Saturday, October 3, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 736

भारत की धरोहर – हस्तिनापुर

इतिहास हमारी कहानी कहता है..हम उसे मिथक का नाम देते हैं मगर वह हमारी जड़ें हैं…हमारा विश्वास। जरूरी है कि जो हमारी धरोहर बिखरी पड़ी है…उसे सहेजें। इस श्रृंखला में हम ऐसी ही सामग्री साभार मूल स्त्रोत और सन्दर्भ के साथ रखेंगे जिनको आज जानने की जरूरत है। पुराण, उपनिषद, रामायण और महाभारत हमारा इतिहास हैं मगर ये भी सही है कि आज इनकी ऐतिहासिकता पर प्रश्न उठाने वाले भी कम नहीं हैं। हमारा जोर रामायण और महाभारत काल पर इसलिए ज्यादा है क्योंकि आज सबसे अधिक सवाल इनको लेेकर ही उठ रहे हैं।  सीमित संसाधनों के बीच इस धरोहर का साझा करना हमारा प्रयास है….आज हर चीज के लिए हम पश्चिम का मुँह ताकते हैं जबकि सत्य है तो हमारे पास पहले से ही हैं, बस उनको पर ध्यान देने की जरूरत है…यह उसी प्रयाास का हिस्सा है – 

विदुर कुटी

हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश में मेरठ के निकट स्थित महाराज हस्ती का बसाया हुआ एक प्राचीन नगर, जो कौरवों और पांडवों की राजधानी थी। इसका महाभारत में वर्णित अनेक घटनाओं से संबंध है। महाभारत से जुड़ी सारी घटनाएँ हस्तिनापुर में ही हुई थीं। अभी भी यहाँ महाभारत काल से जुड़े कुछ अवशेष मौजूद हैं। इनमें कौरवों-पांडवों के महलों और मंदिरों के अवशेष प्रमुख हैं। इसके अलावा हस्तिनापुर को चक्रवर्ती सम्राट भरत की भी राजधानी माना जाता है। यहाँ स्थित ‘पांडेश्वर महादेव मंदिर’ की काफ़ी मान्यता है। कहा जाता है यह वही मंदिर है, जहाँ पांडवों की रानी द्रौपदी पूजा के लिए जाया करती थी। पौराणिक काल में हस्तिनापुर के राजा का नाम अधिसीम कृष्ण था।

द्रोपदी घाट..

स्थिति तथा स्थापना
मेरठ से 22 मील उत्तर-पूर्व में गंगा की प्राचीन धारा के किनारे हस्तिनापुर बसा हुआ है। हस्तिनापुर महाभारत के समय में कौरवों की वैभवशाली राजधानी के रूप में भारत भर में प्रसिद्ध था। प्राचीन नगर गंगा तट पर स्थित था, किन्तु अब नदी यहां से कई मील दूर हट गई है। गंगा की पुरानी धारा जिसे ‘बूढ़ी गंगा’ कहते हैं, यहां के प्राचीन टीलों के समीप बहती है। पौराणिक किंवदंती के अनुसार नगर की स्थापना पुरुवंशी वृहत्क्षत्र के पुत्र हस्तिन् ने की थी और उसी के नाम पर यह नगर हस्तिनापुर कहलाया। हस्तिन् के पश्चात् अजामीढ़, दक्ष, संवरण और कुरु क्रमानुसार हस्तिनापुर में राज्य करते रहे। कुरु के वंश में ही शांतनु और उनके पौत्र पांडु तथा धृतराष्ट्र हुए, जिनके पुत्र पाण्डव और कौरव कहलाए।

हस्तिनापुर क्षेत्र का उजड़ा इलाका

इतिहास
महाभारतकालीन महानगरों की श्रेणी में हस्तिनापुर भी आता था। इसकी स्थापना ‘हस्तिन्’ नामक व्यक्ति द्वारा की गई थी। इसीलिये इसे ‘हस्तिनापुर’ कहा जाता था। हस्तिनापुर में युधिष्ठिर जुए में द्रौपदी सहित अपना सब कुछ हार गए थे। पांडवों की ओर से शांतिदूत बनकर श्रीकृष्ण यहीं धृतराष्ट्र की सभा में आए थे। अपने पिता शांतनु की सत्यवती से विवाह करने की इच्छा पूरी करने के लिए भीष्म पितामह ने अपना उत्तराधिकार छोड़ने और आजीवन अविवाहित रहने का प्रण यहीं पर किया था। द्रौपदी से विवाह के बाद कुछ समय के लिए पांडवों ने दिल्ली के निकट इंद्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाया था, किंतु महाभारत युद्ध के बाद उन्होंने हस्तिनापुर को ही राजधानी रखा।

महाभारत कालीन उल्टा खेड़ा

विशाल नगर
महाभारत के युद्ध के समय हस्तिनापुर बड़ा विशाल नगर था। महाभारत आदिपर्व में इसका वर्णन इस प्रकार है-

‘नगरं हास्तिनपुरं शनैः प्रविविशुस्तदा। पांडवानागतांञ्छ्रुत्वा त्वा नागरास्तु कुतूहालात्, मंडयांचकिरेतत्र नगरं नागसाह्वयम। मुक्तपुष्पावकीर्ण तज्जलसिक्तं तु सर्वश:, घूषितं दिव्यघूपेन मंडनैश्चापि संवृतम्। पताकोछ्रितमाल्यमं च पुरमप्रतिमंबभौ, शंबभेरीनिनादैश्चनागवादित्रनि:स्वनै:। कौतूहलेन नगरं दीप्यमानमिवाभवत, तत्र ते पुरुषव्याघ्रा: दु:खशोकविनाशना:।'[2]

पांडवों का कुआँ

महाभारतकालीन हस्तिनापुर
महाभारत में इस नगर का खुला वर्णन मिलता है। इसके अनुसार विभिन्न शस्त्रों द्वारा सुरक्षित होने के कारण इस पुर के भीतर शत्रुओं का प्रवेश दुष्कर था। नगर के परकोटे में बने गोपुर (दरवाज़े) ऊँचे थे। नगर का भीतरी भाग राजमार्गों द्वारा विभक्त था। सड़कों के दोनों किनारों पर महल और बाज़ार सुशोभित थे। राजमहल नगर के बीच में स्थित था। इसमें अनेक सरोवर और उद्यान थे। नागरिक धर्मनिरत, होमपरायण, यज्ञादि में श्रद्धा रखने वाले, वर्णाश्रम-व्यवस्था के पोषक और धन-धान्य से सम्पन्न थे। सूत-मागध और बन्दी अपने-अपने कर्म में निरत थे। इनके द्वारा नगर की शोभा इतनी बढ़ गई थी कि वह इन्द्रलोक के समान सुन्दर लगता था।

