Friday, April 3, 2026
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जब पड़ने लगे रिश्ते में दरार, तो ऐसे कराएं साथी को प्यार का अहसास

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जिस व्यक्ति से आप प्यार करते हैं उसके साथ अपनी जिन्दगी को साझा करने का एहसास ही बहुत खूबसूरत होता है. लेकिन गहरा प्यार और विश्वास होने के बाद भी कई बार आपके बीच किसी नी किसी बात पर अनबन होती रहती है जिससे धीरे-धीरे रिश्ते में दरार आने लगती है इसलिए रिश्ते में नयापन बनाए रखने के लिए कुछ ऐसे प्रयास करते रहें जो आप दोनों को एक दूसरे के करीब लाए  –

आपका रिश्ता चाहे नया हो या पुराना अपने साथी को पर्सनल स्पेस जरूर दें। जिस रिश्ते में लोग अपने साथी पर ज्यादा प्रतिबंध लगाते हैं वो रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चलता। स्वस्थ रिश्ता के लिए जितना जरूरी अपने पार्टनर के साथ समय व्यतीत करना है उतना ही जरूरी खुद को समय देना और साथ ही अपने पार्टनर के पर्सनल स्पेस में दखल ना देना है।

साथी के साथ अपने दिनभर के अनुभव साझा करें। आपको उनकी कौन सी बात सबसे ज्यादा पसंद है उन्हें बताएं। अपने साथी की पसंद ना पसंद को जानने की कोशिश करें। इससे आप दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा और भावनात्मक तौर पर आप एक दूसरे के ज्यादा करीब आएंगे।

अपने पेशेवर जीवन की योजनाओं और लक्ष्य के बारे में अपने साथी को जरूर बताएं क्योंकि जीवन में हर व्यक्ति के अपने सपने होते हैं, लक्ष्य होता है। आपको नई जॉब के लिए शहर से बाहर भी जाना पड़ सकता है इसलिए पहले ही अपने प्लान के बारे में पार्टनर को साफ- साफ बता दें ताकि आगे जाकर आप दोनों के रिश्ते में कोई समस्या ना आए।

 

 

पटना का अनोखा बैंड जहाँ ढोल नगाड़े बजाती हैं महिलाएं

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वो दिन गए जब महिलाएं घूंघट में रह कर घर का काम किया करती थीं और पुरुष बाहर जाकर पैसे कमाते थे बल्कि आज की महिलाएं पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं। हमारा समाज शुरू से ही पितृसत्तात्मक (पुरुषप्रधान) रहा है जिसमें महिलाओं को हमेशा से ही पुरुषों से कमतर आंका जाता है लेकिन इसी धारणा को गलत साबित कर दिखाया है पटना के एक कस्बे में रहने वाली कुछ महिलाओं ने।

दरअसल, पटना के दानापुर कस्बे के ढिबड़ा गांव की महिलाओं ने अपना एक बैंड बनाया है। इस बैंड का नाम ‘सरगम’ है और इस ग्रुप में 10 दलित महिलाएं शामिल हैं।

बैंड की मुखिया सविता देवी कहती हैं, ‘लोग हम पर हंसते थे कि हम पुरुषों का काम कर रहे हैं,  लेकिन हमारा कहना था कि आजकल महिलाएं हर काम कर रही हैं, ऑटो चलाने से ट्रेन चलाने तक तो फिर हम बैंड ड्रमर्स क्यों नहीं बन सकतीं.’

बैंड की मुखिया सविता देवी कहती हैं कि पटना की इन महिलाओं के लिए यह सब इतना आसान नहीं था. शुरुआत में लोग उन पर हंसा करते थे, मजाक बनाते थे. लेकिन उपहास और विरोध के बावजूद भी इन महिलाओं ने अपना जुनून नहीं छोड़ा। इन महिलाओं ने करीब 10 महीने तक अपने बैंड के लिए रोजाना 2 घंटे के लिए अभ्यास करना जारी रखा। इस बैंड ने ना केवल इन महिलाओं को एक नई पहचान दी है बल्कि इससे उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है।

 

