नई दिल्ली : केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने आंकलन वर्ष 2०18-19 के लिए एक पेज का आयकर रिटर्न फॉर्म 1 (आईटीआर) जारी किया जिसका उपयोग 50 लाख रुपये तक की वार्षिक आय वाले करदाता कर सकेंगे। आयकर विभाग ने कहा कि आंकलन वर्ष 2018-19 के लिए एक पेज का सहज फॉर्म जारी किया गया है जो उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध है। उसने कहा कि करीब तीन करोड़ करदाता इस एक पेज के सहज फॉर्म का उपयोग करेंगे। इसका उपयोग ऐसे करदाता कर सकते हैं जिनका वेतन, एक आवासीय संपत्ति/ब्याज सहित अन्य मद से 50 लाख रुपये तक की वार्षिक आय है। वेतन और आवसीय संपत्ति को तर्कसंगत बनाया गया है। फॉर्म 16 में दिये गये वेतन तथा आवासीय संपत्ति का उल्लेख करना होगा। इसके साथ ही आईटीआर फॉर्म दो को भी तर्कसंगत बनाया गया। ऐसे व्यक्ति या अविभाजित हिन्दू परिवार आईटीआर फॉर्म दो भर सकेंगे जिनकी आय बिजनेस या प्रोफेशन को छोड़कर होगी। ऐसे व्यक्ति या हिन्दु अविभाजित परिवार जिनकी आय व्यवसाय या प्रोफेशन से है, उन्हें आईटीआर फॉर्म तीन या आईटीआर फॉर्म चार भरना होगा। प्रवासियों को रिफंड हासिल करने के लिए एक विदेशी बैंक खाते के बारे में बताना होगा ताकि उसके रिफंड भेजा जा सके। आंकलन वर्ष 2017-18 में विशेष अवधि के दौरान नकद जमा कराने के संबंध में जानकारी मांगी गयी थी, लेकिन आंकलन वर्ष 2018-19 के फॉर्म में इस कॉलम को हटा दिया गया है। आईटीआर फॉर्म भरने के तौर-तरीकों में पिछले वर्ष की तुलना में कोई बदलाव नहीं किया गया है। सभी आईटीआर फॉर्म ऑनलाइन भरना होगा। सिर्फ उन्हीं को आईटीआर फॉर्म 1 सहज और आईटीआर फॉर्म 4 सुगम हार्ड कॉपी में भरकर जमा करने की अनुमति होगी जिनकी आयु वित्त वर्ष में 8० वर्ष हो गयी है या ऐसे व्यक्ति या अविभाजित हिन्दु परिवार जिनकी वार्षिक आय पांच लाख रुपये तक होगी और वे रिटर्न का दावा नहीं करेंगे।
पत्नी के ट्रोल होने के बाद अक्षय ने बनवाया मोबाइल शौचालय
मुम्बई : अभिनेता अक्षय कुमार ने पत्नी टि्वंकल खन्ना ने कुछ महीने के बाद मशहूर जुहू समुद्र तट के निकट एक मोबाइल शौचालय लगवाया है। दरअसल, टि्वंकल ने कुछ महीने पहले मुंबई में एक अन्य समुद्र तट पर एक व्यक्ति के खुले में शौच करते हुए तस्वीर ट्वीट की थी। नगरपालिका आयुक्त प्रशांत गायकवाड़ ने बताया कि पिछले सप्ताह अभिनेता ने बृहन्नमुंबई नगर निगम (बीएमसी) को एक आवेदन भेजकर शौचालय लगाने और इसका पूरा खर्च वहन करने का प्रस्ताव दिया था। हमने उनकी पहल का स्वागत किया और जुहू समुद्र तट के निकट शौचालय लगाया। अभिनेता ने शौचालय के पूरे 10 लाख रुपये का खर्च वहन किया। मोबाइल शौचालय का इस्तेमाल निशुल्क किया जा सकेगा। अगर कोई इसके रख-रखाव के लिए आगे आएगा, तब भुगतान और इस्तेमाल के आधार पर सुविधा मुहैया कराई जा सकेगी। पिछले साल अगस्त में अक्षय कुमार की पत्नी ट्विंकल खन्ना ने उपनगर अंधेरी में वर्सोवा समुद्र तट के निकट खुले में शौच का मुद्दा टि्वटर पर उठाया था।
ये है पुरुषों के तनाव की जड़ और समाधान
