Wednesday, April 1, 2026
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संग्रहालय के गोदाम में कैद थे बापू और शास्त्री के अस्थि कलश

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बापू और शास्त्री के अस्थि कलश संग्रहालय के गोदाम में कैद हैं। ये अस्थि कलश संग्रहालय में इसलिए रखे गए थे कि यहां आने वाले पर्यटक इन महान विभूतियों से जुड़ी स्मृतियां संजो सकें और कलशों को देख सकें।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के अस्थि कलश अब भी मथुरा के राजकीय संग्रहालय में रखे हुए हैं, लेकिन इनके दर्शन यहां आने वाले पर्यटक और स्थानीय लोग नहीं कर पा रहे हैं। ये संग्रहालय के गोदाम में रखे हुए हैं। दरअसल, दोनों महापुरुषों की अस्थियां यहां यमुना में प्रवाहित की गई थीं।

ये अस्थि कलश संग्रहालय में इसलिए रखे गए थे कि यहां आने वाले पर्यटक इन महान विभूतियों से जुड़ी स्मृतियां संजो सकें और कलशों को देख सकें। संग्रहालय प्रशासन इन्हें महज कलश ही समझता रहा। यही वजह है कि इन्हें गोदाम में कैद करके रखा है। राष्ट्रपिता का अस्थि कलश 12 फरवरी 1948 को आया था। इसे तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास रखा गया था।

वर्ष 1970 में इसे संग्रहालय में रखा गया, जबकि शास्त्री का अस्थि कलश 1966 में आया था। संग्रहालय के निदेशक डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि गांधीजी, शास्त्रीजी की अस्थियां यमुना में प्रवाहित की गईं थीं, इसके बाद खाली अस्थि कलश संग्रहालय में रख दिए गए। सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें अभी गैलरी में नहीं रखा जा सकता, इसलिए ये गोदाम में रखे हुए हैं।

इनके लिए अलग से गैलरी तैयार की जा रही है। इनको अब सामने लाया गया है। गौरतलब है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू का अस्थि कलश भी संग्रहालय में रखा है। यह 12 जून 1964 में संग्रहालय में रखा गया था।

पुरुष बैडमिंटन रैंकिंग के शीर्ष 20 में पांच भारतीय

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नयी दिल्ली : बीडब्ल्यूएफ बैडमिंटन पुरुष एकल रैकिंग के शीर्ष 20 खिलाड़ियों में पांच भारतीय शामिल है जिसमें सबसे ज्यादा फायदा पिछले सप्ताह जापान ओपन के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाले एच.एस. प्रणय को हुआ।

प्रणय रैंकिंग में चार स्थान के छलांग के साथ 15वें स्थान पर पहुंच गये जबकि जापान ओपन के क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय करने वाले दूसरे भारतीय किदाम्बी श्रीकांत आठवीं रैंकिंग बरकरार रखा है। वह पुरुष एकल रैंकिंग में शीर्ष भारतीय है।

अजय जयराम पिछले सप्ताह की तरह 20वें और बी साई प्रणीत 17वें स्थान पर बने हुये है। समीर वर्मा भी दो स्थानों के सुधार के साथ 19वें स्थान पर आ गये।

महिला एकल में पी.वी. सिंधू और सायना नेहवाल ने अपनी पिछली रैंकिंग क्रमश: दूसरे और 12वें स्थान पर बरकरार है। दोनों खिलाड़ियों जापान ओपन के दूसरे दौर में हार का सामना करना पड़ा था।

सिक्की रेड्डी और प्रणव जैरी चोपड़ा की मिश्रित युगल जोड़ी को जापान ओपन के सेमीफाइनल में पहुंचने का फायदा हुआ और यह जोड़ी दो स्थानों के सुधार के साथ 17वें स्थान पर आ गयी।

 

नहीं रहे दिग्गज अभिनेता टॅाम ऑल्टर

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मुंबई – रंगमंच, टीवी और फिल्म के दिग्गज अभिनेता का 67 साल की उम्र में निधन हो गया। ऑल्टर को ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘जुनून’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्मों में बेतहरीन अदाकारी के लिये जाना जाता है। प्रसिद्ध अभिनेता और पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित अभिनेता त्वचा कैंसर से पीड़ित थे। उनकी यह बीमारी चौथे चरण में पहुंच चुकी थी और कल रात अपने घर में उनका निधन हो गया।

