Friday, July 10, 2026
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93 साल के नक्कू बाबू रखते हैं 200 साल से भी ज्यादा पुरानी चीजों का खजाना

कोलकाता को सिटी ऑफ जॉय के नाम से भी जाना जाता है। यानी ये खुशियों का शहर है। यहां हर एक गली में कोई न कोई कहानी मिल जाती है जो आपके दिल को छू जाएगी। ऐसी ही एक कहानी है 93 वर्षीय सुशील कुमार चटर्जी की। घूमने और चीजों को गहराई से महसूस करने वाले सुशील के पास कई अनमोल चीजों का खजाना है। लोग उन्हें नक्कू बाबू के नाम से जानते हैं। वे उत्तर कोलकाता के नलिन सरकार स्ट्रीट में एक तीन मंजिल के मकान में रहते हैं। उनके घर में एक 10X12 का कमरा है जिसमें काफी पुरानी चीजें सुरक्षित रखी हुई हैं। यह कमरा पुराने सामानों से इतना भरा है कि यहां दो लोग आराम से खड़े भी नहीं हो सकते।

नक्कू बाबू को पुरानी दुर्लभ चीजों को सहेजने का शौक तब से है जब वो सिर्फ 10 साल के थे। वह कहते हैं कि इन चीजों में कोई लौकिक शक्ति है जो उन्हें अपनी ओर खींच लेते हैं। उन्होंने कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से अपनी पढ़ाई की है। उनसे बातें करते वक्त आप पुराने दिनों में चले जाएंगे। ले लगातार अपनी बचपन की यादों को साझा करते रहते हैं। उन्होंने कई सारे मशहूर कवियों, कलाकारों और लेखकों के साथ अच्छा समय बिताया है जिसकी याद उनके जेहन में अभी भी ताजा हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए नक्कू बाबू ने कहा, ‘मैंने सबसे पहले पुराने पत्थरों को इकट्ठा करना शुरू किया था। उनकी अजीबोगरीब बनावट मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी। इसके बाद ऐसी चीजों से मुझे लगाव बढ़ता गया।’ एक वेबसाइट के मुताबिक नक्कू बाबू के पास प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सेना द्वारा प्रयोग किए गए रिसीवर से लेकर 18वीं सदी का कॉलिंग बेल भी है जिसे इंग्लैंड में निर्मित किया गया था। उनके पास 1930 में स्विस स्टॉपवॉच भी है। उनके कमरे में 200 साल पुरानी तुरही और लगभग 3,000 म्यूजिक रिकॉर्ड्स हैं। एक कोने में जर्मनी में बना 16mm का साउंड प्रॉजेक्ट है, तो दूसरे कोने में कोलकाता में पहली बार आयात किया गया हेडफोन भी है।

उनके इस कमरे में घुसने के बाद आपको पता ही नहीं चलेगा कि आप किस दुनिया में आ गए हैं। इसी वजह से उनके कमरे से निकलने में घंटो लग जाते हैं फिर भी आपका मन नहीं भरता। उनके पास प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए कैमरे भी हैं। इसके अलावा इतनी सारी चीजें कमरे में रखी हैं कि अगर एक-एक चीज गिनने लगें तो लिस्ट काफी लंबी हो जाएगी। नक्कू बाबू अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ रहते हैं। उनका ये शौक हमें हर एक पल, हर एक लम्हे को खुशी के साथ जीने की प्रेरणा देता है।

(साभार – योर स्टोरी)

 

