Sunday, July 12, 2026
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अंधविश्वास से लड़कर डॉक्टर ने बचाई गर्भवती महिला की जान

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तमाम अंधविश्वास, पुराने रीति रिवाज और संसाधनों की कमी की समस्या से लड़ते हुए ओडिशा के एक डॉक्टर ने एक गर्भवती महिला की जान बचाई। ओंकार होटा ने महिला को स्ट्रेचर पर 12 किलोमीटर दूर स्थित प्राइमरी हेल्थ सेटर तक पहुंचाया जिससे उनकी जान बच सकी। ओंकार ओडिशा के पाप्पूलुरु के एक सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर में काम करते हैं। अब उनकी सोशल मीडिया की न्यूज़ फीड बधाइयों के मैसेज से भर गई है। घटना को समझने के लिए बीबीसी के प्रवीण कसम ने ओंकार से बात की। उन्होंने कहा, “एक स्थानीय पत्रकार डेबी मैती ने मुझे बताया कि एक गर्भवती महिला की जान खतरे में है और मुझे मदद करने को कहा।”
ओंकार ने बताया , “30 साल की शुभामा मार्सी चित्रकोंडा ब्लॉक के सारीगट्टा गांव में रहती हैं। पब्लिक ट्रांस्पोर्ट से ये गांव पूरी तरह से कटा हुआ है। यहां से पास के गांव में पहुंचने के लिए नदी-नालों और तंग रास्तों से होते हुए 12 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है।”


गांव की मान्यता

डॉक्टर ओंकार कहते हैं, “गांव में कोई मेडिकल सुविधा नहीं होने के कारण डिलीवरी एक झोपड़ी में ही करनी पड़ी। महिला ने एक लड़के को जन्म दिया लेकिन अधिक खून बह जाने के कारण उसकी हालत खराब होने लगी। उसे पास के हेल्थ सेंटर में ले जाना ज़रूरी था” लेकिन इस काम के लिए कोई भी गांव वाला सामने नहीं आया। गांव वालों की मान्यता है कि डिलीवरी के बाद किसी को भी महिला के आसपास नहीं जाना चाहिए। महिला कोंडारेड्डी जाति की है और उस जाति के कई लोग ऐसा ही मानते हैं। उन्होंने बताया, “आखिर में हमें एक आदमी को स्ट्रेचर लेकर साथ चलने के लिए पैसे देने पड़े। महिला का पति, वो पत्रकार जिसने जानकारी दी, और इस हेल्पर ने हेल्थ केयर सेंटर तक चलने में मदद की। मैंने मरीज़ को तुरंत ग्लूको़ज़ की ड्रिप लगाई और अपने सीनियर अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। उसकी हालत में सुधार हुआ है और वो खतरे से बाहर है।”
माओवादियों का गढ़

ओंकार के मुताबिक शुभामा की ये तीसरी डिलीवरी थी। इसके पहले डिलीवरी के समय उसके एक बच्चे की मौत हो गई थी। उन्होंने बताया, “ये माओवादियों का गढ़ है। मदद के लिए यहां ना ऐम्बुलेंस है, ना नर्स। मुझे अक्सर ऐसे हालात से गुज़रना पड़ता है, ये मेरे लिए कोई नई घटना नहीं थी। ऐसे हालात में मैं खुद को पहले इंसान और बाद में एक डॉक्टर की तरह देखता हूं।” पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए स्थानीय पत्रकार डेबी मैती ने बीबीसी को बताया कि वो अपनी बाइक पहले डॉक्टर के घर पहुंचे और फिर उन्हें लेकर वहां गए जहां डिलीवरी हो रही थी। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी सोशल मीडिया पर डॉक्टर की तारीफ की। डॉक्टर की तारीफ करते हुए उन्होंने लिखा कि ओंकार पर ओडिशा को गर्व है।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

