Friday, July 10, 2026
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सपने उम्र के मोहताज नहीं होते

निशा सिंह फैशन की दुनिया में धमाके से कदम रखने वाली अंतरराष्ट्रीय फैशन डिजाइनर हैं जिनके लिए फैशन मानवाधिकार सेवा का एक माध्यम है। दूसरों को रोजगार देने के लिए खुद फैशन डिजाइनिंग सीखी और लंदन जाकर लंदन फैशन वीक के फैशन स्काउट में अपना कलेक्शन दिखाने वाली और तारीफें बटोरने वाली महानगर की सबसे कम उम्र की और बंगाल की पहली डिजाइनर बनीं। अपराजिता ने निशा सिंह से खास मुलाकात की, पेश हैं प्रमुख अंश –

मैं डिजाइनर बनूँगी, ये कभी नहीं सोचा था

मैं हमेशा से सृजनात्मक थी मगर मैं डिजाइनर बनूँगी, ये कभी नहीं सोचा था। फाइन आर्ट्स करती थी और डिजाइनिंग करती थी। आई एन एफ डी में दाखिला लिया तो अपनी क्षमता का पता चला कि मैं कितना कुछ कर सकती थी। मुझे ये पता था कि कारीगरों से कपड़े बनवाकर बाजार में बिकवा सकती हूँ मगर इसके पहले तकनीकी जानकारी नहीं थी। पहली बार 4 सैम्पल बनवाये औरर 500 कुरते बनवाये थे जो हाथों हाथ बिक गये। मुझे जो भी लाभ मिलता है, वो सीधा कारीगरों तक जायेगा। फिर मुझे लगा कि इनके साथ काम करूँ तो अच्छा होगा।

दूसरों की मदद करने के लिए फैशन डिजाइनिंग सीखी

मानव अधिकारों के लिए काम करती हूँ और मेरा काम मेरे उद्देश्य में सहायक है। खासकर उपनगरीय इलाकों में फैली बेरोजगारी को कम करने के लिए मैं प्रशिक्षण देती हूँ और महिलाओं पर ध्यान अधिक रहता है। मैं फैशन की दुनिया में आई ही इसलिए ताकि मैं इन महिलाओं की मदद कर सकूँ जिससे वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। हावड़ा और उलूबेड़िया में काम करते समय मैंने देखा कि वहाँ के लोग काफी अच्छा काम कर रहे हैं मगर उनके पास रोजगार नहीं था। इनमें से कुछ बांग्लाभाषी थे और कुछ मुस्लिम थे। मैं मानवाधिकारों के लिए काम करती थी मगर कोई रास्ता समझ नहीं आ रहा था। मुझे काम करना अच्छा लगता था तो मैंने इन लोगों के लिए यूनिट खोलीं मगर मशीनें चोरी हो जाती थीं। चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी क्योंकि इन इलाकों में गरीबी बहुत थी। मैं रोजगार चाहती थी और इसके लिए जरूरी था कि खुद मुझे फैशन की समझ हो। तब तक फैशन की एबीसीडी भी मुझे नहीं आती थी मगर मुझे कुछ करना था इसलिए आई एन एफ डी से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया।

घर में सबसे सहयोग मिला

घर में तो मुझे सबसे सहयोग मिला। पति और मेरे परिवार ने भी बहुत साथ दिया। समय प्रबंधन एक दिक्कत गहै मगर हमें इन हालातों में रहकर ही काम करना है तो सबके सहयोग से हो जाता है।

भारतीय कला को लोकप्रिय बनाना चाहती हूँ

मैं भारतीय कारीगरी और पाश्चात्य कला का संगम लाना चाहती हूँ और भारतीय कला को लोकप्रिय बनाने का इरादा है। अपने पहले कलेक्शन में जिसे लंदन फैशन वीक में प्रदर्शित किया गया, मैंने बहुत कम कढ़ाई इस्तेमाल की थी। स्क्रीन और हैंड पेंटिंग के साथ काँथा और लेदर का इस्तेमाल किया जो आमतौर पर सर्दियों में हम इस्तेमाल करते हैं। भारतीय कला को सामने लाने के लिए क्यूरोसिटी नामक इस कलेक्शन में मैने रॉ सिल्क, ब्रोकेड भी इस्तेमाल किया और यह लोगों को पसन्द आय़ा। मैं लकड़ी को फैब्रिक की तरह इस्तेमाल करना चाहती हूँ। फैशन के माध्यम से लोगों की मदद करनी है इसलिए प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित करती हूँ। निःशुल्क सिखाना चाहती हूँ।

