Friday, July 10, 2026
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नयी उमंग का और श्रद्धा का पर्व बैसाखी

बैसाखी बैसाख से बना है। बैसाखी का त्योहार पंजाब हरियाणा सहित अन्य कई स्थानों पर व्यापक स्तर पर मनाया जाता है। बैसाखी को पंजाब और हरियाणा में किसान फसल काटने के बाद नए साल की खुशियां मानते हैं।

इसलिए बैसाखी पंजाब और हरियाणा के आसपास के क्षेत्रों में सबसे बड़े त्योहार के तौर पर मनाया जाता है। बैसाखी रबी फसल के पकने की खुशी में मनाया जाता है। साल 2018 में बैसाखी 14 अप्रैल (शनिवार) को है।

बैसाखी का महत्व

बैसाख (अप्रैल) माह में रबी फसल कटकर घर आती है। इस फसल को बेचकर किसान धन कमाते हैं। इसलिए भी बैसाखी का यह पर्व उल्लास का पर्व माना गया है।

वैसे तो हर वर्ष बैसाखी के दिन पंजाब में कई मेले लगते हैं। लेकिन जब बैसाखी में कुंभ का मेला भी हो तो इस दिन स्नान करने का महत्व और भी बढ़ जाता है। बैसाखी के दिन ही सिख गुरु गोविंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी।

गुरुगोविंद सिंह ने बैसाखी के दिन ही आनंदयुर साहब के गुरूद्वारे में पांच प्यारों से बैसाखी पर्व पर ही बलिदान के लिए आह्वान किया गया था। सिख धर्म में बैसाखी को बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार माना गया है।

वैसे पंजाब ही नहीं, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी बैसाखी की धूम रहती है। इसके साथ ही जहां-जहां सिख धर्म के मानने वाले लोग हैं वहां बैसाखी जरूर मनाई जाती है। इस दिन तीर्थों में स्नान का महत्व भी है।