नकली चेहरा छोड़कर खुद को स्वीकार करना ही वास्तविक सशक्तीकरण है

सिनेमा हमारी रग – रग में बसा है…। जिन्दगी की हर घटना और हर एक क्षण में हिन्दी फिल्मों…उसके नायकों और नायिकाओं का एक हिस्सा जरूर होता है…हम हर बात में उनका जिक्र करते हैं और वह हमारी उपमा में मौजूद रहते हैं और हमारी कसौटी पर खरा उतरने के लिए सितारे भी बहुत  मेहनत करते हैं। अपना व्यक्तित्व भूलकर वे वह बन जाते हैं जैसा हम उनको देखना चाहते हैं। वह हमारे दिल में रहना चाहते हैं और वहाँ उनकी जगह कोई न ले सके, इसके लिए वह अपनी जान पर खेल जाते हैं या अप्राकृतिक तरीके अपनाते हैं…समय को थाम लेने और उसे रोक लेने का असम्भव प्रयास करते हैं। श्रीदेवी ने भी यही किया….तमाम नायिकायें यही करती हैं और सामान्य और साधारण औरतें भी यही करती हैं। परदे पर यह मजबूरी असुरक्षा के कारण होती है…खो जाने का डर…कद्र खत्म हो जाने का डर…शो बिजनेस में ही नहीं….आम जिन्दगी में लड़कियाँ और औरतें…इसी डर के बीच जीती हैं क्योंकि उनको जो महत्व दिया जाता है या जिस दर्जे को हासिल करती हैं, वह उनकी खूबसूरती के कारण ही है..।

हर उम्र की ये खूबसूरती है

देखा जाये तो खूबसूरती को महत्व मिलना गलत नहीं है मगर जब यह पूरे व्यक्तित्व और सम्मान और जिन्दगी पर भारी पड़ जाये और हमारा आकलन बस इसके इर्द – गिर्द सिमट जाये तो यकीनन सशक्त होने की तमाम मजबूत दीवारें ढह जाती हैं। खूबसूरती आपको गर्व दे सकती है मगर वो भी क्षणिक है, वह आपको जीवन भर का स्वाभिमान नहीं दे सकती क्योंकि चेहरे तो ढलते हैं और हर रोज नये चेहरे आते हैं…स्वाभिमान तो उस काम से आता है जिसके लिए आपको याद किया जाये। दिक्कत यह है कि हम सशक्तीकरण की बात करते हैं मगर इसका दायरा जिस्मानी खूबसूरती, महँगे कपड़ों के चारों ओर समेट लेते हैं और इसे हर कीमत पर हासिल करने के लिए और नहीं खोने देने की जिद में असुरक्षा में जीते हैं। श्रीदेवी समेत अन्य नायिकायें और अधिकतर स्त्रियाँ इसी असुरक्षा में जीती हैं….खूबसूरत न रही तो शादी नहीं होगी, लोग मजाक उड़ायेंगे….नौकरी नहीं मिलेगी…..पति छिन जायेगा…लोग भूल जायेंगे..ऐसे न जाने कितने ही तमाम डर हैं जो आपको सामान्य होने ही नहीं देतें और आपको एक आवरण में लपेटकर जीती हैं। ये आवरण ही आपकी कमजोरी है…असली खूबसूरती आपकी शख्सियत में है। उन बातों में है जिनकी मदद से आप एक बेहतर दुनिया बना सकती हैं और खुद पर नाज कर सकती हैं। खूबसूरती उस ताकत में है जो आपको वह ताकत देती है जिससे आप कुछ बेहतर कर सकती हैं। झुर्रियाँ आपकी कमजोरी नहीं बन जातीं…वह आपका मापदंड भी नहीं हो सकती हैं…।

