Friday, July 10, 2026
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विलुप्त होने के कगार पर 42 भारतीय भाषाएं

नयी दिल्ली : विशाल और प्राचीनतम संस्कृति वाले भारत में भाषाओं और उनसे जुड़ी संस्कृतियों का खजाना है। लेकिन हाईटेक युग में आने के बाद भारत में 42 भाषाएं या बोलियां संकट में हैं। ऐसा माना जाता है कि संकटग्रस्त इन भाषाओं को बोलने वाले कुछ हजार लोग ही हैं। गृह मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार इन 42 भाषाओं में से कुछ भाषाएं विलुप्त प्राय भी हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी ऐसी 42 भारतीय भाषाओं या बोलियों की सूची तैयार की है। यह सभी खतरे में हैं और धीरे-धीरे विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हैं।

संकटग्रस्त भाषाओं में 11 अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की हैं। इन भाषाओं के नाम :- ग्रेट अंडमानीज, जरावा, लामोंगजी, लुरो, मियोत, ओंगे, पु, सनेन्यो, सेंतिलीज, शोम्पेन और तकाहनयिलांग हैं। मणिपुर की सात संकटग्रस्त भाषाएं एमोल, अक्का, कोइरेन, लामगैंग, लैंगरोंग, पुरुम और तराओ हैं। हिमाचल प्रदेश की चार भाषाएं- बघाती, हंदुरी, पंगवाली और सिरमौदी भी खतरे में हैं।

अन्य संकटग्रस्त भाषाओं में ओडिशा की मंडा, परजी और पेंगो हैं। कर्नाटक की कोरागा और कुरुबा जबकि आंध्र प्रदेश की गडाबा और नैकी हैं। तमिलनाडु की कोटा और टोडा विलुप्त प्राय हैं। असम की नोरा और ताई रोंग भी खतरे में हैं। उत्तराखंड की बंगानी, झारखंड की बिरहोर, महाराष्ट्र की निहाली, मेघालय की रुगा और पश्चिम बंगाल की टोटो भी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही हैं।

सरकार कर रही बचाने की कोशिश 

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मैसूर स्थित भारतीय भाषाओं के केंद्रीय संस्थान देश की खतरे में पड़ी भाषाओं के संरक्षण और अस्तित्व की रक्षा करने के लिए केंद्रीय योजनाओं के तहत कई उपाय कर रहा है। इन कार्यक्रमों के तहत व्याकरण संबंधी विस्तृत जानकारी जुटाना, एक भाषा और दो भाषाओं में डिक्शनरी तैयार करने के काम किए जा रहे हैं। इसके अलावा, भाषा के मूल नियम, उन भाषाओं की लोककथाओं, इन सभी भाषाओं या बोलियों की खासियत को लिखित में संरक्षित किया जा रहा है। यह सभी वह भाषाएं हैं जिन्हें दस हजार से भी कम लोग बोलते हैं।

22 आधिकारिक भाषाएं

जनगणना निदेशालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 सूचीबद्ध भाषाएं हैं, जो आधिकारिक भाषाएं हैं। संविधान की आठवीं सूची में निहित अनुच्छेद 344(1) और 351 के तहत राजभाषा हिंदी समेत जिन 22 भाषाओं को मान्यता मिली है, वह इस प्रकार हैं :-

असमी, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मैतेई (मणिपुरी), मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू।

इसके अलावा, देश में 100 गैर-सूचीबद्ध भाषाएं भी हैं। इन्हें लोग बड़े पैमाने पर बोलते और लिखते-पढ़ते हैं। समझा जाता है कि इन भाषाओं को कम से कम एक लाख लोग या उससे अधिक लोग बोलते हैं। इनके अतिरिक्त देश में 31 अन्य भाषाएं भी हैं जिन्हें विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों ने आधिकारिक भाषा की मान्यता दी हुई है। जनगणना के आंकड़ों के अतिरिक्त देश में 1635 भाषाएं तार्किक रूप से मातृभाषा हैं। जबकि 234 अन्य मातृभाषाओं की भी पहचान की गई है।

38 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में डालने की मांग

अंगिका, बंजारा, बाजिका, भोजपुरी, भोति, भोतिया, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, धातकी, गढ़वाली, गोंडी, गुज्जरी, हो, कच्चाछी, कामतापुरी, कार्बी, खासी, कोडावा (कोरगी), कोक बराक, कुमांयुनी, कुरक, कुरमाली, लीपछा, लिम्बू, मिजो (लुशाई), मगही, मुंदरी, नागपुरी, निकोबारीज, हिमाचली, पाली, राजस्थानी, संबलपुरी/कोसाली, शौरसेनी (प्रकृत), सिरैकी, तेन्यिदी, तुल्लू।

बाल फिल्मों की उपेक्षा के कारण बड़ों के कंटेंट देखने को मजबूर हैं बच्चे

भारत के पहले सुपरहीरो के तौर पर पहचान बनाने वाले मुकेश खन्ना ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से नाराज़गी जताते हुए भारतीय बाल फिल्म सोसाइटी (सीएफएसआई) के चेयरमेन पद पर रह चुके है ं और उनका  मानना है कि बाल फिल्मों को इस देश में प्रोत्साहन सरकार से नहीं मिल रहा। उनका कहना है कि मंत्रालय बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाता। शक्तिमान में ‘शक्तिमान’ और महाभारत में ‘भीष्म पितामह’ जैसे किरदार निभा चुके मुकेश का कहना है कि वो पहले भी कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।

