Saturday, October 3, 2026
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घर से भागे प्रेमी जोड़ों को मिलती है इस मंदिर में शरण, स्वयं भगवान शिव करते हैं उनकी रक्षा

“दो प्यार करने वालों की मदद खुद भगवान करता है। पूरी दुनिया चाहे प्रेमी जोड़ियों के खिलाफ हो जाए लेकिन ऊपरवाला कभी उन जोड़ों का साथ नहीं छोड़ता”। आपने अक्सर ऐसी लाईनें फिल्मों में सुनी होंगी लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जहां सच में भगवान दो प्यार करने वालों की रक्षा करते हैं। यहां घर से भाग के आए प्रेमी जोड़ों को शरण मिलती है। हम बात कर रहे हैं शांघड गांव के देवता शंगचुल महादेव मंदिर की।

हर जाति और धर्म के प्रेमी जोड़ों को मिलती है शरण

हिमाचल प्रदेश जितना प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है उतना ही अपनी परंपराओं के लिए भी प्रख्यात है। हिमाचल के कुल्लु में स्थित शांघड गांव के देवता शंगचुल महादेव अपने यहां आए प्रेमियों को शरण देते हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर स्वयं भगवान शिव प्रेमियों की रक्षा करते हैं। शंगचुल मंदिर पांडव कालीन ऐतिहासिक धरोहरों में से एक माना जाता है। किसी भी धर्म या जाति के प्रेमी जोड़े यहां पहुंचते हैं तो भगवान शिव उन्हें अपनी शरण में ले लेते हैं। महादेव मंदिर का सीमा क्षेत्र करीब 100 बीघा में फैला है। इस सीमा में आया हुआ हर युगल शिव की शरण में आया हुआ माना जाता है।

गांव में पुलिस के आने तक की है मनाही

इस अनोखे गांव और मंदिर की नियमों के अनुसार इस गांव में पुलिस के आने पर भी प्रतिबंध है। इसी के साथ कोई भी यहां पर शराब, सिगरेट और चमड़े का सामान लेकर नहीं आ सकता है। इसी गांव में किसी भी प्रकार के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और लड़ाई-झगड़े और ऊंची आवाज में बात नहीं करता है। गांव में देवता का फैसला ही सर्वमान्य होता है। यहां आए प्रेमी जोड़ों के मामले जब तक निपट नहीं जाते हैं, तब तक शंगचुल महादेव मंदिर के पंडित उन्हें भगवान शिव का मेहमान मानते हुए उनकी सेवा करते हैं।

पांडवों की भी की थी रक्षा

इस मंदिर के लिए पौराणिक मान्यता है कि महाभारत के काल में पांडवों को आज्ञातवास मिलने के बाद वो इस गांव में आए थे और इस स्थान पर कुछ समय के लिए रुके थे। पांडवों की हत्या करने के लिए कौरव भी इस स्थान पर आए तो शंगचुल महादेव ने कौरवों को रोका और कहा कि ये मेरा क्षेत्र है, जो भी मेरी शरण में आता है उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। महादेव के क्रोध से डरकर कौरव वापस लौट गए थे। उसके बाद से जो भी समाज से ठुकराया प्रेमी युगल महादेव की शरण में आता है स्वयं शिव उनकी देखभाल करते हैं और उनकी परेशानियों को खत्म कर देते हैं।

 

गुजरात की मीना कैसे बन गईं सबकी ‘पैड दादी’

”भारत में लोग कई चीजें दान करते हैं, लेकिन सैनिटरी पैड और अंडरगार्मेंट दान करने के बारे में ज़्यादातर लोग सोच भी नहीं पाते. लेकिन ज़रा उनके बारे में सोचिए जो इन्हें ख़रीद ही नहीं पाते।’‘ ये कहना है 62 साल की मीना मेहता का जो गुजरात के सूरत में रहती हैं। सूरत के सरकारी स्कूलों की लड़कियां उन्हें पैड दादी कह कर बुलाती हैं जबकि झुग्गियों में रहने वाली लड़कियां उन्हें ‘पैड वाली बाई’ के तौर पर जानती हैं।

भारत के पैडमैन के बारे में तो हम पहले से जानते हैं, लेकिन पैड दादी के बारे में बहुत कम जानकारी है।

हर महीने बांटती हैं पांच हज़ार पैड

मीना हर महीने 5,000 पैड दान करने के लिए सूरत में अलग-अलग स्कूलों और झुग्गियों का चक्कर लगाती हैं। वह झुग्गियों में रहने वाली लड़कियों को एक किट देती हैं।

मीना पहले लड़कियों को सिर्फ़ पैड दिया करती थीं, लेकिन जब वह झुग्गियों में रहने वाली लड़कियों से मिलीं तो उन्हें पता चला कि सिर्फ़ पैड देना ही काफ़ी नहीं है क्योंकि इन लड़कियों के पास पैड इस्तेमाल करने के लिए अंडरगार्मेंट भी नहीं हैं।

लड़कियों की इस दिक्कत को दूर करने के लिए उन्होंने ‘हेल्थ किट’ देने के बारे में सोचा। इस हेल्थ किट में आठ सैनेटरी पैड, दो अंडरवियर, शैंपू और साबुन होते हैं।

मीना ने बीबीसी गुजराती को बताया, ”जब साल 2004 में तमिलनाडु में सुनामी आई थी। तब इंफ़ोसिस फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा मूर्ति ने पीड़ितों को सैनेटरी पैड बांटे थे। उन्होंने सोचा था कि लोग पीड़ितों को खाना और अन्य चीजें दे रहे हैं, लेकिन उन बेघर महिलाओं का क्या जिन्हें माहवारी हो रही होगी? उनके इन्हीं शब्दों से मुझे काम करने की प्रेरणा मिली।”

