Saturday, October 3, 2026
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कुरता ही नहीं कुरते का कॉलर भी स्पेशल होना चाहिए

लड़कियाँ कपड़े खरीदते समय जितना वक्त लगाती हैं, लड़के उतना वक्त नहीं लगाते। रंग और फिंटिग देख ली तो पसन्द आ गया तो बस खरीद लिया पर क्या आप जानते हैं कि इन छोटी – छोटी बातों से आपका लुक्स बनता है। कुरता खरीदते समय आप बेशक उसकी हेम (बॉटम लाइन), लम्बाई और फिटिंग देखते हैं मगर कुरते के कॉलर पर आपका ध्यान बहुत कम जाता है तो कुछ कॉलर ये रहे जो आपको और शानदार लुक देंगे –

मैन्डरिन कॉलर

समय के साथ कुर्तो के स्टाइल में काफी बदलाव आए हैं। सिल्क कुर्ते के आ जाने से हमें कुर्ते का सबसे स्टाइलिश रूप मिला मैन्डरिन कॉलर के रूप में। कई सालों के बाद, स्ट्रेट-अप फोल्डेड कॉलर अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया। डिज़ाइनर्स का पसंदीदा – मैन्डरिन-कॉलर्ड, कुर्ते को विविधतापूर्ण बनाता है। पेयरिंग की बात करें तो ये किसी भी पारम्परिक लोअर के साथ अच्छा लगेगा। अगर आपको अपने लुक को ड्रेसी दिखाना है तो इसे चूड़ीदार के साथ पहनें।

एक कैज़ुअल silhouette के लिए सलवार से बेहतर कुछ नहीं होगा लेकिन एक बात का हमेशा ध्यान रखें। बंद गला जैकेट को मैन्डरिन कॉलर्ड कुर्ते के साथ कभी भी न पहनें। एक जैसे कॉलर एक-दूसरे के ऊपर आपके लुक को पूरी तरह से खराब कर देंगे। इसकी जगह एक राउंड नेक बंडी जैकेट पहनें।

अवधी कॉलर

कॉलर के बगैर या रॉउंड कॉलर कुर्ता के नाम से जाने वाले इस कुर्ते का स्टाइल अवध से आया है। अगर आप ऐसा कुर्ता खरीदने जा रहे हैं तो ध्यान रखें कि इसका बटन और इसके आस-पास के एरिया में अच्छी तरीके से डिटेलिंग की गई हो।

प्रिंट्स और एम्बॉयडर्ड एम्बेलिशमेंट इन कुर्तो को खूबसूरत बनाता है। इसका स्टाइल सादगी वाला हो तो बेहतर। इसके साथ एक सिंपल स्ट्रेट फिटेड पयजामा बेस्ट लगेगा। अगर आप सच में कुछ अलग करना चाहते हैं तो इसके साथ क्लासिक खाकी ट्राउज़र पहनें।

शर्ट कॉलर 

ब्रिटिश फैशन से भारतीय कुरता भी प्रभावित रहा। इस कुर्ते का गोल दामन (round hem) और शर्ट कॉलर, दोनों ही यूरोपियन शर्ट से प्रभावित होकर बने हैं। पठानों में लोकप्रिय होने के कारण इन कुर्तों को पठानी कुर्ते के नाम से जाना जाता है। इस कुर्ते की भी पेयरिंग का खास ध्यान रखना पड़ता है।

एकमात्र तरीका जिससे ये कुर्ता आपको पूरी तरह सूट करेगा वो है – इसे सलवार के साथ पेयर करें। सलवार इस पठानी कुर्ते को पूरी तरह से कॉमप्लीमेंट करेगा। कॉलर को आकर्षक बनाने के लिए आप ब्रूच चुन सकते हैं, ये सबका ध्यान कॉलर की तरफ खींचेगा। इसे आप नेहरू जैकेट के साथ भी स्टाइल कर सकते हैं. ये काफी अच्छा लगेगा। पर अपने कॉलर को नेहरू जैकेट के ऊपर रखना न भूलें।
(साभार फैशन 101)

विरासत ए फैशन : सदाबहार है बालूचरी का जादू

पश्चिम बंगाल के विष्णुपुर व मुर्शिदाबाद में बनती हैं। सन् 1965 से बनारस में भी बालूचरी साड़ियों का निर्माण होने लगा। ये भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मशहूर हैं। इन साड़ियों पर महाभारत व रामायण के दृश्यों के अलावा कई अन्य दृश्य कढ़ाई के जरिए उकेरे जाते हैं। देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इन साड़ियों ने अपनी अलग पहचान कायम की है। एक बालूचरी साड़ी बनाने में कम से कम एक सप्ताह का वक्त लगता है। दो लोग मिल कर इसे बनाते हैं।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बालूचर गांव में शुरुआत करने वाली बालूचरी साड़ियों ने बीती दो सदियों के दौरान एक लंबा सफर तय किया है। नवाब मुर्शीद अली खान 18वीं सदी में बालूचरी साड़ी की कला को ढाका से मुर्शिदाबाद ले आए थे। उन्होंने इसे काफी बढ़ावा दिया। बाद में गंगा नदी की बाढ़ में बालूचर गांव के डूब जाने के बाद यह कला बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर पहुंची। अब विष्णुपुर व बालूचरी एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। पहले विष्णुपुर में मल्ल राजाओं का शासन था। उस दौरान यह कला अपने निखार पर थी। मल्ल राजाओं ने इलाके में टेराकोटा कला को काफी बढ़ावा दिया था। वहां टेराकोटा के मंदिर हर गली में बिखरे पड़े हैं। बालूचरी साड़ियों पर भी इन मंदिरों का असर साफ नजर आता है।
इन साड़ियों की खासियत यह है कि इन पर पौराणिक गाथाएं बुनी होती हैं। कहीं द्रौपदी के विवाह का प्रसंग है तो कहीं राधा-कृष्ण के प्रेम का। महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए भगवान कृष्ण की तस्वीर भी इन साड़ियों पर नजर आती है। पूर्व में मुगल व यूरोपियन पल्लू (आंचल) में चौंहसिया (चौकोर) व बीच में कलगा लगाकर सजाया जाता था। इस साड़ी की बुनाई में कम से कम तीन व्यक्तियों को लगना पड़ता है क्योंकि इसमें तीन तरह के डिज़ाइन बेल, बादशाह, बूटा एक साथ चलते हैं तथा इस साड़ी को तैयार होने में लगभग एक महीना लग जाता है, लेकिन रेशम के बारीक धागों से इन कहानियों को साड़ी पर उकेरना कोई आसान नहीं है। दो मजदूर मिल कर एक सप्ताह में एक साड़ी तैयार करते हैं।

 

काम की बारीकी के हिसाब से उस साड़ी की कीमत एक से दस हजार रुपए तक होती है, लेकिन बुनकरों या कलाकारों को इसका फायदा नहीं मिल पाता। बुनाई के बाद साड़ियों पर चमक लाने के लिए उनकी पालिश की जाती है। किसी जमाने में यह साड़ियाँ बंगाल के रईस या जमीदार घरानों की महिलाएं ही पहनती थीं। अब भी शादी-ब्याह के मौकों पर यह साड़ी पहनी जाती हैं। एक बालूचरी साड़ी बनाने में काफी समय लगता है। इसकी बारीक डीटेलिंग के लिए काफी साफ कारीगरी चाहिए। एक साड़ी की बुनाई में लगभग एक हफ्ते का समय लगता है। सभी साड़ियों को बेहतरीन सिल्क का इस्तेमाल करके हाथ से बुना जाता है, हालांकि बदलते समय में लोगों की कम होती दिलचस्पी के साथ, बालूचरी साड़ियां बनाने में कॉटन का भी इस्तेमाल होने लगा है।


