Friday, July 10, 2026
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अभिजात्यता छोड़कर मुखर बनिये, तभी रहेंगी किताबें और सलामत रहेंगे आप

इस बार पुस्तक मेले की जगह बदल गयी है। देखा जाये तो इसका असर सकारात्मक ही पड़ा है मगर गौर करने वाली बात यह है कि हिन्दी के स्टॉल लगातार कम होते जा रहे हैं। इसके बावजूद कि हिन्दी पाठक खोजकर – भटककर अपनी काम की किताबें ढूँढ रहे हैं और छुट्टी के दिनों में भीड़ भी अच्छी – खासी हो रही है मगर प्रकाशकों और पाठकों का मजबूत रिश्ता कोलकाता पुस्तक मेले में नजर नहीं आता। आमतौर पर प्रकाशक इसका ठीकरा कभी पाठकों पर फोड़ते हैं तो कभी आयोजकों पर गुस्सा निकालते हैं मगर सच्चाई तो कुछ और ही है। किताबें लिखी जा रही हैं, छप रही हैं मगर पाठकों तक पहुँचने की कोशिश नहीं हो रही है। न तो प्रकाशक इस बात को लेकर गम्भीर हैं और न ही शिक्षण संस्थान या साहित्यिक संस्थायें इस बात को लेकर सोच रही हैं।

हिन्दी साहित्य को साहित्यकारों, आलोचकों और शिक्षा व कला वर्ग की एक खास दुनिया में समेट दिया गया है। अभिजात्यता ऐसी कि फिल्मों और अच्छी हिन्दी फिल्मों के अवदान को हम याद नहीं रखते और मजे की बात यह है कि हमारा ध्यान इन किताबों पर तब ही जाता है, जब किसी साहित्यिक कृति पर फिल्म बनती है। किताबों को आम जनता तक पहुँचाना भी हिन्दी की जिम्मेदारी है। इसके लिए हमें अपने स्वार्थ से परे होकर सोचने की जरूरत है। बांग्ला और अँग्रेजी की अच्छी बात यह है कि उनको सिनेमा से परहेज नहीं है और न ही इन भाषाओं के लेखकों को किसी बॉलीवुड कलाकार के साथ मंच साझा करने में परेशानी है इसलिए साहित्यिक हस्तक्षेप इन भाषाओं के सिनेमा को मजबूत करता है। हिन्दी में इसका उल्टा है और हिन्दी के लेखक, बुद्धिजीवी और आलोचक सिनेमा से जुड़ने को अपनी तौहीन समझते हैं। एक अजीब प्रकार की हेय दृष्टि से कलाकारों को देखा जाता है और सलूक ऐसा किया जाता है मानो हिन्दी साहित्य पर हिन्दी के साहित्य जगत का एकाधिकार हो।

इस दृष्टि को तोड़ने में हिन्दी कविता एक महत्वपूर्ण प्रयोग कर रही है। सिनेमा के सितारों से हिन्दी की कवितायें पढ़वाना और आम जनता तक पहुँचाना एक बड़ा बदलाव है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसके साथ ही तकनीक और साहित्य को जोड़ना भी जरूरी है। अनिमेष जोशी सुनो कहानी यूट्यूब चैनल के माध्यम से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। अगर युवाओं की बात की जाये तो बोल पोएट्री सोशल मीडिया पर ऐसे मसलों को उठा रहा है, जिन पर बात करनी जरूरी है। धीरज पांडेय, विहान गोयल और उनकी टीम की जुगलबंदी वो काम कर रही है, जो बड़े – बड़े साहित्यकार नहीं कर पा रहे हैं और वह है युवा पीढ़ी को जोड़ना। आप मान लीजिए कि आप पर्वत पर बैठकर साहित्य को लोकप्रिय नहीं बना सकते। अगर शाहरुख खान जयशंकर प्रसाद को पढ़ते हैं या सनी लियोनी सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ती हैं तो इससे कविता अपवित्र नहीं होगी बल्कि साहित्य की ताकत सामने आयेगी। मसला संवाद का भी है और यह भी सच है कि इसके लिए कोशिश नहीं की जाती। हाल ही में जब दिल्ली पुस्तक मेला आयोजित हुआ तो उसकी हलचल से पूरा सोशल मीडिया पटा पड़ा था। प्रचार करने के लिए मानों प्रकाशकों ने एक दूसरे से प्रतियोगिता लगा रखी थी। बड़े लेखकों से लेकर नवोदित साहित्यकार और युवाओं को दिल्ली पुस्तक मेले में देखा गया। आप ये माहौल अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेले में देख सकते हैं मगर बांग्ला और अँग्रेजी प्रकाशकों के स्टॉल पर। हम हर साल रोना रोते हैं कि हिन्दी की उपेक्षा की जा रही है…मीडिया में खबरें भी नयी पुस्तकों और पाठकों की कमी तक सीमित रहती हैं मगर इसके कारणों पर कभी हमारा ध्यान नहीं गया।