गुरु गोविन्द सिंह और खालसा पंथ : बलिदान की शौर्य गाथा

भगवान और उनके भक्तों के बीच सदियों से ही एक अटूट रिश्ता देखने को मिला है। यह एक ऐसे बंधन की डोर है जो विश्वास के धागे में बंधी है। कुछ ऐसा ही रिश्ता देखने को मिलता है सिख धर्म के दसवें गुरु ‘श्री गुरु गोबिंद सिंह जी’ और उनकी संगत (भक्तों) में। कहते हैं एक बादशाह होते हुए भी अपनी संगत के लिए कुछ भी कर जाने का जज़्बा रखते थे गुरु गोबिंद सिंह जी।
सिख धर्म की स्थापना पहले गुरु ‘गुरु नानक देव जी’ ने की थी परंतु सिखों को ‘सिंह’ उनके दसवें गुरु, ‘गुरु गोबिंद सिंह’ ने बनाया था। गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर, 1666 में सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी और माता गुजरी के घर पटना (बिहार) में हुआ था। उनका विवाह माता सुंदरी जी से महज 11 साल की उम्र में 1677 में हुआ था।
गुरु जी के चार साहिज़ादे (पुत्र) थे जिनमें से बड़े दो पुत्र (अजीत सिंह और जुह्गार सिंह) युद्ध में शहीद हुए और छोटे दो पुत्रों (जोरावर सिंह और फतहि सिंह) को मुगलों ने ज़िंदा दीवार में चिनवाया था। इस महान शहीदी के बाद ही सिख धर्म इन चार साहिबज़ादों के नाम के आगे ‘बाबा’ लगाकर उनका सम्मान करते हैं।
कहते हैं गुरु गोबिंद सिंह बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई और तलवारबाज़ी में कुशल थे। महज़ 10 वर्ष की उम्र में अपने पिता की शहीदी के बाद उन्हें राजा की गद्दी पर बैठा दिया गया था। गुरु गोबिंद सिंह के लिए उनके सिख ‘सिंह’ (शेर) के समान थे, वह शेर जो ना किसी से डरते हैं और ना ही घबराते हैं। सिख धर्म को वर्षों पहले यह पहचान गुरु गोबिंद सिंह द्वारा एक अलग ही अंदाज़ में दी गई थी, जो इतिहास में कभी नहीं देखी गई थी।
13 अप्रैल, 1699, बैसाखी के पर्व का दिन, गुरु जी ने इस दिन के लिए एक खास दीवान (कीर्तन समारोह) आयोजित कराने का आदेश दिया और साथ ही कहा, “मेरी प्यारी संगत से कह दो कि मैं उनसे एक खास बात भी करना चाहता हूं।“ वर्तमान पंजाब में स्थित, आनंदपुर साहिब के ‘केशगढ़’ किले में जहां दूर-दूर से संगतों का हुजूम आया।
सब गुरु जी के दर्शन करने के लिए एकत्रित हो गए। लेकिन साथ ही सबके मन में एक सवाल भी था, कि आखिरकार ऐसी क्या बात है जो इस वर्ष गुरु जी ने इतना बड़ा समारोह आयोजित कराया है। रीति अनुसार दीवान सजाए गए और फिर कीर्तन समाप्त होते ही गुरु जी संगत के सामने प्रस्तुत हुए और उनका स्वागत किया। अपने एक बुलावे पर संगतों की इतनी बड़ी संख्या देखकर गुरु जी को बेहद खुशी हुई।
वे आगे बढ़े, म्यान में से अपनी तलवार निकाली और नंगी तलवार लेकर मंच के बीचो-बीच जाकर बोले, “मेरी संगत मेरे लिए सबसे प्यारी है। मेरी संगत मेरी ताकत है, मेरा सब कुछ है। लेकिन क्या आप सब में से ऐसा कोई है, जो अभी, इसी वक्त मेरे लिए अपना सिर कलम करवाने की क्षमता रखता हो?”
संगत में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया, किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक गुरु जी नी ऐसी बात क्यों की। गुरु जी फिर बोले, “क्या है कोई ऐसा मेरा प्यारा, जो मुझे अपना सिर दे सके? यह तलवार खून की प्यासी है। है कोई ऐसा जो इसी क्षण मेरी इस मांग को पूरा कर सके?”
गुरु जी की आवाज़ मानो एक गूंज की तरह वातावरण में फैल गई, लेकिन अभी भी ऐसा कोई ना था जो उनके इस सवाल का जवाब देने के लिए आगे आया हो। परंतु अगले ही क्षण भीड़ में से एक आवाज़ आई। वो आवाज़ ‘दया राम’ की थी। लाहौर के खत्री परिवार का दया राम गुरु गोबिंद सिंह जी का परम भक्त था।
वह आगे बढ़ा और बोला, “गुरु जी, आपके लिए मेरी जान कुर्बान है। यह जीवन आप ही का दिया हुआ है, तो इसे चलाने या खत्म करने का अधिकार भी आपको ही है।“ गुरु जी खुश हुए और दया राम को अपने पास बुलाया। वे दोनों तम्बू के पीछे गए और कुछ देरे बाद अकेले गुरु जी ही बाहर आए।
गुरु जी की नंगी तलवार में ताज़ा खून की बूंदें टपक रही थी। खून से लथपथ तलवार देख कर लोगों में भय की चिंगारी दौड़ पड़ी, परंतु कोई भी अपनी जगह से ना उठा। गुरु जी फिर बोले, “एक और कुर्बानी चाहिए। है कोई संगत में से कोई, जो आगे बढ़कर अपना सिर कुर्बान कर सके?” इस बार हस्तिनापुर के चमार वर्ग का धर्म दास आगे बढ़ा।
गुरु जी उसे भी लेकर तम्बू के पीछे चले गए और फिर कुछ देर बाद खून से रंगी तलवार लेकर अकेले ही बाहर निकले। यह देख लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था। कुछ लोग आपस में बात करने लगे। कहने लगे कि क्या सच में गुरु जी ने उन दोनों को मार दिया? लेकिन गुरु जी ने ऐसा क्यों किया?
सवाल सब के मन में थे लेकिन कोई भी आगे आकर गुरु जी से यह पूछने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था, क्योंकि संगत को एक विश्वास यह भी था कि गुरु जी तो परमात्मा हैं। और परमात्मा कभी भी अपने श्रद्धालुओं का बुरा नहीं करते। अब गुरु जी ने तीसरे सिर की मांग की। यह सुन लोग हैरान थे कि आखिरकार गुरु जी कर क्या रहे हैं।