सबसे बेहतरीन सिल्क लेने के बाद अगला अहम स्टेप होता है इम्ब्रायडरी पर काम करना। पहले डिज़ाइन्स को कागज पर बनाया जाता है और उसके बाद इन्हें साड़ियों पर पंच किया जाता है। बालूचरी साड़ियां बनाने में इस्तेमाल होने वाले रंग आमतौर पर बेहद ब्राइट होते हैं, जैसे कि लाल, हरा, सफेद, नीला और पीला। इसके साथ ही बुनाई की प्रक्रिया में ढेर सारी पर्यावरण के अनुकूल चीज़ों का इस्तेमाल होता है, जैसे कि फूलों से बने रंग, फलों से बने रंग, नीम की पत्तियां, हल्दी की पत्तियां और सूखी लकड़ियां।

बालूचरी साड़ियाँ अपने हाथ के काम के लिए मशहूर हैं। ये रामायण और महाभारत से लिए गए अपने पौराणिक मोटिफ्स के लिए जानी जाती हैं, इन साड़ियों में अकसर भगवान कृष्ण और अर्जुन के गीता प्रकरण की कहानी दिखाई जाती है। मल्ला वंश से इंस्पिरेशन लेने वाली मूल कला आज भी ट्रेंड में है। इस तरह की कला विष्णुपुर के पुराने मंदिरों, मिट्टी के बर्तनों और गहनों में देखी जा सकती है। मोटिफ डिज़ाइन्स ज़्यादातर एक शेडेड बैकग्राउंड पर 4 अलग-अलग रंगों में इस्तेमाल किए जाते हैं। शुरुआत में ये मोटिफ्स सिल्वर ज़री से बुने जाते थे, जो अब कई तरह के चमकीले धागों से बदल दिए गए हैं। आजकल बालूचरी से मैचिंग बैग और अन्य सामान भी बन रहे हैं।

पोएला बैशाख और बंगाल का पारम्परिक स्वाद

खीर कदम

सामग्री : 16 मिनी रसगुल्‍ले, 2 कप मावा/खोया, 2 चम्‍मच दूध, 4 चम्‍मच पिसी चीनी, 1 चम्‍मच रोज एसेंस

विधि : छोटे आकार के रसगुल्‍लों से उसका रस निचोड़ कर अलग रख लें। अब मावा को मसलकर पैन में डालें और पिसी चीनी मिक्‍स कर के 5-7 मिनट पकाएं। जब मावा गीला सा हो जाए तो उसमें हल्‍का सा दूध मिला दें और फिर इसें प्‍लेट पर निकाल कर अलग ठंडा होने के लिए रख दें। जब यह ठंडा हो जाए तब इसमें रोज एसेंस मिक्‍स करके अच्‍छी तरह गूथ लें और फिर इसे 16 एक समान भाग में काट लें। एक हिस्‍से की लोई बना कर उसके बीच में अंगूठे से दबाते हुए गहरा करें और उसमें एक रसगुल्‍ला रख दें। रसगुल्‍ले को अच्‍छी तरह से ढंके और वह कहीं से भी खुला नहीं होना चाहिए। इसे अच्‍छी तरह से रोल करके प्‍लेट पर रखें। खीर कदम तैयार है।

छानार डालना

सामग्री : चौकोर टुकड़ों में कटा 200 ग्राम पनीर, 2 आलू, 1/4 कप हरी मटर के दाने, एक बारीक कटा टमाटर, 2 चम्मच अदरक का पेस्ट, 2 चम्मच धनिया पाउडर, 2 चम्मच भुना जीरा पाउडर, एक चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 2 चम्मच हल्दी पाउडर, एक तेज पत्ता, 2 लंबी कटी हुई हरी मिर्च , एक छोटी चम्मच चीनी, एक छोटा चम्मच जीरा, एक चम्मच गरम मसाला पाउडर, हरा बारीक कटा धनिया, स्वादानुसार नमक, एक चम्मच घी, आधा कप तेल
सजावट के लिए – बारीक कटे हरे धनिया से सजाकर सर्व करें

विधि : आलू धोकर छील लें और चौकोर टुकड़ों में काट लें। एक कटोरे में पनीर के टुकड़े डालें और इन पर एक चुटकी हल्दी-नमक डालकर मिक्स कर लें। दूसरे कटोरे में आलू के पीस डालें और इन पर एक चुटकी हल्दी-नमक डालकर मिक्स कर लें। अब गैस पर एक पैन में तेल गर्म करके उसमें पनीर के टुकड़े गोल्डन होने तक फ्राई करें। एक प्लेट में किचन पेपर लगाकर उसमें फ्राइड पनीर निकाल लें। फिर तेल में आलू के पीस भी सुनहरे होने तक फ्राई करें और एक अलग प्लेट में निकाल लें। अब गैस पर दूसरे पैन में तेल गर्म करके उसमें तेज पत्ता और जीरा डालकर भूनें। जब जीरा तड़कने लगे तो उसमें टमाटर डालकर मध्यम आंच पर 2 मिनट नर्म होने तक पकाएं। इसके बाद टमाटर में हरी मिर्च, अदरक पेस्ट और मटर मिलाकर 2 से 3 मिनट तक पकने दें। तब तक एक कटोरी में थोड़ा तेल लें और उसमें डेढ़ चम्मच हल्दी पाउडर, जीरा पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पाउडर अच्छी तरह मिक्स करके एक पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट को टमाटर के मिक्सचर में मिलाएं। फिर ग्रेवी में नमक और चीनी मिक्स करके एक मिनट तक पकने दें। अब मसालों में 2 कप पानी डालकर उसमें फ्राइड आलू मिलाएं और एक ढक्कन से ढककर धीमी आंच पर 8 से 10 मिनट तक पकाएं। इसके बाद आलू में तला हुआ पनीर भी मिक्स करके सब्जी को 5 मिनट तक और पकने दें। फिर ढक्कन हटाकर छानार डालना में घी मिलाकर कुछ देर धीमी आंच पर रखा रहने दें। लीजिए तैयार है बंगाली स्वाद का व्यंजन छानार डालना।

