Saturday, April 4, 2026
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हिन्दी कहानी जगत के चार में से दूसरे यार दूधनाथ सिंह का निधन

हिन्दी कहानी जगत ‘‘चार यार’’ के नाम से मशहूर लेखकों में शामिल वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ सिंह का निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे।

पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि दूधनाथ सिंह पिछले कुछ समय से बीमार थे। वह प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त थे। उनका निधन इलाहबाद के एक निजी अस्पताल में हुआ। उनका अंतिम संस्कार आज इलाहाबाद में हुआ था। सिंह का जन्म 17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोबंथा में हुआ। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, संस्मरण, कविता, आलोचना, संपादन आदि विधाओं में अपना रचनाकर्म किया।

हिन्दी कहानी में दूधनाथ सिंह ‘चार यार’ में शामिल थे। इसके अन्य तीन कहानीकार रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन और काशीनाथ सिंह हैं। कालिया का भी निधन हो चुका है।

दूधनाथ सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया और यहीं वह हिंदी के अध्यापक नियुक्त हुए। 1994 में सेवानिवृत्ति के बाद से लेखन और संगठन में निरंतर सक्रिय रहे। उनका अंतिम उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ काफी चर्चित रहा। उनके अन्य उपन्यास ‘निष्कासन’ एवं ‘नमो अंधकारम्’ हैं।

उनके कहानी संग्रहों में ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखांत’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’, ‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’, ‘जलमुर्गिर्यों का शिकार’ शामिल हैं। ‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए (लंबी कविता)’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘एक अनाम कवि की कविताएँ’ उनके कविता संग्रह हैं। उन्होंने ‘यमगाथा’ नाम से एक नाटक लिखा था।

उन्होंने ‘निराला : आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध : साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ’ आदि आलोचना ग्रन्थ भी लिखे। सिंह को उत्तर प्रदेश के शीर्ष सम्मान भारत भारती से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें भारतेंदु सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान, कथाक्रम सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

पीएम मोदी बने विश्व के तीसरे बड़े लोकप्रिय नेता, ट्रंप और जिनपिंग को पछाड़ा : सर्वे

पीएम मोदी देश ही नहीं दुनिया में लोकप्रिय हैं और यह बात हम नहीं बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे बताता है। इस सर्वे के अनुसार पीएम मोदी ने चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पछाड़ दिया है और दुनिया के तीसरे बड़े नेता बन गए हैं। गैलप इंटनरनेशल द्वारा यह सर्वे दुनिया के 50 देशों में किया गया था।

इस सर्वे में इन देशों के लोगों से अलग-अलग सवाल पूछे गए थे और उनसे मिले जवाबों के आधार पर गैलप ने पीएम मोदी को विश्व नेताओं के सर्वे में तीसरे स्थान पर रखा है। सर्वे में पहले नंबर पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुल मैक्रों और दूसरे नंबर पर जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल हैं। सर्वे में मैक्रों को 21, मर्केल को 20 और पीएम मोदी को 8 अंक मिले हैं।

इस सर्वे के लिए जिस तरीके का उपयोग किया गया उसमें गैलप ने अलग-अलग देशों के तहत कुल 53 हजार 769 लोगों ने अपनी राय दी है। सर्वे में 30 प्रतिशत लोगों ने पीएम मोदी के पक्ष में राय दी जबकि 22 प्रतिशत विपक्ष में थे। सर्वे में चौथे स्थान पर ब्रिटिश पीएम थेरेसा मे हैं वहीं पांचवे नंबर पर चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग हैं। इनके अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सर्वे में 11वें स्थान पर रहे।

किसान को बचाना, खुद को बचाना है, जिम्मेदारी सरकार की ही नहीं हम सबकी है

इस देश में कृषि और कृषक हमेशा से ही महत्वपूर्ण मगर उतने ही उपेक्षित और शोषित रहे हैं। हम उन बड़े किसानों की बात नहीं कर रहे जो सम्पन्न हैं मगर उनकी तादाद भी कम है। देश के हर कोने में किसान परेशान है, वह मर रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। सोशल मीडिया पर कृषक विमर्श की बाढ़ आ गयी है मगर यह सारा विमर्श आरोप – प्रत्यारोप में सिमट कर रह गया है। हर किसी ने अन्नदाता को अपने हिसाब से इस्तेमाल किया है। मुमकिन है कि दिल्ली में तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन को लेकर आप सवाल उठाएं मगर आप उन कठिनाइयों और कटु सत्य से मुँह नहीं मोड़ सकते और न ही शहर में रहकर परिस्थिति को समझा जा सकता है। माँग ऋणमाफ करने की हो रही थी मगर न तो यह कृषकों की समस्याओं का स्थायी समाधान है और न ही अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत ही है। बावजूद इसके हर चुनाव के पहले ऋणमाफ करने को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। स्थिति को सुधारने के लिए केन्द्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, यह मानने के बावजूद राज्य की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती। प्रदर्शन और ऋणमाफी से आगे बढ़कर ठोस नीतियों की जरूरत है कि निचले स्तर तक इन नीतियों का लाभ पहुँचे और इसमें सरकार की ही नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत, शिक्षाक्षेत्र से लेकर हम सबकी जिम्मेदारी है। ऐसा क्यों लग रहा है कि कृषि को महत्वपूर्ण मानने के बावजूद उद्योग की तुलना में उसे दोयम दर्जे का बनाया जा रहा है? हम किसानों के लिए रोते हैं और जब गाँवों के विकास को सरकार प्रमुखता देती है तो उस पर हाय – तौबा मचाने वाले भी हम ही होते हैं। जी हाँ, शहरों की शिक्षित और परिष्कृत जनता जो बहुरराष्ट्रीय कम्पनियों के मॉल से सब्जियाँ खरीदती है मगर पास जमीन पर बैठे दूर – दराज के गाँवों से आए एक कृषक से सब्जी या अनाज खरीदना उसकी शान के खिलाफ है। मनमानी कीमतों पर ब्रांडेड दाल, सब्जियाँ और फल खरीदने वाले लोग मोलभाव करते हैं और सोशल मीडिया पर आँसू बहाते हैं। खेती विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए महज एक प्रोजेक्ट वर्क है जिससे जरिए वे कुछ दिनों के लिए शहरों से ऊब कर गाँवों में जाते हैं मगर गाँवों में बसकर कृषि क्षेत्र के लिए कोई काम नहीं करना चाहता। आखिर ऐसे शोध क्यों नहीं हो रहे हैं जो कृषकों की मेहनत कम कर उसका उत्पादन बढ़ा सके और इसे एक बाजार उपलब्ध करवाए? कृषि से संबंधित इंजीनियरिंग, पशुओं को स्वस्थ रखने और दुधारू मवेशियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसी भी क्षेत्र में कितने लोग काम कर रहे हैं या अभिभावक कहाँ तक बच्चों को गाँवों में जाने या बसने की अनुमति दे रहे हैं? खुद युवा पीढ़ी क्या गाँवों में जाना चाहती है या गाँवों को बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहती है? क्यों सरकार जब पोस्टिंग किसी गाँव में करती है तो आन्दोलन और घेराव शुरू हो जाता है? कटु सत्य यह है कि सरकारी नौकरी प्राथमिकता इसलिए है क्योंकि वहाँ तय मोटा वेतन है और यह धारणा है कि आरामदायक जीवनशैली भी मिलेगी। अगर ऐसा है तो हर बात के लिए सरकार को दोष देना कहाँ तक सही है? आज किसान मर रहे हैं तो भागीदारी हमारी भी है। कॉरपोरेट क्षेत्र चाहें तो कृषि से सम्बन्धित उद्योगों से इस देश के कृषि और प्राकृतिक संसाधनों को नया जीवन दे सकते हैं। आप पतंजलि का मजाक उड़ा सकते हैं मगर सत्य तो यही है कि पतंजलि ने कृषि को बड़ी सहायता दी है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश हर काम के लिए सरकार पर क्यों निर्भर है? क्या हम हर बात के लिए राजनेताओं और सरकारों पर निर्भर नहीं होते जा रहे? दोहरापन कहीं और नहीं हमारे भीतर है।

उपेक्षा, हिंसा, राजनीति और हिंसक आन्दोलन में फँसा विकास को तरसा पहाड़

भारत बेहद खूबसूरत देश है और इस देश की खूबसूरती इसकी विविधता में है। विविधता में एकता का संदेश इस देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है मगर आज इस संदेश को कोई समझने को तैयार नहीं है। कश्मीर में पत्थर चल रहे हैं तो अब तक बंगाल का हिस्सा रहा दार्जिलिंग जल रहा है। पहाड़ मुस्कुराना चाहता था मगर ऐसा लगता है जैसे वह अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहा है और यह लड़ाई हिंसक हो उठी है। जरा से सामंजस्य से जिस मसले को सुलझाया जा सकता था, वह सियासत की मेहरबानी से नासूर बन चुका है। देश की रक्षा में जान देने वाले गोरखा आज आत्मदाह की बात कर रहे हैं। अब वे गोरखालैंड की माँग पर दिल्ली में आमरण प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। देखा जाए तो आन्दोलन के तरीके की आलोचना की जा सकती है मगर इसके लिए जिम्मेदार सरकार ही नहीं कहीं न कहीं भारत की मुख्यधारा वाली मानसिकता ही है जो हर गोरखा को नेपाली समझती है। उत्तर – पूर्वी राज्यों के हमारे भाई – बहन, बहादुर, चाउमिन, चीनी, मैगी जैसे नामों से पुकारे जाते हैं। याद है कि पिंक में उत्तर – पूर्वी भारत की एक किरदार कहती है कि उसे किस तरह विकसित कहे जाने वाले शहरों में उत्तर – पूर्वी होने के कारण मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। यह एक कटु सत्य है कि उत्तर – पूर्वी और पहाड़ जैसे क्षेत्रों में न तो विकास पूरी तरह पहुँचा है और न ही उनको वैसी स्वीकृति है, जो कि भारत के अन्य राज्यों में प्राप्त है।