कहा जाता है कि महाभारत के समय हस्तिनापुर राज्य की उत्तरी सीमा ‘शुक्करताल’ (मुज़फ़्फ़रनगर ज़िला), दक्षिणी सीमा ‘पुष्पवटी'[3] और पश्चिमी सीमा ‘वारणावत[4] तक थी। पूर्व की ओर गंगा प्रवाहित होती थी। गढ़मुक्तेश्वर शायद यहां का एक उपनगर था और मेरठ या ‘मयराष्ट्र’ भी इसकी परिसीमा के भीतर स्थित था।[5] मेरठ से 15 मील उत्तर-पूर्व में स्थित ‘मवाना’ (मुहाना) नामक ग्राम को हस्तिनापुर का प्रमुख द्वार कहा जाता है।[6] महाभारत आदिपर्व[7] में हस्तिनापुर के वर्धमान नामक पुरद्वार का उल्लेख है। पांडु की मृत्यु के पश्चात् शतश्रंग से हस्तिनापुर आते समय कुंती अपने पुत्रों सहित इसी द्वार से राजधानी में प्रविष्ट हुईं थी[1]-

‘सात्वदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता: कुरुजांगलम्, वर्धमानपुरद्वारमाससाद यश-स्विनी।’

कर्ण मंदिर

पुराण उल्लेख
पुराणों में कहा गया है कि जब गंगा की बाढ़ के कारण यह पुर विनष्ट हो गया, उस समय पाण्डव हस्तिनापुर को छोड़कर कौशाम्बी चले आये थे। यह घटना झूठी नहीं मानी जा सकती। हस्तिनापुर और कौशाम्बी में जो खुदाइयाँ हाल में हुई हैं, उनसे इसकी पुष्टि हो चुकी है। अब विद्वान इस बात को मानने लगे हैं कि गंगा की बाढ़ ने हस्तिनापुर को सचमुच ही किसी समय बहा दिया था। कौशाम्बी के कुछ प्राचीन बर्तन बनावट में हस्तिनापुर के बर्तनों के तुल्य हैं। इससे प्रमाणित होता है कि गंगा की बाढ़ के कारण पाण्डव हस्तिनापुर को छोड़कर कौशाम्बी में बस गये थे। हस्तिनापुर की आधुनिक खुदाइयों ने वहाँ की प्राचीन कला और संस्कृति पर प्रकाश डाला है। वहाँ के नागरिक अपने बर्तनों पर भूरे रंग की पालिश चढ़ाते थे। यह प्रथा मथुरा, इन्द्रप्रस्थ तथा महाभारतकालीन अन्य नगरों में भी प्रचलित थी। इससे सिद्ध होता है कि उनका सामाजिक जीवन एकाकी नहीं था। वे एक-दूसरे से कोई बहुत दूर भी नहीं थे। जलमार्ग से एक-दूसरे से वे लगे हुये थे, अत:एइन महापुरियों के निवासियों के बीच सांस्कृतिक सम्बन्ध कोई अनहोनी बात नहीं मानी जा सकती।

‘विष्णुपुराण से ज्ञात होता है कि बलराम ने कौरवों पर क्रोध करके उनके नगर हस्तिनापुर को अपने हल की नोंक से खींच कर गंगा में गिराना चाहा था, किंतु पीछे उन्हें क्षमा कर दिया; किन्तु उसके पश्चात् हस्तिनापुर गंगा की ओर कुछ झुका हुआ-सा प्रतीत होने लगा था-

हस्तिनापुर नगर का एक दृश्य

‘बलदेवस्ततोगत्वा नगरं नागसाहृयम् बाह्योपवनमध्येऽभून्नविवेशतत्पुरम्।'[8]
‘अद्याप्याघूर्णिताकारं लक्ष्यते तत्गुरं द्विज, एष प्रभावो रामस्य बलशौयोलक्षणः।'[9]
इससे जान पड़ता है कि हस्तिनापुर को गंगा की धारा के भय कौरवों के समय में ही उत्पन्न हो गया था। परीक्षित के वंशज ‘निचक्षु’ या ‘निचक्नु’ के समय में तो वास्तव में ही गंगा ने हस्तिनापुर को बहा दिया और उसे इस नगर को छोड़कर वत्स देश की प्रसिद्ध नगरी कौशाम्बी में जाकर बसना पड़ा था-

‘अधिसीमकृष्णान्निचक्नुः यो गंगया पह्ते हस्तिनापुरे कौशम्बयां निवत्स्यति।'[10]
पुरातत्वों की खोजों से भी उपरोक्त तथ्य की पुष्टि होती है। उत्खनन से ज्ञात होता है कि हस्तिनापुर की सर्वप्राचीन बस्ती 1000 ई. पूर्व से पहले की अवश्य थी और यह कई शतियों तक स्थित रही। दूसरी बस्ती 90 ई. पू. के लगभग बसाई गई थी, जो 300 ई. पू. के लगभग तक रही। तीसरी बस्ती 200 ई. पू. से लगभग 200 ई. तक विद्धमान थी और अन्तिम 11वीं से 14वीं शती तक। इस प्रकार हस्तिनापुर का इतिहास कई बार बना और बिगड़ा।[1]

पांडेवश्वर महादेव मंदिर का एक हिस्सा

विभिन्न नाम
परवर्ती काल में जैन धर्म के तीर्थ के रूप में इस नगर की ख्याति बनी रही। प्राचीन संस्कृत साहित्य में इस नगर के ‘हास्तिनापुर'[11], ‘गजपुर’, ‘नागपुर’, ‘नागसाह्वय’, ‘हस्तिग्राम’, ‘आसन्दीवत’ और ‘ब्रह्मस्थल’ आदि नाम मिलते हैं। कहा जाता है कि हाथियों के बहुतायत के कारण इस प्रदेश का प्रथम नाम ‘गजपुर’ था, पीछे राजा हस्तिन के नाम पर यह हस्तिनापुर कहलाया और महाभारत के युद्ध के पश्चात् यह नाग जाति का प्रमुख होने से ‘नागपुर’ या ‘नागसाह्वय’ कहलाया। ये सब पर्यायवाची नाम हैं। ‘आसंदीवत्’ का बौद्ध साहित्य[12] में उल्लेख है। संभव है ‘विष्णुपुराण’ के उर्पयुक्त उल्लेख के अनुसार गंगा की ओर झुके होने के कारण ही यह नाम पड़ा हो।[13] इस उल्लेख में इसे ‘कुरुट्ठ'[14] की राजधानी बताया गया है। ‘वसुदेव हिंडि’ नामक ग्रंथ में ‘ब्रह्मस्थल’ नाम भी मिलता है। यह जैन ग्रंथ है।

कालीदास का उल्लेख
कालिदास ने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में दुष्यंत की राजधानी हस्तिनापुर का उल्लेख किया है। दुष्यंत से ‘गंघर्व विवाह’ होने के पश्चात् शकुंतला ऋषि कुमारों के साथ कण्वाश्रम से दुष्यंत की राजधानी हस्तिनापुर गई थी-

‘अनुसूये त्वरस्व, स्वरस्व, एतेखलु हस्तिनपुरगामिनः ऋषयः शब्दाय्यान्ते।'[15]
हस्तिनापुर के पूर्व की ओर गंगा के पार उस समय विस्तृत घना वन प्रदेश था, जहां दुष्यंत आखेट के लिए गया था और जहां मालिनी के तट पर कण्वाश्रम में उसकी भेंट शकुंतला से हुई थी। यह वन गढ़वाल[16] की तराई क्षेत्र में स्थित था तथा इसका विस्तार बिजनौर तथा गढ़वाल के इलाके में था। वर्तमान हस्तिनापुर नामक ग्राम में, जो इसी नाम से आज तक प्रसिद्ध है, प्राचीन नगर के खंडहर, ऊंचे-नीचे टीलों की श्रृंखलाओं के रूप में दूर-दूर तक फैले हैं। मुख्य टीला ‘बिदुर का टीला’ या ‘उलटखेड़ा’ कहलाता है। इसकी खुदाई से अनेक प्राचीन अवशेष प्रकाश में आये हैं।