इस बार मोहकम चंद खड़े हुए जो कि एक साधारण दर्जी थे और द्वारका के निवासी थे। वह भी गुरु जी के साथ तम्बू के पीछे गया लेकिन बाहर नहीं आया। इसके बाद गुरु जी ने दो और सिरों की मांग की, जिसके अनुसार जगन्नाथ पुरी के हिम्मत राय और बिदर (महाराष्ट्र) के साहिब चंद आगे बढ़े।
पांच सिर की मांग पूरी करने के बाद गुरु जी वापस तम्बू के अंदर चले गए। मान्यता है कि गुरु जी जब तम्बू के पीछे पहुंचे तो उन्होंने उन पांच सिखों पर पवित्र अमृत छिड़का और उनमें जान डाली। बाहर बैठी संगत परेशान थी कि गुरु जी कब से अंदर गए हैं लेकिन अब तक बाहर नहीं आए। परंतु कुछ देर बाद का दृश्य देख लोगों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
केसरिया रंग के लिबास में पांच नौजवान हाथों में हाथ डाले बाहर आ रहे थे। उनके सिर पर सुंदर केसरिया रंग की एक ही प्रकार की पगड़ी बंधी हुई थी। पांचों लोगों के साथ गुरु जी भी ठीक उसी प्रकार की वेशभूषा में बाहर निकले। यह वही पांच नौजवान थे, जिन्होंने कुछ देर पहले ही गुरु गोबिंद सिंह के कहने पर अपने सिर की कुर्बानी दी थी।
परंतु अब वह बिलकुल सही सलामत नज़र आ रहे थे और केसरिया लिबास में बेहद आकर्षक लग रहे थे। पांच नौजवानों के साथ गुरु जी मंच के बीचो-बीच पहुंचे और बोले, “सिख धर्म को अपने पंज प्यारे मिल गए हैं।“
गुरु जी ने अपने हाथ में लोहे का एक कटोरा लिया। उसमें साफ जल (पानी) भरा और माता जीतो जी को कुछ पताशे (चीनी) लाने के लिए आग्रह किया। गुरु जी ने जल में पताशे डाले और उसे एक दो-धारी छोटी सी किरपान (तलवार) से मिलाया। इस तरह से सिख धर्म का पवित्र ‘अमृत’ तैयार हुआ।
अब गुरु जी द्वारा पंज प्यारों को आगे आने के लिए निवेदन किया गया। वे आगे बढ़े और नीचे झुककर अपने दोनों हाथ आगे किए। गुरु जी ने एक-एक प्यारे को अमृत छकाया (पिलाया) और उन्हें खालसा पंथ के पंज प्यारे निर्धारित किया। फिर गुरु जी ने उन्हीं पंज प्यारों के हाथ से स्वयं आगे झुककर अमृत पीया। इतिहासनुसार गुरु जी द्वारा अमृत छ्काने से पहले पंज प्यारों को पांच ककार (कड़ा, केश, कंघा, किरपान और कछहरा) भी अर्पित किए गए थे।
पंज प्यारों के सामने गुरु जी को यूं झुकता हुआ देख सारी संगत चकित रह गई। गुरु जी द्वारा निभाए गए इस वाकए को सिख संगत में ‘वाहो वाहो गोबिंद सिंह आपे गुरु चेला’ वाक्या से उच्चारित किया जाता है। इसका अर्थ है – गुरु गोबिंद सिंह ही गुरु हैं और समय आने पर वही अपने पंज प्यारों के चेला (आज्ञा का पालन करने वाले) भी हैं”।
यह केवल कहने की बात नहीं है। मान्यता है कि गुरु गोबिंद सिंह के पंज प्यारों को स्वयं गुरु जी द्वारा ही कुछ अधिकार प्रदान किए गए थे। गुरु जी की अनुपस्थिति में सिख धर्म से जुड़ी बड़ी-छोटी गतिविधियों की देख-रेख इन्हीं पंज प्यारों के हाथ में सौंपी गई।
गुरु जी की अनुपस्थिति में यह पंज प्यारे गुरु जी के बराबर ही आदेश देने के हकदार बनाए गए। केवल गुरु गोबिंद सिंह के ना होने पर ही नहीं, बल्कि समय आने पर आपसी सलाह से यह पंज प्यारे खुद गुरु गोबिंद सिंह को भी आदेश देने का अधिकार रखते थे।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण चमकौर की गढ़ी के युद्ध के दौरान देखा गया था, जब मुगलों की बड़ी फौज के सामने मुट्ठी भर सिखों को देख पंज प्यारों को गुरु गोबिंद सिंह और सिख धर्म के भविष्य की चिंता सताने लगी। तब गुरु जी स्वयं युद्ध के मैदान में उतरने को तैयार थे, परंतु पंज प्यारों ने उन्हें रोका और उनके अधिकार का इस्तेमाल किया।
उन्होंने गुरु जी से चमकौर का किला छोड़ जाने के लिए विनम्रतापूर्वक निवेदन किया। पंज प्यारों का हुक्म गुरु जी किसी भी हाल में नकार नहीं सकते थे, इसलिए गुरु जी मान तो गए लेकिन जाते-जाते शेर की दहाड़ के बराबर मुगलों के लिए एक गूंज छोड़कर गए।
एक राजा का बाणा (पहनावा) छोड़ एक साधारण व्यक्ति का लिबास धारण कर जब गुरु से किले से बाहर निकल रहे थे तो उन्होंने दुश्मनों के लिए एक संदेश छोड़ना सही समझा। वे बोले, “हिन्द का पीर जा रहा है, कोई रोक सके तो रोक लो।“ यह कहकर गुरु जी माछीवाड़े के जंगल की ओर निकल गए।
आज इतने वर्षों बाद भी सिख संगत में बैसाखी का पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है। जगह-जगह कीर्तन समारोह आयोजित किए जाते हैं और गुरुद्वारों में अमृत छकाने का आयोजन भी किया जाता है। गुरु जी द्वारा सजाए गए पंज प्यारे जो पहले तो अलग-अलग जाति के थे, उन्हें ‘सिंह’ की उपाधि देकर सिख बनाया गया।
अब वे पंज प्यारे ‘भाई दया सिंह’, ‘भाई धर्म सिंह’, ‘भाई हिम्मत सिंह’, ‘भाई मोहकम सिंह’ और ‘भाई साहिब सिंह’ के नाम से जाने जाते हैं। सिख धर्म के प्रत्येक पर्व में नगर कीर्तन के दौरान, जिसे ‘गुरुपर्व’ भी कहा जाता है, उनमें गुरु ग्रंथ साहिब की सुंदर पालकी के आगे इन पंज प्यारों को जगह दी जाती है।
(साभार – स्पीकिंग ट्री से गुलनीत कौर का आलेख)