अभिनेता के त्वचा कैंसर की पहचान पिछले साल की गयी थी और उसका उपचार किया जा रहा था, लेकिन इस माह की शुरूआत में वह फिर से बीमार पड़ गये और उन्हें सैफी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
ऑल्टर के पुत्र जैमी ने प्रेट्र से कहा, ‘‘उनका अंतिम संस्कार बुधवार को किया जाएगा। उनका अंतिम संस्कार ईसाई प्रथाओं के अनुसार एक चर्च में होगा।’’ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभिनेता के निधन पर उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की हैं। राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया ट्वीटर पर लिखा, ‘‘वयोवृद्ध अभिनेता टॉम ऑल्टर के निधन के बारे में सुनकर दुख हुआ है। फिल्म प्रेमी उन्हें हमेशा याद रखेंगे। उनके परिवार के लिये संवेदना।’’ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऑल्टर के निधन पर शोक व्यक्त किया और फिल्मों एवं थियेटर में उनके योगदान को याद किया।

प्रधानमंत्री के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल पर लिखा गया, ‘‘प्रधानमंत्री श्री टॉम ऑल्टर के निधन पर शोक व्यक्त करते हैं और फिल्मों एवं रंगमंच में उनके योगदान को याद करते हैं। उन्होंने श्री टॉम ऑल्टर के परिवार और प्रशंसकों के लिए संवेदना व्यक्त की हैं।’’ ऑल्टर अमेरिकी मिशनरी माता-पिता के पुत्र थे। उनका जन्म 1950 में मसूरी में हुआ था। उन्होंने मसूरी के वुडस्टॉक स्कूल में और बाद में पुणे के फिल्म और टेलीविजन संस्थान में पढ़ाई की। ऑल्टर ने हरियाणा के जगाधरी के एक विद्यालय में अध्यापन किया था। राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की फिल्म ‘‘अाराधना’’ देखने के बाद उन्होंने अभिनय करने का फैसला किया।
इसके बाद वह पुणे के फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान में दाखिल हो गये, जहां उन्होंने 1972 से 1974 तक अभिनय की बारीकियां सीखीं और गोल्ड मैडल से स्नातक की उपाधि हासिल की। ऑल्टर ने साल 1976 में रामानंद सागर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘चरस’ से अभिनय की शुरूआत की। इस फिल्म में धमेन्द्र और हेमा मालिनी ने मुख्य भूमिकायें निभायी थीं। इस फिल्म में ऑल्टर मुख्य कस्टम अधिकारी बने थे।

उनकी अगली और सबसे मशहूर फिल्मों में सत्यजीत रे की ‘‘शतरंज के खिलाड़ी’’ (1977) थी, जो मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम की छोटी कहानी पर आधारित थी।
इसके बाद उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘‘जूनून’’ (1979), मनोज कुमार की ‘‘क्रांति’’ (1981) और राज कपूर की ‘‘राम तेरी गंगा मेली’’ (1985) में काम किया।

उनकी बेहतरीन अभिनय वाली फिल्मों में ‘‘आशिकी’’, ‘‘परिंदा’’, ‘‘सरदार पटेल’’ और ‘‘गांधी’’ शामिल हैं। हालांकि ऑल्टर अपने समय के बेहतरीन अभिनेताओं में से एक थे, लेकिन बॉलीवुड में उन्हें बार-बार ब्रिटिश पुरुष के किरदार के रूप में ही दिखाया गया। उन्होंने अपने अभिनय की शुरूआत 1977 में कन्नड़ फिल्म ‘‘कन्नेश्वर रामा” के साथ की। इसके अलावा उन्होंने बंगाली, असमिया, गुजराती, तमिल और कुमांऊनी फिल्मों में भी काम किया। उन्होंने ‘‘जुनून’’ ‘‘जबान संभाल के’’, ‘‘भारत एक खोज’’ ‘‘शक्तिमान’’, ‘‘कैप्टन व्योम’’ और ‘‘यहां के हम सिकन्दर’’ जैसे लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों में काम किया था।
आखिरी बार वह इस समय चल रहे धारावाहिक ‘‘रिश्तों का चक्रव्यूह’’ में दिखाई दिये थे। ऑल्टर अपने करियर के दौरान रंगमंच से करीब से जुड़े रहे। उन्होंने 1979 में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और गिलानी के साथ मोटली प्रोडक्शंस की स्थापना की थी। ऑल्टर की प्रमुख रंगमंच प्रस्तुतियों में करीब ढ़ाई घंटे का एकल उर्दू नाटक ‘‘मौलाना’’ ‘‘बाबर की औलाद’’, ‘‘लाल किले का आखिरी मुशायरा’’, ‘‘गालिब के खत’’, ‘‘तीसवीं शताब्दि’’, ‘‘कोपेनहेगन’’, ‘‘दिल्ली में गालिब’’ और विलियम डेलरिम्पल के नाटकीय रूपांतरण ‘‘सिटी ऑफ डिजिन्स’’ शामिल है।
ऑल्टर एक खेल पत्रकार भी थे। वह टीवी के लिये सचिन तेंदुलकर का साक्षात्कार करने वाले पहले व्यक्ति थे।
कला और सिनेमा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 2008 में ऑल्टर को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उनकी आखिरी फिल्म ‘‘सरगोशियां’’ थी, जिसमें उनके साथ आलोकनाथ और फरीदा जलाल ने काम किया था। यह फिल्म इस साल मई में रिलीज हुयी थी।
आॅल्टर के परिवार में पत्नी कैरोल, बेटा जेमी और बेटी अफसान हैं।

