Thursday, July 9, 2026
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प्लास्टिक बना बच्चों का प्रचलित शब्द: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी

नयी दिल्ली :प्लास्टिक को साल का बच्चों का शब्द घोषित किया गया है क्योंकि उनके द्वारा यह शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया गया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के मुताबिक, इससे संकेत मिलता है कि बच्चे प्लास्टिक प्रदूषण के खतरों के बारे में अवगत हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने बीबीसी रेडियो 2 के 500 शब्द प्रतियोगिता में आई लघु कहानियां की समीक्षा की।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि प्लास्टिक, ओसियन, इम्मेलाइन पंखुर्स्ट, डोनाल्ड ट्रंप, कोरिया, ग्रीनफिल टॉवर, यूनिकॉर्न, स्लिम और कंप्यूटर गेम फोर्टनाइट शब्दों का ब्रिटिश बच्चों पर काफी असर देखा गया। प्लास्टिक को साल का बच्चों का शब्द इसलिए चुना गया क्योंकि इस बार की प्रतियोगिता में इसका इस्तेमाल काफी हुआ। पिछले साल की तुलना में 100 फीसदी से भी ज्यादा।
उन्होंने अपनी कहानियों में प्लास्टिक का इस्तेमाल समुद्री जीवन को इससे हो रहे नुकसान के बारे में अपनी समझ को भावनात्मक तरीके से व्यक्त किया। साथ ही चित्रकारी में बेहतर ढंग से पेश किया। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बच्चों के शब्दकोश की प्रमुख विनीता गुप्ता ने कहा कि बच्चों ने दिखाया कि वे पर्यावरण पर प्लास्टिक के दुष्प्रभाव से अवगत हैं और यह कैसे उनके भविष्य पर असर डालेगा।

सेबी ने आधार जमा कराने की समयावधि बढ़ाई

नयी दिल्ली  : बाजार नियामक सेबी ने पूंजी बाजारों में निवेश करने वालों के लिए अपने आधार की जानकारी जमा कराने की आखिरी तारीख बढ़ा दी है। अब यह तारीख आधार को वित्तीय लेनदेन से जोड़ने को अनिवार्य किए जाने के मामलों में उच्चतम न्यायालय के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी। सेबी ने एक बयान में कहा है कि प्रतिभूति बाजार के लिए केवाईसी प्रक्रिया को पूरा करने हेतु स्थायी खाता संख्या (पैन) की अनिवार्यता जारी रहेगी। आधार 12 अंकों की एक विशिष्ट पहचान संख्या हो देश में हर नागरिक को जारी की जा रही है। भारतीय प्रतिभूति व विनियम बोर्ड (सेबी) ने एक परिपत्र में कहा है कि आधार का ब्यौरा देने की अंतिम तारीख को इस मामले में उच्चतम न्यायालय के ‘ अंतिम फैसले ’ की घोषणा तक बढ़ाया जाता है। उच्चतम न्यायालय ने 13 मार्च को अंतरिम आदेश में मौजूदा बैंक व अन्य वित्तीय खातों को आधार से जोड़ने की अंतिम तारीख मामले में अंतिम फैसला आने तक बढ़ा दी।

न करें बच्चे के लिए बेबी वॉकर का इस्तेमाल

माता पिता अपने बच्चे को ज़मीन पर अपना पहला कदम बढ़ाने में हर प्रकार से मदद करते हैं और कई बार वो बेबी वॉकर का भी इस्तेमाल करते हैं। लेकिन क्या वाकई में ये बेबी वॉकर बच्चों के लिए मददगार साबित होते हैं। जो बच्चे नया नया चलना सीख रहे होते हैं अकसर माँ बाप उनकी मदद करने के लिए वॉकर ले आते हैं। इसमें बैठ कर बच्चे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से चले जाते हैं। इसमें प्लास्टिक ट्रे लगी होती है जिसमें खिलौना लगा होता है, यह बच्चों के मनोरंजन के लिए होता है। साथ ही इसमें बच्चे के बैठने के लिए सीट बनी होती है और इसमें पहिये लगे होते हैं।
अगर विशेषज्ञों की राय मानें तो ये वॉकर आपके बच्चे के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं होते। जानकारों के अनुसार बेबी वॉकर में बैठने के बाद बच्चे अपने पैरों पर ज़ोर लगाते हैं। वह भी तब जब वे ठीक से खड़े होने के लिए भी तैयार नहीं होते, जो बच्चे के लिए बिल्कुल सही नहीं होता।
इसमें लगे हुए पहिये बच्चों को न तेज़ी से चलने में मदद करते हैं जिसके कारण उन्हें चोट लगने का खतरा बना रहता है। इसकी रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि कई बार माता पिता के पहुंचने से पहले ही बच्चा सीढ़ियों या फिर किसी अन्य स्थान पर गिर जाता है।
जब बच्चा इस वॉकर में होता है तो उसका नियंत्रण अपने कदमों पर नहीं होता ऐसे में वे तेज़ी से दौड़ते हुए किसी ऐसी चीज़ तक पहुंच सकते हैं जो उनके लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं होता। एक अध्ययन के अनुसार वॉकर्स बच्चों के विकास में किसी भी तरह सहायक नहीं होते, ये केवल एक खतरनाक वस्तु है।
हालांकि बाज़ार में आजकल ऐसे कई वॉकर्स मिलते हैं जिन्हें बच्चे पीछे की ओर से पकड़ कर धक्का मारते हैं और फिर आगे की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं। यह ऐसी स्थिति में होता है जब बच्चा स्वयं खड़े होने या फिर चलने के लिए तैयार होता है। अगर आप अपने बच्चे के लिए वॉकर खरीदना चाहते हैं तो फिर ऐसे ही वॉकर का प्रयोग करें क्योंकि यह उनके विकास में भी किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं करते।
ध्यान रहे जब भी आपका बच्चा वॉकर के अंदर हो आप ज़रूर उसके आस पास रहे ताकि वह चोटिल न हो। बच्चों का विकास जानकारों के मुताबिक वॉकर के कारण बच्चों की चलने की प्राकृतिक क्षमता बिगड़ जाती है जिसके फलस्वरूप वे देर से चलना सीखते हैं। अगर बच्चा प्राकृतिक रूप से चलना सीखता है तो बेहतर होता है। स्वयं बैठना, पलटना, फैलना आदि से बच्चे की मांसपेशियां मज़बूत होती हैं, साथ ही वह खुद को संतुलित करना सीखता है और आसानी से खड़ा हो जाता है।
वॉकर का प्रयोग करके चलने वाले बच्चों का सही विकास होने में काफी समय लग जाता है क्योंकि वे ज़मीन पर बहुत कम समय बिताते हैं। खुद चलने वाले बच्चों के शरीर में काफी हलचल रहती है जो वॉकर में बैठने वाले बच्चों में नहीं होती।
बच्चों के मनोरंजन और खेलने कूदने के लिए अन्य कई विकल्प हैं। आप चाहे तो बेबी वॉकर की जगह अपने बच्चे के लिए स्टेशनरी मैट ले आएं या फिर किसी प्ले सेंटर में उसे ले जाएं जहां उसका मन तो बहलेगा ही साथ ही वह पूरी तरह से सुरक्षित भी रहेगा। माता पिता होने के नाते आपके बच्चे की सुरक्षा आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। बेहतर होगा आप अपने नन्हे शिशु के लिए वॉकर घर न लाएं और उसे स्वयं अपने कदम आगे बढ़ाने दें।