जलियाँवाला बाग में बसंत

– सुभद्रा कुमारी चौहान

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

 

सोचो तुम एक लड़की हो….

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वीडियो – साभार बोल पोएट्री

12 लाख ग्राहकों ने अपना नंबर BSNL में कराया पोर्ट

कोलकाता : वित्त वर्ष 2017-18 में मोबाइल नेटवर्क क्षेत्र में उपभोक्ताओं का भरोसा भारत सरकार की राज्य की स्वामित्व वाली भारत संचार निगम लिमिटेड (BSNL) पर बढ़ा है। इस दौरान 12 लाख मोबाइल उपभोक्ताओं ने अपने मोबाइल नंबर बीएसएनएल में पोर्ट करा लिए हैं।
‘कोलकाता टेलीफोन्स’ के मुख्य महाप्रबंधक एस.पी. त्रिपाठी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘पिछले वित्त वर्ष में मोबाइल उद्योग के राजस्व संग्रह में 10 से 20 फीसदी की कमी होने के बावजूद बीएसएनएल का राजस्व संग्रह अन्य मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों से बेहतर रहा है।’ कंपनी ने सिम कार्ड बेचने का लक्ष्य प्राप्त करने और ग्राहकों की शिकायतों का निस्तारण करने में भी अच्छा प्रदर्शन किया है।
त्रिपाठी ने कहा, ‘पिछले वित्त वर्ष (2017-18) में देश भर में 12 लाख मोबाइल उपभोक्ताओं ने अन्य कंपनियों को छोड़कर बीएसएनएल को वरीयता दी।’ उन्होंने कहा कि बीएसएनएल-कोलकाता मोबाइल्स ने नया फैमिली ब्रॉडबैंड संयुक्त ऑफर पेश किया है, जिसके अनुसार तीन मोबाइल कनेक्शनों को देश भर में किसी भी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी से असीमित कॉल और 1199 रुपये के मासिक शुल्क वाला इंटरनेट प्लान उपभोक्ता द्वारा सुझाए गए परिजनों को दे दिए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि इस दौरान 40 जीबी खर्च होने तक इंटरनेट की 10 एमबी प्रति सेकेंड की दर से चलेगा तथा इसके बाद दो एमबी प्रति सेकेंड की दर से चलेगा। त्रिपाठी ने इस प्लान से कंपनी का व्यापार बढ़ने की उम्मीद जताई। लैंडलाइन कनेक्शन के विभिन्न प्लान की जानकारी देते हुए त्रिपाठी ने कहा कि लैंडलाइन के विभिन्न प्लान में एक नई सुविधा जोड़ी गई है। इसके तहत रविवार और रात्रि के समय किसी भी बीएसएनएल के नेटवर्क पर निशुल्क बात की जा सकती है। उन्होंने कहा कि लैंडलाइन, ब्रॉडबैंड और एफटीटीच कनेक्शन लगाने का सेवा शुल्क माफ कर दिया गया है।

महिला चल संपत्ति नहीं है, पति उसे अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली :  सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि पत्नी ‘चल संपति या एक वस्तु’ नहीं है और साथ रहने की इच्छा होने के बावजूद पति इसके लिए पत्नी पर दवाब नहीं बना सकता है। एक महिला की तरफ से पति पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए दायर आपराधिक केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है। महिला ने अपने आरोप में कहा था कि पति चाहता है कि वह उसके साथ रहे लेकिन वह स्वयं उसके साथ नहीं रहना चाहती है।

न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने अदालत में मौजूद व्यक्ति से कहा, ‘वह एक चल संपत्ति नहीं है। आप उसे मजबूर नहीं कर सकते। वह आपके साथ नहीं रहना चाहती हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि आप उसके साथ रहेंगे।’ पीठ ने महिला के वकील के जरिए पति के साथ नहीं रहने की इच्छा वाले बयान के दृष्टिगत व्यक्ति से पत्नी के साथ रहने के निर्णय पर ‘पुनर्विचार’ करने को कहा। अदालत ने व्यक्ति से कहा, ‘आपके लिए इस पर पुनर्विचार बेहतर होगा’।

व्यक्ति की ओर से पेश वकील से पीठ ने कहा, ‘आप (व्यक्ति) इतना गैरजिम्मेदार कैसे हो सकते हैं? वह महिला के साथ चल संपत्ति की तरह व्यवहार कर रहे हैं। वह एक वस्तु नहीं है’। इस मामले की अगली सुनवाई आठ अगस्त को होगी।

