमैन अभियान में शामिल होकर इस संदेश को फैलायें कि एक महिला दूसरी महिला के लिए कठिन से कठिन कार्य कर सकती है।

 

भोजपुरी गीत

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बाबा कवने नगरिया जुआ खेललऽ

बाबा कवने नगरिया जुआ खेललऽ
कि हमरा के हारि अ‍इलऽ, हमरा के हारि ह‍इलऽ

बेटी अवध नगरिया जुआ खेललीं तऽ
तोहरा के हारि अ‍इलीं, तोहरा के हारि अइलीं ।

बाबा कोठिया-अँटरिया काहे ना हरलऽ
कि हमरा के हारि अ‍इलऽ, हमरा के हारि ह‍इलऽ

बेटी कोठिया-अँटरिया हमार लछिमी तऽ
तू हऊ पराया धन तू हऊ पराया धन ।

बाबा भैया-भ‍उज‍इया काहें ना हरलऽ
कि हमरा के हारि अ‍इलऽ, हमरा के हारि ह‍इलऽ

बेटी पुतवा-पतोहिया हमार लछिमी तऽ
तू हऊ परायाधन-तू हऊ परायाधन ।

बाबा ग‍इया-भँइसिया काहे न हरल कि
कि हमरा के हारि अ‍इलऽ, हमरा के हारि ह‍इलऽ

बेटी ग‍इया-भँइसिया हमार लछिमी तऽ
तू हऊ पराया धन तू हऊ पराया धन ।

भावार्थ यह विवाह-गीत है । लड़की अपने पिता से पूछती है कि बाबा! आप किस नगर में जुआ खेल कर आ रहे हैं जहाँ आप मुझे हार आए हैं? पिता कहता है कि मैं अयोध्या (जिस जगह लड़की की शादी हो रही है उस गाँव या शहर का नाम यहाँ जोड़ दिया जाता है) में जुआ खेलने गया था और हे बेटी! वहीं पर तुम्हेम हार आया । पुत्री कहती है कि बाबा! आपके पास तो बड़ी सम्पत्ति थी। महल कोटे अटारियाँ थीं । इन्हें आपने दाँव पर क्यों नहीं लगाया ? इन्हें हारना चाहिए था आपको। आप मुझे ही क्यों हार आए? पिता का जवाब यह है कि ये सारी सम्पदा मेरी लक्ष्मी है, मैं उन्हें क्यों हारता ! तब बेटी कहती है कि घर में से अगर किसी को हारना ही था तो भैया-भाभी भी तो थे? आख़िर आपने उन्हें दाँव पर क्यों नहीं लगाया? जनक का उत्तर यह होता है कि पुत्र-पुत्रवधू तो मेरे अपने हैं । हे बेटी तू पराया धन है इसलिए तुम्हे मैं हार आया । आगे तुम्हारी क़िस्मत । मैं अपना धन कैसे हारता ? ये हारने या जुए में लगाने की वस्तु नहीं हैं । बेटी कहती है कि हे पिता, क्या मैं तुम्हारी गाय-भैंसों से भी गई-गुज़री हूँ कि तुम उन्हें हारकर आने की जगह मुझे हार आए और वह रोती हुई विजेता के खूँटे पर बँधने के लिए विदा कर दी जाती है।

 

एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया

एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया
दू रंग नीतिया
काहे कईल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

बेटा के जनम में त सोहर गवईल अरे सोहर गवईल
हमार बेरिया, काहे मातम मनईल हमार बेरिया

दू रंग नीतिया
काहे कईल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

बेटा के खेलाबेला त मोटर मंगईल अरे मोटर मंगईल
हमार बेरिया, काहे सुपली मऊनीया हमार बेरिया

दू रंग नीतिया
काहे कईल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

बेटा के पढ़ाबेला  स्कूलिया पठईल अरे स्कूलिया पठईल
हमार बेरिया, काहे चूल्हा फूँकवईल हमार बेरिया

दू रंग नीतिया
काहे कईल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

बेटा के बिआह में त पगड़ी पहिरल अरे पगड़ी पहिरल
हमार बेरिया, काहे पगड़ी उतारल हमार बेरिया

