Wednesday, April 1, 2026
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लिटिल थेस्पियन ने पूरी की रंगकर्म की 23 साल की सृजन यात्रा

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अपराजिता की ओर से

रंगकर्म सृजन का अनूठा माध्यम है जिसमें समाज को बदलने की शक्ति है और झकझोर देने की शक्ति भी है मगर रंगमंच के संसार में अपनी पहचान बनाना इतना आसान काम नहीं है। आज भी रंगमंच को जीवनयापन का माध्यम मानने और बनाने में संकोच पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, ऐसी स्थिति में उमा झुनझुनवाला के लिए राह आसान नहीं थी। उनके सृजन कर्म की कहानी शीघ्र ही हम आपके लिए लाएँगे मगर आश्वस्त करने वाली बात यह है कि पृष्ठभूमि अलग होने के बावजूद रंगमंच की राह इनकी एक ही रही और इस राह पर चलते हुए जिस नन्हे पौधे का जन्म हुआ, अब वह एक वट वृक्ष का आकार ले चुका है और इसकी जड़ें फैलती जा रही है। रंगमंच  के संसार को उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम की जोड़ी ने और समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया हैै। रंगमंच को एक नया आयाम देना हिन्दी की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को सहेजना है और इसके लिए टिकट खरीद कर नाटक देखना एक दायित्व भी है और सहयोग भी। जिस तरह बूँद – बूँद से सागर भरता है, उसी प्रकार हमारा और आपका छोटा सा सहयोग भी इस विरासत को समृद्ध करेगा। लिटिल थेस्पियन के 23 वर्ष पूरे करने पर अपराजिता की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ और संस्था के सहयोग से प्राप्त एक आलेख जो इस सृजन यात्रा को सामने रखता है। –

रंगमंच को नयी भाषा और कलेवर देने की कोशिश लिटिल थेस्पियन

1994 में स्थापना के बाद से ही लिटिल थेस्पियन रंगकर्म के लिए प्रतिबद्ध है।  साहित्यिक और सामाजिक नाटकों के मंचन के माध्यम से समाज में कला और संस्कृति का विकास इस संस्था का मूल उद्देश्य है। लिटिल थेस्पियन हिंदी और उर्दू इन दोनों भाषाओं में नाटकों के नियमित प्रदर्शन के साथ कार्यशालाओं का सञ्चालन, सेमिनार और राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन भी करता है | कोलकाता में ये हिंदी का एकलौता राष्ट्रीय नाट्य उत्सव है – कथा कोलाज उत्सव(2010-11), जश्न-ए-टैगोर(2011-12), बे-लगाम मंटो(2012-13), जश्न-ए-रंग(2014), कृष्ण और भीष्म(2015) और जश्न-ए-रंग(2016).

लिटिल थेस्पियन ने कहानी और कविता की पाठ प्रस्तुति में अभिनय पक्ष की महत्ता को एक आवश्यक अंग मानते हुए भारतीय भाषा परिषद के साथ मिलकर इसके प्रशिक्षण के लिए तीन महीने का एक डिप्लोमा कोर्स, “कविता और कहानी का नाटकीय पाठ” भी 2016 प्रारम्भ किया है। लिटिल थेस्पियन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है रंगमंच की सर्वप्रथम उर्दू-पत्रिका रंगरस का प्रकाशन जिसे देश भर से सराहना मिल रही है। लिटिल थेस्पियन अब तक अपने इस सफ़र में 17 सम्पूर्ण नाटक, 38 कहानियाँ तथा 8 एकांकियों का मंचन कर चुका है जिनमे से 12 उर्दू, 2 नेपाली तथा शेष हिंदी में हैं.

 

नाटकों में

  1. रूहें (नाटक एवं निर्देशन- अजहर आलम),
  2. बलकान की औरतें (नाटक- जुलेस तास्का, निर्देशन- मुश्ताक़ काक),
  3. धोखा (नाटक- राहुल वर्मा, निर्देशन- अजहर आलम),
  4. कबीरा खड़ा बाज़ार में (नाटक- भीष्म सहनी, निर्देशन- अजहर आलम),
  5. रेंगती परछाइयाँ (नाटक- उमा झुनझुनवाला, निर्देशन- अजहर आलम),
  6. अलका (नाटक- मनोज मित्रा, निर्देशन- उमा झुनझुनवाला),
  7. गैंडा (नाटक- यूजीन यूनेस्को, निर्देशन- अजहर आलम),
  8. पतझड़ (नाटक- टेनेसी विलिएम्स, निर्देशन- अजहर आलम),
  9. सवालिया निशान (नाटक- इस्माइल चुनार, निर्देशन- अजहर आलम),
  10. यादों के बूझे हुए सवेरे (नाटक- इस्माइल चुनारा, निर्देशन- उमा झुनझुनवाला),
  11. हयवदन (नाटक- गिरीश कर्नाड, निर्देशन- अजहर आलम),
  12. शुतुरमुर्ग (नाटक- ज्ञानदेव अग्निहोत्री, निर्देशन- अजहर आलम),
  13. रक्सी को सृष्टिकर्ता (नाटक एवं निर्देशन- अजहर आलम),
  14. कांच के खिलौने (नाटक- टेनेसी विलिएम्स, निर्देशन- अजहर आलम),
  15. लोहार (नाटक- बलवंत गार्गी, निर्देशन- अजहर आलम),
  16. सुलगते चिनार (नाटक एवं निर्देशन- अजहर आलम) और
  17. महाकाल (अविनाश श्रेष्ठ, निर्देशन- अजहर आलम)

 

एकांकियों में

  1. ओलओकून,
  2. पहले आप,
  3. मंटो ने कहा,
  4. नमक की गुड़िया (अज़हर आलम),
  5. तमसिली मुशाएरा,
  6. दर्द का पोर्ट्रेट,
  7. सद्गति और
  8. ब्लैक सन्डे आदि शामिल हैं.