मुकेश कहते हैं कि बच्चों के लिए फ़िल्मों की भरमार है, लेकिन ये फ़िल्में कभी रिलीज़ ही नहीं हुईं। बच्चों को कभी मालूम ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए भी फ़िल्में बनती हैं। ”मुझे लगता है कि मुझसे पहले जो भी लोग यहां रहे उन्होंने कभी बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने के बारे में इस तरीक़े से सोचा ही नहीं। शायद यही वजह है कि जो फ़िल्में वयस्क देखते हैं, वही छोटे बच्चे भी देखते हैं।’ मुकेश कहते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में आठ फ़िल्में बनाईं और मंत्रालय से कहा कि वो फ़ंड बढ़ाए। उनका दावा है कि उनकी चिट्ठी प्रधानमंत्री तक जा चुकी है, लेकिन कोई भी ऐक्शन नहीं लिया गया।

उनके अनुसार, ”मैं फ़िल्में डिस्ट्रीब्यूट करना चाहता हूं, लेकिन वो कहते हैं इसे टेंडर कर दो लेकिन आप ही सोचिए जिस देश में बच्चों की फ़िल्म को लेकर इतनी उदासीनता हो वहां टेंडर निकालकर क्या मिलेगा।”कई बार चेयरपर्सन होने के बावजूद मुझे फ़ैसले लेने में दिक्क़त आई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या पैसों की है। मैं यहां 25 फ़िल्में अप्रूव करके बैठा हूं लेकिन मेरे पास पैसा सिर्फ़ चार फ़िल्मों का है।” मुकेश कहते हैं कि बड़े-बड़े निर्देशक जैसे अनुपम खेर, राजकुमार संतोषी, नीरज पांडेय संयुक्त रूप से बच्चों के लिए फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें देने के लिए हमारे पास पैसे ही नहीं हैं। ‘ बच्चों के पास अपनी फ़िल्में ही नहीं हैं. ऐसे में वो मजबूरी में सास-बहू वाले सीरियल देख रहे हैं या फिर गंदी-गंदी फिल़्में।”

इतनी देर से प्रतिक्रिया क्यों?

अगर आपको लग रहा था कि मंत्रालय आपका सहयोग नहीं कर रहा तो आपने इतनी देर से इस्तीफ़ा क्यों दिया? इस सवाल के जवाब में मुकेश कहते हैं, ”मेरे पास 12 फिल्में थी. उनका बजट अप्रूव कराना मेरी ज़िम्मेदारी थी। साथ ही ये सारी समस्याएं बीते एक साल में ज़्यादा बढ़ी हैं। ‘मुकेश मानते हैं कि ‘यहां लोगों की सोच है कि फ़िल्में बनाकर गोदाम में डाल दो। वो कहां लगेंगी, लोगों तक कैसे पहुंच पाएंगी इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता.’

क्यों नहीं चुना कोई दूसरा रास्ता?

मुकेश कहते हैं कि ‘ऑनलाइन विकल्प हैं, लेकिन इससे सीएफ़एसआई का कोई भला नहीं होगा। डिजिटल माध्यम से बच्चों तक फ़िल्में पहुंच तो जाएंगी, लेकिन इससे किसी को सीएफ़एसआई के बारे में नहीं पता चलेगा। फ़िल्म का हिट होना ज़रूरी है. तभी लोगों को ये समझ आएगा कि बच्चों के लिए भी फ़िल्में बनना ज़रूरी है। ‘ बड़ों का कन्टेंट, बच्चों के लिए कैसे हो सकता है? मुकेश कहते हैं, ‘आज के समय में इससे ख़तरनाक कुछ नहीं. चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को अपने से दोगुनी उम्र की वो बातें पता होती हैं जो उसे उस वक्त नहीं पता होनी चाहिए।  ये सारी चीज़ें कहीं न कहीं बच्चे में अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम करती हैं।’

क्या है सीएफएसआई?

सीएफएसआई की स्थापना आज़ादी के कुछ ही समय बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई थी. 1955 से सीएफएसआई ने बतौर स्वायत्त संस्थान काम करना शुरू किया. 1957 में वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सीएफएसआई की फ़िल्म ‘जलदीप’ को पहला इनाम मिला था।

सीएफएसआई का मक़सद बच्चों के लिए ऐसी फ़िल्मों का निर्माण करना है जो उनके विकास में सहायक हो। सीएफएसआई की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार अब तक वह 10 अलग-अलग भाषाओं में 250 फिल्मों का निर्माण कर चुकी है.