”बाद में मैंने कुछ ऐसा देखा जिसने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया और जो मैं आज कर रही हूं उसके लिए मजबूर कर दिया। मैंने देखा कि दो लड़कियां कचरे से इस्तेमाल किए गए पैड ले रही थीं।

मैंने उनसे पूछा कि वो इन पैड का क्या करने वाली हैं। उन्होंने कहा कि वो इन्हें धोएंगी और उसके बाद फिर से इस्तेमाल करेंगी। यह सुनकर मेरे होश उड़ गए। इसके बाद मैंने अपनी कामवाली और अन्य पाँच लड़कियों को पैड देने शुरू किए. ​फिर मैं स्कूलों में भी जाकर पैड बांटने लगी।”

मीना ने आगे बताया, ”जब मैं स्कूल में पैड देने गई तो एक लड़की मेरे पास आई और कान में बोली, दादी आप हमें पैड दे रही हैं, लेकिन हमारे पास पैड इस्तेमाल करने के लिए अंडरवियर ही नहीं है। तब से मैं अंडरवियर भी दे रही हूँ। वहीं, झुग्गियों में रहने वाली लड़कियों को साफ़-सफ़ाई की जानकारी न होने के कारण वो संक्रमण का शिकार हो जाती हैं इसलिए मैं उन्हें पूरी किट देती हूं.”

उन्होंने कहा, ”सुधा मूर्ति ये सुनकर बहुत हैरान थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि वो कई सालों से महिलाओं के लिए काम कर रही हैं, लेकिन ये बात कैसे उनके दिमाग़ में कभी नहीं आई? बाद में उन्होंने मुझे एक लाख रुपये के सैनेटरी पैड दो बार भेजे।”

विदेश से भी मिली मदद

मीना कहती हैं कि शुरुआत में इस काम में होने वाले खर्चे में उनके पति मदद किया करते थे। उन्होंने मीना को 25 हज़ार रुपये दिए थे. लेकिन, बाद में कई और लोग इस अभियान से जुड़ गए। लंदन, अफ़्रीका और हांगकांग से कई लोगों ने मीना की इस अभियान में मदद की। अब मीना मेहता मानुनी संस्थान चलाती हैं। मीना ने बताया कि जिन महिलाओं ने पैड का इस्तेमाल शुरू किया वो कहती हैं कि अब उन्हें खुजली या अन्य सफ़ाई संबंधी समस्याएं नहीं होतीं. वो आराम से काम कर सकती हैं।

भारत में माहवारी से जुड़े टैबू के बारे में मीना ने बीबीसी गुजराती से कहा, ”क्या हम सब्ज़ी बेचने वाली किसी औरत से सब्ज़ी खरीदने से पहले पूछते हैं कि उसे माहवारी है या नहीं? माहवारी को लेकर ये छुआछूत और टैबू अस्वीकार्य हैं।”

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

गुजरात की दो लड़कियों ने केले के रेशों से बनाया सेनेटरी पैड

 

इन दिनों अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन’ की काफी चर्चा है। उनकी यह फिल्म सैनिटरी पैड बनाकर क्रांति लाने वाले अरुणाचलम मुरुगनाथम के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने ग्रामीण महिलाओं के लिए सस्ते नैपकिन बनाने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। इसी तरह गुजरात के मेहसाणा जिले में दो लड़कियों ने भी सस्ते और इको फ्रेंडली पैड के मॉडल पेश किए हैं। इन पैड्स की खास बात यह है कि इन्हें पूरी तरह से ऑर्गैनिक तरीके से तैयार किया गया है। यानी कि ये स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के काफी अनुकूल हैं। इन दोनों लड़कियों का नाम राजवी और धार्मि पटेल हैं।

मेहसाणा के आनंद निकेतन स्कूल की नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली दोनों लड़कियों ने स्कूल लेवल पर पहले इसे प्रदर्शित किया था। उसके बाद वड़ोदरा में सीबीएसई की जोन लेवल पर साइंस एग्जिबिशन में उसे दिखाया गया। वहां इस प्रॉजेक्ट और इनकी सोच की काफी तारीफ हुई। भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मॉडल को अब राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी में दिखाने के लिए दिल्ली ले जाया जाएगा। इसका परीक्षण भी किया जा रहा है। जिसके लिए इसे एक अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में दे दिया गया है। वहां पर इस बात की जांच की जाएगी कि यह स्त्रियों के इस्तेमाल के लिए उचित है या नहीं।

अभी सिर्फ 15 सैंपल अस्पताल को दिए गए हैं। धर्मि और राजवी को स्कूल की तरफ से पूरा सपोर्ट मिला। स्कूल के प्रबंधक बिपिन भाई पटेल और प्रिंसिपल डॉ. ट्रेशा पॉले ने बताया कि स्कूल के टीचर जॉनी अब्राहम और तपस्या ब्रह्मभट्ट के मार्गदर्शन में कक्षा 9 की स्टूडेंट्स धार्मि पटेल ओर राजवी पटेल ने यह सेनेटरी पेड तैयार किया है। उन्होंने इसके लिए काफी रिसर्च किया और वड़ोदरा की एक एजेंसी से संपर्क कर केले के खराब हो चुके तने से रेशे निकाला गया। उन रेशों से ये पैड तैयार किए गए।