 

कथा मंच के अंतर्गत कथा कोलाज की श्रृंखला (1-8) में

  1. चंद्रधर शर्मा गुलेरी की उसने कहा था,
  2. मंटो की ठंडा-गोश्त, खोल दो, लाइसेंस, औलाद, सहाय, बू और खुदा की कसम,
  3. टैगोर की आखरी रात और दुराशा,
  4. प्रेमचंद की बड़े भाई साहब और सद्गति,
  5. अज्ञेय की बदला,
  6. मोहन राकेश की मवाली,
  7. इकबाल माजिद की सुइंयों वाली बीबी,
  8. कृष्ण चंदर की पेशावर एक्सप्रेस, शहज़ादा और दो फर्लांग सड़क,
  9. भीष्म साहनी की माता विमाता,
  10. मुज़फ्फ़र हनफ़ी की बजिया तुम क्यों रोटी हो तथा इश्क़ पर जोर..,
  11. इस्माइल चूनारा की दोपहर,
  12. मधु काकडिया की फाइल,
  13. अनीस रफ़ी की पॉलिथीन की दीवार

 

इसके अलावा अन्य और भी कहानियाँ हैं । मंटो की ठंडा गोश्त, खोल दो, सहाय और औलाद के निर्देशक अजहर आलम हैं तथा बाकी सभी कहानियाँ उमा द्वारा निर्देशित हैं। नाटकों और कहानियों के अनुवाद और लिप्यन्तरण में भी लिटिल थेस्पियन काफी सक्रिय है ताकि प्रख्यात और श्रेष्ठ साहित्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंच सके. मुक्तधारा (रवीन्द्रनाथ टैगोर, अनुवाद- उमा झुनझुनवाला व अज़हर आलम),  बलकान की औरतें (उमा झुनझुनवाला), धोखा (उमा झुनझुनवाला), गैंडा (अजहर आलम), पतझड़ (अजहर आलम), अलका (उमा झुनझुनवाला), सवालिया निशान (अजहर आलम), यादों के बुझे हुए सवेरे (अजहर आलम और उमा झुनझुनवाला) आदि नाटकों व कहानियों का अंग्रेजी और बंगला से हिंदी और उर्दू में अनुवाद तथा लिप्यन्तरण किया है। भारत रंग महोत्सव तथा देश के सभी महत्वपूर्ण नाट्य उत्सवों में लिटिल थेस्पियन की प्रस्तुतियां लगातार रहती हैं l प्रोडक्शन और निर्देशन के कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों में से पश्चिम बंग नाटक अकादमी का पुरस्कार भी महत्वपूर्ण है। लिटिल थेस्पियन के कर्णधार उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम  के साक्षात्कार की झलक –

साभार – यू ट्यूब

 

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समस्याओं से जूझने की शक्ति देता है साहित्य

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हर युग में दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए के लिए साहित्य की जरूरत पड़ती है। व्यक्ति को विवेकशील, विचारवान और संवेदनशील बनाने के साथ साहित्य समस्याओं को पहचानने की समझ देता है। साहित्य समस्याओं से जूझने की शक्ति देता है। श्री शिक्षायतन कॉलेज आयोजित हिन्दी दिवस समारोह में अतिथि वक्ता के रूप में उपस्थित कवि प्रियंकर पालीवाल ने उक्त विचार रखे। उन्होंने कहा कि साहित्यविहीन समाज संवेदना से दूर आध्यात्मिक मृत्यु को प्राप्त होता है। विषय प्रवर्तन डॉ. प्रीति सिंघी ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना से हुई। कॉलेज की प्राचार्या डॉ. अदिति दे ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने कहा कि सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी देश में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में महत्वपूर्ण है। हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित इस समारोह में रचनात्मक लेखन, काव्य पोस्टर तथा आशु अभिनय प्रतियोगिता आयोजित की गयी। रचननात्मक लेखन प्रतियोगिता में ए.जे.सी बोस कॉलेज के रणवीर कुमार राय , काव्य पोस्टर प्रतियोगिता में श्री शिक्षायन कॉलेज की अनीषा मिंज को प्रथम स्थान मिला। आशु अभिनय में श्री शिक्षायतन कॉलेज ने सर्वश्रेष्ठ दल तथा बेथुन कॉलेज की छात्रा शुभ स्वपना मुखोपाध्याय ने सर्वश्रेष्ठ अभिनय का पुरस्कार जीता। प्रथम सत्र का संचालन डॉ. रचना पांडेय तथा दूसरे सत्र का संचालन प्रो. सिन्धु मेहता ने किया। रचनात्मक लेखन की निर्णायक डॉ. मनीषा साव, काव्य पोस्टर के निणार्यक कार्तिक बासफोर थे। नाट्यकर्मी महेश जायसवाल तथा ऋतेश पांडेय ने आशु अभिनय प्रतियोगिता का निर्णय किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अल्पना नायक ने किया।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं प्रभाकर माचवे और उनका सृजन कर्म

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कोलकाता : प्रभाकर माचवे प्रयोगशीलता और सादगी की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने सताईस सालों तक साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और पांच वर्षों तक भारतीय भाषा परिषद में हिंदी भाषा और साहित्य की जो सेवा की वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। हिंदी के मूर्धन्य विद्वान डॉ.इंद्रनाथ चौधरी ने उनकी जन्मशती को महत्वपूर्ण अवसर बताते हुए यह कहा कि वे छह भाषाओं के जानकार और एक चलता-फिरता इंसाइक्लोपिडिया थे। उनके व्यक्तित्व में विरोधाभास भी अनुपूरक के रूप में काम करते थे। उन्होंने कई ग्रंथों का संपादन किया। उनके जीवन की एक बड़ी घटना महात्मा गांधी के निरीक्षण में उनका विवाह है जो 1940 में सादगीपूर्ण ढंग से नौ आने में हुआ था। वरिष्ठ पत्रकार प्रो. राममोहन पाठक ने कहा कि  प्रभाकर माचवे का व्यक्तित्व एक कुशल संचारक का व्यक्तित्व था। उन्होंने ‘चौथा संसार’ के संपादन के माध्यम से जन समस्याओं और देश की प्रगति के बाधक तत्वों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन पर प्रहार किया। ‘कलकत्ता की चिट्ठी’ नामक उनका स्तंभ पूरे देश में चर्चित हुआ। उन्होंने बिना भेद-भाव के सभी पत्र-पत्रिकाओं के लिए विपुल लेखन किया।