जहाँ तक मेरी समझ है तो इस समस्या की जड़ ही यही है कि हमने कभी भी इन क्षेत्रों की संस्कृति, भाषा और जीवनशैली का सम्मान नहीं किया। किसी भी राज्य की अपनी पसन्द या नापसन्द हो ही सकती है मगर उसे कोई अधिकार नहीं है कि वह अपनी मान्यता को उन क्षेत्रों पर जबरन थोपे जो उनकी संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं। क्षमा कीजिए मगर मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ कि बंगाल में होने के कारण मुझे बांग्ला या कोई और भाषा समझनी चाहिए जो मेरे मानस में नहीं है। ये सही है कि किसी भी भाषा की जानकारी सम्बन्धित राज्य में रहते – रहते हो जाती है, जीवनशैली और अपनी आवश्यकता के आधार पर भाषा सीखी जा सकती है मगर कोई मेरी भाषा की उपेक्षा कर बलात अपनी संस्कृति थोपना चाहेगा तो वह स्वीकार नहीं किया जा सकता।<strong> अपराजिता की पड़ताल इस बार इसी गोरखालैंड की माँग को लेकर है जो समस्या बना दी गयी है।  </strong>भाषा का प्रसार होना अच्छी बात है मगर आप उसे थोप नहीं सकते, उसे इस लायक बनाइए कि वह अपनी स्वीकृति खुद प्राप्त करे। गोरखालैंड और गोरखालैंड आन्दोलन का इतिहास बहुत पुराना है। अगर इस देश में विकास और भाषा का हवाला देकर छत्तीसगढ़, झारखंड और तेलगांना जैसे राज्य नहीं बनते तो गोरखालैंड की माँग अनुचित कही जा सकती थी मगर इस देश में ये सारे राज्य सिर्फ भाषायी और सांस्कृतिक राजनीति के आधार पर बने। गोरखालैंड की माँग उठती नहीं बल्कि खत्म हो सकती थी, अगर उसे समानता, विकास और भाषायी स्वतंत्रता के साथ रहने का अवसर दिया जाता मगर ऐसा नहीं हुआ। जरूरत इस बात की है कि वहाँ के लोगों के साथ राजनीति नहीं की जाए बल्कि उनको समझाया जाए क्योंकि अलग होना विकास की गारंटी नहीं है। इसके लिए आपको अपनी नीति बदलनी होगी, नजरिया बदलना होगा और इस समस्या को सुलझाने के तरीके बदलने होंगे। बांग्ला को थोपने की जिद छोड़नी होगी। दीदी, आप अपनी खुन्नस का ठीकरा चीन और पाकिस्तान के सिर पर नहीं मढ़ सकतीं क्योंकि ये सब आपकी विभाजक राजनीति के कारण हुआ है। जातियों के आधार पर अलग – अलग बोर्ड बनाकर आपने पहाड़ को बाँटा मगर गोरखा आपकी राजनीति समझ गए और एक गलती का नतीजा पूरा बंगाल भुगत रहा है। जरूरी है कि बंगाल और समूचे देश के बुद्धिजीवी, संस्थाएँ और खुद सरकार गोरखाओं को सम्मान दें जिसके वे हकदार हैं।

सीएम ममता कहती हैं कि  गोरखालैंड आदोलन को चीन का समर्थन प्राप्त है मगर उनके इस बयान को गोजमुमो (गोरखा जनमुक्ति मोर्चा) के महासचिव विनय तमाग ने सिरे से खारिज करते हुए सरकार की बौखलाहट बताया। उन्होंने कहा कि आदोलन का एकसूत्री एजेंडा गोरखालैंड राज्य का गठन है। इसके लिए हम किसी तरह के समझौते को तैयार नहीं हैं। इसको लेकर प. बंगाल सरकार में बौखलाहट है। इसकी पुष्टि मुख्यमंत्री के बयान से होती है। केंद्र सरकार हमारे आदोलन पर नजर रखे है। हंमारी सेना में गोरखा रेजिमेंट है, गोरखाओं के आन्दोलन के तरीके की आलोचना हो सकती मगर हम उनको अलगाववादी नहीं कह सकते और न ही कश्मीर के पत्थरबाजों से उनकी तुलना कर सकते हैं। यदि मुख्यमंत्री के बयान में तनिक सच्चाई होती तो हमारे उपर अभी तक कार्रवाई हो चुकी होती। हम भारतीय हैं। गोरखा राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं। उन पर राष्ट्रद्रोही होने का आरोप मुनासिब नहीं है। गोरखालैण्ड की मांग करने वालों का तर्क है कि उनकी भाषा और संस्कृति शेष बंगाल से भिन्न है। गोरखालैण्ड की यह मांग हड़ताल, रैली और आंदोलन के रूप में भी समय-समय पर उठती रहती है।गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में गोरखालैंड के लिए दो जन आंदोलन (१९८६-१९८८) में हुए। इसके अलावा गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेतृत्व में (२००७ से अब तक) कई आंदोलन हुए। इस बार भी यह आन्दोलन हिंसक हो चुका है। सरकारी सम्पत्तियों को लगातार नुकसान पहुँचाया जा रहा है। विरोधी पार्टियों के कार्यालय फूँके जा रहे हैं जिसका समर्थन कतई नहीं किया जा सकता। इस समस्या की जड़ तक जाने के लिए जरूरी है कि इस क्षेत्र और गोरखालैंड की माँग का इतिहास समझा जाए।

भारतीय भाषाओं और अपनी बोलियों को सम्मान देकर ही देश की अपनी राष्ट्रभाषा बनेगी हिन्दी

दक्षिण भारत& जिसकी संस्कृति उत्तर भारत से अलग है जहाँ इस देश की राजभाषा को राजनीति ने अवांछनीय बना दिया है। दक्षिण भारत जिसका उसी अवांछनीय हिन्दी से एक रिश्ता है दिल का रिश्ता साहित्य का रिश्ता&#8230;और वह रिश्ता अपनापन खोज रहा है। आजतक क्या हमने सुना है कि राजनीति ने कभी एक किया हो? उसने तो हमेशा बाँटा है&#8230;.एक तो हमेशा संस्कृति ने किया है&#8230;भाषा कभी अलग नहीं करती&#8230;वह तो जोड़ती है। जरूरत बस हृदय से अपनाने की है। हम कहते हैं कि दक्षिण भारतीय भाषाएँ या यूँ कहें कि समस्त भारतीय भाषाएँ इस देश की भाषाएँ हैं&#8230;दक्षिण वाले हिन्दी को अपना नहीं समझते&#8230;.जरा सोचिए तो क्या आपने कभी उनको अपनाया है या सीखने की कोशिश की है। अगर की भी है तो उसमें भी जरूरत है या फिर मजबूरी&#8230;यही समस्या दक्षिण भारत की भी है और इसी को लेकर राजनीति भी हो रही है।

पिछले कई दिनों से कर्नाटक में हिंदी-विरोधी आंदोलन चल रहा है। रेल्वे स्टेशनों पर लगे हिंदी नामपटों को पोता जा रहा है। कर्नाटक के लिए एक अलग झंडे की मांग की जा रही है। अभी अलग झंडे की मांग को तो दरी के नीचे सरका दिया गया है, क्योंकि कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार इसका खुला समर्थन नहीं कर सकती। यदि मुख्यमंत्री सिद्धरमैया किसी क्षेत्रीय पार्टी में होते तो इस मांग को वे हाथोंहाथ उठा लेते लेकिन हिंदी-विरोध का कर्नाटक में कोई विरोध नहीं कर रहा है। न तो सत्तारुढ़ कांग्रेस, न सत्ताकांक्षी भाजपा और न ही पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा का जनता दल !  कोई आश्चर्य नहीं कि यह हिंदी-विरोधी आंदोलन दक्षिण के अन्य राज्यों में भी जोर पकड़ ले। एक तरह से यह केंद्र के विरुद्ध दक्षिण के सभी विघ्नसंतोषी राज्यों को एक कर दे सकता है।