सपने उम्र के मोहताज नहीं होते

मेरा मानना है कि सपने उम्र के मोहताज नहीं होते, बस आपको इनके लिए मेहनत करनी होंगे। अगर आप सपने देखतीं हैं तो उसे पूरा करने के लिए डटकर  मेहनत करें, सफलता जरूर मिलेगी।

लड़कर नहीं, साथ रचकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं

अपराजिता समानता की सोच को सृजनात्मकता के साथ सामने रखने की कोशिश है। हमारी कोशिश है कि सकारात्मकता पर हमारा विश्वास बढ़े और इसके लिए हम आपके लिए अलग – अलग माध्यमों से ऐसी खबरें सामने लाते हैं जिनमें थोड़ी उम्मीद हो, थोड़ा हौसला हो और आगे बढ़ने का जज्बा हो। इसके साथ हम जहाँ से इन खबरों को लाते हैं, उस संबंधित वेबसाइट्स अथवा मीडिया का नाम भी बताते हैं और सीधी सी वजह यह है कि मीडिया के प्रति जनता का भरोसा बढ़े क्योंकि अंडमान हो या कन्याकुमारी, प्रिंट हो या चैनल या कोई वेबसाइट, पत्रकार अंततः पत्रकार ही होता है और साभार खबरें साझा करने का उद्देश्य इस मकसद का विस्तार है। अपराजिता कोई बागीचा भले न हो मगर यह गुलदस्ता जरूर है…सृजनात्मक और रचनात्मक। अब जब कि दो साल हो चुके हैं और इस सफर में अत्यप्रत्याशित रूप से हमें आप सबका सहयोग मिला है। एक दूसरे से लड़कर नहीं, साथ रचकर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। यह वेबपत्रिका नयी सज – धज और नये कलेवर में आपके सामने है। अपराजिता में वीडियो गैलरी, जनमत और महत्वपूर्ण लिंक के साथ नींव की ईंट नामक स्तम्भ जोड़ा गया है जो उन लोगों, घटनाओं, संस्थानों और समूहों को सामने लाने की कोशिश है जिनका योगदान सामने लाये जाने की जरूरत है। किसी भी प्रकार के रचनात्मक सहयोग और आपके सुझावों का स्वागत है। उम्मीद है कि आपका स्नेह और सहयोग हमें यूं ही मिलता रहेगा।

स्वामी सिद्धेश्वर ने पद्मश्री लेने से किया इनकार

ज्ञानयोगाश्रम विजयपुर के संत सिद्धेश्वर स्वामी ने केंद्र सरकार की ओर से प्रदान किया जाने वाला पद्मश्री पुरस्कार लेने से इनकार दिया है। स्वामी सिद्धेश्वर ने राज्य सभा सदस्य बासवराज पाटिल सेदाम को शुक्रवार को लिखे पत्र में कहा कि वह संन्यासी एवं आध्यात्मिक व्यक्ति हैं और उन्हें किसी पुरस्कार की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यह पुरस्कार विभिन्न क्षेत्रों में महान कार्य करने वाले लोगों को दिया जाना चाहिए। वह पूरे सम्मान के साथ यह पुरस्कार लौटा रहे हैं। इसे अन्यथा न लें।’

स्वामी ने कहा कि आध्यात्मिक व्यक्ति होने के नाते मेरी किसी सम्मान या पुरस्कार में रुचि नहीं है। मैंने पूर्व में भी कोई पुरस्कार स्वीकार नहीं किया है। कनार्टक विश्वविद्यालय ने कुछ वर्ष पूर्व मुझे मानद उपाधि प्रदान की थी। उसे मैंने सम्मान के साथ लौटा दिया था। यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने पद्मश्री पुरस्कार लेने से इनकार करने की अपनी इच्छा से केंद्र सरकार को अवगत करा दिया है, स्वामी ने कहा कि वह प्रधानमंत्री को एक पत्र भेज रहे हैं।

बांग्ला फिल्म अभिनेत्री सुप्रिया देवी का निधन

कोलकाता : जानीमानी बांग्ला फिल्म अभिनेत्री सुप्रिया देवी का आज दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 85 साल की थीं और उनके परिवार में उनकी एक बेटी है।

