अशोक “प्रवृद्ध
वैदिक संस्कृति का प्रकृति से अटूट सम्बन्ध है। वैदिक संस्कृति का सम्पूर्ण क्रिया -कलाप प्राकृत से पूर्णतः आवद्ध है। वेदों में प्रकृति संरक्षणअर्थात पर्यावरण से सम्बंधित अनेक सूक्त हैं। वेदों में दो प्रकार के पर्यावरण को शुद्ध रखने पर बल दिया गया है –
आन्तरिक एवं बाह्य। सभी स्थूल वस्तुऐं बाह्य एवं शरीर के अन्दर व्याप्त सूक्ष्म तत्व जैसे मन एवं आत्मा आन्तरिक पर्यावरण का हिस्सा है। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान केवल बाह्य पर्यावरण शु्द्धि पर केन्द्रित है। वेद आन्तरिक पर्यावरण जैसे मन एवं आत्मा की शुद्धि से पर्यावरण की अवधारणा को स्पष्ट करता है।
बाह्य पर्यावरण में घटित होने वाली सभी घटनायें मन में घटित होने वाले विचार का ही प्रतिफल हैं। भगवद् गीता में मन को अत्यधिक चंचल कहा गया है –
चंचलं ही मनः ……। (भगवद् गीता 6:34)।
ऐतेरेयोपनिषत् के अनुसार ब्रह्मांड का निर्माण पाँच तत्वों पृथ्वी, वायु, आकाश, जल एवं अग्नि को मिलाकर हुआ है – इमानि पंचमहाभूतानि पृथिवीं, वायुः, आकाशः, आपज्योतिषि। (3:3)। इन्हीं पाँच तत्वों के संतुलन का ध्यान वेदों मै रखा गया है। इन तत्वों में किसी भी प्रकार के असंतुलन का परिणाम ही सूनामी, ग्लोबल वार्मिंग, भूस्खल, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदायें हैं वेदों में प्राकृति के प्रत्येक घटक को दिव्य स्वरूप प्रदान किया गया है। प्रथम वेद ऋग्वेद का प्रथम मन्त्र ही अग्नि को समर्पित है
– ऊँ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। (ऋग्वेद 1.1.1)
ऋतं ब्रह्मांड का सार्वभौमिक नियम है।
इसे ही प्राकृति का नियम कहा जाता है। यह ब्रह्मांड की सभी गतियों एवं अस्तित्व का कारण
नियंता है। ऋग्वेद के अनुसार –
सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः
त्रृतेनादित्यास्तिठन्ति दिवि सोमो अधिश्रितः
ऋग्वेद (10:85:1)
भावार्थ – देवता भी ऋतं की ही उत्पति हैं एवं ऋतं के नियम से बंधे हुए हैं। यह सूर्य को आकाश में स्थित रखता है। वेदों में वरूण को ऋतं का देवता कहा गया है। वैसे तो वरूण जल एवं समुद्र के
देवता के रूप में जाना जाता है परन्तु मुख्यतया इसका प्रमुख कार्य इस ब्रह्मांड को सुचारू पूर्वक चलाना है। ऋग्वेद के अनुसार वरूण अपने ऊपर स्थित सिंहासन से सभी अद्भुत चीजों को देखता है, जो हो चुकी हैं एवं जो होने वाली हैं
– अतो विश्वान्यद्धुता चिकित्वों अभि पश्यति।
ड्डतानि या च कत्र्वा। (ऋग्वेद 1:25:11)।
असंतुलन की स्थिति में ही वरूण अथवा ऋतं उपरोक्त वर्णित विभिन्न प्रकार की आपदाओं द्वारा पृथ्वी एवं ब्रह्माण्ड में संतुलन स्थापित करता है। आइये वेदों में वर्णित सृष्टि के मुख्य तत्वों के महत्व को जानें।
वैदिक साहित्य में पृथ्वी तत्व को माता कहकर सम्मानित किया गया है –
द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्। (ऋग्वेद1:164/33)।
