Friday, July 10, 2026
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गोरखपुर : मदरसा बना मिसाल – अरबी, अंग्रेज़ी के साथ-साथ पढ़ाई जा रही है संस्कृत

 गोरखपुर : वक्त के साथ-साथ अब देश के मदरसों में भी बदलाव देखा जा रहा है। गोरखपुर में दारुल उलूम हुसैनिया मदरसे की चर्चा इस समय दूर-दूर तक हो रही है क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले बच्चों के लिए यह मदरसा आधुनिक शिक्षा का केंद्र बना दिया गया है। यहां विज्ञान, गणित, अंग्रेज़ी, अरबी के साथ-साथ हिन्दी और यहां तक कि संस्कृत भाषा भी पढ़ाई जा रही है।
इससे पहले शायद यह बात पहले कभी नहीं सुनी गई कि किसी मदरसे में संस्कृत भी पढ़ाई जा रही हो। गोरखपुर का यह मदरसा उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के अंतर्गत चलाया जाता है और सबसे खास बात यह है कि संस्कृत भाषा पढ़ाने के लिए भी यहां मुस्लिम शिक्षक ही नियुक्त किया गया है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस समय मदरसों को आधुनिक बनाने के लिए कई तरह के कदम उठा रहे हैं।

महिला ने शौचालय न होने पर छोड़ी ससुराल

लखनऊ : अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर की फिल्म ‘टॉयलेट : एक प्रेम कथा’ की कहानी से मिलती जुलती एक खबर उत्तर प्रदेश के संभल जिले में सामने आई है। एक महिला अपनी ससुराल को छोड़कर इसलिए मायके चली गई क्योंकि वहां पर शौचालय नहीं था। महिला के बार-बार कहने के बाद भी ससुराल में शौचालय नहीं बनवाया जा रहा था। इससे परेशान होकर उसने मायके जाने का फैसला कर लिया। महिला इस समय अपने भाई के घर पर है। बताया जा रहा है कि इस बीच ससुरालजनों ने कई बार उसको मनाने की कोशिश की है लेकिन उसने कहा है कि जब तक शौचालय नहीं बन जाएगा वह वापस नहीं आएगी।
घटना के सामने आने के बाद सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने कहा है कि मामले की जांच की जा रही है जो भी उचित होगा कदम उठाया जाएगा। गौरतलब है कि मोदी सरकार की ओर से ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत खुले में शौच न करने के लिए भी लोगों को जागरुक किया जा रहा है। इसका असर भी अब धीरे-धीरे समाज में दिख रहा है। कई लोगों ने अपने घरों में शौचालय बनवाएं हैं और गरीब परिवारों को सरकार की ओर से भी मदद की जा रही है।

प्रिंस हैरी और मेघन मरकले की शादी पर निमंत्रित की गयी भारतीय खानसामा

लंदन : भारतीय मूल की एक मशहूर खानसामा और सामाजिक उद्यमी ने कहा है कि उन्हें राजपरिवार से एक लिफाफा मिला और जब उन्होंने उसे खोला तो उसमें अगले महीने होने वाली प्रिंस हैरी एवं मेघन मरकले की शादी का निमंत्रण देखा । उन्होंने कहा कि यह देखकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
ब्रिटेन में जन्मीं पंजाबी माता – पिता की संतान रोसी गिंडे (34) उन 1200 आम लोगों में हैं जिन्हें अपने समुदाय के बीच उल्लेखनीय योगदान के लिए इस शादी में आमंत्रित किया गया है।  गिंडे कारोबारी इकाई ‘ मिस मैकारुन ’ की संस्थापक हैं। यह इकाई न केवल मैकारुन्स बिस्किट बनाती और बेचती है बल्कि अपना लाभ युवाओं के रोजगार प्रशिक्षण अवसरों पर भी इस्तेमाल करती है।
जब पिछले महीने राजपरिवार के लेाग बर्घिंघम पहुंचे थे तब उन्होंने उनके बिस्किट का स्वाद चखा और वे उनके उद्यम से प्रभावित हुए थे।
गिंडे ने कहा , ‘‘ यह निमंत्रण पाना और इस तरह पहचान मिलना वाकई रोमांचक है। वे उन संगठनों को एक पहचान देने के लिए इस मौके का इस्तेमाल कर रही हैं जो अपने समुदायों में सुधार के लिए काम कर रहे हैं। ’’