निर्देशक ऋत्विक घटक की फिल्म ‘मेघे ढाका तारा’ में नीता का किरदार अदा करने के बाद सुप्रिया चर्चा में आई थीं।

साल 1933 में पैदा हुईं सुप्रिया का अभिनय करियर करीब 50 साल का रहा, जिस दौरान उन्होंने ‘चौरंगी’ और ‘बाग बांदी खेला’ जैसी सुपरहिट फिल्मों में काम किया।

पद्मश्री से सम्मानित सुप्रिया को पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बंग विभूषण’ से भी नवाजा था।

सुप्रिया की पहली फिल्म उत्तम कुमार अभिनीत ‘बसु परिवार’ थी। यह 1952 में रिलीज हुई थी।

उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट किया, ‘‘बंगाल की दिग्गज अभिनेत्री सुप्रिया चौधरी (देवी) के निधन से दुखी हूं। हम उनकी फिल्मों के जरिए उन्हें याद करेंगे। उनके परिजन एवं प्रशंसकों के प्रति मेरी संवेदनाएं’’ बंगाली फिल्म अभिनेता सौमित्र चटर्जी ने सुप्रिया के साथ अपने लंबे जुड़ाव को याद किया। दोंनो ने ‘जोड़ी जंतेम’ सहित कई अन्य फिल्मों में काम किया था।

मशहूर अभिनेत्री सावित्री चट्टोपाध्याय ने कहा, ‘‘मैं इस खबर पर यकीन नहीं कर पा रही। हम फोन पर अक्सर बातें करते थे।’’

 

पहली बार महिला इमाम ने पढ़वाई जुमे की नमाज

कुरान सुन्नत सोसाइटी की 34 वर्षीय राज्य सचिव, जमीदा, भारत के इतिहास में जुमा नमाज की अगुवाई करने वाली पहली महिला इमाम बन गई हैं।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, यह देश में पहली बार हुआ है कि किसी मुस्लिम महिला ने शुक्रवार की दोपहर विशेष प्रार्थना सत्र का नेतृत्व किया। यह वाकया केरल के मलप्पुरम जिले में एक मस्जिद में हुआ।

हालांकि, कई लोगों ने इसकी सराहना की, तो वहीं महिला इमाम को कट्टरपंथियों की ओर से धमकियां भी मिल रही है।

लोगों का एक वर्ग जो इससे नाखुश हैं, वे उन्हें फोन पर धमकी दे रहे हैं।  हालांकि इसके बाद उन्हें सुरक्षा दे दी गई है।

जमीदा, जिसे ‘जमीदा टीचर’ भी कहा जाता है, उन्होंने कहा कि जुमे की प्रार्थना भी एक महिला द्वारा भी आयोजित की जा सकती है और वे भी इमाम बन सकती हैं।

 

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने ‘आधार’ को चुना 2017 का हिंदी शब्द

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने अंग्रेजी शब्द की तरह पहली बार ‘वर्ष के हिंदी शब्द’ की भी घोषणा की है। आधार को वर्ष 2017 का हिंदी शब्द चुना गया है। आधार कार्ड के चलते इस शब्द को खासी लोकप्रियता मिली है। यह गत वर्ष सुर्खियों में रहा। माना जा रहा है कि 2018 में भी आधार चर्चा में बना रहेगा।  जयपुर लिटरेचल फेस्टिवल के दौरान ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की ओर से जारी एक विज्ञप्ति में यह जानकारी दी गई।

आधार के साथ नोटबंदी, स्वच्छ, विकास, योग और बाहुबली जैसे शब्दों पर भी विचार किया गया। ऑक्सफोर्ड की ओर से कहा गया कि ‘वर्ष का हिंदी शब्द’ एक ऐसी अभिव्यक्ति है जिसने सबसे ज्यादा ध्यान आकृष्ट किया हो तथा जो पिछले साल की प्रकृति, भाव तथा मनोदशा का समग्र रूप से चित्रण करता हो। हिंदी भाषा में आधार मौलिक रूप से स्थापित शब्द है। हालांकि आधार कार्ड या विशिष्ट पहचान संख्या के रूप में इसने एक नया संदर्भ ग्रहण किया। इस नए संदर्भ में यह शब्द पिछले साल राष्ट्रीय परिचर्चा के केंद्र में आ गया जब आधार योजना के विस्तार के परिणामस्वरूप बैंक खातों तथा फोन नंबरों को इससे जोड़ा जाने लगा।
कई हिंदी शब्दों में से एक का चुनाव करने वाली समिति में शामिल लेखिका नमिता गोखले ने कहा, उन शब्दों को ढूंढना जो 2017 को पारिभाषित करते हों, बेहद मजेदार और प्रेरक अनुभव रहा। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इंडिया के प्रबंध निदेशक शिवरामाकृष्णन वी के मुताबिक, ‘हम अत्यंत उल्लास के साथ पहले ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के वर्ष के हिंदी शब्द की घोषणा कर रहे हैं।’