बेबी वॉकर खरीदते समय इन बातों पर ध्यान दें

  • बेबी वॉकर ऐसा चुनें जिसमे बच्चे को कुशलता से खड़े होने को मिले। अगर आप कोई ऐसा बेबी वॉकर खरीदते हैं जो बहुत ही भारी है या ज़मीन से बहुत घर्षण करता है तो इससे बच्चे के साथ दुर्घटना होने की संभावना बढ़ जाती है। इस वजह से हो सकता है की बच्चा आगे से बेबी वॉकर से डरने लगे और दूरी बना ले।
  • बेबी वॉकर ऐसा चुनें जिसका आधार चौड़ा हो ताकि बच्चे को गिरने से बचाया जा सके। इसके अलावा इस तरह से बच्चे उन जगहों पर भी जाने से बचे रहेंगे जहाँ उन्हें नहीं जाना चाहिए।
  • अतिरिक्त सुरक्षा सुविधाओं को ध्यान में रखें जैसे लॉक सिस्टम , सीट बेल्ट जिससे आपके बच्चे की गतिविधि आसान और आरामदायक बनी रहे।
  • सुनिश्चित करें की बेबी वॉकर जिस पदार्थ से बना है वो बच्चे के लिए खतरनाक नहीं है।
  • बनावटी खराबी को ध्यान में रखें और बेबी वॉकर को अच्छे से जाँच लें। उसके किनारे कोमल हों, कपडे की सिलाई ठीक हो , कोई ऐसी चीज़ बहार ना निकली हो जिससे बच्चे को नुकसान पहुंचे आदि।

पाजेब

जैनेन्द्र

बाजार में एक नई तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वे बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उनकी कड़ियां आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पांव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।

पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।

हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे। बोलिए भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी।

मैंने कहा, कैसी पाजेब?

बोली, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है।

मैंने कहा, अच्छा-अच्छा।

बोली, मैं तो आज ही मंगा लूंगी।

मैंने कहा, अच्छा भाई आज सही।

उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी।

बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद में लिया और कहा कि अच्छा, तो तेरी पाजेब अबके इतवार को जरूर लेती आऊंगी।

इतवार को बुआ आई और पाजेब ले आई। मुन्नी पहनकर खुशी के मारे यहां-से-वहां ठुमकती फिरी। रुकमन के पास गई और कहा-देख रुकमन, मेरी पाजेब। शीला को भी अपनी पाजेब दिखाई। सबने पाजेब पहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ की। सचमुच वह चांदी कि सफेद दो-तीन लड़ियां-सी टखनों के चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई, बहुत ही सुघड़ लगती थी, और बच्ची की खुशी का ठिकाना न था।

और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तो मुन्नी को सजी-बजी देखकर बड़े खुश हुए। वह हाथ पकड़कर अपनी बढ़िया मुन्नी को पाजेब-सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गए। मुन्नी की पाजेब का गौरव उन्हें अपना भी मालूम होता था। वह खूब हँसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे कि मुन्नी को पाजेब दी, सो हम भी बाईसिकिल लेंगे।

बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म-दिन को तुझे बाईसिकिल दिलवाएंगे।

आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे।

बुआ ने कहा, ‘छी-छी, तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियाँ किया करती हैं। और लड़कियाँ रोती हैं। कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं?”

आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिल जरूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज।

बुआ ने कहा कि हां, यह बात पक्की रही, जन्म-दिन पर तुमको बाईसिकिल मिलेगी।

इस तरह वह इतवार का दिन हंसी-खुशी पूरा हुआ। शाम होने पर बच्चों की बुआ चली गई। पाजेब का शौक घड़ीभर का था। वह फिर उतारकर रख-रखा दी गई; जिससे कहीं खो न जाए। पाजेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे।

श्रीमतीजी ने हमसे कहा, क्यों जी, लगती तो अच्छी है, मैं भी अपने लिए बनवा लूं?

मैंने कहा कि क्यों न बनावाओं! तुम कौन चार बरस की नहीं हो?

खैर, यह हुआ। पर मैं रात को अपनी मेज पर था कि श्रीमती ने आकर कहा कि तुमने पाजेब तो नहीं देखी?

मैंने आश्चर्य से कहा कि क्या मतलब?

बोली कि देखो, यहाँ मेज-वेज पर तो नहीं है? एक तो है पर दूसरे पैर की मिलती नहीं है। जाने कहां गई?

मैंने कहा कि जाएगी कहाँ? यहीं-कहीं देख लो। मिल जाएगी।

उन्होंने मेरे मेज के कागज उठाने-धरने शुरू किए और आलमारी की किताबें टटोल डालने का भी मनसूबा दिखाया।

मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहां वह कहाँ से आएगी?

जवाब में वह मुझी से पूछने लगी कि फिर कहाँ है?

मैंने कहा तुम्हीं ने तो रखी थी। कहाँ रखी थी?

बतलाने लगी कि दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह संभालकर उस नीचे वाले बाक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है।

मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जाएगी? भूल हो गई होगी। एक रखी होगी, एक वहीं-कहीं फर्श पर छूट गई होगी। देखो, मिल जाएगी। कहीं जा नहीं सकती।

इस पर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो। खुद लापरवाह हो, दोष उल्टे मुझे देते हो। कह तो रही हूँ कि मैंने दोनों संभालकर रखी थीं।

मैंने कहा कि संभालकर रखी थीं, तो फिर यहां-वहां क्यों देख रही थी? जहां रखी थीं वहीं से ले लो न। वहां नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी।

श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख्याल हो रहा है। हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली हो। मैंने रखी, तब वह वहां मौजूद था।

मैंने कहा, तो उससे पूछा?

बोलीं, वह तो साफ इंकार कर रहा है।

मैंने कहा, तो फिर?

श्रीमती जोर से बोली, तो फिर मैं क्या बताऊं? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नही। डांटकर कहते क्यों नहीं हो, उस बंसी को बुलाकर? जरूर पाजेब उसी ने ली है।

मैंने कहा कि अच्छा, तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूं कि ला भाई पाजेब दे दे!

श्रीमती झल्ला कर बोलीं कि हो चुका सब कुछ तुमसे। तुम्हीं ने तो उस नौकर की जात को शहजोर बना रखा है। डांट न फटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा?

बोलीं कि कह तो रही हूं कि किसी ने उसे बक्स से निकाला ही है। और सोलह में पंद्रह आने यह बंसी है। सुनते हो न, वही है।

मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था। उसने नहीं ली मालूम होती।

इस पर श्रीमती ने कहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते। वे बड़े छंटे होते हैं। बंसी चोर जरूर है। नहीं तो क्या फरिश्ते लेने आते?

मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा?

बोलीं, पूछा था। वह तो खुद ट्रंक और बक्स के नीचे घुस-घुसकर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है। वह नहीं ले सकता।

मैंने कहा, उसे पतंग का बड़ा शौक है।

बोलीं कि तुम तो उसे बताते-बरजते कुछ हो नहीं। उमर होती जा रही है। वह यों ही रह जाएगा। तुम्हीं हो उसे पतंग की शह देने वाले।

मैंने कहा कि जो कहीं पाजेब ही पड़ी मिल गई हो तो?

बोलीं, नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता?

खैर, बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शाम आशुतोष पतंग और डोर का पिन्ना नया लाया है।

श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसने पतंग की उसे इजाजत दी। बस सारे दिन पतंग-पतंग। यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भी कोई बात पूछो। मैं सोचती हूँ कि एक दिन तोड़-ताड़ दूं उसकी सब डोर और पतंग।

मैंने कहा कि खैर; छोड़ो। कल सवेरे पूछ-ताछ करेंगे।

सवेरे बुलाकर मैंने गंभीरता से उससे पूछा कि क्यों बेटा, एक पाजेब नहीं मिल रही है, तुमने तो नहीं देखी?