जरा सोचिए कि क्या वजह है कि जिस भाषा ने, जिस देश ने हमें 200 साल तक गुलाम बनाए रखा, वह भाषा आज भी राज कर रही है, वह इन राज्यों के लोगों के हृदय में विराजमान है&#8230;क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत एक दूसरे की भाषाओं को अपना ले। अँग्रेजी हो&#8230;जरूर हो&#8230;हमें सारी दुनिया से जुड़ना है मगर कोई पड़ोसी जिस तरह माँ और मौसी का विकल्प नहीं हो सकता, उसी तरह अँग्रेजी कभी भी हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा का विकल्प नहीं हो सकती। हम अँग्रेजी किसी भी अन्य विषय की तरह ही पढ़ेंगे&#8230;.जरूर पढ़ेंगे&#8230;.मगर प्राथमिकता अपनी भाषा ही होगी। अगर हम चाहते हैं कि लोग हिन्दी को अपनाएँ तो हमें स्थानीय भाषाओं को अपनाना चाहिए। इन भाषाओं का साहित्य हिन्दी में अधिक से अधिक उपलब्ध हो और हिन्दी के तुलसीदास, सूरदास&#8230;.अनुदित होकर तमिल या तेलगू में पहुँचें&#8230;..पाठ्यक्रम तक ले जाइए। हम रवीन्द्रनाथ को हिन्दी में पढ़ते हैं तो प्रेमचन्द, बिहार, आचार्य शुक्ल और अज्ञेय तमिल, तेलगू और कन्नड़ में पढ़ाएँ जाएँ। हम दोनों एक दूसरे के पूरक बने तो कोई अँग्रेजी हमें नहीं तोड़ सकती। अगर किसी राज्य में उसकी भाषा प्रथम स्थान पर है तो हिन्दी को दूसरी भाषा बनाइए मगर मामला अगर देश का हो तो हिन्दी को स्वीकार कीजिए&#8230;.। आपसी समझ और समन्वय ही समस्या का समाधान है।

अगर हिन्दी को देश के हर कोने में जाना है तो उसे साबित करना होगा कि वह जोड़ने की क्षमता रखती है। अगर कोई मराठी मराठी लहजे में हिन्दी बोलता है तो उसका स्वागत कीजिए, अगर कोई बांग्ला के लहजे में बोलता है तो उसका उत्साह बढ़ाइए&#8230;अगर कोई मणिपुरी तरीके से बोलता है तो उसका सम्मान कीजिए, अगर कोई हिन्दी में डोगरी मिलाता है तो मिलने दीजिए, अगर किसी की हिन्दी में तमिल, तेलगू या कन्नड़ है तो गले लगाइए। इसी प्रकार सभी भारतीय भाषाएँ भी हिन्दी को खुद में समाहित होने दें। अपनी सहोदर और सहचर भाषाओं के साथ मिलकर हिन्दी समृद्ध ही होगी&#8230;.कम से ये बहनें हैं&#8230;.पड़ोसी नहीं है। मुझे अँग्रेजी और हिन्दी के हिंग्लिश से ये बेहतर यह जुगलबन्दी लगती है जिसका सुर मेरे देश का सुर बनाता है। अगर अँग्रेजी से लोहा लेना है तो हमें हिन्दी और भारतीय भाषाओं को एक साथ लाना होगा। आपको हिन्दी का प्रसार करना है तो बताइए कि स्थानीय भाषाएँ किसी एक राज्य में चल सकती हैं, कोई अँग्रेजी सीखे भी तो गाँवों तक नहीं पहुँच सकता मगर हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो संसद से सड़क तक, होटलों से गाँव की चौपाल तक आपका साथ देगी&#8230;और अपनेपन से देगी। यह सही है कि आज हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं है मगर हिन्दी देश को जोड़ने वाली भाषा है। नेताओं से मुद्दा छीनिए&#8230;.वह भाषा के नाम पर आन्दोलन खड़ा करें, उसके पहले ही उनके हाथ से भाषा छीनिए। वैसे भी कोई भी भाषा राजनीति के भरोसे आगे कभी नहीं बढ़ती, उसे जनता आगे बढ़ाती है, सरकार तो बस संरक्षण दे सकती है&#8230;.तो यह संरक्षण भी बराबरी का हो। हिन्दी के साथ 50 प्रतिशत राशि स्थानीय भाषाओं के विकास पर खर्च हो&#8230;.उनके विस्तार और प्रसार को भी प्राथमिकता मिले। अगर आप हाथ बढ़ाएँगे तभी कोई आपका हाथ थाम सकता है। दक्षिण में हमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम का डटकर समर्थन करना चाहिए। वहां रहने वाले हिंदीभाषियों को भी ये भाषाएं सीखनी चाहिए। उत्तर भारत के नेता जब दक्षिण में जाएं तो उन्हें उन्हीं भाषाओं के अपने भाषण देवनागरी में लिखवाकर बोलना चाहिए। दक्षिण के नेता हिंदी सीखते हैं या नहीं ? देवेगौड़ाजी हिंदी में लिखे भाषणों को बड़े चाव से पढ़ा करते थे। दिल्ली में रहते हुए अब वे थोड़ी-बहुत हिंदी बोल लेते हैं। दक्षिण भारत में जाकर आप अँग्रेजी नहीं बल्कि तमिल, कन्नड़, तेलगू और मलयालम बोलिए..और उसके बीच में हिन्दी भी डालिए। .उसी तरह उत्तर भारत आने वाले हिन्दी के साथ पंजाबी, मराठी, गुजराती, बांग्ला और भोजपुरी बोलें। ऐसा ही प्रयोग प्रशासनिक और विधानसभा या लोकसभा में हो।

राजनीतिक स्तर पर यदि कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्त्ता दक्षिण की भाषाओं का डटकर समर्थन करें और अंग्रेजी के नामपट पोतने लगें तो क्या होगा ? हिंदी को लाने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। वह अपने आप आ जाएगी। त्रिभाषा-सूत्र तत्काल खत्म करें और प्रांतीय भाषाओं को प्रथम स्थान दें तो अखिल भारतीय संपर्क हिंदी के बिना कैसे संभव होगा ? यदि हम प्रांतीय भाषाओं को सिर पर बिठाएं तो वे हिंदी को गोद में जरुर बिठाएंगी।

सच तो यह है कि वर्तमान में जिस प्रकार दक्षिण में हिंदी को रोजगारमूलक भाषा मानकर इसके प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। यदि उनकें राज्यों की जनता हिंदी सीख कर या मात्र बोलनें सुननें भर की क्षमता विकसित करके यदि अपनी व्यावसायिक निपुणता या पेशेवर दक्षता बढ़ा पाती है तो इसमें दोष क्या है? वोटों की खातिर क्षुद्र राजनीति करनें वाले इन हिंदी विरोधी नेताओं को समझना चाहिए कि दक्षिण भारत का शेष भारत की संस्कृति और भाषा के प्रति अपना आदरभाव का और विनम्र अनुगामी भाव  का अपना गरिमामय और आदरणीय इतिहास रहा है। उत्तर भारत के तीर्थों के प्रति अपनें पूज्य भाव के कारण यहाँ का सनातनी और हिन्दू समाज हिंदी भाषा सीखनें और माता पिता के गंगा स्नान करा लेनें को सदा उत्सुक रहा है!! हिंदी सीख लेनें की रूचि के आधार पर ही1918 में मद्रास में ‘हिंदी प्रचार आंदोलन’ को प्रारम्भ हुआ था और इसी वर्ष में स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन मद्रास कार्यालय  आगे चलकर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के रूप में स्थापित हुआ। बाद में तमिल और अन्य दक्षिणी राज्यों की जनता की भावनाओं का आदर करते हुए ही इस संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया।