…लेकिन इस बीच सवाल वहीं का वहीं रह जाता है कि भारत में बच्चों के लिए मनोरंजन की भारी कमी है और इस कमी को वो बड़ों वाले कन्टेंट देखकर ही पूरा कर रहे हैं।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

जिन्दगी का जहर पीकर मुस्कान से दीवाना बनाने वाली मधुबाला

भारतीय बॉलीवुड के सबसे ख़ूबसूरत चेहरों की जब भी बात होती है तो लोग मधुबाला का नाम सबसे पहले लेते हैं और मधुबाला का नाम लेते ही आपके जेहन में उनकी कई छवियां उभर आती हैं। महल में सस्पेंस जगाने वाली मधुबाला हों या फिर मिस्टेर एंड मिसेज 55 की शहरी बाला या फिर हावड़ा ब्रिज की मादक डांसर हो या फिर मुगले आज़म की कनीज अनारकली जिसका जलवा किसी शहजादी से कम नहीं लगता।

मोहक, ख़ूबसूरत, दिलकश और ताज़गी से भरपूर, जिसके चेहरे से नूर टपकता रहा हो, तो आप मधुबाला के अलावा शायद ही किसी दूसरे चेहरे के बारे में सोच पाएं। मधुबाला की ख़ूबसूरती का अंदाज़ा लगाना हो तो 1990 में एक फ़िल्मी पत्रिका मूवी के बॉलीवुड की आल टाइम ग्रेटेस्ट अभिनेत्रियों की लोकप्रियता वाले सर्वेक्षण को देखिए, उसमें 58 फ़ीसदी लोगों के वोट के साथ मधुबाला नंबर एक पर रहीं थीं, उनके आसपास कोई दूसरा नहीं पहुंच पाया था। इसमें नरगिस 13 फ़ीसदी वोटों के साथ दूसरे पायदान पर रहीं थीं। शोख और अल्हड़ अंदाज़ के साथ अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर मधुबाला को गुजरे पांच दशक हो चुके हैं लेकिन आज भी उनके चाहने वाले उन्हें जिस शिद्दत से याद करते हैं, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

सबसे ख़ूबसूरत मधुबाला

मधुबाला के साथ ही अपना डेब्यू करने वाले राजकपूर ने मधुबाला के बारे में एक बार कहा था लगता है कि ईश्वर ने खुद अपने हाथों से संगमरमर से उन्हें तराशा है। पेंगुइन इंडिया से प्रकाशित और भाईचंद पटेल की संपादित बॉलीवुड टॉप 20- सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडिया में राजकपूर का ये बयान दर्ज है। इसी पुस्तक के मुताबिक शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अपने फ़िल्मी जगत में काम करने के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब एक दिन उन्होंने शूटिंग करते हुए मधुबाला को देखा था उन्हें लगा कि उनका दिन बन गया।

शम्मी कपूर ने अपनी ऑटोबोयोग्राफी शम्मी कपूर द गेम चेंजर में एक पूरा चैप्टर मधुबाला को समर्पित किया है। इसका शीर्षक है- फेल मेडली इन लव विद मधुबाला। शम्मी कपूर इसमें कहते हैं- मैं ये जानता था कि मधु किसी और के प्यार में हैं, लेकिन इसके बाद भी मैं ये स्वीकार करना चाहता हूं कि मैं उनसे पागलों की तरह प्यार करने लगा था। इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि मैं ने उनसे ख़ूबसूरत औरत कभी नहीं देखी। शम्मी कपूर ने 2011 में प्रकाशित इस आत्मकथा में कहा कि छह दशक बाद आज भी जब वो कभी मधुबाला के बारे में सोचते हैं तो उनके दिल की धड़कन मानो थम जाती है। मधुबाला की ख़ूबसूरती का ये आलम था कि शम्मी कपूर अपनी डेब्यू फ़िल्म रेल का डब्बा फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला को देखते ही अपने डॉयलाग भूल जाया करते थे।

महज 36 साल की उम्र, जीवन के आख़िरी नौ साल अपने घर में क़ैद हो कर रहने की मज़बूरी और केवल 66 फ़िल्में. लेकिन मधुबाला ने इन सबसे वो मुकाम हासिल कर लिया जो उन्हें हमेशा हमेशा के लिए अमर कर गया। जन्म से ही मधुबाला के दिल में छेद था और डॉक्टरों के मुताबिक उस बीमारी में उन्हें बहुत ज्यादा आराम की ज़रूरत थी लेकिन मधुबाला के पिता ने उन्हें ऐसी दुनिया में धकेला हुआ था जहां उन्हें लगातार काम करना पड़ा था।

दरअसल मधुबाला अपने माता-पिता ही नहीं 11 भाई बहन वाले परिवार में इकलौती आजीविका कमाने वाली थीं। पिता इंपीरियरल टौबेको कंपनी में काम किया करते थे, लाहौर में, वो नौकरी छूटी तो दिल्ली आए और फिर दिल्ली से बंबई पहुंचे तो यही ध्यान था कि ख़ूबसूरत मधुबाला को फ़िल्मों में काम मिल जाएगा। महज छह साल साल की उम्र से मधुबाला ने मायानगरी में अपने क़दम रख दिए थे।

इस काम ने उन्हें कितना खपा दिया इसकी झलक 1957 में फ़िल्मफेयर की उस ख़ास सिरीज़ में मिलती है जिसमें पत्रिका ने उस जमाने के सुपरस्टार से अपने बारे में कुछ लिखने को कहा था। नरगिस, मीना कुमारी, नूतन, राजकपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद, किशोर कुमार, अशोक कुमार सबने इसमें अपने बारे में लिखा था।