वह गुम हो गया। जैसे नाराज हो। उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली। पर मुंह नहीं खोला।

मैंने कहा कि देखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच बता देना चाहिए।

उसका मुँह और भी फूल आया। और वह गुम-सुम बैठा रहा।

मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए। मैंने स्थिर किया कि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए। रोष का अधिकार नहीं है। प्रेम से ही अपराध-वृति को जीता जा सकता है। आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है। बालक का स्वभाव कोमल होता है और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करन चाहिए, इत्यादि।

मैंने कहा कि बेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं। सच कहने में घबराना नहीं चाहिए। ली हो तो खुल कर कह दो, बेटा! हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं। बल्कि बोलने पर तो इनाम मिला करता है।

आशुतोष तब बैठा सुनता रहा। उसका मुंह सूजा था। वह सामने मेरी आँखों में नहीं देख रहा था। रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे।

“क्यों बेटे, तुमने ली तो नहीं?”

उसने सिर हिलाकर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली। यह कहकर वह रोने को हो आया, पर रोया नहीं। आँखों में आँसू रोक लिए।

उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है।

मैंने कहा, देखो बेटा, डरो नहीं; अच्छा जाओ, ढूंढो; शायद कहीं पड़ी हुई वह पाजेब मिल जाए। मिल जाएगी तो हम तुम्हें इनाम देंगे।

वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहां-वहां पाजेब की तलाश में लग गया।

श्रीमती आकर बोलीं, आशू से तुमने पूछ लिया? क्या ख्याल है?

मैंने कहा कि संदेह तो मुझे होता है। नौकर का तो काम यह है नहीं!

श्रीमती ने कहा, नहीं जी, आशू भला क्यों लेगा?

मैं कुछ बोला नहीं। मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रति उमड़ रहा था। मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूति से वंचित नहीं करना चाहिए। बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए। मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी। मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी की है तो उसका इतना दोष नहीं है; बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्जाम है। बच्चे में चोरी की आदत भयावह हो सकती है, लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यह और भी कहीं भयावह है। यह हमारी आलोचना है। हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते।

मैंने बुलाकर कहा, “अच्छा सुनो। देखो, मेरी तरफ देखो, यह बताओ कि पाजेब तुमने छुन्नू को दी है न?”

वह कुछ देर कुछ नहीं बोला। उसके चेहरे पर रंग आया और गया। मैं एक-एक छाया ताड़ना चाहता था।

मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि डरने की कोई बात नहीं। हाँ, हाँ, बोलो डरो नहीं। ठीक बताओ, बेटे ! कैसा हमारा सच्चा बेटा है!

मानो बड़ी कठिनाई के बाद उसने अपना सिर हिलाया।

मैंने बहुत खुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को ?

उसने सिर हिला दिया।

अत्यंत सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुंह से बोलो। छुन्नू को दी है?

उसने कहा, “हाँ-आँ।”

मैंने अत्यंत हर्ष के साथ दोनों बाँहों में लेकर उसे उठा लिया। कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के। आशू हमारा राजा बेटा है। गर्व के भाव से उसे गोद में लिए-लिए मैं उसकी माँ की तरफ गया। उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है। पाजेब उसने छुन्नू को दी है।

सुनकर माँ उसकी बहुत खुश हो आईं। उन्होंने उसे चूमा। बहुत शाबाशी दी ओर उसकी बलैयां लेने लगी !

आशुतोष भी मुस्करा आया, अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी।

उसके बाद अलग ले जाकर मैंने बड़े प्रेम से पूछा कि पाजेब छुन्नू के पास है न? जाओ, माँग ला सकते हो उससे?

आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रहा। मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ।

उसने जवाब में मुंह नहीं खोला।

मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा ?

मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगी उसका नाम बता देगा। सुनकर वह चुप हो गया। मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा कि पाजेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहाँ से ?

अंत में हारकर मैंने कहा कि वह कहीं तो होगी। अच्छा, तुमने कहाँ से उठाई थी ?

“पड़ी मिली थी ।”

“और फिर नीचे जाकर वह तुमने छुन्नू को दिखाई ?”

“हाँ !”

“फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे !”

“हाँ !”

“कहाँ बेचने को कहा ?”

“कहा मिठाई लाएंगे ?”

“नहीं, पतंग लाएंगे ?”

“हाँ!”

“सो पाजेब छुन्नू के पास रह गई ?”

“हाँ !”

“तो उसी के पास होनी चाहिए न ! या पतंग वाले के पास होगी ! जाओ, बेटा, उससे ले आओ। कहना, हमारे बाबूजी तुम्हें इनाम देंगे।

वह जाना नहीं चाहता था। उसने फिर कहा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो कहाँ से देगा !

मुझे उसकी जिद बुरी मालूम हुई। मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्या किया है? बोलते क्यों नहीं?

वह मेरी ओर देखता रहा, और कुछ नहीं बोला।

मैंने कहा, कुछ कहते क्यों नहीं?

वह गुम-सुम रह गया। और नहीं बोला।

मैंने डपटकर कहा कि जाओ, जहाँ हो वही से पाजेब लेकर आओ।

जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंने उसे कान पकड़कर उठाया। कहा कि सुनते हो ? जाओ, पाजेब लेकर आओ। नहीं तो घर में तुम्हारा काम नहीं है।

उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया । निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुंह बनाकर खड़ा रह गया ।

मुझे बड़ा क्षोभ हो रहा था। यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका। मैंने बाहर आकर धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो?

पहले तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?

मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे। समझे न जाओ, तुम कहो तो।

छुन्नू की माँ तो कह रही है कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता। उसने पाजेब नहीं देखी।

जिस पर आशुतोष की माँ ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलता है। क्यों रे आशुतोष, तैने दी थी न?

आशुतोष ने धीरे से कहा, हाँ, दी थी।

दूसरे ओर से छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी। क्यों रे, मुझे कब दी थी ?

आशुतोष ने जिद बांधकर कहा कि दी तो थी। कह दो, नहीं दी थी ?

नतीजा यह हुआ कि छुन्नू की माँ ने छुन्नू को खूब पीटा और खुद भी रोने लगी। कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोर हो गए। कुलच्छनी औलाद जाने कब मिटेगी ?

बात दूर तक फैल चली। पड़ोस की स्त्रियों में पवन पड़ने लगी। और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी माँ दोनों एक-से हैं। मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसी कोई बात भला सुलझती है !

बोली कि हाँ, मैं तेज बोलती हूँ। अब जाओ ना, तुम्हीं उनके पास से पाजेब निकालकर लाते क्यों नहीं ? तब जानूँ, जब पाजेब निकलवा दो।

मैंने कहा कि पाजेब से बढ़कर शांति है । और अशांति से तो पाजेब मिल नहीं जाएगी।

श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज होकर मेरे सामने से चली गईं ।

थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ हमारे घर आई । श्रीमती उन्हें लाई थी। अब उनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाजेब के लिए इनकार करता है। वह पाजेब कितने की थी, मैं उसके दाम भर सकती हूँ।

मैंने कहा, “यह आप क्या कहती है! बच्चे बच्चे हैं। आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी !”

उन्होंने उसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया। कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहीं देता जो तैने पाजेब देखी हो ?

छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इनकार किया। और बताया कि पाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वालों को दे आया है। मैंने खूब देखी थी, वह चाँदी की थी।

“तुम्हें ठीक मालूम है ?”

“हाँ, वह मुझसे कह रहा था कि तू भी चल। पतंग लाएंगे।”

“पाजेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो ।”

छुन्नू ने उसका आकार बताया, जो ठीक ही था।

मैंने उसकी माँ की तरफ देखकर कहा देखिए न पहले यही कहता था कि मैंने पाजेब देखी तक नहीं। अब कहता है कि देखी है ।

माँ ने मेरे सामने छुन्नू को खींचकर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया। कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है ? तेरी चमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं।

मैंने बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाया। वह शहीद की भांति पिटता रहा था। रोया बिल्कुल नहीं और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से देख रहा था।

खैर, मैंने सबको छुट्टी दी। कहा, जाओ बेटा छुन्नू खेलो। उसकी माँ को कहा, आप उसे मारिएगा नहीं। और पाजेब कोई ऐसी बड़ी चीज़ नहीं है।

छुन्नू चला गया। तब, उसकी माँ ने पूछा कि आप उसे कसूरवर समझतें हैं ?

मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसे कुछ पता है। और वह मामले में शामिल है।

इस पर छुन्नू की माँ ने पास बैठी हुई मेरी पत्नी से कहा, “चलो बहनजी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाए देती हूँ। एक-एक चीज देख लो। होगी पाजेब तो जाएगी कहाँ ?”

मैंने कहा, “छोड़िए भी। बेबात को बात बढ़ाने से क्या फायदा ।” सो ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया। नहीं तो वह छुन्नू को पीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाए ले रही थी। कुलच्छनी, आज उसी धरती में नहीं गाड़ दिया तो, मेरा नाम नहीं ।

खैर, जिस-तिस भांति बखेड़ा टाला। मैं इस झंझट में दफ्तर भी समय पर नहीं जा सका। जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो, आशुतोष को धमकाना मत। प्यार से सारी बातें पूछना। धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछ नहीं आता। समझी न ?

शाम को दफ्तर से लौटा तो श्रीमती से सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है। ग्यारह आने पैसे में वह पाजेब पतंग वाले को दे दी है। पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं। पाँच आने जो दिए वह छुन्नू के पास हैं। इस तरह रत्ती-रत्ती बात उसने कह दी है ।

कहने लगी कि मैंने बड़े प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकाला है। दो-तीन घंटे में मगज़ मारती रही। हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है।

मैं सुनकर खुश हुआ। मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पाँच आने भेजकर पाजेब मँगवा लेंगे। लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसी चीज़ें लेता है। उसे पुलिस में दे देना चाहिए । उचक्का कहीं का !

फिर मैंने पूछा कि आशुतोष कहाँ है?

उन्होंने बताया कि बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा।

मैंने कहा कि बंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ।

बंसी गया और उसने आकर कहा कि वे अभी आते हैं।

“क्या कर रहा है ?”

“छुन्नू के साथ गिल्ली डंडा खेल रहे हैं ।”

थोड़ी देर में आशुतोष आया । तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया । आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया और गोद में लेने पर भी वह कोई विशेष प्रसन्न नहीं मालूम नहीं हुआ।

उसकी माँ ने खुश होकर कहा कि आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं। हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है ।

आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा। लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ, ऐसा प्रतीत होता था।

मैंने कहा कि आओ चलो । अब क्या बात है। क्यों हज़रत, तुमको पाँच ही आने तो मिले हैं न ? हम से पाँच आने माँग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे !

कमरे में जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की, “क्यों बेटा, पतंग वाले ने पाँच आने तुम्हें दिए न ?”

“हाँ”!

“और वह छुन्नू के पास हैं न!”

“हाँ!”

“अभी तो उसके पास होंगे न !”

“नहीं”

“खर्च कर दिए !”

“नहीं”

“नहीं खर्च किए?”

“हाँ”

“खर्च किए, कि नहीं खर्च किए ?”

उस ओर से प्रश्न करने वह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया।

“बताओं खर्च कर दिए कि अभी हैं ?”

जवाब में उसने एक बार ‘हाँ’ कहा तो दूसरी बात ‘नहीं’ कहा।

मैंने कहा, तो यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें नहीं मालूम है ?

“हाँ।”

“बेटा, मालूम है न ?”

“हाँ।”

पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिए हैं न?

“हाँ”

“तुमने क्यों नहीं लिए ?”

वह चुप।

“इकन्नियां कितनी थी, बोलो ?”

“दो।”

“बाकी पैसे थे ?”

“हाँ”

“दुअन्नी थी!”

“हाँ ।”

मुझे क्रोध आने लगा। डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी ? सच बताओ कितनी इकन्नियां थी और कितना क्या था ।”

वह गुम-सुम खड़ा रहा, कुछ नहीं बोला।

“बोलते क्यों नहीं ?”

वह नहीं बोला।

“सुनते हो ! बोला-नहीं तो—”

आशुतोष डर गया। और कुछ नहीं बोला।

“सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूँ?”

इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंने कान पकड़कर उसके कान खींच लिए। वह बिना आँसू लाए गुम-सुम खड़ा रहा।

“अब भी नहीं बोलोगे ?”

वह डर के मारे पीला हो आया। लेकिन बोल नहीं सका। मैंने जोर से बुलाया “बंसी यहाँ आओ, इनको ले जाकर कोठरी में बंद कर दो ।”

बंसी नौकर उसे उठाकर ले गया और कोठरी में मूंद दिया।

दस मिनट बाद फिर उसे पास बुलवाया। उसका मुँह सूजा हुआ था। बिना कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे। कोठरी में बंद होकर भी वह रोया नहीं।

मैंने कहा, “क्यों रे, अब तो अकल आई ?”

वह सुनता हुआ गुम-सुम खड़ा रहा।

“अच्छा, पतंग वाला कौन सा है ? दाई तरफ का चौराहे वाला ?”

उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया। जिसे मैं कुछ समझ न सका ।

“वह चौराहे वाला ? बोलो—”

“हाँ।”

“देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ। बता देना कि कौन सा है। फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे। समझते हो न ?”

यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया। सब बात समझाकर कहा, “देखो, पाँच आने के पैसे ले जाओ। पहले तुम दूर रहना। आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाजेब माँगेगा। अव्वल तो यह पाजेब लौटा ही देगा। नहीं तो उसे डांटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूंगा। बच्चों से माल ठगता है ? समझे ? नरमी की जरूरत नहीं हैं।”

“और आशुतोष, अब जाओ। अपने चाचा के साथ जाओ।” वह अपनी जगह पर खड़ा था। सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया।

“नहीं जाओगे!”

उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा।

मैंने तब उसे समझाकर कहा कि “भैया घर की चीज है, दाम लगे हैं। भला पाँच आने में रुपयों का माल किसी के हाथ खो दोगे ! जाओ, चाचा के संग जाओ। तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा। हाँ, पैसे दे देना और अपनी चीज वापस माँग लेना। दे तो दे, नहीं दे तो नहीं दे । तुम्हारा इससे कोई सरोकार नहीं। सच है न, बेटे ! अब जाओ।”

पर वह जाने को तैयार ही नहीं दिखा। मुझे लड़के की गुस्ताखी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ। बोला, “इसमें बात क्या है? इसमें मुश्किल कहाँ है? समझाकर बात कर रहे है सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं।”

मैंने कहा कि, “क्यों रे नहीं जाएगा?”

उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊंगा।

मैंने प्रकाश, अपने छोटे भाई को बुलाया। कहा, “प्रकाश, इसे पकड़कर ले जाओ।”

प्रकाश ने उसे पकड़ा और आशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा। वह साथ जाना नहीं चाहता था।

मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा, कि जाओ भाई! डरो नहीं। अपनी चीज घर में आएगी। इतनी-सी बात समझते नहीं। प्रकाश इसे गोद में उठाकर ले जाओ और जो चीज माँगे उसे बाजार में दिला देना। जाओ भाई आशुतोष !

पर उसका मुंह फूला हुआ था। जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला। ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारी हो रहा हो। आठ बरस का यह लड़का होने को आया फिर भी देखो न कि किसी भी बात की उसमें समझ नहीं हैं। मुझे जो गुस्सा आया कि क्या बतलाऊं! लेकिन यह याद करके कि गुस्से से बच्चे संभलने की जगह बिगड़ते हैं, मैं अपने को दबाता चला गया। खैर, वह गया तो मैंने चैन की सांस ली।

लेकिन देखता क्या हूँ कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है।

मैंने पूछा, “क्यों?”

बोला कि आशुतोष भाग आया है।

मैंने कहा कि “अब वह कहाँ है?”

“वह रूठा खड़ा है, घर में नहीं आता।”

“जाओ, पकड़कर तो लाओ।”

वह पकड़ा हुआ आया। मैंने कहा, “क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आएगा? बोल, जाएगा कि नहीं?”