वर्तमान में इस संस्थान के चारों दक्षिणी राज्यों में प्रतिष्ठित शोध संस्थान है, और बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय इस संस्थान से हिंदी में दक्षता प्राप्त कर हिंदी की प्राणपण से सेवा कर रहें हैं। इसी क्रम में केरल में 1934 में केरल हिंदी प्रचार सभा, आंध्र में 1935 में हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद और कर्नाटक में 1939 में कर्नाटक हिंदी प्रचार समिति, 1943 में मैसूर हिंदी प्रचार परिषद तथा 1953 में कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की स्थापना हुई। इन संस्थानों में लाखों छात्र हिंदी की परीक्षाओं में सम्मिलित व् उत्तीर्ण होतें हैं. तमिलनाडु में तथाकथित और पूर्वाग्रही विरोध के कारण भले ही शासकीय शिक्षण संस्थानों में हिंदी की उपेक्षा हो रही हो, किन्तु कई निजी संस्थानों में हिंदी की पढ़ाई जारी है, और इनकी परीक्षाओं में छात्रों की संख्या लाखों में रहती है। जनसामान्य में असंतोष है कि निजी विद्यालयों में पढ़नें वाले बच्चे तो हिंदी पढ़कर अपनी रोजगार की संभावनाएं प्रबल कर लेतें हैं किन्तु शासकीय विद्यालयों के विद्यार्थी हिंदी पीछे रह जातें हैं। दक्षिणी राज्यों में हिंदी को आजीविका का साधन विकसित करनें का एक प्रबल माध्यम माननें का ही परिणाम है कि यहाँ कई सेवाभावी संस्थाएं निःशुल्क हिंदी कक्षाओं का संचालन, लेखन, प्रकाशन, पत्रकारिता, गोष्ठियों का आयोजन निरंतर कराती रहतीं हैं। मुम्बईया हिंदी फिल्मों और हिंदी गीतों की लोकप्रियता के कारण भी हिंदी अब दक्षिणी राज्यों में एक सहज सामान्य रूप से बोली सुनी जानें लगी है। आज हैदराबाद, बैंगलूर तथा चेन्नई नगरों से दसियों बड़े और कई छोटे हिंदी समाचार पत्र प्रकाशित हो रहें हैं। यहाँ यह कतई न समझा जाए कि दक्षिण भारत में हिंदी का चलन कुछ दशकों की देन है! दक्षिण के सभी राज्यों में हिंदी का अपना दीर्घ और समृद्ध इतिहास रहा है, दो सौ वर्ष पूर्व भी केरल में ‘स्वाति तिरुनाल’ के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा राम वर्मा (1813-1846) ने हिंदी की कालजयी कृतियाँ रचीं थी जो वहां के जनजीवन में अब भी परम्परागत रूप से आदर पूर्वक बोली सुनी जाती हैं. दशकों पूर्व से कोचीन से मलयालम मनोरमा की ओर से ‘युग प्रभात’ नाम के अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक हिंदी पत्र  और हिंदी विद्यापीठ (केरल) से ‘संग्रथन’ मासिक पत्रिका और कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति की ओर से “हिंदी प्रचार वाणी” का प्रकाशन हो रहा है। हिंदी समर्थक पहल को वापिस लेनें के स्थान पर आज अधिक आवश्यक हो गया है कि दक्षिण के जनसामान्य की भावनाओं को न समझनें वालें और अनावश्यक हिंदी विरोध की राजनीति करनें वालों के प्रति कठोर रूख रखा जाए और ऐसे असंतोष उपजा रहे दक्षिणी नेताओं पर कठोरता से अंकुश भी लगाया जाए।

कहीं भी कोई क्षेत्र महानगर का स्वरूप ले पाता है, जब उनमें सह-अस्तित्व की भावना हो। बेंगलुरु ने हमेशा इस सिद्धांत का पालन किया। आप याद कर सकते हैं,बरसों पहले शिवसेना ने किस तरह दक्षिण भारतीयों और हिंदी भाषियों को जलील करने की कोशिश की थी, पर वह सिरे से नाकाम रही। कोलकाता और चेन्नई में भी कभी हिंदी विरोध का दावानल फूटा करता था, पर अब वह अतीत का किस्सा है। राजनेता बंबई को मुंबई, बंगलोर को बेंगलुरु, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता को कोलकाता या गुड़गांव को गुरुग्राम बना सकते हैं, मगर सिर्फ बोर्ड पर नया नाम पोत देने से शहरों की आत्मा नहीं बदला करती।

1991 के आर्थिक उदारीकरण की बड़ी देन है। इससे हिन्दुस्तान में कॉरपोरेटीकरण को बढ़ावा मिला और नई तकनीक के आगमन से बेंगलुरु, हैदराबाद और गुरुग्राम, नोएडा जैसे ‘हब’ विकसित हुए। इन उभरते महानगरों का विकास यह भी जताता है कि हमें अपने मानसिक अवरोधों से मुक्ति पाने की कितनी जरूरत है? हर नया आगंतुक अपने साथ अपनी संस्कृति के मूल तत्व लेकर आता है और जहां जा बसता है, वहां उसके पौधे रोपता चलता है।

आप गौर करें, तो पाएंगे कि इधर हिंदी ने अन्य भाषाओं के शब्द बड़ी तेजी से ग्रहण किए हैं। यही हाल अन्य भारतीय भाषाओं का है। जरूरत है, तो बस इसमें तेजी लाने की, क्योंकि भाषा अलगाव के अवरोधों को सबसे पहले खत्म करने की क्षमता रखती है। कहने का तात्पर्य यह है कि अँग्रेजी अपने प्रसार का एक माध्यम भर होना चाहिए&#8230;मगर इसके साथ जरूरी है कि हिन्दी और सभी भारतीय भाषाएँ साथ आएँ, एक दूसरे के साथ चलें, एक दूसरे की शाब्दिक, साहित्यिक, सामाजिक विरासत को खुले दिल से अपनाएँ तो हिंग्लिश खुद ही खत्म हो जाएगी। हिन्दीवालों को समझना होगा कि हिन्दी सिर्फ हिन्दी प्रदेश की भाषा नहीं है और उसका अस्तित्व और विकास भी अन्य भारतीय भाषाओं और उसकी तमाम बोलियों के साथ जुड़ा है। जाहिर सी बात है कि अगर आप राष्ट्रभाषा बनने की बात करते हैं तो वह संकुचित हृदय, शुद्धिवादिता की जिद के साथ नहीं होगा। भारतीय भाषाओं और हिन्दी को एक दूसरे के साहित्य को अपने पाठ्यक्रमों में जगह देनी होगी। मुझे विश्वास है कि अपने भाषायी क्षेत्र में तमाम बोलियों और अन्य भारतीय भाषाओं को जगह देकर हिन्दी जन – जन की भाषा बन सकती है और वह बनेगी, जरूर बनेगी।

बड़ों की महत्वाकांक्षा और संवेदनहीनता के बीच पिस रहा बचपन

अपराजिता फीचर्स डेस्क

जब हम बच्चे थे तो बड़ों की हर बात बुरी लगती थी और आज जब हम बड़े हो चुके हैं तो हम बच्चों को समझना नहीं चाहते। हम उनकी हर बात को वैसे ही समझना चाहते हैं, जैसे हम समझना चाहते हैं हमने बच्चों के लिए ऐसी दुनिया तैयार कर दी है जहाँ हम कभी खुद नहीं रहना चाहेंगी..बच्चे घृणा झेल रहे हैं और हम अपनी नफरतों को उन पर थोप रहे हैं। बच्चों की दुनिया में हम बड़ों ने अपनी नफरत और महत्वाकांक्षा का जहर घोल रखा है। वे बच्चे भी खुश नहीं हैं जो समृद्ध हैं और जो महंगे स्कूलों में जाते हैं। प्रद्युम्न की हत्या के मामले में ग्यारहवीं कक्षा के छात्र का नाम आता है और वजह यह है कि वह परीक्षा को टालना चाहता था इसलिए उसे हत्या ही एकमात्र विकल्प सूझ अब जरा सोचिए क्या ये इस अभियुक्त छात्र का दोष है  ये दोष हमारा है हमारी शिक्षा प्रणाली का है हमने क्या हाल कर रखा है और परीक्षा कितनी बड़ी दहशत बन गयी है जो एक सामान्य बात है मगर इसके पीछे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा और बच्चे पर अत्यधिक दबाव डालने वाली प्रवृति है जिसने एक मासूम को अपराधी बनाकर छोड़ दिया है। अच्छा&#8230;जरा सोचिए तो हम सिखा क्या रहे हैं& मुफ्त में सामान बटोरना& मेहनत और सच बोलने को बेवकूफी समझना&#8230;.रिश्वत देना और तलवे चाटना& हर बुरी चीज हमें अच्छी लगने लगी है इसलिए संजय दत्त और सलमान खान जैसे लोग आदर्श बन जाते हैं जो कानून को अपने हाथ में लिए घूमते हैं आप जब झूठ बोलते हैं, हिंसा करते हैं तो वह सब आपके बच्चे देख रहे हैं होते हैं। आप घर में शराब की पार्टी करेंगे तो आपको आवेश जैसे बच्चों से कैसे बात करेंगे& जो शराब को आम सी चीज समझते हैं हर मां – बाप चाहता है कि उसका बच्चा एक अच्छा  इंसान बने& उसकी इज्जत करे मगर क्या हर मां – बाप अपनी जिन्दगी में ये सारे सिद्धांत लेकर चलता है मॉल कल्चर में आप प्रकृति को खत्म किए जा रहे हैं तो बच्चा पेड़ लगाना कैसे सीखेगा? बच्चा सिर्फ मां – बाप से नहीं सीखता& उसके भाई –बहन, बुआ..मासी..नानी& चाचा& सब उसकी जिन्दगी का हिस्सा है..बच्चा अगर गालियां देता है चोरी करता है तो उसे पीटने से पहले एक बार अपनी जिंदगी पर नजर डालिए। सीरिया और पाकिस्तान जैैसे आतंकपोषित देश में बच्चों की स्थिति कैसी है&#8230;यह बताने की जरूरत नहीं है और यह तोहफा हम बड़ों ने ही दिया है।

हर साल बेची जाती हैं नेपाली लड़कियां, आंकड़ा 12 हजार पार

नेपाल के शहर की चकाचौंध भरी ये गलियां किसी न किसी डांस बार पर जाकर खत्म होती हैं। यहां सूरज ढलते ही महफिल सजती है और सज-धजकर नाच रही लड़कियों के बीच फिल्मी धुनों पर लोग थिरकने लगते हैं। रात परवान चढ़ने लगती है और इस बीच एक अन्य समूह इन डांस बारों पर पहुंचता है। ये लोग खरीदार हैं जो बार में मौजूद लड़कियों की बोली लगाते हैं। सौदा तय हो जाता है और ये महफिल सुबह तक ऐसे ही चलती रहती है। इसके बाद ये लड़कियां बड़े-बड़े शहरों में मौजूद डांस बार में ले जाई जाती हैं।