तारसप्तक की काव्य परंपरा का उल्लेख करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने बताया कि अज्ञेय के साथ मिलकर प्रभाकर माचवे ने तारसप्तक की योजना बनाई जो साहित्य में प्रयोगों पर जोर देती थी। उनका लक्ष्य था कि जिस तरह विज्ञान में प्रयोग होते हैं उसी तरह साहित्य की प्रगति भी निरंतर प्रयोगों से ही संभव है। अन्यथा समाज और साहित्य में रूढ़ियों का साम्राज्य स्थापित हो जाता है। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने स्वागत करते हुए कहा कि प्रभाकर माचवे भारतीय भाषा परिषद के बौद्धिक शिल्पकार थे। सभा की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध नाटयविद डॉ.प्रतिभा अग्रवाल ने उनके कुछ संस्मरण सुनाए और उनके व्यक्तित्व के कोमल पक्षों को उद्घाटित किया।  उनका कहना था कि प्रभाकर माचवे सिर्फ कवि नहीं थे वे एक अच्छे चित्रकार भी थे और वैसी बहुज्ञता आज दुर्लभ है। परिषद की मंत्री ने बिमला पोद्दार ने सभा का संचालन किया। धन्यवाद देते हुए नंदलाल शाह ने कहा कि हमे ऐसे व्यक्तित्वों का स्मरण करना चाहिए जिनका सांस्कृतिक निर्माण में महत्वपूर्ण रहा है।

 

राष्ट्रीय परीक्षण शाला में मनाया गया हिन्दी पखवाड़ा

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भारत सरकार, उपभोक्ता मामले विभाग के अधीनस्थ सॉल्टलेक स्थित राष्ट्रीय परीक्षण शाला में 14 सितंबर तक हिन्दी पखवाड़ा-मनाया गया। हिन्दी दिवस के दिन आयोजित पखवाड़ा समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में हिन्दी  दैनिक समाचार पत्र “सलाम दुनिया” की वरिष्ठ पत्रकार सुषमा त्रिपाठी उपस्थित रहीं । इसके अलावा राष्ट्रीय परीक्षण शाला के निदेशक डॉ. पी. कांजीलाल उक्त समारोह में उपस्थित थे । उक्त समारोह का संचालन इस कार्यालय के सहायक निदेशक (राजभाषा) श्री अरूण कुमार मजुमदार ने अत्यंत कुशलता पूर्वक किया।  प्रत्येक वर्ष की भाँति इस वर्ष भी हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत विभिन्न प्रतियोगिताओं जैसे – हिन्दी निबंध, वाद-विवाद, वार्तालाप, आशुपाठ, कविता पाठ, पोस्टर एवं स्लोगन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया  एवं उसमें विजित प्रतिभागियों को प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कारों से सम्मानित किया गया ।

 

हिन्दी से खेलों और भाषा को लोकप्रिय बनाते हिन्दी के कमन्ट्रेटर

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देश में खेलों को लोकप्रिय करने में भाषा की बहुत बड़ी भूमिका है। भारत में 70 फीसदी जनसंख्या हिन्दी बोलती और पढ़ती है। लिहाजा देश में अगर किसी खेल की टीआरपी बढ़ानी है तो चैनलों को हिन्दी का सहारा लेना ही पड़ेगा। हिंदी बाहुल्य जनसंख्या को देखते हुए देश में टीआरपी के लिए कई चैनल आज हिन्दी में विशेष कमेंट्री कर रहे हैं। विदेश के चैनल देश में शीर्ष बने रहने के लिए हिन्दी को आगे कर रहे हैं। यही हमारी हिंदी के महत्व को जगजाहिर कर रहा है। स्टार नेटवर्क ने हिन्दी में कमेंट्री को बढ़ावा दिया है। कुछ साल पहले लोकप्रिय स्पोर्ट्स चैनल ईएसपीएन में हिन्दी की कमेंट्री क्रिकेट की लोकप्रियता में इजाफा कर चुकी है। क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों को भी हिन्दी के जरिए लोकप्रिय किया जा रहा है। स्टार स्पोर्ट्स में प्रो कबड्डी लीग की कमेंट्री हिन्दी में हो रही है। कबड्डी खेल को समझने में हिन्दी सहायक हो रही है। इससे कबड्डी की लोकप्रियता काफी बढ़ रही है। स्टार नेटवर्क ने देश का पहला फ्री टू एयर प्राइवेट स्पोर्ट्स चैनल लांच किया है। जिसमें हिन्दी कमेंट्री को तरजीह दी गई है।

प्रो कबड्डी लीग के अलावा बीसीसीआई के घरेलू क्रिकेट और घरेलू फुटबॉल लीग के मैच भी हिन्दी कमेंट्री के साथ प्रसारित होंगे। स्टार नेटवर्क के अलावा सोनी टीवी, टेन स्पोर्ट्स में भी हिन्दी की कमेंट्री की जा रही है। बीसीसीआई के प्रसिद्ध कमेंटेटर जब आपको स्टार स्पोर्ट्स में हिन्दी में मैच की लाइव कमेंट्री करते हैं तो यह काफी रोचक होता है। हमेशा अंग्रेजी में वार्तालाप करने वाले महान सुनील गावस्कर जब क्रिकेट की बारीकी को हिन्दी में बयां करते हैं तो यह अपने आप में रोमांचक होता है।