सानिया मिर्जा का खुलासा- ‘मेरे बच्चे का सरनेम मलिक नहीं मिर्जा मलिक होगा’

नयी दिल्ली  :  भारत की स्टार टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा ने साफ किया है कि जब भी उनके बच्चे होंगे, तो उनका सरनेम मलिक नहीं होगा। सानिया ने 2010 में पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी की थी। सरनेम को लेकर सानिया ने जो बात कही है, वो आपका दिल जीत लेगी।
सानिया ने बताया कि वो और शोएब एक बेटी चाहते हैं और जब भी परिवार बढाने के बारे में सोचेंगे तो उनके बच्चे का सरनेम मिर्जा मलिक होगा। सानिया ने गोवा फेस्ट 2018 में लैंगिक पक्षपात पर बातचीत के दौरान कहा, ‘मैं आपको एक राज की बात बताती हूं। मेरे पति और मैंने इस पर बात की है और हमने तय किया है कि जब भी हमारा बच्चा होगा तो उसका सरनेम मिर्जा मलिक होगा। वो भी एक बेटी चाहते हैं।’
सानिया ने लैंगिक पक्षपात के अपने अनुभव के बारे में कहा कि उनके कुछ रिश्तेदार उनके पिता से कहते थे कि उनके बेटा होना चाहिए ताकि खानदान का नाम आगे बढ़ सके। उन्होंने कहा, ‘हम दो बहनें हैं और हमें कभी नहीं लगा कि एक भाई भी होना चाहिए। हमारे रिश्तेदार हमारे पिता से कहते थे कि उनके एक बेटा होना चाहिए तो हम उनसे लड़ते थे। मैंने शादी के बाद भी सरनेम नहीं बदला और हमेशा ये सानिया मिर्जा ही रहेगा।’

42 साल की सुष्मिता सेन ने शेयर की 6 पैक एब्स की तस्वीरें

मुम्बई : कहा जाता है कि खूबसूरती न कोई सीमा होती है और न ही कोई उमर, बस देखने का नजरिया होना चाहिए। यह कहावत सुष्मिता सेन के साथ बहुत ही सटीक है। 42 साल की सुष्मिता ने इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर और वीडियो शेयर किया है। सुष्मिता द्वारा इस तस्वीर को शेयर करते ही बस चंद मिनटों फैंस के कमेंट की और शेयर की बाढ़ आ गई।
बता दें कि सुष्मिता अपने फिटनेस को लेकर काफी सजग रहती हैं। अपनी फिगर मेटेंन करने के वह जिम से लेकर घर पर कई घंटे मेहनत करती रहती हैं।सुष्मिता की सबसे लेटेस्ट तस्वीर देखें तो उसमें वो काफी खूबसूरत दिख रही हैं।

इस तस्वीर में उन्होंने ब्लैक कलर की बिकनी पहनी हुई हैं और अपनी फिट बॉडी से सबको इंस्पायर करती दिखाई दे रही हैं। सुष्मिता ने जो तस्वीरें शेयर की हैं उसमें 6पैक एब्स को बखूबी देखा जा सकता है। यहीं नहीं इस वायरल तस्वीर से अंदाजा लगया जा सकता है कि वह फिटनेस मेटेन करने के लिए वह कितनी ज्यादा मेहनत करती हैं। सुष्मिता के इस पिक्स को शेयर करते ही बस चंद मिनटों फैंस के कमेंट की और शेयर की बाढ़ आ गई। बता दें कि सुष्मिता अपने फिटनेस को लेकर काफी अवेयर रहती हैं। अपनी फिगर मेटेंन करने के वह जिम से लेकर घर पर कई घंटे मेहनत करती रहती हैं। सुष्मिता ने जो तस्वीरें शेयर की हैं उसमें 6पैक एब्स बनाने के लिए एक साल से लगातार मेहनत भी कर रही हैं। सुष्मिता सेन के इस एब्स की पिक देखकर फैंस तारीफें कर रहे है। यहां तक कि एक फैंस ने उनके सामने शादी करने का प्रस्ताव भी रख दिया है।

हर साल दुनिया में 15 करोड़ लोग बीमारियों के कारण हो रहे गरीब

नई दिल्ली : 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र ने इस बार विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम ‘सबको स्वास्थ्य बीमा’ रखी है। दुनिया की एक अरब से अधिक आबादी के पास कोई स्वास्थ्य बीमा न होने का अनुमान है। महंगे इलाज के चलते आर्थिक पक्ष पर टूटने वाले एक तिहाई से अधिक भारत में रहते हैं। अच्छी बात यह है कुछ डॉक्टर गरीबों का मुफ्त इलाज कर उनके हमदर्द बन रहे हैं। 6.3 करोड़ भारतीय हर वर्ष इलाज का खर्च उठाते उठाते गरीबी के गर्त में चले जाते हैं
भारतीय सबसे ज्यादा प्रभावित
2011-2012 में 18 प्रतिशत भारतीय घरों ने बीमारियों के चलते आर्थिक तंगी का सामना किया। वहीं घर की कुल मासिक आय का 6.9 प्रतिशत हिस्सा बीमारियों के उपचार में खर्च होता है। वहीं शहरी क्षेत्र में इसका आकड़ा 5.5 प्रतिशत है। 72 प्रतिशत रकम दवाइयां खरीदने में जाती है।