देश के पहले सुपरस्टार के एल सहगल जिन्होंने सेल्समैन से होटल मैनेजर बन किया काम,

नई दिल्ली: गूगल ने डूडल बनाकर भारत के पहले सुपरस्टार कुंदन लाल सहगल को उनकी 114 जयंती पर याद किया। हिंदी सिनेमा में बेमिसाल गायक के नाम से मशहूर सहगल का जन्म 11 अप्रैल, 1904 को हुआ था। शानदार गायक होने के साथ-साथ सहगल ने अपने अभिनय से भारतीय दर्शकों के दिलों पर खास जगह बनाई और इसी के साथ उन्हें देश का पहला सुपरस्टार कहा जाने लगा. 1935 में आई फिल्म ‘देवदास’ सहगल के करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुई।


सहगल का जन्म जम्मू में हुआ था। उनके पिता अमरचंद सहगल जम्मू के राजा के न्यायालय में तहसीलदार थे जबकि मां केसरबाई भगवान की भक्ति में लीन और संगीत प्रेमी थीं। केसरबाई अक्सर बेटे को भजन, कीर्तन में ले जाया करती थीं। बचपन में उन्होंने रामलीला में सीता का किरदार निभाया। सहगल ने जल्द ही पढ़ाई छोड़कर पैसे कमाना शुरू कर दिया। वह रेलवे टाइमकीपर के तौर पर काम करने लगे। बाद में उन्होंने रेमिंगटन टाइपराइटर कंपनी में टाइपराइटर सेल्समैन के रूप में काम किया और भारत के कई हिस्सों का दौरा करने का मौका उन्हें मिल। कुछ समय के लिए उन्होंने होटल मैनेजर के तौर पर भी काम किया लेकिन किस्मत उन्हें फिल्मी दुनिया में ले ही आई।

1930 के दशक में उन्होंने बतौर गायक फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। बी.एन. सरकार ने उन्हें 200 रुपये प्रति माह के अनुबंध पर रखा था। सहगल की यहां मुलाकात संगीतकार आर.सी.बोराल से हुई। बतौर अभिनेता सहगल को साल 1932 में प्रदर्शित एक उर्दू फिल्म ‘मोहब्बत के आंसू’ में अभिनय का मौका मिला। 1933 में प्रदर्शित फिल्म ‘पुराण भगत’ की कामयाबी के बाद बतौर गायक सहगल कुछ हद तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो पाए थे। 1937 में सहगल को बांग्ला फिल्म ‘दीदी’ से अपार सफलता मिली।

सहगल को जो शोहरत मिली वो कम ही लोगों को हासिल होती है। उनकी लोकप्रियता का आलम ये रहा है कि अपने दौर के सबसे विख्यात रेडियो चैनल रेडियो सीलोन ने करीब 48 साल तक हर सुबह अपना एक कार्यक्रम सहगल के गानों पर ही आधारित रखा था। 1940 से 1947 तक सहगल ने हिंदी फिल्म जगत में काफी नाम कमाया। सहगल ने अपने करियर में 185 गाने रिकॉर्ड किए, इसमें में 142 फिल्मी और 43 गैर-फिल्मी रहे। आप उनकी लोकप्रियता का आलम इस बात से लगा सकते हैं कि लता मंगेशकर से लेकर किशोर कुमार तक के एल सहगल को अपना गुरू मानते थे। सहगल महज 43 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन इस छोटे से दौर में उन्होंने शोहरत की बुलंदियां हासिल कर ली थीं। उनका निधन 18 जनवरी, 1947 को जालंधर में हुआ था।

हिन्दुस्तान मुसलमानों की नहीं, धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं की वजह से धर्मनिरपेक्ष : गौहर रज़ा