98 साल की उम्र में हासिल की एम.ए की डिग्री

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पटना :  नालंदा खुला विश्वविद्यालय (एनओयू) के 12वें दीक्षांत समारोह में 98 साल के वयोवृद्ध राज कुमार वैश्य को एम.ए की डिग्री से नवाजा गया। पटना में आयोजित एनओयू के दीक्षांत समारोह में मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद ने वैश्य को अर्थशास्त्र में एम.ए की डिग्री प्रदान की ।

वैश्य ने एम.ए (अर्थशास्त्र) में 2015 में दाखिला लिया था। अपनी डिग्री प्राप्त करने के बाद वैश्य ने पत्रकारों से कहा, ‘‘मैं आज बहुत खुश हूं । मैंने कड़ी मेहनत की थी । लंबे समय से मैं मास्टर डिग्री पूरी करना चाह रहा था…..युवाओं को सिर्फ करियर नहीं बल्कि अपनी शिक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए ।’’ कुल 22,100 छात्रों को इस साल विभिन्न डिग्रियां प्रदान की गईं । वैश्य 29 स्वर्ण पदक विजेताओं सहित 2780 ऐसे छात्रों में से थे जिन्हें दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किया गया ।

 

धैर्य, श्रद्धा और विनम्रता से सपने पूरे होंगे

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अपराजिता की ओर से

अपराजिता की कोशिश रही है कि नयी प्रतिभाओं को सामने लाया जाए और ऐसे लोगों की कहानी कही जाए जिन्होंने अपना एक मुकाम बनाया है और प्रेरक रहे हैं। आज के बदलते दौर में जहाँ सफलता की पूजा होती है, वहीं जरूरी है कि हम उन लोगों की भी बात करें जिन्होंने सफलता की इमारत की बुनियाद रखी। समय कुछ ऐसा है कि आज नींव की ईंट ही गुम हो जाती है। ऐसी स्थिति में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इन लोगों को सामने लायें क्योंकि अगर नींव ही न हो तो महलों को ढहते देर नहीं लगेगी। इसी सोच के साथ नववर्ष पर अपराजिता एक नयी पहल करने जा रही है जिसका नाम नींव की ईंट है। हम मुलाकात के तहत जहाँ नयी और स्थापित प्रतिभाओं को हमेशा की तरह सामने लाएंगे, वहीं समय – समय पर नींव की ईंट स्तम्भ के तहत ऐसे लोगों से भी आपकी मुलाकात करवाएंँगे या उनकी कहानी बताएंगे जिन्होंने एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत की। आज नींव की ईंट के तहत हम आपकी मुलाकात राजन – साजन मिश्र के पं.  राजन मिश्र से करवाने जा रहे हैं जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के माधुर्य को प्रसारित करने के लिए जाने जाते हैं –

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित राजन-साजन मिश्र का नाम बेहद आदर से लिया जाने वाला नाम है। बनारस घराने की गूँज को विश्‍व तक ले जाने में इन भाइयों का महत्वपूर्ण योगदान है। संगीत को विश्‍व शांति का माध्यम मानने वाले राजन – साजन मिश्र ने भैरव से भैरवी तक’ की यात्रा आरम्भ की है। इसकी शुरुआत कला की समृद्ध भूमि बनारस से 18 नवंबर 2017 से हुई है जो अहमदाबाद और कोलकाता से होते हुए ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोपीय देशों तक जारी रहेगी। 7 जनवरी को कोलकाता के जोड़ासांको में होने वाले इस कार्यक्रम के सिलसिले में पद्मभूषण पंडित राजन मिश्र महानगर आए जहाँ हमने उनसे संगीत की दुनिया को लेकर बात की, पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश –

संगीतमय बचपन बीता

हमारी तो आँखें ही संगीत के बीच खुली। हम बनारस के कबीर चौरा मोहल्ले में रहते हैं जहाँ कबीर का स्थान है। वहीं बड़े – बड़े कलाकार रहते हैं। जब आँख खुली तो हर जगह स्वर लहरियाँ गूँज रही थीं। कहीं तबले, तो कहीं नृत्य, कहीं सितार की आवाज, कहीं सारंगी की आवाज, संगीतमय बचपन जीता। 4 -5 साल की उम्र से गंडाबंधन पंडित बड़े रामदास जी से हो गया और तब से शिक्षा शुरू हो गयी और अब तक चल ही रही है।