आँकड़े परेशान करते हैं
भारत में पैदा होने वाले हर 1000 शिशु में से 34 की मौत साल भर के भीतर हो जाती है, 39 बच्चे पांच साल से कम उम्र में दम तोड़ देते हैं। हर 1000 में से 174 भारतीय महिलाओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती है। 2020 तक मातृ मृत्यु दर 100 पर लाने का लक्ष्य है।

बड़े रोग का बढ़ता प्रकोप
2016 में 61.8 प्रतिशत अनुमानित मौतें भारत में एनसीडी के कारण हुई। वहीं 1990 के दशक में यह आकड़ा 37.9 प्रतिशत था। जिमें केरल और गोवा में एनसीडी का प्रकोप सबसे ज्यादा था।
89.5 प्रतिशत बोझ सीधे मरीज की जेब पर
स्वास्थ्य बीमा योजनाओं से अस्पतालों तक मरीज की पहुंच तो बढ़ी है, लेकिन बीमारियों से पड़ने वाला आर्थिक बोझ नहीं घटा है। एक अनुमान के मुताबिक 89.5} औसतन कुल निजी इलाज का खर्च आज भी सीधे तौर पर भारतीय मरीजों की जेब से जाता है। बीमित राशि इलाज के खर्च के अनुरूप न होना और अस्पतालों में शुल्क तय न होना मुख्य कारण है। स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का लाभ सिर्फ भर्ती होने पर मिलना भी बड़ी वजह
देश में गरीबों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा
फरवरी 2018 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना शुरू की, जिसके तहत 10 करोड़ गरीब परिवारों को 5 लाख रुपये का सालाना स्वास्थ्य बीमा मिलेगा।

प्रोफेशनल इंग्लिश सीखने के लिए बेहतर हैं ये कोर्स

आजकल बड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी सबसे जरूरी चीज है। इंटरव्यू से लेकर मीटिंग, बैठक और प्रेजेंटेशन में भी अंग्रेजी की अहम भूमिका होती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के क्लाइंट कई देशों से होते हैं। ऐसे में उनसे संवाद स्थापित करने की भाषा अंग्रेजी ही होती है, इसलिए अंग्रेजी के कम्युनिकेशन स्किल बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। अगर अच्छी कंपनी में नौकरी करना चाहते हैं या कर रहे हैं तो अंग्रेजी की इस दीवार को गिराने के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म पर कई ऐसे प्रोफेशनल अंग्रेजी कम्युनिकेशन संबंधित शॉर्ट टर्म कोर्स मौजूद है जो खराब अंग्रेजी की परेशानी को दूर कर सकते हैं।  एस्पायरिंग माइंड के एक सर्वे के अनुसार हमारे देश में इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकलने वाले 97 फीसदी ग्रेजुएट्स को अंग्रेजी बोलनी नहीं आती जो कि कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करने के लिए अनिवार्य है। इंजीनियरिंग देश में युवाओं का सबसे पसंदीदा स्ट्रीम है। ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में स्नातकों को अंग्रेजी न आना बड़ी समस्या है। सर्वे के अनुसार स्पोकेन इंग्लिश के आधार पर 51 फीसदी इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स जॉब के लायक नहीं है। वहीं, सालाना ग्रेजुएट होने वाले 6 लाख इंजीनियरों में से सिर्फ 2.9 फीसदी ही फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने में सक्षम होते हैं। भारत के बहुलतावादी समाज में एक दूसरे की संस्कृति और मूल्यों को समझने में भी अंग्रेजी भाषा का महत्व है। देश के कई राज्यों की अपनी भाषा है और वहां का कामकाज स्थानीय भाषा में ही होता है। अलग-अलग भाषाओं को बोलने वाले भारतीय समाज में अंग्रेजी अभी भी सेतु का काम कर रही है। वैश्वीकरण के दौर में दुनिया के साथ कदमताल करने के लिए अंग्रेजी भाषा ज्ञान को अपनाने के लिए आज का युवा संकोच नहीं करता। रोजगार की भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा के प्रति युवाओं का रुझान बढ़ा है इसलिए भाषा कोई भी सीखनी चाहिए…बगैर अपनी भाषा की उपेक्षा किए –

‘स्पीक इंग्लिश प्रोफेशनली : इन पर्सन, ऑनलाइन एंड ऑन द फोन’