राजवी के टीचर जॉनी अब्राहम ने बताया कि इस पेड को ट्रायल के लिए महेसाणाा के सिविल हॉस्पिटल में दे दिया गया है। स्कूल इन पैड्स को बड़े पैमाने पर प्रॉडक्शन करने पर विचार कर रहा है। केले के पेड़ का बेकार तना इसके लिए बहुत ही उपयोगी है। तने से रेशे निकालकर उससे पैड बनाया जाता है। इस वजह से यह पर्यावरण के लिए काफी अच्छा है और महिलाओं के लिए अनुकूल भी है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसकी कीमत भी ज्यादा नहीं है। गरीब महिलाएं भी आराम से इसे खरीद सकेंगी। क्योंकि इसकी कीमत 5 रुपये आंकी गई है। इस्तेमाल के बाद यह पैड किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता और उसी में मिल जाता है।

(साभार – योर  स्टोरी)

 

नहीं रहीं जनरल ज़िया और मुशर्रफ़ से भिड़ने वालीं आसमां जहांगीर

पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पूर्व अध्यक्ष और जानीमानी मानवाधिकार कार्यकर्ता आसमा जहांगीर का 66 साल की उम्र में लाहौर में निधन हो गया। बीबीसी से बात करते हुए मुंज़े जहांगीर ने अपनी मां के निधन की पुष्टि की। उनका कहना था कि वे इस वक्त देश से बाहर हैं और उनके भाई ने उन्हें इस ख़बर के बारे में बताया।

रिपोर्टों के मुताबिक़ आसमा जहांगीर की तबियत रविवार को ही अचानक ख़राब हुई जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अपने असाधारण साहस, बहादुरी और ताउम्र समाज के पिछड़े लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली आसमा जहांगीर पाकिस्तान के घर-घर में जानी जाती थीं।

आसमा पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली महिला अध्यक्ष थीं और उन्हें महिला सशक्तिकरण का आइकॉन माना जाता था।

वो अपने सहयोगी वकील आज़म तारार से फ़ोन पर बातें कर रही थीं, तभी उन्हें बहुत तेज़ दर्द हुआ और फ़ोन उनके हाथ से छूट गया।

मीडिया से बात करते हुए आज़म तारार ने कहा कि उन्हें उनकी चीख सुनाई दी, पहले उन्होंने सोचा कि उनका कोई पोता गिर गया है लेकिन फ़ोन कट गया।

आज़म ने कहा कि उन्होंने फिर फ़ोन करने की कोशिश की लेकिन 15 मिनट के बाद जब उनके घर के एक सहायक ने फ़ोन पर बताया कि उन्हें अस्पताल ले जाया गया है।

आसमा के निधन पर शोक

पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी और क़ानून से जुड़े लोगों को इस मौत से बेहद सदमा लगा है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राजनेताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है। अपने शोक संदेश में प्रधानमंत्री शाहिद खाक़ान अब्बासी ने क़ानून, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की।

पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश साक़िब निसार ने अपने शोक संदेश में न्यायपालिका की आज़ादी और पाकिस्तान के संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने में उनके योगदान की प्रशंसा की।

अपने शोक संदेश में मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, “वो एक मुखर महिला थीं और अपनी कड़ी मेहनत और क़ानूनी पेशे के प्रति प्रतिबद्धता की बदौलत उनकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ी।”

कई राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले

आसमा ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार दूत के रूप में भी काम किया था। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इसमें स्वीडन के नोबल पुरस्कार के विकल्प के रूप में विख्यात 2014 में मिला फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भी शामिल है।

उन्हें देश की राजनीति में सेना के प्रभाव का मुखर आलोचक माना जाता था। उन्होंने ज़िया उल हक़ और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की तानाशाह सरकारों के ख़िलाफ़ संर्घषों का नेतृत्व किया था।

जनरल ज़िया और मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ लड़ीं

साल 2007 में जब पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ ने पूर्व न्यायाधीश इफ़्तिखार मुहम्मद चौधरी को उनके पद से हटा कर देश में आपातकाल घोषित कर दिया था तो वो न्यायपालिका की बहाली के लिए आंदोलन में सबसे आगे थीं।

उन्हें अपने कॅरियर के दौरान मौत की धमकी, पिटाई और जेल जाने तक का सामना करना पड़ा। उन्हें 1983 में ज़िया उल हक शासन के दौरान मानवाधिकारों की बहाली के लिए आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए जेल जाना पड़ा और फिर 2007 में जनरल मुशर्रफ़ के राज के दौरान न्यायपालिका की बहाली को लेकर उन्हें जेल भेजा गया।

मानवाधिकार की पैरोकार

आसमा जहांगीर पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के सह-संस्थापकों में से थीं और उन्होंने इसके लिए सालों तक बतौर महासचिव और अध्यक्ष काम किया। वो दक्षिण एशिया फोरम फॉर ह्यूमन राइट्स की सह-अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ की उपाध्यक्ष रहीं।

उन्होंने अपनी सारी जिंदगी अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों के मामलों का प्रतिनिधित्व किया.

पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट

आसमा जहांगीर का जन्म 27 जनवरी 1952 को लाहौर में हुआ था। लाहौर के ही कॉन्वेंट ऑफ़ जीसस एंड मैरी से ग्रैजुएशन और फिर पंजाब यूनिवर्सिटी से उन्होंने क़ानून की पढ़ाई की।

वे कानून की आगे की पढ़ाई के लिए स्विटज़रलैंड, कनाडा और अमरीका भी गईं। लाहौर के क़ायदे-आज़म लॉ कालेज में उन्होंने संविधान भी पढ़ाया था। उन्होंने दो किताबें भी लिखीं- डिवाइन सैंक्शन? द हदूद ऑर्डिनेंश (1988) और चिल्ड्रेन ऑफ़ ए लेसर गॉडः चाइल्ड प्रिसनर्स ऑफ़ पाकिस्तान (1992)।

 