तनाव मनःस्थिति से उपजा विकार है। मनःस्थिति एवं परिस्थिति के बीच असंतुलन एवं असामंजस्य के कारण तनाव उत्पन्न होता है। तनाव एक द्वन्द है, जो मन एवं भावनाओं में गहरी दरार पैदा करता है। तनाव अन्य अनेक मनोविकारों का प्रवेश द्वार है। उससे मन अशान्त, भावना अस्थिर एवं शरीर अस्वस्थता का अनुभव करते हैं। ऐसी स्थिति में हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होती है और हमारी शारीरिक व मानसिक विकास यात्रा में व्यवधान आता है। हम आपको पुरुषों में तनाव के कुछ प्रमुख कारणों और उससे निजात पाने के तरीके बता रहे हैं –
तनाव, खासकर अगर यह पुराना है, एक निरंतर मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक अतिप्रवाह का कारण बनता है, जो अंततः एक दीर्घ अवसाद में विकसित होता है।
समाधान – अपनी समस्याओं को लेकर घुटते न रहें। आप जिनके करीब हैं, फिर वह आपके दोस्त हो, परिवार का सदस्य हो या जीवन साथी,खुलकर बात करें। अगर बोल नहीं पाते तो लिखें। जरूरत पड़े तो किसी मनोचिकित्सक से बात करें या फिर इससे जुड़ी किताबें पढ़ें।
वित्तीय कठिनाइयों जो मानव अनुभवों का कारण बनती हैं और तनाव पैदा करती हैं। कार्यस्थल के नुकसान (बर्खास्तगी) पुरुषों में अवसाद के सबसे सामान्य कारणों में से एक माना जाता है।
समाधान – हर अंत में शुरुआत होती है। मुश्किल है कि स्थितियों को अपने हिसाब से ढालना मगर नामुमकिन नहीं है। अगर शादीशुदा हैं तो इस कठिनाई से निकालने में आपकी पत्नी मदद कर सकती है मगर जरूरी है कि आप न तो इसे अहं का मुद्दा बनायें और न तो इसे अपनी कमजोरी समझें। उसे बगैर किसी कुंठा के आत्मनिर्भर बनने में मदद करें। भारतीय पत्नी की पारम्परिक छवि के उलट उसे अपने सहचर के रूप में देखें..जो आपके साथ रहती है। आप बच्चों और घर को सम्भालने में मदद कर सकते हैं। घर से ही कोई काम शुरू कर सकते हैं। यह एक स्थिति है जो हमेशा नहीं रहती, सकारात्मक रहें,,,,आने वाला समय आपका ही है। अपनी पहचान का दायरा बढ़ाएं, अपडेट रहे..अपने क्षेत्र की नयी जानकारी से रूबरू रहें…आपकी वर्तमान नौकरी से भी अच्छी नौकरी मिल सकती है…इसलिए नो चिंता।
गलत पोषण, विशेष रूप से शराब का उपयोग अक्सर शरीर में पोषक तत्वों की कमी की ओर जाता है। इसी समय, अगर किसी व्यक्ति को विभिन्न समस्याओं से परेशान किया जाता है, तो समय के साथ-साथ इस तरह की जिंदगी आगे बढ़ जाती है, जिससे रोगी की हालत खराब हो जाती है।
समाधान – आप परिवार के लिए कमाते हैं मगर इसके लिए आपको अपनी सेहत का ध्यान खुद रखना होगा। हर चीज के लिए बच्चों, पत्नी और परिवार पर निर्भर न रहें और न अपने हर काम के लिए इंतजार करें। खुद करें, खाएँ, खुश रहें और अगर दूसरों के लिए करें…तो और भी अच्छा। समय – समय पर शरीर परीक्षण करवाते रहें और खुद अपने डॉक्टर न बनें। अच्छी खुराक लें और डॉक्टर की सलाह के साथ लें।
पति/पत्नी और बच्चों के लिए जिम्मेदारी की भावना पुरुषों में अवसाद का कारण बन सकती है। खासकर जब परिवार अक्सर संघर्ष कर लेता है और सामान्य वैवाहिक स्थिति आदर्श से बहुत दूर है। इसके अलावा कार्यस्थल या परिवार में लगातार संघर्ष भी परेशान करता है।
समाधान – दोस्त आपके टॉनिक हैं मगर भूलकर भी नशे में गम उड़ाने की कोशिश न करें। जीवनसाथी और बच्चों से बात करें…अगर काम पर भी हों तो कोशिश करें कि बात होती रहे। आजकल तो व्हाट्सऐप का जमाना है…बगैर अपने काम में बाधा डाले सम्पर्क बनाए रखना आसान है। किसी से भी बहुत ज्यादा उम्मीदें न पालें और न ही ये उम्मीद करें कि कोई आपके लिए अपनी पूरी जिंदगी दाँव पर लगा दें। यह फिल्मों में होता है…असली जिन्दगी में नहीं।