दुनिया को बेहतर बनाने की जब ताकत हो, तो खूबसूरती खुद ही आ जाती है

फिर भी खासकर शो बिजनेस से जुड़ी महिलाओं की जिन्दगी में ऐसा नहीं है। वे जाने कितनी बार प्लास्टिक सर्जरी करवाती हैं, एंटी एजिंग दवाएं खाती हैं…..मेकअप की परतें थोपती हैं और कपड़ों का स्टोर हाउस बनती हैं और उनको कोई नहीं रोकता…कोई नहीं बताता कि तुमको ये सब करने की कोई जरूरत नहीं…तुम जैसी हो…हमें वही चाहिए। सबको पता है कि बोनी कपूर श्रीदेवी की खूबसूरती के कायल थे।क्या उनको पता नहीं था कि श्रीदेवी सुन्दर बने रहने के लिए किस तरह के तरीके अपना रही हैं…उनको रोकना चाहिए…मगर कोई नहीं रोकता। इनकी नकल में आम औरतें भी अक्सर ऐसा ही करती देखी जाती हैं मगर ये जानना जरूरी है कि आपको किसी की परछाई बनने या किसी के जैसा होने की जरूरत नहीं है। आप अपनी पहचान आप हैं।

आपके दिल में प्यार हो तो आपके आगे खूबसूरती केे सारे मापदंड छोटे पड़ जाते हैं

क्या सशक्त होने के लिए प्रकृति से लड़ना जरूरी है। अच्छा दिखना अच्छी बात है मगर यह आपके पूरे व्यक्तित्व के आकलन का मापदंड नहीं हो सकती। सबसे बड़ी बात यह है कि जो आपको आपकी तरह न जीने दे…उससे प्यार करने का कोई मतलब है? प्यार तो वह है जो आपको आपकी तरह स्वीकार करे। कुदरत ने जो जिन्दगी दी है, हमारा फर्ज है कि हम उसका सम्मान करें और नकली चेहरे को छोड़कर खुद से प्यार करें, वास्तविक सशक्तीकरण यही है। जिस दिन हम यह समझ गये…महिला सशक्तीकरण तो बस यूँ ही आ जायेगा। अलग से महिला दिवस नहीं मनाना पड़े या खूबसूरती की परिभाषा थोड़ी सार्थक हो…हम एक नकलीपन से निकलकर खुली साँस ले सकें…हमें इसी दिन का इंतजार है।

कविताएं सिर्फ मनोरंजन नहीं हो सकतीं, उससे आगे की बात करती हैं

लेखन संसार में पंखुरी सिन्हा महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं और उनका सृजन संसार छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दों को उठाता आ रहा है। बहुचर्चित और बहुप्रशंसित इस कवियित्री ने जीवन के तमाम झंझावातों को न सिर्फ जीया बल्कि उसे अपनी कलम में सहेज दिया है। पंखुरी को पढ़ना उन मुद्दों की गहराई तक जाना और समझना हो…चाहे वह विस्थापन हो या स्त्री के अंदर की चीख या विकास का मुद्दा। हिन्दी और अँग्रेजी, दोनो भाषाओं में उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पत्रकार भी रह चुकी हैं और उनकी कवितायें सीधे मार करती हैं। अपराजिता में इस बार की मुलाकात पंखुरी सिन्हा के साथ….पेश हैं महत्वपूर्ण अंश –

प्र. कविता कर्म की शुरुआत कैसे की ?

उ. लिखती बचपन से थी, स्नातक स्तर पर जाते ही औपचारिकतापूर्वक लिखने की शुरुआत की। इतिहास लेकर पढ़ रही थी। स्नातक के बाद पत्रकारिता की पढ़ाई भी की। पत्रकारिता के क्षेत्र थोड़े समय के लिए रही, फ्रीलांसिग की और कई साक्षात्कार लिए। गिरिजाप्रसाद माथुर पुरस्कार मिला और कलम चल पड़ी।

प्र. आप पत्रकार भी रह चुकी हैं। आज की पत्रकारिता के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

उ.  पत्रकारिता भ्रष्टाचार के खिलाफ होनी चाहिए। विकास की गाथा और परेशानियों के साथ चुनौतियों को सामने रखे, ऐसी पत्रकारिता होनी चाहिए। मगर आज पत्रकारिता खासकर टीवी पत्रकारिता टीवी केन्द्रित और राजनेताओं पर केन्द्रित है। पत्रकार रहते हुए भी लिखने की इच्छा प्रबल रही। सहारा में दो साल रही मगर इसके बाद पूरी तरह लिखना शुरू किया। नौकरी में बहुत समय जाता था।

प्र. कहानी या कविता, आपको क्या लिखना पसन्द है?