राजस्थान के गांवों की सूरत बदल रही है 25 साल की तन्वी

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तन्वी जदवानी 25 साल की हैं। राजस्थान के कम विकसित गांवों में जाकर कमाल का काम कर रही हैं। शिक्षा का अधिकार, सबका अधिकार। तन्वी इस नारे को अपने जीवन का मूलमंत्र समझती हैं। उन्होंने शिक्षा के लिए उदासीन और बाल श्रम के दंश में जकड़े गांव के बच्चों को उनका पढ़ाई-लिखाई का हक दिलाने के लिए बीड़ा उठाया है।

योरस्टोरी से बातचीत में तन्वी ने बताया कि एक पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित होने के नाते मुझे समस्याओं की तलाश करना सिखाया गया था। जो कि वास्तव में मैंने तब करना शुरू किया जब मैंने चुरु, राजस्थान के दूर गांवों में स्थित स्कूलों में काम करना शुरू कर दिया। यहां मैंने बच्चों की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक वृद्धि से संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। वहां सभी पंद्रह कक्षाओं में बच्चे अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर पा रहे थे। वे बड़े उदासीन से रहते थे, क्लास में बहुत कम ध्यान देते थे और पढ़ाई के दौरान उन्होंने कभी भी कोई सवाल नहीं पूछते थे। लेकिन फिर भी वो रचनात्मक थे और प्रकृति के बारे में उत्सुक रहते थे। मैं उनको नए-नए क्राफ्ट सिखाती थी, उसके लिए वो बड़े उत्साह से हमेशा तत्पर रहते थे। उनकी इस रुचि को देखकर मैंने अपने कक्षाओं में औपचारिक पढ़ाई पर थोड़ा ब्रेक लगा दिया और खेल-खेल में कलात्मक कृतियां तैयार करने पर ज्यादा जोर देने लगी।

तन्वी ने कक्षाओं में बच्चों के साथ ड्राइंग बनाना शुरू कर दिया। उन्हें न सिर्फ दृश्यावली को चित्रित करना सिखाया जाता, बल्कि उनके घरों, परिवार के सदस्यों, मित्रों और पालतू जानवरों को चित्रित करने के लिए भी प्रेरित किया गया। तन्वी ने बच्चों से उनके परिवार के सदस्यों के साथ संबंधों के बारे में बात करना शुरू कर दिया। वो बच्चों के साथ फिल्में देखती हैं और खिलौने बनवाती हैं। बच्चे उन जानवरों के मुखौटे भी बनाते हैं जो वो उस दिन के लिए बनना चाहते हैं। तन्वी ने एक बहुत ही प्यारी रणनीति अपनाई। उन्होंने बच्चों के घरों और परिवार के बारे में एक दूसरे की कहानियों को बताया और इस तरह की गतिविधियों से वो इस बात को समझने के करीब पहुंच गईं कि बच्चे कैसे सोचते हैं, उन्हें किस प्रकार प्रभावित किया जा सकता है और वे क्या पसंद करते हैं और नापसंद करते हैं आदि। तन्वी ने योरस्टोरी से बातचीत में बताया, जल्द ही बच्चे मेरे साथ खुलने लगे और मुझसे प्रश्न पूछे और कक्षा में काफी अधिक ध्यान देने लगे ।

लेकिन हमारी मुलाकात के दौरान मैंने बच्चों के बारे में जाना, उन सब बातों ने मुझे हिलाकर रख दिया। मुझे पता चला कि मेरी कक्षा में सात साल के बच्चों ने खेतों में अपने माता-पिता के साथ कड़ी मेहनत की है, स्कूल के बाद कई किलोमीटर चलकर मवेशी चराने जाते थे। दस साल की छोटी सी उम्र की बच्चियों ने अपने परिवार के लिए पूरा भोजन पकाया करती हैं। उस समय के आसपास, मेरे तीन छात्रों की तेरह साल में ही शादी कर दी गई थी। इस वजह से उन्होंने स्कूल में आना बंद कर दिया था। कुछ बच्चों के माता-पिता शराबी थे, जो घर में नशे में आते थे और नशे में उनको पीटते भी थे। कुछ बच्चों के माता-पिता ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनी लड़कियों को घर के बाहर खेलने की इजाजत नहीं दी थी।