पुरुषों में तथाकथित प्रसवोत्तर अवसाद एक बच्चे के जन्म के बाद होता है, जब पत्नी का अधिकतर ध्यान अब पति को नहीं दिया जाएगा, लेकिन बच्चे को इसके अलावा, स्थिति तब और भी जटिल हो जाती है जब, जन्म देने के बाद, पति के यौन संबंध नहीं होते हैं।
समाधान – ये बात आपको समझनी होगी कि बच्चे के बाद आपकी जिंदगी बदलेगी और प्राथमिकताएं भी बदलेंगी। ये दौर महिलाओं के लिए भी आसान नहीं होता। बच्चे की परवरिश में आप पत्नी की मदद कर सकते हैं। यह सही है कि दाम्पत्य जीवन में यौन संबंधों की जरूरत पड़ती है मगर शादी सिर्फ जिस्मानी रिश्तों का नाम नहीं है…आपसी विश्वास और साझेदारी की भावना भी आप दोनों को पास ला सकती है। वैसे भी बेमन से बनाए गए संबंध भी आपको सुख नहीं देंगे तो अच्छा है न कि आप जीवनसाथी में एक दोस्त देखें और उसका साथ दें क्योंकि घर – परिवार और वह बच्चा आपका भी है।
घर के प्रदूषण को दिखायें बाहर का रास्ता
आजकल प्रदूषण की वजह से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। साथ ही इससे सांस और त्वचा संबंधी बीमारियों से ग्रसित होने की आशंका बढ़ जाती है। बाहरी प्रदूषण के साथ घर के अंदर का प्रदूषण भी खतरनाक होता है। लेकिन कुछ चीजों और उपायों का अपनाकर इस मुसीबत से बचा जा सकता है। आइए जानते हैं कि कौन-से उपायों की मदद से घर के अंदर का प्रदूषण कम किया जा सकता है।
1. घर के अंदर पौधों को लगाने से ना सिर्फ घर की सुंदरता बढ़ती है। बल्कि स्वस्थ और साफ हवा भी मिलती है। पौधें ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं और घर में दूषित हवा की मात्रा को कम करते हैं। मनी प्लांट, नाग पौधा और एरेका पाम जैसे भारतीय पौधों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
2. घर के अंदर धूम्रपान (स्मोकिंग) नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे घर के अंदर की हवा विशुद्ध होती है और हवा में प्रदूषण के कण बढ़ जाते हैं।
3. घर की दीवारों पर कम वाष्पशील कार्बनिक यौगिक वाले रंगों का इस्तेमाल करें क्योंकि ज्यादा वाष्पशील कार्बनिक यौगिक वाले रंगों के अंदर मौजूद विषाक्त पदार्थ सामान्य तापमान के अंदर ही हवा में घुलकर नुकसान पहुंचाते हैं।
4. घर के अंदर पानी टपकने की समस्या नहीं होने दें। क्योंकि इससे फंगस, फफूंदी और जगह सड़ जाने जैसी समस्या होने लगती है। जो अस्थमा, साइनस (एक प्रकार का सिरदर्द) और घरघराहट जैसी समस्याओं को और बढ़ाते हैं। इसलिए नियमित अंतराल पर घर की मरम्मत करवाते रहें।
5. विद्युत उपकरणों पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है क्योंकि फ्रिज और ओवन जैसे उपकरण हानिकारक गैस का उत्पादन करते हैं। जिससे घर का वातावरण दूषित हो सकता है। इसके लिए विद्युत उपकरणों का नियमित रखरखाव काफी अहम है।
6. घर के अंदर साफ-सफाई करना महत्वपूर्ण होता है लेकिन साफ-सफाई करते हुए अधिकतर बार छोटी और कोने वाली जगहों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। जिससे वहां पर कीटाणु एकत्रित होने लगते हैं और नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए साफ-सफाई करते हुए फर्नीचर के नीचे, घर के कोनों, छोटी-छोटी जगहों पर भी अच्छी तरह सफाई करें।