अर्थात् द्याव (आकाश) मेरे पिता हैं, बन्धु वातावरण मेरी नाभि है, और यह महान् पृथ्वी मेरी माता है। ऋग्वेद में आकाश व पृथ्वी की पिता एवं माता के रूप में स्तुति करते हुए सभी प्राणियों की रक्षा की कामना की गई है
– पिता माता च भुवनानि रक्षतः (1:160:2)।
अथर्ववेद के भूमिसूक्त में भी पृथ्वी माता के रूप में पूजनीय है।
– माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः (12:1:12)।
पृथ्वी पर विराजमान जीव एवं वनस्पति के महत्व को वेदों द्वारा स्वीकार कर उनके संरक्षण की आवश्यकता विभिन्न मन्त्रों के द्वारा की गई है।
ऋग्वेद में वनस्पतियों से पूर्ण वनदेवी की पूजा की गई है –
आजनगन्धिं सुरभि बहवन्नामड्डषीवलाम्
प्राहं मृगाणां मातररमण्याभिशंसिषम्
(ऋग्वेद 10:146:6)
भावार्थ – अब मैं वनदेवी (आरण्ययी) की पूजा करता हूँ जो कि मधुर सुगन्ध से परिपूर्ण है और सभी वनस्पतियों की माँ है और बिना परिश्रम किये हुए भोजन का भण्डार है। ऋग्वेद में औषधि सूक्त में वनस्पति को माँ कहकर वानस्पतिक औषधि के महत्व को स्वीकारा गया है –
शतं वो अम्ब धामानि सहस्रमत वो रूहः।
अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं ड्डत।
(ऋग्वेद 10:97:2)

भावार्थ – हे माँ, हजारों तुम्हारे जन्म स्थान हैं और हजारों तुम्हारे प्रकार हैं। नाना प्रकार की तुम्हारी शक्तियाँ हैं। मेरे इस रोगी को रोग से मुक्त करो। ऋग्वेद में ही पवित्र घास को मनुष्य के दोहन से बचाने का निर्देश दिया गया है
– मा नो बर्हिः पुरूसता निदे कर्यूयं पात
स्वस्तिभिः सदा नः (7:75:8)।
अगली पीढ़ी का खजाना इसी वनस्पति एवं पानी को कहा गया है
– पुरूणि रत्ना दधतौ नयस्मे अनु
पूर्वाणि चख्यथुर्युगानि। ऋग्वेद 7:70:4।
इस प्रकार ऋग्वेद वनों को विनाश से बचाने का निर्देश देता है – वनानि नः प्रजहितानि (8:1:13)। पद्म
पुराण में तो एक वृक्ष को दस पुत्रों के समान माना गया है –
दशपुत्रसमो दु्रमः (1:44:455)।
तात्पर्य यह है कि अपने पुत्र के समान ही हमे वृक्षों की देखभाल करनी चाहिए। यजुर्वेद प्रार्थना करता है कि मैं पृथ्वी सम्पदा को हानि न पहुँचाऊँ
– पृथिवी मातर्मा हिंसी मा अहं त्वाम् (10:23)।
जल की महत्ता एवं उपयोगिता का महिमामंडन वेदों में अत्यधिक हुआ है। शतपत ब्राह्मण में इसे अमृत कहा गया है
– अमृत वा आपः (1:9:3:7)।
केवल वैदिक संस्कृति में ही नदियों को माँ एवं इनके जल को मोक्ष का माध्यम कहा गया है। पदम् पुराण जल प्रदूषण की कड़ी शब्दों में भर्त्सना करता है –
सुकूपानां तड़ागानां प्रपानां च परंतप।
सरसां चैव भैत्तारो नरा निरयगामिनः।।
(पदम् पुराण 96:7:8)
भावार्थ – वह व्यक्ति जो तालाब, कुओं अथवा झील के जल को प्रदूषित करता है, नरकगामी होता है।
वर्तमान समय में जल प्रदूषण से उत्पन्न बीमारियां किसी नरक से कम नहीं हैं। हमारी सभ्यता नदियों को नाली एवं गन्दगी द्वारा प्रदूषित करने की नहीं रही है, परन्तु आज हमारी नदियां नाम मात्र के लिए पवित्र रह गयी हैं।
वायु शरीर के अन्दर प्राण के रूप में व्याप्त है
– वायुर्ड वा प्राणो भूत्वा शरीरमाविशत्। -तैत्तिरीयोपनिषत् (2:4)।