रानी ‘बनी हिचकी’ में जिंदगी की रानी 

रेखा श्रीवास्तव

हिचकी। जी हाँ, हिचकी। घबराइये नहीं। वो हिचकी नहीं, जिससे पता चले कि आपको कोई याद कर रहा है या फिर वो भी हिचकी नहीं जिससे कि लोग आपके सामने पानी बढ़ा दें। यह हिचकी रानी मुखर्जी की ‘हिचकी’ है। यानी बालीवुड की एक नयी फिल्म। एक नयी सोच पर बनी फिल्म। इस फिल्म में ‘हिचकी’ को एक बीमारी के रूप में दिखाया गया है, जिसकी वजह से रानी मुखर्जी (नैना) एक सामान्य जिंदगी नहीं जी पाती है और उसे हर जगह अलग तरह से देखा जाता है पर उसने बड़ी सच्चाई से अपनी इस कमजोरी को ही ताकत बना लिया और एक सफलतम जिंदगी जी कर दिखा दिया। इस फिल्म के माध्यम से हम यह जरूर समझ सकते हैं कि जिस तरह रानी मुखर्जी (नैना) को हिचकी की परेशानी थी, उसी तरह से हम सब के अंदर कोई न कोई कमी और परेशानी जरूर है, और जब हम अपनी कमी और परेशानी को स्वीकार कर उसके साथ आगे बढ़ने का हौसला रखते हैं, तो दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती। बालीवुड में अपनी अमिट छाप रखने वाली अभिनेत्री रानी मुखर्जी चार साल के अंतराल के बाद इस फिल्म से बालीवुड में फिर से आई हैं। उनके दर्शक इस रोल में भी काफी पसंद किया है। इस फिल्म में रानी मुखर्जी एक सामान्य परिवार की एक सामान्य लड़की के रूप में नजर आयी है, जो एक बीमारी से ग्रस्त तो जरूर है पर अपनी जिंदगी में वह इस बीमारी से टूटी नहीं है और उसने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया है और इसी के साथ आगे बढ़ती है और लंबे संघर्ष के बाद सफलता भी हासिल करती है। निर्देशक सिद्धार्थ पी.मल्होत्रा ने बड़े ही अच्छे तरीके से फिल्म को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है। फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है : एक सामान्य परिवार में नैना अपने पापा-मम्मी और भाई के साथ रहती है। वह टॉरेट सिंड्रोम नामक बीमारी से पीड़ित है। इसकी वजह से उसको हर समय हिचकी आती रहती है। अलग-अलग तरह की आवाज भी निकलती है। तनाव बढ़ने से उसकी बीमारी भी बढ़ जाती है। माँ और भाई इस बीमारी से लड़ने में उसका हौसला बढ़ाते हैं, और पिता इससे परेशान है। वह कई बार अपने परिवार को छोड़ कर चले जाते हैं और फिर वापस लौट आते हैं। उसके पिता बीमारी को बीमारी के रूप में देखते हैं और अपनी बेटी को समझौता करने के लिए बाध्य करते रहते हैं। इस मुद्दे पर पिता-बेटी में हर समय तनाव का माहौल व्याप्त रहता है। सामान्य परिवार में जहां पिता बेटी की शादी के लिए जिस तरह से परेशान रहते हैं, उसी तरह यहां इस बीमारी से त्रस्त पिता को दिखाया गया है। इस बीमारी के बावजूद नैना को एक अच्छे स्कूल में पढ़ने का मौका मिलता है और वह अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करती है। उसके बाद वह नौकरी के लिए दर-दर भटकती है। वह मुख्य रूप से शिक्षक बनना चाहती है, लेकिन उसकी बीमारी की वजह से उसे स्कूल वाले नौकरी नहीं देते हैं। संघर्ष काफी लंबा चलता है, और आखिरकार में उसे उसी स्कूल में नौकरी मिल जाती है जहाँ से उसने स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी। वहां भी 14 ऐसे बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी मिलती है, जो समाज के पिछड़े वर्ग से आते हैं और वे किसी तरह से स्कूल तो आ जाते हैं पर उनका उद्देश्य पढ़ना नहीं है। उन बच्चों के अंदर पढ़ाई का जज्बा जगाने में नैना को काफी संघर्ष पड़ता है। अंत में कामयाबी हासिल करती है और आखिर में प्रिंसिपल होकर रिटार्यड होती हैं। इस फिल्म में जहाँ रानी मुखर्जी का अभिनय जबरदस्त था, वहीं माँ और पिता की भूमिका में जानी-पहचानी जोड़ी सुप्रिया और सचिन को देखने को मिली। ये दोनों ही दर्शकों की पसंद रहे हैं। भाई के रूप में हुसैन दलाल नजर आते हैं। छात्र-छात्राओं का अभिनय भी काबिले तारिफ रहा है। कहानी अंकुर चौधरी की है।  यश राज बैनर तले यह फिल्म दो घंटे तक दर्शक को अपने में बांधे रहती है। बीच-बीच में कई बार बहुत तनाव नजर आता है, पर रानी मुखर्जी (नैना) की हिम्मत और संघर्ष दर्शकों के अंदर भी जज्बा भर देती है और हमें सिखा जाती है कि हममें अगर कुछ कमी है, तो उससे हम दूसरे से कम नहीं। हमें भी सपने देखने का अधिकार है और उसे पाने का हौसला रखना चाहिए।  यह फिल्म हॉलीवुड फिल्म ‘फ्रंट ऑफ द क्लास ’ की कहानी से प्रेरित कहानी जरूर है, लेकिन इसमें बहुत कुछ नया दिखाया गया है।

सीयू के हिन्दी विभाग में याद किए गये कवि केदारनाथ सिंह

कोलकाता ः कलकत्ता विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा दिवंगत कवि केदारनाथ सिंह की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गयी। इस सभा में विद्यार्थियों तथा शोधार्थियों ने कवि को याद करते हुए अपने संस्मरण साझा किये। इसके साथ ही उनकी कविताओं की आवृति और आलेख पाठ भी किया गया। सीयू की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राजश्री शुक्ला ने कवि के साथ अपनी स्मृतियाँ साझा करते हुए उनकी सहजता को उनकी विशेषता बताया। उन्होंने कहा कि कलकत्ता विश्‍वविद्यालय में व्याख्यान के लिए कवि केदारनाथ सिंह का आना एक लम्बी प्रतीक्षा के अंत जैसा था। उनका वक्तव्य किसी बुजुर्ग के आशीर्वचनों जैसा था और उन्होंने हमेशा नयी पीढ़ी को उत्साह बढ़ाकर प्रोत्साहित किया। उनकी कविताओं की कई पँक्तियों का प्रयोग आज हिन्दी में मुहावरों की तरह किया जा रहा है। वे अपनी आत्मीयता को बाँटते हुए गये हैं। सभा में बंगवासी कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष आशुतोष कुमार, काँचरापाड़ा कॉलेज की हिन्दी विभागाध्यक्ष सुनीता मंडल तथा सीयू के हिन्दी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर राम प्रवेश रजक ने भी विचार रखे।