उ. कहानियाँ लिखना चाहती थीं, अभी कविताएँ लिख रही हूँ और कहानियाँ भी लिखना जारी है। ज्ञानपीठ से दो सँग्रह आए। वागर्थ समेत कई पत्रिकाओं में कविताएँ छपीं। थोड़े समय पहले बिहार में बाढ़ आयी, फसलें प्रभावित हुईं। वैषम्य की बात कई कविताओं में हैं। विकास लोगों तक नहीं पहुँच पा रहा हैं, इस पर कई कविताएँ हैं। राजस्थान पत्रिका की ओर से सम्मानित हुई। कई बार आपकी निजता में हस्तक्षेप होता है, कई सामाजिक मुद्दे हैं और कई बार आप जन – मानस तक पहुँचना चाहते हैं, जब ऐसी कविताएँ लिखती हैं तो मनोरंजन से एक कदम आगे होती हैं और तब लोगों को समझाने की जरूरत पड़ती हैं। ये सारी उसकी चुनौतियाँ हैं।

प्र. ऐसे क्षण जिनको आप भूल नहीं पातीं?

उ. अपने तलाक और घर से विस्थापन के बाद, जिसका ज़िक्र, मैंने अपनी कविता ‘किनारे की हुस्न हिना’ कविता में किया है, जब मैं कैलगरी में अपनी पीएचडी की पढ़ाई कर रही थी, भूकंप के कई झटके मेरी बगल से गुज़रे। ‘हम हक़ मांगने वाले’ शीर्षक इस कविता में, चिली के भूकंप के बाद के त्रास का वर्णन है, उस स्थिति में जब आपकी रूममेट चिलियन रही हो! दरअसल, चिली के भूकंप से भी पहले मैंने हेटी के भूकंप को और करीब से देखा। यह भयानक भूकंप जिस दिन आया, उस दिन हमारी यूनिवर्सिटी में चर्चित इतिहासकार, प्रोफेसर माइकल इगनेटीएफ, अपना चुनाव प्रचार करने आये थे—जो कनाडा की लिबरल पार्टी के टिकट पर प्रधान मंत्री का चुनाव लड़ रहे थे. और, इस पूरे संकटपूर्ण समय में, मेरे पास सिंगल एंट्री स्टडी परमिट थी, जो कि अपने आप में एक विरल बात है, और बेहद तकलीफदेह। और ये सिंगल एंट्री वीसा, मुझे लगभग हासिल ग्रीन कार्ड की चोरी के बाद मिला था, इसलिए और भी तकलीफदेह था। यह ग्रीन कार्ड दरअसल एक साज़िश के तहत मुझसे छीना गया–पहले मैंने यूनिवर्सिटी द्वारा प्रस्तावित स्टडी परमिट स्वीकारते, अपना लगभग हासिल ग्रीन कार्ड ड्राप किया–और उस प्रोफेसर की फ़र्ज़ी कंप्लेंट पर, जो दरअसल, मेरा पीछा कर रहा था, मेरा स्टडी परमिट रद्द किया गया. इस वाकये के डिटेल्स यूट्यूब पर भी एक बातचीत में उपलब्ध हैं. लेकिन, इस त्रासदी का क्लाइमेक्स यह है की जब मैं कैलगरी पहुंची ९ महीने के भीतर मेरा पासपोर्ट एक्सपायर कर रहा था–और अपने स्टडी परमिट रिन्यूअल में मुझे २ साल इंतज़ार करना पड़ा, जिसकी वजह से मेरा शोध पूरा नहीं हो सका. लेकिन, भूकंप को इतने करीब से महसूसना अपने आप में एक त्रासद अनुभव है।

प्र.  आप संदेश देना चाहेंगी?     