जम्बूद्वीप

जैन तीर्थ
जैन समुदाय के बीच हस्तिनापुर को एक प्रमुख तीर्थ माना जाता है। हस्तिनापुर जैन धर्मावलंबियों का भी प्रसिद्ध तीर्थ है। यहाँ जैन धर्म के कई तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। यही वजह है कि यहाँ काफ़ी संख्या में जैन मंदिर मौजूद हैं। यहीं पर राजा श्रेयांस ने आदितीर्थकर ऋषभदेव को गन्ने के रस का दान दिया था। इसलिए इसको ‘दानतीर्थ’ कहते हैं। इसका संबंध शांतिनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ नामक तीर्थकरों से भी है। यहाँ भगवान शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरहनाथ के चार-चार कल्याणक हुए हैं। यहाँ अनेक जैन धर्मशालाएं और मंदिर हैं। खुदाई में यहाँ अनेक प्राचीन खंडहर मिले हैं। इनमें क़रीब 200 साल पुराना बड़ा मंदिर, जंबूद्वीप, कैलाश पर्वत, अष्टापद जी, कमल मंदिर और ध्यान मंदिर मुख्य हैं। प्राचीन बड़ा मंदिर में हस्तिनापुर की नहर की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई जिन प्रतिमाओं को देखा जा सकता है। इन मंदिरों को काफ़ी सुंदर और कलात्मक तरीक़े से बनाया गया है।

जैन ग्रंथ ‘विविधतीर्थकल्प’ के अनुसार महाराज ऋषभदेव ने अपने सम्बंधी कुरु को कुरूक्षेत्र का राज्य दे दिया था। इन्हीं कुरु के पुत्र हस्ति ने हस्तिनापुर को भागीरथी के किनारे बसाया था। हस्तिनापुर में शान्ति, कुंधु और अरनाध तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। ये क्रमशः 16वें, 17वें और 18वें तीर्थंकर थे। 5वें, 6वें और 7वें तीर्थंकरों ने यहाँ कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। हस्तिनापुर नरेश बाहुबली के पौत्र श्रेयांश के निवास स्थान पर ऋषभदेव ने प्रथम उपवास का पारण किया था। विष्रग कुमार नामक जैन साधु जिन्होंने नमुचि नामक दैत्य को वश में किया था, हस्तिनापुर ही के निवासी थे। इनके अतिरिक्त सनत्कुमार, महापद्म, सुभूभ और परशुराम का जन्म भी हस्तिनापुर में हुआ था। यहाँ चार चैत्यों का निर्माण किया गया था।

दिगम्बर जैन मंदिर

त्रिधर्म स्थल
हस्तिनापुर पहला ऐसा तीर्थ स्थान है, जो हिन्दू और जैनों के साथ सिक्खों का भी पवित्र तीर्थ है। हस्तिनापुर के पास ही स्थित ‘सैफपुर’ सिक्ख धर्म के पंच प्यारों में से एक भाई धर्मदास की जन्मस्थली है। देश भर के श्रद्धालु यहाँ स्थित पवित्र सरोवर में डुबकी लगाने के लिए आते रहते हैं।

मेले
हस्तिनापुर में साल में कई छोटे-बड़े मेले लगते हैं। इनमें अक्षय तृतीया, होली और 2 अक्टूबर का मेला प्रमुख है। अक्षय तृतीया को देश भर से श्रद्धालु यहाँ भगवान को गन्ने के रस का आहार कराने के लिए आते हैं। यदि किसी को होली के रंग पसंद नहीं आते, तो हस्तिनापुर उनके लिए इनसे बचने की एक बेहतरीन जगह साबित हो सकता है। दुल्हैंडी वाले दिन यहाँ लगने वाले मेले में देश भर से होली नहीं खेलने वाले लोग आते हैं। साथ ही 2 अक्टूबर को लगने वाले मेले में भी काफ़ी भीड़ उमड़ती है।

संदर्भ
ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 1014 |
महाभारत, आदिपर्व 206, 14-दाक्षिणात्य पाठ, 15
पूठ, बुलंदशहर ज़िला)
=बरनावा, मेरठ ज़िला
दि मानुमेंटल एंटिविवटीज एण्ड इंसक्रिप्शंस ऑव एन डब्ल्यू प्राविंसेज, 1891
हस्तिनापुर, शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश, पृ. 2
महाभारत आदिपर्व 125,9
विष्णुपुराण 5,35,8
विष्णुपुराण 5,35,37
विष्णुपुराण 21,7-78; पार्जिटर-डायनेस्टजी ऑव दि कलि एज, पृ. 5
पाणिनि 4, 2, 101
अवदान, 2 पृ. 359
आसंदी = कुर्सी
कुरुराष्ट्र
अंक 4
पहले उत्तर प्रदेश का भाग

(साभार – भारत डिस्कवरी )

समाज की जरूरत हैं प्रसाद की मुखर स्त्रियाँ और उनके प्रश्न

सुषमा कनुप्रिया

जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य की निधि हैं और उनका साहित्य समाज की धरोहर। छायावाद का उत्कर्ष उनकी रचनाओं में दिखता है और ‘कामायनी’ इस उत्कृष्टता का शिखर। राष्ट्रवाद का उत्कर्ष देखना हो तो प्रसाद के समूचे साहित्य में वह भरा पड़ा है। प्रसाद इतिहास के शिलालेख पर संवेदना से समाज को समेटते हुए लिखते हैं मगर मुझे लगता है कि स्त्री के सन्दर्भ में कामायनी उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति नहीं है अपितु इसका शिखर तो ‘ध्रुवस्वामिनी’ में दिखता है जो पहले प्रकाशित हुई थी। यह आश्चर्य की बात लगती है कि एक ही व्यक्ति के दो रूप उसके साहित्य की दो अलग विधाओं में दिखते हैं।
अगर कामायनी की बात की जाए तो वे नारी को श्रद्धा कहते हैं, प्रकृति का रूप बताते हैं मगर पुरुष के प्रतिकार का सामर्थ्य वे उसे नहीं देते हैं जबकि मनु गर्भवती श्रद्धा को छोड़कर चल देता है। वह इड़ा के प्रश्रय में रहता है और उसके साथ उसकी प्रजा पर भी अत्याचार करता है, इसके बावजूद इड़ा को बुद्धि और पश्चिम की बताकर प्रसाद उसे उपेक्षित करते हैं….यह बात बड़ी अजीब लगती है कि तमाम प्रताड़नाओं के बावजूद श्रद्धा मनु को स्वीकार करती है तो यह सवाल बनता है कि क्या यह कृति युगीन समाज की माँगों के आगे झुक जाती है? सम्भव है कि इसके ऐतिहासिक सन्दर्भ ऐसा न मानते हों मगर मेरी समझ में स्त्री की प्रखरता, मनोविज्ञान, संवेदना और उसके प्रश्नों को देखना हो तो प्रसाद की कहानियों और नाटकों को केन्द्र में रखकर ही बात होगी। प्रसाद जी का साहित्य भंडार विपुल है इसलिए मैं दो – तीन कहानियों, ध्रुवस्वामिनी और उपन्यास कंकाल को केन्द्र में रखकर ही अपनी बात कहना चाहूँगी।