स्त्रियाँ हैं मगर उनके पास संचालन का अधिकार नहीं है

कोलकाता ः हमारे समाज में स्त्रियाँ हैं मगर उनके पास संचालन का अधिकार नहीं है। मंदिरों में देवी बनाकर उनको पूजा जाता है, व्रत और उपवास भी वह अधिक करती हैं मगर धर्म के संचालन का अधिकार उनके पास नहीं है। राजनीति और आर्थिक क्षेत्रों में उनकी संख्या बढ़ी है मगर निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी अब भी नहीं है इसलिए आपको स्त्रियों की दशा सुधारनी है तो पहले धर्म, राजनीति और आर्थिक क्षेत्रों में उनको संचालन और निर्णय का अधिकार दीजिए। कलकत्ता विश्‍वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा स्त्री साहित्य और उसके विभिन्न सन्दर्भो को समेटते हुए विशेष व्याख्यानमाला को संबोेधित करते हुए विभाग के पूर्व प्रोफेसर तथा वरिष्ठ आलोचक प्रो. जगदीश्‍वर चतुर्वेदी ने उक्त बातें कहीं। उन्होंने कहा कि सेबी के निर्देश के बावजूद आज भी कई कम्पनियों में महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ी है। स्त्री जितना संचालन करेगी, उतनी ताकतवर बनेगी। उसे समानता, लोकतंत्र और न्याय के सन्दर्भों में देखना जरूरी है मगर उसे लोकतंत्र तक जाने ही नहीं दिया जाता। अराजनीतिक होने की सीमा को तोड़ना जरूरी है। इसके पूर्व व्याख्यानमाला के पहले दिन स्त्री साहित्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य में ×स्त्री के प्रश्‍नों और उसकी समस्याओं पर सबसे पहले आधुनिक काल में जाकर विचार हुआ। बड़े लेखक स्त्री के रोटी जैसे बड़े प्रश्‍नों पर बात नहीं करते, उनके लिए स्त्री की सबसे बड़ी समस्या अवैध संबंध ही हैं। स्त्री साहित्य का परिवेश किताबों से नहीं जीवन से आता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी गहन परिचय के बावजूद बंग महिला पर विशेष बात नहीं करते और न ही रामविलास शर्मा जैसे आलोचकों ने स्त्री के प्रश्‍नों पर बहुत कुछ लिखा। उन्होंने इस सन्दर्भ में राधा मोहन गोकुल का उल्लेख करते हुए कहा कि स्त्री के सन्दर्भों में उनको पढ़ा जाना चाहिए। स्वागत भाषण हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. राजश्री शुक्ला ने दिया। दोनों सत्रों में विभाग के प्रोफेसर रामआह्लाद चौधरी तथा असिस्टेंट प्रोफेसर रामप्रवेश रजक समेत अतिथि तथा विद्यार्थी उपस्थित थे।

धन से अखबार नहीं निकलता, संकल्प से निकलता है

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद में ‘मीडिया और जन-पहरेदारी’ विषय सेमिनार आयोजित हुआ। छपते-छपते और ताजा टीवी के चेयरमैन विश्‍वंभर नेवर ने कहा कि लेखकों, पत्रकारों, कवियों और विचारकों को निराशाजनक बातें नहीं करनी चाहिए। धन से अखबार नहीं निकलता। संकल्प से निकलता है। आज बड़े-बड़े अखबार घरानों से निकलने वाली पत्रिकाएं बंद हो गई हैं। अंग्रेजी अखबारों के लिए चिंता का विषय है क्योंकि उनका प्रसार घट रहा है। हिंदी के अखबारों की प्रसार संख्या लगातार बढ़ रही है।
इस मौके पर प्रभात खबर के संपादक तारकेश्‍वर मिश्र ने कहा कि यह सच है कि मीडिया में अपंगता आ गई है। अब मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा उस अर्थ में नहीं रहा जो  अस्सी के दशक तक कहा जाता था। उन्होंने कहा कि चारा घोटाला और निजी अस्पतालों में मरीजों को लूटने की खबर हमारे अखबार ने खूब छापा लेकिन क्या हुआ? लूट अब भी जारी है। जरूरत है तंत्र को बदलने की। आम आदमी जो मीडिया से अपेक्षाएँ करता है वह पूरा नहीं हो पा रहा है। वह मीडिया आम आदमी की क्या रक्षा करेगा जो खुद ही कमजोर है। अखबारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है।
विद्यासागर विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर संजय जायसवाल ने कहा कि जन-पहरेदारी के लिए हमें जन के साथ खड़ा होना पड़ेगा। पूंजी निवेश के कारण अखबारों का चरित्र बदल गया है। इलेक्ट्रानिक मीडिया से तो अब कोई उम्मीद ही नहीं है लेकिन प्रिंट मीडिया से अब भी उम्मीद बची हुई है। अखबार के मालिक व्यापारी के रूप में खड़े हो जाएंगे तो फिर जन पहरेदारी कैसे होगी। तटस्थ हो कर समाचार/विचार लिखने का समय लद गया है। लेखक राजीव पांडेय ने कहा कि अब मनुष्य मनुष्य नहीं उपभोक्ता बन गया है। अगर विज्ञापन ज्यादा और समाचार कम हो रहा है तो फिर अखबारों की कमजोर स्थिति क्यों होनी चाहिए।
इसके बाद पत्रकारिता के छात्र-छात्राओं ने उपस्थित वक्ताओं से प्रश्‍न किए जिनका उन्होंने विस्तार से उत्तर दिया।   भारतीय भाषा परिषद के निदेशक और इस कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि विद्यार्थियों ने प्रश्‍न कर यह जताया कि उनके भीतर अनेक जिज्ञासाएं हैं और यही सजगता का परिचायक है। प्रश्‍न है तभी अखबार भी है। लोकतंत्र के चौथे खंभे के बाद एक पांचवां खंभा भी आ गया है और यह खंभा है मैनेजमेंट। हर चीज मैनेज कर दी जा रही है। आम आदमी की वाणी बाजार छीन रहा है। विकास की गति जहां भी कम होगी वहां राजनीतिक खबरें ज्यादा होंगी। अब बौद्धिक किलेबंदी हो रही है जिसे मीडिया को ही तोड़ना होगा।

अपने स्वागत भाषण में भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ कुसुम खेमानी ने कहा कि जन- पहरेदारी  का निर्वाह या दायित्व मीडिया की है तो जनता की भी है। हम यह न कहें कि मीडिया बिकाऊ हो गई है क्योंकि ऐसा  कह  कर हम परोक्ष  रूप उंगली अपने ऊपर ही  उठाते हैं।
 विषय प्रवर्तन करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय, भोपाल के कोलकाता केंद्र, भारतीय भाषा परिषद में शैक्षिक समन्वयक विनय बिहारी सिंह ने कहा कि पत्रकारों की हत्याएं हो रही हैं और केंद्र सरकार झूठी खबरों के खिलाफ अध्यादेश लाना चाहती है जो तानाशाही का प्रतीक है। राजतंत्र यदि इस तरह का अध्यादेश लाता है तो वह निरंकुशता की स्थापना कर रहा है। यह अत्यंत विकट स्थिति है और इस पर गौर करने की जरूरत है। आखिर क्यों अखबारों पर उंगली उठाई जाती है और क्यों कहा जाता है कि वे पेड न्यूज छाप रहे हैं? इस कार्यक्रम का संचालन प्रो.पीयूषकांत राय ने किया और धन्यवाद ज्ञापन भारतीय भाषा परिषद के मंत्री नंदलाल शाह ने किया।

स्त्री पुरुष के संबंधों को लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है