छात्राओं को मिली सैनेटरी नैपकिन वाली उड़ान

आज जब सोशल मिडिया से लेकर हर ओर सेनेटरी पैड के प्रयोग को लेकर चर्चाओं का शोर मचा है, ऐसे में कोलकाता की भूमि पर कार्यरत एक स्वयं सेवी संस्थान (उड़ान) ने एक अनूठी पहल की शुरुआत की है। आज संस्थान की ओर से हावड़ा शिक्षा सदन (गर्ल्स) में संक्रमण मुक्त मासिक स्राव विषय पर एक ज्ञानवर्द्धक परिचर्चा आयोजित की गई। जिसमें छात्राओं को संक्रमण मुक्त मासिक स्राव, सेनेटरी नैपकिन के प्रयोग के साथ साथ इससे जुड़े कई भ्रांतियों को दूर करने के लिए वैज्ञानिक तर्कों पर आधारित बातें भी बताई गयी।

इस मौके पर उपस्थित एनजीओ के संस्थापक एवं निदेशक अभिनव गुप्ता जी ने बताया इस विषय पर जागरूकता का अधिकतम अभाव है।साथ ही स्कूलों में सेनेटरी नैपकिन निःशुल्क उपलब्ध होना अतिआवश्यक है। सचिव श्रीमती सोफिया खान ने बताया कि शीघ्र ही उड़ान की ओर से सेनेटरी नैपकिन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट उत्तरपाड़ा में लगाया जा रहा है जिसके जरिये हर महीने 75000 छात्राओं को निःशुल्क सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराया जा सकेगा। संस्थान की सदस्या सुश्री गिरिजा शर्मा ने बताया कि उड़ान की ओर से ईस तरह के कार्यक्रम कई स्कूलों में ईसी महीने में करने की योजना है। हावड़ा शिक्षा सदन (गर्ल्स) की प्रिंसिपल श्रीमती निराला ठाकुर ने संस्थान की पहल की अत्यधिक सराहना की।

अभिजात्यता छोड़कर मुखर बनिये, तभी रहेंगी किताबें और सलामत रहेंगे आप

इस बार पुस्तक मेले की जगह बदल गयी है। देखा जाये तो इसका असर सकारात्मक ही पड़ा है मगर गौर करने वाली बात यह है कि हिन्दी के स्टॉल लगातार कम होते जा रहे हैं। इसके बावजूद कि हिन्दी पाठक खोजकर – भटककर अपनी काम की किताबें ढूँढ रहे हैं और छुट्टी के दिनों में भीड़ भी अच्छी – खासी हो रही है मगर प्रकाशकों और पाठकों का मजबूत रिश्ता कोलकाता पुस्तक मेले में नजर नहीं आता। आमतौर पर प्रकाशक इसका ठीकरा कभी पाठकों पर फोड़ते हैं तो कभी आयोजकों पर गुस्सा निकालते हैं मगर सच्चाई तो कुछ और ही है। किताबें लिखी जा रही हैं, छप रही हैं मगर पाठकों तक पहुँचने की कोशिश नहीं हो रही है। न तो प्रकाशक इस बात को लेकर गम्भीर हैं और न ही शिक्षण संस्थान या साहित्यिक संस्थायें इस बात को लेकर सोच रही हैं।

हिन्दी साहित्य को साहित्यकारों, आलोचकों और शिक्षा व कला वर्ग की एक खास दुनिया में समेट दिया गया है। अभिजात्यता ऐसी कि फिल्मों और अच्छी हिन्दी फिल्मों के अवदान को हम याद नहीं रखते और मजे की बात यह है कि हमारा ध्यान इन किताबों पर तब ही जाता है, जब किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनती है। किताबों को आम जनता तक पहुँचाना भी हिन्दी की जिम्मेदारी है। इसके लिए हमें अपने स्वार्थ से परे होकर सोचने की जरूरत है। बांग्ला और अँग्रेजी की अच्छी बात यह है कि उनको सिनेमा से परहेज नहीं है और न ही इन भाषाओं के लेखकों को किसी बॉलीवुड कलाकार के साथ मंच साझा करने में परेशानी है इसलिए साहित्यिक हस्तक्षेप इन भाषाओं के सिनेमा को मजबूत करता है। हिन्दी में इसका उल्टा है और हिन्दी के लेखक, बुद्धिजीवी और आलोचक सिनेमा से जुड़ने को अपनी तौहीन समझते हैं। एक अजीब प्रकार की हेय दृष्टि से कलाकारों को देखा जाता है और सलूक ऐसा किया जाता है मानो हिन्दी साहित्य पर हिन्दी के साहित्य जगत का एकाधिकार हो।

इस दृष्टि को तोड़ने में हिन्दी कविता एक महत्वपूर्ण प्रयोग कर रही है। सिनेमा के सितारों से हिन्दी की कवितायें पढ़वाना और आम जनता तक पहुँचाना एक बड़ा बदलाव है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके साथ ही तकनीक और साहित्य को जोड़ना भी जरूरी है। अनिमेष जोशी सुनो कहानी यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। अगर युवाओं की बात की जाये तो बोल पोएट्री सोशल मीडिया पर ऐसे मसलों को उठा रहा है, जिन पर बात करनी जरूरी है। धीरज पांडेय, विहान गोयल और उनकी टीम की जुगलबंदी वो काम कर रही है, जो बड़े – बड़े साहित्यकार नहीं कर पा रहे हैं और वह है युवा पीढ़ी को जोड़ना। आप मान लीजिए कि आप पर्वत पर बैठकर साहित्य को लोकप्रिय नहीं बना सकते। अगर शाहरुख खान जयशंकर प्रसाद को पढ़ते हैं या सनी लियोनी सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ती हैं तो इससे कविता अपवित्र नहीं होगी बल्कि साहित्य की ताकत सामने आयेगी। मसला संवाद का भी है और यह भी सच है कि इसके लिए कोशिश नहीं की जाती। हाल ही में जब दिल्ली पुस्तक मेला आयोजित हुआ तो उसकी हलचल से पूरा सोशल मीडिया पटा पड़ा था। प्रचार करने के लिए मानों प्रकाशकों ने एक दूसरे से प्रतियोगिता लगा रखी थी। बड़े लेखकों से लेकर नवोदित साहित्यकार और युवाओं को दिल्ली पुस्तक मेले में देखा गया। आप ये माहौल अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले में देख सकते हैं मगर बांग्ला और अँग्रेजी प्रकाशकों के स्टॉल पर। हम हर साल रोना रोते हैं कि हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है…मीडिया में खबरें भी नयी पुस्तकों और पाठकों की कमी तक सीमित रहती हैं मगर इसके कारणों पर कभी हमारा ध्यान नहीं गया।