उ. पाठक कविता और कहानियों में नयी चीजों को तलाशें। लोग कविताओं को पसन्द कर रहे हैं, चिट्ठियाँ और संदेश आते हैं, मैं सभी पाठकों को धन्यवाद देना चाहूँगी। अपने शहर को स्वच्छ बनाएँ।

 

 

 

उड़ि गुलाल घूँघर भई

बिहारी

उड़ि गुलाल घूँघर भई तनि रह्यो लाल बितान।
चौरी चारु निकुंजनमें ब्याह फाग सुखदान॥
फूलनके सिर सेहरा, फाग रंग रँगे बेस।
भाँवरहीमें दौड़ते, लै गति सुलभ सुदेस॥
भीण्यो केसर रंगसूँ लगे अरुन पट पीत।
डालै चाँचा चौकमें गहि बहियाँ दोउ मीत॥
रच्यौ रँगीली रैनमें, होरीके बिच ब्याह।
बनी बिहारन रसमयी रसिक बिहारी नाह॥

 रिटायर होंगे सुप्रीम कोर्ट के 7 जज, 6 जजों की है जरूरत

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के सात जज इस वर्ष एक मार्च के बाद सेवानिवृत्त हो जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में छह जजों की कमी है जबकि दो जजों की नियुक्ति की अनुशंसा सरकार के पास लंबित है। सुप्रीम कोर्ट और कानून मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार जस्टिस अमिताव राय 1 मार्च को रिटायर होंगे इसके बाद जस्टिस राजेश अग्रवाल 4 मार्च को रिटायर हो रहे हैं। जस्टिस राय के कामकाज का अंतिम दिन शुक्रवार था क्योंकि शीर्ष अदालत होली की छुट्टियों के बाद 5 मार्च को खुल रहा है।

वेबसाइट पर बताया गया है कि शीर्ष अदालत में चीफ जस्टिस बाद वरिष्ठतम जज जे. चेलमेश्वर 22 जून को रिटायर होंगे। इसके बाद जस्टिस आदर्श गोयल 6 जुलाई को सेवानिवृत्त होंगे। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2 अक्तूबर को रिटायर होंगे। इसके बाद जस्टिस कुरियन जोसफ 29 नवंबर और जस्टिस मदन बी लोकुर 30 दिसंबर को रिटायर होंगे। जजों के रिटायर होने और छह जजों की कमी से कॉलेजियम पर दबाव बढ़ेगा कि वह नामों की अनुशंसा करें और सरकार पर नियुक्तियों में तेजी लाने का दबाव होगा।

सम्मानित किये गये संगीतज्ञ पद्मश्री विजय किचलू

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद द्वारा प्रख्यात संगीतज्ञ पं. विजय किचलू को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर पंडित विजय किचलू ने कहा कि संगीत का साहित्य से गहरा संबंध है। एक-दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं। इसलिए संगीतकारों को साहित्य के शब्दों का महत्व समझना चाहिए। पंडित विजय किचलू को सारी दुनिया शास्त्रीय संगीत के संरक्षक और संवर्द्धक के रूप में जानती है। उन्होंने संगीतकारों की कई पीढ़ियों को प्रशिक्षित करवाया। उन्हें संगीत नाटक के महत्तर फैलोशिप से सम्मानित करने के बाद हाल में राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री भी प्राप्त हुई। भास्कर मित्र ने पंडित किचलू का परिचय विस्तार से देते हुए उनके कई पहलुओं के बारे में अवगत कराया। भारतीय भाषा परिषद में आयोजित उनके सम्मान समारोह में इसकी अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने अपने भावोद्गार व्यक्त करते हुए नगरवासियों की ओर से उन्हें सम्मानित किया। प्रसिद्ध संगीतज्ञ होलिकोत्सव के अवसर पर श्रीमती अबंती भट्टाचार्या ने ठुमरियों का गायन किया और अपनी संगीतमय प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। श्रीमती बिमला पोद्दार ने होली को प्रेम और उमंग का त्यौहार बताते हुए सभी को धन्यवाद दिया। समारोह का संचालन सुशील कान्ति ने किया।