अपने बारे में मधुबाला

इस सिरीज़ में मधुबाला ने अपने बारे में कुछ लिखने से इनकार करते हुए माफ़ी मांगी थी, माफ़ीनामे में मधुबाला ने लिखा था, “मैं खुद को खो चुकी हूं। ऐसे में खुद के बारे में क्या लिखूं. मुझे ऐसा लग रहा है कि आपने मुझे उसके बारे में लिखने को कहा है जिसे मैं नहीं जानती। समय ने मुझे खुद से मिलने का वक्त नहीं दिया। जब मैं पांच साल की थी तो किसी ने मेरे बारे में पूछा नहीं और मैं इस भूल भुलैया में आ गई. फिल्म इंडस्ट्री ने मुझे पहली सीख यही दी थी कि आपको अपने बारे में सबकुछ भूलना होता है, सबकुछ खुद को भी तभी आप एक्ट कर पाते हैं, ऐसे में मैं खुद के बारे में क्या लिखूं।”

मधुबाला के फिल्मी जीवन पर ख़तीजा अक़बर ने आई वांट टू लिव- द स्टोरी ऑफ़ मधुबाला लिखी है। इस पुस्तक से गुजरने के दौरान पता चलता है कि मधुबाला की ख़ूबसूरती ने उनके अभिनय के प्रति अनुशासन और सीखने की लगन को कभी कम नहीं होने दिया। मधुबाला उस दौर में फिल्मी दुनिया की इकलौती कलाकार थीं जो समय से पहले सेट पर मौजूद होती थीं. हालांकि स्वास्थ्य कारणों से वो रात में शूटिंग नहीं किया करती थीं और अपने पूरे करियर में उन्होंने कभी आउटडोर शूटिंग में हिस्सा नहीं लिया। इसके बावजूद मधुबाला अपने समय की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार होती रहीं।

काम के प्रति उनके परफैक्शन की मिसाल देखनी हो तो मुगले आज़म फिल्म के वो प्रेम दृश्यों को देखिए जिसमें शहजादा सलीम, अनारकली को मोर के पंखों से छेड़ता है। इस दृश्य को भारतीय सिने संसार के सबसे रोमांटिक दृश्यों में शुमार किया जाता है। ये जानना दिलचस्प है कि इन दृश्यों के अलावा भी मुगले आज़म के तमाम प्रेम दृश्यों के वक्त दिलीप कुमार और मधुबाला की आपसी बातचीत बंद थी।

दिलीप कुमार-मधुबाला की प्रेम कहानी

दोनों को एक समय में भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे रोमांटिक जोड़ी माना जाता था, दोनों एक दूसरे से प्यार भी करते थे। 1955 में पहली बार फ़िल्म इंसानियत के प्रीमियर के दौरान मधुबाला दिलीप कुमार के साथ सार्वजनिक तौर पर नज़र आईं थीं। ये पहला और इकलौता मौका था जब दिलीप कुमार और मधुबाला एक साथ सार्वजनिक तौर पर साथ नजर आए थे। इस मौके को कवर करने वाले पत्रकार के. राजदान ने बाद में लिखा था कि मधुबाला इससे ज़्यादा ख़ुश पहले कभी नज़र नहीं आई थीं। रॉक्सी सिनेमा में हुए इस प्रीमियर में मधुबाला हमेशा दिलीप कुमार की बांह थामे हुए नज़र आती रहीं। शम्मी कपूर ने इस बात का जिक्र भी किया है कि किस तरह से दिलीप कुमार केवल मधुबाला को देखने के लिए मुंबई से पूना तक कार चला कर आया करते थे और दूर खड़े होकर मधुबाला को देखा करते थे।

बहरहाल, एक आम धारणा ये है कि मुधबाला के पिता नहीं चाहते थे कि मधुबाला और दिलीप कुमार की शादी हो। इसको लेकर फ़िल्मी पत्र पत्रिकाओं में काफ़ी कुछ छपता भी रहा है. लेकिन दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा दिलीप कुमार- द सब्सटेंस एंड द शैडो में इससे उलट बात कही है।

मधुबाला-दिलीप ऐसे हुए अलग?

उन्होंने लिखा है, “जैसा कि कहा जाता है, उसके उलट मधु और मेरी शादी के ख़िलाफ़ उनके पिता नहीं थे। उनकी अपनी प्रॉडक्शन कंपनी थी और वे इस बात से बेहद ख़ुश थे कि एक ही घर में दो बड़े स्टार मौजूद होंगे। वे तो चाहते थे कि दिलीप कुमार और मधुबाला एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले अपने करियर के अंत तक उनकी फिल्मों में डूएट गाते नजर आएं।”

फिर ऐसी क्या बात हुई, जिसके चलते बॉलीवुड की सबसे मशहूर प्रेम कहानी शादी तक नहीं पहुंच पाई. दिलीप कुमार ने इसके बारे में भी लिखा है, “जब मुझे मधु से उनके पिता की योजनाओं के बारे में पता चला तो मेरी उनसे कई बार बातचीत हुई जिसमें मैंने उन दोनों से कहा कि मेरे काम करने का अपना तरीका है, मैं अपने हिसाब से प्रोजेक्ट चुनता हूं और उसमें मेरा अपना भी प्रॉडक्शन हाउस हो तो भी ढिलाई नहीं कर सकता।”