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर जब दिल्ली पुस्तक मेले की हलचल देखी तो ऐसा लगा कि हमें यह माहौल कोलकाता में नहीं दिखता। यह सही है बंगाल एक अहिन्दीभाषी राज्य है और यह भी सही है कि हिन्दी के पाठकों में जानकारी का अभाव है या साहित्य को लेकर उनमें उत्साह की कमी है मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने किताबों के प्रति प्यार जगाने और लोगों तक ले जाने की कोशिश की? क्या यह सच नहीं है कि हिन्दी के साहित्यकार अपनी गुटबाजी और घेरे में इस कदर घिरे हैं कि पाठकों तक पहुँचने की तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया? कहीं ये तो सच नहीं है कि हिन्दी के साहित्यकार खुद को इस कदर ऊँचाई तक ले आये हैं कि नीचे झुककर देखना उनको अपनी तौहीन लगती है? इस अभिजात्यता के चक्कर में हिन्दी ने कई साहित्यकारों के साथ आम पाठकों को भी खुद से दूर किया है। जहाँ तक प्रकाशकों का प्रश्‍न है तो साहित्य सेवा के साथ व्यवसाय और लाभ – हानि का गणित उनके लिए मायने रखता है। इस बार जब हम 2018 के कोलकाता पुस्तक मेले में गये तो हिन्दी के एक बड़े प्रकाशन समूह ने इसे हमारी बातचीत में स्वीकार किया और हमें यह फर्क इस बार भी दिखायी पड़ा। अगर आप शहरों के अनुसार पाठक के साथ बर्ताव बदलते रहेंगे तो इसमें क्षति आपकी ही होगी क्योंकि आजकल तो जमाना भी ऑनलाइन का ही है। हिन्दी के स्टॉलों पर पाठक थे मगर प्रकाशकों की ओर से किसी प्रकार की हलचल नहीं थी और हलचल होती भी है तो यह मात्र पुस्तक लोकार्पण तक ही सीमित रहती है। सवाल यह है कि कोलकाता पुस्तक मेले में स्टॉलों पर सन्नाटा आखिर हिन्दी की नियति क्यों है और यह कब तक ऐसा रहेगा? आप पाठकों को किताबें खरीदते देख सकते हैं। दिल्ली में राजकमल प्रकाशन ने पाठकों को लुभाने के लिए एक अभिनव प्रयोग किया था। किताबों की कुछ पँक्तियाँ पाठकों से पढ़वाकर उसे सोशल मीडिया पर डाला जाता रहा मगर लेख लिखे जाने तक कोलकाता पुस्तक मेले में इस समूह के स्टॉल पर यह प्रयोग हमें नहीं दिखा। तमाम असुविधाओं के बावजूद सिर्फ पाठकों पर ठीकरा फोड़ देना हमारी समझ में अपनी गलतियों से भागना और मुँह छुपाना है क्योंकि आपकी उपेक्षा और उदासीनता के बावजूद ये हिन्दी का पाठक ही है जिसके कारण आपका लेखकीय व्यक्तित्व सुरक्षित है और किताबें बिक रही हैं और खासकर तब जब कि आपकी ओर से युवा पाठकों को लुभाने, उस तक पहुँचने और साथ लाने की पुरजोर कोशिश नहीं की गयी। वो भी तब जब कि आप अपनी बहसों और एक दूसरे की आलोचना में उलझे रहें और बंगाल में तो अहिन्दीभाषी भी हिन्दी पढ़ते हैं और अनूदित किताबें पढ़ते हैं, इसलिए जरूरी है समय के साथ प्रचार के तरीकों को उन्नत करने के साथ मुखर होकर पाठकों से जुड़ें वरना आपको कोई अधिकार नहीं रहेगा कि आप अपनी नाकामी के लिए आम पाठकों को दोषी समझें।

राजकमल प्रकाशन समूह के निदेशक (विपणन एवं कॉपीराइट) अलिंद्य माहेश्‍वरी का कहना है कि हम साल भर देश में 60 अलग – अलग मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेते हैं। हर जगह समान रूप से ध्यान दे पाना और प्रचार कर पाना सम्भव नहीं हो पाता। कोलकाता पुस्तक मेले में तो हिन्दी स्टॉलों को कोने पर ही रख दिया जाता है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वैसे हम सोशल मीडिया पर प्रचार करते हैं और कोशिश करें कि पाठकों से सम्पर्क करने के तरीके हम इस पुस्तक मेले में भी लायें। आनन्द प्रकाशन के निदेशक दिनेश त्रिपाठी मानते हैं कि पाठकों की कमी नहीं है। पाठक आते हैं और किताबें भी बिकती हैं। कई किताबों के तो दो – तीन संस्करण भी निकल चुके हैं। हम सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार करते हैं। हाँ, यह सही है कि पाठकों तक पहुँचने के लिए हमें और भी तरीके अपनाने होंगे।