7. रोजाना घर की खिड़कियां कम से कम 5-10 मिनट तक खुली रखें। क्योंकि पर्याप्त धूप और हवा ना लगने से घर के अंदर दूषित कणों और वायु-संचालन में कमी आ जाती है और घर का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।
8. कीटनाशकों की जगह बायो-फ्रेंडली उत्पादों का इस्तेमाल करें। विषाक्त उत्पादों का इस्तेमाल कम करने से घर के अंदर हवा में दूषित कणों की मात्रा कम हो जाती है।
ड्राइविंग क्षमता पर असर डालता है आपका मानसिक स्वास्थ्य
नयी दिल्ली : मानसिक स्वास्थ्य विकार में व्यक्ति को किसी काम पर ध्यानकेंद्रित होने, सक्रिय होने या सोच-समझकर काम करने में परेशानी होती है। इस बीमारी को ध्यान आभाव सक्रियता विकार (एटेंशन डेफीसिट हाइपर एक्टीविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी)) कहा जाता है। एक शोध में सामने आया है कि मानसिक स्वास्थ्य से आपकी ड्राइविंग (वाहन चलाने की) कुशलता पर भी असर पड़ता है और गलतियां होने की संभावनाएं भी अधिक होती है।
पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 16 से 19 साल के किशोरों पर अध्ययन किया। जिसमें पाया गया कि इस उम्र के किशोरों में ज्यादा उम्र के लोगों के मुकाबले वाहन चलाते समय घातक दुर्घटना होने की संभावना अधिक होती है। क्योंकि व्यस्क लोगों का मानसिक स्वास्थ्य ज्यादा मजबूत होता है। अध्ययनकर्ताओं ने एक प्रश्नावली के जरिए भी किशोरों से आंकडें एकत्रित किए। इस प्रश्नावली में वाहन चलाते हुए मोबाइल इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति और वाहन पर सवारियों की संख्या जैसे प्रश्न पूछे गए। इसके बाद किशोरों से प्रयोगात्मक ड्राइव करने के लिए कहा गया, जिसमें विभिन्न दुर्घटना परिदृश्यों का सामना करवाया गया। अध्ययन के अंत में पाया गया कि जिन किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य कमजोर था, उनमें दुर्घटना से बचने की क्षमता और ड्राइविंग कुशलता में कमी देखी गई।
कुरता ही नहीं कुरते का कॉलर भी स्पेशल होना चाहिए
लड़कियाँ कपड़े खरीदते समय जितना वक्त लगाती हैं, लड़के उतना वक्त नहीं लगाते। रंग और फिंटिग देख ली तो पसन्द आ गया तो बस खरीद लिया पर क्या आप जानते हैं कि इन छोटी – छोटी बातों से आपका लुक्स बनता है। कुरता खरीदते समय आप बेशक उसकी हेम (बॉटम लाइन), लम्बाई और फिटिंग देखते हैं मगर कुरते के कॉलर पर आपका ध्यान बहुत कम जाता है तो कुछ कॉलर ये रहे जो आपको और शानदार लुक देंगे –
मैन्डरिन कॉलर
समय के साथ कुर्तो के स्टाइल में काफी बदलाव आए हैं। सिल्क कुर्ते के आ जाने से हमें कुर्ते का सबसे स्टाइलिश रूप मिला मैन्डरिन कॉलर के रूप में। कई सालों के बाद, स्ट्रेट-अप फोल्डेड कॉलर अपनी जगह बनाने में कामयाब हो गया। डिज़ाइनर्स का पसंदीदा – मैन्डरिन-कॉलर्ड, कुर्ते को विविधतापूर्ण बनाता है। पेयरिंग की बात करें तो ये किसी भी पारम्परिक लोअर के साथ अच्छा लगेगा। अगर आपको अपने लुक को ड्रेसी दिखाना है तो इसे चूड़ीदार के साथ पहनें।

एक कैज़ुअल silhouette के लिए सलवार से बेहतर कुछ नहीं होगा लेकिन एक बात का हमेशा ध्यान रखें। बंद गला जैकेट को मैन्डरिन कॉलर्ड कुर्ते के साथ कभी भी न पहनें। एक जैसे कॉलर एक-दूसरे के ऊपर आपके लुक को पूरी तरह से खराब कर देंगे। इसकी जगह एक राउंड नेक बंडी जैकेट पहनें।