 

समसामायिक मुद्दों को उठाता नाटक आखिरी रात

प्रोसिनियम आर्ट सेन्टर में “आखिर रात ” नाटक का प्रदर्शन यू .एल टी.नाट्य संस्था ने किया । नाटककार योगराज के इस  नाटक को एस. एम. राशिद ने निर्देशित किया । यह नाटक एक जेलर और कैदी के संबंधों पर आधारित है। मुल्क के एक बड़े समाजसेवी की हत्या के मामले में गिरफ्तार एक राजनीतिक कैदी है जिसे सुबह फांसी होने वाली है ,लेकिन जेल का मुलाजिम पादरी हमदर्दी रखता है और वह कैदी द्वारा की गयी हत्या के कारण जानना चाहता है लेकिन जेलर अपने वसुलो का पक्का है। उसके लिए मुल्क अहम है और वह कानून के अलावे कुछ नहीं सुनना चाहता और  कानूनी फैसले पर अमल करता है ।।दोनों में एक बहस शुरु हो जाती है अंततः जेलर जो खु़द एक बेहतर नर्म दिल इंसान है पादरी की बात मान लेता है ।


अपने जोखिम पर उसे अपने पास बुलाता है और शुरू हो जाती हत्या की राज जानने की मुहिम ।कैदी पढ़ा लिखा राजनैतिक नेता रहा है, वह हत्या के राज को छिपाता चला जा रहा है लेकिन आखिर में जेलर के सामने अपना  गुनाह स्वीकार लेता।फिर जेलर सवाल उठता है कि यह हत्या क्यों की गई ?  पादरी की  और हमदर्दी बढ़ जाती है। इधर जेलर कानून के आगे विवश पड़ जाता  है ।  फिर  बहस शूरू हो जाती है  और मालूम होता है कि समाजसेवी नेता देश के साथ एक सौदेबाजी में शामिल  था और इस छोटे नेता फंसाना चाहता था तभी इसने हत्या कर दी।
लेकिन इस केस की सरकारी और जांच हो रही थी और  अचानक कोर्ट का फैसला आता है कि  कैदी को रिहा कर दिया गया । पादरी की  और हमदर्दी बढ़ जाती है ,और इधर जेलर कानून के आगे वह विवश पड़ जाता है ।
उर्दू भाषा में यह नाटक कहीं कहीं बहुत नाटकियता पैदा करता है। कलाकारों ने बहुत सहजता और काव्यात्मक और संवेदनशीलता से निभाया है । नाटक में जेलर का चरित्र बहुत द्वंद  भरा है ,जिसे जीतेन्द्र सिहं ने बहुत खुबसूरती से निभाया  है ,उनका संवादों को दृश्यबंध के साथ बोलना,चलना प्रभावित करता है ।पादरी के रूप में शकील अहमद और समाजसेवी की बेटी की भूमिका में सदफ़ अयूब ने भी अच्छा अभिनय किया । पुराने अभिनेता प्रताप जयसवाल ने भी कैदी के चरित्र में ठीक ठाक रहे। नाटक का संगीत और इफ्केट ठीक रहा लेकिन परिधान पर निर्देशक को ध्यान देना होगा ।
निर्देशक एस.एम.राशिद ने बिना तामझाम  पैदा किये एक वर्तमान समाजिक  राजनैतिक मुद्दे पर नाटक प्रस्तुत किया ।

वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ मिश्रा का निधन

नयी दिल्ली :  वरिष्ठ पत्रकार एंव नेशनल हेराल्ड के प्रधान संपादक नीलाभ मिश्रा का आज चेन्नई के एक अस्पताल में निधन हो गया। वह 57 वर्ष के थे। वह गंभीर रूप से बीमार थे और यकृत की पुरानी बीमारी की जटिलताओं से जूझ रहे थे। उन्हें इस महीने की शुरूआत में उन्हें चेन्नई के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था और इसके पहले कि उनका यकृत प्रतिरोपित हो पाता, उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मिश्रा के निधन पर शोक व्यक्त किया और उन्हें एक ऐसा व्यक्ति बताया जिसने हमेशा मजबूती के साथ सच्चाई का पक्ष रखा। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘ वे संपादकों के संपादक थे। ऐसा व्यक्ति जिसने मजबूती के साथ सच बोला। संस्थान निर्माता थे। नीलाभ मिश्रा के आज सुबह दुखद निधन पर उनके परिजन, मित्रों, सहकर्मियों तथा प्रशांसकों के प्रति मैं अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं।’’

 

युद्धक विमान मिग-21 उड़ाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं अवनी चतुर्वेदी

अवनी चतुर्वेदी, ऐसी पहली भारतीय महिला, जिन्होंने अकेले जामनगर वायुसेना स्टेशन से युद्धक विमान मिग- 21 बाइसन उड़ाकर नया इतिहास रच दिया है। होनहार बिरवान के होत चीकने पात, यह कहावत अवनी चतुर्वेदी पर भी चरितार्थ होती है। सतना (मध्य प्रदेश) के कोठी कंचन गांव में पैदा हुईं एवं बाद में इसी राज्य के रीवा जिले में जा बसीं चौबीस वर्षीय अवनी बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रही हैं। उनके पिता दिनकर चतुर्वेदी मध्य प्रदेश सरकार के वाटर रिसोर्स डिपार्टमेंट में एक एग्जिक्युटिव इंजीनियर और मां गृहिणी हैं। उनके भाई सेना में कैप्टन हैं और मामा रिटायर्ड कर्नल। भाई निरभ कविताएं लिखते हैं, उनसे ही अवनी को कविताएं लिखने का भी शौक है।

इसके अलावा उनकी चित्रकारी, टेनिस आदि में ही दिलचस्पी नहीं, अपने कस्बाई अतीत में वह सखी-सहेलियों के साथ मेंहदी रचाने से लेकर अन्य हर तरह की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल हुआ करती थीं। स्नातक तक उनकी पढ़ाई-लिखाई वनस्थली (राजस्थान) में एवं लड़ाकू विमान उड़ाने का प्रशिक्षण दो चरणों में हैदराबाद की वायु सेना अकादमी और बिदार (कर्नाटक) में मिला। अभी उनके प्रशिक्षण का तीसरा चरण पूरा होना है।

उसके बाद वह लड़ाकू जेट विमान सुखोई, तेजस आदि भी उड़ाने लगेंगी। शुरू से ही सेना में जाने की ठान चुकी अवनी छात्र जीवन में एनसीसी में हमेशा भाग लेती रही हैं। वनस्थली की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह जून-जुलाई 2016 में वह फ्लाइंग ऑफिसर चुन ली गईं। लड़ाकू विमान उड़ाने के प्रशिक्षण के दौरान उनके साथ भावना कांत और मोहना सिंह भी रहीं। तीनों को एक साथ भारतीय वायु सेना के लड़ाकू स्क्वाड्रन में भर्ती मिली थी। उस समय देश के रक्षा मंत्री थे मनोहर पर्रिकर। अवनी अपनी सफलता का श्रेय मुख्यतः पिता को देती हैं, जिनसे उन्हें जीवन के उन्नत पथ पर आगे बढ़ने की बचपन से ही प्रेरणा मिलती रही थी। इंडियन एयरफोर्स की फ्लाइंग ऑफिसर अवनी के मन में कभी वायु सैनिक बनने का जज्बा सैन्य अधिकारी मामा और भाई की संगत से पैदा हुआ था। वह देश की सुर्खियों में उस वक्त आईं, जब हाल ही में उन्होंने गुजरात के जामनगर में अपनी पहली ट्रेनिंग में अकेले मिग-21 बाइसन फाइटर प्लेन उड़ाया। यह भारतीय वायु सेना और पूरे देश के लिए एक विशेष उपलब्धि रही। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने 2015 में महिलाओं को फाइटर पायलट में शामिल करने का फैसला किया था।