प्रो.रंजना शर्मा कहती हैं कि यह सही है कि बांग्ला और अँग्रेजी के प्रकाशक प्रचार के मामले में हिन्दी से कहीं आगे हैं। वे नये – नये तरीके अपनाते हैं और इसका नतीजा आप इन स्टॉलों पर हो रही पाठकों की बढ़ती तादाद के रूप में देख सकते हैं। पाठक कम नहीं हैं मगर प्रचार में कमी है, इस बात को स्वीकार करना होगा। मौन रहकर आप जनता तक नहीं पहुँच सकते। सस्ती किताबें उपलब्ध करवाना एक तरीका है और 50 रुपये में किताबें उपलब्ध करवाकर साहित्य भंडार यही काम कर रहा है। सिर्फ पुस्तक मेला ही नहीं बल्कि आम जीवन में भी लेखकों और प्रकाशकों को युवा पीढ़ी और आम पाठकों के पास जाना होगा। ऐसी गतिविधियाँ लानी होंगी जिससे जनता उनको अपना समझे…वे शिक्षण संस्थानों से जुड़ें, बाजारों से जुड़े, घरों से जुड़ें और ये समझायें कि साहित्य जनता की अपनी धरोहर है, साहित्य व कला जगत की मिल्कियत नहीं।

(अपराजिता फीचर डेस्क)

सब्जी बेचकर गरीबों के लिए अस्पताल खड़ा करने वाली सुभाषिनी मिस्त्री

आज के जमाने में ऐसे विरले ही होंगे, शायद न के बराबर, जिन्होंने समाज सेवा के लिए अपने जीवन में सुभाषिणी मिस्त्री जैसा त्याग किया हो। जन्म से ही वक्त ने उनकी घनघोर परीक्षाएं लीं। वह पहले तो जिस घर में पैदा हुईं, वहां मौत ने झपट्टे मारे। जब बच गईं, मुफलिसी में ब्याहकर कलकत्ता से ससुराल अपने गांव पहुंचीं तो वहां भी सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। सन 1943 में जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था, उन्हीं दिनो उनका जन्म हुआ था। वह चौदह भाई-बहन थीं, जिनमें सात अकाल की भेंट चढ़ गए थे। उनकी मात्र बारह साल की ही उम्र में कृषक पिता ने खेतिहर युवा से ही उनकी शादी रचाई। शादी के बाद तेईस साल की उम्र में वह विधवा हो गईं।

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव हंसपुकुर की सुभाषिनी मिस्‍त्री के पति समय पर ठीक से इलाज न हो पाने के कारण ही एक दिन चल बसे। अब उन पर अपने चार बच्चों का बोझ आ गया। उसके बाद सबसे पहले सुभाषिणी मिस्त्री ने अपने सभी चारो बच्चों को अनाथालाय भेज दिया और प्रण किया कि अब किसी गरीब को वह दवा-इलाज के अभाव में नहीं मरने देंगी। उस दिन उन्हें क्या पता था कि इसके बाद खुद उनकी संतानें भी साथ छोड़ देंगी। ऐसा ही हुआ। उस वक्त उन्होंने ठान लिया कि एक ऐसा अस्पताल बनवाएंगी, जिसमें उनके जैसे गरीबों का इलाज हो सके। वह अपना लौह-संकल्प पूरा करने में जुट गईं। अस्पताल खड़ा करना कोई आसाना काम नहीं था, इतना पैसा कहां से आएगा, यह चिंता उन्हें परेशान करने लगी। उन्होंने गांव वालों से मदद मांगी, तो कई लोग उनके साथ जुड़ते चले गए। वह लोगों से आर्थिक मदद तो मांगती ही रहीं, अपना एक-एक दिन दिहाड़ी मेहनत-मजदूरी से पैसा जुटाने में बीस साल तक व्यतीत करती रहीं।इस दौरान उन्होंने पैसे के लिए सब्जियां बेंची, लोगों के जूते तक पॉलिश किए, कई साल तक घरों के जूठे बर्तन धोए पर कदम पीछे नहीं मोड़ा, तनिक विचलित नहीं हुईं, धैर्य नहीं छोड़ा। एक-एक पैसा जमाकर सन् 1992 में उन्होंने सबसे पहले हंसपुकुर में दस हजार रुपए में एक एकड़ जमीन खरीदी। उस पर अस्थाई शेड डाला। कुछ बिस्तर बिछाए और निकल पड़ीं डॉक्टरों के हाथ-पैर जोड़ने। लाउडस्पीकर की मदद से भी शहर में डॉक्टरों %

जहाँ दहेज मांगने पर मिलता है दंड, खाना भी साथ लेकर आते हैं बराती

भले ही आदिवासी समाज को आदिम और पिछड़ा कहा जाता हो, लेकिन कई मामलों में यह तथाकथित विकसित समाजों को सीख देता नजर आता है। विशेषकर बेटियों के मामले में इस समाज की परंपराओं का जवाब नहीं। यहां बेटी को पूरी तरजीह दी जाती है। यही वजह है कि दहेज प्रथा का चलन इस समाज में कभी नहीं रहा।

परंपरा आज भी कायम है। अगर वर पक्ष ने भूल से भी दहेज मांग लिया, तो पंचायत के लोग दंड तय करते हैं। विवाह में होने वाले अनावश्यक खर्च को भी वधु पक्ष पर नहीं थोपा जाता है। वर पक्ष को बेटी का हाथ मांगने जना पड़ता है, तब होती है शादी। यहां तक कि बराती अपने साथ अपना खाना भी खुद ही लेकर आते हैं।