नेपाल के लिए लड़कियों की तस्करी कोई नई समस्या नहीं है। 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद लड़कियों की तस्करी में अचानक देखी जा रही बढ़ोतरी ने नेपाल सरकार और नेपाल पुलिस की चिंता बढ़ा दी है।

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता मनोज नेऊपाने ने कहा, समस्या कितनी बड़ी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल नवंबर महीने तक नेपाल पुलिस ने 2,700 से भी ज्यादा नेपाली लड़कियों को तस्करों और दलालों के चंगुल से छुड़वाया है। मनोज ऊपाने कहते हैं,  मानव तस्करी का ये जाल बहुत बड़ा है और इसके तार यहाँ से लेकर भारत और विदेशों तक फैले हुए हैं। मानव तस्करी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए नेपाल पुलिस में हमने एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया है, हमें सफलता मिल रही है, मगर उतनी नहीं।

एक अमरीकी संस्थान के शोध के अनुसार हर साल 12,000 नेपाली लड़कियां तस्करी का शिकार हो रही हैं। भारत और नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा पर तस्करी को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ऐसा मानना है नेपाल-भारत की सीमा की चौकसी करने वाले सशस्त्र सीमा बल के अधिकारियों का।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से लगे सोनौली बॉर्डर पर तैनात उप समादेष्टा दिलीप कुमार झा कहते हैं,  उन लड़कियों को रोकना मुश्किल है जो वयस्क हैं और अपनी मर्जी से सरहद पार कर रही होती हैं। कई लड़कियां अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ होती हैं।

दिलीप झा बताते हैं,  हमें पता है कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हो सकती हैं। मगर जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास दस्तावेज सही होते हैं और वो वयस्क होती हैं। कभी जब शक पुख्ता होता है तो हम ऐसी लड़कियों को नेपाल पुलिस के अधिकारियों या वहां के सामजिक संगठनों के सुपुर्द कर देते हैं। मगर ये समस्या काफी बड़ी है। नेपाल के अधिकारियों और भारत के सीमा प्रहरियों का कहना है कि मानव तस्करी का सबसे बड़ा कारण है गरीबी, नेपाल के दूर-दराज के इलाकों में रोजगार के संसाधन नहीं होने की वजह से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। सुनीता दानुवर कम उम्र में ही तस्करी का शिकार हो गई थीं।

उन्हें मुंबई ले जाया गया जहां उनका बलात्कार हुआ, फिर उन्हें जबरन जिस्मफरोशी के काम में धकेला गया। मगर एक दिन उस जगह पुलिस का छापा पड़ा जहां सुनीता को रखा गया था। पुलिस ने उन्हें वहां से निकाला और वापस नेपाल भेज दिया। ये सिलसिला सिर्फ भारत के महानगरों तक सीमित नहीं है। सुनीता कहती हैं कि नेपाली लड़कियों को तस्करी के बाद उन्हें चीन, श्रीलंका और अरब देशों में बेचा जाता है जहां उन्हें जिस्मफरोशी के लिए मजबूर किया जाता है।

मगर तस्करी की पीड़ितों की विडंबना है कि वापसी के बाद उन्हें ना उनका परिवार अपनाता है और ना ही समाज, काठमांडू में बने एक पुनर्वास केंद्र में रहने वाली एक पीड़ित नेपाली लड़की का कहना है, मुझे अच्छी नौकरी का झांसा देकर दिल्ली ले जाया गया मगर जब मैं वहां पहुंची तो खुद को एक छोटे से गंदे से कमरे में पाया। वहां पर और भी नेपाली लड़कियां थीं। मैं बेबस थी और मुझे जिस्मफरोशी के काम में जबरदस्ती झोंक दिया गया। कई महीनों के बाद मैं किसी तरह वहां से निकलकर भाग सकी।

नाम नहीं बताने की शर्त पर बात करने को तैयार हुई तस्करी की शिकार एक अन्य नेपाली युवती ने कहा कि वो शादी के झांसे में आ गई और होश संभाला तो खुद को जिस्मफरोशी की मंडी में पाया। वो कहती हैं, मैं जिस लड़के से प्यार करती थी उसने मुझे मुंबई में बेहतर जिन्दगी का भरोसा दिलाया। मैं उसके साथ दिल्ली चली गई, मगर वो मुझे उम्रदराज आदमी के पास छोड़कर भाग गया। उस व्यक्ति ने मेरा बलात्कार किया। फिर मैं जिस्मफरोशी की मंडी में फंस गई।

सुनीता दानुवर कैमरे के सामने आकर अपनी आपबीती सुनाने में हिचकिचाती नहीं हैं, बल्कि अब उन्होंने एक सामजिक संगठन बनाकर पीड़ित लड़कियों के पुनर्वास के लिए काम करना शुरू किया है। वो कहती हैं कि ये काम भी इतना आसान नहीं है। वो बताती हैं, शुरू में हमने पीड़ितों को प्रशिक्षण देना शुरू किया ताकि वो बाहर जाकर नौकरी कर सकें और अपनी आजीविका चला सकें। ऐसा हुआ भी लेकिन जब लोगों को पता चला कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हुई थीं तो वो फायदा उठाने की कोशिश करने लगे।

अब हम यहीं पर इनके लिए रोजगार के मौके बढ़ाने की कोशिश पर काम कर रहे हैं। मगर नेपाल में संसाधनों की कमी है, इसलिए इन पीड़ितों को और भी ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है।

हालांकि, कुछ एक सामाजिक संगठन इन पीड़ितों को सामान्य ज़िन्दगी में वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, मगर जिस्मफरोशी की मंडियों में बेची गईं इन नेपाली लड़कियों की आत्मा पर लगे घाव उन्हें हमेशा तकलीफ देते रहेंगे।

शाहरुख़ पर लगा चोरी का आरोप, उठाया ऐसा क़दम कि बन गए ज़ीरो से हीरो

शाहरुख़ ख़ान को बातों का बाज़ीगर यूं ही नहीं कहा जाता। अपनी वाकपटुता से विपरीत परिस्थियों में भी जीतकर बाहर आने का हुनर उनसे सीखना चाहिए। ज़ीरो कैसे हीरो बनता है, ये कहानी भी शाहरुख़ सिखाते हैं। हाल ही में किंग ख़ान पर साहित्यिक चोरी का इल्ज़ाम लगा, जिसको लेकर सोशल मीडिया में उनकी जमकर खिंचाई हुई, मगर सीनाज़ोरी दिखाने की बजाय उन्होंने उभरते हुए लेखक को उसकी पंक्तियों के लिए शुक्रिया अदा करके बाज़ी अपने नाम कर ली।

क़िस्सा पहली जनवरी को शुरू हुआ, जब शाहरुख़ ने अपनी नई फ़िल्म ज़ीरो का फ़र्स्ट लुक और टाइटल ट्विटर पर फ़ैंस के साथ साझा किया। फ़र्स्ट लुक आते ही छा गया और देखते ही देखते इसे 3.2 करोज़ व्यूज़ मिल गए। शाहरुख़ ने फैंस का शुक्रिया अदा करने में कोई देरी नहीं की और ट्विटर पर सबका धन्यवाद किया। मगर, इस शानदार उपलब्धि को आलोचनाओं का ग्रहण तब लगा, जब उन पर साहित्यिक चोरी का सनसनीखेज़ आरोप लगा। ज़ीरो में शाहरुख़ के बौने लुक को जितनी तारीफ़ें मिलीं, उतनी ही आलोचना इस चोरी करने के लिए भी की गयी। किंग ख़ान ने फ़र्स्ट लुक के साथ अपने स्टेटस में कुछ पंक्तियां हिंदी में लिखीं। ये लाइंस थीं- &#8221;टिकटें लिए बैठें हैं लोग मेरी ज़िंदगी की, तमाशा भी पूरा होना चाहिए

इन पंक्तियों को पढ़ने वाले वाह-वाह कर उठे, मगर सोशल मीडिया के दौर में चोरी पकड़ने में देर नहीं लगती। इस ट्वीट के जवाब में कुछ फॉलोअर्स ने लिखा कि दरअसल ये पंक्तियां मिथिलेश बारिया नाम के लेखक की हैं, जो ट्विटर पर भी मौजूद हैं। बस फिर क्या था, यूज़र्स शाहरुख़ के पीछे पड़ गए और असली लेखक को क्रेडिट ना देने के लिए उन्हें ट्रोल करने लगे।