वह नहीं बोला तो मैंने कसकर उसके दो चांटे दिए। थप्पड़ लगते ही वह एक दम चीखा, पर फौरन चुप हो गया। वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा।

मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसे मेरे सामने से। जाकर कोठरी में बंद कर दो। दुष्ट!

इस बार वह आध-एक घंटे बंद रहा। मुझे ख्याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूँ, लेकिन जैसे कोई दूसरा रास्ता न दिखता था। मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ कई थी, और कुछ अभ्यास न था।

खैर, मैंने इस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ।

मालूम करना कि किसने पाजेब ली है। होशियारी से मालूम करना। मालूम होने पर सख्ती करना। मुरव्वत की जरूरत नहीं। समझे।

प्रकाश गया और लौटने पर बताया कि उसके पास पाजेब नहीं है।

सुनकर मैं झल्ला आया, कहा कि तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता। जरा सी बात नहीं हुई, तुमसे क्या उम्मीद रखी जाए?

वह अपनी सफाई देने लगा। मैंने कहा, “बस, तुम जाओ।”

प्रकाश मेरा बहुत लिहाज मानता था। वह मुंह डालकर चला गया। कोठरी खुलवाने पर आशुतोष को फर्श पर सोता पाया। उसके चेहरे पर अब भी आँसू नहीं थे। सच पूछो तो मुझे उस समय बालक पर करुणा हुई । लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं !

मैंने उसे जगाया। वह हड़बड़ाकर उठा। मैंने कहा, “कहो, क्या हालत है?”

थोड़ी देर तक वह समझा ही नहीं। फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया।

झट उसके चेहरे पर वहीं जिद, अकड़ ओर प्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे।

मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ नहीं तो इस कोठरी में फिर बंद किए देते हैं।

आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा मालूम नहीं हुआ।

खैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा। मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को दे देना और पाजेब माँग लेना कोई घबराने की बात नहीं। तुम समझदार लड़के हो।”

उसने कहा कि जो पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?

“इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पाँच आने में पाजेब दी है। न हो तो छुन्नू को भी साथ ले लेना। समझे?”

वह चुप हो गया। आखिर समझाने पर जाने को तैयार हुआ। मैंने प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा। उसका मुँह भारी देखकर डांटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी।

बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रखकर पूछा कि कहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ।

आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा। मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो।

आशुतोष रुकने को उद्यत था। वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा। बुआ ने पूछा, “क्या बात है?”

मैंने कहा, “कोई बात नहीं, जाने दो न उसे।”

पर आशुतोष मचलने पर आ गया था। मैंने डांटकर कहा, “प्रकाश, इसे ले क्यों नहीं जाते हो?”

बुआ ने कहा कि बात क्या है? क्या बात है?

मैंने पुकारा, “बंसी, तू भी साथ जा। बीच से लौटने न पाए।” सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोष को जबरदस्ती उठाकर सामने से ले गए। बुआ ने कहा, “क्यों उसे सता रहे हो?”

मैंने कहा कि कुछ नहीं, जरा यों ही-

फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा। राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती, मुहल्ले में भी राजनीति होती है। यह भार स्त्रियों पर टिकता है। कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रंग फैलाती है। इसी प्रकार कुछ बातें हुईं, फिर छोटा-सा बक्सा सरका कर बोली, इनमें वह कागज है जो तुमने माँगें थे। और यहाँ-

यह कहकर उन्होंने अपने बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाजेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हों। मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या?

बोली कि उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ चली गई थी।

– जैनेन्द्र

नीलांबर कोलकाता : एक साँझ कविता की – 4′

एक साँझ कविता की – 4′ लेकर एक बार फिर  नीलांबर कोलकाता 10 जून की शाम कोलकाता में अपने प्रिय कवियों के साथ उपस्थित हो रहा हैं।यहाँ कविताएँ विभिन्न रूपों में  संवाद करेंगी।हिंदी के वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की अध्यक्षता में होने वाले कविता पाठ में शामिल हैं हिंदी की सुपरिचित कवयित्री अनामिका, तुषार धवल सिंह और घनश्याम कुमार देवांश।

इसके अलावा नीलांबर की टीम के द्वारा कविता कोलाज और कविता मोंताज की भी प्रस्तुति की जाएगी । साथ में रश्मि बंदोपाध्याय और उनके दल ‘नृत्यंगनाज’ के द्वारा काव्य नृत्य प्रस्तुत किया जाएगा।

माता कुन्ती से है जिसका संबंध….उसे कहते हैं आज कुतवार

मुरैना जिले में कुतवार जगह देखते ही महाभारत की यादें ताजा हो जाती हैं। इस स्थान का संबंध पांडवों की मां कुंती से है। महाभारत काल में इसे कुंतीभोज नाम से भी जाना जाता था। यह जगह ग्वालियर से लगभग 45 किमी दूर मुरैना जिले में स्थित है। यह जगह महाभारत कालीन है, इसे कुछ लोग कुतवार के नाम से जानते हैं। इस स्थान का संबंध पांडवों की मां कुंती से है। महाभारत काल में इसे कुंतीभोज नाम से भी जाना जाता था। वीर पांडव, अर्जुन की ननसार भी यही है और अर्जुन व श्रीकृष्ण द्वारा बनवाए गए हरिसिद्धी मंदिर और देवी कुंती द्वारा पूजा गया शिवलिंग भी यहीं स्थापित है। पास ही आसन नदी का तट जहां आज भी सूर्य के घोड़ों की टाप और सूर्य के पदचिन्हों की छाप मौजूद है।

चंबल घाटी का सबसे प्राचीन नगर कुंतलपुर है, जिसे आज के समय में कुतवार के नाम जाना जाता है। पुराणों के इतिहास संबंधी अंशों तथा प्राचीन राजनीतिक भूगोल पर प्रकाश डालें, तो पता चलता है कि चंबल पर राजा शूरसेन राज करते थे। राजा शूरसेन की पुत्रियों में से एक का नाम प्रथा था, जिसे उन्होंने अपने मित्र राजा कुंतीभोज को गोद दे दिया था। प्रथा के सहोदर भ्राता का नाम वसुदेव था। कुंतीभोज द्वारा उनका लालन-पालन करने के बाद प्रथा का नाम कुंती पड़ गया।  राजा कुंतीभोज का राज्य चंबल के दक्षिण में था।

इतिहास के अनुसार कुंतीभोज महाभारत में द्रोणाचार्य के हाथों मारे गए थे। यह भू-भाग कुंती क्षेत्र के नाम से विख्यात हुआ और दंतिदुर्ग (दतिया) तक फैला हुआ है। 4-हजारों वर्ष से कुतवार में किले के पीछे एक स्थल को कर्णवार कहा जाता है, जहां से कुंती ने नवजात कर्ण को मंजूषा में रख अश्व नदी (अब आसन) में बहा दिया था। यह मंजूषा आसन से चंबल में जा पहुंची। यहां एक स्थान सूर्यवाह के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यहां का नाम सूर्यवाह इसलिए पड़ा, क्योंकि कुंती के आह्वान पर सूर्यदेव प्रकट हुए थे। उस अद्भुत घटना के स्मृति चिह्न अश्व नदी के किनारे एक ऊंची चट्टान पर घोड़ों की टापों के रूप में प्राचीन काल से बने हुए हैं। यहां एक टूटा हुआ मंदिर भी है। अनुमान लगाया जाता है कि यहां सूर्य मंदिर रहा होगा।