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर जब दिल्ली पुस्तक मेले की हलचल देखी तो ऐसा लगा कि हमें यह माहौल कोलकाता में नहीं दिखता। यह सही है बंगाल एक अहिन्दीभाषी राज्य है और यह भी सही है कि हिन्दी के पाठकों में जानकारी का अभाव है या साहित्य को लेकर उनमें उत्साह की कमी है मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमने किताबों के प्रति प्यार जगाने और लोगों तक ले जाने की कोशिश की? क्या यह सच नहीं है कि हिन्दी के साहित्यकार अपनी गुटबाजी और घेरे में इस कदर घिरे हैं कि पाठकों तक पहुँचने की तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया? कहीं ये तो सच नहीं है कि हिन्दी के साहित्यकार खुद को इस कदर ऊँचाई तक ले आये हैं कि नीचे झुककर देखना उनको अपनी तौहीन लगती है? इस अभिजात्यता के चक्कर में हिन्दी ने कई साहित्यकारों के साथ आम पाठकों को भी खुद से दूर किया है। जहाँ तक प्रकाशकों का प्रश्‍न है तो साहित्य सेवा के साथ व्यवसाय और लाभ – हानि का गणित उनके लिए मायने रखता है। इस बार जब हम 2018 के कोलकाता पुस्तक मेले में गये तो हिन्दी के एक बड़े प्रकाशन समूह ने इसे हमारी बातचीत में स्वीकार किया और हमें यह फर्क इस बार भी दिखायी पड़ा। अगर आप शहरों के अनुसार पाठक के साथ बर्ताव बदलते रहेंगे तो इसमें क्षति आपकी ही होगी क्योंकि आजकल तो जमाना भी ऑनलाइन का ही है। हिन्दी के स्टॉलों पर पाठक थे मगर प्रकाशकों की ओर से किसी प्रकार की हलचल नहीं थी और हलचल होती भी है तो यह मात्र पुस्तक लोकार्पण तक ही सीमित रहती है। सवाल यह है कि कोलकाता पुस्तक मेले में स्टॉलों पर सन्नाटा आखिर हिन्दी की नियति क्यों है और यह कब तक ऐसा रहेगा? आप पाठकों को किताबें खरीदते देख सकते हैं। दिल्ली में राजकमल प्रकाशन ने पाठकों को लुभाने के लिए एक अभिनव प्रयोग किया था। किताबों की कुछ पँक्तियाँ पाठकों से पढ़वाकर उसे सोशल मीडिया पर डाला जाता रहा मगर लेख लिखे जाने तक कोलकाता पुस्तक मेले में इस समूह के स्टॉल पर यह प्रयोग हमें नहीं दिखा। तमाम असुविधाओं के बावजूद सिर्फ पाठकों पर ठीकरा फोड़ देना हमारी समझ में अपनी गलतियों से भागना और मुँह छुपाना है क्योंकि आपकी उपेक्षा और उदासीनता के बावजूद ये हिन्दी का पाठक ही है जिसके कारण आपका लेखकीय व्यक्तित्व सुरक्षित है और किताबें बिक रही हैं और खासकर तब जब कि आपकी ओर से युवा पाठकों को लुभाने, उस तक पहुँचने और साथ लाने की पुरजोर कोशिश नहीं की गयी। वो भी तब जब कि आप अपनी बहसों और एक दूसरे की आलोचना में उलझे रहें और बंगाल में तो अहिन्दीभाषी भी हिन्दी पढ़ते हैं और अनूदित किताबें पढ़ते हैं, इसलिए जरूरी है समय के साथ प्रचार के तरीकों को उन्नत करने के साथ मुखर होकर पाठकों से जुड़ें वरना आपको कोई अधिकार नहीं रहेगा कि आप अपनी नाकामी के लिए आम पाठकों को दोषी समझें।

राजकमल प्रकाशन समूह के निदेशक (विपणन एवं कॉपीराइट) अलिंद्य माहेश्‍वरी का कहना है कि हम साल भर देश में 60 अलग – अलग मेलों और प्रदर्शनियों में भाग लेते हैं। हर जगह समान रूप से ध्यान दे पाना और प्रचार कर पाना सम्भव नहीं हो पाता। कोलकाता पुस्तक मेले में तो हिन्दी स्टॉलों को कोने पर ही रख दिया जाता है, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वैसे हम सोशल मीडिया पर प्रचार करते हैं और कोशिश करें कि पाठकों से सम्पर्क करने के तरीके हम इस पुस्तक मेले में भी लायें। आनन्द प्रकाशन के निदेशक दिनेश त्रिपाठी मानते हैं कि पाठकों की कमी नहीं है। पाठक आते हैं और किताबें भी बिकती हैं। कई किताबों के तो दो – तीन संस्करण भी निकल चुके हैं। हम सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार करते हैं। हाँ, यह सही है कि पाठकों तक पहुँचने के लिए हमें और भी तरीके अपनाने होंगे।

प्रो.रंजना शर्मा कहती हैं कि यह सही है कि बांग्ला और अँग्रेजी के प्रकाशक प्रचार के मामले में हिन्दी से कहीं आगे हैं। वे नये – नये तरीके अपनाते हैं और इसका नतीजा आप इन स्टॉलों पर हो रही पाठकों की बढ़ती तादाद के रूप में देख सकते हैं। पाठक कम नहीं हैं मगर प्रचार में कमी है, इस बात को स्वीकार करना होगा। मौन रहकर आप जनता तक नहीं पहुँच सकते। सस्ती किताबें उपलब्ध करवाना एक तरीका है और 50 रुपये में किताबें उपलब्ध करवाकर साहित्य भंडार यही काम कर रहा है। सिर्फ पुस्तक मेला ही नहीं बल्कि आम जीवन में भी लेखकों और प्रकाशकों को युवा पीढ़ी और आम पाठकों के पास जाना होगा। ऐसी गतिविधियाँ लानी होंगी जिससे जनता उनको अपना समझे…वे शिक्षण संस्थानों से जुड़ें, बाजारों से जुड़े, घरों से जुड़ें और ये समझायें कि साहित्य जनता की अपनी धरोहर है, साहित्य व कला जगत की मिल्कियत नहीं।

(अपराजिता फीचर डेस्क)

सब्जी बेचकर गरीबों के लिए अस्पताल खड़ा करने वाली सुभाषिनी मिस्त्री

आज के जमाने में ऐसे विरले ही होंगे, शायद न के बराबर, जिन्होंने समाज सेवा के लिए अपने जीवन में सुभाषिणी मिस्त्री जैसा त्याग किया हो। जन्म से ही वक्त ने उनकी घनघोर परीक्षाएं लीं। वह पहले तो जिस घर में पैदा हुईं, वहां मौत ने झपट्टे मारे। जब बच गईं, मुफलिसी में ब्याहकर कलकत्ता से ससुराल अपने गांव पहुंचीं तो वहां भी सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। सन 1943 में जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था, उन्हीं दिनो उनका जन्म हुआ था। वह चौदह भाई-बहन थीं, जिनमें सात अकाल की भेंट चढ़ गए थे। उनकी मात्र बारह साल की ही उम्र में कृषक पिता ने खेतिहर युवा से ही उनकी शादी रचाई। शादी के बाद तेईस साल की उम्र में वह विधवा हो गईं।