तन्वी घंटों इस बात को समझने में लगा देती थीं कि स्कूल के बाद बच्चे कहां समय बिताते हैं को और स्कूल के पर्यावरण पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। उन्हें पता चला कि इन सभी अनुभवों में एक बात कॉमन थी कि बच्चों पर घर में बहुत कम ध्यान दिया जाता था और उन्हें अक्सर कठिन परिश्रम, शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता था। और जिन सरकारी स्कूलों में वे पढ़ते थे, वे बेहतर नहीं थे। यहां उन्हें अपने शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए दंडित किया गया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं था कि उनके पास इतना कम आत्मविश्वास था और उनके लिए पढ़ाई को गंभीरता से लेना बहुत कठिन था। तन्वी को जल्द ही ये एहसास हुआ कि इस तरह का बचपन उनके मानस पर गहरा असर छोड़ सकता है।

इन सबने तन्वी को सरकारी स्कूलों में सहायता प्रणाली शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। तन्वी बताती हैं कि मुझे पता था कि मैं उन समस्याओं की हल नहीं कर सकती, जो इन बच्चों को घर पर झेलनी पड़ती है लेकिन अगर मैं स्कूल को उस जगह में बदलने की दिशा में काम कर सकती हूं जहां बच्चों के मन को समझने वाला कोई हो। इससे उन्हें भावनात्मक और मानसिक रूप से बढ़ने में मदद मिल सकती है। ताकि उनको अपनी बाधाओं से लड़ने और सफल होने के लिए उचित मौका मिले। मैंने ऐसा करने के लिए तन्वी ने कला का इस्तेमाल किया। वो बच्चों को अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इन कलाकृतियों को माध्यम बनाने के लिए प्रेरित करने लगीं। तन्वी ने इस प्रयोग में अपने अद्भुत कलाकारों दोस्तों से मदद ली जिन्होंने बच्चों के साथ कला कार्यशालाएं कीं, जहां उन्होंने उन्हें सिखाया कि कैसे एक दूसरे के प्रति संवेदनशील होना है, टीम में कैसे काम करना है, पढ़ाई पर लगातार कैसे केन्द्रित रहना हैऔर खुद को और बेहतर कैसे समझना है। तन्वी ने पाया कि इसके बाद स्कूल के वातावरण में सकारात्मकता आ गई थी। यहां तक कि स्टाफ के सदस्य भी अधिक हंसमुख नजर आने लगे थे। और बच्चों में भी सकारात्मक बदलाव दिखने लगे थे। वे विद्यालय की गतिविधियों में ज्यादा से ज्यादा भाग लेने लगे और अब वो अधिक चौकस और कम हिंसक थे। अब उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ गया था।

इन सकारात्मक बदलावों ने मुझे राजस्थान के सभी स्कूलों के लिए कला के माध्यम से सामाजिक और भावनात्मक सीखने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। यह देखते हुए कि कला अभ्यास से मानसिक और भावनात्मक विकास होता है, जिनसे लाभ पाकर बच्चे कक्षा में ज्यादा अच्छा परफॉर्म करते हैं। मैंने इसे एक समस्या का समाधान के रूप में देखा। और इसलिए मेरी फेलोशिप के बाद, मैं उदयपुर में स्थानांतरित हो गई। ये स्थानीय कलाओं से समृद्ध जगह थी और मैंने यहां चार स्कूलों में काम करना शुरू कर दिया। हमारी परियोजना का विचार विभिन्न कला रूपों के माध्यम से सामाजिक और भावनात्मक कौशल सीखना था। हमारी परियोजना के माध्यम से, हम विभिन्न कला रूपों के साथ प्रयोग करते हैं, प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ सहयोग करते हैं और बाद में एक पाठ्यक्रम बनाते हैं, जिससे शिक्षकों को बच्चों को सिखाना आसान हो जाता है।