दिलीप कुमार के मुताबिक उनकी यही बात मधुबाला के पिता अयातुल्ला ख़ान को पसंद नहीं आई और उन्होंने दिलीप कुमार को जिद्दी और अड़ियल मानना शुरू कर दिया। दिलीप के मुताबिक मधुबाला का रुझान हमेशा अपने पिता की तरफ़ रहा और वो कहती रहीं कि शादी होने के बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा।

ऐसा भी नहीं था कि दिलीप शादी के लिए तैयार नहीं थे, 1956 में ढाके की मलमल फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दिन उन्होंने मधुबाला से कहा भी काज़ी इंतज़ार कर रहे हैं चलो मेरे घर आज शादी कर लेते हैं लेकिन उनकी बातों पर मुधबाला रोने लगीं. दिलीप कुमार कहते रहे कि अगर आज तुम नहीं चली तो मैं तुम्हारे पास लौटकर नहीं आऊंगा, कभी नहीं आऊंगा।

दिलीप कुमार उसके बाद मधुबाला के पास नहीं लौटे क्योंकि दोनों के बीच 1957 में ऐसा विवाद हो गया जिसकी आंच ने इस मोहब्बत को असमय ख़त्म कर डाला। 1957 में प्रदर्शित नया दौर फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार और मुधबाला को निर्देशक बीआर चोपड़ा ने साइन किया. इस फ़िल्म की आउटडोर शूटिंग पूना और भोपाल में होनी थी, लेकिन मधुबाला के पिता ने मधुबाला को भोपाल भेजने से इनकार कर दिया तब तक बीआर चोपड़ा अपनी फ़िल्म की काफ़ी शूटिंग कर चुके थे।

पेशे से वकील रह चुके बीआर चोपड़ा मामले को कोर्ट में ले गए और इस बीच उन्होंने मधुबाला की जगह वैजयंती माला को साइन कर लिया। इसी मामले की सुनवाई के दौरान दिलीप कुमार ने कोर्ट में कहा था कि वे मधुबाला से मोहब्बत करते हैं और उनके मरने तक तक मोहब्बत करते रहेंगे लेकिन उन्होंने अपना बयान बीआर चोपड़ा के पक्ष में दिया था।

दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में इसके बारे में लिखा है कि उन्होंने अपनी ओर से सुलह की बहुत कोशिश की थी लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ था और पूरे मामले में बीआर चोपड़ा का पक्ष सही था।  इसके बाद मधुबाला को यक़ीन हो गया कि दिलीप कुमार उनके पास कभी नहीं लौटेंगे।

किशोर कुमार से शादी

इस अलगाव के चलते ही मधुबाला ने शादी करने का मन बनाया होगा लेकिन वो किशोर कुमार से एक दिन शादी कर लेंगी, इसका भरोसा किसी को नहीं था. लेकिन जिस वक्त मधुबाला और दिलीप कुमार की राहें अलग होने लगी थीं, उसी वक्त किशोर कुमार का अपनी पहली पत्नी रोमा देवी से तलाक़ हुआ था और दोनों एक साथ कई फ़िल्मों में काम कर रहे थे।

इस वजह से दोनों के बीच एक आकर्षण हुआ हो और 1960 में किशोर कुमार और मधुबाला ने शादी कर ली। किशोर कुमार के साथ शादी के फ़ैसले ने मधुबाला को दिलीप कुमार से अलग होने के तुलना में कहीं ज़्यादा अाघात पहुंचाया। किशोर कुमार को मधुबाला की बीमारी के बारे में पता तो था लेकिन उसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं था. वे मधुबाला को इलाज़ के लिए लंदन ले गए, जहां डॉक्टरों ने जवाब देते हुए कहा कि अब ज्यादा से ज्यादा मधुबाला एक से दो साल ही जी पाएंगी।

इसके बाद किशोर कुमार जब लौटे तो उन्होंने मधुबाला को उनके पिता और बहनों के पास छोड़ आए और कहा कि वे इतने व्यस्त रहते हैं कि मधुबाला की देखभाल नहीं कर पाऐेंगे। वो मधुबाला से मिलने के लिए आते ज़रूर रहे लेकिन तीन चार महीनों के अंतराल पर यानी जब मधुबाला को किशोर कुमार के साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब किशोर कुमार के पास उनके लिए समय ही नहीं था।

ऐसे में दिल की बीमारी बढ़ती गई लेकिन मधुबाला के अंदर जीने की इच्छा काफ़ी भरी हुई थी, लिहाजा वो डॉक्टरों के हाथ खड़े करने के बाद नौ साल तक जीवित रहीं लेकिन जीवन के आख़िरी नौ साल उन्होंने बेहद एकाकी में गुजारे। इस दौरान बेहद गिने चुने लोग ही उनका हाल चाल जानने के लिए उनके घर जाते रहे थे। इसमें दिलीप कुमार का परिवार भी शामिल था।

हालांकि मुगले आज़म के रिलीज़ होने के ठीक बाद मधुबाला गंभीर रूप से बीमार हो गईं, हालांकि अगले चार साल तक उनके काम वाली फिल्में रिलीज़ होती रहीं लेकिन मुधबाला आख़िरी दिनों में देखने में कैसी थीं, इसको लेकर भी कम कयास नहीं लगाए जाते रहे हैं.