अगर आप बेहतर इंग्लिश बोलना चाहते हैं तो कोर्सेरा का यह कोर्स आपको अपने लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करेगा। ‘स्पीक इंग्लिश प्रोफेशनली : इन पर्सन, ऑनलाइन एंड ऑन द फोन’ कोर्स आपके प्रोफेशनल अंग्रेजी संवाद को बेहतर करने के लिए केंद्रित है। ये एक पांच हफ्ते का कोर्स है। इस कोर्स में आप स्वयं को बेहतर तरीके से प्रजेंट करना सीखेंगे। आप ग्रुप डिस्कशन में सबके सामने पूरे आत्मविश्वास से बोलने के स्किल सीखेंगे। ग्रुप डिस्कशन के दौरान कैसे लोगों से सहमत हों, असहमत हों, अपनी बातों को पूरी सपष्टता के साथ रखें और अपनी बातों को निष्कर्ष पेश करना भी इस कोर्स में सिखाया जाएगा। इसके अलावा आप फोन पर जानकारी देने और किसी के आग्रह का जवाब देने के तरीकों से भी रूबरू होंगे। इस कोर्स में आप ऑफिस में चलने वाले रोजमर्रा के सभी संवादों के दौरान बोलने का स्किल सीखेंगे, जैसे इंटरव्यू देने या लेने के दौरान कैसे बात करें, सेल्स प्रेजेंटेशन कैसे दें, क्लाइंट से कैसे बात करें आदि। इस कोर्स को करने के बाद आपका उच्चारण, प्रवाह, शब्दकोश का ज्ञान बढ़ेगा। इसके अलावा विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ घुलना-मिलना और बात करने के तरीके भी सीख सकेंगे। इस कोर्स को जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा डिजाइन किया गया है। इस कोर्स के बाद आपको सर्टिफिकेट भी मिलेगा।
कोर्सेरा का राइट प्रोफेशनल ईमेल इन इंग्लिश कोर्स
अगर आपको ऑफिस में काफी सारे ईमेल लिखने होते हैं तो ये कोर्स आपके लिए एकदम सही है। ये कोर्स आपको प्रभावित करने वाले बिजनेस ईमेल लिखना सिखाता है। इस कोर्स को करने से आपकी ग्रामर और शब्दकोश के ज्ञान में बढ़ोतरी होगी। क्रॉस कल्चर लोगों से ईमेल पर संवाद करने के लिए सिखाये जाने वाले स्किल्स से आप विभिन्न लोगों से बेहतरीन तरीके से कॉरपोरेट संवाद कर सकेंगे। आप हर ईमेल के महत्व और टोन को समझते हुए उसके अनुसार रिप्लाई करना सीखेंगे। इस कोर्स में आप हर दिन 4 से 5 मेल लिखना और उन्हें रिवाइज करना सीखेंगे। इसके अलावा ईमेल लिखने से संबंधित क्विज और अन्य छात्रों के ईमेल भी रिवाइज करने को भी मिलेगा। इस कोर्स को करने के लिए आपको हर हफ्ते 3 से 4 घंटे का समय देना पड़ेगा।
फ्यूचर लर्न का इंग्लिश फॉर वर्कप्लेस कोर्स
ये कोर्स उन लोगों के लिए है जो कार्यस्थलों पर संवाद के लिए अपनी अंग्रेजी बेहतर करना चाहते हैं। इसके अलावा नौकरी तलाश करने और इंटरव्यू देने वाले लोगों के लिए भी यह कोर्स बेहतरीन है। ये कोर्स चार हफ्ते का है और इसमें हर हफ्ते आपको कम से कम दो घंटे का समय देना होगा। ये कोर्स मुफ्त किया जा सकता है। इस कोर्स का फोकस कार्यस्थलों पर बोले जाने वाली अंग्रेजी पर होगा। इसमें विडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग के जरिए लोगों को नौकरी की तलाश करना, नौकरी के लिए आवेदन करना, इंटरव्यू के लिए खुद को तैयार करना, नई नौकरी में अपने सहकर्मियों से बातचीत करना और ऑफिशियल कार्यों के दौरान संवाद करना या ईमेल करना सिखाया जाएगा। इस कोर्स के दौरान अनुभवी शिक्षक आपकी अंग्रेजी की दक्षता की जांच कर उसे सुधारने और बेहतर करने के लिए सुझाव देेंगे। इसके लिए शिक्षक सही तरीके से बोलने और लिखने के लिए मार्गदर्शन करेंगे। यह कोर्स लैंग्वेज सिलेबस के अनुसार नहीं बल्कि कार्यस्थलों पर इस्तेमाल की जाने वाली अंग्रेजी पर फोकस करता है। आपके अभ्यास के लिए छोटे क्विज और डिस्कशन भी करवाएंगे। पूरे कोर्स के दौरान आपसे आपके विचार, सोच और सवाल अन्य प्रतिभागियों के साथ साझा करने के लिए कहा जाएगा।
माई इंग्लिश (ब्रिटिश काउंसिल)