तन्वी कलाकारों के लिए एक सामाजिक मंच बनाकर उदयपुर के अधिक से अधिक सरकारी स्कूलों में अपने कामों का विस्तार करना चाहती हैं। तन्वी के प्रोजेक्ट में चार लोगों की एक टीम हैं जो इस परियोजना पर पूर्ण समय काम करती है। ये लोग वर्तमान में अपनी परियोजना के लिए वित्तीय सहायता की तलाश कर रहे हैं और समर्थन हासिल करने के लिए एक क्राउड फंडिंग अभियान चला रहे हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

 

फिर बदला जीएसटी, अब सिर्फ 50 वस्तुओं पर लगेगा 28 प्रतिशत कर

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जीएसटी काउंसिल तय किया है कि अब सिर्फ 50 वस्पतुओं र ही 28 प्रतिशत का अधिकतम टैक्स देना होगा। इस बात की जानकारी देते हुए काउंसिल के अहम सदस्य औऱ बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने कहा कि जीएसटी परिषद ने 28 प्रतिशत कर दायरे में ज्यादातर लग्जरी, गैर-जरूरी और अहितकर आइटम सहित केवल 50 वस्तुओं को ही रखने का फैसला किया है। इस बैठक में असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा की अगुआई में गठित मंत्री समूह (GoM) द्वारा कंपोजीशन स्कीम के तहत 1 फीसदी छूट और नॉन एसी रेस्ट्रॉन्ट पर टैक्स घटाने की सिफारिश पर भी विचार किया गया। राज्यों के वित्त मंत्रियों वाला समूह जीएसटी रिटर्न फाइलिंग की प्रक्रिया पर भी विचार हुआ और इसे टैक्सपेयर फ्रैंडली बनाने की बात हुई। GST लागू होने के वक्त कहा गया था कि 4 महीने बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली की अगुआई में पैनल समग्र रूप से टैक्स दरों की समीक्षा करेगा। इसके अलावा रिटर्न फाइलिंग को आसान बनाने और छोटे व मध्यम उद्योगों के लिए राहत की घोषणा की जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं जैसे, शैंपू पर टैक्स में कटौती संभव है। इसे अब 18 फीसदी टैक्स स्लैब में लाया जाएगा। फर्नीचर, इलेक्ट्रिक स्वीच और प्लास्टिक पाइप पर भी राहत मिलेगी। पहले 227 सामान ऐसे थे जिनपर जीएसटी देना होता था। सुशील मोदी ने बताया कि पहले 62 आइटमों को सबसे उच्च कर वाले दायरे में रखा जाना था, लेकिन मीटिंग में काफी चर्चा के बाद कुछ और आइटम उस कैटिगरी में से कम किए गए। अब सिर्फ 50 आइटमों पर ही 28 प्रतिशत टैक्स लगेगा। उन्होंने बताया कि आफ्टर शेव, डिओड्रेंट, वॉशिंग पाउडर, ग्रेनाइट और मार्बल जैसे आइटमों पर अब 18 पर्सेंट टैक्स लगेगा।इसके साथ ही एयरकंडीशन्ड रेस्तरांओं में परोसे जाने वाले भोजन पर भी जीएसटी को 18 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी करने पर फैसला इसी बैठक में किया जा सकता है। काउंसिल उन सेक्टर्स में रेट कटौती कर सकती है, जिनमें पुराने टैक्स सिस्टम के तहत वस्तुओं पर एक्साइज से छूट मिली हुई थी या कम वैट लगता था और अब इनपर टैक्स अधिक हो गया है। काउंसिल टैक्स दरों पर उद्योगों की चिंताओं को दूर करना चाहती है इसलिए राजस्व पर असर का अनुमान लगाने के बाद 28 फीसदी टैक्स स्लैब की वस्तुओं पर टैक्स कटौती की जा सकती है। जीएसटी लागू होने के बाद जीएसटी में टैक्स के पांच स्लैब के चलते बड़े कारोबारी परेशान तो हो ही रहे हैं, छोटे कारोबारी भी काफी मुसीबत झेल रहे हैं। कारोबारियों ने तीन स्लैब की वकालत की है। व्यापारियों का यह भी कहना है कि कमोडिटी के नाम को लेकर जो कोड दिए गए हैं, वे भी समस्याएं पैदा कर रहे हैं। कारोबारी चाहते हैं कि एक प्रकार के कारोबार का कोड एक ही कर दिया जाए, इससे ऑनलाइन समस्याएं काफी हद तक दूर हो जाएंगी। इससे शैम्पू, डियोडरेंट, टूथपेस्ट, शेविंग क्रीम, आफ्टरशेव लोशन, जूतों की पॉलिश, चॉकलेट, च्यूइंग गम तथा पोषक पेय पदार्थ जैसी वस्तुएं अब सस्ती हो जाएंगी।