बॉलीवुड टॉप 20- सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडिया में मधुबाला के अंतिम दिनों की झलक मिलती है। दिलीप कुमार की बहन सईदा ख़ान के मुताबिक मधुबाला की मौत से एक दिन पहले वो उनसे मिली थीं और उस वक्त तक उनकी ख़ूबसूरती में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई थी।

हालांकि लंबी बीमारी के चलते वो थकी हारीं ज़रूर हुई थीं लेकिन चेहरे का नूर बना रहा था लेकिन शायद बीमारी ने मधुबाला के आत्मबल को कमज़ोर किया था, तभी अपने अंतिम दिनों में वो मेकअप करने लगीं थीं। सुपरस्टार्श ऑफ़ इंडिया में फिल्म निर्देशक शक्ति सामंता ने बताया कि वो भी मधुबाला की मौत से ठीक एक दिन पहले उनसे मिले थे और वो काफी मेकअप में थीं हालांकि अपने पूरे फ़िल्मी करियर के दौरान वो काफ़ी कम मेकअप करने के लिए मशहूर रही थीं।

उनकी जिस ख़ूबसूरती का बॉलीवुड में कभी डंका बजता था, उस दुनिया ने उन्हें भुला दिया लेकिन वो भारतीय सिने प्रेमियों के दिलों पर राज करती रहीं। भारतीय डाक सेवा ने 18 मार्च, 2008 को मधुबाला की याद में एक डाक टिकट जारी किया था, इस मौके पर फ़िल्म अभिनेता मनोज कुमार ने कहा था, मधुबाला देश का चेहरा थीं। शताब्दी में कोई एक मधुबाला ही हो सकती हैं. जब भी उन्हें मैं देखता था तो मेरे दिल में ग़जल गूंजने लगती थी। वाकई में मधुबाला कोई दूसरी नहीं हो सकती थीं, जिसकी तस्वीर देखने मात्र से दिलों में संवेदनाओं के तार झंकृत होने लगते हों. हमारे भी और आपके भी।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

बिहार की आकाँक्षा ने बनाया बच्चों को पढ़ाने वाला रोबोट

बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली आकांक्षा आनंद ने एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो बच्चों की पढ़ाई में उनकी मदद करेगा। उनका बनाया हुआ ये रोबोट बच्चों को खेल-खेल में पढ़ने लिखने की चीजें सिखाएगा। इस रोबोट का नाम निनो रखा गया है।

बता दें, आकांक्षा एजुकेशन सिस्टम को एक नया रूप देना चाहती हैं जिसके बाद उन्होंने इस मॉडल को बनाने की तैयारी की वह बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली हैं. बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने दो साल तक एक आईटी कंपनी में नौकरी की. फिर वह ‘सिरेना टेक्नॉलजी’ के साथ काम करने लगी। इस कंपनी में वह रोबोटिक्स के क्षेत्र में काम करती हैं।

आकांक्षा ने पढ़ाई के दौरान हांगकांग, चीन और ताइवान घूम चुकी हैं. वहां के बच्चों में उन्होंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चों को रोबोट बना रहे हैं और उनके साथ खेल रहे हैं। तब उन्होंने सोचा कि जब दूसरे देश के बच्चे इसे आसानी से समझ सकते हैं तो हमारे देश के बच्चे भी इसे आसानी से समझ सकते हैं जिसके बाद उन्होंने ऐसा रोबोट बनाने की सोची जो बच्चों को नए और अलग तरीके से पढ़ाना, खेलना, डांस जैसी चीजों को सिखाने में मदद करें ताकि बच्चे पढ़ाई में रुचि लें। रोबोट की खासियत है कि ये बात कर लेता है और डांस भी करता है। इसे ऐप या वॉइस कमांड के जरिए संचालित किया जा सकता है।

आकांक्षा के इस प्रोजेक्ट में कर्नाटक सरकार ने भी मदद की है और इस प्रयास के लिए प्रोत्साहित भी किया. वही इस रोबोट से पहले आकांक्षा ने अभी तक कई तरह के रोबोट बनाए हैं, जो अलग-अलग काम करते हैं।  इनमें ह्यूमेनाइड रोबोट, रोबोटिक आर्म, ऑटोमोबाइल किट, पेट रोबोट, क्वार्डबोट रोबोट जैसे कई रोबोट शामिल हैं।

युवाओं को डेटिंग ऐप ज्यादा पसंद

भारतीय युवा वैवाहिक साइटों और विज्ञापनों के बजाय मोबाइल डेटिंग एप और सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से जुड़ना ज्यादा पसंद करते हैं. मंगलवार को जारी एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ है। सर्वेक्षण के हवाले से एसोचैम ने एक बयान में कहा, कुल उत्तरदाताओं में से करीब 55 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने निर्धारित मानदंडों और परंपराओं से हटकर अनौपचारिक डेटिंग और किसी से जुड़ने के लिए डेटिंग ऐप का इस्तेमाल किया।