नयी दिल्ली : देश में हाल ही में राम नवमी और हनुमान जयंती के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में जाने-माने शायर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ.गौहर रज़ा का कहना है कि हिन्दुस्तान मुसलमानों की वजह से नहीं बल्कि हिन्दुओं की वजह से धर्मनिरपेक्ष मुल्क है और देश को बचाने के लिए अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए अल्पसंख्यकों को उनका साथ देना चाहिए। शायर, वैज्ञानिक और सामाजिक कार्याकर्ता डॉ.गौहर रज़ा ने कहा कि ‘‘इस देश में मुसलमान और दलित बड़ी ताकत हैं। दलित तो और भी बड़ी ताकत हैं। दोनों मिलकर देश को बदलने में अहम किरदार अदा कर सकते हैं।’’ रज़ा ने कहा, ‘‘हिन्दुस्तान मुसलमानों की वजह से धर्मनिरपेक्ष नहीं है। यह देश यहां के धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं की वजह से धर्मनिरपेक्ष है।’’ हाल ही में रामनवमी और हनुमान जयंती पर सांप्रदायिक हिंसा और मुस्लिम मौहल्लों से जुलूस निकाले जाने की पृष्ठभूमि में शायर ने कहा, ‘‘ सवाल राजनीतिक संस्कृति का है और वह :भाजपाः इसे बदलने में लगी हुई है। मैं नहीं समझता कि हिंदूवादी ताकतें मुसलमानों या ईसाइयों से नफरत करती हैं लेकिन यह इनकी राजनीति है। जब धार्मिक नारे लगाए जाते हैं तो यह मजहबी नहीं सियासी हरकत है। इससे लड़ने की कोशिश भी सियासी होनी चाहिए। अगर इसे मजहबी रंग दिया गया तो इससे लड़ना मुमकिन नहीं है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुसलमान अकेले न खुद को बचा सकता है और न देश को बचा सकता है। उसे इन धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं का साथ देना चाहिए और इनके साथ मिलकर लड़ना चाहिए।’ मुसलमानों को कथित तौर पर उकसाने की घटनाओं पर रज़ा ने कहा, ‘‘ मुसलमानों ने अब तक खुद पर काबू रखा है जो उम्मीद पैदा करता है।’उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘ महात्मा गांधी ने हमें अहिंसा का रास्ता दिखाया है। मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष हिन्दुओं के साथ मिलकर अहिंसक तरीके से विरोध करना चाहिए। हो सकता है कि शुरू में दुश्वारियां आएं लेकिन आखिरकार जिस तरह से देश को आजादी मिली थी उसी तरह के नतीजे आएंगे।’’
देश के मौजूदा हालात पर रज़ा ने कहा, ‘‘ नफरत कभी एक कौम तक सीमित नहीं रहती। जब नफरत के पंख फैलने शुरू होते हैं तो यह पूरे समाज को अपनी जद में लेती है। हमने यह अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अन्य मुल्कों में देखा है। हमारी संस्थाओं का जिस तरह से राजनीतिकरण किया जा रहा है उसके नतीजे बहुत भयावह होंगे।’’