कंकाल उपन्यास में आपको गाला के माध्यम से प्रसाद जी स्त्री के प्रेम संबंधी मनोभाव और उसके विद्रोह से परिचित करवाते हैं। यह पँक्तियाँ दृष्टव्य हैं – गाला ने एक दीर्घ श्वास लिया। उसने कहा, ‘नारी जाति का निर्माण विधाता की एक झुँझलाहट है। मंगल! संसार-भर के पुरुष उससे कुछ लेना चाहते हैं, एक माता ही सहानुभूति रखती है; इसका कारण है उसका स्त्री होना। वह कहती है कि स्त्री का हृदय…प्रेम का रंगमंच है! गाला की ये पँक्तियाँ देखिए – “पद्मिनी के समान जल-मरना स्त्रियाँ ही जानती हैं, पुरुष केवल उसी जली हुई राख को उठाकर अलाउद्दीन के सदृश बिखेर देना ही तो जानते हैं!’ कहते-कहते गाला तन गयी थी।’
आकाशदीप कहानी में चम्पा और बुद्धगुप्त के संबंधों में जो अंतर्द्वंद्व है, वह एक स्त्री को समझे बगैर नहीं लिखा जा सकता। चम्पा अपने पिता के हत्यारे (उसका यही मानना है) को क्षमा नहीं कर सकती मगर वह उसे हत्यारे यानि बुद्धगुप्त से चाहकर भी घृणा नहीं कर सकती। वह उसकी हत्या करने के बजाय खुद आजीवन एकाकी रह जाना स्वीकार कर लेती है। वह कहती भी है -‘विश्वास? कदापि नहीं, बुधगुप्त ! जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अंधेर है जलदस्यु। तुम्हें प्यार करती हूँ।’’ चम्पा रो पड़ी। (कहानी – आकाशदीप)। ऐसा ही संघर्ष पुरस्कार की मधुलिका में दिखता है जहाँ वह देशप्रेम को चुनती है मगर अंततः प्रेम के साथ भी खड़ी हो जाती है। प्रसाद के स्त्री चरित्रों में प्रखर स्वाभिमान बिल्कुल स्पष्ट है और स्वत्व की रक्षा करने के लिए वे किसी की परवाह नहीं करती हैं। मधुलिका का चरित्र देखिए। उसके चरित्र की प्रखरता कहानी के आरम्भ से ही आपको दिखती है। ऐसे देश और समाज में..जहाँ आर्थिक और सामाजिक तौर पर स्त्रियाँ दूसरों पर निर्भर और अपने अस्तित्व से अनजान हैं..मधुलिका ताजी हवा के झोंके की तरह है जिसमें झंझावात को थामने का सामर्थ्य है। उदाहरण के लिए यह प्रसंग देखिए जिसमें मधुलिका के चरित्र और उसकी सुन्दरता को बड़ी खूबसूरती से बुना गया है – बीजों का एक बाल लिये कुमारी मधूलिका महाराज के साथ थी। बीज बोते हुए महाराज जब हाथ बढ़ाते, तब मधूलिका उनके सामने थाल कर देती। यह खेत मधूलिका का था, जो इस साल महाराज की खेती के लिए चुना गया था; इसलिए बीज देने का सम्मान मधूलिका ही को मिला। वह कुमारी थी। सुन्दरी थी। कौशेयवसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे सम्हालती और कभी अपने रूखे अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी, वे सब बरौनियों में गुँथे जा रहे थे। सम्मान और लज्जा उसके अधरों पर मन्द मुस्कराहट के साथ सिहर उठते; किन्तु महाराज को बीज देने में उसने शिथिलता नहीं की। महाराज ने मधूलिका के खेत का पुरस्कार दिया, थाल में कुछ स्वर्ण मुद्राएँ। वह राजकीय अनुग्रह था। मधूलिका ने थाली सिर से लगा ली; किन्तु साथ उसमें की स्वर्णमुद्राओं को महाराज पर न्योछावर करके बिखेर दिया। मधूलिका की उस समय की ऊर्जस्वित मूर्ति लोग आश्चर्य से देखने लगे! महाराज की भृकुटी भी जरा चढ़ी ही थी कि मधूलिका ने सविनय कहा- देव! यह मेरे पितृ-पितामहों की भूमि है। इसे बेचना अपराध है; इसलिए मूल्य स्वीकार करना मेरी सामथ्र्य के बाहर है। महाराज के बोलने के पहले ही वृद्ध मन्त्री ने तीखे स्वर से कहा-अबोध! क्या बक रही है? राजकीय अनुग्रह का तिरस्कार! तेरी भूमि से चौगुना मूल्य है; फिर कोशल का तो यह सुनिश्चित राष्ट्रीय नियम है। तू आज से राजकीय रक्षण पाने की अधिकारिणी हुई, इस धन से अपने को सुखी बना। राजकीय रक्षण की अधिकारिणी तो सारी प्रजा है, मन्त्रिवर! …. महाराज को भूमि-समर्पण करने में तो मेरा कोई विरोध न था और न है; किन्तु मूल्य स्वीकार करना असम्भव है।-मधुलिका उत्तेजित हो उठी। वह अरुण से प्रेम करती है मगर मातृभूमि के लिए खुद उसे पकड़वा देती है और अंत में अपने लिए भी प्राणदंड माँगती है।