 

इतिहास के पन्नों में हाशिए पर रह गयीं कस्तूरबा : नीलिमा

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रायपुर – कस्तूरबा को भी जब भी इतिहास के आइने में देखा गया तो वो गांधी जी की कठपुतली के रूप में ही दिखीं। उनकी हां में हां और ना में ना मिलाते हुए ही जीवन बिता दिया। पर उनके त्याग और तपस्या की चर्चा तो ऐतिहासिक पन्नों से गायब ही हो गई। क्या किसी ने सोचा कि जीवन पर दर्द सहकर, उपेक्षित होकर बा ने मोहनदास को लोगों की नजरों में महात्मा बना दिया। दरअसल एक संपन्न परिवार में जन्मीं बा ऐसी नहीं थीं।

कलम दैनिक भास्कर संवाद में शामिल होने रायपुर पहुंचीं नीलिमा ने कस्तूरबा के जीवन पर एक काल्पनिक किताब ‘द सीक्रेट डायरी ऑफ कस्तूरबा’ लिखी है। इसका हिंदी अनुवाद “कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी’ के नाम से जारी किया गया है। नीलिमा ने बताया कि यह किताब ऐतिहासिक तथ्यों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। इसे कस्तूरबा की डायरी की शैली में लिखा गया है। एक साइकोलॉजिस्ट, स्त्री और मां होने के लिहाज से मैंने कस्तूरबा को उस दौर के लिहाज से जीने की कोशिश की है और उसी आधार पर बातें लिखी हैं।

रईस कपाड़िया परिवार में सबसे छोटी थीं वो

इस किताब के अंशों को पढ़ते हुए नीलिमा ने कहा कि ये कहानी है उस महिला की, जिसने मोहन दास को महात्मा गांधी बनाया। दुनिया में ‘कस्तूर’ को खुशबू के लिए जाना जाता है, उसका नाम इसी पर रखा गया था। वह रईस कपाड़िया परिवार में सबसे छोटी थी। वो कपाड़िया परिवार जो विदेशों में कपड़े, अनाज और कपास के कारोबार का स्थापित घराना था। पूरी दुनिया उन्हें कस्तूरबा के नाम से पहचानती है, लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो उन्हें वाकई में जानते हैं। वह ऐसे व्यक्ति की पत्नी थी, जिसे शांति के दूत के रूप में दुनियाभर में सम्मान प्राप्त हुआ। जिसे लोग राष्ट्रपिता और बापू जैसे संबोधन देते हैं। वो दुनिया के लिए जैसे थे, अपनी पत्नी और बेटे के लिए वैसे बिल्कुल नहीं थे। कस्तूरबा ने उनके साथ रहकर कई दुख सहे। अगर उनकी जिंदगी को एक शब्द में बयां करने कहें तो मैं उन्हें “व्यथा’ कहूंगी।

दोहरा चरित्र था गांधी जी का

नीलिमा ने कहा, एक तरफ गांधी जी कपोल कल्पना के आधार पर बा को चरित्रहीन कहते हुए सड़क पर फेंक देने की बात कहते हैं तो दूसरी ओर ब्रह्मचर्य के प्रयोग में 18-20 साल की लड़कियों को शामिल करते थे। एक पत्नी के लिए ये घोर मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं था। वे जैसे दुनिया के लिए थे, घरवालों के लिए वैसे नहीं थे।