बेटी के पिता के सामने झुकता है सिर: संथाली आदिवासियों में बेटी का पिता वर खोजने नहीं जाता बल्कि वर पक्ष स्वयं लड़की के घर आता है। लड़की के पिता से सिर झुकाकर और विनती कर लड़की का हाथ मांगता है। कन्या पक्ष को रिश्ता मंजूर तो ठीक अन्यथा वह इंकार भी कर सकता है। यदि कन्या पक्ष गरीब है तो वर पक्ष को विवाह का पूरा खर्च उठाना होगा। साथ ही, एक जोड़ा बैल या कुछ हजार रुपये कन्या के पिता को देने होंगे। यदि दोनों पक्ष समर्थ हैं तो कन्या पक्ष को सवा रुपये देकर बात बन सकती है। विवाह के बाद भूल से भी वर पक्ष ने दहेज की बात की तो समाज की ओर से दंड तक दिया जाता है।

 झारखंड में संथाली आदिवासियों की इस परंपरा की बात करें तो राज्य के पूर्व सीएम शिबू सोरेन व बाबूलाल मरांडी ने भी अपने बेटों की शादी में आदिवासी परंपरा को निभाया। मात्र सवा रुपया लेकर शादी की गई थी। सोरेन के बेटे बसंत सोरेन की शादी बोकारो के खुंटरी कुसूलमुंडा गांव में शशिभूषण हांसदा की बेटी सरिता से हुई थी। इसमें भी इन्हीं परंपराओं का पालन किया गया था।

हजारीबाग जिले की मोरांगी पंचायत का महुआटांड़ आदिवासी टोला भी मिसाल पेश कर रहा है। करीब 50 घरों के इस टोले में बेटियों की शादी में किसी तरह के दान-दहेज की परंपरा नहीं है, यहां तक कि कन्या पक्ष पर कोई बोझ न पड़े इसके लिए बारातियों के खाने का इंतजाम भी न्योता के माध्यम से ही होता है। शादियों में जुटने वाले रिश्तेदार बोरियों में खाने-पीने का सामान लेकर पहुंचते हैं। बरात में आने वाले लोग भी खाना साथ लेकर ही आते हैं ताकि वधु पक्ष पर कोई भार न पड़े।

अगर कन्या पक्ष बारातियों के स्वागत में सक्षम नहीं है तो वर पक्ष ही शादी के दिन उन्हें अपने घर आमंत्रित करता है। रांची पंतगा की रहने वाली मुन्नी कुमारी की शादी पिछले वर्ष पांच मई को महुआटांड के आशीष लिंडा से हुई थी। वधु पक्ष के सक्षम नहीं होने की वजह से शादी का सारा इंतजाम वर पक्ष ने ही किया। मैट्रिक तक पढ़ी मुन्नी बताती हैं कि दहेज या अन्य खर्च की बात होती तो उस जैसी कई लड़कियों की शादी शायद ही हो पाती।

(साभार – दैनिक जागरण)

बेटे की तरह बेटी को भी जन्म से ही है पैतृक संपत्ति में हक- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने पिता की पैतृक संपत्ति में हिन्दू लड़की के हक पर अहम व्यवस्था दी है। कोर्ट ने कहा है कि हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 के बनने से पहले पैदा हुई लड़की को भी पिता की संपत्ति में पुत्रों के बराबर हक है। कानून की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा है कि 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार कानून में किये गए संशोधन में बेटी को पिता की संपत्ति में जन्म से अधिकार दिया गया है जैसा कि पुराने कानून में बेटे को मिला है। ऐसे में बेटी को भी बेटे की तरह संपत्ति में जन्म से अधिकार मिलेगा। दोनों पैतृक संपत्ति में जन्म से सहभागी माने जाएंगे।

यह अहम व्यवस्था न्यायमूर्ति एके सीकरी व न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने गत 1 फरवरी को कर्नाटक की दो बहनों के पिता की संपत्ति में हक पर मुहर लगाते हुए दी। निचली अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह कहते हुए बेटियों की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग खारिज कर दी थी कि उनका जन्म हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के बनने से पहले हुआ था। इतना ही नहीं बेटियों की ये दलील भी खारिज कर दी थी कि 2005 में हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम में हुए संशोधन के बाद उन्हें पिता की संपत्ति में कानूनन हक मिला है।

हिन्दू लड़की के पैतृक संपत्ति मे हक पर अहम व्यवस्था 

सुप्रीम कोर्ट ने पिता की संपत्ति में दोनों बहनों को हिस्सेदारी देते हुए अपने फैसले में कहा कि मिताक्षरा से संचालित होने वाले हिन्दू अविभाजित परिवार के कानून में अभूतपूर्व बदलाव हुआ है। ये बदलाव संपत्ति में हक रखने वाले सहभागी के नजदीकी महिला रिश्तेदार जैसे बेटी को बराबरी का हक देने के लिए किया गया। कानून में कहा गया है कि बेटी संपत्ति में जन्म से साझी हिस्सेदार होगी और उसके भी वही अधिकार और जिम्मेदारियां होंगी जो बेटे की होती हैं। बेटी साझी हिस्सेदार होगी और उसे वह संपत्ति वसीयत या किसी और तरीके से निस्तारित करने का भी हक होगा।

कोर्ट ने कहा कि बेटी के साथ भेदभाव खत्म करने और उसे बराबरी का हक देने के लिए ये बदलाव किये गये। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में ये मूलभूत बदलाव 2005 के संशोधन के जरिये किये गए। 2005 के संशोधित कानून की धारा 6 कहती है कि बेटी जन्म से ही संपत्ति पर उसी तरह साझी हिस्सेदारी की अधिकारी होगी जैसे कि बेटा होता है। कोर्ट ने कहा कि पुराना हिन्दू कानून बेटे को जन्म से संपत्ति का साझा हिस्सेदार मानता है ऐसे ही संशोधित कानून में बेटी को जन्म से साझा हिस्सेदार माना गया है। कानून में ठीक वैसे ही शब्द प्रयोग किये गये हैं जैसे बेटे के लिए किये गये हैं। इसलिए बेटे और बेटी दोनों का संपत्ति पर जन्म से साझा हक होगा।