 प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी

सन् 2000 में स्त्री पर पहली पुस्तक लिखी थी। अगर स्त्री साहित्य और संबंधित पुस्तकों पर बात की जाये तो कोलकाता में पुस्तकें उपलब्ध हैं मगर जब पहली पुस्तक लिखी तो कोलकाता में इस तरह पुस्तकें नहीं थीं। रमाशंकर शुक्ल ने सबसे पहले स्त्रीवादी व्याख्यान दृष्टिकोण से पुस्तक लिखी। स्त्री साहित्य को पढ़ने के लिए जिस पुराने साहित्य का होना जरूरी है, वह आधुनिककाल में जाकर मिलता है मगर आलोचक स्त्री लेखिकाओं पर विस्तार से बात नहीं करते। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक के पास 15 -20 से अधिक स्त्री लेखिकाओं के नाम नहीं हैं। यहाँ तक कि बंग महिला से परिचय होने के बावजूद शुक्ल जी उन पर नहीं लिखते और हिन्दी आलोचना में भी यही स्थिति है। जरूरी है कि स्त्री साहित्य और स्त्री लेखिकाओं को खोजा जाए। आज स्त्री लेखिकायें लिख रही हैं और अपनी समस्याओं को लेकर मुखर भी हैं मगर 15 -20 साल पहले यह स्थिति नहीं थी। अगर आचार्य शुक्ल जैसे बड़े लेखक इस तरह का पक्षपात करेंगे तो शिक्षक कैसे बताएगा कि स्त्री लिखती है? स्त्री लिखती भी है, इस बात पर ही किसी को विश्वास नहीं होता। हिन्दी का लेखक मानने को तैयार ही नहीं है कि स्त्री लिखती भी है…आम धारणा तो यही है कि स्त्री ने किसी से लिखवा लिया होगा। लड़कियाँ जिस तरह से लिखती हैं, वह दिखता नहीं है। स्त्री जितनी सरल है, उतनी ही खतरनाक भी है, वह जितनी निर्बल है, उतनी ही सबल भी है।
स्त्री साहित्य को समझने के लिए उसके प्रति समर्पण और विश्वास का होना जरूरी है, यही स्त्री साहित्य को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका भी है। एक शिक्षक के दरवाजे 24 घंटे खुले रहने चाहिए जिससे वह छात्राओं के प्रश्नों और उनकी समस्याओं का समाधान कर सके, उनका मार्गदर्शन कर सके। स्त्री साहित्य का परिवेश किताबों से नहीं जीवन से आता है। स्त्री साहित्य का परिवेश जीवन से जुड़ा है मगर हमने परिवेश को स्त्री के अनुकूल नहीं बनने दिया मगर इस मामले में कोलकाता अलग है क्योंकि यहाँ ऐसा परिेवेश है। यह परिवेश 200 साल पहले बना है, इसके पहले स्त्री की कोई ठोस छवि हमारे सामने नहीं आती। आधुनिक काल के पहले स्त्री का वास्तविक स्वरूप हमारे पास नहीं था। भारतेंदु युग ने स्त्री को सबसे पहले जाना। स्त्री साहित्य को समझने के लिए राधा मोहन गोकुल की दृष्टि होनी चाहिए। स्त्रियों के बारे में उनके निबंध फेमिनिज्म के पहले विचारक निबंध हैं मगर रामविलास शर्मा भी गोकुल के स्त्री संबंधी विचारों पर बात नहीं करते। हिन्दी में स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य में गोकुल के दृष्टिकोण का विशेष महत्व है। महादेवी वर्मा का दृष्टिकोण उनसे मिलता है और इसके बाद ही श्रृंखला की कड़ियाँ प्रकाशित होती है। स्त्री के स्वभाव, लक्षण, साहित्य को विश्लेषित नहीं करते। हिन्दी में परिवार पर निबंधों का अकाल है, दहेज पर निबंध नहीं मिलते। स्त्री के यौनिक प्रश्नों से प्रगतिशील आलोचना दूर भागती है। नामवर सिंह भी 2006 में जाकर स्त्री के प्रश्नों पर बोलते हैं और रामविलास शर्मा ने केवल एक निबंध लिखा और अच्छा कहने के अलावा कुछ नहीं कहा। छायावाद की सबसे अच्छी आलोचना महादेवी वर्मा ने लिखी मगर उन पर भी बहुत कम बात होती है।
स्त्री की सबसे बड़ी समस्या रोजगार है। आज बड़े पैमाने पर औरतें रोटी कमाने के लिए जूझ रही हैं मगर साहित्य में मोहन राकेश से लेकर मन्नू भंडारी के यहाँ भी स्त्रियों की समस्या सिर्फ अवैध संबंध हैं। लड़की की कोई जाति नहीं होती। दहेज और बाल विवाह स्त्रियों की बड़ी समस्या है। आलोचना का काम है कि वह अनुप्लब्ध क्षेत्रों को उपलब्ध कराये। स्त्री के बड़े प्रश्नों पर बड़े लेखक बात नहीं करते।

स्त्री और उसकी समस्याओं को सामने लाने के पीछे वे अंतरराष्ट्रीय समझौते हैं, जिन पर 1970 -75 में भारत ने हस्ताक्षर किये थे। बीना मजुमदार रिपोर्ट के जमा होने के बाद पता चलता है कि स्त्रियों की समस्याएँ कितनी भयावह हैं, उन तक पंचवर्षीय योजनाओं के लाभ नहीं पहुँच पा रहे थे। इसके बाद जाकर स्त्रियों के पक्ष में कानून बनने शुरू हुए। आज भी 98 प्रतिशत स्त्रियाँ अपनी मर्जी से बगैर पूछे कोई फैसला नहीं कर पाती। वह अपने फैसले पर किसी और की मुहर का इंतजार करती हैं।
स्त्री के प्रश्नों पर गोपनीय तरीके से बात होती है जबकि उन पर खुलकर बात करने की जरूरत है। शिक्षकों को और पुरुष शिक्षकों को भी इन पर बात करने की जरूरत है और पुरुष शिक्षकों को भी इन समस्याओं को संवेदनशील होकर समझने की जरूरत है। स्त्री की समस्याएँ सामाजिक प्रश्न हैं, उन पर बात होनी चाहिए। शिक्षक अपनी छात्राओं को वह साहस दें कि वे अपनी बात शिक्षकों से कह सकें। साहित्य के प्रश्नों के समाधान जीवन में होते हैं। आज दिक्कत यह है कि बड़े पैमाने पर स्त्री की चेतना का रूपांतरण साम्प्रदायिक तरीके से हो रहा है। औरतें अपराधियों की हिमायत में कवच बनकर खड़ी हो रही हैं। स्त्री की मनुष्यता खत्म हो रही है मगर हमें स्त्री भी चाहिए और मनुष्य भी चाहिए। स्त्री को स्त्री बने रहने दें। स्त्री को लिंग के दायरे से बाहर लाया जाये। हमें एक अच्छी मानवीय स्त्री चाहिए। स्त्री की अस्मिता के प्रश्नों को मनुष्यता के दायरे से जोड़ा जाये। इस विषय पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की स्त्री का पत्र कहानी पढ़ी जानी चाहिए। स्त्री के प्रश्नों को उसकी पहचान के दायरे से आगे लाकर मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। स्त्री को न सिर्फ मनुष्य माना जाये बल्कि उसे आचरण में भी लाया जाये, उसे खर्च दें जिसका इस्तेमाल वह अपने तरीके से कर सके। परिवार का लोकतांत्रिककरण करना आवश्यक है। वर्जीनिया वुल्फ मानती हैं कि परिवार की संरचना में फासीवाद होता है और उसकी जड़ वहीं है। पितृसत्ता को नष्ट करने के लिए फासीवाद का खात्मा जरूरी है। विवाह के समय लड़का – लड़की, दोनों की सहमति ली जाए तो आधी समस्यायें खुद खत्म हो जायेंगी। स्त्री पुरुष के संबंधों को लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है।