जब दो लड़कियों की चोटी खुद गांधी ने काटी

नीलिमा ने एक किस्सा शेयर किया, उन्होंने बताया महात्मा गांधी के बेटे मणिलाल काे लंबे बालों वाली एक युवती बेहद पसंद थी। वे घंटों बैठकर बातें करते थे। एक दिन मणिलाल ने अंजाने में किसी दूसरी लड़की के कंधे पर पीछे से हाथ रख दिया। वो शिकायत करने गांधी तक पहुंच गईं। उन्होंने मणिलाल और दोनों युवतियों को कक्ष में बुलाया। मणिलाल से पूछा- तुमने ऐसा क्यों किया? उन्होंने जवाब दिया- मुझे उसके लंबे बाल पसंद हैं, अंजाने में मुझसे ये गलती हो गई। गांधीजी ने कहा, यानी सारे फसाद की जड़ बाल हैं। इसके बाद उन्होंने दोनों युवतियों के बाल खुद काट दिए। मणिलाल को भी सजा दी ।

गांधीजी ने लिखा चौकाने वाला खत

नीलिमा ने एक वाकया साझा करते हुए कहा कि एक बार कस्तूरबा बीमार थीं, उन्हें गांधी की जरूरत थी। वो नहीं आए, लेकिन जो खत भेजा वो चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि अभी मैं आने की स्थिति में नहीं हूं। अगर यही नियति है कि तुम्हारी मृत्यु हो तो तुम्हारे लिए वही बेहतर होगा कि तुम मुझसे पहले जाओ। मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूं कि तुम्हारी मृत्यु के बाद मैं दूसरी स्त्री से शादी नहीं करूंगा। वहीं, दूसरी तरफ जब गांधीजी खुद बीमार पड़े तो उन्होंने तब कोलकाता में रह रही कस्तूरबा को बुला लिया।  बीमारी की खबर सुनते ही वो दौड़ी-दौड़ी आ गईं। गांधीजी इतने बीमार थे कि अगर कस्तूरबा उनका ख्याल नहीं रखती तो उनका बच पाना मुश्किल था।

बा के चरित्र पर भी करने लगे थे संदेह

कार्यक्रम में बतौर मॉडरेटर मौजूद बृजेश उपाध्याय के सवालों के जवाब में नीलिमा ने वो वाकया शेयर किया जब करमचंद की मौत के बाद मोहनदास एकदम बदल गए। जिस कस्तूरबा के बिना वो एक पल भी दूर नहीं रह सकते थे उनके चरित्र पर संदेह करने लगे। वो इसलिए क्योंकि वो प्यार करने के लिए उनसे पहल कर बैठीं। नीलिमा ने कहा कि कस्तूरबा का निधन गांधी से पहले हो चुका था, लेकिन मैंने उन्हें किताब में तब तक जिंदा रखा है जब तक गांधीजी थे। प्रभा खेतान फाउंडेशन के इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता श्री सीमेंट थे। काशी मेमोरियल सोसाइटी सहभागी थी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

निःशुल्क शिक्षा ड्रॉप आउट दर को कम करेगी

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जीवन में तकनीक का महत्व है और युवाओं के लिए रोजगार का। एक समय था जब तकनीक को अपनाने में हिचक होती थी और आज भी कई शिक्षक शिक्षण कार्यों के लिए तकनीक का इस्तेमाल करने से कतराते हैं।

दूसरी तरफ कुछ शिक्षक और शिक्षिकाएँ ऐसी हैं जिन्होंने इस नयेपन का स्वागत किया और अपने साथ विद्यार्थियों को भी प्रोत्साहित कर रही हैं। बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार उनको एक अलग पहचान दे रहा है। ऐसी ही एक शिक्षिका हैं केन्द्रीय विद्यालय, बालीगंज की वरिष्ठ शिक्षिका चन्द्रप्रभा भाटिया, जिनसे अपराजिता ने बात की…आप भी कीजिए मुलाकात –

आज की शिक्षा में कौशल विकास का महत्व बढ़ा है

शिक्षा का अर्थ है अध्ययन तथा ज्ञान ग्रहण करना। शिक्षा चेतन या अचेतन रूप से मनुष्य की योग्यता को बढ़ाती है। सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार स्वतंत्रता देकर सर्वांगीण विकास करना ही वास्तविक शिक्षा है। आज शिक्षा जीवन की चुनौतियों का सामना करना सिखाती है और आज कौशल विकास का महत्व भी आधुनिक शिक्षा में बढ़ गया है।