माई इंग्लिश एक इंटरेक्टिव ऑनलाइन कोर्स है जिसे ब्रिटिश काउंसिल के शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है। ये कोर्स अंग्रेजी बोलने में प्रवाह, स्पष्टता और आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करता है। ये एक छह हफ्ते का कोर्स है जिसे लाइव ऑनलाइन कक्षाओं और अन्य ऑनलाइन गतिविधियों द्वारा संचालित किया जाता है। इस कोर्स से अंग्रेजी के कम्युनिकेशन स्किल में सुधार होता है और आप असल जिंदगी की परिस्थितियों में खुद को बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर पाते हैं। हर हफ्ते आपको सिर्फ 2 घंटे के लिए ऑनलाइन क्लास ज्वाइन करनी होती है। इससे स्पीकिंग और राइटिंग स्किल्स में सुधार होता है और आपको शिक्षक से निजी फीडबैक भी मिलता रहता है। छह हफ्तों में लगभग 50 घंटे की कक्षाएं पूरी करनी होती हंै। इस कोर्स को तीनों भागों में बांटा गया है प्री इंटरमीडिएट, इंटरमीडिएट और अपर इंटरमीडिएट स्तर। इस कोर्स की कीमत 9,500 रुपए है।
प्रोफेशनल इंग्लिश फॉर नॉन नेटिव स्पीकर : राइटिंग इन इंग्लिश
ये ऑनलाइन राइटिंग कोर्स स्टैनफोर्ड लैंग्वेज सेंटर द्वारा चलाया जाता है। ये कोर्स नॉन नेटिव स्पीकर यानी अंग्रेजी देशों से ताल्लुक न रखने वाले अंग्रेजी भाषियों के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है। इस कोर्स में लगभग हर प्रोफेशन से जुड़े लेखन कार्यों के बारे में पढ़ाया और अभ्यास कराया जाता है। कार्यालयों के कामकाज में इस्तेमाल में आने वाले फॉर्मल मैसेज से लेकर ईमेल व चिट्ठी, प्रपोजल बनाने से लेकर प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने जैसे लेखन कार्यों के बारे में इस कोर्स में विस्तृत पढ़ाई कराई जाती है। इसमें शब्दकोश अभ्यास, वाक्यों की संरचना, संपादन और प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने जैसे असाइनमेंट भी दिए जाते हैं।
बिजनेस इंग्लिश (उदेमी)
बिजनेस इंग्लिश कोर्स ऑनलाइन लर्निंग वेबसाइट उदेमी द्वारा संचालित की जाती है। जो भी अंग्रेजी के प्रोफेशनल ज्ञान को सुधारना चाहते हैं उनके लिए ये कोर्स बेहद कारगर साबित हो सकता है। इस कोर्स में कामकाज के दौरान पेश आने वाली विभिन्न परिस्थितियों में अंग्रेजी बोलने, लिखने, सुनने के बारे में बताया जाता है। इसके अलावा व्याकरण और शब्दकोश पर भी पूरा ध्यान दिया जाता है। ये कोर्स आपको बिजनेस की दुनिया के फ्रेज, स्लैंग, एक्सप्रेशन, ईमेल और फीडबैक देने के तरीकों के बारे में बताता है।
इंप्रूव प्रोफेशनल इंग्लिश (ऑक्सफोर्ड ऑनलाइन क्लासेज)
ये कोर्स ऑक्सफोर्ड ऑनलाइन क्लासेज द्वारा ऑफर किया जा रहा है। इस कोर्स में आपको प्रेजेंटेशन, मीटिंग, बातचीत, कॉन्फ्रेंस, कॉल, ईमेल लिखने और अन्य सभी कार्यालय के कार्यों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अंग्रेजी का अभ्यास कराया जाता है। हर प्रतिभागी के लिए पर्सनलाइज्ड (व्यक्तिगत) कक्षाओं का संचालन किया जाता है ताकि उनकी सभी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
बिजनेस इंग्लिश लंदन स्कूल
लंदन स्कूल का बिजनेस इंग्लिश कोर्स आपको ऐसी अंग्रेजी भाषा सीखने में मदद करता है जो कार्यस्थल पर बातचीत करने और संवाद करने के लिए बेहद जरूरी है। बिजनेस और प्रोफेशनल परिस्थितियों में आत्मविश्वास से अंग्रेजी बोलना सिखाने के लिए इस कोर्स को डिजाइन किया गया है। प्रोफेशनल मीटिंग, डिस्कशन, कॉन्फ्रेंस और कॉल में धारा प्रवाह अंग्रेजी बोलना बेहद जरूरी है। यह कोर्स छह महीने का होता है। इसमें लगभग 150 घंटे का लर्निंग कंटेंट है। इस कोर्स को आप किसी भी इंटरनेट सुविधायुक्त डिवाइस से कर सकते हैं।

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