                                                                                     भाग दो 

      
हर लड़की की मनोदशा अलग होती है। उसकी समस्या को समझना है तो उसकी आँखों में आँखें डालकर बात कीजिए। हमने महिलाओं के साथ परदे का संबंध रखा है मगर जरूरत बगैर परदे के स्त्री से संवाद करने की है। उसकी खिल्ली उड़ाने की जरूरत नहीं है। स्त्री की भावनाओं का सम्मान करें। हम स्त्री पर अपने विचार थोपते हैं। पुरुष अपने हिसाब से स्त्री को ढालना चाहता है। हमें वही लड़की अच्छी लगती है जो हमारे हिसाब से ढल जाये। अब स्त्री पुरुषों का ही अनुकरण कर रही है। राधा मोहन गोकुल ने लिखा है कि जिस पति – पत्नी के संबंधों में नशे की लत होती है, उनके बच्चे अवसादग्रस्त होते हैं। हमने तो कभी सोचा ही नहीं कि माता – पिता के संबंध बच्चे के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं। अब तो स्थिति सुधरी है, बच्चों को लेकर आज के माता – पिता काफी ध्यान दे रहे हैं और सजग हैं मगर आम धारणा यही रही है कि बच्चे खुद ही बड़े हो जाए, हम उसकी जरूरतें पूरी कर देंगे।
हिन्दीभाषी समाज पर पूँजीपति वर्ग का गहरा असर है और यह वर्ग किताबें नहीं पढ़ता। छूत की समस्या हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हमें अपनी मर्जी से कम से कम आधा या एक घंटा भी अपनी इच्छा का कोई काम करना चाहिए। धर्म हमेशा से शोषण का उपकरण रहा है जिसके संचालन की बागडोर हमेशा से पुरुषों के हाथ में रही है। अगर यह बागडोर स्त्रियों को मिली होती तो उनका इतना शोषण नहीं होता। धर्म के संचालन में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ा दें, उसे कमान दे दें, आधी समस्याएं ऐसे ही खत्म हो जायेंगी।
यही स्थिति आर्थिक क्षेत्र में भी है। सेबी के निर्देश के बावजूद कम्पनियों ने महिलाओं को निदेशक मंडल में शामिल किया मगर आज भी 400 से अधिक कम्पनियों में महिला निदेशक नहीं है और न ही किसी निर्णायक पद पर हैं। स्त्री जितना संचालन करेगी, उतनी ताकतवर होगी। स्त्री के प्रश्नों को समानता, लोकतंत्र और न्याय, इन तीन आधारों पर देखे जाने की जरूरत है। स्त्री को लोकतंत्र तक जाने ही नहीं दिया जा रहा है। स्त्री के अराजनीतिक होने की सीमा को तोड़ने की जरूरत है।
राधा मोहन गोकुल पुरुष को स्त्री के वेश्या बन जाने का बड़ा कारण मानते हैं। जो क्षेत्र क्रांति के लिए जाने जाते हैं, उन क्षेत्रों में वेश्यावृति तेजी से बढ़ रही है। बंगाल और नेपाल ऐसे ही क्षेत्र हैं। विकास का अभाव, माइग्रेशन, बांग्लादेश की उथल – पुथल इसके प्रमुख कारण हैं। विभाजन के बाद दंगों के दौरान और युद्ध में भी वेश्यावृत्ति इतनी नहीं बढ़ी थी। इसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जाना चाहिए बल्कि वेश्याओं के उद्धार और उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए। हमारी सरकारों के पास वेश्याओं की समस्याओं के समाधान के लिए कोई ब्लू प्रिंट नहीं है। वेश्याओं की समस्याओं पर खुलकर बात हो, अखबारों में बात हो। उनके लिए कंडोम की व्यवस्था हो और उसके अस्तित्व की रक्षा की जाए, तभी इस समस्या का समाधान हो सकता है। वेश्याओं के बच्चों का स्कूलों में दाखिला होना एक बड़ी समस्या है। स्त्री के सारे प्रश्न उसके शरीर से जुड़े हैं इसलिेए उन पर बहस पर बात किये बगैर नहीं हो सकती। स्त्री को देखना है तो उसके हृदय में देखिए, वह वहीं मिलेगी।

(कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा स्त्री, उसके प्रश्नों और स्त्री साहित्य पर आधारित व्याख्यानमाला में दिये गये व्याख्यान पर आधारित)

क्रांतिकारी, लेखक और पत्रकार राधा मोहन गोकुल

– शिवशरण त्रिपाठी

राधा मोहन गोकुल जी के बारे में नई पीढ़ी के लोग बहुत कम ही जानते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि नई पीढ़ी के पत्रकारों को भी उनके बारे में या तो कुछ पता ही नहीं है या तो बहुत ही कम पता है। राधा मोहन जी एक क्रांतिकारी, लेखक व पत्रकार के साथ ही सनातनी, आर्य समाजी तो थे ही कांग्रेसी व साम्यवादी होने के साथ समाज सुधारक भी थे।
राधा मोहन गोकुल एक ऐसा नाम है जिसे देश की नई पीढ़ी को जानना चाहिये, पढ़ना चाहिये और समझना चाहिये। वास्तव में वह एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। ईश्वर ने जितना उन्हें कष्ट पहुंचाया उतने ही वह दृढ़ निश्चयी बने, उतने ही फौलादी बने, उतने ही तपकर लोगों के प्रेरणास्रोत व आदर्श बने। एक बारगी ‘राधा मोहन गोकुल’ नाम ही समझ में नहीं आता। देश के कुछ राज्यों खासकर गुजरात, महाराष्ट्र आदि में पुत्र के साथ पिता का नाम जोड़े जाने की परम्परा है पर उनका तो इन राज्यों से कुछ भी सम्बन्ध नहीं था। उनके पूर्वज राजस्थान की वर्तमान राजधानी जयपुर के (तत्कालीन राज्य) के खेतड़ी नामक स्थान से आकर उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद जनपद में आ बसे थे और वहीं उनका जन्म हुआ था। यह समझ से परे है कि उनका नाम राधा मोहन से राधा मोहन गोकुल कैसे हो गया। बहुत सम्भव तो यही प्रतीत होता है कि उन्होंने स्वयं अपने नाम राधा मोहन के साथ अपने पिता जी गोकुल चन्द के नाम से गोकुल शब्द जोड़ लिया था। वह वैश्य बिरादरी से थे और उनके परबाबा लाला परमेश्वरीदास आजीविका की तलाश में कोई ढाई-तीन सौ वर्षों पूर्व इलाहाबाद जनपद के लाल गोपाल गंज में आ बसे थे और निकटवर्ती भदरी (वर्तमान में प्रतापगढ़ जनपद) के राजा साहब के यहां बतौर खजांची काम करने लगे थे।

राधामोहन जी का जन्म १५ दिसम्बर १८६५ को लाल गोपालगंज, इलाहाबाद में हुआ था। वह अपने पिता की चार संतानों में सबसे बड़े थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पास के बौद्ध भिक्षुओं के आवास विहार में हुई थी। वहीं उन्होंने पहले हिन्दी व फिर उर्दू, फारसी की पढ़ाई की थी। आगे की पढ़ाई के लिये उन्हें कानपुर में रहने वाले उनके ताऊ जी के पास भेज दिया गया था। यही उनका कानपुर से पहला सम्पर्क भी था। यहां उन्हें फारसी के साथ-साथ बहीखाते की शिक्षा मिली। इसी बीच तत्कालीन परम्परा के चलते १३ वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह कर दिया गया था। चूंकि वह आगे पढ़ना चाहते थे सो वह कानपुर छोड़कर आगरा अपने चाचा के पास आ गये और सेंट जॉन्स कालिजिएट में दाखिला लेकर अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी।