वहीं ध्रुवस्वामिनी प्रसाद जी का ऐसा नाटक है जहाँ वे खुलकर स्त्रियों के प्रश्न उठाते हैं और उनका समर्थन भी करते हैं और ऐसे समाज में जहाँ स्त्री का अस्तित्व ही पुरुष पर निर्भर हो, वहाँ ऐसे नाटक की रचना ही अपने -आप में क्राँति है। ध्रुवस्‍वामि‍नी’ 1933 में प्रकाशि‍त हुई थी। जयशंकर प्रसाद ने अपने इस नाटक में नारी के अस्‍ति‍त्‍व,अधि‍कार और पुनर्लग्‍न की समस्‍या को उठाया है। इसमें प्रसाद ने समाज में नारी के स्थान और उसके पुर्नविर्वाह जैसे प्रश्न न सिर्फ उठाये हैं बल्कि स्त्री को वह अधिकार भी दिलवाये हैं जो आज भी एक आम औरत की पहुँच से कहीं बाहर हैं। इस नाटक में दि‍खाया गया है कि‍ ध्रुवस्वामिनी में प्रेम को अधिकार की तरह देखा गया है। इस नाटक में आपको ध्रुवस्वामिनी में द्रोपदी जैसा रोष और वैसे ही प्रश्न दिखते हैं। कोमा में मंदोदरी और रावण के प्रसंग की छाया है तो मंदाकिनी ऐसा चरित्र है जो स्त्री के संघर्ष में साथ खड़ी है। इस नाटक की खूबी है कि यहाँ स्त्री स्त्री की शत्रु नहीं बल्कि सहारा है और इस मामले में प्रसाद तुलसी और राजेन्द्र यादव जैसे उन लेखकों से कहीं आगे निकल जाते हैं जो स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ा करते हैं। ध्रुवस्वामिनी जि‍स पुरूष(चंद्रगुप्‍त) से प्रेम करती है, उससे विवाह नहीं कर पाती और जि‍ससे(रामगुप्‍त) उसका वि‍वाह हुआ है, उससे वह प्रेम नहीं करती। इस नाटक में पुरूष सत्‍तात्‍मक समाज के शोषण के प्रति नारी का विद्रोही स्‍वर सुनाई पड़ता है। स्त्री स्‍वतंत्रता की आधुनि‍क चेतना के कारण ही इसमें पहली बार प्रति‍क्रि‍या करती है। ध्रुवस्‍वामि‍नी रामगुप्‍त को स्‍पष्‍ट रूप से कह देती है – ‘पुरूषों ने स्‍त्रि‍यों को पशु-संपत्‍ति‍ समझकर उसपर अत्‍याचार करने का अभ्‍यास बना लि‍या है। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा, नारी के गौरव को बचा नहीं सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते।’ यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से महाभारत के द्यूत क्रीड़ा प्रसंग की छाया मुझे दिखती है। पुरूषों की प्रभुता तथा प्रेमजाल में फंसकर स्‍त्रि‍यों को हमेशा निराशा, उत्‍पीड़न और उपेक्षा ही मिलती है। नाटककार के शब्‍दों में स्‍त्रि‍यों के बलि‍दान का भी कोई मूल्‍य नहीं। कि‍तनी असहाय दशा है। अपने निर्बल और अवलंब खोजनेवाले हाथों से वह पुरूषों के चरणों को पकड़ती है ओर वह सदैव ही इसको तिरस्‍कार,घृणा से उपेक्षा करता है। ध्रुवस्वामिनी जयशंकर प्रसाद का अंतिम नाटक है। इस नाटक की सबसे बड़ी शक्ति प्रसाद जी के उस क्रांतिकारी दृष्टिकोण में निहित है जो इस नाटक के माध्यम से व्यक्त हुआ है। और वह यह है कि नारी पुरुष की क्रीत दासी नहीं है। पुरुष यदि क्लीव (नपुंसक), कायर और व्यभिचारी है तो नारी न केवल उसके विरुद्ध विद्रोह ही कर सकती है, उसका परित्याग करके अपने प्रिय पुरुष का वरण कर उससे पुनर्विवाह भी कर सकती है। यह बात भारतीय समाज के लिए, खासतौर से उस समय जब यह नाटक लिखा गया था, कल्पना से भी परे थी। शकराज गुप्त साम्राज्य से अपने पुरखों के अपमान का प्रतिशोध होने के लिए खिगिल के माध्यम से एक प्रस्ताव रामगुप्त के पास भेजता है कि यदि वह अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है तो उसके लिए उपहारस्वरूप अपनी महारानी ध्रुवस्वामिनी और हमारे सभी श्रीमंतों के लिए स्त्रियां भेज दे। रामगुप्त शकराज की बढ़ती शक्ति से पहले ही भयभीत है। इसलिए अपने मंत्री शिखरस्वामी की मंत्रणा के बाद राज्य के हित को ध्यान में रखकर महारानी ध्रुवस्वामिनी और शकराज के सभी श्रीमंतों के लिए अपनी स्त्रियां भेजने के लिए तैयार हो जाता है। ध्रुवस्वामिनी को जब यह पता चलता है तो वह सीधे निर्भीक होकर अमात्य को चुनौती देते हुए कहती है, ‘मैं केवल यही कहना चाहती हूं कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-संपत्ति समझकर उन पर अत्याचार करने का जो अभ्यास बना लिया है, वह मेरे साथ नहीं चल सकता।’ वहीं शकराज को रोकते हुए कोमा में आपको मंदोदरी दिखेगी। कोमा कहती है – वही, जो आज होने जा रही है! मेरे राजा! आज तुम एक स्त्री को अपने पति से विच्छिन्न कराकर अपने गर्व की तृप्ति के लिए कैसा अनर्थ कर रहे हो?शकराज : (बात उड़ाते हुए, हँसकर) पागल कोमा! वह मेरी राजनीति का प्रतिशोध है।
कोमा : (दृढ़ता से) किन्तु राजनीति का प्रतिशोध क्या एक नारी को कुचले बिना नहीं हो सकता?
देखा जाए तो जयशंकर प्रसाद जिस क्राँति की परिकल्पना करते हैं, वह उनके गद्य साहित्य में ही स्पष्ट और मुखर होती है और वे जिन स्त्रियों की रचना करते हैं, उनका साहस, उनकी प्रखरता और उनके प्रश्न आज की नारी के भी प्रश्न हैं इसलिए प्रसाद की मुखर स्त्रियाँ आज के समाज की जरूरत हैं।

सुनो स्त्रियों

उमा झुनझुनवाला
मेरा नाम उमा है
या सीता गीता
सलमा नफ़ीसा मैरी
कमली, मराठी, बंगाली
मलयाली, जम्मुई, असमी
जो चाहे नाम रख लो
जहाँ की चाहे समझ लो
उम्र की भी कोई बंदिश नहीं
जिस उम्र की पसंद आए
वही मान लो, चुन लो
किसी बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता
लिंग बस स्त्री का ही होना चाहिए
इतना मात्र ही काफ़ी है बलात्कार के लिए
बलात्कार इन दिनों केवल एक शब्द है
जो अलग अलग अर्थो में ध्वनित हो रहा है
नेता के लिए अलग अर्थ
जाति और धर्म के लिए अलग अर्थ
शासक के लिए अलग अर्थ
आम आदमी के लिए बिल्कुल अलग अर्थ
स्त्रियों के पास उनका कोई अर्थ नहीं
ओ स्त्रियों
खुश रहो कि अब तक तुम्हारा बलात्कार नहीं हुआ
तुम्हारे घर की लड़कियाँ बची हुई हैं अब तक
पड़ोस में शायद न घटी कोई घटना अब तक
शायद रिश्तेदार भी सुरक्षित हों अब तक
मगर कब तक…
कब तक…
कब तक…
सोचना ज़रूर…
अगर अब भी न सोचा
तो फिर कब
देखो स्त्रियों
पुरुषों पर इल्ज़ाम लगाना बन्द करो
ये पुरुष तुम्हारे गर्भ से ही पैदा हुए हैं
बलात्कार की ज़िम्मेदार इसलिए तुम ही हो
अब या तो पुरुषों का जन्म बन्द हो
या स्त्रियाँ वजूद में ही न आए
जहाँ दोनों होंगे
बलात्कार होना ही है
बलात्कार करके पुरुष आज़ाद ही रहेगा
मरेगी तो स्त्री
ज़लील होगी तो स्त्री
छाती पिटेगी तो स्त्री
तार तार होगी तो स्त्री
सुनो स्त्रियों
बच्चे पैदा करना बंद कर दो अब
ना लड़का
ना लड़की
याद रखना
बलात्कारी की कोई सज़ा नहीं
कोई रोक भी नहीं
इसलिए आँसू नहीं
आँखों से पत्थर बरसा
अब यही ज़रूरी है
कि इन पत्थरों से ईश्वर नहीं
आग का जन्म होगा
जिसमें बलात्कारी ख़ाक होंगे
निश्चित ही…