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव हंसपुकुर की सुभाषिनी मिस्‍त्री के पति समय पर ठीक से इलाज न हो पाने के कारण ही एक दिन चल बसे। अब उन पर अपने चार बच्चों का बोझ आ गया। उसके बाद सबसे पहले सुभाषिणी मिस्त्री ने अपने सभी चारो बच्चों को अनाथालाय भेज दिया और प्रण किया कि अब किसी गरीब को वह दवा-इलाज के अभाव में नहीं मरने देंगी। उस दिन उन्हें क्या पता था कि इसके बाद खुद उनकी संतानें भी साथ छोड़ देंगी। ऐसा ही हुआ। उस वक्त उन्होंने ठान लिया कि एक ऐसा अस्पताल बनवाएंगी, जिसमें उनके जैसे गरीबों का इलाज हो सके। वह अपना लौह-संकल्प पूरा करने में जुट गईं। अस्पताल खड़ा करना कोई आसाना काम नहीं था, इतना पैसा कहां से आएगा, यह चिंता उन्हें परेशान करने लगी। उन्होंने गांव वालों से मदद मांगी, तो कई लोग उनके साथ जुड़ते चले गए। वह लोगों से आर्थिक मदद तो मांगती ही रहीं, अपना एक-एक दिन दिहाड़ी मेहनत-मजदूरी से पैसा जुटाने में बीस साल तक व्यतीत करती रहीं।इस दौरान उन्होंने पैसे के लिए सब्जियां बेंची, लोगों के जूते तक पॉलिश किए, कई साल तक घरों के जूठे बर्तन धोए पर कदम पीछे नहीं मोड़ा, तनिक विचलित नहीं हुईं, धैर्य नहीं छोड़ा। एक-एक पैसा जमाकर सन् 1992 में उन्होंने सबसे पहले हंसपुकुर में दस हजार रुपए में एक एकड़ जमीन खरीदी। उस पर अस्थाई शेड डाला। कुछ बिस्तर बिछाए और निकल पड़ीं डॉक्टरों के हाथ-पैर जोड़ने। लाउडस्पीकर की मदद से भी शहर में डॉक्टरों %

जहाँ दहेज मांगने पर मिलता है दंड, खाना भी साथ लेकर आते हैं बराती

भले ही आदिवासी समाज को आदिम और पिछड़ा कहा जाता हो, लेकिन कई मामलों में यह तथाकथित विकसित समाजों को सीख देता नजर आता है। विशेषकर बेटियों के मामले में इस समाज की परंपराओं का जवाब नहीं। यहां बेटी को पूरी तरजीह दी जाती है। यही वजह है कि दहेज प्रथा का चलन इस समाज में कभी नहीं रहा।

परंपरा आज भी कायम है। अगर वर पक्ष ने भूल से भी दहेज मांग लिया, तो पंचायत के लोग दंड तय करते हैं। विवाह में होने वाले अनावश्यक खर्च को भी वधु पक्ष पर नहीं थोपा जाता है। वर पक्ष को बेटी का हाथ मांगने जना पड़ता है, तब होती है शादी। यहां तक कि बराती अपने साथ अपना खाना भी खुद ही लेकर आते हैं।

बेटी के पिता के सामने झुकता है सिर: संथाली आदिवासियों में बेटी का पिता वर खोजने नहीं जाता बल्कि वर पक्ष स्वयं लड़की के घर आता है। लड़की के पिता से सिर झुकाकर और विनती कर लड़की का हाथ मांगता है। कन्या पक्ष को रिश्ता मंजूर तो ठीक अन्यथा वह इंकार भी कर सकता है। यदि कन्या पक्ष गरीब है तो वर पक्ष को विवाह का पूरा खर्च उठाना होगा। साथ ही, एक जोड़ा बैल या कुछ हजार रुपये कन्या के पिता को देने होंगे। यदि दोनों पक्ष समर्थ हैं तो कन्या पक्ष को सवा रुपये देकर बात बन सकती है। विवाह के बाद भूल से भी वर पक्ष ने दहेज की बात की तो समाज की ओर से दंड तक दिया जाता है।

 झारखंड में संथाली आदिवासियों की इस परंपरा की बात करें तो राज्य के पूर्व सीएम शिबू सोरेन व बाबूलाल मरांडी ने भी अपने बेटों की शादी में आदिवासी परंपरा को निभाया। मात्र सवा रुपया लेकर शादी की गई थी। सोरेन के बेटे बसंत सोरेन की शादी बोकारो के खुंटरी कुसूलमुंडा गांव में शशिभूषण हांसदा की बेटी सरिता से हुई थी। इसमें भी इन्हीं परंपराओं का पालन किया गया था।

हजारीबाग जिले की मोरांगी पंचायत का महुआटांड़ आदिवासी टोला भी मिसाल पेश कर रहा है। करीब 50 घरों के इस टोले में बेटियों की शादी में किसी तरह के दान-दहेज की परंपरा नहीं है, यहां तक कि कन्या पक्ष पर कोई बोझ न पड़े इसके लिए बारातियों के खाने का इंतजाम भी न्योता के माध्यम से ही होता है। शादियों में जुटने वाले रिश्तेदार बोरियों में खाने-पीने का सामान लेकर पहुंचते हैं। बरात में आने वाले लोग भी खाना साथ लेकर ही आते हैं ताकि वधु पक्ष पर कोई भार न पड़े।

अगर कन्या पक्ष बारातियों के स्वागत में सक्षम नहीं है तो वर पक्ष ही शादी के दिन उन्हें अपने घर आमंत्रित करता है। रांची पंतगा की रहने वाली मुन्नी कुमारी की शादी पिछले वर्ष पांच मई को महुआटांड के आशीष लिंडा से हुई थी। वधु पक्ष के सक्षम नहीं होने की वजह से शादी का सारा इंतजाम वर पक्ष ने ही किया। मैट्रिक तक पढ़ी मुन्नी बताती हैं कि दहेज या अन्य खर्च की बात होती तो उस जैसी कई लड़कियों की शादी शायद ही हो पाती।

(साभार – दैनिक जागरण)