एसोचैम के सोशल मीडिया शाखा ने चार मेट्रो शहर समेत 10 बड़े शहरों में 20 से 30 साल की आयुसीमा के 1,500 लोगों पर 1 जनवरी से 10 फरवरी के बीच यह सर्वे आयोजित किया था। बयान में कहा गया, उत्तरदाताओं में अधिकतर लोगों ने कहा कि यह सुरक्षित है, क्योंकि इससे उन्हें अपनी पहचान ना बताने की अनुमति मिलती है, भले ही उनके पास उसे दिखाने का विकल्प हो। एसोचैम के प्रधानसचिव डी.एस. रावत ने कहा कि निकट भविष्य में डेटिंग ऐप को और ज्यादा प्रसिद्धि मिलेगी, क्योंकि यह ऑनलाइन लोगों से मिलने और उनके साथ जुड़ने के अवसरों की पेशकश करते हैं। उन्होंने कहा, फिलहाल यह एक नवोदित स्तर पर है और इसका मूल्य 500 करोड़ रुपये का भी नहीं है, लेकिन भारत मे बढ़ती युवाओं की संख्या ऑनलाइन डेटिंग के लिए प्रयास कर रही है और आने वाले दिनों में यह करोड़ों का उद्योग बन जाएगा।

विटामिन डी नहीं मिलने से खोखली हो रही हैं हड्डियाँ

शीशे से बंद एयरकंडीशनिंग वाले घर और दफ्तर भले ही आरामदायक महसूस होते हों, लेकिन ये आपकी हड्डियों को खोखला बना रहे हैं। आधुनिक जीवन शैली की प्रतीक माने जाने वाले ऐसे घर और दफ्तर न केवल ताजा हवा, बल्कि धूप से भी लोगों को वंचित करते हैं, जिस कारण शरीर में विटामिन-डी की कमी होती है और हड्डियां कमजोर होती हैं। नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ अस्थि शल्य चिकित्सक डॉ. राजू वैश्य ने देश के अलग-अलग शहरों में जोड़ों में दर्द एवं गठिया (अर्थराइटिस) के एक हजार मरीजों पर अध्ययन कर पाया कि ऐसे मरीजों में से 95 प्रतिशत मरीजों में विटामिन-डी की कमी होती है और इसका एक मुख्य कारण पर्याप्त मात्रा में धूप न मिलना है, जो विटामिन-डी का मुख्य स्रोत है।

दरअसल विटामिन-डी का मुख्य स्रोत सूर्य की रोशनी है, जो हड्डियों के अलावा पाचन क्रिया में भी बहुत उपयोगी है। व्यस्त दिनचर्या और आधुनिक संसाधनों के कारण लोग तेज धूप नहीं ले पाते। खुले मैदान में घूमना-फिरना और खेलना भी बंद हो गया. इस कारण धूप के जरिए मिलने वाला विटामिन-डी उन तक नहीं पहुंच पाता।

जब भी किसी को घुटने या जोड़ में दर्द होता है, तो उसे लगता है कि कैल्शियम की कमी हो गई है, जबकि विटामिन-डी की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। डॉक्टरों का कहना है अगर कैल्शियम के साथ-साथ विटामिन-डी की भी समय पर जांच करवा ली जाए तो आर्थराइटिस को बढ़ने से रोका जा सकता है।

बचपन में खानपान की गलत आदतों व कैल्शियम की कमी के कारण आर्थराइटिस के अलावा ऑस्टियोपोरोसिस की भी संभावना बहुत अधिक होती है. ऑस्टियोपोरोसिस में कैल्शियम की कमी के कारण हड्डियों का घनत्व एवं अस्थि मज्जा बहुत कम हो जाता है। साथ ही हड्डियों की बनावट भी खराब हो जाती है, जिससे हड्डियां अत्यंत भुरभुरी और अति संवेदनशील हो जाती हैं। इस कारण हड्डियों पर हल्का दबाव पड़ने या हल्की चोट लगने पर भी वे टूट जाती हैं।

 अमेरिकन सोसाइटी फॉर बोन एंड मेडिकल रिसर्च में पेश किए गए एक शोधपत्र में बताया गया है कि प्रतिदिन केवल एक पेय पदार्थ जैसे कोला पीने वाली महिलाओं की तुलना में प्रतिदिन तीन कोला पीने वाली महिलाओं के कूल्हे की हड्डियों का घनत्व 2. 3 से 5.1 प्रतिशत तक कम पाया गया।

यूजीसी ने विश्वविद्यालयों से तीन वर्ष में पाठ्यचर्या का उन्नयन एवं समीक्षा करने का सुझाव दिया

नयी दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग :यूजीसी: ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को प्रत्येक तीन वर्ष में अपनी पाठ्यचर्या का उन्नयन करने और उसकी समीक्षा करने का सुझाव दिया है । मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक अधिकारी ने  बताया, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्चतर शिक्षा में गुणवत्ता और उत्कृष्ठता में सुधार लाने के लिये कई उपाए किये हैं । शैक्षिक स्तर बढ़ाने के लिये की गई महत्वपूर्ण पहल में यूजीसी ने पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या सुधार के लिये उपाए शुरू किये हैं। उन्होंने बताया कि उच्चतर शैक्षिक संस्थाएं अपने पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या तैयार करने के लिये स्वतंत्र हैं ।

मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूजीसी ने उच्चतर शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की दृष्टि से ऐच्छिक और अनिवार्य पाठ्यक्रम के लिये विभिन्न विषयों में माडल पाठ्यक्रम निर्धारित किये हैं । इन पाठ्यक्रमों की समय समय पर समीक्षा की जाती है ।