मां ने मूंगफली बेचकर क्रिस गेल को बनाया क्रिकेट का सबसे सफल खिलाड़ी

आईपीएल 2018 की जंग शुरू हो चुकी है और सभी टीमें चैम्पियन बनने की जंग में भिड़ चुकी हैं। विश्व क्रिकेट के सबसे खतरनाक खिलाड़ी आईपीएल में नजर आ रहे हैं. उसी में है क्रिस गेल जो किंग्स इलेवन पंजाब की तरफ से खेल रहे हैं। उनके प्रशंसक सिर्फ वेस्टइंडीज में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं। वो पहले बल्लेबाज हैं जिन्होंने टी-20 में शतक जड़ा था। आईपीएल में सबसे ज्यादा छक्के (265) लगाने वाले बल्लेबाज भी हैं।
जब भी वो आईपीएल में खेलने उतरते हैं तो भारतीय समर्थक भी उनको सपोर्ट करते हैं. गेल ने ये मुकाम बहुत संघर्षों के बाद पाया है। गेल का जन्म वेस्टइंडीज के जमैका के किंग्सटन में 21 सितंबर 1979 को हुआ। उनका बचपन काफी संघर्षों में बीता। उनका बचपन गरीबी में बीता। दो वक्त की रोटी भी खाना मुश्किल था। उनके पिता पुलिस में थे तो वहीं मां मूंगफली बेचा करती थीं। उस वक्त क्रिस गेल गली-महल्ले में ही क्रिकेट खेला करते थे। उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो ग्राउंड पर क्रिकेट प्रैक्टिस कर सकें। बड़े होते ही वो जमैका का लुकास क्रिकेट क्लब में शामिल हो गए। उनकी बल्लेबाजी के चर्चे हर जगह थे। इसको देखते हुए 19 साल की उम्र में ही उनको फर्स्ट क्लास मैच खेलने का मौका मिल गया।
फर्स्ट क्लास में उन्होंने शानदार परफॉर्म किया और वेस्टइंडीज के लिए खेलने का मौका मिल गया। उन्होंने पहला वनडे भारत के खिलाफ 1998 में खेला था. जिसके बाद टेस्ट मैच में भी उन्हें मौका दिया गया लेकिन वो इंटरनेशनल में ठीक परफॉर्म नहीं कर पाए जिसकी वजह से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया लेकिन अंदर आने के लिए गेल संघर्ष करते रहे और 2002 में उनको वेस्टइंडीज में फिर जगह मिल गई। उसी साल उन्होंने भारत के खिलाफ 3 सेंचुरी जड़ीं जिसके बाद उनका नाम पूरे विश्व में छा गया।
2005 में पता चला कि दिल में छेद है
2005 में गेल जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेल रहे थे तो वो चक्कर खाकर ग्राउंड पर ही गिर गए थे। उनको सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच के दौरान पता चला कि उनके दिल में छेद है. जिसके बाद क्रिकेट छोड़ उन्होंने इलाज कराया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करना शुरू कर दिया। शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें 2006 में चैम्पियंस ट्रॉफी में प्लेयर ऑफ द मैच दिया गया। 2007 टी-20 वर्ल्ड कप के दौरान उन्होंने दक्षिणअफ्रीका के खिलाफ शानदार 117 रन की पारी खेली. इसी के साथ वो टी-20 में पहला शतक बनाने वाले खिलाड़ी बन गए थे।

राज कपूर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित होंगे धर्मेंद्र

नई दिल्ली: महाराष्ट्र सरकार ने दिग्गज अभिनेता धर्मेद्र को राज कपूर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए चुना है जबकि निर्देशक राजकुमार हिरानी को राज कपूर स्पेशल कंट्रीब्यूशन अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। महाराष्ट्र शिक्षा एवं सांस्कृतिक मामलों के मंत्री विनोद तावड़े ने  सोशल मीडिया के जरिए यह घोषणा की।
तावडे ने ट्वीट कर कहा, “महाराष्ट्र सरकार के राज कपूर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए धर्मेद्र जी और राज कपूर स्पेशल कंट्रीब्यूशन अवॉर्ड के लिए निर्देशक राजकुमार हिरानी के नाम का ऐलान कर बहुत खुशी हो रही है. बधाई।”
मराठी अभिनेता विजय चौहान और अभिनेत्री मृणाल कुलकर्णी को भी सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा, “दिग्गज अभिनेता विजय चौहान को प्रतिष्ठित चित्रापति वी शांताराम जीवन गौरव पुरस्कार और अभिनेत्री-निर्देशक मृणाल कुलकर्णी को चित्रापति वी शांताराम विशेष योगदान पुरस्कार के लिए बधाई। “

शिल्पकारों, दस्तकारों के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय शुरू करेगा ‘विरासत योजना’