गुजरे जमाने के विस्फोटक ओपनर वीरेंद्र सहवाग कहते हैं कि जो जजबात हिन्दी में है वह किसी भाषा में नहीं, सहवाग का यह कहना पूरी तरह सही है। जब खिलाड़ी के कमाल को हिन्दी भाषा में पूरे भाव और जजबात के साथ व्यक्त किया जाता है तो वह खेल और खिलाड़ी के रोमांच को निश्वित रूप से दुगुना कर देता है। क्रिकेट को केवल गावस्कर, कपिल और सचिन ने ही आकर्षक नहीं बनाया बल्कि वह हिन्दी के कमेंटेटरों से भी आकर्षक और लोकप्रिय खेल बना है।

देश में हिन्दी की कमेंट्री को संजय बनर्जी और सुशील दोषी, रवि चतुर्वेदी ने एक हद तक नया आयाम दिया है। दोषी की कमेंट्री से लाखों करोड़ों लोग दशकों तक अभिभूत रहे। उनकी क्रिकेट कमेंट्री दर्शकों को रोमांचित करती थी। मनीष देव, मुरली मनोहर मंजुल, सुरैश सरैया, अनंत सितलवाड़ ने भी हिंदी में क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाया। पर दोषी की कमेंट्री लाजवाब रही है। सुशील दोषी जैसे कमेंटटर ने कमेंट्री के लिए नए शब्द दिए, मुहावरे तलाशे।

रेडियो पर तो अच्छे कमेंट्रेटर रहे लेकिन टीवी पर कमेंट्री के लिए अब रिटायर्ड क्रिकटेर आगे आ गए हैं। अगर टीवी पर क्रिकेट को सुने देखें तो सुनील गावस्कर, वसीम अकरम बहुत अच्छी कमेंट्री करते रहे हैं। एक दम सधी हुई और संतुलित। कपिल देव, मोहम्मद कैफ, आकाश चोपड़ा, वीरेंद्र सहवाग, नवजोत सिद्धू भी बेहतर कमेंट्री कर लेते हैं। सुनील गावस्कर अंग्रेजी-हिंदी दोनों में बढ़िया कमेंट्री करते हैं। कई क्रिकेटरों के खेल से अलग होने के बाद कमेंट्रेटर बन जाने से टीवी में सुशील दोषी, मुरली मनोहर मंजुल, रवि चतुर्वेदी जैसे हिन्दी कमेंट्रेटरों को जगह नहीं मिल पाई।

 

कविता की जुगलबंदी से हिन्दी को समृद्ध करते तीन दोस्त

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हमारी शिकायत रहती है कि युवाओं में हिन्दी को लेकर उत्साह नहीं रहा या फिर अपनी भाषा के प्रति प्रेम नहीं है मगर एक बात तो तय है कि अँग्रेजी को लेकर हम चाहें कितनी भी बातें करें मगर इस देश के दिल में उतरना है तो आप हिन्दी से दूर नहीं रह सकते। आज सम्भवतः रोजगार के साथ यह एक बड़ा कारण है कि युवा वर्ग अपने तरीके से हिन्दी को अपना ही नहीं रहा है, रच रहा है और इस भाषा के माध्यम से न सिर्फ अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा है बल्कि गम्भीर सामाजिक मसले भी उठा रहा है। मसले ऐसे जो एक की जिन्दगी से जुड़े होते हैं मगर इनसे समाज भी बनता है और देश भी। अब यही काम मुम्बई की मायानगरी में तीन दोस्त कर रहे हैं और इन तीनों की जुगलबंदी सोशल मीडिया पर धूम मचा रही है।

अगर आप सोशल मीडिया पर हैं तो आपके सामने बोल पोएट्री की क्या तुम समझती हो, वीडियो के रूप में आई जरूर होगी और अगर आप खुद ऐसी समस्या से परेशान हैं या यह आपके दिल से टकराती है तो यह इसी वीडियो की देन है।

” क्या तुम समझती हो” जी हाँ यही नाम है इनके विडीओ का, जो आपके किसी ना किसी फ़ेसबुकिया दोस्त की टाइमलाइन पर पर मिल जाएगा। पति-पत्नी और सास के रिश्तों में बढ़ती कड़वाहट को दर्शाता यह वीडियो अपने रिलीज़ के पहले ही दिन एक मिलियन और दूसरे दिन भी इतनी ही तेज़ी से दो मिलियन से ज़्यादा बार देखा गया।

इस जुगलंदी में एक सुर बंगाल का भी है जो हावड़ा का ही है। मूल कविता के कवि धीरज पांडेय हावड़ा में ही रहते हैं और वह कभी पत्रकार हुआ करते थे। फिलहाल कविता से रिश्ता गहरा है और मुम्बई के एक प्रोडक्शन हाउस में हैं। धीरज ने  अपनी सफलता का श्रेय अपनी टीम ” बोल पोयट्री” और अपने दोनों दोस्तों विहान गोयल ( अभिनेता ) और विरेंद्र राय बोल्ड ( निर्देशक) को देते हुए बताया कि उन्होंने यह कविता पहले कई बड़े प्रडक्शन हाउसों और फ़ेस्बुक/यूटूब के बड़े चैनलों को सुनाई पर सबने यह कह कर खारिज कर दिया कि कविता में दम नहीं है। हर जगह खारिज होने के बावजूद भी तीनों निराश नहीं हुए और एक सीमित बजट में कुछ दोस्तों की मदद से वीडियो को शूट किया। धीरज ने अपनी लेखनी से ज़्यादा श्रेय विहान के अभिनय और वीरेन्द्र के निर्देशन को दिया। फिलहाल यह टीम एक नए विषय के साथ अपनी नयी पेशकश की तैयारी में व्यस्त है। बोल पोएट्री की जुगलबंदी को अपराजिता की ढेर सारी शुभकामनाएँ।  वीडियो आप भी देखिए और पूछिए क्या तुम समझती हो –