ऋग्वेद में वायु को प्राणदायिनी औषधि के रूप में सराहा गया है जो कल्याण एवं आनन्द
लाती है
– वात आ वातु भेषतं शंभु मयोभु नो हृदे। (10:186:1)।
वैदिक संस्कृति लोग वायु के महत्व से भलिभाँति परिचित थे। सुखी एवं दीर्घ जीवन हेतु उन्होंने शुद्धि एवं प्रदूषण रहित वायु पर बल दिया है।
अन्ततोगत्वा हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वेद केवल धर्म एवं आस्था का विषय न होकर एक विज्ञान भी है। पृथ्वी एवं अन्तरिक्ष के कण-कण की पूजा जहाँ एक ओर परमात्मा की सर्वव्यापकता के दृष्टान्त को प्रतिपादित करती है, वहीं दूसरी ओर स्वस्थ पर्यावरण की कल्पना को भी मूर्त रूप देती है। ईशावस्योपनिषत् के निम्न श्लोक द्वारा हमें समझना होगा कि इस जगत में व्याप्त समस्त वस्तुएँ ईश्वर द्वारा ही प्रदत्त हैं। इस धरा पर जीवित रहने के लिए इनमें संतुलन आवश्यक है। अतः हम उतना ही उपयोग करें जितनी हमें आवश्यकता है –
ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किच जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्वि(नम्।।
(ईशावास्योपनिषद् 1)
(साभार – हिन्दी मीडिया डॉट इन)














कंकाल उपन्यास में आपको गाला के माध्यम से प्रसाद जी स्त्री के प्रेम संबंधी मनोभाव और उसके विद्रोह से परिचित करवाते हैं। यह पँक्तियाँ दृष्टव्य हैं – गाला ने एक दीर्घ श्वास लिया। उसने कहा, ‘नारी जाति का निर्माण विधाता की एक झुँझलाहट है। मंगल! संसार-भर के पुरुष उससे कुछ लेना चाहते हैं, एक माता ही सहानुभूति रखती है; इसका कारण है उसका स्त्री होना। वह कहती है कि स्त्री का हृदय…प्रेम का रंगमंच है! गाला की ये पँक्तियाँ देखिए – “पद्मिनी के समान जल-मरना स्त्रियाँ ही जानती हैं, पुरुष केवल उसी जली हुई राख को उठाकर अलाउद्दीन के सदृश बिखेर देना ही तो जानते हैं!’ कहते-कहते गाला तन गयी थी।’
वहीं ध्रुवस्वामिनी प्रसाद जी का ऐसा नाटक है जहाँ वे खुलकर स्त्रियों के प्रश्न उठाते हैं और उनका समर्थन भी करते हैं और ऐसे समाज में जहाँ स्त्री का अस्तित्व ही पुरुष पर निर्भर हो, वहाँ ऐसे नाटक की रचना ही अपने -आप में क्राँति है। ध्रुवस्वामिनी’ 1933 में प्रकाशित हुई थी। जयशंकर प्रसाद ने अपने इस नाटक में नारी के अस्तित्व,अधिकार और पुनर्लग्न की समस्या को उठाया है। इसमें प्रसाद ने समाज में नारी के स्थान और उसके पुर्नविर्वाह जैसे प्रश्न न सिर्फ उठाये हैं बल्कि स्त्री को वह अधिकार भी दिलवाये हैं जो आज भी एक आम औरत की पहुँच से कहीं बाहर हैं। इस नाटक में दिखाया गया है कि ध्रुवस्वामिनी में प्रेम को अधिकार की तरह देखा गया है। इस नाटक में आपको ध्रुवस्वामिनी में द्रोपदी जैसा रोष और वैसे ही प्रश्न दिखते हैं। कोमा में मंदोदरी और रावण के प्रसंग की छाया है तो मंदाकिनी ऐसा चरित्र है जो स्त्री के संघर्ष में साथ खड़ी है। इस नाटक की खूबी है कि यहाँ स्त्री स्त्री की शत्रु नहीं बल्कि सहारा है और इस मामले में प्रसाद तुलसी और राजेन्द्र यादव जैसे उन लेखकों से कहीं आगे निकल जाते हैं जो स्त्री को