 

बच्चों ने आयोजित किया बच्चों का बाल फिल्मोत्सव

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हाल ही में मालदा में बच्चों ने पहली बार बाल फिल्मोत्सव आयोजित किया। यह 17वां फिल्मोत्सव यूनिसेफ, तलाश और सिने सेंट्रल कोलकाता द्वारा आयोजित किया गया और 12 दिन तक चला। इस बाल फिल्मोत्सव का उद्घाटन मालदा के अतिरिक्त जिलाशासक देवतोष मंडल ने किया। इस आयोजन में ओल्ड मालदा, गाजोल, हबीबपुर और रतुआ ब्लॉक के बच्चों ने भागेदारी की। इस बाल फिल्मोत्सव का उद्देश्य वंचित बच्चों तक पहुँचना था। इस आयोजन की परिकल्पना, प्रबंधन, वॉलेंटियर और मीडिया तक की जिम्मेदारी बच्चों ने उठायी। फिल्मोत्सव की शुरुआत फिल्म चैप्लिन से हुई। समारोह में यूनिसेफ की सम्पर्क विशेषज्ञ मोमिता दस्तिदार, तलाश की एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर आयशा सिन्हा और सिने सेंट्रल के संयुक्त सचिव प्रणव दासगुप्त भी उपस्थित थे।

जलवायु परिवर्तन की कीमत हमने ऋतुओं के असमान्य परिवर्तन के रूप में चुकायी है : यादवेंद्र

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कोलकाता : साहित्यिकी ने भारतीय भाषा परिषद में गत 11 नवंबर “पर्यावरण चेतना : सृजन और सरोकार ” विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया। साहित्यकार और पर्यावरणविद यादवेन्द्र ने “पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासतें” विषय पर दृश्य चित्रों‌ के माध्यम से अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की कीमत हमने ऋतुओं के असमान्य परिवर्तन के रूप में चुकायी है। गंगोत्री ग्लेशियर लगातार पीछे की ओर खिसकता जा रहा है। पांच छः सालों के बाद केदारनाथ मंदिर में चढ़ाया जानेवाला ब्रह्मकमल खिलना बंद हो जाएगा। जलवायु परिवर्तन के लक्षणों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा  कि अगर हमने अपने चाल और व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया तो चीजें ऐसी बदल जाएंगी कि दोबारा उस ओर लौटना संभव नहीं हो पाएगा। उन्होंने राष्ट्रीय धरोहरों पर  निरंतर बढ़ते जा रहे खतरों से भी श्रोताओं को अवगत करवाया।