विद्यार्थिय़ों के साथ शिक्षकों के लिए भी जरूरी है तकनीक

तकनीकी शिक्षा आज बहुत महत्वपूर्ण है। कई देशों में शिक्षण संस्थान ऑनलाइन हो गये हैं, उनके पाठ्यक्रम इंटरनेट पर उपलब्ध हैं और मल्टीमीडिया को स्कूलों में प्रोत्साहन मिल रहा है। ये बहुत आवश्यक है। विद्यार्थिय़ों के साथ शिक्षकों के लिए भी जरूरी है। वे विद्यार्थियों में सोचने की क्षमता, प्रक्रिया को बढ़ाकर उसे स्वतंत्र बना रहे हैं और ये छात्र 21वीं सदी के छात्र बन रहे हैं। कक्षा में इसे लाया जाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों के लिए रोचक है। मैं खुद न सिर्फ तकनीक इस्तेमाल करती हूँ बल्कि आज भी माइक्रोसॉफ्ट और इन्टेल जैसी अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियों से जुड़ी हूँ।

निःशुल्क शिक्षा ड्रॉप आउट दर को कम करेगी

सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षा मौलिक अधिकार है। निःशुल्क शिक्षा ड्रॉप आउट दर को कम करेगी। मेरा मानना है कि शिक्षा पर सभी का अधिकार होना चाहिए और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि यह गुणवत्तापरक पाठ्यक्रम और पाठ्यसामग्री व अन्य सुविधाएँ प्रदान करे। हम पीपीपी मॉडल की बात कर रहे हैं मगर मुझे लगता है कि यह सरकार की जिम्मेदारी है। बड़ों की शिक्षा प्रदान करने की दिशा में समुचित कदम उठाए जाने चाहिए।

2007 से लेकर अब तक कई पुरस्कार और सम्मान मिले

2007 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किया था। मुझे 2009 में गुरुकुल अवार्ड्स, 2015 का माइक्रोसॉफ्ट इनोवेटिव एडुकेटर एक्सपर्ट, 2016 को आईडीए टीचिंग अवार्ड्स समेत कई पुरस्कार मिले हैं। 2014 में कौमी एकता मंच पुरस्कार मिला। तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए और कक्षाओं में नयापन लाने के लिए कई बार सम्मानित किया जा चुका है और कई बार विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया है। अब तक बहुत से राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं।

उसे कभी न भूलें या जिसने आपको जीवन में कुछ सिखाया हो

मैं अब भी अपने शिक्षकों को बहुत याद करती हूँ। हिन्दी की शिक्षिका बीजू रानी पाल से लगाव था और मुझे लगता है कि हम अपने जीवन में अगर कुछ बन पाते हैं तो उसे कभी न भूलें या जिसने आपको जीवन में कुछ सिखाया हो।

उत्पीड़न और पक्षपात लड़कियों का ही नहीं, लड़कों का भविष्य भी नष्ट करेगा

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भारत में देवियों के पूजन की परम्परा है और स्त्रियों को सम्मान देने की बातें तो हमारे ग्रन्थों में भी विद्यमान हैं मगर हालात और हकीकत दोनों कुछ और ही बयान कर रहे हैं। शायद, एक भी दिन ऐसा न हो जब महिलाओं के प्रति अपराध की खबर पढ़ने को न मिले मगर हमारी सोच और संस्कार दोनों की शिकायत आजकल मीडिया और सोशल मीडिया कर देते हैं।

हम हमेशा से दोहरेपन के शिकार रहे हैं और इसे स्वीकार नहीं करते। नवरात्रि पर कुआँरी कन्याओं को पूजने वाले इस देश में गर्भ में ही कन्याओं को मार डाला जाता है और नवरात्रि के दौरान ही छेड़छाड़ का विरोध कर रही छात्राओं को केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पीटा जाता है और पूरी घटना को लेकर राजनीति करने की कोशिश दोनों तरफ से होती है…अगर आपको लगता है कि ऐसी घटनाओं का असर सिर्फ लड़कियों पर पड़ रहा है तो आपको एक बार फिर सोचने की जरूरत है। बीएचयू बड़ा नाम है और यहाँ आने वाली लड़कियाँ कई अलग राज्यों से अपने हिस्से का संघर्ष लिए आती हैं।

घर के बाहर भी वे खुद को पूरी तरह आजाद नहीं कर पातीं…उनके पीछे उनका घर, समाज, सहेलियाँ, रिश्तेदार सब चलते हैं और ऐसी घटनाएँ उनके सपनों को कुचलने का काम कर रही हैं मगर इस बार लड़कियाँ लड़ीं….जमकर लड़ीं। आप गौर कीजिए तो पाएंगे कि जैसे –जैसे लड़कियाँ बाहर निकल रही हैं, उनके साथ अपराध भी बढ़ रहे हैं और यही सामन्तवादी मानसिकता को दर्शाता है जिसकी नजर में हर आगे निकलने वाली पीढ़ी उसे टक्कर दे रही है और यही उसे स्वीकार नहीं है।