अब तक विश्व के चार देशों अमेरिका, पाकिस्तान, ब्रिटेन और इजरायल में महिलाओं को फाइटर पायलट बनने के अवसर सुलभ रहे हैं। देश की वायुसेना में पहला महिला सशक्तीकरण हुआ 19 फरवरी 2018 को, जब अवनी ने सफलतापूर्वक अपना मिशन पूरा कर यह इतिहास रचा। बताते हैं कि जिस वक्त वह मिग में सवार हुईं, अनुभवी फ्लायर्स और प्रशिक्षकों ने जामनगर एयरबेस के एयर ट्रैफिक कंट्रोल और रन-वे पर लगातार अपनी आंखें साधे रखी थीं। अवनी की कामयाबी को इसलिए भी विशेष दर्जा मिला क्योंकि ‘बाइसन’ की तकनीकि लैंडिंग और टेक-ऑफ में फर्राटे की स्पीड होती है, जिसे नियंत्रित करते हुए आकाश में छलांग लगाना कोई हंसी-खेल नहीं रहता है।

मोहना और भावना के साथ अवनी चतुर्वेदी को उड़ाकू विमान उड़ाने का कठिन प्रशिक्षण अक्तूबर 2016 से दिया जा रहा था। अवनी की उड़ान से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी दिल गर्व से भर उठा। उन्होंने ‘मन की बात’ में कहा – ‘कल्पना चावला कोलंबिया अंतरिक्षयान दुर्घटना में वह हमें छोड़ कर चली गई लेकिन दुनिया भर के युवाओं को प्रेरणा दे गईं। उन्होंने अपने जीवन से संदेश दिया कि नारी शक्ति के लिए कोई सीमा नहीं है। वह कहते हैं कि अवनी ने भारतीय वायुसेना के इतिहास में नया अध्याय जोड़ा है। उनकी इस उपलब्धि से प्रदेशवासियों, विशेषकर विन्ध्यवासियों का मान बढ़ा है। वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ बताते हैं कि उड़ान के लिए कठिन अभ्यास के बावजूद इन तीनों प्रशिक्षुओं का प्रदर्शन अन्य पायलटों की तरह ही पूरी तरह कुशल रहा। हॉक एडवांस जेट ट्रेनर पर उड़ान भरने से लेकर बाइसन तक अवनी का यह सफर काफी चुनौतियों भरा रहा।

 

 

जिमनास्टिक वर्ल्ड कप में पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनीं अरुणा

मेलबर्न : भारतीय जिमनास्ट अरुणा रेड्डी ने मेलबर्न में चल रहे जिमनास्टिक वर्ल्ड कप में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया। 22 साल की अरुणा महिला वॉल्ड ईवेंट में तीसरे स्थान पर रहीं। कांस्य पदक जीतने के साथ ही वो जिमनास्ट में मेडल जीतने वाली पहली महिला बन गई हैं। रेड्डी ने मेडल राउंड में 13.649 का स्कोर किया। वहीं भारत की प्रांति नायक छठे स्थान पर रहीं।

टूनार्मेंट में अरुणा के अलावा स्लोवाकिया की ट्जासा क्लिसलेफ ने 13.800 के स्कोर के साथ स्वर्ण पदक जीता जबकि मेजबान ऑस्ट्रेलिया की एमिली व्हाइटहेड ने 13.699 का स्कोर कर रजत पदक पर कब्जा जमाया।