शाहरुख़ एक-दो दिन तक ख़ामोश रहे, मगर शनिवार 6 जनवरी को उन्होंने भूल सुधार किया। लेखक की पुस्तक का फोटो शेयर करके उन्होंने संदेश लिखा कि उनकी किताब उन्हें बहुत अच्छी लगी। साथ ही ये भी जता दिया कि वो इतना अच्छा लिखते हैं कि सोशल मीडिया में शेयर हो जाता है। शाह रुख़ ने टिकट वाली पंक्तियों के लिए मिथिलेश का शुक्रिया भी अदा किया। शाहरुख़ के संदेश को पढ़कर ऐसा महसूस होता है, जैसे लेखक ने अपनी किताब भेजकर उन्हें चोरी के बारे में आगाह किया हो, जिसके बाद शाहरुख़ ने लेखक को क्रेडिट दिया।

बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी किताब मिली और पढ़कर बहुत अच्छा लगा। सोशल मीडिया पर आपने साबित कर दिया की हर जगह पर अच्छी बातें ही पसंद आती हैं। और “टिक्केटें लिये&#8230;” वाली पंक्तियों के लिए भी शुक्रिया ।

बता दें कि आनंद एल राय निर्देशित फ़िल्म इसी साल दिसंबर में रिलीज़ हो रही है। कटरीना कैफ़ और अनुष्का शर्मा फ़ीमेल लीड में हैं। शाह रुख़ मेरठ के बौने के रोल में हैं, जो बड़े-बड़े सपने देखता है। फ़िल्म के टाइटल को लेकर काफ़ी सस्पेंस रहा था, जिसे किंग ख़ान ने 1 जनवरी को खोला।

रंगमंच पर दोहरा संघर्ष कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं स्त्रियाँ

रंगमंच की दुनिया में कुछ लोग होते हैं जो नाटक करते हैं और कुछ होते हैं जो नाटकों को जीते हैं। लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक और निदेशक उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम की जोड़ी ऐसी ही जोड़ी है। लिटिल थेस्पियन 23 साल पूरे कर चुकी है&#8230;देश भर में प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुकी है&#8230;और हिन्दी का पहले थियेटर फेस्टिवल करने का श्रेय भी संस्था को जाता है। हाल ही में नीलांबर के लिटरेरिया में लिटिल थेस्पियन को रवि दवे स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। नाटकों को उपेक्षित करते आ रहे हिन्दी प्रदेश में नाट्यकर्मी उमा झुनझुनवाला ने नाटकों न सिर्फ प्रतिष्ठित किया बल्कि नयी पीढ़ी और खासकर लड़कियों को इस विधा से जुड़ने का आत्मविश्वास दिया। आगामी 3 नवम्बर से लिटिल थेस्पियन जश्न ए रंग 2017 का वृहद आयोजन करने जा रहा है&#8230;। नाटकों का उत्सव जब सजने वाला है तो नाटकों पर बात होनी ही है&#8230;तो अपराजिता से लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक व निदेशक उमा झुनझुनवाला ने साझा की ढेर सारी बातें नाटकों, उसके इतिहास और नाटकों में स्त्री पर। पेश हैं कुछ अंश

“किसी भी क्षेत्र में स्त्रियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है” &#8211; कह देने मात्र से ही बात पूरी नहीं हो जाती हैl अभी चारों तरफ इसी तरह की बातें लिखी और कही जा रही हैं कि २१वी सदी महिलाओं के बहुआयामी प्रतिभाओं की सदी है, जागरूकता और दावेदारी की सदी है। समाज, राजनीति और कला सहित जीवन का कोई भी क्षेत्र महिलाओं की इस दावेदारी से अछूता नहीं है।

व्यक्तिगत तौर पर मैं लिंग-भेद के दृष्टिकोण से किसी भी विषय या चर्चा की पक्षधर नहीं हूँ&#8230;लेकिन उसके बावजूद एक स्त्री होने के नाते किसी भी सृजन की प्रसव पीड़ा से ठीक उसी तरह अवगत हूँ जैसे एक माँ होती है। उस पीड़ा को पुरुष समाज अलग अलग धरातल पर काव्यात्मक ढंग से महसूस कर उसे वर्णित तो कर सकता है किन्तु हर औरत के लिए उस पीड़ा की अनुभूति सामान्य तौर एक जैसी ही होती है – उदहारण स्वरुप किसी औरत या लड़की का नाटक करने जाना ही उसके पिता/पति के परिवारवालों के लिए स्वीकार्य नहीं हो पाता है कि मंच पर जाकर लोगो के सामने अभिनय करना, नाचना गाना वगैरह वगैरह अधर्म होता है, किसी तरह जाने की स्वीकृति मिल जाए तो और दूसरे पचासों सवाल सुरसा राक्षसी की तरह मुंह बाये खड़ी रहती हैं – मसलन- डायरेक्टर कौन है, रोल क्या है, समय पर घर आ जाना, आज देर क्यों हो गयी, फलाने एक्टर के साथ किस तरह का दृश्य है, रोज़ रोज़ जाना ज़रूरी है क्या ?

और अगर शादीशुदा है तो – घर की सारी जिम्मेदारियां तय वक़्त पर ही पूरी होनी चाहिए, रात को देर से आओगी तो खाना कैसे बनेगा, बच्चों की पढाई का कौन ध्यान रखेगा, फलाने मर्द के साथ क्यों आई, दृश्य में दूरी बना के रखो, फलाने के साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध है, आदि आदिl उफ्फ्फ ये सारे सवाल सिर्फ स्त्रियों के लिए ही होते हैं इसलिए इनका संघर्ष दोहरा होता है – इन सारे सवालों की जवाबदेही के साथ साथ रंगमंच पर अपने हस्ताक्षर को दर्ज कराना मामूली बात नहीं हो सकती l ऐसा नहीं है कि ऐसी परिस्थिति का सामना हर स्त्री शब्द को करना पड़ता है; लेकिन अपनी मर्ज़ी के काम में रजामंदी के मोहर की आवश्यकता मुझे लगता है हर किसी को पड़ ही जाती है l खैर समय के साथ ये सवाल उठने लगा था कि वर्तमान परिस्थितियों में परिवर्तन लाये बिना समाज का विकास संभव नहीं और इसके लिए औरतों को भी समाज की संपूर्ण कलात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेने की पूरी स्वाधीनता होनी चाहिए l

अपितु, परिवर्तित सामाजिक ढाँचे की विषमताओं और जटिलताओं के चलते कला की अन्य विधाओं की अपेक्षा रंगमंच में स्वयं को घोषित करना निस्संदेह असाधारण कार्य है परन्तु असंभव कतई नहीं और इसलिए ये सूची भी मामूली नहीं जहाँ महिला रंगकर्मियों की एक लम्बी कतार है –जोहरा सहगल, कुदसिया जैदी, शांता गाँधी,  रशीद जहाँ, शीला भाटिया, दीना पाठक, अंजला महर्षि, अनामिका हक्सर, प्रतिभा अग्रवाल, लक्ष्मी चन्द्रा, कपिला मलिक वात्स्यायन, क्षमा आहूजा, नीलम मानसिंह, रानी बलबीर कौर, बी. जयश्री, अरुंधती राजे, एस. मालती, सौम्य वर्मा, नादिरा बब्बर, जे. शैलजा, अमाल अल्लाना, अनुराधा कपूर, गिरीश रस्तोगी, कीर्ति जैन, तृप्ति मित्रा, उषा गांगुली, त्रिपुरारी शर्मा, मंजू जोशी, कुसुम हैदर, विजया मेहता, माया कृष्ण राव, शबनम हाशमी, अरुंधती नाग, कविता नागपाल, रेखा जैन, सांवली मित्र, अमला राय, उषा बनर्जी, उमा सहाय, नंदिता दास, उत्तरा बावकार, चेतना जालान, रेखा जैन, भागीरथी, विभारानी (और आप लोग चाहें तो मेरा भी नाम दर्ज कर सकते हैं इसमें उमा झुनझुनवाला)

१९वीं सदी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर का बोलबाला अपने चरम पर था l मूनलाइट, मिनर्वा आदि थियटरों में व्यावसायिक दृष्टिकोण से एक के बाद एक सफल नाटकों की प्रस्तुतियाँ होती रहीं l इनका मूल उद्देश्य दर्शकों का सतही तौर पर मनोरंजन करके पैसा कमाना था l १९३०-३४ तक इसका असर बड़ा व्यापक रहा l लेकिन ये काल आन्दोलनों और क्रांतियों का काल था l देश की आज़ादी के साथ साथ समाज में व्याप्त जड़ता के ख़िलाफ़ तथा पारसी थिएटर की फूहड़ प्रस्तुतियों स व्याकुल होकर साहित्यकारों की कलम ने काम करना शुरू किया l फलस्वरूप हर स्तर पर नवजागरण की लहर ने लोगो की विचारधारा में एक सशक्त परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई l नवजागरण काल के लेखकों में एक विशेष लक्षण दृष्टिगोचर होती है  इनका विस्तार एक साथ कई कई विधाओं में था l साहित्य को कला का ही अभिन्न अंग मानते हुए इनलोगों ने ऐसे नाटकों के मंचन पर विशेष बल दिया जिनका साहित्यिक महत्व हो और सुसंस्कृत विचारों की स्थापना में सक्षम हों l प्रभावस्वरूप इन नाटकों ने पारसी नाटकों की अतिरंजना के प्रभाव को धूमिल करना शुरू कर दिया जो लोगो को उनके वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ पा रही थी l  इनमे भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, पंडित माधव शुक्ल आदि प्रमुख थे l इनका मानना था साहित्य की समझ के लिए समाज का शिक्षित हों ज़रूरी है क्योंकि शिक्षा मनुष्य को विचारवान बनती है और निम्न कोटि के साहित्य के रसापान से रोकती है l इनलोगों ने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ नाटक को एक सशक्त हथियार बनाया और देशप्रेम से ओतप्रोत नाटक खेले l इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु १९०६ में हिंदी नाट्य समिति की स्थापना हुई और मुंशी भृगुनाथ के नेतृत्व में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नीलदेवी और राधेश्याम ने कथावाचक का वीर अभिमन्यु जैसे सामाजिक विषयों पर नाटक खेलना शुरू किया और हिंदी रंगमंच को पारसी बालाओं की जुल्फों और पतली कमर से बाहर निकाल कर दर्शकों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर आधारित जीवन मूल्यों के प्रति सचेत होने की प्रेरणा दीl सत्य विजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मनी, सम्राट परीक्षित, स्कूल की लड़की आदि नाटकों के मंचन के माध्यम से सामाजिक जागरूकता को सस्जक्त बनाया l इन नाटकों से तत्कालीन समाज के स्वरुप को भलीभांति समझा जा सकता है l