पर्यावरणविद सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा कि पर्यावरण और स्थानीय भाषा दोनों के साथ असमान व्यवहार होता है। पर्यावरण का अनियमित शोषण हो रहा है। नदियों का लगातार दोहन हुआ है। जागरूकता के अभाव में पानी बर्बाद होता है। आज के समय में हम विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन देख रहे हैं। केन बेतवा परियोजना के कारण बहुत बड़ी संख्या में पेड़ डूबने वाले हैं। उन्होंने अपना दर्द साझा करते हुए कहा कि आज के समय में पर्यावरण के लिए काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। इतु सिंह ने साहित्य और पर्यावरण पर अपनी बात रखते हुए कहा कि प्रकृति प्रेम हमारा स्वभाव और प्रकृति पूजा हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। उन्होंने जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय‌ आदि की कविताओं  के हवाले से प्रकृति के प्रति उनके लगाव और चिंता को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि बाद में भवानी प्रसाद मिश्र आदि ने प्रकृति प्रेम की ही नहीं प्रकृति रक्षण की भी बात की। हेमंत कुकरेती, केदारनाथ सिंह, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेन्द्रपति, मंगलेश डबराल, कुंवर नारायण,  उदय प्रकाश, लीलाधर मंडलोई, वीरेंद्र डंगवाल, मनीषा झा, राज्यवर्द्धन, निर्मला पुतुल की कविताओं में पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा बेहतरीन ढंग से उठाया गया है। अध्यक्षीय भाषण में किरण सिपानी ने कहा कि पर्यावरण में आ रहे बदलावों की वजह से हमारा अस्तित्व खतरे में है। अभी भी लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अभाव है। हम अदालती आदेशों से डरते हुए भी सरकारी प्रयासों के प्रति उदासीनता बरतते हैं। आवश्यकता है अपनी उपभोग की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की। प्लास्टिक पर रोक लगाने की बजाय उनका उत्पादन बंद होना ‌चाहिए। सचिव गीता दूबे ने संस्था की गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण देते हुए अतिथियों का स्वागत किया। वाणी मुरारका ने ‘पेड़ मैं और हम सब’ ( कवि, मरूधर मृदुल) की कविता का  पाठ किया। परिचर्चा में पूनम पाठक, विजय गौड़, विनय जायसवाल, वाणी मुरारका आदि ने हिस्सा लिया। सभागार में शोध छात्र, प्राध्यापक एवं साहित्यकार बड़ी संख्या में मौजूद थे। कार्यक्रम का कुशल  संचालन रेवा जाजोदिया और धन्यवाद ज्ञापन विद्या भंडारी ने किया।

(रिपोर्ट – साभार गीता  दूबे)

महिला हॉकी : भारत ने चीन को हराकर जीता एशिया कप

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भारतीय महिलाओं ने शक्तिशाली चीन को हराकर हॉकी का एशिया कप जीत लिया है। इस जीत के साथ टीम को 2018 के विश्व कप में सीधे प्रवेश मिल गया है। रविवार को जापान के काकामिगहारा कावासाकी स्टेडियम में खिताबी मुकाबले में भारत ने पेनाल्टी शूट आउट के जरिए चीन को 5-4 से परास्त किया। मैच में अंतिम समय तक भारत 1-0 की बढ़त पर रहा लेकिन चीन ने अंतिम दौर में गोल कर मुकाबला बराबरी पर ला दिया।

इसके बाद पेनाल्टी शूट आउट के जरिए भारत ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 5-4 से चीन को हराकर यह खिताब जीत लिया। भारतीय टीम इस टूर्नामेंट में अपराजित रही। भारतीय ‌महिलाओं ने चीन को लीग मैच में भी हराया था। जापान को हराकर फाइनल में प्रवेश किया था।
फाइनल मैच में दोनों टीमें तय समय तक 1-1 की बराबरी पर थी। इसके बाद शूट आउट का सहारा लिया गया। जिसमें भारत ने बाजी मार ली। भारत को ननजोत कौर ने 25 वें मिनट में गोलकर 1-0 से आगे कर दिया था। टीम इंडिया जीत के लिए आगे बढ़ रही थी। लेकिन चौथे क्वार्टर में 47 वें मिनट में टिनाटियान लु ने पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलते हुए मुकाबले में बराबरी हासिल कर ली। इसके बाद दोनों टीम गोल करने में नाकाम रहीं और मैच पेनल्टी शूटआउट में चला गया। भारतीय टीम चौथी बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंची थी। 1999 में उसे दक्षिण कोरिया के हाथों 2-3 से हार मिली। 2004 में टीम इंडिया इस खिताब को जीतने में कामयाब रही। 2009 में चीन ने बैंकॉक में टीम इंडिया को 5-3 से हराकर खिताब जीता था।  खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने ट्वीटर में टीम इंडिया को जीत के लिए बधाई दी है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश- पत्राचार से नहीं हो सकती तकनीकी शिक्षा की पढ़ाई