स्त्री के खिलाफ खड़ा करते हैं। ध्रुवस्वामिनी जिस पुरूष(चंद्रगुप्त) से प्रेम करती है, उससे विवाह नहीं कर पाती और जिससे(रामगुप्त) उसका विवाह हुआ है, उससे वह प्रेम नहीं करती। इस नाटक में पुरूष सत्तात्मक समाज के शोषण के प्रति नारी का विद्रोही स्वर सुनाई पड़ता है। स्त्री स्वतंत्रता की आधुनिक चेतना के कारण ही इसमें पहली बार प्रतिक्रिया करती है। ध्रुवस्वामिनी रामगुप्त को स्पष्ट रूप से कह देती है – ‘पुरूषों ने स्त्रियों को पशु-संपत्ति समझकर उसपर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा, नारी के गौरव को बचा नहीं सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते।’ यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से महाभारत के द्यूत क्रीड़ा प्रसंग की छाया मुझे दिखती है। पुरूषों की प्रभुता तथा प्रेमजाल में फंसकर स्त्रियों को हमेशा निराशा, उत्पीड़न और उपेक्षा ही मिलती है। नाटककार के शब्दों में स्त्रियों के बलिदान का भी कोई मूल्य नहीं। कितनी असहाय दशा है। अपने निर्बल और अवलंब खोजनेवाले हाथों से वह पुरूषों के चरणों को पकड़ती है ओर वह सदैव ही इसको तिरस्कार,घृणा से उपेक्षा करता है। ध्रुवस्वामिनी जयशंकर प्रसाद का अंतिम नाटक है। इस नाटक की सबसे बड़ी शक्ति प्रसाद जी के उस क्रांतिकारी दृष्टिकोण में निहित है जो इस नाटक के माध्यम से व्यक्त हुआ है। और वह यह है कि नारी पुरुष की क्रीत दासी नहीं है। पुरुष यदि क्लीव (नपुंसक), कायर और व्यभिचारी है तो नारी न केवल उसके विरुद्ध विद्रोह ही कर सकती है, उसका परित्याग करके अपने प्रिय पुरुष का वरण कर उससे पुनर्विवाह भी कर सकती है। यह बात भारतीय समाज के लिए, खासतौर से उस समय जब यह नाटक लिखा गया था, कल्पना से भी परे थी। शकराज गुप्त साम्राज्य से अपने पुरखों के अपमान का प्रतिशोध होने के लिए खिगिल के माध्यम से एक प्रस्ताव रामगुप्त के पास भेजता है कि यदि वह अपने राज्य की सुरक्षा चाहता है तो उसके लिए उपहारस्वरूप अपनी महारानी ध्रुवस्वामिनी और हमारे सभी श्रीमंतों के लिए स्त्रियां भेज दे। रामगुप्त शकराज की बढ़ती शक्ति से पहले ही भयभीत है। इसलिए अपने मंत्री शिखरस्वामी की मंत्रणा के बाद राज्य के हित को ध्यान में रखकर महारानी ध्रुवस्वामिनी और शकराज के सभी श्रीमंतों के लिए अपनी स्त्रियां भेजने के लिए तैयार हो जाता है। ध्रुवस्वामिनी को जब यह पता चलता है तो वह सीधे निर्भीक होकर अमात्य को चुनौती देते हुए कहती है, ‘मैं केवल यही कहना चाहती हूं कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-संपत्ति समझकर उन पर अत्याचार करने का जो अभ्यास बना लिया है, वह मेरे साथ नहीं चल सकता।’ वहीं शकराज को रोकते हुए कोमा में आपको मंदोदरी दिखेगी। कोमा कहती है – वही, जो आज होने जा रही है! मेरे राजा! आज तुम एक स्त्री को अपने पति से विच्छिन्न कराकर अपने गर्व की तृप्ति के लिए कैसा अनर्थ कर रहे हो?शकराज : (बात उड़ाते हुए, हँसकर) पागल कोमा! वह मेरी राजनीति का प्रतिशोध है।