बेटे की तरह बेटी को भी जन्म से ही है पैतृक संपत्ति में हक- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने पिता की पैतृक संपत्ति में हिन्दू लड़की के हक पर अहम व्यवस्था दी है। कोर्ट ने कहा है कि हिन्दू उत्तराधिकार कानून 1956 के बनने से पहले पैदा हुई लड़की को भी पिता की संपत्ति में पुत्रों के बराबर हक है। कानून की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने कहा है कि 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार कानून में किये गए संशोधन में बेटी को पिता की संपत्ति में जन्म से अधिकार दिया गया है जैसा कि पुराने कानून में बेटे को मिला है। ऐसे में बेटी को भी बेटे की तरह संपत्ति में जन्म से अधिकार मिलेगा। दोनों पैतृक संपत्ति में जन्म से सहभागी माने जाएंगे।

यह अहम व्यवस्था न्यायमूर्ति एके सीकरी व न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने गत 1 फरवरी को कर्नाटक की दो बहनों के पिता की संपत्ति में हक पर मुहर लगाते हुए दी। निचली अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह कहते हुए बेटियों की संपत्ति में हिस्सेदारी की मांग खारिज कर दी थी कि उनका जन्म हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के बनने से पहले हुआ था। इतना ही नहीं बेटियों की ये दलील भी खारिज कर दी थी कि 2005 में हिन्दू उत्तराधिकारी अधिनियम में हुए संशोधन के बाद उन्हें पिता की संपत्ति में कानूनन हक मिला है।

हिन्दू लड़की के पैतृक संपत्ति मे हक पर अहम व्यवस्था 

सुप्रीम कोर्ट ने पिता की संपत्ति में दोनों बहनों को हिस्सेदारी देते हुए अपने फैसले में कहा कि मिताक्षरा से संचालित होने वाले हिन्दू अविभाजित परिवार के कानून में अभूतपूर्व बदलाव हुआ है। ये बदलाव संपत्ति में हक रखने वाले सहभागी के नजदीकी महिला रिश्तेदार जैसे बेटी को बराबरी का हक देने के लिए किया गया। कानून में कहा गया है कि बेटी संपत्ति में जन्म से साझी हिस्सेदार होगी और उसके भी वही अधिकार और जिम्मेदारियां होंगी जो बेटे की होती हैं। बेटी साझी हिस्सेदार होगी और उसे वह संपत्ति वसीयत या किसी और तरीके से निस्तारित करने का भी हक होगा।

कोर्ट ने कहा कि बेटी के साथ भेदभाव खत्म करने और उसे बराबरी का हक देने के लिए ये बदलाव किये गये। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में ये मूलभूत बदलाव 2005 के संशोधन के जरिये किये गए। 2005 के संशोधित कानून की धारा 6 कहती है कि बेटी जन्म से ही संपत्ति पर उसी तरह साझी हिस्सेदारी की अधिकारी होगी जैसे कि बेटा होता है। कोर्ट ने कहा कि पुराना हिन्दू कानून बेटे को जन्म से संपत्ति का साझा हिस्सेदार मानता है ऐसे ही संशोधित कानून में बेटी को जन्म से साझा हिस्सेदार माना गया है। कानून में ठीक वैसे ही शब्द प्रयोग किये गये हैं जैसे बेटे के लिए किये गये हैं। इसलिए बेटे और बेटी दोनों का संपत्ति पर जन्म से साझा हक होगा।

कर्नाटक के गुरुलिंगप्पा सावादी अविभाजिक हिन्दू परिवार के थे। उनकी 2001 में मृत्यु हो गई। उनके दो बेटे, दो बेटियां व पत्नी थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके पोते ने संपत्ति में बटवारे का मुकदमा किया। मुकदमें में गुरुलिंगप्पा की दोनों बेटियों को संपत्ति का साझा हिस्सेदार नहीं बनाया गया। दलील थी कि इन बेटियों का जन्म हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के आने से पहले हुआ था। ये भी कहा कि इनकी शादी हो चुकी है और उसमे इन्हें सोना और पैसा मिला था इसलिए इन्होंने अपना हिस्सा छोड़ दिया है। दोनों लड़कियों ने पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी मांगी थी। निचली अदालत और हाईकोर्ट से निराश होने के बाद दोनों बहनें सुप्रीम कोर्ट आयीं थी।

 

गुरु राहुल द्रविड़ के नाम जुड़ा वर्ल्ड कप टाइटल, शिष्यों ने दी बड़ी गुरुदक्षिणा

आधुनिक क्रिकेट के सबसे जेंटलमैन खिलाड़ी राहुल द्रविड़ के करियर की एक बड़ी कमी आज दूर हो गई। यह कमी थी एक अदद विश्वकप ट्राफी जीतने की। द्रविड़ अपने सफल-सुनहरे कैरियर में भले ही यह सपना पूरा नहीं कर पाए लेकिन उनके शिष्यों ने अंडर 19 विश्वकप जीतकर यह ट्राफी आज ‘गुरूदक्षिणा के रूप में उनकी झोली में डाल दी।

क्रिकेट की दुनिया में ‘श्रीमान भरोसेमंद, ‘संकटमोचक और ‘भारत की दीवार जैसे कई विशेषणों के बावजूद द्रविड़ अब तक किसी विश्वकप विजेता टीम का हिस्सा नहीं रहे थे। लेकिन आज भारत के जिन युवाओं ने अंडर 19 विश्वकप जीता उसके गुरु यानी कोच राहुल द्रविड़ हैं।

दरअसल भारतीय क्रिकेट की अगली नस्ल को तैयार करने की जिम्मेदारी उठाने वाले द्रविड़ ने सितारों की फौज में नहीं बल्कि टीमवर्क में भरोसा रखने वाली एकादश बनाई है और इसकी बानगी अंडर 19 विश्व कप में देखने को मिली।