Kya Tum Samajhti ho.. Vihaan Goyal's rendition of what married life, love and relationship is all about!Hope you enjoy it. ❤Do like, comment and share! Tag your friends, couples, family and colleagues..who absolutely need to watch this!Like the page so you don't miss out on new videos and event updates!Insta – @niting0yalConcept and penned by – Dheeraj PandeyShot by – Virendra RaiEdited by – SajaleditingstudioCurated by – Team Bol poetrySpecial thanks to – Tushar Rawat and teamProduced by – A.D Production Also show your love to our YouTube channel as well – http://bit.do/BolPoetryWith love,Bol Poetry

Posted by Bol Poetry on Wednesday, September 6, 2017

भारतीय भाषाओं और अपनी बोलियों को सम्मान देकर ही देश की अपनी राष्ट्रभाषा बनेगी हिन्दी

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सुषमा त्रिपाठी

दक्षिण भारत….जिसकी संस्कृति उत्तर भारत से अलग है…जहाँ इस देश की राजभाषा को राजनीति ने अवांछनीय बना दिया है। दक्षिण भारत…जिसका उसी अवांछनीय हिन्दी से एक रिश्ता है…दिल का रिश्ता…साहित्य का रिश्ता…और वह रिश्ता अपनापन खोज रहा है। आजतक क्या हमने सुना है कि राजनीति ने कभी एक किया हो? उसने तो हमेशा बाँटा है….एक तो हमेशा संस्कृति ने किया है…भाषा कभी अलग नहीं करती…वह तो जोड़ती है। जरूरत बस हृदय से अपनाने की है। हम कहते हैं कि दक्षिण भारतीय भाषाएँ या यूँ कहें कि समस्त भारतीय भाषाएँ इस देश की भाषाएँ हैं…दक्षिण वाले हिन्दी को अपना नहीं समझते….जरा सोचिए तो क्या आपने कभी उनको अपनाया है या सीखने की कोशिश की है। अगर की भी है तो उसमें भी जरूरत है या फिर मजबूरी…यही समस्या दक्षिण भारत की भी है और इसी को लेकर राजनीति भी हो रही है।

पिछले कई दिनों से कर्नाटक में हिंदी-विरोधी आंदोलन चल रहा है। रेल्वे स्टेशनों पर लगे हिंदी नामपटों को पोता जा रहा है। कर्नाटक के लिए एक अलग झंडे की मांग की जा रही है। अभी अलग झंडे की मांग को तो दरी के नीचे सरका दिया गया है, क्योंकि कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार इसका खुला समर्थन नहीं कर सकती। यदि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया किसी क्षेत्रीय पार्टी में होते तो इस मांग को वे हाथोंहाथ उठा लेते लेकिन हिंदी-विरोध का कर्नाटक में कोई विरोध नहीं कर रहा है। न तो सत्तारुढ़ कांग्रेस, न सत्ताकांक्षी भाजपा और न ही पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा का जनता दल !  कोई आश्चर्य नहीं कि यह हिंदी-विरोधी आंदोलन दक्षिण के अन्य राज्यों में भी जोर पकड़ ले। एक तरह से यह केंद्र के विरुद्ध दक्षिण के सभी विघ्नसंतोषी राज्यों को एक कर दे सकता है।

जरा सोचिए कि क्या वजह है कि जिस भाषा ने, जिस देश ने हमें 200 साल तक गुलाम बनाए रखा, वह भाषा आज भी राज कर रही है, वह इन राज्यों के लोगों के हृदय में विराजमान है…क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत एक दूसरे की भाषाओं को अपना ले। अँग्रेजी हो…जरूर हो…हमें सारी दुनिया से जुड़ना है मगर कोई पड़ोसी जिस तरह माँ और मौसी का विकल्प नहीं हो सकता, उसी तरह अँग्रेजी कभी भी हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विकल्प नहीं हो सकती। हम अँग्रेजी किसी भी अन्य विषय की तरह ही पढ़ेंगे….जरूर पढ़ेंगे….मगर प्राथमिकता अपनी भाषा ही होगी। अगर हम चाहते हैं कि लोग हिन्दी को अपनाएँ तो हमें स्थानीय भाषाओं को अपनाना चाहिए। इन भाषाओं का साहित्य हिन्दी में अधिक से अधिक उपलब्ध हो और हिन्दी के तुलसीदास, सूरदास….अनुदित होकर तमिल या तेलगू में पहुँचें…..पाठ्यक्रम तक ले जाइए। हम रवीन्द्रनाथ को हिन्दी में पढ़ते हैं तो प्रेमचन्द, बिहार, आचार्य शुक्ल और अज्ञेय तमिल, तेलगू और कन्नड़ में पढ़ाएँ जाएँ। हम दोनों एक दूसरे के पूरक बने तो कोई अँग्रेजी हमें नहीं तोड़ सकती। अगर किसी राज्य में उसकी भाषा प्रथम स्थान पर है तो हिन्दी को दूसरी भाषा बनाइए मगर मामला अगर देश का हो तो हिन्दी को स्वीकार कीजिए….। आपसी समझ और समन्वय ही समस्या का समाधान है।