भगवान सूर्य नारायण ने यहां उतारा था अपना रथ
कहा जाता है कि इसी स्थान पर महाभारत काल में भगवान सूर्य नारायण ने अपना रथ उतारा था और कुंती से भेंट की। किवदंती है कि यहां महर्षि दुर्वासा की तपस्थली भी है। खुदाई में नागराजवंश के समय के सिक्के व बर्तनों का मिलना इस स्थान की ऐतिहासिक सत्यता को और मजबूत बनाता है। सिंधिया स्टेट के समय आसन नदी पर यहां अर्धचंद्राकार बांध भी बनाया गया था। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 3 पर ग्वालियर से आगरा की ओर जाने पर छौंदा टोल प्लाजा से दाहिने हाथ पर मुड़कर कुतवार जाया जा सकता है। नजदीकी रेलवे स्टेशन मुरैना इस स्थान से लगभग 12 किमी दूर है।
कांतिपुरी की कुंती
विजयेन्द्र कुमार माथुर के अनुसार वर्तमान कोतवार जो डभोरा  (बमोरा) स्टेशन से 12 मील दूर है वही कांतिपुरी है। यह आसन नदी के तट पर स्थित है और ग्वालियर से 20 मील है। कांतिपुरी जो प्राचीन पद्मावती के निकट ही स्थित थी गुप्तकाल में नागराजाओं के अधिकार में थी। विष्णुपुरा 4,24,64 में पद्मावती में नागराजाओं का उल्लेख है। कांतिपुरी के कुंतीपुरी , कुंतीपद, और कुंतलपुरी नाम भी मिलते हैं। पांडवों की माता कुंती संभवत: इसी नगरी के राजा कुंतिभोज की पुत्री थी।

कहते हैं कि इसी स्थान पर सूर्य नारायण कुन्ती से मिलने आये थे जिसके बाद कर्ण का जन्म हुआ। कहते हैं कि आज भी यहाँ घोड़ों की टापों के निशान मौजूद हैं..जो कि चित्र में दिख रहा है

कान्तिपुरी में नागवंशी जाटों का शासन
नागवंश एक सुप्रसिद्ध वंश है जो सूर्यवंश एवं चन्द्रवंश की तरह ही अनेक क्षत्रिय आर्यों के वंशों का समूह है। ऐतिहासिकों का मत है कि ये क्षत्रिय अपनी ‘नाग’ चिन्हित ध्वजा के कारण ही नाग नाम से प्रसिद्ध हुए। यह यक्ष, गंधर्व और देवताओं की कोटि का सुसंस्कृत वंश था।[30] रामायणकाल में भी इस नागवंश की बड़ी प्रसिद्धि थी। इस काल में इस विशाल नागवंश का संगठन कई छोटे-छोटे प्रसिद्ध जाट राजवंशों के द्वारा हुआ जिनमें वैसाति या वैस, तक्षक, काला (कालीधामन), पौनिया (पूनिया), औलक, कलकल, भारशिव (भराईच) आदि हैं। ये जाटवंश नागवंश की शाखा के नाम से प्रसिद्ध हैं। [31]
इण्डियन एंटीक्वेरी जिल्द 14, पृ० 45 पर लिखा है कि शेरगढ़ (कोटा राज्य) के द्वार पर नागवंशज राजाओं का शिलालेख, 15 जनवरी 791 ई० का खुदवाया हुआ मिला है जिसने उस स्थान पर विन्दुनाग, पद्मनाम, सर्वनाग, देवदत्त नामक चार नाग नरेशों का शासन होना सिद्ध होता है। [32] इन नागवंशी जाटों का राज्य कान्तिपुरी, मथुरा, पद्मावती, कौशाम्बी, अहिछत्रपुर, नागपुर, चम्पावती (भागलपुर), बुन्देलखण्ड तथा मध्यप्रान्त पश्चिमी मालवा, नागौर (जोधपुर) पर रहा। इनके अतिरिक्त शेरगढ़ कोटा राज्य की प्राचीन भूमि पर, मध्यप्रदेश में चुटिया, नागपुर, खैरागढ़, चक्रकोटय एवं कवर्धा में भी इस वंश का राज्य था। महाविद्वान् महाराजा भोज परमार (जाट) की माता शशिप्रभा नागवंश की कन्या थी। राजस्थानी महासन्त वीरवर तेजा जी (धौल्या गोत्री जाट) का अपनी बहादुर पत्नी बोदल समेत एक बालू नामक नागवंशी वीर से युद्ध करते हुए ही प्राणान्त हुआ था। वहीं पर वीर तेजा जी की समाधि बनी हुई है। आज भी राजस्थान में इस वंश के जाटों की संख्या अधिक है। उत्तरप्रदेश जि० बदायूं में रम्पुरिया, खुदागंज, धर्मपुर, जि० बुलन्दशहर के अहार गांव में नागवंशी जाट हैं। यह ‘अहार’ वही प्राचीन गांव है जहां कि दुर्योधन द्वारा विष खिलाकर अचेत भीमसेन को गंगा में फेंक दिया गया था, जिसे नागवंशियों ने बचा लिया था।


मुरैना से महाभारत काल का नाता और गहराता जा रहा है। वर्ष 1997 में जिले के कुतवार गांव में हुई खुदाई में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को महाभारत कालीन कुंतलपुर शहर (राजा कुंतिभोज के राज्य की राजधानी) मिला था। अब पुरातत्व विभाग को सिंहौनिया (कच्छपघात कालीन राजाओं की राजधानी सिंहपाणी) में एक और महाभारत कालीन शहर होने के प्रमाण मिले हैं। इस शहर की खुदाई के लिए प्रस्ताव एएसआई को भेजा गया है। पुरातत्व विभाग को सिंहौनिया थाने के पीछे स्थित मिट्टी के विशाल टीले में करीब चार से पांच हजार साल पुराना (महाभारत कालीन) नगर होने के प्रमाण मिले हैं। वर्ष 2012 में एक सर्वे के दौरान विभाग को महाभारत कालीन मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) व अन्य पुरातत्व महत्व के अवशेष मिले थे। इसके बाद यह पुष्ट हुआ कि सिंहौनिया के इस टीले पर कुतवार जैसा ही कोई नगर बसा करता था। ज्ञात हो कि कुतवार गांव के एक मिट्टी के टीले से पुरातत्व विभाग को मृदभांड व अन्य अवशेष मिले थे। इसके बाद खुदाई करने पर शहर सामने आया था।
पानसिंह तोमर का गाँव भी महाभारत काल का है
एथलीट व डकैत रहे पानसिंह तोमर के गाँव भिड़ौसा व लेपा भी महाभारत काल के ही हैं। यहां भी पुरातत्व विभाग को महाभारत कालीन पुरावशेष मिले हैं, जिनमें चार से पांच हजार साल पुराने मृदभांड प्रमुख हैं। पुरातत्वविदों की मानें तो यहां भी महाभारत काल में कोई गांव या शहर बसा हुआ होगा।
महाभारत में उल्लेखित कई जगह हैं अंचल में
महाभारत में पांडवों की मां कुंती का मायका कुंतलपुर नाम से उल्लेखित है। यहां पर कुंती ने कर्ण को आसन नदी में प्रवाहित किया था। यह नगर एएसआई को कुतवार गांव में मिला। यहां वह कर्णखार भी मिली, जहां से कर्ण को बहाया गया था। महाभारत में महाराज शांतनु द्वारा बसाए गए नगर शांतनु नगर का भी उल्लेख है। यह नगर आज भी चंबल किनारे के शांतनुखेरा नामक गांव के नाम से जाना जाता है।
महाभारत में चर्मण्यवती गंगा (चंबल) नामक नदी का उल्लेख है जहां महाराज शांतनु नौका विहार करते थे। यह चंबल नदी, शांतनु खेरा आज भी उसी स्थिति में है। हमने वर्ष 2012 में जो सर्वे किया था उसमें हमें सिंहौनिया व लेपा भिड़ौसा से महाभारत काल की चीजें मिलीं। हम यहां खुदाई करने का प्रस्ताव एएसआई को भेज चुके हैं। अंचल में और भी जगह हैं जो इतनी पुरानी हो सकती हैं, लेकिन इसके लिए हम दूसरे चरण में सर्वे करेंगे।