यह द्रविड़ का ही जज्बा था कि टूर्नामेंट के दौरान बेंगलूरू में आईपीएल की नीलामी हुई लेकिन अपनी युवा ब्रिगेड का ध्यान उन्होंने भटकने नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा,’आईपीएल नीलामी हर साल होगी लेकिन देश के लिये विश्व कप खेलने का मौका बार बार नहीं मिलेगा। इसके बाद जो हुआ , वह अब इतिहास है। द्रविड़ ने इन खिलाड़ियों को सपने देखने का हौसला दिया और वह सपना हकीकत में बदला जो वह बतौर खिलाड़ी पूरा नहीं कर पाये थे।
भारत अंडर 19 विश्व कप में सबसे ज्यादा चार बार विश्व कप जीतने वाली एकमात्र टीम बन गई। अब तक आस्ट्रेलिया और उसके नाम तीन तीन खिताब थे।
अपने 16 साल के टेस्ट कैरियर में 164 टेस्ट में 13288 रन बनाने वाले द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट में 344 मैच खेलकर 10889 रन बनाये।

विश्व कप में 1999 में बतौर रिजर्व विकेटकीपर उन्होंने पदार्पण किया लेकिन भारत का प्रदर्शन टूर्नामेंट में बेहद खराब रहा। इसी विश्व कप से हालांकि द्रविड़, सौरव गांगुली और सचिन तेंदुलकर की तिकड़ी का दबदबा दिखाई देने लगा था।

चार साल बाद दक्षिण अफ्रीका में गांगुली की कप्तानी में भारतीय टीम खिताब के बिल्कुल करीब पहुंची लेकिन फाइनल में यह सपना टूट गया जब आस्ट्रेलिया ने उसे हराकर खिताब जीता।

द्रविड़ की कप्तानी में 2007 में भारत ने वेस्टइंडीज में विश्व कप खेला जो किसी बुरे सपने से कम नहीं था। भारतीय टीम शुरूआती दौर से ही हारकर बाहर हो गई। द्रविड़ का सपना फिर अधूरा रहा। विधि का विधान देखिये कि भारत ने 2011 में अपनी मेजबानी में 28 साल बाद विश्व कप अपने नाम किया लेकिन महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली टीम में द्रविड़ नहीं थे। द्रविड़ और गांगुली को टीम में जगह नहीं मिली और विश्व कप इनके सुनहरे कैरियर का हिस्सा नहीं बन सका।

इसके बाद सितंबर 2011 में वह इंग्लैंड के खिलाफ आखिरी वनडे खेलकर द्रविड़ ने इस प्रारूप से विदा ली तो कहीं ना कहीं विश्व कप नहीं जीत पाने की कसक रही होगी। सात साल बाद गुरू द्रविड़ के शिष्यों ने उनके इस सपने को जिया और हकीकत में बदला । भारत के अंडर 19 चैम्पियन बनने की खुशी इस तथ्य के साथ दोहरी हो गई कि द्रविड़ का अधूरा सपना आखिरकार पूरा हुआ।

 

अंडर 19 विश्व कप : टीम इंडिया बनी विश्व विजेता, चौथी बार लहराया तिरंगा

मनजोत कालरा (101 रन, 102 गेंद, 8 चौकों और 3 छक्कों) के नाबाद पारी की बदौलत टीम इंडिया ने शनिवार को टौरंगा के बे ओवल स्टेडियम में खेले गए आईसीसी अंडर-19 वर्ल्ड कप के फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को 8 विकेट से मात देकर अंडर-19  वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम कर लिया। टीम इंडिया ने चाैथी बार यह खिताब अपने नाम दर्ज किया।
आॅस्ट्रेलिया ने टाॅस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम इंडिया के सामने 217 रन का लक्ष्य रखा। जिसके जवाब में उतरी टीम इंडिया ने 38.5 ओवर में ही मैच जीतकर वर्ल्ड कप का खिताब अपने नाम कर लिया। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए ऑस्ट्रेलिया टीम को भारतीय तेज गेंदबाजों के घातक स्पेल का सामना करना पड़ा। इशान पॉरेल (2/30) और कमलेश नागरकोटी (2/41) ने टीम इंडिया को शुरूआती विकेट दिलाए। जिसके बाद अनुकूल रॉय (2/32) और शिवम मावी (46/1) ने मिलकर पारी को 216 पर समेट दिया।

टीम इंडिया के लिए यह लक्ष्य कुछ खास बड़ा नहीं था। टीम इंडिया की तरफ से ओपनिंग करने आए कप्तान शॉ और मनजोत कालरा ने पहले विकेट के लिए 71 रनों की मजबूत साझेदारी बनाई। शॉ ने 41 गेंदों में 4 चौकों की मदद से 29 रन बनाए।  इस बीच बारिश की वजह से मैच को रोकना भी पड़ा लेकिन कुछ ही देर में वापस खेल शुरू हो गया। शॉ को विल सदरलैंड ने आउट कर पवेलियन भेज दिया। जिसके बाद बल्लेबाजी करने आए टीम इंडिया के धाकड़ बल्लेबाज शुभमन गिल ने 30 गेंदों में 4 चौकौं की मदद से 31 रन की पारी खेली। गिल को परम उप्पल ने बोल्ड कर दिया।

इससे पहले पहले बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम 47.2 ओवर में 216 रन पर ऑलआउट हो गई। पहले बल्लेबाजी करने उतरी ऑस्ट्रेलियाई टीम को शुरुआत में ही तीन झटके लगे। ऑस्ट्रेलिया की तरफ से ओपनिंग करने आए जैक एडवर्ड्स (28) और मैक्स ब्रायंट (14) दोनों ईशांत पोरेल के शिकार हुए। छठे ओवर की पहली ही गेंद पर ईशान पोरेल ने मैक्‍स ब्रायंट को अभिषेक शर्मा के हाथों कैच कराकर पेवेलियन लौटा दिया। वहीं, ऑस्ट्रेलिया को 9.6 ओवर में दूसरा झटका लगा। इसके बाद 59 रन के स्कोर पर ऑस्ट्रेलिया को कप्तान सांघा के रूप तीसरा झटका लगा। 17.1 ओवरों में कमलेश नागरकोटी ने अपनी पहली गेंद पर ही सांघा को हार्विक देसाई के हाथों कैच आउट कराकर पवेलियन पहुंचाया। उन्होंने 24 गेदों का सामना कर मात्र 13 रन ही बना पाए।