कर्नाटक के गुरुलिंगप्पा सावादी अविभाजिक हिन्दू परिवार के थे। उनकी 2001 में मृत्यु हो गई। उनके दो बेटे, दो बेटियां व पत्नी थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके पोते ने संपत्ति में बटवारे का मुकदमा किया। मुकदमें में गुरुलिंगप्पा की दोनों बेटियों को संपत्ति का साझा हिस्सेदार नहीं बनाया गया। दलील थी कि इन बेटियों का जन्म हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के आने से पहले हुआ था। ये भी कहा कि इनकी शादी हो चुकी है और उसमे इन्हें सोना और पैसा मिला था इसलिए इन्होंने अपना हिस्सा छोड़ दिया है। दोनों लड़कियों ने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी मांगी थी। निचली अदालत और हाईकोर्ट से निराश होने के बाद दोनों बहनें सुप्रीम कोर्ट आयीं थी।

 

गुरु राहुल द्रविड़ के नाम जुड़ा वर्ल्ड कप टाइटल, शिष्यों ने दी बड़ी गुरुदक्षिणा

आधुनिक क्रिकेट के सबसे जेंटलमैन खिलाड़ी राहुल द्रविड़ के करियर की एक बड़ी कमी आज दूर हो गई। यह कमी थी एक अदद विश्वकप ट्राफी जीतने की। द्रविड़ अपने सफल-सुनहरे कैरियर में भले ही यह सपना पूरा नहीं कर पाए लेकिन उनके शिष्यों ने अंडर 19 विश्वकप जीतकर यह ट्राफी आज ‘गुरूदक्षिणा के रूप में उनकी झोली में डाल दी।

क्रिकेट की दुनिया में ‘श्रीमान भरोसेमंद, ‘संकटमोचक और ‘भारत की दीवार जैसे कई विशेषणों के बावजूद द्रविड़ अब तक किसी विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा नहीं रहे थे। लेकिन आज भारत के जिन युवाओं ने अंडर 19 विश्वकप जीता उसके गुरु यानी कोच राहुल द्रविड़ हैं।

दरअसल भारतीय क्रिकेट की अगली नस्ल को तैयार करने की जिम्मेदारी उठाने वाले द्रविड़ ने सितारों की फौज में नहीं बल्कि टीमवर्क में भरोसा रखने वाली एकादश बनाई है और इसकी बानगी अंडर 19 विश्व कप में देखने को मिली।

यह द्रविड़ का ही जज्बा था कि टूर्नामेंट के दौरान बेंगलूरू में आईपीएल की नीलामी हुई लेकिन अपनी युवा ब्रिगेड का ध्यान उन्होंने भटकने नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा,’आईपीएल नीलामी हर साल होगी लेकिन देश के लिये विश्व कप खेलने का मौका बार बार नहीं मिलेगा। इसके बाद जो हुआ , वह अब इतिहास है। द्रविड़ ने इन खिलाड़ियों को सपने देखने का हौसला दिया और वह सपना हकीकत में बदला जो वह बतौर खिलाड़ी पूरा नहीं कर पाये थे।
भारत अंडर 19 विश्व कप में सबसे ज्यादा चार बार विश्व कप जीतने वाली एकमात्र टीम बन गई। अब तक आस्ट्रेलिया और उसके नाम तीन तीन खिताब थे।
अपने 16 साल के टेस्ट कैरियर में 164 टेस्ट में 13288 रन बनाने वाले द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट में 344 मैच खेलकर 10889 रन बनाये।

विश्व कप में 1999 में बतौर रिजर्व विकेटकीपर उन्होंने पदार्पण किया लेकिन भारत का प्रदर्शन टूर्नामेंट में बेहद खराब रहा। इसी विश्व कप से हालांकि द्रविड़, सौरव गांगुली और सचिन तेंदुलकर की तिकड़ी का दबदबा दिखाई देने लगा था।

चार साल बाद दक्षिण अफ्रीका में गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम खिताब के बिल्कुल करीब पहुंची लेकिन फाइनल में यह सपना टूट गया जब आस्ट्रेलिया ने उसे हराकर खिताब जीता।

द्रविड़ की कप्तानी में 2007 में भारत ने वेस्टइंडीज में विश्व कप खेला जो किसी बुरे सपने से कम नहीं था। भारतीय टीम शुरूआती दौर से ही हारकर बाहर हो गई। द्रविड़ का सपना फिर अधूरा रहा। विधि का विधान देखिये कि भारत ने 2011 में अपनी मेजबानी में 28 साल बाद विश्व कप अपने नाम किया लेकिन महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली टीम में द्रविड़ नहीं थे। द्रविड़ और गांगुली को टीम में जगह नहीं मिली और विश्व कप इनके सुनहरे कैरियर का हिस्सा नहीं बन सका।

इसके बाद सितंबर 2011 में वह इंग्लैंड के खिलाफ आखिरी वनडे खेलकर द्रविड़ ने इस प्रारूप से विदा ली तो कहीं ना कहीं विश्व कप नहीं जीत पाने की कसक रही होगी। सात साल बाद गुरू द्रविड़ के शिष्यों ने उनके इस सपने को जिया और हकीकत में बदला । भारत के अंडर 19 चैम्पियन बनने की खुशी इस तथ्य के साथ दोहरी हो गई कि द्रविड़ का अधूरा सपना आखिरकार पूरा हुआ।