अवधी कॉलर
कॉलर के बगैर या रॉउंड कॉलर कुर्ता के नाम से जाने वाले इस कुर्ते का स्टाइल अवध से आया है। अगर आप ऐसा कुर्ता खरीदने जा रहे हैं तो ध्यान रखें कि इसका बटन और इसके आस-पास के एरिया में अच्छी तरीके से डिटेलिंग की गई हो।

प्रिंट्स और एम्बॉयडर्ड एम्बेलिशमेंट इन कुर्तो को खूबसूरत बनाता है। इसका स्टाइल सादगी वाला हो तो बेहतर। इसके साथ एक सिंपल स्ट्रेट फिटेड पयजामा बेस्ट लगेगा। अगर आप सच में कुछ अलग करना चाहते हैं तो इसके साथ क्लासिक खाकी ट्राउज़र पहनें।
शर्ट कॉलर
ब्रिटिश फैशन से भारतीय कुरता भी प्रभावित रहा। इस कुर्ते का गोल दामन (round hem) और शर्ट कॉलर, दोनों ही यूरोपियन शर्ट से प्रभावित होकर बने हैं। पठानों में लोकप्रिय होने के कारण इन कुर्तों को पठानी कुर्ते के नाम से जाना जाता है। इस कुर्ते की भी पेयरिंग का खास ध्यान रखना पड़ता है।

एकमात्र तरीका जिससे ये कुर्ता आपको पूरी तरह सूट करेगा वो है – इसे सलवार के साथ पेयर करें। सलवार इस पठानी कुर्ते को पूरी तरह से कॉमप्लीमेंट करेगा। कॉलर को आकर्षक बनाने के लिए आप ब्रूच चुन सकते हैं, ये सबका ध्यान कॉलर की तरफ खींचेगा। इसे आप नेहरू जैकेट के साथ भी स्टाइल कर सकते हैं. ये काफी अच्छा लगेगा। पर अपने कॉलर को नेहरू जैकेट के ऊपर रखना न भूलें।
(साभार फैशन 101)
विरासत ए फैशन : सदाबहार है बालूचरी का जादू
पश्चिम बंगाल के विष्णुपुर व मुर्शिदाबाद में बनती हैं। सन् 1965 से बनारस में भी बालूचरी साड़ियों का निर्माण होने लगा। ये भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मशहूर हैं। इन साड़ियों पर महाभारत व रामायण के दृश्यों के अलावा कई अन्य दृश्य कढ़ाई के जरिए उकेरे जाते हैं। देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इन साड़ियों ने अपनी अलग पहचान कायम की है। एक बालूचरी साड़ी बनाने में कम से कम एक सप्ताह का वक्त लगता है। दो लोग मिल कर इसे बनाते हैं।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बालूचर गांव में शुरुआत करने वाली बालूचरी साड़ियों ने बीती दो सदियों के दौरान एक लंबा सफर तय किया है। नवाब मुर्शीद अली खान 18वीं सदी में बालूचरी साड़ी की कला को ढाका से मुर्शिदाबाद ले आए थे। उन्होंने इसे काफी बढ़ावा दिया। बाद में गंगा नदी की बाढ़ में बालूचर गांव के डूब जाने के बाद यह कला बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर पहुंची। अब विष्णुपुर व बालूचरी एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। पहले विष्णुपुर में मल्ल राजाओं का शासन था। उस दौरान यह कला अपने निखार पर थी। मल्ल राजाओं ने इलाके में टेराकोटा कला को काफी बढ़ावा दिया था। वहां टेराकोटा के मंदिर हर गली में बिखरे पड़े हैं। बालूचरी साड़ियों पर भी इन मंदिरों का असर साफ नजर आता है।