दूसरे दशक में पंडित माधव शुक्ल और भोलानाथ बर्मन के द्वारा हिंदी नाट्य परिषद् की स्थापना हुई l गाँधीजी के आन्दोलनों का प्रभाव हर तरफ था; साहित्य भी इससे अछूता नहीं था, कला पर भी इन आंदोलनों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता था l बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों में अग्रणी रहा है l कलकत्ता का साहित्य सृजन, कला सृजन, रंगकर्म आदि गतिविधियाँ राष्ट्रीय नवजागरण में अदभुत सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर रहा था l देशभक्ति से ओतप्रोत नाटकों को अंग्रेज़ सरकार प्रतिबंधित करने लगी तो इन रंगकर्मियों ने नाटकों के नाम बदल कर से खेलना शुरू कर दिया l इस कड़ी में महाराणा प्रताप, महाभारत, विश्वप्रेम, चन्द्रगुप्त, नूरजहाँ, शाहजहाँ, महात्मा ईसा आदि नाटक खेले गए l इस तरह रंगमंच पर देशप्रेम की धारा बहने लगी l इस बीच में और भी कई नाट्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं l लेकिन १९४७ में तरुण संघ की स्थापना ने रंगमच में स्त्रियों की भागेदारी को महत्वपूर्ण बनाया l भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, विमल लाठ आदि महत्वपूर्ण लोगो के साथ सुशीला भंडारी, सुशीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल ने रंगमंच की बागडोर संभाली l बाल विवाह, विधवा विवाह, पर्दा-प्रथा, फूहड़ नाचगान, शादी-विवाह पर होने वाली फिजूलखर्ची, दिखावाबाज़ी, आडम्बर आदि पर खुलकर नाटक लिखे गए और मंचित भी हुए l ये प्रस्तुतियां बड़ी सफल और सार्थक साबित हुईं l

१९५५ में अनामिका की स्थापना एक नई ऊर्जा साबित हुई&#8211; अनुवादों की श्रृंखला में नाट्य शोध की संस्थापक प्रतिभा अग्रवाल का नाम भी अग्रणी है. १९३० में इनका जन्म हुआ था. मारवाड़ी समाज की किसी महिला का अभिनय में आना ही उस वक़्त के लिहाज से बहुत बड़ी क्रांति थी l प्रतिभा जी ने कलकत्ता के हिंदी रंगमंच को राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान दिलाई वो अतुलनीय है l अनामिका द्वारा साहित्यिक नाटकों की प्रस्तुतियाँ जनमानस की रुचियों का शुद्धिकरण के साथ लोगो में साहित्य के पठन पाठन के चलन को बढ़ाया l प्रतिभा जी के अनुवादों ने भाषाओँ के मध्य सेतु का काम किया और विभिन्न साहित्य के नए नए आस्वादों से दर्शकों को परिचित कराया l प्रतिभा जी के नेतृत्व में हम हिन्दुस्तानी, जनता का शत्रु, आषाढ़ का एक दिन, पाटलिपुत्र के खँडहर में, अंजो दीदी, घर-बाहर, छलावा, छपते छपते, मादा कैक्टस, लहरों के राजहंस, शुतुरमुर्ग, आधे-अधूरे, एवम इन्द्रजीत, पगला घोड़ा, हयवदन आदि पचास से भी अधिक नाटक हैं जो कलकत्ता के हिंदी रंगमंच के इतिहास में विशेष महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं l प्रतिभा अग्रवाल कलकत्ता के हिंदी रंगमंच का एक स्वर्णिम नाम है l

उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में किसानों, लेखकों, छात्रों, मजदूरों के अनेक संगठन बने जिन्होंने जन आंदोलनों को नया मोड़ दिया. 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद और बंगाल कल्चरल स्क्वायड, मुंबई का कल्चरल स्कावड, बैग्लोर की सांस्कृतिक इकाई की सफ़लता के बाद एक राष्ट्रीय मंच की आवश्यक्ता की पुर्ति के लिये इप्टा का 25 मई 1943 को गठन हुआ. ब्रिटिश साम्राज्य, अन्तर्राष्ट्रीय फ़ासीवाद और भारतीय सामंतवाद के खिलाफ़ संघर्ष में आम जनता के वैचारिक पहलुओं को दिशा देने के लिये प्रदर्शनकारी कला के प्रयोजन के महत्त्व को समझा गया. इप्टा ने गीत, संगीत, नृत्यरचना आदि के द्वारा समय के यथार्थ को प्रदर्शनकारी रूपों में व्यक्त करने की जरूरत बताई. लेखक, कलाकार, नर्तक, अभिनेता इसमें शामिल हुए. विभिन्न भारतीय भाषाओं में इसकी शाखाएं बनी. नुक्कड़ नाटकों का दौर शुरू हुआ&#8230; बंगाल में हिंदी में नुक्कड़ नाटक को एक आन्दोलन के तौर पर महेश जायसवाल ने लिया और लगातार लिखते और करते रहे l उषा गांगुली ने भी नुक्कड़ नाटको को महत्व दिया था और कई प्रस्तुतियां की l मैंने भी कई नुक्कड़ नाटक लिखे और उनकी हज़ार से ऊपर प्रस्तुतियां की हैं l नवजागरण युग के प्रभाव की तरह इप्टा के जन्म ने नाटकों को एक नई दिशा दी l रंगमंच से जुड़ा हर व्यक्ति किसी न किसी रूप से इप्टा और इप्टा के आंदोलनों से जुड़ने लगा था l फलस्वरूप रंगकर्म को एक नया कैनवास मिला लोगो के बीच में उनका होकर उनकी समस्याओं को लेकर उनके बीच पहुँचने के लिए l

१९४४ में जन्मी उषा गांगुली ने १९७६ में रंगकर्मी की स्थापना कर प्रगतिशील नाटकों के साथ कलकत्ता के हिंदी रंगमंच पर अपनी धूम मचा दी l सत्तर के बाद बंगाल में मार्क्सवाद और समाजवाद ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया l चाहे बंगाली समाज या हिंदी समाज, पूरा बंगाल इसके प्रभाव में डूबा हुआ था l

समाजवाद और मार्क्सवाद लोगो के जीवन का एक अहम् हिस्सा हो गया था l सारा साहित्य और रंगमच मार्क्समयी हो गया था l गण-नाट्य का प्रभाव बहुत ही जन व्यापी था l इस तरह बंगाली समाज या यूँ कहूँ कि मार्क्सवाद में डूबा बंगाली समाज पहली बार हिंदी रंगमंच के लिए बहुत बड़ा दर्शक वर्ग बन कर उभरा l

दूसरे आरंभिक दिनों में रंगकर्मी के नाटकों में साहित्यिक नाटकों की भाषा की गूढता और जटिलता भी नहीं थी l इसलिए बंगाली दर्शकों ने इसे बड़े ही सहज रूप से लिया l महाभोज, लोक कथा, होली, रुदाली, शोभा यात्रा, कोर्ट मार्शल, हिम्मत माई, सरहद पार मंटो, काशीनामा, भोर, चंडालिका आदि नाटकों की सफल प्रस्तुतियों से उषा गांगुली एक मजबूत हस्ताक्षर हैं भारतीय हिंदी रंगमंच में l

1972 में श्यामानन्द जालान ने अनामिका से अलग हटकर पदातिक की स्थापना की l चेतना जालान (१९४७) ने श्यामानंद के निर्देशन में लहरों के राजहंस में अलका की भूमिका करके एक संवेदनशील कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई और इसक बाद एवम इन्द्रजीत में मौसी और मानसी के द्वैत भूमिका में अभिनय करके अपनी कुशलता का लौहा मनवा लिया l इतना ही नहीं विजय तेंदुलकर के गीधाड़े और सखाराम बाइंडर में चंपा के अभिनय में उन्होंने अपने साहसिक कलाकार होने का भी परिचय दिया l