नयी दिल्ली : अल्पसंख्यक समुदाय के गरीब दस्तकारों, शिल्पकारों और कारीगरों को पूंजी मुहैया कराने के लिए सरकार ‘‘विरासत योजना’’ शुरू करने की तैयारी में है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की इस प्रस्तावित योजना के तहत दस्तकारों, शिल्पकारों और दूसरे पुश्तैनी कामों में लगे कारीगरों को 10 लाख रुपये तक का ऋण मुहैया कराए जाएगा। इस पर ब्याज की दर पांच फीसदी से भी कम रखे जाने की संभावना है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताया कि ‘इस प्रस्तावित योजना को लेकर जरूरी प्रक्रियाओं को पूरा किया जा रहा है और अगले डेढ़-दो महीनों में इसके शुरू हो जाने की उम्मीद है।’ दरअसल, इस योजना को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम (एनएमडीएफसी) के माध्यम से क्रियान्वित किया जाना है और इसका मसौदा भी एनएमडीएफसी द्वारा तैयार किया गया है। एनएमडीएफसी के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक मोहम्मद शहबाज अली ने बताया, ‘करीब तीन महीने पहले हमने इस योजना का प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा था। मंत्रालय की ओर से हमसे कुछ और ब्यौरा मांगा गया था और हमने वो भी भेज दिया है। मंत्रालय इस योजना को लागू करने के लिए तैयार है। उम्मीद है कि यह योजना जल्द शुरू हो जाएगी।’ उन्होंने कहा कि एनएमडीएफसी की ओर से इस प्रस्तावित योजना का जो मसौदा तैयार किया गया है उसमें शिल्पकारों, दस्तकारों और कारीगरों को पांच फीसदी से भी कम के ब्याज पर 10 लाख रुपये तक की पूंजी मुहैया कराने का प्रावधान किया गया है ताकि ये लोग अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा सकें।
गौरतलब है कि शिल्पकारों, दस्तकारों और कारीगरों को बाजार और अवसर प्रदान करने के लिए अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय समय समय पर ‘हुनर हाट’ का आयोजन करता है। अली का कहना है, ‘शिल्पकारों, दस्तकारों और दूसरे पुश्तैनी कामों में लगे कारीगरों को ‘हुनर हाट’ से बड़ा बाजार और अवसर मिला है, लेकिन अभी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनको अपने कारोबार के लिए पूंजी की जरूरत है। इन्हीं लोगों की मदद के लिए इस योजना का प्रस्ताव दिया गया है।’
उन्होंने कहा, ‘‘पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि पुश्तैनी पेशों से जुड़े लोगों की दिक्कतें बढ़ी हैं। उनके सामने सबसे बड़ी दिक्कत वित्तीय इंतजाम न होने की है। हमारे पास कई लोगों के सुझाव आए थे। इसके बाद हमने इस तरह की योजना का प्रस्ताव तैयार किया।’’