इन साड़ियों की खासियत यह है कि इन पर पौराणिक गाथाएं बुनी होती हैं। कहीं द्रौपदी के विवाह का प्रसंग है तो कहीं राधा-कृष्ण के प्रेम का। महाभारत के युद्ध के दौरान अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए भगवान कृष्ण की तस्वीर भी इन साड़ियों पर नजर आती है। पूर्व में मुगल व यूरोपियन पल्लू (आंचल) में चौंहसिया (चौकोर) व बीच में कलगा लगाकर सजाया जाता था। इस साड़ी की बुनाई में कम से कम तीन व्यक्तियों को लगना पड़ता है क्योंकि इसमें तीन तरह के डिज़ाइन बेल, बादशाह, बूटा एक साथ चलते हैं तथा इस साड़ी को तैयार होने में लगभग एक महीना लग जाता है, लेकिन रेशम के बारीक धागों से इन कहानियों को साड़ी पर उकेरना कोई आसान नहीं है। दो मजदूर मिल कर एक सप्ताह में एक साड़ी तैयार करते हैं।

काम की बारीकी के हिसाब से उस साड़ी की कीमत एक से दस हजार रुपए तक होती है, लेकिन बुनकरों या कलाकारों को इसका फायदा नहीं मिल पाता। बुनाई के बाद साड़ियों पर चमक लाने के लिए उनकी पालिश की जाती है। किसी जमाने में यह साड़ियाँ बंगाल के रईस या जमीदार घरानों की महिलाएं ही पहनती थीं। अब भी शादी-ब्याह के मौकों पर यह साड़ी पहनी जाती हैं। एक बालूचरी साड़ी बनाने में काफी समय लगता है। इसकी बारीक डीटेलिंग के लिए काफी साफ कारीगरी चाहिए। एक साड़ी की बुनाई में लगभग एक हफ्ते का समय लगता है। सभी साड़ियों को बेहतरीन सिल्क का इस्तेमाल करके हाथ से बुना जाता है, हालांकि बदलते समय में लोगों की कम होती दिलचस्पी के साथ, बालूचरी साड़ियां बनाने में कॉटन का भी इस्तेमाल होने लगा है।

सबसे बेहतरीन सिल्क लेने के बाद अगला अहम स्टेप होता है इम्ब्रायडरी पर काम करना। पहले डिज़ाइन्स को कागज पर बनाया जाता है और उसके बाद इन्हें साड़ियों पर पंच किया जाता है। बालूचरी साड़ियां बनाने में इस्तेमाल होने वाले रंग आमतौर पर बेहद ब्राइट होते हैं, जैसे कि लाल, हरा, सफेद, नीला और पीला। इसके साथ ही बुनाई की प्रक्रिया में ढेर सारी पर्यावरण के अनुकूल चीज़ों का इस्तेमाल होता है, जैसे कि फूलों से बने रंग, फलों से बने रंग, नीम की पत्तियां, हल्दी की पत्तियां और सूखी लकड़ियां।

बालूचरी साड़ियाँ अपने हाथ के काम के लिए मशहूर हैं। ये रामायण और महाभारत से लिए गए अपने पौराणिक मोटिफ्स के लिए जानी जाती हैं, इन साड़ियों में अकसर भगवान कृष्ण और अर्जुन के गीता प्रकरण की कहानी दिखाई जाती है। मल्ला वंश से इंस्पिरेशन लेने वाली मूल कला आज भी ट्रेंड में है। इस तरह की कला विष्णुपुर के पुराने मंदिरों, मिट्टी के बर्तनों और गहनों में देखी जा सकती है। मोटिफ डिज़ाइन्स ज़्यादातर एक शेडेड बैकग्राउंड पर 4 अलग-अलग रंगों में इस्तेमाल किए जाते हैं। शुरुआत में ये मोटिफ्स सिल्वर ज़री से बुने जाते थे, जो अब कई तरह के चमकीले धागों से बदल दिए गए हैं। आजकल बालूचरी से मैचिंग बैग और अन्य सामान भी बन रहे हैं।
पोएला बैशाख और बंगाल का पारम्परिक स्वाद
खीर कदम

सामग्री : 16 मिनी रसगुल्ले, 2 कप मावा/खोया, 2 चम्मच दूध, 4 चम्मच पिसी चीनी, 1 चम्मच रोज एसेंस
विधि : छोटे आकार के रसगुल्लों से उसका रस निचोड़ कर अलग रख लें। अब मावा को मसलकर पैन में डालें और पिसी चीनी मिक्स कर के 5-7 मिनट पकाएं। जब मावा गीला सा हो जाए तो उसमें हल्का सा दूध मिला दें और फिर इसें प्लेट पर निकाल कर अलग ठंडा होने के लिए रख दें। जब यह ठंडा हो जाए तब इसमें रोज एसेंस मिक्स करके अच्छी तरह गूथ लें और फिर इसे 16 एक समान भाग में काट लें। एक हिस्से की लोई बना कर उसके बीच में अंगूठे से दबाते हुए गहरा करें और उसमें एक रसगुल्ला रख दें। रसगुल्ले को अच्छी तरह से ढंके और वह कहीं से भी खुला नहीं होना चाहिए। इसे अच्छी तरह से रोल करके प्लेट पर रखें। खीर कदम तैयार है।