‘उर्दू की गीता’ के रचनाकार अनवर जलालपुरी

मैं जा रहा हूं…मेरा इंतजार मत करना…’, ये कहकर अनवर जलालपुरी तो बीती 2 जनवरी को दुनिया से अलविदा कह गए लेकिन ऐसे रोशन सितारों की चमक भला कब अलविदा कहती है। अशआर की शक्ल में जो नगीने अनवर जलालपुरी जमाने को दे गए, उनका रुतबा उस वक्त और बढ़ गया जब गुरुवार को पद्म पुरस्कारों की घोषणा हुई।

भारत सरकार ने मरणोपरांत अनवर जलालपुरी को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की है। यह पुरस्कार उन्हें भगवद्गीता का उर्दू अनुवाद करने के लिए दिया गया है। अनवर जलालपुरी ने केवल संस्कृत में लिखी गई गीता को उर्दू के अशआर में ढाला, बल्कि अरबी में लिखी कुरान, बांग्ला में लिखी रवीन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि और फारसी में रचे गए उमर खय्याम के साहित्य को भी सरल उर्दू (हिन्दुस्तानी भाषा) में लिखकर आम लोगों तक पहुंचाने को कोशिश की है।

 

पद्मावत में जौहर के महिमामंडन से भड़कीं स्वरा, भंसाली को घेरा

 मुंबई : संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ रिलीज के बाद भी विवादों से बाहर नहीं आ पा रही है। देशभर में चौतरफा विरोध के बीच एक्ट्रेस स्वरा भास्कर ने भी फिल्म को देखने के बाद कमेंट किया है। स्वरा ने भंसाली को खुला खत लिखते हुए लताड़ लगाई है। उन्होंने अपने खत में लिखा है कि फिल्म में सती प्रथा और जौहर का महिमामंडन किया गया है। मैं इस फिल्म में पेश की गई महिलाओं की छवि से बेहद दुखी हूँ।

खत की शुरुआत में तो स्वरा ने भंसाली की काफी तारीफ की है लेकिन आगे लिखा- क्या जौहर के बिना पद्मावती की जिंदगी नहीं चल सकती थी। क्या कोई महिला किसी पुरुष के बिना अधूरी है।
स्वरा ने आगे कहा- औरतें कोई चलती-फिरती वजाइना नहीं हैं। हां बेशक उनके पास यह चीज होती है, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ है।
इसके अलावा स्वरा ने फिल्म के आखिर में रानी पद्मावती द्वारा अपनी रक्षा के लिए किए गए जौहर वाले सीन पर लिखा- महिलाओं को रेप का शिकार होने के अलावा जिंदा रहने का भी हक है।
पुरुष का मतलब आप जो कुछ भी मानते हो पति, रक्षा करने वाला, मालिक, औरतों की सेक्शुएलिटी पर कंट्रोल करने वाला, क्या उसकी मौत के बाद औरतों को जिंदा रहने का हक नहीं है।

क्या हमेशा पुरुषों की निगाहें औरतों की वजाइना पर ही रहती हैं। क्या वजाइना के अलावा औरतों की कोई जिंदगी नहीं। क्या रेप के बाद किसी औरत को जीने का हक नहीं।
क्या पुरुषों को सिर्फ महिला का शरीर चाहिए और अगर वह उसे देने से इनकार करती है तो उसे मौत को गले लगाना होगा। क्या उनके पास मौत के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं।