50 की उम्र के बाद हो सकती हैं ये मनोवैज्ञानिक समस्यायें

अकसर काम और जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद लोग अपने भविष्य को लेकर तरह -तरह की दुशचिंताओं में पड़ जाता है और उसे कई तरह की मानसिक या मनोवैज्ञानिक समस्याएं घेर लेती है। उम्र के दूसरे पड़ाव में होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं एक बहस का मुददा हो सकती है। इस उम्र में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और उसकी प्रकृति के अनुसार उससे लड़ने के लिए डॉक्टर बहुत सारे सलाह दे सकते है। मध्य उम्र में होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं 30 की उम्र पार करने और 50 के पहले तक शुरू हो सकती है। यह स्थित कई तरह की बीमारियों के लक्षण को प्रकट होने का संकेत देती है लेकिन यह निश्चिंत करना बड़ा कठिन होता है कि ये समस्याएं शरीर में हार्मोंस के असंतुलित होने से होता है या मानसिक स्थिति से।
क्या होते है इसके कारण
रिटायरमेंट के बाद पुरूषों का अपने दैनिक जीवन और दिनचर्या में काफी बदलाव करना पड़ता है। अपनें जीवन में होने वाले इस बदलाव से वह काफी विचलित हो जाता है। जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण इसे इस बदलाव के अनुकूल उसे ढालने में मदद करता है।जिन लोगों की पहचान उनकी नौकरी या व्यवसाय से जुड़ी रहती है वैसे लोगों को सेवानिवृति के बाद मानसिक तौर पर अस्वस्थ होने की संभावना अधिक रहती है। जिन लोगों में बढती उम्र का एहसास कुछ ज्यादा होता है और वह देखने में भी बूढ़े लगने लगते है उनमें स्वंय को लाचार और असहाय समझने जैसी हीन भावना आ जाती है। जो लोग अपनी उम्र बढने के साथ अपनी नौकरी पेशा से रिटायर होने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं होते है, उन लोगों में सेवानिवृति के बाद खास तौर पर भावनात्मक समस्याएं और प्रकट होने लगती है।
उम्र बढने के साथ ही पुरूषों में जीवन के प्रति अनिश्चितत्ता, भ्रम और एक नकारात्मक भाव पैदा होने लगता है जो कई तरह की बीमारियों का वाहक बनता है। इस के कई कारण हो सकते है। उम्र बढने के साथ अचानक मरने का विचार मन में आने लगना। अपने जीवन में होने वाले बदलावों के प्रति असंतुष्ठि का भाव और कुछ अधुरे सपने और दमित इच्छाओं को पानेे की अपेक्षाएं। अपने परिवार में पत्नी, बच्चे या किसी अन्य इष्ट की मौत हो जाने या किसी सहकर्मी की मौत से भी व्यक्ति व्यथित हो जाता है। बढती उम्र में पत्नी से तलाक आदि की स्थित पैदा होने पर भी व्यक्ति इस तरह के मानसिक पीड़ा का अनुभव करता है। रिटायमेंट के बाद अपनी जिम्मेदारी और पहचान के संकट से उत्पन्न खतरे के कारण भी आदमी मानसिक रूप से दुखी हो जाता है। परिवार में बच्चों द्वारा अपने माता पिता को घर में अकला छोड़ कर खुद अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहने की बढती प्रवृति के कारण भी बूढे लोगों में एक तरह से असुरक्षा का भाव पनपने लगता है। वह भावनात्मक रूप से काफी संवेदनशील हो जाता है। इसी कमी को दूर करने के लिए अकसर वृद्ध लोग अपनी उम्र के लोगों के साथ समय गुजारने लगते है और अपनी परेशानी और दुशचिंताओ को एक दूसरे से शेयर करते है।
उम्र बढने के बाद अपनी नौकरी पेशा से रिटायरमेंट होने के लिए समय रहते ही खुद को मानसिक रूप से तैयारी करना शुरू कर दे। आप अपने रिटायरेमेंट के कुछ माह पहले से ही अपने काम को करने में मजा लेने और काम के प्रति थोड़ा कंम गंभीर या कहे तो लापरवाह बन कर पहले से सेवानिवृति का अभ्यास कर सकते है।

(साभार ओनली माई हेल्थ डॉट कॉम)

आम्बेडकर जयंती : डॉ. भीमराव आम्बेडर के कुछ विचार

डॉ भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल सन् 1891 में मध्यप्रदेश के महू में हुआ था। बाबा साहेब के नाम से मशहूर आंबेडकर  ही भारत के संविधान के निर्माता हैं। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर  का जीवन संघर्ष और सफलता की ऐसी अद्भुत मिसाल है

आइए जानते हैं उनके कुछ विचार

1. जीवन लम्बा होने के बजाय महान होना चाहिए।

2. मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।

3. यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के शास्त्रों की संप्रभुता  का अंत होना चाहिए।

4. हिन्दू धर्म में विवेक, कारण और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।

5. इतिहास बताता है कि जहां नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष होता है, वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है, जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल न लगाया गया हो।

6. बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।

7. समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।

8. यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो मैं इसे सबसे पहले जलाऊंगा।

9. जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते,कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी है।

10. समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।