बनारस से रिश्ता मजबूत है

समय के साथ तो बदलाव आता ही है। बहुत से लोग इधर – उधर चले गये। हम भी स्थायी तौर पर दिल्ली रहने लगे मगर बनारस से नाता टूटा नहीं है। हर एक -दो महीने पर बनारस जाते हैं, वहाँ हमारा अपना निवास स्थान है। गुरु लोगों का स्थान है, वहाँ जाकर माथा टेकते हैं।

बॉलीवुड गीत बाजार के दबाव में बनते हैं

80 और 90 के दशक तक जो फिल्मी गाने बने….उसे हम 50 बार भी सुनें तब भी अच्छे लगते हैं क्योंकि उस जमाने के संगीत निर्देशक पार्श्‍व गायक होते थे। वो सब शास्त्रीय संगीत सीखे हुए होते हैं। अब बैजू बावरा के गाने, झनक – झनक पायल बाजे के गाने और मुगले आजम के गाने सालों बाद आज भी कर्णप्रिय लगते हैं। बाजार का दबाव है कि लोगों को वैसे गीत बनाने पड़ते हैं। एक बार कविता कृष्णमूर्ति के साथ यात्रा कर रहे थे हम, तब उन्होंने ये बात बतायी कि संगीत निर्देशक अगर अच्छे और कर्णप्रिय गाने बनाना चाहते हैं मगर निर्माताओं का नजरिया कुछ अलग होता है और वे हर किसी की पसन्द को ध्यान में रखकर ऐसे गीत बनवाना चाहते हैं जिन पर लोग थिरक सकें।

नाना पाटेकर निभा सकते हैं हमारा किरदार

हमने एक फिल्म की थी सुर संगम, जो तमिल फिल्म की रीमेक थी। इस फिल्म में 11 गाने हमने गाए। उसमें हमारा लता जी, अनुराधा पौंडवाल जी और कविता जी के साथ गाना है। बहुत अच्छी फिल्म बनी थी। वह फिल्म गुरु शिष्य परम्परा पर बनी थी और एक शास्त्रीय संगीतज्ञ के व्यक्तित्व पर फिल्म बनी है। तब बॉलीवुड का अनुभव लेने का मौका मिला। बीच में माटी नाम की फिल्म में संगीत दिया था। एक फिल्म निर्माता -निर्देशक के मतभेद में बंद पड़ी है, उसमें सोनू निगम, श्रेया घोषाल और आकृति कक्कड़ के साथ गाने हैं और वे रिकॉर्ड हो चुके हैं। नाना पाटेकर हमारा किरदार निभा सकते हैं।

युवाओं को संदेश

धैर्य, श्रद्धा और विनम्रता से युवा अपने सपने पूरे कर सकते हैं।

 

हिंदी पुस्तकों में प्राण बसते थे श्रीराम तिवारी के

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कोलकाता : सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के पूर्व पुस्तकालयाध्यक्ष श्रीराम तिवारी के निधन पर भारतीय भाषा परिषद के भागीरथ कानोड़िया ग्रंथालय में आज एक शोक सभा की अध्यक्षता करते हुए विश्‍वभारती, शांतिनिकेतन की प्रोफेसर डॉ. मंजुरानी सिंह ने कहा कि श्रीराम तिवारी विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए ज्ञान का ठिकाना थे। वे बहुत सहृदय और सरल इन्सान थे। उनके निधन से हिंदी पुस्तकालय संसार की एक अपूरणीय क्षति हुई है। भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि श्रीराम तिवारी कॉलेज एवं विश्‍वविद्यालयों के विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन में बहुत बड़े सहयोगी थे। हिंदी पुस्तकों में उनके प्राण बसते थे।  उनकी जैसी सरलता और कर्मठता से ही हिंदी पुस्तकालयों में गतिशीलता आ सकती है। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने अपने शोक-संदेश में कहा कि श्रीराम तिवारी एक सच्चे हिंदी सेवी थे। ग्रंथालय के पाठकों ने उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। लम्बे समय तक सावित्री गर्ल्स कॉलेज में पुस्तकालयध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं देने वाले श्रीराम तिवारी का निधन मष्तिष्क ज्वर से 71 वर्ष की आयु में गत 27 दिसम्बर को हो गया था।

अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है

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नया साल, नयी उम्मीदों का साल। पुरानी स्मृतियों से सीखने की सीख देता नया साल। हिंसा, कड़वाहटों और निराशा के बीच नये साल का आगमन उम्मीदें भरता है और इनको पूरा करने की जिम्मेदारी भी है। गुजरा साल हिंसा, कड़वाहटों, शिकायतों और रक्त से भरा रहा…..इस साल ऐसा बिलकुल न हो…इसकी तो कल्पना हम नहीं कर सकते मगर थोड़ा प्रेम, संवेदना, सहानुभूति की कोंपल तो हम अपने हृदय में रख ही सकते हैं..इनको पुष्पित पल्लवित होने दें…तो क्या एक सुन्दर दुनिया बनाना इतना कठिन कार्य होगा?

इस समय तो न जाने कितनी नाराजगी भरी है…थोड़ी हमारे अन्दर और थोड़ी आपके भीतर…इन शिकायतों और नाराजगी को हम सृजनात्मक रूप भी तो दे सकते हैं।

 

पता है कि अभी यह यूटोपिया ही है मगर यूटोपिया भी सच में बदल सकती है…जरूरत शुरुआत करने की है….अगर टूटी सड़कों से शिकायत है तो सरकार का इन्तजार करने की जगह हम और आप मिलकर बना दें…क्योंकि टूटी सड़कों से हमको और आपको गुजरना है। बच्चों को सरकार सीट नहीं देती तो हम और आप उनको बसों में बैठा सकते हैं। कहने को छोटी –छोटी बातें हैं मगर बड़े बदलावों की आधारशिला ऐसी ही छोटी बातों से होती है। नाराजगी है तो पास बैठाकर एक – दूसरे की बात सुनिए और सुनाइए…यह जरूरी है क्योंकि अंततः हमें ही एक दूसरे का हाथ थामना है..तमाम शिकायतों और नाराजगी के बीच। अपराजिता की ओर से

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं….नव वर्ष ही नहीं पूरा साल मंगलमय हो…..सुस्वागतम 2018

बाल विवाह के मामलों में आयी कमी : सरकार

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नयी दिल्ली : सरकार ने कहा कि एक सर्वेक्षण के अनुसार 20-24 वर्ष के आयु वर्ग की ऐसी महिलाएं जिनका बाल विवाह हुआ था, उनका प्रतिशत 2014-15 में घटकर 26.8 फीसदी रह गया, जो 2005-06 में 47.4 प्रतिशत था।

महिला एवं बाल कल्याण राज्य मंत्री वीरेन्द्र कुमार ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में यह बात सामने आयी है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार लड़के-लड़कियों में 0-9 वर्ष के आयुवर्ग में कोई विवाह नहीं हुए थे। उन्होंने कहा कि कम आयु में विवाह लड़के-लड़की दोनों के लिए हानिकारक है तथा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए कदम उठा रहा है।

उन्होंने 2011 की जनगणना के आंकड़ों के हवाले से बताया कि बाल विवाह के मामले में राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल और झारखंड उच्च प्रतिशत के साथ शीर्ष पर हैं।

 

हिमाचल के नए सीएम ने करीब से देखी है गरीबी

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हिमाचल के मुख्यमंत्री बने जयराम ठाकुर ने बहुत करीब से गरीबी देखी है। वे प्रदेश के 13वें मुख्यमंत्री बनेंगे। जयराम ठाकुर का जन्म 6 जनवरी 1965 को मंडी जिले की थुनाग तहसील के तांदी गांव में राजपूत परिवार में हुआ है।

उनकी शिक्षा बगस्याड़ से हुई है। जेठूराम और ब्रिकमू देवी के घर में जन्मे जयराम ठाकुर का बचपन बेहद गरीबी में कटा है।

परिवार में तीन भाई और दो बहनें हैं। पिता खेतीबाड़ी और मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते थे। जयराम तीन भाइयों में सबसे छोटे हैं।

इसलिए उनकी पढ़ाई-लिखाई में परिवार वालों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कुराणी स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद बगस्याड़ से उच्च शिक्षा लेकर वे मंडी आ गए।