धार्मिक कट्टरता और अज्ञानता के विरोधी थे राहुल सांकृत्यायन

कोलकाता : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से राहुल सांकृत्यायन की 125 वीं जयंती के अवसर पर `राहुल सांकृत्यायन की प्रासंगिकता’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन बहुआयामी प्रतिभा के धनी लेखक थे । उन्होंने दर्शन, इतिहास, मार्क्सवाद, साम्यवाद, घुमक्कड़शास्त्र, भाषा आदि पर साधिकार लिखा । इस अवसर पर विभाग की शोध छात्रा मधु सिंह ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन की दृष्टि व्यापक और मानवीय है । उन्होंने विवेकपरक ढंग से लेखन किया । रुखसार परवीन ने कहा कि अपनी प्रतिभा के कारण राहुल आजमगढ़ से विदेश तक का सफर तय करते हैं । सुनील कुमार ने कहा कि राहुल का विपुल साहित्य उनकी बहुज्ञता के कारण लिखा गया । रेशमी वर्मा ने कहा कि वे किसानों के हितैषी थे । के. अनुष्का और गायत्री रथो ने राहुल के रचना संसार पर परिचयात्मक आलेख पाठ किया । कार्यक्रम का संचालन करते हुए संजय जायसवाल ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन आज हमारे लिए ज्यादा प्रासंगिक हैं क्योंकि वे धार्मिक कट्टरता और अज्ञानता को मानव विरोधी मानते हैं । शोधार्थी दीपनारायण चौहान ने विषय प्रवर्तन एवं अमित कुमार राय ने धन्यवाद ज्ञापन दिया ।

लिटिल थेस्पियन तथा भारतीय भाषा परिषद द्वारा कहानी तथा कविता का नाटकीय पाठ

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद् सभागार में कहानी और कविता के अभिनयात्मक पाठ का आयोजन किया गया। कहानी और कविता का अभिनयात्मक पाठ उनके गूढ़ अर्थों को और अच्छी तरह प्रेषित करने में एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है। इस तरह के पाठ से श्रोता नई ध्वनियों और नए बिम्बों से स्वतः जुड़ने लगता है क्योंकि हर अभिनेता अपने वाचन से उसके कई मर्म खोलता है और इसलिए कई अलग अलग बिम्बों की सृष्टि होती है इसलिए लिटिल थेस्पियन ने कहानी और कविता की पाठ प्रस्तुति में अभिनय पक्ष की महत्ता को एक आवश्यक अंग मानते हुए भारतीय भाषा परिषद् के साथ मिलकर इसके प्रशिक्षण के लिए पिछले अगस्त 2016 से तीन महीने का एक सर्टिफिकेट कोर्स प्रारम्भ किया है जिसकी कक्षा प्रति शनिवार लिटिल थेस्पियन की निर्देशिका उमा झुनझुनवाला की निगरानी में होती है।
कल तीसरे सत्र का समापन है l इस सत्र में कुल 17 प्रशिक्षार्थी थे जिन्होंने 5 कहानियों और 9 कविताओं का अभिनयात्मक पाठ प्रस्तुत किया। विद्यार्थियों ने अकेली (मन्नू भंडारी), जन्मदिन (संगीता बासु), नाच (असगर वज़ाहत), सिक्का बदल गया (कृष्णा सोबती), एक अचम्भा प्रेम (कुसुम खेमानी) का पाठ किया। कविताओं में जलियांवाला बाग़ में बसंत (सुभद्रा कुमारी चौहान), बहारें होली की (नज़ीर अकबराबादी) गाँधीजी के जन्मदिन पर (दुष्यंत कुमार), सब कुछ कह लेने के बाद (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना), उधार (अज्ञेय), चार कौए उर्फ चार हौए (भवानीप्रसाद मिश्र), उत्तर (महादेवी वर्मा), मैंने आहुति बन कर देखा (अज्ञेय) और हँसो हँसो जल्दी हँसो (रघुवीर सहाय) का पाठ किया गया। प्रशिक्षार्थियों के नाम पूनम पाठक, मृणालिनी मिश्रा, अमर्त्य भट्टाचार्य, विपिन गिरी, बबीन दास, तृषा मंडल, अविक महतो, अनुभव कृष्ण, प्रणय साहा, अनीता दास, शबरीन खातून, साकिब जमील, दीपाश्री दास, नीतू कुमारी सिंह, बिंतेश पांडेय, शिवम मिश्र, रजत प्रसाद यादव, एजाज़ खान हैं। इस सत्र के निर्णायक सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री एस. एम्. अज़हर आलम, नाट्य समीक्षक श्री प्रेम कपूर तथा सत्यजित रे फिल्म व टेलीविज़न इंस्टिट्यूट के प्रोफ़ेसर श्री राजा चक्रवर्ती थे। अंत में सभी प्रशिक्षार्थियों को सर्टिफिकेट दिए गये।

श्रीकांत ने रचा इतिहास, दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी बने