दू रंग नीतिया
काहे कईल हो बाबू जी
दू रंग नीतिया

एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया
दू रंग नीतिया
काहे कईल हो बाबू जी दू रंग नीतिया

 

 

पेशे से डेंटिस्ट, चल नहीं सकती, फिर भी है सुपरमॉडल

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हौसला हो तो बिना पंखों के भी उड़ान भरी जा सकती है और पैर ना होने के बावजूद मॉडलिंग संभव है। इसकी मिसाल पेश की बेंगलुरु की राजलक्ष्मी ने। राजलक्ष्मी पेशे से डॉक्टर हैं। राजलक्ष्मी चल नहीं सकतीं। दस साल पहले वर्ष 2007 में हुए एक हादसे ने राजलक्ष्मी से उनके चलने की ताकत छीन ली। साल 2007 में राजलक्ष्मी को चेन्नई में चल रही एक नेशनल कॉन्फरेंस के लिए कुछ पेपर प्रेजेंट करने के लिए बुलाया गया था।

उस वक्त उन्होंने अपनी बीडीएस की परीक्षा दी ही थी. रास्ते में उनकी गाड़ी का एक्सिडेंट हो गया जिसमें राजलक्ष्मी को स्पाइनल इंजरी हो गई। हालांकि, इसके बाद भी राजलक्ष्मी ने हार नहीं मानी और अपनी आगे की पढ़ाई की। राजलक्ष्मी को साइकोलॉजी और फैशन पसंद है, इसलिए उन्होंने इसमें आगे बढ़ने का फैसला किया।

इसी दौरान राजलक्ष्मी को मिस वीलचेयर इंडिया के बारे में पता चला और उन्होंने इसके लिए एप्लाई किया, जिसके बाद उन्होंने इसमें हिस्सा भी लिया. साल 2014 में वो इसकी विजेता बनीं।

 

जोयिता मंडल बनीं भारत की पहली ट्रांसजेंडर जज

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जोयिता मंडल देश के ट्रांसजेंडर समुदाय के उन चंद लोगों में से एक हैं, जिन्होंने जिंदगी में सिर्फ मुश्किलों का दौर ही देखा। कभी भीख मांगनी पड़ी तो कभी खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी। इन सब के बावजूद जोयिता मंडल आज सफलता की मिसाल बनकर उभरी हैं। जोयिता मंडल भारत की पहली ट्रांसजेंडर जज बन चुकी हैं। जोयिता को उत्तर दिनाजपुर (पश्चिम बंगाल) के इस्लामपुर की लोक अदालत में जज नियुक्त किया गया है।

जोयिता के बचपन का दौर आसान नहीं था हर राह मुश्किल और नई चुनौतियां राह में रोड़े अटकाती रही लेकिन जोयिता हार मानने वालों में से नहीं थीं। जोयिता को बचपन से ही काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा था। स्कूल में उनका मजाक बनाया जाता। जिससे तंग आकर उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। जोयिता के बचपन का दौर आसान नहीं था हर राह मुश्किल और नई चुनौतियां राह में रोड़े अटकाती रही लेकिन जोयिता हार मानने वालों में से नहीं थीं। जोयिता को बचपन से ही काफी भेदभाव का सामना करना पड़ा था। स्कूल में उनका मजाक बनाया जाता। जिससे तंग आकर उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा।

कई बार खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़ी। बाद में जोयिता एक सामाजिक संस्था से जुड़ गईं और सोशल वर्क को अपने जीवन का आधार बना लिया। 2010 से वह सोशल वर्कर के रूप में काम कर रही हैं। जोयिता मंडल देश के ट्रांसजेंडर समुदाय के उन चंद लोगों में से एक हैं, जिन्होंने पूरी जिंदगी कठिनाईयों से लड़ते हुए एक सफल मुकाम हासिल किया है। जोयिता की जिंदगी उन सभी लोगों के लिए मिसाल है जो अपने दम पर जीवन में कुछ करना चाहते हैं।