इतना ही नहीं, स्वरा ने दुख जताते हुए लिखा- भले ही रानी पद्मावती के समय हालात कुछ और थे लेकिन वर्तमान में भंसाली जी से तो कुछ अलग ही देखने की ख्वाहिश थी। फिल्म के आखिरी सीन में जब महिलाएं जौहर के लिए जाती हैं तो उनमें एक प्रेग्नेंट लेडी और बच्ची भी होती है। इस तरह के सीन देखकर किसी का भी दिल पसीज जाएगा।

मिस्टर गे वर्ल्ड इंडिया 2018: पुरुषों की दुनिया में कीर्तिमान गढ़ रहे समर्पण

आदमी अपना भविष्य खुद तय करता है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो इस बात को समाज के सामने साबित करने का माद्दा रखते हैं, क्योंकि इसके लिए तमाम सामाजिक बाधाओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कुछ ऐसी ही कहानी है कि हाल ही में ‘मिस्टर गे वर्ल्ड इंडिया 2018’ का खिताब जीतने वाले समर्पण मैती की। अगर आप सोच रहे हैं कि अपने सोशल ओरिएनटेशन के चलते पैदा होने वाली चुनौतियों को पीछे छोड़ मॉडल बनने और इस खिताब को जीतने के लिए ही समर्पण की तारीफ हो रही है, तो आप गलत तो नहीं, लेकिन कम जरूर सोच रहे हैं। समर्पण सिर्फ मॉडल ही नहीं बल्कि मेडिकल साइंस के होनहार शोधार्थी भी हैं।

29 वर्षीय समर्पण, पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के सिद्धा गांव के रहने वाले हैं। आपको बता दें कि समर्पण फिलहाल कोलकाता के एक नामी संस्थान में ब्रेन कैंसर ड्र्ग्स पर रिसर्च कर रहे हैं बल्कि उनकी पीएचडी थीसिस लगभग तैयार हो चुकी है। उन्हें डिग्री मिलना अभी बाकी है। इतना ही नहीं, समर्पण यूएस की एक यूनिवर्सिटी में पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च के लिए इंटरव्यू का पहला इंटरव्यू राउंड भी पार कर चुके हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि एक इतना बड़ा स्कॉलर और मॉडल अभी भी ठीक से अंग्रेजी बोलने में सहज नहीं है। मई में साउथ अफ्रीका में होने वाली मिस्टर गे वर्ल्ड 2018 प्रतियोगिता में समर्पण भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।

समर्पण ने अपने पुराने वक्त को याद करते हुए बताया कि वह जब 10वीं कक्षा में थे, तब उनके पिता जी सुदर्शन मैती, टीवी घर ले आए। टीवी के माध्यम से समर्पण को अपने बारे में दो सच्चाइयों का पता चला। एक तो यह कि फैशन की दुनिया के लिए उनके अंदर काफी रुचि है और दूसरा यह कि लड़कियों से ज्यादा उन्हें लड़कों में दिलचस्पी है। समर्पण मानते हैं कि यह खुद की खोज का समय था। समर्पण ने पूर्व में लड़कियों से रहे अपने शारीरिक संबंधों का जिक्र करते हुए बताया कि लड़कियों की अपेक्षा वह लड़कों के साथ अधिक सहज महसूस करते हैं। हमारे समाज में आमतौर पर देखा जाता है कि मां-बाप बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं, लेकिन बच्चा किसी और क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है। हालांकि, समर्पण के परिवार की कहानी मां-बाप और बच्चों के बीच वैचारिक मतभेद की अवधारणा पर ही चल रही थी, लेकिन जरा हट के। ऐसा इसलिए क्योंकि समर्पण के मां-बाप चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर या इंजीनियर न बने, बल्कि वह लेखक या पत्रकार बने, लेकिन समर्पण को साइंस में रुचि थी। हालांकि, समर्पण पत्रकार तो नहीं बने, लेकिन उनके दो रिसर्च पेपर अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित जरूर हो चुके हैं। समर्पण आईआईटी और आईआईएससी (बेंगलुरु) की प्रवेश परीक्षाएं भी पास कर चुके हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने सिर्फ मजे के लिए दो बार नेट (NET) की परीक्षा भी दी है।