अगर हिन्दी को देश के हर कोने में जाना है तो उसे साबित करना होगा कि वह जोड़ने की क्षमता रखती है। अगर कोई मराठी मराठी लहजे में हिन्दी बोलता है तो उसका स्वागत कीजिए, अगर कोई बांग्ला के लहजे में बोलता है तो उसका उत्साह बढ़ाइए…अगर कोई मणिपुरी तरीके से बोलता है तो उसका सम्मान कीजिए, अगर कोई हिन्दी में डोगरी मिलाता है तो मिलने दीजिए, अगर किसी की हिन्दी में तमिल, तेलगू या कन्नड़ है तो गले लगाइए। इसी प्रकार सभी भारतीय भाषाएँ भी हिन्दी को खुद में समाहित होने दें। अपनी सहोदर और सहचर भाषाओं के साथ मिलकर हिन्दी समृद्ध ही होगी….कम से ये बहनें हैं….पड़ोसी नहीं है। मुझे अँग्रेजी और हिन्दी के हिंग्लिश से ये बेहतर यह जुगलबन्दी लगती है जिसका सुर मेरे देश का सुर बनाता है। अगर अँग्रेजी से लोहा लेना है तो हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को एक साथ लाना होगा। आपको हिन्दी का प्रसार करना है तो बताइए कि स्थानीय भाषाएँ किसी एक राज्य में चल सकती हैं, कोई अँग्रेजी सीखे भी तो गाँवों तक नहीं पहुँच सकता मगर हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संसद से सड़क तक, होटलों से गाँव की चौपाल तक आपका साथ देगी…और अपनेपन से देगी। यह सही है कि आज हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है मगर हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है। नेताओं से मुद्दा छीनिए….वह भाषा के नाम पर आन्दोलन खड़ा करें, उसके पहले ही उनके हाथ से भाषा छीनिए। वैसे भी कोई भी भाषा राजनीति के भरोसे आगे कभी नहीं बढ़ती, उसे जनता आगे बढ़ाती है, सरकार तो बस संरक्षण दे सकती है….तो यह संरक्षण भी बराबरी का हो। हिन्दी के साथ 50 प्रतिशत राशि स्थानीय भाषाओं के विकास पर खर्च हो….उनके विस्तार और प्रसार को भी प्राथमिकता मिले। अगर आप हाथ बढ़ाएँगे तभी कोई आपका हाथ थाम सकता है। दक्षिण में हमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम का डटकर समर्थन करना चाहिए। वहां रहने वाले हिंदीभाषियों को भी ये भाषाएं सीखनी चाहिए। उत्तर भारत के नेता जब दक्षिण में जाएं तो उन्हें उन्हीं भाषाओं के अपने भाषण देवनागरी में लिखवाकर बोलना चाहिए। दक्षिण के नेता हिंदी सीखते हैं या नहीं ? देवेगौड़ाजी हिंदी में लिखे भाषणों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। दिल्ली में रहते हुए अब वे थोड़ी-बहुत हिंदी बोल लेते हैं। दक्षिण भारत में जाकर आप अँग्रेजी नहीं बल्कि तमिल, कन्नड़, तेलगू और मलयालम बोलिए..और उसके बीच में हिन्दी भी डालिए। .उसी तरह उत्तर भारत आने वाले हिन्दी के साथ पंजाबी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और भोजपुरी बोलें। ऐसा ही प्रयोग प्रशासनिक और विधानसभा या लोकसभा में हो।

राजनीतिक स्तर पर यदि कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्त्ता दक्षिण की भाषाओं का डटकर समर्थन करें और अंग्रेजी के नामपट पोतने लगें तो क्या होगा ? हिंदी को लाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। वह अपने आप आ जाएगी। त्रिभाषा-सूत्र तत्काल खत्म करें और प्रांतीय भाषाओं को प्रथम स्थान दें तो अखिल भारतीय संपर्क हिंदी के बिना कैसे संभव होगा ? यदि हम प्रांतीय भाषाओं को सिर पर बिठाएं तो वे हिंदी को गोद में जरुर बिठाएंगी।

सच तो यह है कि वर्तमान में जिस प्रकार दक्षिण में हिंदी को रोजगारमूलक भाषा मानकर इसके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। यदि उनकें राज्यों की जनता हिंदी सीख कर या मात्र बोलनें सुननें भर की क्षमता विकसित करके यदि अपनी व्यावसायिक निपुणता या पेशेवर दक्षता बढ़ा पाती है तो इसमें दोष क्या है? वोटों की खातिर क्षुद्र राजनीति करनें वाले इन हिंदी विरोधी नेताओं को समझना चाहिए कि दक्षिण भारत का शेष भारत की संस्कृति और भाषा के प्रति अपना आदरभाव का और विनम्र अनुगामी भाव  का अपना गरिमामय और आदरणीय इतिहास रहा है। उत्तर भारत के तीर्थों के प्रति अपनें पूज्य भाव के कारण यहाँ का सनातनी और हिन्दू समाज हिंदी भाषा सीखनें और माता पिता के गंगा स्नान करा लेनें को सदा उत्सुक रहा है!! हिंदी सीख लेनें की रूचि के आधार पर ही1918 में मद्रास में ‘हिंदी प्रचार आंदोलन’ को प्रारम्भ हुआ था और इसी वर्ष में स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन मद्रास कार्यालय  आगे चलकर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के रूप में स्थापित हुआ। बाद में तमिल और अन्य दक्षिणी राज्यों की जनता की भावनाओं का आदर करते हुए ही इस संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया।