आस्ट्रेलिया की तरफ से मेरलो और परम उप्पल (34) ने चौथे विकेट के लिए 75 रन की साझेदारी की । इसके बाद मेरलो ने नाथन मैकस्वीनी (23) के साथ 49 रन जोड़े। चौथे विकेट के लिए मेलरो और उप्‍पल के बीच अच्छी साझेदारी होने लगी थी तभी अनूकुल रॉय ने ऑस्ट्रेलिया को चौथा झटका देकर परम उप्पल को अपना शिकार बनाया। 28.5 ओवरों में ऑस्ट्रेलिया को चौथा झटका लगा। परम उप्पल ने 58 गेंदों में तीन चौकों की मदद से 34 रन बनाकर पवेलियन लौटे। विल सदरलैंड (5) को विकेट के पीछे हार्विक देसाई ने शिवा सिंह की गेंद पर लपका। शिवा ने ही 183 के स्कोर पर नाथन मैक्स्वीनी (23) को कॉट एंड बोल्ड किया। सदरलैंड मात्र 5 रन बनाकर आउट हो गए।

वहीं, ऑस्ट्रेलिया को 39.2 ओवरों में पांचवा झटका लगा। शिवा सिंह ने नेथन मैक्स्वीनी को खुद के हाथों कैच कराया। मैक्स्वीनी ने 29 गेंदों में 2 चौकों की मदद से 23 रन बनाए। वहीं, टीम इंडिया के खिलाफ खेले जा रहे वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में मेरलो ने शानदार अर्धशतक जमाया। इसके साथ ही मेलरो का यह पहला वन-डे इंटरनेशनल अर्धशतक है। इसके बाद रयान हेडली (1) को आखिरी झटका शिवम मावी ने दिया। विकेट के पीछे हार्विक देसाई ने वह कैच लपका। इसी स्कोर पर बैक्टर होल्ट (13) रन आउट हुए। 214 के स्कोर पर जैक इवांस (1) कमलेश नागरकोटी ने बोल्ड किया।

गौरतलब है की अभी तक मौजूदा टूर्नामेंट में टीम इंडिया ने कोई मैच नहीं गंवाया था। इसलिए फैन्स की टीम इंडिया से उम्मीदें और ज्यादा थी। हालांकि, दोनों टीमें फाइनल को लेकर काफी उत्साहित और आत्मविश्ववास से परिपूर्ण थी। एक तरफ सेमीफाइनल में जहां ऑस्ट्रिलिया ने अफगानिस्तान को 6 विकेट से हराकर फाइनल में जगह बनाई, वहीं दूसरी तरफ टीम इंडिया ने सेमीफाइनल में पाकिस्तान को 203 रन से करारी मात देकर फाइनल में प्रवेश किया था।

फाइनल में सभी की निगाहें टीम इंडिया की मजबूत बल्लेबाजी पर टिकी हुई थीं। फैन्स का कहना था कि कप्तान पृथ्वी और शुभमन गिल के रूप में टीम इंडिया के पास दो शानदार बल्लेबाज हैं जिन्होंने अभी तक अपने बल्ले से सभी को प्रभावित किया है। गिल ने अभी तक इस टूर्नामेंट में 170 की औसत से रन बनाए हैं। गिल ने पाकिस्तान के खिलाफ 94 गेंदों में 102 रनों की पारी खेली थी। वहीं, फैन्स का ये भी मानना था कि गेंदबाजी में टीम इंडिया का दारोमदार शिवम मावी, अनूकुल रॉय, कमलेश नागरकोटी और ईशान पोरेल पर होगा, जो की सच साबित हुआ।

बता दें कि टीम इंडिया और ऑस्ट्रेलिया दोनों की कोशिश अपने चौथे खिताब पर कब्जा जमाने की थी, लेकिन ऑस्ट्रेलिया को निराशा हाथ लगी। मालूम हो कि दोनों टीमें अभी तक इस वर्ल्ड कप को तीन-तीन बार घर ले जा चुकी थी, लेकिन टीम इंडिया ने चौथी बार खिताब पर कब्जा जमाने में सफल रही। ऑस्ट्रेलिया ने 1988, 2002 और 2010 में अंडर-19 वर्ल्ड कप का खिताब जीते थे तो वहीं टीम इंडिया ने 2000, 2008, 2012 में वर्ल्ड कप का खिताब जीते थे लेकिन अब 2018 भी इस खाते में शामिल हो गया। इसी के साथ टीम इंडिया चौथी बार इतिहास रचने ंमें कामयाब रही।

 

अब केन्द्रीय महिला कर्मी ‘शी-बॉक्स’ में कर सकेंगी ऑफिस में यौन उत्पीड़न की शिकायत

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने केंद्र सरकार में काम कर रही महिला कर्मचारियों के लिए ऑनलाइन प्लैटफॉर्म शी-बॉक्स लॉन्च किया है। अब केंद्रीय महिला कर्मचारी ऑफिसों में यौन उत्पीड़न की शिकायत शी-बॉक्स के जरिए कर सकेंगी।

महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि शी-बॉक्स फिलहाल केंद्र सरकार की कर्मचारियों के लिए है। बाद में इसका विस्तार किया जाएगा और इसमें प्राइवेट सेक्टर को भी शामिल किया जाएगा।  ऑफिस और कामकाज की जगह पर होने वाले उत्पीड़न की प्रकृति के लिए राष्ट्रीय स्तर का सर्वे कराने की बात भी मेनका गांधी ने कही है।

शी-बॉक्स का मतलब है ‘सेक्सुअल हैरसमेंट इलेक्ट्रॉनिक बॉक्स’. इसमें आई कोई भी शिकायत सीधे संबंधित मंत्रालय, विभाग की इंटरनल कंप्लेन कमेटी के पास भेज दिया जाएगा, जिसके पास इसकी जांच का अधिकार होगा। इंटरनल कंप्लेन कमेटी नियमों के मुताबिक कार्रवाई करेगी और शिकायत की स्थिति भी पीड़ित को बताती रहेगी।

अभी केंद्र सरकार में करीब 30.87 लाख कर्मचारी हैं। फिलहाल केंद्र सरकार की कर्मचारियों के लिए है जिसमें करीब 10.93 प्रतिशत महिलाएँ हैं। मेनका गांधी के मुताबिक पोर्टल में कैसी हरकतें यौन उत्पीड़न मानी जाएंगी यह भी बताया गया है। फर्जी शिकायतें ना आएं इस पर भी ध्यान दिया जाएग।