कुतवार देवी मंदिर

कुंती ने बनवाया था हरिसिद्धि माता का मंदिर
कालपी से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जब ग्वालियर आईं तो अंग्रेजों से नफरत करने वाली ग्वालियर की बागी सेना ने उनका साथ दिया रानी ने किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद जयाजीराव सिंधिया पांडवों की मां के कुतवार में बनाए हरिसिद्धि माता के मंदिर में जा छिपे थे। जयाजीराव सिंधिया ने जिस मंदिर में शरण ली थी वह कुंती के पिता कुंति भोज ने राजधानी कुंतलपुर में आसन नदी के किनारे अपनी पुत्री के लिए बनवाया था। इसी मंदिर के किनारे कुंती ने सूर्य देव की कृपा से महाभारत युद्ध के महारथी कर्ण को जन्म दिया था। लोकलाज से बचने इसी मंदिर के किनारे बने घाट से सोने की पेटी में कवच-कुंडलों के साथ कर्ण को सुरक्षित रख कर नदी में बहा दिया था।

(साभार – दैनिक भास्कर)

प्लास्टिक नष्ट होने में लग जाते हैं 1 हजार साल

इन दिनों प्लास्टिक का इस्तेमाल हर क्षेत्र में बढ़ा है। यह धरती और समंदर को प्रदूषित करने के साथ ही समुद्री जीवों और मानव स्वास्थ्य + के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। अब तक इसका कोई ठोस विकल्प ढूंढा नहीं जा सका है। यही वजह है कि इस बार 5 जून यानी विश्व पर्यावरण दिवस 2018 को ‘बीट प्लास्टिक पलूशन’ थीम पर मनाने का फैसला किया गया। इसके जरिए सरकारों, उद्योगों, विभिन्न समुदायों और आम जनता से मिलकर प्लास्टिक से निपटने का अनुरोध किया जा रहा है जिससे विकल्प तलाश कर प्लास्टिक उत्पादन में कमी लाई जा सके। भारत इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का ग्लोबल होस्ट भी है।
प्लास्टिक के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि हर साल दुनियाभर में 500 अरब प्लास्टिक बैग्स + का इस्तेमाल होता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण इसका निपटारा कर पाना गंभीर चुनौती है। दरअसल, प्लास्टिक न तो नष्ट होता है और न ही सड़ता है। आपको जानकर शायद हैरानी हो कि प्लास्टिक 500 से 700 साल बाद नष्ट होना शुरू होता है और पूरी तरह से डिग्रेड होने में उसे 1000 साल लग जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ जितना भी प्लास्टिक का उत्पादन हुआ है वह अब तक नष्ट नहीं हुआ है।


प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है पर नष्ट नहीं होता है। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। दुनियाभर में केवल 1 से 3% प्लास्टिक ही रीसाइकल हो पाता है। अक्सर लोग इसे जलाकर सोचते हैं कि उन्होंने प्लास्टिक को नष्ट कर दिया है जबकि प्लास्टिक को जलाना और भी खतरनाक है। प्लास्टिक के कचरे को जलाने से ऐसी गैसें निकलती हैं, जो फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकती हैं। पेट्रोलियम, नैचरल गैस और दूसरे केमिकल्स के इस्तेमाल से प्लास्टिक बैग्स बनाए जाते हैं। 1950 के दशक में अमेरिका और यूरोप में प्लास्टिक के उत्पादन की जानकारी मिलती है। सुपरमार्केट्स में पहली बार प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल 1977 में शुरू हुआ था।
… तो समुद्र में मछलियों से ज्यादा होगा प्लास्टिक
वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि प्लास्टिक का विकल्प न खोजा गया तो अगले 30 वर्षों यानी करीब 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक भर जाएगा। हर साल करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक समंदर में जमा हो रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि हर मिनट कूड़े से भरे एक ट्रक के बराबर प्लास्टिक समुद्र के पानी में मिल रहा है। पिछले दशक में दुनियाभर में प्लास्टिक का इतना उत्पादन किया गया था, जितना पिछली पूरी शताब्दी में नहीं हुआ था। UN Environment के मुताबिक हम जो प्लास्टिक इस्तेमाल में लाते हैं उसका 50 फीसदी सिंगल-यूज या डिस्पोजेबल होता है। हर मिनट दुनिया में करीब 10 लाख प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैं। दुनियाभर में जो भी कूड़ा-कचरा पैदा होता है, उसका 10 से 20 फीसदी हिस्सा प्लास्टिक का ही होता है।


समुद्री जीवों का ‘यमराज’
समुद्र में प्लास्टिक बढ़ने से समुद्री जीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। यह खतरा कितना गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2008 में कैलिफॉर्निया में बीच पर एक व्हेल मृत पाई गई। उसके पेट में 22 किलो प्लास्टिक पाया गया, जो उसकी मौत की वजह बना। प्लास्टिक के कारण हर साल करीब एक लाख समुद्री जीव-जंतु मर रहे हैं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

पर्यावरण का संरक्षण कर मनायें पर्यावरण दिवस

विश्व में सबसे समृद्ध देश वही है जहाँ हरियाली हैं, इसी को बनाए रखने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को मनाया जाता है। इस बार विश्व 45वां विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा और उसके संरक्षण को ध्यान में रखकर इसकी पहल की गई थी। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे यह उद्देश्य है कि लोगों को इस बारे में जागरूक किया जा सके कि आखिर क्यों पर्यावरण की सुरक्षा जरूरी है।

विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पूरी दुनिया में अलग-अलग तरह के कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इन कार्यक्रमों के दौरान पौधरोपण किए जाते हैं और साथ ही पर्यावरण को कैसे संरक्षित रखना है, इस बारे में विचार-विमर्श होता है।
वैश्विक स्तर पर आज सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट से निपटने की और इस गंभीर मुद्दे पर आम जनता और सुधी पाठकों को जागरूक करने की। हमने पर्यावरण, वन्य जीव-जंतुओं और मानव समाज का सीधा रिश्ता आम आदमी की समझ के मुताबिक समझाने का प्रयास सरल व वैज्ञानिक दृष्टि से किया है।

तो आइए आज हम सब मिलकर इस विश्व पर्यावरण दिवस साथ मिलकर मनाते है। इसके लिए आपको कहीं जाने या किसी रैली में भाग लेने की जरूरत नहीं, केवल अपने आस-पड़ोस के पर्यावरण का अपने घर जैसा ख्याल रखें जैसे कि –

इस तरह करें पर्यावरण का संरक्षण 
1.अपने घर के आसपास पौधारोपण करें और स्वच्छ रखें।
2. गरमी, भूक्षरण, धूल इत्यादि से बचाव तो कर ही सकते हैं।
3. पक्षियों को बसेरा भी दे सकते हैं, फूल वाले पौधों से आप अनेक कीट-पतंगों को आश्रय व भोजन दे सकते हैं।
4. कपड़े व कागज के थैलों का करें इस्तेमाल।
5. डीजल जेनेरेटर को कम से कम इस्तेमाल करें।
6. प्लास्टिक के बैग्स को संभाल कर रखें। इन्हें कई बार इस्तेमाल में लाएं। सामान खरीदने जाने पर अपने साथ कैरी बेग (कपड़े या कागज के बने) लेकर जाएं।
7. प्लास्टिक सामान को कम करने की कोशिश करें। धीरे-धीरे प्लास्टिक से बने सामान की जगह दूसरे पदार्थ से बने सामान अपनाएं।
8. शहरी पर्यावरण में रहने वाले पशु-पक्षियों जैसे गोरैया, कबूतर, कौवे, मोर, बंदर, गाय, कुत्ते आदि के प्रति सहानुभूति रखें व आवश्यकता पड़ने पर दाना-पानी या चारा उपलब्ध कराएँ।
9. ताप विद्युत संयंत्रों के उत्सर्जन में कटौती , उद्योगों के लिए कड़े उत्सर्जन मानक तैयार करके , घरों में ठोस ईंधन के इस्तेमाल में कमी लाकर।
10. ईंट निर्माण के लिए जिग-जैग ईंट-भट्टों के इस्तेमाल और तत्परता के साथ वाहन उत्सर्जन मानकों को कड़ा बनाने जैसे नीतिगत उपायों से हम अपने प्रदुषित पर्यावरण में सुधार लाया जा सकता है।
(साभार – प्रभा साक्षी)