यह नँगई कुछ और नहीं घबराहट और असुरक्षा का प्रतीक है…और बनारस की जड़ता को इन लड़कियों ने झकझोर दिया है जिससे यहाँ की रूढ़िवादी मानसिकता तिलमिला उठी है। लड़के जब ऐसा करते हैं तो वे लड़कियों से ज्यादा नुकसान अन्य लड़कों को पहुँचाते हैं जो बगैर किसी अपराध के मनचलों की श्रेणी में रख दिये जाएँगे….और उनको लेकर संशय खड़ा होगा…अगली बार जब भी आप बीएचयू के छात्र से मिलेंगे तो उसका पूरा समय खुद को ऐसे छात्रों से अलग साबित करने में बीतेगा…कि वे इस लम्पट परम्परा से नहीं आते और इसका असर उनके भविष्य पर भी पड़ना तय है।

अब सवाल यह है कि आखिर इस सोच पर अब तक लगाम क्यों नहीं लगी तो इसकी जिम्मेदार भी स्त्रियाँ ही हैं जो अपनी सुरक्षा के आवरण के नीचे दबी अपने घर में कभी बेटी तो कभी बहनों और भाभियों को दबाने के लिए उन पर हो रहे अन्याय का परोक्ष समर्थन करती हैं।

सच तो यह है कि स्त्री को बेटे, पति, भाई और पिता समेत अन्य पुरुषों से सुरक्षा चाहिए, आर्थिक निभर्रता है,एक भय का घेरा है और एक अन्धा प्रेम भी जो कभी सवाल नहीं करने देता। अपना घर बचाने के चक्कर में वह इनकी तमाम गलतियों पर परदा डालती हैं, ऐसी स्थिति में अगर ऐसे मर्द पूरी दुनिया को सल्तनत और हर औरत को अपनी सम्पत्ति समझें तो यह पुरुषों से अधिक स्त्रियों का दोष है।

मूर्ति को पूजो और जीवित बेटियों को जला दो, हवस का शिकार बनाओ और सार्वजनिक मंचों पर गालियाँ दो…….यह मानसिकता मर्दों को कभी आगे नहीं बढ़ने देगी और परम्परा के नाम पर रूढ़ियों को अपनाना इस देश को और पीछे ले जाएगा….।

इस घटना का असर पड़ा है और बहुत गहराई से पड़ा है…बीएचयू ही नहीं पूरे बनारस की छवि धूमिल हुई है। व्यक्ति की मानसिकता ही देश का भविष्य और उसकी प्रगति की दिशा तय करती है…अब यह इस देश को तय करना है कि वह आए जाए या पीछे रहकर कुंठा में जीए।

पापी पेट का सवाल

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अपराजिता की ओर से

अपने आस – पास हम ऐसे बहुत से बच्चों को देखते हैं जो अपना बचपन दाँव पर लगाकर अपने परिवार का पेट भरते हैं। कई बार इसमें उनकी जान भी दाँव पर लगी होती है मगर पेट भरने के लिए उनके माता – पिता ही कई बार उनको ऐसी जगहों पर भेजते हैं और यह उनकी मजबूरी है। हम 21वीं सदी के भारत का सपना देख रहे हैं जहाँ बच्चों को बच्चा भी नहीं रहने दिया जाता। बाल श्रमिक इस देश की भयावह समस्या हैं मगर खेल दिखाने वाले बच्चों को क्या अन्य बच्चों की तरह जीने का अधिकार नहीं है। कुछ ख्याल बरबस आ जाते हैं और कुछ ऐसी घटनाएँ जब झकझोर दें तो बस कलम चल पड़ती है। मौमिता भटट्टाचार्य युवा पत्रकार हैं और ऐसी ही घटना को देखकर उन्होंने  अपनी कलम चलायी है, आप भी पढ़िए और कुछ ऐसा देखकर लिखने की छटपटाहट हो तो हमसे साझा करें –

मौमिता भट्टाचार्य

” राधा रानी खेल दिखायेगी….दिखायेगी!!! राधा रानी रस्सी पर चलेगी…चलेगी!!! बाबू पापी पेट का सवाल है। कुछ मदद कर दो। हमारा भी त्योहार मन जायेगा।” यह किसी नुक्कड़ नाटक के संवाद नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता है।

त्योहार किसे पसंद नहीं होता है। बच्चों के लिये तो त्योहारों का महत्व कुछ ज्यादा होता है पर कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जिनके जीवन की यह सच्चाई है।