 

रेलवे के लिए 1.48 लाख रुपये का आवंटन, 600 स्टेशन अाधुनिक बनेंगे

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट में रेलवे को लेकर भी बड़े ऐलान किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा ऐलान रेलवे पर करीब 1 लाख 48 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
सरकार पटरी बदलने से लेकर स्टेशनों के आधुनिकीकरण पर खर्च किया जाएगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सदन को जानकारी देते हुए बताया कि स्टेशनों पर वाईफाई और सीसीटीवी की सुविधा पर जोर दिया जाएगा। इतना ही नहीं 600 स्टेशनों को आधुनिक रूप दिया जाएगा। 3600 किमी रेल पटरियों का नवीनीकरण होगा और इस साल 700 नए रेल इंजन तैयार किए जाएंगे।
सुरक्षा वॉर्निंग सिस्टम पर भी जोर दिया जाएगा और मुंबई में लोकल ट्रेन सर्विस के लिए खास योजना तैयार की गई है।

 

फर्जी फेसबुक अकाउंट बनाने वालों से बचें इस तरह

दोस्तों, आप युवा हैं और फेसबुक पर बहुत से आपके दोस्त भी हैं पर क्या हर अनजान व्यक्ति दोस्ती करने के लायक होता है? आज जब साइबर क्राइम बढ़ता जा रहा है और खुद फेसबुक मान रहा है कि करोड़ों अकाउंट फर्जी हैं तो आपको भी जरा सी सावधानी बरतने की जरूरत है।  हर काम तकनीक की सहायता से होता है और तकनीक का इस्तेमाल सभी आसानी से कर लेते है। ऊपर से सोशल मीडिया साइट्स जो व्यक्ति की इनफार्मेशन, नंबर, फोटोज इत्यादि को पुरे संसार में इन्टरनेट के जरिये प्रसारित करते है। इससे पूरा संसार एक सूत्र में बंध गया है किन्तु इसी का फायदा कुछ गलत लोग भी उठाते है। कुछ गलत लोग जैसे आतंकवादी, चोर, लुटेरे इत्यादि भी इनका इस्तेमाल करते है और फेक अकाउंट बनाकर लोगों को फंसाते है। खासतौर से ये फर्जी  अकाउंट किसी खुबसूरत लड़की की आईडी पर बनते है ताकि सभी उनकी तरफ आसानी से आकर्षित हो सके।

सोशल मीडिया पर दिन प्रतिदिन बढती इस धोखाधड़ी के जरिये लोग आपको अपना मित्र बनाते है और आपको कहीं आने के लिए बोल देते है जहाँ आपसे आपके पैसे छीन लिए जाते है, अगर किसी लड़की के साथ दोस्ती की जाए तो उन्हें बुलाकर उनके साथ बदतमीजी की जाती है। ऐसी ख़बरें आप रोजाना अखबारों में भी पढ़ सकते हो। आतंकवादी तो इसका अधिक गलत तरीके से लाभ उठाते है तो जरूरी है कि आप ये जांच कर ही किसी की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट ( Friend Request Accept ) करें या किसी को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजें कि उसका अकाउंट फर्जी तो नहीं है। अब आप ये सोच रहे होगे कि आपको कैसे पता चलेगा कि किसका अकाउंट फर्जी है? तो चिंता ना करें आज हम अपनी इस पोस्ट में कुछ ऐसी बाते बताने जा रहे है जिसकी मदद से आप जान सकते है कि आपको किसके साथ मित्रता करनी चाहियें और किसके साथ नहीं।

 प्रोफाइल फोटो ( Profile Photo ) : किसी भी अकाउंट की तरफ आकर्षित करने के लिए उसपर खूबसूरत प्रोफाइल फोटो लगाई जाती है तो आप भी सबसे पहले उसके फोटोज में जाएँ और देखें कि क्या उसने अपनी खुद की कोई फोटो डाली है या फिर वो खुबसूरत लड़कियों की ही फोटो इस्तेमाल करता है। इसके अलावा कुछ फेक अकाउंट वाले फोटोज ही नहीं डालते. तो आप इन बातों को ध्यान में रखते हुए ही सामने वाले के अकाउंट को पहचाने।

 स्टेटस ( Status ) : फर्जी अकाउंट वालों में एक और ख़ास बात ये होती है कि वे अधिक से अधिक लोगों को अपना मित्र बनाने के चक्कर में अपना स्टेटस अपडेट नहीं करते, न ही जल्दी से किसी की पोस्ट का रिप्लाई देते है बल्कि अपनी ही फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने में लगे रहते हैं। तो इस तरह भी आपको फर्जी अकाउंट को पहचानने में मदद मिलती है.

 पिछली गतिविधियाँ ( Last Activities ) : आप फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने वाले की पिछली गतिविधियाँ भी अवश्य जांच लें और देखें कि वो किसी ग्रुप से जुड़ा है या नहीं,वो किसी के मेसेज का रिप्लाई कर रहा है या नहीं, किसी फोटो पर कमेंट या लाईक किया है या नहीं इत्यादि चीजें देखने के बाद ही निष्कर्ष निकालें और तभी अगला कदम बढायें।

   फ्रेंड लिस्ट ( Friend List ) : इनके अलावा आप उस व्यक्ति की फ्रेंड्स लिस्ट भी देख सकते हो. अगर आपको लगता है कि उसने लड़की की प्रोफाइल फोटो लगाकर सिर्फ लड़कियों को ही अपना मित्र बना रखा है तो संदेह करें और यदि उसने लड़के की फोटो लगाकर भी अधिक से अधिक लड़कियों को मित्र बना रखा है तो भी आपको संदेह होना चाहियें। आप इन दोनों ही स्थिति में फ्रेंड रिक्वेस्ट को रिजेक्ट ( Reject ) कर दें।