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीकी शिक्षा की पढ़ाई पत्राचार यानि कॉरेस्पॉन्डेंस के जरिए नहीं की जा सकती। यह बात कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन संस्थानों को फटकार भी लगाई जो इंजीनियरिंग जैसे कोर्स को डिस्टेंस लर्निंग से करवा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले पर ध्यान दिया वहीं ओडिशा हाई कोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया। दो साल पहले पंजाब और हरियाणा के हाई कोर्ट ने कॉरेस्पॉन्डेंस से की गई कंप्यूटर साइंस की एक डिग्री को रेगुलर पढ़ाई करके हासिल की गई डिग्री के बराबर मानने से इंकार कर दिया था। वहीं ओडिशा हाईकोर्ट ने कॉरेस्पॉन्डेंस से तकनीकी पढ़ाई लेने को सही बताया था।

 

विजय गोयल ने पद्मश्री के लिए किदाम्बी श्रीकांत के नाम की सिफारिश की

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पूर्व खेल मंत्री विजय गोयल  ने बुधवार को प्रतिष्ठित पद्मश्री अवॉर्ड के लिए भारतीय बैडमिंटन के नए सुपरस्टार किदाम्बी श्रीकांत के नाम की सिफारिश की है।

श्रीकांत ने पिछले सप्ताह फ्रेंच ओपन का खिताब जीता था। यह साल का उनका चौथा सुपरसीरीज खिताब था। श्रीकांत एक कैलेंडर वर्ष में चार सुपरसीरीज खिताब जीतने वाले भारत के पहले जबकि विश्व के चौथे शटलर बने।

संसदीय कार्य मंत्री गोयल ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा और देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए श्रीकांत के नाम की सिफारिश की। हालांकि, पद्म अवॉर्ड के नामांकनों की समयसीमा 15 सितंबर को समाप्त हो चुकी है।

गोयल ने पत्र में लिखा, ‘इस स्थिति में युवा खिलाड़ी को भारत में बैडमिंटन में उम्दा योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करने का अच्छा अवसर होगा। वो देश के युवा खिलाड़ियों के लिए आदर्श हैं और लाखों लोग उनकी उपलब्धि पर खुश हैं व उनसे प्रेरणा ले रहे हैं। कई लोगों ने मुझे पूर्व खेल मंत्री होने के नाते संपर्क किया कि श्रीकांत के नाम की सिफारिश पद्मश्री अवॉर्ड के लिए की जाए।’

उन्होंने आगे लिखा, ‘देश के लोगों की बात का सम्मान करते हुए मैं पद्मश्री अवॉर्ड के लिए श्री श्रीकांत किदाम्बी के नाम की सिफारिश करता हूं।’ बता दें कि श्रीकांत ने पेरिस में फ्रेंच ओपन सुपर सीरीज के फाइनल में जापान के केंता निशिमोटो को 21-14 और 21-13 से मात दी थी।

24 वर्षीय श्रीकांत ने इस सीजन में पांच टूर्नामेंट्स के फाइनल्स में प्रवेश किया। उन्होंने चार खिताब जीते जबकि सिंगापुर ओपन में हमवतन बी साईं प्रणीत से शिकस्त झेली।