नयी दिल्ली : किदाम्बी श्रीकांत इतिहास रचते हुए विश्व बैडमिंटन महासंघ ( बीडब्ल्यूएफ ) द्वारा जारी की गयी सूची में दुनिया के पहले नंबर के पुरुष एकल खिलाड़ी बन गए। आधिकारिक रैंकिंग शुरू होने के बाद वह यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय पुरुष खिलाड़ी बन गये हैं। आधुनिक समय में कंप्यूटर द्वारा तैयार की जाने वाली रैंकिंग प्रणाली शुरू किए जाने से पहले महान खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण को एक समय विश्व का नंबर एक खिलाड़ी माना जाता था। इस तरह श्रीकांत  साइना नेहवाल के बाद दूसरे भारतीय बन गए जिसे यह सम्मान हासिल हुआ है। साइना 2015 में महिलाओं की एकल रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर पहुंची थी। श्रीकांत ने यह उपलब्धि पिछले साल के अपने शानदार प्रदर्शन के बाद हासिल की और उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। गोपीचंद अकादमी  में प्रशिक्षण पाने वाले श्रीकांत ने कहा , ‘‘ मैं पहली बार विश्व नंबर एक बनने और प्रकाश सर के बाद यह उपलब्धि हासिल करने वाला पहला भारतीय पुरूष बनने पर निश्चित रूप से खुश हूं। ’उन्होंने कहा , ‘‘ यह गोपी सर , मेरे परिवार , मेरे दूसरे कोच एवं सहयोगी स्टाफ , मेरी टीम गोस्पोट्र्स फाउंडेशन , मेरे प्रायोजकों और इन तमाम वर्षों में मुझमें विश्वास दिखाने वाले हर इंसान की कड़ी मेहनत का परिचायक है। मौजूदा विश्व चैंपियन विक्टर एक्सेलसेन चोट के कारण बैडमिंटन से दूर रहे और पिछला साल अप्रैल में जीता गया अपना मलेशिया ओपन का खिताब बरकरार रखने में नाकाम रहे और इसके बाद दूसरे स्थान पर खिसक गए।
इस साल मलेशिया ओपन राष्ट्रमंडल खेलों के कारण आगे खिसका दिया गया है। विक्टर को जनवरी में टखने की चोट के कारण इंडोनेशिया मास्टर्स से बीच में ही हटना पड़ा था और इसके बाद वह इंडिया ओपन , ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप , यूरोपियन चैंपियनशिप में भी नहीं खेल पाए। बैडमिंटन कोर्ट से दूर रहने के कारण उन्होंने अपने कुल 77,130 अंकों में से 1,660 अंक गंवा दिए जिससे उनके अंक 75,470 हो गए जबकि श्रीकांत ने कुल 76,895 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल कर लिया। पिछले साल इंडोनेशिया , ऑस्ट्रेलिया , डेनमार्क और फ्रांस में एक के बाद एक चार खिताब जीतकर रैंकिंग में इतने ऊपर आए। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रमंडल खेलों में मलेशिया के महान बैडमिंटन खिलाड़ी ली चोंग वेई को सीधे गेम में हराकर भारत को मिश्रित टीम का स्वर्ण पदक भी दिलाया। इस 25 वर्षीय खिलाड़ी ने कहा , ‘‘ यह एक शानदार साल रहा लेकिन मेरे और भी कई लक्ष्य हैं एवं इस समय मेरा ध्यान बड़ी प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करने तथा और उपलब्धियां हासिल करने पर है। राष्ट्रमंडल खेल चल रहे हैं और इस साल एशियाई खेल भी हैं। ’2014 में बैडमिंटन के महानतम खिलाड़ी लिन डैन को हराकर चाइना ओपन का खिताब जीतने वाले श्रीकांत ने कहा , ‘‘ मेरा लक्ष्य दो साल के बाद तोक्यो ओलंपिक में देश के लिए गौरव हासिल करना भी है। मैं मुझमें विश्वास करने के लिए सबका आभार जताता हूं और उम्मीद करता हूं कि और भी भारतीय उत्कृष्टता की तरफ बढ़ने की अपनी कोशिश जारी रखेंगे। भारतीय बैडमिंटन संघ ( बीएआई ) के अध्यक्ष हेमंत विश्व सरमा ने श्रीकांत की तारीफ करते हुए कहा ‘‘ यह भारतीय बैडमिंटन के लिए शानदार है और मेरा मानना है कि श्रीकांत की बेहतरीन उपलब्धि से दूसरे खिलाड़ी अच्छे प्रदर्शन और रैंकिंग में ऊपर जाने का लक्ष्य बनाने के लिए प्रेरित होंगे। उन्होंने कहा , ‘‘ मैं उन्हें बधाई देना चाहूंगा और विश्वास करता हूं कि वह आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। ’दूसरे भारतीयों में ओलंपिक रजत पदक विजेता पी वी सिंधु इस समय तीसरे स्थान पर जबकि साइना नेहवाल 12 वें स्थान पर हैं। वहीं एच एस प्रणय एक पायदान का सुधार करते हुए 11 वें स्थान पर पहुंच गए हैं।

गलती हो तो कह दीजिए…आई एम सॉरी

प्यार में तकरार आम बात है। कभी यह नोंक-झोंक आसानी से टल से जाती है तो कभी साथी थोड़ा ज्यादा नाराज हो जाता है। ऐसे में सामने वाले को समझदारी के साथ बात को संभालने की जरूरत होती है और गलती होने पर माफी माँग लेने में कोई बुराई नहीं है। अगर आप नहीं जानते कि अपने साथी से माफी कैसे माँगी जाए तो जरा यहाँ ध्यान दें –
झगड़े की कोई एक वजह नहीं होती यह किसी भी बात पर हो सकता है। ऐसे में अपने पार्टनर से अपनी तरफ से उस बात को फिर ना छेड़ने की जिम्मेदारी लें और सॉरी कहें। इससे बात भी संभल जाएगी और साथी की नाराजगी भी खत्म हो जाएगी।
अगर आप सोच रहे हों कि सभी बातें करने के बाद आखिर में माफी मांगे तो ऐसा ना करें। जितनी जल्दी और सीधे तौर पर पार्टनर से माफी मांगेगे उतना ही बेहतर होगा। ऐसा करने से दोनों के बीच का विवाद और खराब होने के बजाय सही वक्त पर सुलझ सकेगा।
सिर्फ सॉरी बोलने के बजाय जरूरी है पार्टनर से बात की जाए ताकि झगड़ा पूरी तरह से खत्म हो सके। इससे सबसे बड़ा फायदा होगा कि आप दोनों को एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे और आगे से ऐसे झगड़े होने के खतरे कम हो जाएंगे।
इसका मतलब है जब तक आप सच में गलती महसूस ना करें तब तक पार्टनर से माफी न माँगें। अगर आप ऐसा करेंगे तो जल्द ही फिर झगड़ा होने का खतरा बना रहेगा। इसी के साथ ही आपके साथी को ये सॉरी बहुत बचकाना हरकत लगेगी, जिससे आपका इंप्रेशन और खराब होगा।
आपको जब भी लगे कि हर बार झगड़ा और माफी माँगने के बावजूद कहीं कुछ ना कुछ गलत हो रहा है तो वक्त निकाल कर बात करें। इससे आप दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े खत्म होंगे।

आप कैसे मनाते हैं अपने रूठे दोस्तों, परिजनों और साथियों को, हमें बताएँ
(साभार)

केरल में महिलाओं के लिए होगा ‘‘शी कोरिडोर’’

तिरूवनंतपुरम : केरल में एक नगर निकाय सिर्फ महिलाओं के लिए एक ऐसा गलियारा बनाने पर काम रहा है जहां महिला शौचालय , नैपकिन वेंडिंग मशीन , सीसीटीवी कैमरे और दीवारों पर महिलाओं की कामयाबी की गाथा बयां करने वाले चित्र लगे होंगे। अगर सबकुछ योजना के मुताबिक हुआ तो तिरूवनंतपुरम में जल्द ही एक ऐसा मार्ग तैयार होगा जहां महिलाएं सुरक्षित अनुभव कर सकती हैं। नगर निगम गवर्मेंट वूमन्स कॉलेज जंक्शन से यहां वज़हुथाकॉड के बीच सरकारी कोटनहिल गर्ल्स हायर सकेंडरी स्कूल तक ‘ शी कॉरिडोर ’ स्थापित करने की तैयारी कर रही है।
वूमन्स कॉलेज और कोटनहिल स्कूल शहर के बीचों बीच स्थित लड़कियों के प्रतिष्ठित संस्थान हैं। महिलाओं को खास सुविधाओं की पेशकश करने के अलावा इसका मकसद सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा को भी रेखांकित करना है। उपमहापौर राखी रविकुमार ने बताया कि पहल का मकसद यहां महिला निवासियों के मन में सुरक्षा की भावना को बिठाना है।
राखी ने कहा कि इस परियोजना का मकसद राज्य की राजधानी को आदर्श महिला सुविधा अनुकूल शहर में तब्दील करना और उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देना है। महिलाओं को हमारे शहरों में स्वतंत्र और सुरक्षित महसूस करना चाहिए। उन्होंने बताया कि गलियारे में सड़क के दोनों ओर महिलाओं के बैठने की सुविधा होगी और इस पूरे मार्ग पर सीसीटीवी कैमरों की नजर होगी। इस मार्ग पर एफएम रेडियो , महिला शौचालय और नेपकिन वेंडिंग मशीनें भी होंगी। राखी ने बताया कि इस परियोजना के लिए दो करोड़ रुपये निश्चित किए गए हैं।