वह शिक्षा पूर्ण कर पाते कि उन पर एक के बाद एक विपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा। यहीं से उनकी ऐसी कठिन परीक्षा शुरू हुई कि दूसरा व्यक्ति होता तो शायद जीवन से ही मोह त्याग देता। पर राधा मोहन जी ने हर विपदा का डटकर सामना किया। जहां शादी के ५ वर्षों बाद ही सन् १८८३ में उनकी पत्नी का निधन हो गया वहीं १८८४ में एक व्यापारिक दुर्घटना फलस्वरूप परिवार की आर्थिक स्थिति चरमरा गई। ऐसे में वह पढ़ाई छोड़कर नौकरी की तलाश में पुन: इलाहाबाद आ गये। यहां उन्हें एक सरकारी महकमे के एकाउंटस विभाग में २० रूपये माहवार की नौकरी मिल गई। पर यह नौकरी कुछ ही महीने चल सकी। एक गोरे अधिकारी के अपमानजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी तथा ताजीवन सरकारी नौकरी न करने की शपथ ली।

इलाहाबाद में जीवन यापन होता न देखकर वह रोजी-रोटी की तलाश में रीवा चले गये पर वहां वह बामुश्किल एक डेढ़ वर्ष रह पाये। बीमारी के चलते वह कानपुर आ गये। उस समय कानपुर में पं० प्रताप नारायण मिश्र जी के ब्राह्मण पत्र की बड़ी धूम थी। चूंकि राधा मोहन जी को लिखने पढ़ने का बड़ा शौक था और पहले ही बाल कृष्ण भट् के हिन्दी प्रदीप में उनकी कवितायें व लेख छपने लगे थे अतएव जब वह मिश्र जी से मिले तो वह मिश्र जी को इतना भाये कि उन्होंने अपने पत्र में उनका नाम आनरेरी मैनेजर के रूप में छापना शुरू कर दिया। उनके उत्तेजक लेख भी ब्राह्मण में छपा करते थे।

इसी बीच उन्होंने देश के तत्कालीन हालात पर एक पुस्तक भी लिखी जो कि इतनी उग्र भाषा में थी कि उसे पढ़ने के बाद कानपुर के तत्कालीन सुप्रसिद्ध समाजसेवी व जाने माने वकील पं० पृथी नाथ ने कहा था कि अभी ऐसी रचनाओं का समय नहीं है और उनके कहने पर उन्होंने पुस्तक को जला दिया था। इधर आर्थिक स्थिति निरंतर बिगड़ने से परिवार की परेशानियां बढ़ती ही जा रही थीं। अत: उन्हें पिता जी का हाथ बंटाने की नीयत से न चाहते हुये भी कानपुर छोड़ना पड़ा और वह पिता जी के साथ हसनपुर (गुड़गांव) आ गये। इसी दौरान उनकी पुत्री का भी देहांत हो गया। यह समाचार पाकर उनका मन और व्यथित हो गया। काम-काज से मन उचाट होने से कोसीकलां (मथुरा) चले आये पर दुर्भाग्य ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। सन् १९०१ में १६ वर्ष की आयु में उनकी एक मात्र निशानी बचे इकलौते पुत्र का निधन हो गया। जिससे वह बिल्कुल टूट से गये। मन उचाट हो गया। बेटे पर आई भारी विपदा से दुखी पिता गोकुल चंद्र जी ने दुबारा विवाह करने को कहा। पहले तो वह मना करते रहे पर जब बेहद दबाव में तैयार हुये तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि वह दुबारा विवाह करेंगे तो सिर्फ किसी विधवा से ही करेंगे। इस पर परिवारवाले राजी नहीं हुये थे अतएव उन्होंने विधुर रहने की प्रतिज्ञा कर ली।

परिवार के छिन्न-भिन्न होने व परिवार की आर्थिक स्थिति डावांडोल होने से क्षुब्ध राधा मोहन जी का मन आगरा में लग नहीं रहा था सो अचानक घर छोड़कर बम्बई चले गये। वहां से बीकानेर जयपुर आदि जगहों पर भटकते रहे पर उनका मन इतना बेहाल था कि कहीं भी उन्हें चैन नहीं मिल पा रहा था। अंतत: सन् १९०४ में वह कलकत्ता जा पहुंचे। यहीं से उनके जीवन को एक और नई दिशा मिली। वैश्य समाज में उन्होंने पैठ बना ली और युवाओं को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध क्रांतिकारियों की सहायता करने व क्रांति आंदोलनों में भाग लेने को प्रेरित करने लगे। इसी बीच आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी के विचारों से इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने आर्य समाज के सहयोग से ‘सत्य सनातन धर्म’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं पाखण्डों पर जोरदार हमला शुरू कर दिया। इससे भले ही वैश्य समाज उनसे नाराज हुआ पर समाज के बीच उनकी प्रतिष्ठा व स्वीकार्यता बढ़ती चली गई। हालांकि तीन वर्षों बाद उनका साप्ताहिक पत्र बंद हो गया पर इस दौरान उनकी प्रतिष्ठा तत्कालीन नामवर साहित्यकारों/पत्रकारों मसलन पुरूषोत्तम दास टंडन, श्याम सुन्दर दास, ईश्वरी प्रसाद शर्मा, गणेश शंकर विद्यार्थी, महादेव प्रसाद सेठ, शिव पूजन सहाय आदि के बीच स्थापित हो चुकी थी। तत्कालीन छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ तो उन्हें अपना राजनीतिक गुरु ही मानते थे।

एक तरफ राधा मोहन जी ने सत्य सनातन धर्म के माध्यम से जहां लोगों को सामाजिक कुरीतियों से छुटकारा दिलाया वहीं अपने क्रांतिकारी व जोशीले लेखों से क्रांतिकारी आंदोलन में प्राण फूंकने का काम किया। उन्होंने न केवल अपने लेखों से वरन् आर्थिक रूप से क्रांतिकारियों की भरपूर मदद करने में महती भूमिका निभाई। उस समय कलकत्ते में सक्रिय प्रसिद्ध क्रांतिकारी आशुतोष लाहिड़ी उनके पक्के दोस्त बन चुके थे। सन् १९१४ में जब क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ मुखर्जी ने जर्मन की बनी पिस्तौलों से भरे बक्से को गायब कर लिया तो उसे पार करने और छिपाने की जिम्मेदारी राधा मोहन जी ने निभाई थी। उन्हीं के प्रेरणा और प्रयत्नों से कुछ मारवाड़ी युवकों ने इसमें आर्थिक मदद दी थी।

सत्य सनातन धर्म के प्रकाशन के दौरान ही सन् १९०८ में उन्होंने अपनी पहली पुस्तक ‘देश का धन’ लिखी। इसमें उन्होंने धन कमाने से लेकर उसके उपयोग, सुरक्षा के साथ श्रम की भूमिका पर व्यापक प्रकाश डाला था। १९१२ में उन्होंने ‘नीति दर्शन’ नाम से दूसरी पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने समाज के समग्र कल्याण को लेकर नीतियां बनाने पर जोर दिया। नीति दर्शन में नीति से उनका तात्पर्य है- नीति मनुष्य के सहज कर्तव्य पथ का नाम है। स्पष्ट है कि वह सुसंस्कृति शब्द समाज के निर्माण में प्रत्येक नागरिक के सोच और आचरण की नीति तय कर लेना चाहते थे। ऐसी नीति जिसके मूल्य में लोक मंगल हो।