मंडी कॉलेज से बीए करने के साथ एबीवीपी और संघ से जुड़कर कार्य करते रहे। 1986 में एबीवीपी के जॉइंट सेक्रेटरी रहे। 1989-93 तक भाजयुमो के स्टेट सेक्रेटरी रहे।

जम्मू-कश्मीर जाकर एबीवीपी का प्रचार किया और 1992 में घर लौटे। वर्ष 1993 में जयराम को भाजपा ने सिराज विधानसभा क्षेत्र से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा।

जयराम यह चुनाव हार गए थे। घरवालों ने जयराम का राजनीति में जाने का विरोध किया था। जयराम ठाकुर के बड़े भाई बीरी सिंह बताते हैं कि परिवार के सदस्यों ने जयराम ठाकुर को राजनीति में न जाकर खेतीबाड़ी संभालने की सलाह दी थी।

इसकी वजह परिवार की आर्थिक तंगी थी। जयराम ठाकुर अपने दम पर राजनीति में डटे रहने का निर्णय लिया और विस चुनाव लड़ा।

उस वक्त वे महज 26 वर्ष के थे। यह चुनाव जयराम ठाकुर हार गए। 1998 में भाजपा ने फिर जयराम ठाकुर को चुनावी रण में उतारा। इस बार जयराम ने जीत हासिल की। इसके बाद कभी हार का मुंह नहीं देखा।

वर्ष 1995 में उन्होंने जयपुर की डॉ. साधना सिंह से शादी की। जयराम ठाकुर की दो बेटियां हैं।

वे एक बार सिराज मंडल भाजपा के अध्यक्ष, एक बार प्रदेशाध्यक्ष, राज्य खाद्य आपूर्ति बोर्ड के उपाध्यक्ष और कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। 2006-09 तक जयराम के प्रदेशाध्यक्ष रहते भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी।

जयराम ठाकुर की 79 वर्षीय मां बिक्रमू देवी बेटे की इस उपलब्धि पर फूली नहीं समा रही हैं। पूछने पर प्रसन्न आवाज में कहती हैं – मेरा बेटा सीएम बन गया। काश उसके पिता बेटे का इतना बड़ा राजनीतिक कद देखने के लिए जिंदा होते।

मजदूरों की तरह मेहनत कर मेरे पति ने इस परिवार को अपने कंधों पर खड़ा किया है। जयराम के पिता जेठूराम का देहांत 25 दिसंबर, 2016 को हुआ था। उनकी मां कहती हैं कि इस परिवार ने बड़ी गरीबी देखी है। छोटी भाभी कहती हैं कि उनके ससुर काष्ठकुणी शैली के कारीगर थे। उन्होंने बैहली (लकड़ी को छीलने वाला यंत्र) से परिवार का बोझ उठाया है। सिराज विस क्षेत्र के लोग सीएम की ताजपोशी की खबर सुनते ही चहक उठे हैं।

 

आईएएस अफसर ने महिला को मिलवाया 50 साल पहले बिछड़े परिवार से

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निजी स्वार्थों और ढीले रवैये से ब्यूरोक्रेसी लालफीताशाही बनती जा रही है। लेकिन ब्यूरोक्रेसी की गिरती साख के बीच ऐसी कुछ खबरें दिख जाती हैं जो नौकरशाहों की नीयत पर फिर से यकीन पुख्ता कर देती हैं। यह कहानी आईएएस अधिकारी डॉ प्रीति गोयल के प्रयासों के बारे में है, जो एक परिवार के लिए बन गईं रियल लाइफ बजरंगी भाईजान। प्रीति ने अनीता नाम की एक महिला को उसके परिवार से 50 सालों बाद मिलवा दिया। बेहतर भारत का निर्माण सकारात्मकता पर आधारित है। प्रीति गोयल पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में एसडीओ के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने बचपन से अपने पड़ोस में रहने वाली अनीता के मुंह से सुना था कि 1967 में पहले वह नागालैंड से आर्मी के एक ऑफिसर से शादी कर पंजाब आ गई थी। उस समय उनकी उम्र करीब 14 साल की थी। अनीता नागालैंड में अंगामी जनजाति की थीं।