1994 में मैंने और अज़हर ने लिटिल थेस्पियन की स्थापना की थी l लेकिन ये दौर किसी आंदोलनों का दौर नहीं था l थोड़ी बहुत राजनीतिक उठापटक के अलावा समाज एक सीधी रेखा पर ही चल रहा था l लेकिन टीवी सीरियलों का कुप्रभाव नज़र आने लगा था l सन 2000 के बाद तो हमने छात्र वर्ग के मध्य से साहित्यिक संगोष्ठियों के चलन का खात्मा भी देखा l हिंदी भाषियों में नाटक और रंगमंच अतीत की गाथा में सीमित हो कर रह गया था l लेकिन लिटिल थेस्पियन की साहित्यिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े नाटकों की लगातार प्रस्तुतियों ने हिंदी दर्शकों को एक बार फिर नया आस्वाद देने में सफलता हासिल की l

रेंगती परछाइयाँ (मेरे द्वारा लिखित), कबीरा खड़ा बाज़ार में, अलका, गैंडा, पतझड़, लोहार, बड़े भाईसाहब, प्रश्नचिह्न, यादों के बुझे हुए सवेरे, हयवदन, शुतुरमुर्ग, कांच के खिलौने आदि 30 से अधिक नाटक और कथा-कोलाज के अंतर्गत ३२ कहानियों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को ये कहने पर मजबूर किया है कि इन प्रस्तुतियों की बात कुछ अलग है l

इसके अलावा मैंने भारत सरकार के जूनियर फेल्लोशिप के अंतर्गत मैंने कोलकाता में कहानियों के मंचन पर कई स्तरों पे काम किया है l कहानियों में कोई बदलाव किये बगैर उनका मंचन दर्शकों के लिए एक अद्भुत अनुभूति साबित हुयी l चूँकि अनुवाद भी मेरा क्षेत्र है, अंग्रेजी, उर्दू और बांगला से कई नाटकों का अनुवाद किया है मैंने जिनका अलग अलग नाट्य निर्देशकों द्वारा मंचन भी हुआ है l

डॉली बासु मूलतः बंगला नाटकों में और रमनजीत कौर अंग्रेजी नाटकों में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं लेकिन इन्होने हिंदी नाटको को भी मंचित कर हिंदी नाटको के विकास में अहम भूमिका निभाई हैं l निर्देशन के अलावा अभिनय के क्षेत्र में भी कलकत्ता का स्त्रीवर्ग अग्रणी रहा है l यामा सराफ, संचिता भट्टाचार्य, उमा जयसवाल, अनुभवा फतेहपुरिया, श्राबोनी राय, सेंजुती मुखोपाध्याय, शुभ्रा खेतान अग्रवाल, हीना परवेज़, अर्पिता बोस, अनीता दास, चंद्रेयी दत्ता मित्रा, आरज़ू सज्जाद, अंजना मंडल कई नाम हैं जिन्होंने कलकत्ता के रंगकर्म को अतुलनीय बनाया है l

रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पर बात हो और बंगाल की उस अदाकारा का नाम ना लिया जाए तो पूरी बात अधूरी रह जायेगी। मेरा इशारा नटी विनोदिनी की तरफ है जिसे एक महत्वपूर्ण चरित्र  के रूप में हर महिला अभिनेत्री ज़रूर खेलती हैं  नटी विनोदिनी सिर्फ बंगाल की ही अभिनेत्री नहीं थी बल्कि संपूर्ण भारतीय रंगमंच की एक महान कलाकार थीं. विनोदिनी ने अपनी आत्म-कथा “आमार कथा” में अपने संघर्ष की कथा को कुछ इस तरह वर्णित किया है – “वारांगनाओं का जीवन कलंकित और घृणित होता है, लेकिन वह घृणित और कलंकित क्यों होता है? माँ के गर्भ से ही तो पतिता नहीं होती, अपने जन्म के लिए वो तो दोषी नहीं होती, सोचना चाहिए की किसने सबसे पहले उसका जीवन घृणा योग्य बनाया?

यह संभव कि कुछ स्त्रियाँ स्वेच्छा से अँधेरे में डूब कर नरक के रास्ते चलती हैं, लेकिन ज़्यादातर पुरुषों के छल कपट का शिकार बन कलंक का बोझ सर पे लादे नरक यंत्रणा सहती हैं ऐसी स्त्रियाँ ही जानती हैं कि वारांगनाओं का जीवन कितना असहनीय होता है? विनोदिनी की ये पंक्क्तियाँ उनके साथ हुई सारी ज़्यादतियों का खुलासा ही करती हैं l

कलकत्ता में रंगमंच के सफ़र को सौ साल से भी ज़्यादा हो चुके हैं और इस बात में कोई संदेह नहीं कि हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की एक सुदृढ़ परंपरा रही है जिन्होंने एक से बढ़ कर एक नए नए प्रयोग  किये हैं l परन्तु महिलाओं का काम संगठित होने की बजाय कुछेक टोलियों में बंट कर रह गया l

वर्तमान समय में हम आदर्शवाद और यथार्थवाद के मध्य के संघर्ष को नए रूप में देख रहें हैं l फलस्वरूप नाटकों के प्रति रूचि उत्पन्न करने के लिए विभिन्न स्तरों पर दर्शकों के लिए सेमिनारों, संगोष्ठियों और वर्कशॉप के आयोजन की आवश्यकता है और ये ज़िम्मेदारी सभी सांस्कृतिक संस्थाओं की भी है ताकि सिर्फ़ स्त्रियों की ही नहीं बल्कि पुरुषों की भी भागीदारी रंगमंच में सशक्त रूप में हो l

मौलिक हिन्दी नाटक कम लिखे जाते हैं। आम तौर पर साहित्यकार साहित्य की अन्य विधाओं पर ही अपना समय देना पसंद करते हैं। नाटक लिखने में बहुत उत्साहजनक रुचि नहीं दिखाई देती। नतीजतन रंगकर्मियों को अक्सर अनूदित नाटकों का सहारा लेना पड़ता है। या फिर स्क्रिप्ट चयन में समझौता करना पड़ता है।

अंत में मैं यही कह कर अपनी बात समाप्त करती हूँ कि रंगमंच पर स्त्री का लक्ष्य कला के विभिन्न पहलुओं के लिए, दर्शकों और जनता के लिए और स्वयं उसके लिए एक महान और विशिष्ट स्थान रखता है और इसलिए स्त्रियों ने रंगमंच को मानवता के हित में समृद्ध किया है l जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह रंगमंच में भी ऐसी अनेक स्त्रियाँ मौजूद हैं जिनपर हम गर्व कर सकते हैं l

जब स्वामी विवेकानंद ने भूखे रहकर बच्चों को दे दी रोटियाँ

स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी घटनाएं प्रेरक प्रसंगों के रूप में भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पढ़ी-सुनी जाती हैं। ऐसा ही एक प्रेरक वाकया है, जिसमें उन्होंने स्वयं भूखे होने के बावजूद अपनी सारी रोटियां बच्चों में बांट दी।

किस्सा कुछ यूं है कि एक बार स्वामी जी अमेरिका गए। वहां वे अक्सर लंबी यात्राएं करते और अलग-अलग शहरों में भारत की महान संस्कृति और सनातन धर्म के बारे में व्याख्यान देते। लोग दूर-दूर से उन्हें सुनने आते और जब

लौटते तो धर्म और अध्यात्म के नजरिए से तृप्त होकर लौटते। ऐसे ही एक बार व्याख्यान के बाद स्वामी जी घर लौटे। तब वे अमेरिका में एक महिला के घर पर ठहरे थे। वे अपना भोजन खुद बनाते थे।

उस दिन सुबह से शाम तक भूखे ही व्याख्यान देकर स्वामी जी ने घर लौटकर बहुत यत्नपूर्वक भोजन बनाया। उस दिन उन्होंने अपनी रोजाना की मात्रा से कुछ ज्यादा ही रोटियां बनाईं। भोजन बनाकर, भगवान को भोग लगाकर, जैसे ही वे भोजन करने बैठे, कुछ बच्चों का झुंड उनके पास आ गया। वैसे भी अक्सर बच्चे उनके पास आ जाया करते थे। भोजन देखकर बच्चों के मुंह

में पानी आ गया और उन्होंने स्वामी जी से रोटियां मांग लीं। स्वामी जी ने भी झट से एक-एक करके रोटी सब बच्चों को दे दी। रोटियां खत्म हो गईं और स्वामी जी भूखे रह गए।

यह सारा दृश्य उस महिला ने देख लिया, जिसके घर में स्वामी जी रहते थे। उसने पूछा कि आप सुबह से भूखे हैं, फिर भी अपनी रोटियां बच्चों को क्यों दे दीं ? तब स्वामी जी ने कहा &#8211; &#8216;मां, ये रोटियां तो मेरे पेट की क्षुधा ही शांत कर सकती हैं, मेरे अंतर्मन की क्षुधा तो मेरे शास्त्रों और धर्म ग्रंथों ने पहले ही शांत कर दी। पेट की क्षुधा उतनी महत्वपूर्ण नहीं, जितनी अंतर्मन की!