सेक्स वर्कर्स को भी मिलेगी शिक्षा, दिल्ली पुलिस ने उठाया जिम्मा

नई दिल्ली: सेक्स वर्कर्स के लिए एक अच्छी खबर आई है। सरकार की तरफ से उन्हें शिक्षित करने के लिए परियोजना तैयार की गई है। इसके तहत दिल्ली पुलिस द्वारा रेड-लाईट एरिया और जीबी रोड से छुड़ाई गई सेक्स वर्कर को पढ़ाया जाएगा।   13 महिलाओं को दिल्ली पुलिस की विशेष संस्था स्पेशल पुलिस यूनिट फॉर वुमेन एंड चिल्ड्रन द्वारा दिल्ली के बदनाम रेड-लाईट एरिया, जीबी रोड से मुक्त कराया गया है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत एक विशेष परियोजना में इन लड़कियों को एक महीने के लिए अल्पकालिक कौशल प्रशिक्षण दिया गया।
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश मुक्ता गुप्ता की अध्यक्षता में वंचित लड़कियों को सहयोग एवं कौशल प्रशिक्षण देना और उन्हें आजीविका के व्यावहारिक साधन उपलब्ध कराना इस विशेष परियोजना का उद्देश्य है।
स्पेशल प्रोजेक्ट के बारे में कौशल मंत्रालय के संयुक्त सचिव एवं सीवीओ राजेश अग्रवाल ने कहा, “सेक्स वर्कर्स का शोषण दयनीय स्थिति में है. इन्हें अपने काम के चलते भेदभाव के नजरिए से देखा जाता है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत इन लड़कियों को कौशल प्रदान करने और उन्हें बेहतर आजीविका उपलब्ध कराना इस परियोजना का मकसद है ताकि वे बेहतर और गरिमामय जीवन जी सकें।”
अग्रवाल ने कहा, “दिल्ली पुलिस के साथ हमारे संयुक्त प्रयासों के माध्यम से हम सेक्स वर्कर्स को सुरक्षा प्रदान कर उन्हें आजीविका के गरिमामय साधन देना चाहते हैं।”
जुवेनाईल जस्टिस कमेटी की चेयरमैन न्यायाधीश मुक्ता गुप्ता ने कहा, “मानव तस्करी एक गंभीर मुद्दा है। हमारा मानना है कि राष्ट्रीय कौशल विकास योजना की यह विशेष परियोजना अन्य पीड़ितों को भी आगे आने के लिए प्रोत्साहित करेगी और उन्हें बेहतर आजीविका के अवसर तलाशने में मदद करेगी. इस परियोजना के माध्यम से हम इन लड़कियों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकेंगे।

65वें राष्ट्रीय पुरस्कार : विनोद खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार, श्रीदेवी बनीं सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री,

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय फिल्मों के निर्णायक मंडल ने अभिनेता विनोद खन्ना को दादा साहेब फाल्के और अभिनेत्री श्रीदेवी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार देने की घोषणा की। दोनों ही कलाकारों को यह पुरस्कार मरणोपरांत दिया जाएगा। निर्णायक मंडल के प्रमुख शेखर कपूर ने बताया कि असमी फिल्म ‘ विजय रॉकस्टार्स ’ को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म और मलयाली फिल्म ‘ भयानकम ’ के लिए जयराज को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार दिया जाएगा। बंगाली फिल्म ‘ नगर कीर्तन ’ में शानदार अभिनय के लिए रिद्धी सेन ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार अपने नाम किया है। ‘ न्यूटन ’ को साल के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म के लिए चुना गया है। वहीं एस एस राजमौली की ‘ बाहुबली : द कनक्लुजन ’ को सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का पुरस्कार दिया जाएगा। खन्ना का पिछले साल 27 अप्रैल को 70 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। वहीं इस साल 25 फरवरी को श्रीदेवी (54) के निधन से पूरे देश सकते में आ गया था।

65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की ये रही पूरी लिस्ट

बेस्ट एक्टर – ऋद्धि सेन (नगर कीर्तन)
बेस्ट एक्ट्रेस – श्रीदेवी (मॉम)
बेस्ट फिल्म – विलेज रॉकस्टार्स (असमिया भाषा)
दादा साहेब फाल्के – विनोद खन्ना
इंटरटेनर फिल्म ऑफ द ईयर – बाहुबली (द कन्क्लूजन)
बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस – दिव्या दत्ता (इरादा)
बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर – फहाद फाजिल (तोंडीमुथलम दृक्शयम)
बेस्ट डायरेक्टर – जयराज
बेस्ट हिंदी फिल्म – न्यूटन
बेस्ट तेलगु फिल्म – गाजी
बेस्ट लद्दाखी फिल्म – वॉकिंग विद द विंड
बेस्ट तमिल फिल्म – टू लेट
बेस्ट बंगाली फिल्म – मयूरक्षी
बेस्ट कन्नड़ फिल्म – हेब्बत रामाक्का
बेस्ट मलयालम फिल्म – थोंडीमुथलम दृक्शियम
बेस्ट उड़िया फिल्म – हेलो आर्सी
बेस्ट मराठी फिल्म – कच्चा लिंबू
बेस्ट गुजराती फिल्म – दह..
बेस्ट असम फिल्म – इशू
बेस्ट एक्शन डायरेक्शन अवार्ड – अब्बास अली मोगुल (बाहुबली- द कन्क्लूजन)
बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर – ए आर रहमान (‘कात्रु वेलियिदाई’ के लिए)
बेस्ट लिरिक्स – जे एम प्रहलाद
बेस्ट कोरियोग्राफर – गणेश आचार्य (‘गोरी तू लठ्ठ मार…’ गाने के लिए)
बेस्ट जूरी अवार्ड – नगर कीर्तन
बेस्ट मेक-अप आर्टिस्ट – राम रज्जक (नगर कीर्तन)
बेस्ट प्रोडक्शन डिजाइन – संतोष रमन (टेक ऑफ)
बेस्ट स्क्रीन प्ले –
* स्क्रीनप्ले राइटर (ओरिजनल) – संजीव पजहूर (तोंडीमुथलम दृक्शयम)
* स्क्रीनप्ले राइटर (एडाप्टेड) – जयराज (भयानकम)
* डायलॉग्स – संबित मोहंते (हेलो अर्सी)
बेस्ट सिनेमेटोग्राफी – ‘भयानकम’
बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर – शशा तिरुपति (‘कात्रु वेलियिदाई’ गाने के लिए)
बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट – बनिता दास (विलेज रॉकस्टार्स)