उन्होंने 1967 में सेना के सैनिक वकील चंद सिंह को शादी कर ली, जिन्हें नागालैंड में तैनात किया गया था। वर्ष 1971 में अनीता अपने पति के साथ पंजाब में चली गईं और कभी भी नागालैंड में कभी वापस नहीं गईं। चंदसिंह सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद एक छोटा सा वस्त्र व्यापार शुरू किया। बाद में उनका निधन हो गया। अनीता अब बिल्कुल अकेली हो गई थीं। उन्हें मां बाप की याद सताने लगी जिनको उन्होंने वर्षों पहले छोड़ दिया था। अफसोस की बात ये थी, वह अपने अतीत के बारे में कुछ याद नहीं कर पा रही थीं। उन्हें बस अपने पिता का नाम याद था और एक सिनेमा हॉल की अस्पष्ट स्मृति थी। उनके मुताबिक ये सिनेमाहॉल उनके घर के करीब ही था।

अनीता के दो बेटों ने भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, डीएनए की सूचना दी। प्रीति अनीता के पड़ोसी थीं और अनीता से उनकी कहानियों और उनके परिवार के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। वह अनीता की इच्छा को पूरा करने के लिए बाहर निकलीं और नागालैंड में अनीता और उनके परिवार को फिर से एकजुट करने की मुहिम पर लग गईं। 2014 में आईएएस अधिकारी प्रीति ने नागालैंड में अनीता के परिवार के सदस्यों की खोज शुरू की। दो साल बाद, असफल प्रयासों के बाद, आखिरकार प्रीति नागालैंड में अनीता के परिवार के साथ संपर्क स्थापित करने में कामयाब हो गईं। प्रीति ने अनीता के परिवार को खोजने के लिए अपने सभी संसाधनों और उसके पूरे नेटवर्क का इस्तेमाल किया।

पहली सफलता तब हासिल हुई, जब नागालैंड में एक अंगाइ जनजाति के पुलिस निरीक्षक से प्रीति ने संपर्क किया। पुलिस निरीक्षक ने तुरंत लोगों को जुटाया और एक फोन कॉल करवाया, फिर एक वीडियो कॉल की व्यवस्था की। अनीता और उसके परिवार वालों ने जब 50 साल बाद फोन पर बात की तो वह 15 मिनट तक रोती रहीं क्योंकि 50 साल तक एक दूसरे को नहीं देखने के कारण शब्द भी शायद मूक हो गए थे। अनीता गोयल की पोती कामिनी सिंगला प्रीति गोयल को अपने जीवन की रियल बजरंगी भाईजान मानती है. जिन्होंने उसकी दादी को उनके 50 साल से बिछड़े परिवार से मिलाया। दोनों पक्ष के संतुष्ट हो जाने के बाद, अनिता पंजाब से नागालैंड आ गईं।

(साभार – योर स्टोरी)

 

पल्लवी फौजदार, जो बाइक राइडिंग में बना चुकी हैं कई विश्व रिकॉर्ड

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पल्लवी फौजदार का नाम लिम्का बुक आफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है। दो बच्चों की मां पल्लवी की सबसे बड़ी ताकत उनका परिवार है। पति परीक्षित मिश्रा सेना में अधिकारी हैं। जबकि पल्लवी बाइकर के अलवा बेंगलुरू में बतौर फैशन डिजाइनर काम कर चुकी हैं। वे समाजसेवी और रेकी विशेषज्ञ भी हैं।

वे अपनी बाइक से विश्व की सबसे ऊंची झील में से एक देवताल (17950 फुट) तक भी पहुंच चुकी हैं। वे 6502 मीटर ऊंचे साताटोला दर्रे पर भी बाइक से जा चुकी हैं। इसके अलावा पल्लवी हिमालय के बर्फीले पहाड़ों की 5 हजार मीटर की ऊंचाई के 9 दर्रों और 19323 फीट ऊंचाई वाले उमलिंगला पर पहुंचने वाली पहली बाइकर हैं।
इससे पहले वे 18774 फीट की ऊंचाई वाले मानापास तक भी पहुंची हैं। इसी साल उन्हें भारत सरकार के नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है।