अधिकारी ने बताया ‘‘ यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को प्रत्येक तीन वर्ष में अपनी पाठ्यचर्या का उन्नयन और समीक्षा करने का सुझाव दिया है ताकि इन्हें रोजगारोन्मुखी बनाने के साथ कौशल सम्पन्न बनाया जा सके । ’’ यूजीसी ने पाठ्यक्रमों में नवाचार और सुधार लाने, शिक्षण सुगम बनाने के साथ परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली के माध्यम से उच्चतर शिक्षा में शैक्षिक मानकों एवं गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिये विकल्प आधारित क्रेडिट प्रणाली :सीबीसीएस: जैसी पहलें की हैं ।

उन्होंने बताया कि सीबीसीएस एक ‘‘कैफिटेरिया’’ जैसा दृष्टिकोण उपलब्ध कराती है जहां छात्र अपनी पसंद के पाठ्यक्रम ले सकते हैं, अपनी गति से अध्ययन कर सकते हैं, अतिरिक्त पाठ्यक्रम ले सकते हैं, क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं और शिक्षण के प्रति अलग अलग विषयों पर आधारित दृष्टिकोण को अपना सकते हैं ।

सीबीसीएस की शुरूआत से पाठ्यचर्याओं का प्रारूप बनाने के साथ सेमेस्टर प्रणाली सुनिश्चित की जा सकेगी । मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, यूजीसी ने अब तक 91 मुख्य पाठ्यक्रमों और 18 विशिष्ठ पाठ्यक्रमों की पाठ्यचर्या का नमूना तैयार किया है ।

(साभार – पीटीआई)

यूजीसी नेट परीक्षा 8 जुलाई को, जेआरएफ में उच्च आयु सीमा दो साल बढ़ायी गई

नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) आठ जुलाई को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा का आयोजन करेगा और इसके तहत जूनियर रिसर्च फेलोशिप में सम्मिलित होने के लिये अधिकतम आयु सीमा दो साल बढ़ा दी गई है । सीबीएसई के एक अधिकारी ने  बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी नेट) के लिये उम्मीदवार 6 मार्च 2018 से आनलाइन आवेदन कर सकेंगे । आनलाइन आवेदन करने की आखिरी तरीख 5 अप्रैल 2018 है और शुल्क का भुगतान 6 अप्रैल 2018 तक किया जा सकेगा ।

यूजीसी नेट के तहत जूनियर रिसर्च फेलोशिप :जेआरएफ: में सम्मिलित होने के लिये अधिकतम आयु सीमा दो साल बढ़ा दी गई है, अर्थात वर्तमान उच्च आयु सीमा को 28 वर्ष से बढ़ाकर 30 वर्ष कर दिया गया है ।

सहायक प्रोफेसर और जूनियर रिसर्च फोलोशिप की पात्रता के लिये आयोजित होने वाले यूजीसी नेट की संशोधित स्कीम के अनुसार परीक्षा में दो पत्र होंगे । इसमें पहला पत्र 100 अंकों का होगा जिसमें 50 प्रश्न पूछे जायेंगे और सभी प्रश्न अनिवार्य होंगे । दूसरा पत्र 200 अंकों का होगा जिसमें 100 प्रश्न होंगे और सभी प्रश्न अनिवार्य होंगे ।

प्रश्नपत्र प्रथम में 50 वस्तुनिष्ठ प्रश्न होंगे और प्रत्येक प्रश्न दो अंकों के होंगे । ये प्रश्न सामान्य प्रकृति के होंगे जिनका उद्देश्य उम्मीदवारों की शिक्षण और अनुसंधान अभिरूचि का निर्धारण करना है । यह मूल रूप से उम्मीदवारों की तार्किक क्षमता, सोच और सामान्य जागरूकता का परीक्षण करने के लिये तैयार किया गया है । दूसरे प्रश्नपत्र में उम्मीदवारों द्वारा चयन किये गए विषय पर आधारित 100 वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न होंगे और सभी प्रश्न दो अंकों के होंगे ।

(साभार – पीटीआई)

आशा भोसले को मिला यश चोपड़ा मेमोरियल अवॉर्ड

मुंबई : लोकप्रिय गायिका आशा भोसले को पांचवा यश चोपड़ा मेमोरियल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। गायिका को सदाबहार अभिनेत्री रेखा ने इस अवार्ड से नवाजते हुए कहा कि उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक बड़ा कलाकार बनाने का श्रेय गायिका और यश चोपड़ा को जाता है।
उन्होंने कहा, “ मैं यहां दो लोगों यशजी और आशा भोसले की वजह से हूं। वह मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं। गायिका अंदर और बाहर से खूबसूरत हैं। मैंने मंगेशकर परिवार से काफी कुछ सीखा है।”  इससे पहले इस अवॉर्ड से लता मंगेशकर, अमिताभ बच्चन, रेखा और शाहरुख खान को नवाजा गया है।
इस मौके पर गायिका ने कहा, “अवॉर्ड पाना अच्छा लगता है। यह एक विशेष अवॉर्ड है। मैं उनके नाम का अवॉर्ड पाकर खुश हूं लेकिन मैं दुखी हूं कि वह आज जिंदा नहीं है। मैं हमेशा सोचती हूं कि अगर वह जिंदा होते तो। मुझे कोई उत्तर नहीं मिलता।”

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

महादेवी वर्मा

तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल-खेल, थक-थक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?