वर्तमान में इस संस्थान के चारों दक्षिणी राज्यों में प्रतिष्ठित शोध संस्थान है, और बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय इस संस्थान से हिंदी में दक्षता प्राप्त कर हिंदी की प्राणपण से सेवा कर रहें हैं। इसी क्रम में केरल में 1934 में केरल हिंदी प्रचार सभा, आंध्र में 1935 में हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और कर्नाटक में 1939 में कर्नाटक हिंदी प्रचार समिति, 1943 में मैसूर हिंदी प्रचार परिषद तथा 1953 में कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की स्थापना हुई। इन संस्थानों में लाखों छात्र हिंदी की परीक्षाओं में सम्मिलित व् उत्तीर्ण होतें हैं. तमिलनाडु में तथाकथित और पूर्वाग्रही विरोध के कारण भले ही शासकीय शिक्षण संस्थानों में हिंदी की उपेक्षा हो रही हो, किन्तु कई निजी संस्थानों में हिंदी की पढ़ाई जारी है, और इनकी परीक्षाओं में छात्रों की संख्या लाखों में रहती है। जनसामान्य में असंतोष है कि निजी विद्यालयों में पढ़नें वाले बच्चे तो हिंदी पढ़कर अपनी रोजगार की संभावनाएं प्रबल कर लेतें हैं किन्तु शासकीय विद्यालयों के विद्यार्थी हिंदी पीछे रह जातें हैं। दक्षिणी राज्यों में हिंदी को आजीविका का साधन विकसित करनें का एक प्रबल माध्यम माननें का ही परिणाम है कि यहाँ कई सेवाभावी संस्थाएं निःशुल्क हिंदी कक्षाओं का संचालन, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, गोष्ठियों का आयोजन निरंतर कराती रहतीं हैं। मुम्बईया हिंदी फिल्मों और हिंदी गीतों की लोकप्रियता के कारण भी हिंदी अब दक्षिणी राज्यों में एक सहज सामान्य रूप से बोली सुनी जानें लगी है। आज हैदराबाद, बैंगलूर तथा चेन्नई नगरों से दसियों बड़े और कई छोटे हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित हो रहें हैं। यहाँ यह कतई न समझा जाए कि दक्षिण भारत में हिंदी का चलन कुछ दशकों की देन है! दक्षिण के सभी राज्यों में हिंदी का अपना दीर्घ और समृद्ध इतिहास रहा है, दो सौ वर्ष पूर्व भी केरल में ‘स्वाति तिरुनाल’ के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा राम वर्मा (1813-1846) ने हिंदी की कालजयी कृतियाँ रचीं थी जो वहां के जनजीवन में अब भी परम्परागत रूप से आदर पूर्वक बोली सुनी जाती हैं. दशकों पूर्व से कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से ‘युग प्रभात’ नाम के अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक हिंदी पत्र  और हिंदी विद्यापीठ (केरल) से ‘संग्रथन’ मासिक पत्रिका और कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की ओर से “हिंदी प्रचार वाणी” का प्रकाशन हो रहा है। हिंदी समर्थक पहल को वापिस लेनें के स्थान पर आज अधिक आवश्यक हो गया है कि दक्षिण के जनसामान्य की भावनाओं को न समझनें वालें और अनावश्यक हिंदी विरोध की राजनीति करनें वालों के प्रति कठोर रूख रखा जाए और ऐसे असंतोष उपजा रहे दक्षिणी नेताओं पर कठोरता से अंकुश भी लगाया जाए।

कहीं भी कोई क्षेत्र महानगर का स्वरूप ले पाता है, जब उनमें सह-अस्तित्व की भावना हो। बेंगलुरु ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया। आप याद कर सकते हैं,बरसों पहले शिवसेना ने किस तरह दक्षिण भारतीयों और हिंदी भाषियों को जलील करने की कोशिश की थी, पर वह सिरे से नाकाम रही। कोलकाता और चेन्नई में भी कभी हिंदी विरोध का दावानल फूटा करता था, पर अब वह अतीत का किस्सा है। राजनेता बंबई को मुंबई, बंगलोर को बेंगलुरु, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता को कोलकाता या गुड़गांव को गुरुग्राम बना सकते हैं, मगर सिर्फ बोर्ड पर नया नाम पोत देने से शहरों की आत्मा नहीं बदला करती।

1991 के आर्थिक उदारीकरण की बड़ी देन है। इससे हिन्दुस्तान में कॉरपोरेटीकरण को बढ़ावा मिला और नई तकनीक के आगमन से बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम, नोएडा जैसे ‘हब’ विकसित हुए। इन उभरते महानगरों का विकास यह भी जताता है कि हमें अपने मानसिक अवरोधों से मुक्ति पाने की कितनी जरूरत है? हर नया आगंतुक अपने साथ अपनी संस्कृति के मूल तत्व लेकर आता है और जहां जा बसता है, वहां उसके पौधे रोपता चलता है।
आप गौर करें, तो पाएंगे कि इधर हिंदी ने अन्य भाषाओं के शब्द बड़ी तेजी से ग्रहण किए हैं। यही हाल अन्य भारतीय भाषाओं का है। जरूरत है, तो बस इसमें तेजी लाने की, क्योंकि भाषा अलगाव के अवरोधों को सबसे पहले खत्म करने की क्षमता रखती है। कहने का तात्पर्य यह है कि अँग्रेजी अपने प्रसार का एक माध्यम भर होना चाहिए…मगर इसके साथ जरूरी है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ साथ आएँ, एक दूसरे के साथ चलें, एक दूसरे की शाब्दिक, साहित्यिक, सामाजिक विरासत को खुले दिल से अपनाएँ तो हिंग्लिश खुद ही खत्म हो जाएगी। हिन्दीवालों को समझना होगा कि हिन्दी सिर्फ हिन्दी प्रदेश की भाषा नहीं है और उसका अस्तित्व और विकास भी अन्य भारतीय भाषाओं और उसकी तमाम बोलियों के साथ जुड़ा है। जाहिर सी बात है कि अगर आप राष्ट्रभाषा बनने की बात करते हैं तो वह संकुचित हृदय, शुद्धिवादिता की जिद के साथ नहीं होगा। भारतीय भाषाओं और हिन्दी को एक दूसरे के साहित्य को अपने पाठ्यक्रमों में जगह देनी होगी। मुझे विश्वास है कि अपने भाषायी क्षेत्र में तमाम बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं को जगह देकर हिन्दी जन – जन की भाषा बन सकती है और वह बनेगी, जरूर बनेगी।