एक ओर जहाँ न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि पूरी दुनिया दशहरा और विजया दशमी मनाने में मगन है। वही दूसरी तरफ है गोपी और राधा कुमारी की टोली, जिसमें हैं 5-6 साल की बच्ची राधा, 13-14 साल का गोपी, 3-4 साल का एक बच्चा और एक अधेर व्यक्ति शमिल है।

अपनी टोली के साथ छत्तीसगढ़ के बिलासपुर का रहनेवाला गोपी महानगर कोलकाता में तमाशा दिखाने आता है। षष्टी के दिन वह दमदम इलाके में तमाशा दिखाता है, तो नवमी को वह बागबाजार पूजा पण्डाल के बाहर तमाशा दिखाता है। बाग बाजार में राधा लगातार लगभग ढाई तीन घंटे रस्सी पर चलती है। आने जाने वाले दर्शनार्थियों में से कोई कुछ रुपये दे देता तो कोई अचरज से बस देखता रह जाता। वहाँ मौजूद हर किसी ने इसे मोबाइल में कैद किया।

गोपी कहता है कि हर रोज लगभग 500-600 रुपया कमा लेता है। गोपी के लिये काला अक्षर भैंस बराबर है। वह कभी स्कूल गया ही नहीं। गोपी और राधा इस पेशे को ही अपना बना चुके है।

गोपी को किसी और काम को पेशागत तरीके से करने की कोई इच्छा भी नहीं है। आज एक ओर तो बाल अधिकार और बाल सुरक्षा के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं और दूसरी तरफ गोपी और राधा जैसे बच्चे हैं जिन्होंने आज तक स्कूल का चेहरा तक नहीं देखा है।

इन सबके बीच एकमात्र अच्छी बात यह है कि कम से कम गोपी और राधा के बहाने रस्सी पर चलने जैसे खेलों ने अपना अस्तित्व बचा कर रखा है पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि 13-14 साल के इन बच्चों को सड़कों पर तमाशा दिखाकर अपना पेट पालने को मजबूर होना पड़े।

(तस्वीर – लेखिका  के सौजन्य से)

दुर्गापूजा और यायावरी के वो चार दिन

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सुषमा त्रिपाठी

आज विजया दशमी है। देखते – देखते नवरात्रि कैसे गुजर गयी, पता ही नहीं चला। नवरात्रि की धूम तो सारे देश में रहती है मगर दुर्गापूजा के ये 4 दिन बंगाल का ऑक्सीजन है।

टाला पार्क में आधुनिकता का भविष्य दिखा मगर क्या आज हमारी नियति नहीं है? दवाओं पर जिन्दा रहना

बंगाल की खूबसूरती देखनी हो तो पूजा के ये 4 दिन सबसे बेहतरीन है। वक्त बदला है तो शारदोत्सव के मायने बदले हैं, अब शहर होर्डिंग्स से पटा रहता है मगर ये भी संकेत बन जाते हैं कि शहर तैयार हो रहा है, ये पूरा बंगाल तैयार हो रहा है माँ की आराधना के लिए।

माँ दुर्गा को के पंख….गिरीबाबू लेन की प्रतिमा।

यह एक ऐसा मौसम है जब बसों की भीड़, लम्बी कतारों का असर लोगों पर नहीं पड़ता। इन चार दिनों में लोग नाराज नहीं होना चाहते, जल्दी होते भी नहीं, बस हर दिन नये – नये कपड़े, दोस्त, मस्ती और अड्डा…यही चलता है।

गाड़ियों का शोर,, ट्रैफिक….शिकायतें….उत्सव सब धो डालता है…अहिरीटोला का पंडाल

ये चार दिन बंगाल की संस्कृति और बंगाल कला के बेहतरीन नमूने लाते हैं। पंडालों में लगी भीड़ और एक प्रतियोगिता सी लगी रहती है। रिपोर्टर से लेकर एंकर तक, सब साड़ी और धोती – पंजाबी में सजे, पूजा की तस्वीरें लाते हैं।

हम लन्दन भले न जाएँ…लन्दन अपने शहर में उतार लाते हैं…भवानीपुर स्थित एक भव्य पंडाल

 

इन चार दिनों में सारे शिकवे, सारा गुस्सा, असंतोष सब पीछे छूट जाते हैं। बंगाल के ये चार दिन बंगालियों के चार दिन नहीं रहते, मजहब की दीवारें पीछे छूट जाती हैं। इस बार भी कहीं पंडालों में 22 किलो सोने की साड़ी माँ को पहनायी गयी तो कभी करोड़ों के बजट वाला पंडाल बना।

उत्सव मजहब और नफरत की हर सीमा से परे है। वह घृणा नहीं प्रेम जानता हैै। हिन्दूओं की ही नहीं दुर्गापूजा हम सबकी है।