जैसा कि समर्पण ने बताया कि टीवी के जरिए वह फैशन की दुनिया से रूबरू हुए। छोटी उम्र से ही उनके अंदर मॉडलिंग का शौक पनपने लगा था। शुरूआत में जब समर्पण ने मॉडलिंग के बारे में सोचा, तब पहली बाधा थी उनकी लंबाई की। समर्पण की लंबाई थी 5.6 फीट और मॉडलिंग के लिए कम के कम आपकी लंबाई 5.7 फीट होनी चाहिए। 2015 में समर्पण ने वर्कआउट शुरू किया। आगे उनकी उपलब्धियों की दास्तान सभी जानते हैं। समर्पण आज भी रोज सुबह डेढ़ घंटे तक वर्कआउट करते हैं।

पिता की मौत के बाद उनके परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ गई, लेकिन जीवन के हर मोड़ पर समर्पण को उनकी मां का भरपूर साथ मिला। समर्पण की मां अपने बेटे की उपलब्धियों से खुश हैं और उन्हें बेटे के गे होने पर भी आपत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें इस बात की चिंता जरूर सताती है कि समाज उनके बेटे के प्रति कैसा रवैया रखेगा। समर्पण सिर्फ शोहरत के लिए मिस्टर गे वर्ल्ड का खिताब नहीं जीतना चाहते हैं, बल्कि वह अपनी उपलब्धियों के माध्यम से लैंगिक समानता को बढ़ावा देना चाहते हैं।

 

कुली बनकर तीन बच्चों की परवरिश कर रही हैं संध्या

मध्य प्रदेश के कटनी रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाली संध्या मरावी को देखकर हर कोई चौंक जाता है। दरअसल रेलवे स्टेशनों पर सामान ढोने के लिए सिर्फ पुरुष कुली ही दिखते हैं। यहां तक कि बड़े रेलवे स्टेशनों पर भी महिला कुली नजर नहीं आती हैं लेकिन संध्या रूढ़ियों से आगे जाकर अपनी आजीविका चलाने के लिए कुली का काम करती हैं। हालांकि संध्या को मजबूरी में यह पेशा अपनाना पड़ा, लेकिन उन्हें किसी की परवाह नहीं है।

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के कुंडम गांव की रहने वाली संध्या के पति भोलाराम का 2016 में असामयिक देहांत हो गया था। इसके बाद उनके ऊपर मानो पहाड़ टूट गया हो। परिवार में कमाने वाले संध्या के एकमात्र पति ही थी। पति की मौत के बाद घर चलाने में दिक्कत आने लगीं। इसके बाद संध्या ने सोचा कि वो खुद कुछ काम करके अपने तीन बच्चों का पेट पालेंगी। उन्होंने कुली का काम करना शुरू किया। लेकिन उन्हें यह काम घर से 250 किलोमीटर दूर कटनी रेलवे स्टेशन पर मिला। उन्हें हर रोज काम के लिए ढाई सौ किलोमीटर का सफर करना पड़ता है। इसके लिए पहले वे अपने गांव से जबलपुर पहुंचती हैं फिर वहां से कटनी।

संध्या के दो छोटे बेटे साहिल (8) और हर्षित (6) व एक बेटी पायल (4) है। पति के गुजर जाने के बाद संध्या अपने घर को भी संभालती है और काम भी करती है। संध्या बताती हैं कि पैसे न होने की वजह से खाने के लाले पड़ रहे थे। उनसे बच्चों को इस हाल में देखा नहीं जा रहा था इसलिए उन्होंने कुली बनने का फैसला किया। कटनी स्टेशन पर लगभग 40 कुली हैं, लेकिन संध्या अकेली महिला कुली है जो अपने कंधों पर भारी भरकम वजन ढोती है।

असमय पति के चले जाने से संध्या को काफी तकलीफ हुई। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी हंसती गाती जिंदगी में दुखों का पहाड़ा टूट पड़ेगा। संध्या के परिवार में उसके बच्चों के अलावा बूढ़ी सास भी है। संध्या अपनी कमाई से सबका पेट पालती है। वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर अफसर बनाना चाहती है। संध्या कहती है कि जिंदगी में चाहे जो हो जाए वह हार नहीं मानेगी और अपने बच्चों की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। संध्या ने रेलवे विभाग के अधिकारियों से अपना ट्रांसफर कटनी से जबलपुर करवाने को अर्जी दी है, लेकिन अभी उस पर कोई सुनवाई नहीं की गई है। संध्या ने कहा कि अगर उसका ट्रांसफर हो जाएगा तो उसे हर रोज इतना लंबा सफर नहीं तय करना पड़ेगा।

(साभार – योर स्टोरी)