छानार डालना

सामग्री : चौकोर टुकड़ों में कटा 200 ग्राम पनीर, 2 आलू, 1/4 कप हरी मटर के दाने, एक बारीक कटा टमाटर, 2 चम्मच अदरक का पेस्ट, 2 चम्मच धनिया पाउडर, 2 चम्मच भुना जीरा पाउडर, एक चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 2 चम्मच हल्दी पाउडर, एक तेज पत्ता, 2 लंबी कटी हुई हरी मिर्च , एक छोटी चम्मच चीनी, एक छोटा चम्मच जीरा, एक चम्मच गरम मसाला पाउडर, हरा बारीक कटा धनिया, स्वादानुसार नमक, एक चम्मच घी, आधा कप तेल
सजावट के लिए – बारीक कटे हरे धनिया से सजाकर सर्व करें
विधि : आलू धोकर छील लें और चौकोर टुकड़ों में काट लें। एक कटोरे में पनीर के टुकड़े डालें और इन पर एक चुटकी हल्दी-नमक डालकर मिक्स कर लें। दूसरे कटोरे में आलू के पीस डालें और इन पर एक चुटकी हल्दी-नमक डालकर मिक्स कर लें। अब गैस पर एक पैन में तेल गर्म करके उसमें पनीर के टुकड़े गोल्डन होने तक फ्राई करें। एक प्लेट में किचन पेपर लगाकर उसमें फ्राइड पनीर निकाल लें। फिर तेल में आलू के पीस भी सुनहरे होने तक फ्राई करें और एक अलग प्लेट में निकाल लें। अब गैस पर दूसरे पैन में तेल गर्म करके उसमें तेज पत्ता और जीरा डालकर भूनें। जब जीरा तड़कने लगे तो उसमें टमाटर डालकर मध्यम आंच पर 2 मिनट नर्म होने तक पकाएं। इसके बाद टमाटर में हरी मिर्च, अदरक पेस्ट और मटर मिलाकर 2 से 3 मिनट तक पकने दें। तब तक एक कटोरी में थोड़ा तेल लें और उसमें डेढ़ चम्मच हल्दी पाउडर, जीरा पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पाउडर अच्छी तरह मिक्स करके एक पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट को टमाटर के मिक्सचर में मिलाएं। फिर ग्रेवी में नमक और चीनी मिक्स करके एक मिनट तक पकने दें। अब मसालों में 2 कप पानी डालकर उसमें फ्राइड आलू मिलाएं और एक ढक्कन से ढककर धीमी आंच पर 8 से 10 मिनट तक पकाएं। इसके बाद आलू में तला हुआ पनीर भी मिक्स करके सब्जी को 5 मिनट तक और पकने दें। फिर ढक्कन हटाकर छानार डालना में घी मिलाकर कुछ देर धीमी आंच पर रखा रहने दें। लीजिए तैयार है बंगाली स्वाद का व्यंजन छानार डालना।
रानी ‘बनी हिचकी’ में जिंदगी की रानी
रेखा श्रीवास्तव

हिचकी। जी हाँ, हिचकी। घबराइये नहीं। वो हिचकी नहीं, जिससे पता चले कि आपको कोई याद कर रहा है या फिर वो भी हिचकी नहीं जिससे कि लोग आपके सामने पानी बढ़ा दें। यह हिचकी रानी मुखर्जी की ‘हिचकी’ है। यानी बालीवुड की एक नयी फिल्म। एक नयी सोच पर बनी फिल्म। इस फिल्म में ‘हिचकी’ को एक बीमारी के रूप में दिखाया गया है, जिसकी वजह से रानी मुखर्जी (नैना) एक सामान्य जिंदगी नहीं जी पाती है और उसे हर जगह अलग तरह से देखा जाता है पर उसने बड़ी सच्चाई से अपनी इस कमजोरी को ही ताकत बना लिया और एक सफलतम जिंदगी जी कर दिखा दिया। इस फिल्म के माध्यम से हम यह जरूर समझ सकते हैं कि जिस तरह रानी मुखर्जी (नैना) को हिचकी की परेशानी थी, उसी तरह से हम सब के अंदर कोई न कोई कमी और परेशानी जरूर है, और जब हम अपनी कमी और परेशानी को स्वीकार कर उसके साथ आगे बढ़ने का हौसला रखते हैं, तो दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती। बालीवुड में अपनी अमिट छाप रखने वाली अभिनेत्री रानी मुखर्जी चार