संयोगवश तत्कालीन सुप्रसिद्ध लेखक पं० सुन्दर लाल जी की घनिष्ठा के चलते उनके आग्रह पर वह नागपुर आ गये। जहां उन्होंने पं० जी के जेल जाने पर उनके द्वारा स्थापित असहयोग आश्रम का संचालन बखूबी किया। उन्होंने यहां भी स्वयं तो क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया ही अनेक युवकों को भी क्रांतिकारी आंदोलन का सहभागी बनाया। नागपुर से उन्होंने एक क्रांतिकारी युवक सतीदास मूंधड़ा द्वारा प्रकाशित ‘प्रणवीर’ का सम्पादन शुरू कर दिया। उनके सम्पादन में ऐसे-ऐसे लेख व विचार छपने लगे कि अंग्रेजों के बीच तहलका मच गया। ‘प्रणवीर’ कार्यालय नागपुर से ही ‘मेजनी’ और ‘गैरीबाल्डी’ के जीवन चरित्र पर उन्होंने अपनी लिखी दो पुस्तकों का भी प्रकाशन किया। इन सबका नतीजा यह निकला कि वह गिरफ्तार कर जेल में डाल दिये गये। इसी बीच प्रणवीर के सम्पादक का कार्य उनके कहने पर उनके सहयोगी सत्यभक्त जी ने संभाला पर विपरीत परिस्थितियों के चलते प्रणवीर का प्रकाशन भी बंद हो गया। जेल से छूटने के बाद उन्होंने देश में घूम-घूमकर क्रांति की अलख जगानी शुरू कर दी और लेखन कार्य भी जारी रखा।

प्रणवीर बंद हो जाने के बाद सत्य भक्त जी कानपुर आ गये और मजदूरों के बीच काम करना शुरू कर दिया। जब २५ दिसम्बर १९२५ को कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की पहली बैठक हुई तो उसमें राधा मोहन गोकुल जी शामिल हुये और फिर कानपुर में ही रम गये। उनके यहां आने से गणेश शंकर विद्यार्थी, चन्द्रशेखर आजाद तथा भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को और बल मिला। मजदूर आंदोलनों को धार देने के लिये जब सत्यभक्त जी ने ‘साम्यवादी’ नामक पाक्षिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया तो राधा मोहन जी हर स्तर पर उन्हें सहयोग करते रहे।

साम्यवाद से लोगों को परिचित कराने की दृष्टि से सन् १९२४ में ही उन्होंने ‘कम्युनिज्म क्या है’ नामक पुस्तक भी लिखी पर उसका प्रकाशन फरवरी १९२७ में हो सका। कानपुर में उन्होंने साम्यवाद को नई धार तो दी ही क्रांतिकारियों को नई ऊर्जा भी दी। कानपुर के क्रांतिकारी आंदोलन में उनका योगदान इतना व्यापक है कि जिसे यहां विस्तार से दिया जाना संभव नहीं है। साण्डर्स कांड के बाद पुलिस राधा मोहन जी के पीछे ही पड़ गई और सन् १९३० में वह गिरफ्तार कर लिये गये जिसमें उन्हें दो वर्ष की सजा हुई। १९३२ में जब वह जेल से छूटे तो उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ चुका था कि चलना फिरना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में वह पहले ही इलाहाबाद जा चुके अपने सहयोगी सत्य भक्त जी के बुलावे पर इलाहाबाद चले गये। हालांकि पुलिस के बराबर पीछा करते रहने व दबाव के चलते जल्द ही उन्होंने इलाहाबाद छोड़ दिया और पुलिस से बचने को साधु वेश धारण कर हमीरपुर के खोही गांव में आश्रम बनाया। यहीं से उन्होंने अपनी क्रातिकारी गतिविधियां जारी रखीं। यहीं वह कानपुर, बनारस, इलाहाबाद, बंगाल व अन्य जगहों से आने वाले क्रांतिकारियों से मिलते जुलते थे तथा गुप्त मंत्रणायें चलती थीं। वह ब्रिटिश सत्ता के विरोधी जमीनदारों से जो भी हथियार और धन जमा करते उसे वह उन क्रांतिकारियों को सौप देते थे। यह बात ज्यादा दिनों तक छिपी न रह सकी और धीरे-धीरे उस पूरे इलाके में फैल गई। इसी दौरान अंग्रेज परस्त कुछ जमीनदारों की शिकायत पर कलेक्टर ने उन्हें समन जारी कर जिला मुख्यालय तलब कर लिया। किसी को क्या मालूम था उनका यही दौरा उनके लिये जानलेवा सिद्ध होगा।

क्लेक्टर के फरमान पर वह टट्टू पर बैठकर जिला मुख्यालय के लिये रवाना हो गये। पहले से ही बीमार शरीर, लम्बी यात्रा व घटिया खानपान से वह और टूट गये। आखिरकार जब वह खोही वापस लौटे तो बिस्तर पर गिर गये और पेचिश का शिकार हो गये। चूंकि उस क्षेत्र में इलाज की कोई कारगर व्यवस्था न थी सो देहाती जड़ी बूटियों से ही उनका उपचार चलता रहा पर शायद इस क्रांतिकारी शेर को ईश्वर के सिर्फ बुलावे का इंतजार था। करीब सप्ताह भर घोर कष्ट भोगने के बाद अंतत: राष्ट्र के इस महान सपूत का ३ सितम्बर १९३५ को महाप्रयाण हो गया। स्थानीय लोगों ने आश्रम के समीप ही पूरे मान सम्मान के साथ उन्हें समाधि दे दी। ऐसे थे एक महान क्रांतिकारी, लेखक व पत्रकार राधा मोहन गोकुल जी!
(प्रभासाक्षी से साभार)
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अब ट्रांसजेंडर भी ऑनलाइन जमा कर सकेंगे इनकम टैक्स

नयी दिल्ली : आयकर विभाग ने आयकर रिटर्न फॉर्म में अब ट्रांसजेंडर का भी विकल्प दिया है। ट्रांसजेंडर को सामाजिक पहचान देने के लिए पुडुचेरी प्रशासन ने यह पहल शुरू की है। पहले इन्हें फॉर्म में खुद को महिला या पुरुष बताना पड़ता था। लेकिन अब इनके लिए तीसरा ऑप्शन दिया गया है। बता दें कि आधार में थर्ड जेंडर का विकल्प दिया गया है जबकि पैन कार्ड में यह ऑप्शन नहीं है। ऐसे में पैन कार्ड में महिला या पुरुष बताने में परेशानी हो रही थी। इससे आधार और पैन आपस में लिंक भी नहीं हो पा रहे थे।
महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में पुडुचेरी में कंसल्टेंट डॉ समीरा महमूद जहांगीरदार ने अपने जेंडर को थर्ड जेंडर घोषित किया था। लेकिन उन्हें पैन कार्ड में खुद को पुरुष घोषित करना पड़ा था। इस कारण उनका आधार और पैन कार्ड आपस में लिंक नहीं हो पा रहे थे।

इसी को ध्यान में रखते हुए पुडुचेरी में ई-फाइलिंग पोर्टल्स में ट्रांसजेंडर विकल्प की शुरुआत के लिए कई बार ऑनलाइन पिटिशन भी दायर की गई थी। समीरा ने इसके लिए इनकम टैक्स के प्रिंसिपल सेक्रटरी जहनाब अख्तर से मुलाकात की और उनसे मदद मांगी। इसके बाद उन्होंने संबंधित विभाग को निर्देश दिया और ई-पोर्टल्स पर फाइलिंग के दौरान तीसरे जेंडर के विकल्प को भी तैयार करने को कहा। साथ ही समीरा को पैन में तीसरा जेंडर ना आने तक आधार-पैन लिंकिंग से भी छूट दी गई। बता दें कि 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में लगभग 5 लाख लोग थर्ड जेंडर में आते हैं।