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अलग-अलग कई वीडियो को एक वीडियो बनाना, खराब दृश्यों में सुधार करना, साउंडट्रैक जोड़ना जैसे कार्य एक वीडियो एडिटर के जिम्मे होते हैं। एक वीडियो एडिटर का मुख्य काम किसी भी मोशन पिक्चर, केबल या ब्रॉडकास्ट विजुअल मीडिया इंडस्ट्री के लिए साउंडट्रैक, फिल्म और वीडियो का संपादन करना होता है। वीडियो एडिटर का कौशल ही फाइनल प्रोडक्ट की गुणवत्ता और डिलीवरी तय करता है। इसकी खास बात यह है कि बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी युवा इसे करियर विकल्प के तौर पर चुन सकते हैं। डिजिटल वीडियो एडिटिंग में करियर बनाने के लिए एक व्यक्ति के पास इसके लिए जरूरी कंप्यूटर सिस्टम और प्रोग्राम्स की ट्रेनिंग प्राप्त होना जरूरी है।
क्या करता है एक वीडियो एडिटर
किसी भी फिल्म के निर्माण के दौरान रॉ फुटेज शूट के संपादन का काम एक वीडियो एडिटर के जिम्मे होता है। आधुनिक वीडियो डिजिटल कैमरे के बढ़ते इस्तेमाल से पहले फिल्म फुटेज को असली स्ट्रिप्स (पट्टियों) पर शूट किया जाता था। उस वक्त वीडियो एडिटर्स को हाथ से उन्हें काटना पड़ता था और कई दृश्यों को एक साथ जोड़ना पड़ता था। एक वीडियो एडिटर को आमतौर पर निर्देशक या निर्माता के साथ बैठकर घंटों तक शूट किए गए रॉ फुटेज को देखना होता है। फिर उनके साथ मिलकर यह निर्धारित करना होता है कि कौन-सा दृश्य रखना है और कौन सा हटाना है।
कोर्स का विवरण
वर्तमान में वीडियो या फिल्म एडिटिंग का कोर्स भारत के लगभग सभी प्रतिष्ठित फिल्म संस्थानों में उपलब्ध है। ये कोर्सेज सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा स्तर पर कराए जाते हैं। इन कोर्सेज का लक्ष्य फिल्म एडिटिंग के सभी पहलुओं जैसे नॉन-लीनियर एडिटिंग, प्रोफेशनल एडिटिंग, कैमरा बेसिक्स, ग्राफिक्स और स्पेशल इफेक्ट टेक्नीक्स इत्यादि की शिक्षा छात्रों को मुहैया कराना है। फिल्म या वीडियो एडिटिंग के अंडरग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन के लिए अभ्यर्थियों का 12वीं पास होना जरूरी है और पीजी डिप्लोमा कोर्स के लिए संबंधित स्ट्रीम में ग्रेजुएट होना अनिवार्य शर्त है। वीडियो एडिटर के असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू करने के लिए बैचलर डिग्री काफी है।
रोजगार की संभावनाएं
भारत में हर साल 1000 से ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं, जो भारत को सबसे ज्यादा फिल्म बनाने वाले देशों में से एक बनाती हैं। फिल्म निर्माण के लिए एडिटिंग मौलिक जरूरत है, इसलिए कुशल वीडियो संपादकों की मांग आने वाले दशकों में घटने वाली नहीं है। वीडियो एडिटर के तौर पर एक व्यक्ति फीचर या नॉन फीचर फिल्मों, डॉक्युमेंट्री, विज्ञापनों और टीवी कार्यक्रमों में रोजगार तलाश कर सकता है। मोशन पिक्चर इंडस्ट्री में असिस्टेंट एडिटर से एडिटर के पद तक प्रमोशन पा सकते हैं। इसके अलावा किसी फिल्म स्कूल, टेक्निकल स्कूल या यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का काम भी कर सकते हैं।
वेतन
शुरुआती तौर पर अभ्यर्थी 7,000 से 10,000 रुपये तक कमा सकते हैं। दो से तीन साल का अनुभव प्राप्त करने के बाद वेतन 15,000 से 25,000 रुपये तक बढ़ सकता है। बेहद अनुभवी वीडियो एडिटर छह अंकों वाली उम्दा वेतन की भी उम्मीद कर सकते हैं।
रोजगार के अवसर – फिल्म, टीवी और म्यूजिक प्रोडक्शन, फिल्म और टीवी की मार्केटिंग और डिस्ट्रिब्यूशन, फिल्म प्रोडक्शन, डिस्ट्रिब्यूशन या थियेटर संबंधी पर्सनल या पारिवारिक व्यवसाय,पोस्ट प्रोडक्शन स्टूडियो, कॉर्पोरेट एप्लायर (कॉरपोरेट ट्रेनिंग वीडियो)
प्रमुख संस्थान
सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, कोलकाता
वेबसाइट: srfti.ac.in
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे
वेबसाइट: www.ftiindia.com
एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नोएडा
वेबसाइट:www.aaft.com
सेंटर फॉर रिसर्च इन आर्ट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नई दिल्ली
वेबसाइट: www.craftfilmschool.com
डिपार्टमेंट ऑफ फिल्म एंड टीवी स्टडीज, भारतीय विद्या भवन
वेबसाइट:www.film-tvstudies.com

अब रेलवे स्टेशनों के शौचालयों में सस्ते दामों पर मिलेंगे नैपकिन और कंडोम

नई दिल्ली : रेलवे बोर्ड ने हाल ही में एक नई शौचालय नीति को मंजूरी दी है जिसके तहत अब रेलवे स्टेशनों के अंदर और बाहर बने शौचालयों में न सिर्फ यात्रियों को बल्कि आसपास के क्षेत्र के लोगों को कम दामों पर कंडोम और सेनेटरी नैपकिन मुहैया कराए जाएंगे।
नीति में कहा गया है कि स्टेशन परिसर के अंदर तथा बाहर शौचालयों की कमी के कारण आसपास के क्षेत्रों खासतौर पर झुग्गी बस्ती और गांवों में रहने वाले लोग अकसर खुले में शौच करते हैं जिससे गंदगी फैलती है और इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं। देश की करीब 82 प्रतिशत महिलाएं आज भी सेनेटरी नैपकिन से दूर हैं।
इसमें कहा गया कि इन समस्याओं से निपटने के लिए रेलवे स्टेशन परिसरों का इस्तेमाल महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय वाला सुविधा केन्द्र बनाने में करेगा। यहां मासिक धर्म से जुड़ी साफ-सफाई तथा गर्भ निरोधक के इस्तेमाल की जानकारी दी जाएगी। नई नीति के अनुसार, प्रत्येक सुविधा केन्द्र में कम दामों में महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन और उसके निपटान की सुविधा तथा पुरुषों को कंडोम देने की सुविधा होगी।
नीति के तहत प्रत्येक स्टेशन में ऐसे दो केन्द्र होंगे। पहला स्टेशन के अंदर और दूसरा स्टेशन के बाहर जिससे इसका इस्तेमाल स्टेशन आने वाले और आसपास रहने वाले दोनों की प्रकार के लोग कर सकें। इसके अलावा प्रत्येक केन्द्र में महिला, पुरुष और दिव्यांगजनों के लिए अलग-अलग शौचालय होंगे। इसमें कहा गया है कि 8500 स्टेशनों पर इस प्रकार की सुविधा केन्द्रों के निर्माण के लिए धन सीएसआर कोष से आएगा।