 

सागर परिक्रमा पर निकलीं नेवी की 6 महिलाएं

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भारतीय नौसेना की महिला टीम सोमवार को दुनिया की सागर परिक्रमा पर निकली। देश की रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने इसे देश के लिए ऐतिहासिक दिन करार दिया।

रक्षामंत्री ने यहां बोट पूल के पास से आईएनएस मंडोवी से भारतीय नौसेना के इस तरह के पहले अभियान ‘नविका सागर परिक्रमा’ को हरी झंडी दिखाई। लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के नेतृत्व में छह महिला सदस्यों का दल स्वदेशी निर्मित बोट आईएनएस तारिणी में दुनिया की समुद्री परिक्रमा करेंगी।

इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री सीतारमण ने कहा, ‘यह ऐसा मौका नहीं है जो पांच या दस साल में आता है। यह भारत के लिए और नौवहन के क्षेत्र में ऐतिहासिक दिन है। मैं समझती हूं कि हमारी महिला नौसैनिकों वह काम कर रही हैं जो अधिकतर नौसेना सोच भी नहीं सकती है।

इस अवसर पर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर परिकर और नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा भी मौजूद थे। सीतारमण ने पूर्व रक्षामंत्री मनोहर परिकर को ‘प्रेरणादायक राजनीतिक गुरु’ बताया।

165 दिन की होगी समुद्र परिक्रमा
नौसेना प्रमुख लांबा ने कहा कि यह पहली बार है कि भारतीय महिला चालक दल इस प्रकार के समुद्री परिक्रमा अभियान पर निकली हैं। लांबा ने कहा, ‘यह समुद्री परिक्रमा करीब 165 दिन की होगी। इस यात्रा में आईएनएस तारिणी ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फॉकलैंड और दक्षिण अफ्रीका भी के बंदरगाह से होकर गुजरेगी।’ इस दल में ले. कमांडर जोशी के अतिरिक्त ले. कमांडर प्रतिभा जामवाल, ले. पी. स्वाति, ले. विजया देवी, ले. पायल गुप्ता और ले. बी ऐश्वर्या शामिल हैं।

यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिला क्रू-मेंबर को बधाई देते हुए ट्वीट किया कि ‘आज बेहद खास दिन है। नेवी की 6 महिला क्रू-मेंबर आइएनएसवी के जरिए सागर परिक्रमा पर निकली हैं। पूरे देश को एक साथ मिलकर इस टीम का हौंसला बढ़ाना चाहिए।’

 

शहीद की पत्नी बोलीं- पति की शहादत पर मेरी आंखों से बहे थे फक्र के आंसू

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मेरे पति ने जिस दिन देश के लिए प्राणों की न्यौछावर किया था, उस दिन मेरी आंखों से आंसू जरूर बहे थे, लेकिन वह फक्र के आंसू थे। दु:ख के साथ ही मुझे इस बात की खुशी थी कि मेरे पति की मौत पर पूरा देश फक्र महसूस कर रहा है। यह कहते हुए वयोवृद्ध रसूलन बीबी की लड़खड़ाती आवाज कुछ देर के लिए बंद हो गई और गला रूंध गया।

उन्होंने इशारों ही इशारों में बहुत कुछ कहा। हर साल दस सितंबर को वीर अब्दुल हमीद का शहादत दिवस धामूपुर स्थित शहीद पार्क में मनाया जाता है। अब्दुल हमीद के पौत्र जमील आलम ने बताया कि 26 जनवरी 1966 को जब राष्ट्रपति राधा कृष्णनन ने भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से जब मेरे बाबा अब्दुल हमीद को नवाजा तो गर्व से मेरे परिवार का सिर ऊंचा हो गया।

कहा कि मेरे पति वीर अब्दुल हमीद की शहादत दिवस तो हर वर्ष मनाई जाती है, लेकिन इस बार के कार्यक्रम में आने वाले मुख्य अतिथियों को दिल से आभार व्यक्त किया। अंतत: इशारों में खुशी बयां करते हुए रसूलन बीबी की आंखें सजल हो गई।

सेना में शामिल हुईं स्वाति महादिक तथा निधि दूबे

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साहस का अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हुए शहीद कर्नल संतोष महादिक की पत्नी आज 11 महीनों का कठिन प्रशिक्षण हासिल करने के बाद सेना में अधिकारी के तौर पर शामिल हो गयीं। उनके साथ एक अन्य महिला निधि दूबे भी सेना में शामिल हुईं। दो साल पहले जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए कर्नल महादिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

38 साल की स्वाति महादिक दो बच्चों की मां हैं और आर्मी ऑर्डनेंस कोर ने उन्हें सेना में अधिकारी के रूप में शामिल किया।
उनके पति कर्नल महादिक को वीरता के लिए सेना मेडल दिया गया था। उनकी नवंबर, 2015 को उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंक विरोधी अभियान में मौत हो गयी थी।
कर्नल महादिक सेना के 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज के अधिकारी थे और उनके सहकर्मियों के अनुसार वह हमेशा आगे बढ़कर नेतृत्व करने के लिए जाने जाते थे।
स्वाति अपने पति के पदचिह्नों का पालन करते हुए पिछले साल अक्तूबर में सेना के अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए) का हिस्सा बनी थीं।
सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम सार्वजनिक ना करने के अनुरोध के साथ कहा, ‘‘चेन्नई में ओटीए में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद स्वाति महादिक को आज अधिकारी के तौर पर सेना में शामिल कर लिया गया।’’ उन्होंने बताया कि स्वाति पुणे में आर्मी ऑर्डनेंस कोर का हिस्सा होंगी।
निधि दुबे नाम की एक और महिला आज अधिकारी के तौर पर सेना में शामिल हुईं। निधि ने अपने पति को खो दिया जो सेना में नायक थे।