श्रीकांत एकमात्र खिलाड़ी नहीं है, जिसके नाम की सिफारिश पद्म अवॉर्ड्स के लिए की गई हो। भारत की स्टार महिला शटलर पीवी सिंधु और पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान एमएस धोनी के नाम की सिफारिश पद्म भूषण अवॉर्ड के लिए की गयी है।

 

वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार

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नयी दिल्ली : साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला देश का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार वर्ष 2017 के लिए हिन्दी की शीर्षस्थ कथाकार कृष्णा सोबती को प्रदान किया जायेगा।

ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने आज ‘भाषा’ को बताया कि प्रो. नामवर सिंह की अध्यक्षता में यहां हुई प्रवर परिषद की बैठक में वर्ष 2017 का 53वां ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी साहित्य की सशक्त हस्ताक्षर कृष्णा सोबती को देने का निर्णय किया गया। यह पुरस्कार साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रदान किया जायेगा।

उन्होंने बताया कि पुरस्कार स्वरूप कृष्णा सोबती को 11 लाख रूपये, प्रशस्ति पत्र और वाग्देवी की कांस्य प्रतिमा प्रदान की जायेगी।

कृष्णा सोबती को उनके उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ के लिए वर्ष 1980 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। उन्हें 1996 में अकादमी के उच्चतम सम्मान ‘साहित्य अकादमी फैलोशिप’ से नवाजा गया था। इसके अलावा कृष्णा सोबती को पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

कृष्णा सोबती के कालजयी उपन्यासों ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘जैनी मेहरबान सिंह’, ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरे’ ने कथा साहित्य को अप्रतिम ताजगी और स्फूर्ति प्रदान की है। हाल में प्रकाशित ‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख’ और ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान’ भी उनके लेखन के उत्कृष्ट उदाहरण है। 18 फरवरी 1924 को गुजरात (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी सोबती साहसपूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती है। उनके रचनाकर्म में निर्भिकता, खुलापन और भाषागत प्रयोगशीलता स्पष्ट परिलक्षित होती है। 1950 में कहानी ‘लामा’ से साहित्यिक सफर शुरू करने वाली सोबती स्त्री की आजादी और न्याय की पक्षधर है। उन्होंने समय और समाज को केंद्र में रखकर अपनी रचनाओं में एक युग को जिया है।

गौरतलब है कि पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार 1965 में मलयालम के लेखक जी शंकर कुरूप को प्रदान किया गया था। सुमित्रानंदन पंत ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले हिन्दी के पहले रचनाकार थे। कृष्णा सोबती ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाली हिन्दी की 11वीं रचनाकार हैं। इससे पहले हिन्दी के 10 लेखकों को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिल चुका है। इनमें पंत, दिनकर, अज्ञेय और महादेवी वर्मा शामिल हैं।

 

अब ऑनलाइन दर्ज होगी यौन शोषण की शिकायत

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सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली महिलाएं अब कार्यस्थलों पर यौन शोषण की न केवल ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकती हैं, बल्कि उस पर कार्रवाई की निगरानी भी कर सकती हैं।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने हाल ही में केंद्र सरकार के सभी विभागों को पत्र लिखकर इस बारे में महिला कर्मियों को ‘सेक्सुअल हरासमेंट इलेक्टॉनिक बॉक्स’ और ‘शी बॉक्स’ जैसे कदम के बारे में बताने को कहा है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 24 जुलाई को इस कदम की शुरुआत की है।

डीओपीटी ने कहा कि जैसे ही शिकायत को ‘शी बॉक्स’ में दर्ज किया जाएगा, वह सीधे संबंधित मंत्रालय या विभागों की आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) के पास पहुंच जाएगी। जिसके अधिकार क्षेत्र में वह शिकायत होगी, वह उसकी पड़ताल करेगी। शी बॉक्स शिकायतकर्ता और नोडल अधिकारी को जांच की प्रगति की निगरानी का अवसर भी प्रदान करेगा। शी बॉक्स पोर्टल www.shebox.nic.in पर शिकायत की स्थिति को कभी भी देखा जा सकता है।