साल के अंतराल के बाद इस फिल्म से बालीवुड में फिर से आई हैं। उनके दर्शक इस रोल में भी काफी पसंद किया है। इस फिल्म में रानी मुखर्जी एक सामान्य परिवार की एक सामान्य लड़की के रूप में नजर आयी है, जो एक बीमारी से ग्रस्त तो जरूर है पर अपनी जिंदगी में वह इस बीमारी से टूटी नहीं है और उसने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया है और इसी के साथ आगे बढ़ती है और लंबे संघर्ष के बाद सफलता भी हासिल करती है। निर्देशक सिद्धार्थ पी.मल्होत्रा ने बड़े ही अच्छे तरीके से फिल्म को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया है। फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है : एक सामान्य परिवार में नैना अपने पापा-मम्मी और भाई के साथ रहती है। वह टॉरेट सिंड्रोम नामक बीमारी से पीड़ित है। इसकी वजह से उसको हर समय हिचकी आती रहती है। अलग-अलग तरह की आवाज भी निकलती है। तनाव बढ़ने से उसकी बीमारी भी बढ़ जाती है। माँ और भाई इस बीमारी से लड़ने में उसका हौसला बढ़ाते हैं, और पिता इससे परेशान है। वह कई बार अपने परिवार को छोड़ कर चले जाते हैं और फिर वापस लौट आते हैं। उसके पिता बीमारी को बीमारी के रूप में देखते हैं और अपनी बेटी को समझौता करने के लिए बाध्य करते रहते हैं। इस मुद्दे पर पिता-बेटी में हर समय तनाव का माहौल व्याप्त रहता है। सामान्य परिवार में जहां पिता बेटी की शादी के लिए जिस तरह से परेशान रहते हैं, उसी तरह यहां इस बीमारी से त्रस्त पिता को दिखाया गया है। इस बीमारी के बावजूद नैना को एक अच्छे स्कूल में पढ़ने का मौका मिलता है और वह अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करती है। उसके बाद वह नौकरी के लिए दर-दर भटकती है। वह मुख्य रूप से शिक्षक बनना चाहती है, लेकिन उसकी बीमारी की वजह से उसे स्कूल वाले नौकरी नहीं देते हैं। संघर्ष काफी लंबा चलता है, और आखिरकार में उसे उसी स्कूल में नौकरी मिल जाती है जहाँ से उसने स्कूली शिक्षा प्राप्त की थी। वहां भी 14 ऐसे बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी मिलती है, जो समाज के पिछड़े वर्ग से आते हैं और वे किसी तरह से स्कूल तो आ जाते हैं पर उनका उद्देश्य पढ़ना नहीं है। उन बच्चों के अंदर पढ़ाई का जज्बा जगाने में नैना को काफी संघर्ष पड़ता है। अंत में कामयाबी हासिल करती है और आखिर में प्रिंसिपल होकर रिटार्यड होती हैं। इस फिल्म में जहाँ रानी मुखर्जी का अभिनय जबरदस्त था, वहीं माँ और पिता की भूमिका में जानी-पहचानी जोड़ी सुप्रिया और सचिन को देखने को मिली। ये दोनों ही दर्शकों की पसंद रहे हैं। भाई के रूप में हुसैन दलाल नजर आते हैं। छात्र-छात्राओं का अभिनय भी काबिले तारिफ रहा है। कहानी अंकुर चौधरी की है। यश राज बैनर तले यह फिल्म दो घंटे तक दर्शक को अपने में बांधे रहती है। बीच-बीच में कई बार बहुत तनाव नजर आता है, पर रानी मुखर्जी (नैना) की हिम्मत और संघर्ष दर्शकों के अंदर भी जज्बा भर देती है और हमें सिखा जाती है कि हममें अगर कुछ कमी है, तो उससे हम दूसरे से कम नहीं। हमें भी सपने देखने का अधिकार है और उसे पाने का हौसला रखना चाहिए। यह फिल्म हॉलीवुड फिल्म ‘फ्रंट ऑफ द क्लास ’ की कहानी से प्रेरित कहानी जरूर है, लेकिन इसमें बहुत कुछ नया दिखाया गया है।