 

कहीं महिष्मती तो कहीं लंदन उतरा। कहीं गौतम बुद्ध दिखे तो कहीं चन्द्रोदय मंदिर, हर पंडाल में एक सन्देश छुपा है। वह कहीं सड़क हादसों से बचने की सीख देता है तो कहीं मशीनी हो रही दुनिया को चेतावनी देता है और कहीं छोड़ जाता है शांति और साम्प्रदायिक सौहार्द का एक सबक।

कुम्हारटोली पार्क में दिखा प्रस्तावित चन्द्रोदय मंदिर

ये दिन आराधना के दिन हैं, ये दिन यायावरी के दिन थे….हम जब निकले तो आँखों को तड़क – भड़क की तलाश नहीं थी…करोड़ों के बजट वाले मंडप नहीं चाहिए थे….कुछ ऐसा चाहिए था जिसमें एक मकसद हो, परम्परा की छाप हो…कुछ ऐसे ही पंडाल हमें मिले भी जिसकी गूँज हमें अब तक सुनायी पड़ रही है।

मानव बंधन भी. भवानीपुर में एक मण्डप में यही थी इस पूजा की थीम

बाकी, माँ के आगमन की प्रतीक्षा में एक बार फिर डूब गया बंगाल एक और यायावरी के लिए….हमें भी इन्तजार है उन चार दिनों का क्योंकि ऑक्सीजन तो हम सबको चाहिए।

कुम्हारटोली तो अभी भी व्यस्त रहेगी…लक्खी पूजा आशछे तो…..खुमार बरकरार है…..यायावरी जारी है। ….ताले…आशछे बछर आबार होबे….शुभो विजया।

विजय दशमी

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                                                -हरिवंशराय बच्चन

जो जय उठाते हाथ,
उनकी जाति है नत-शीश,
उनका देश है नत-माथ,
अचरज की नहीं क्या बात?
इष्ट जिनके देवता हैं राम
उनकी जाति आज अशक्त,
उनका देश आज गुलाम,
विधि की गति नहीं क्या वाम?

मुक्ति जिनके जन्म का आदर्श
बंधन में पड़े वे आज,
बंधन की तजे वे लाज
क्यों हैं? बोल, भारतवर्ष!

आत्मपरिचय और संयम रखना सिखाता है दशहरा का पर्व

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नवरात्रि के नौ पावन दिनों के पश्चात् दशहरा दरअसल स्वयं के पुर्नपरिचय का महाकाल है, आंतरिक जागरण का कालखण्ड है। नवरात्रि का पर्व किसी पंडाल में स्थापित देवी की कृपा प्राप्त करने का नहीं, बल्कि अपने ही भीतर के सप्तचक्रों पर विराजित अपनी ही नौ शक्तियों के बोध और अपनी बाह्य ऊर्जा से नौ गुनी शक्तिशाली आंतरिक ऊर्जा को सहजता और सरलतापूर्वक सक्रीय करने की पावन बेला है। अपने अंतर्मन से बाहर पंडाल में देवी की स्थापना तो बस स्वयं से जुड़ने की किसी वैज्ञानिक पद्धति का हिस्सा प्रतीत होती है, जिसकी तकनीक कालांतर में विस्मृत होने से आज सिर्फ पारंपरिक मान्यताओं की खुराक बन कर रह गयी है।

दशहरा और दशरथ दोनों में दस है। दस से अभिप्राय है दस इन्द्रियां। पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियां। इन्हीं इन्द्रियों को पराजित करने का अभिप्राय है यह पर्व। स्वयं पर विजय पाने वाला ही दशरथ कहलाता है। राम दशरथ की संतान हैं। राम कहीं बाहर से नहीं, इन्हीं दशरथ से अर्थात् हमारे भीतर से ही प्रस्फुटित होते हैं। दशरथ हमारी आपकी आंतरिक क्षमता का प्रतीक पुरुष है, महाचिन्ह है। विजयादशमी अपने ही भीतर के सप्त सुप्त चक्रों पर आसीन नौ ऊर्जाओं और अपनी बाह्य शक्ति से नौ गुनी अधिक आंतरिक क्षमता के बोध से सर्वत्र विजय की महाअवधारणा है। नवरात्रि के नौ दिनों की साधना के पश्चात् स्वयं पर काबू पाकर विजय की दशमी अर्थात् विजयादशमी का सूत्रपात संभव है। मूल भाव तो यही है कि स्वयं को जीते बिना जगत को या किसी को भी जीतोगे कैसे।

(साभार – जनसत्ता)