 प्रोफाइल ( Profile / About ) : हर सोशल मीडिया साईट में उस व्यक्ति को अपनी प्रोफाइल में अपनी कुछ जानकारियाँ डालनी होती है जैसे कि उसने कहाँ से स्कूल की शिक्षा ली है, कौन से कॉलेज में पढ़ा है, कहाँ काम किया है, कहाँ रहता है, किसमे इंटरेस्टेड है इत्यादि. तो आप भी इन सब बातों को जांचे और देखें कि उसने कितने कॉलम खाली छोड़ें है।

 जन्म तारीख ( Birth Date ) : अधिकतर फर्जी अकाउंट में आपको कुछ ऐसी जन्म तिथि मिलती है जिसे याद रखने में बहुत आसानी हो. जैसेकि 1 – 9 –1991, 11 – 11 – 1988 इत्यादि। आप उनकी जन्म तिथि से उनकी प्रोफाइल फोटो को मिलाकर भी देख सकते है और अंदाजा लगा सकते है कि उसकी बताई जन्म तिथि में और उसकी प्रोफाइल फोटो में कितने सालों का अंतर दिख रहा है तो आप उसकी जन्म तारीख पर भी अवश्य ध्यान दें।

 फ़ोन नंबर ( Phone Number ) : सोशल मीडिया साइट्स में 2 तरह से अकाउंट बनते है या तो आप अपनी ईमेल आईडी से अकाउंट बनायें या अपने फ़ोन नंबर से तो प्रोफाइल इनफार्मेशन में नंबर का मिलना सामान्य होता है किन्तु कोई भी लड़की इस बात को हमेशा याद रखती है कि उसका नंबर किसी अनजान के पास ना जाएँ. तो अगर आपको किसी ऐसे अकाउंट में फ़ोन नंबर मिलता है जिसपर किसी खूबसूरत लड़की की तस्वीर लगी है तो वो अकाउंट फर्जी होता है।

 पिछली पोस्ट ( Last Post ) : आप व्यक्ति की पिछली पोस्ट भी देख सकते है और अगर आपको वहाँ ऐसे जवाब दिख रहें है जैसे – क्या मैं आपको जानता हूँ,आप कौन है, आप मुझे कैसे जानते है, मुझे जोड़ने के लिए। धन्यवाद इत्यादि तो आपको समझ जाना चाहियें कि रिक्वेस्ट भेजने वाला ऐसा व्यक्ति है जो जबरदस्ती सभी को अपना फ्रेंड बना रहा है। तो ऐसे लोगों से तो आपको बहुत सावधान रहना चाहियें.

 इस्तेमाल की गयी एप्लिकेशन ( Used Application ) : हर वो व्यक्ति जो एंड्राइड फ़ोन इस्तेमाल करता है और जिसका किसी सोशल मीडिया साईट पर अकाउंट होता है वो गेम खेलने के दौरान कुछ स्कोर बनाता है या ऑनलाइन गेम खेलता है जैसे तीन पत्ती, कैंडी क्रश, पूल इत्यादि। इन सब एप्लीकेशन का रिकॉर्ड अपने आप उनकी सोशल मीडिया साईट पर पोस्ट हो जाता है ताकि उनके फ्रेंड देख सके कि वो कितना मजेदार व्यक्ति है. अगर आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने वाले व्यक्ति के अकाउंट में ऐसा कुछ नहीं दिखता है तो भी आप रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट ना करें।

 गूगल की सहायता ( Take Help from Google ) :गूगल बहुत ही शक्तिशाली सर्च इंजन है। ये हर ऐसे व्यक्ति का रिकॉर्ड भी अपने पास रखता है जिसने फेक अकाउंट बनाया है। आप भी रिक्वेस्ट भेजने वाले व्यक्ति की इमेज को गूगल में तलाश करने की कोशिश करें. अगर उसका अकाउंट फेक होगा तो गूगल आपको उस व्यक्ति का इतिहास, उसकी असली फोटो और फेक फोटो दोनों को आसानी से दिखा देता है जिससे आपको उस व्यक्ति के फर्जी अकाउंट को पहचानने में सहायता मिलती है।

फेसबुक पर दुनियाभर में 20 करोड़ से ज्यादा फर्जी या डुप्लीकेट अकाउंट

सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर करीब 20 करोड़ खाते फर्जी या फिर एक ही व्यक्ति के दोहरे खाते हो सकते हैं। यही नहीं भारत उन देशों में है, जहां इस तरह के खातों की संख्या बहुत अधिक है। फेसबुक ने इसकी जानकारी दी है। फेसबुक ने अपनी ताजा वार्षिक रिपोर्ट में कहा, ‘2017 की चौथी तिमाही में हमारा अनुमान है कि नकली अथवा दोहरे खातों की हिस्सेदारी हमारे मासिक सक्रिय उपयोगकर्ता (एमएयू) का लगभग 10 प्रतिशत है।’

रिपोर्ट में कहा गया, ‘हमारा मानना है कि अधिक विकसित बाजारों की तुलना में भारत, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे विकासशील बाजारों में इस तरह के नकली अथवा प्रतिरूप खातों की संख्या अधिक है।’ 31 दिसंबर 2017 तक फेसबुक पर मासिक सक्रिय उपयोगकर्ताओं की संख्या 2.13 अरब थी, जो कि 31 दिसंबर 2016 से 14 प्रतिशत अधिक है। 31 दिसंबर 2016 को एमएयू की संख्या 1.86 अरब थी, जिसमें 6 प्रतिशत यानी 11.4 अरब ‘नकली खाते’ थे।

रिपोर्ट में कहा गया कि भारत, इंडोनेशिया और वियतनाम में उपयोगकर्ताओं की वृद्धि दिसंबर 2016 के मुकाबले दिसंबर 2017 में अधिक रही। डुप्लीकेट (नकली) खाते वे खाते हैं जो कोई उपयोगकर्ता अपने मुख्य खाते के अतिरिक्त रखता है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि नकली या फर्जी खातों का अनुमान खातों के सीमित नमूने की आंतरिक समीक्षा पर आधारित है। कंपनी ने कहा कि फर्जी या नकली खातों का अनुमान वास्तविक संख्या से अलग हो सकता है। इस तरह के खातों को पैमाने पर मापना बहुत मुश्किल है।