Thursday, July 9, 2026
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पत्रकारों का सूरत ए हाल,,,,कल भी बेहाल, आज भी बदहाल

सुषमा कनुप्रिया
अब 15 साल हो रहे हैं और जब मैं पत्रकारिता में आयी थी तो लड़कियाँ न के बराबर थीं। हालाँकि यह स्थिति अँग्रेजी और बांग्ला के अखबारों के साथ नहीं थी। पत्रकारों की परिभाषा में ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का दबदबा था। लोग हमारे हाथों में कलम नहीं बल्कि कैमरे और बूम तलाशा करते थे। हमसे अक्सर पूछा जाने वाला पहला सवाल ही होता कि हम किस चैनल से जुड़े हैं और जैसे ही मैं बताती कि मैं चैनल में नहीं बल्कि अखबार में काम करती थी तो सबके चेहरे लटक जाया करते थे। पत्रकार, वह भी महिला पत्रकार और वह भी हिन्दी अखबार की पत्रकार…स्थिति तो विचित्र ही थी। तब महिलाओं की उपस्थिति को सहजता से नहीं लिया जाता था मगर स्थिति तो सबके लिए ही एक जैसी थी मगर मेरे लिए समस्या दोहरे स्तर पर थी। वैसे ही जैसे हिन्दी मीडिया में काम कर रही अन्य लड़कियों के लिए होती थी मगर अब स्वीकृति बढ़ जाने से स्थिति थोड़ी बेहतर हुई थी।
मुझे याद है कि जब मैंने अपने दोस्तों और परिचितों को बताया था कि मुझे अखबार में नौकरी मिली है तो मुझे सावधान और सजग करने वाले लोग अधिक थे। उनका मानना था कि मीडिया में अच्छे लोग काम नहीं करते और लड़कियाँ तो बिलकुल नहीं क्योंकि पत्रकारों का सामना हर तरह के लोगों से होता है। मैं तब बहुत दब्बू टाइप हुआ करती थी क्योंकि पत्रकारिता में आने के पहले मेरी मंजिल कॉलेज से घर ही थी। हमारे घर में खासकर मेरे घर में लड़कियों के नौकरी करने की परम्परा नहीं थी और शिक्षण को आदर्श कार्य माना जाता था क्योंकि वहाँ सुरक्षा और तय ढर्रा था मगर मैंने जो क्षेत्र चुना या यूँ कहूँ कि जिस क्षेत्र ने मुझे चुना, वहाँ समय की तो सीमा ही नहीं थी। 2004 के बाद कोलकाता के हिन्दी मीडिया संस्थानों में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी।

कुछ बड़े संस्थानों को छोड़ दें तो अधिकतर छोटे अखबार एक या दो दड़बेनुमा कमरों में चलते थे, आज भी चलते हैं। मीडिया संस्थानों को तब भी महिलाओं को निर्णायक पदों पर देखने में ऐतराज था, आज भी है। महिला पत्रकारों का अधिकतर समय संशय में गुजरता है और उनका अधिकतर डेजिग्नेशन अधिकतर मामलों में वरिष्ठ संवाददाता तक सीमित रहता है। जो संस्थान महिलाओं को कथित तौर पर प्रमुखता देते रहे हैं, वहाँ भी सुविधाओं के नाम पर शोषण अधिक है। आप अपनी रीढ़ की हड्डी तोड़कर उनके हवाले कर दें तो चीफ रिपोर्टर क्या ब्यूरो चीफ भी बनाये जा सकते हैं और ऐसा करने वाले लोग हैं जिनमें लड़कियाँ भी शामिल हैं। जिनको पत्रकारिता का सही अर्थ तक नहीं पता और वह अपने आकाओं के लिए काम निकालने का माध्यम भर हैं। वे सम्पादकों के निजी व्यवसाय सहयोगियों में अपनी स्वेच्छा से तब्दील हो चुकी हैं मगर आज मान्यता और तथाकथित पदोन्नति की सीमा पार करने वाले लोग वहीं हैं और ऐसी लड़कियाँ हैं। सवाल यह है कि इससे पत्रकारिता का क्या भला हुआ और लड़कियाँ कहाँ तक मानसिक और वैचारिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकी हैं? अगर ये आकलन करें तो आप सिर पीटने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते। मैंने आरम्भिक दिनों में पत्रकारिता की उड़ान देखी है तो स्याह अँधेरे भी देखे हैं। बड़े से बड़े पत्रकारों को चीफ रिपोर्टर से सम्पादक बने महानुभवों को थर – थर काँपते देखा है। इन सम्पादकों को अखबार के मालिकों के सामने हाथ जोड़ते, भागते और मातहतों पर हाथ उठाकर शेखी बघारते देखा है। सम्पादक साम, दाम, दंड भेद की नीति से पत्रकारों को लड़वाते, वरिष्ठ पत्रकारों की बेइज्जती कनिष्ठ पत्रकारों से करवाते देखा है। आज ऐसे सम्पादक सर्वेसर्वा हैं तो हिन्दी पत्रकारिता की उम्मीद ही खुद को धोखा देने की तरह है।
प्रगति के नाम पर 2 दर्जन से अधिक मीडियाकर्मियों को इसी शहर में रातों – रात बाहर का रास्ता दिखाया गया मगर एक भी आवाज नहीं उठी। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उनकी उम्र हो चुकी है तो सवाल यह है कि हमारी नीतियों में क्या वरिष्ठ नागरिकों के लिए जगह सिर्फ कागजों पर है? आपने पूरी व्यवस्था को बदलने के लिए उन तमाम लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जो आपके संस्थान की नींव की ईंट थे। आपने उनको प्रशिक्षण क्यों नहीं दिलवाया? क्या सीखना वरिष्ठों के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। सवाल यह है कि कितने मीडिया संस्थान पत्रकारों की कार्य कुशलता बढ़ाने के लिए किसी कार्यशाला अथवा सेमिनार आयोजित करते हैं…इस शहर के हिन्दी मीडिया संस्थानों में तो एक भी नहीं है। मैंने एक घटना तो यहाँ तक सुनी कि एक पूर्व कर्मी ने जब संस्थान में जाना चाहा तो उसे धक्के मारकर निकलवाया। कुछ स्वनामधन्य अखबारों ने तो पूर्व सम्पादकों के सन्दूक भी खुलवाकर देखे हैं…ऐसा मैं नहीं कहती। जगजाहिर कहानी है और पत्रकारिता के उत्कर्ष की बातें करते हैं तो यह क्या विडम्बना नहीं है?
जिलों की खबरें आती हैं, गलतियों से भरपूर होती हैं और जब उनसे मैंने ध्यान देने को कहा तो पता चला कि इन स्ट्रिंगरों को नाम मात्र की राशि मिलती है तो उनका दो -टूक उत्तर भी होता है कि जितना मिलेगा, उसी के हिसाब से काम करेंगे। आपने पत्रकारों को बुनियादी सुविधायें तक नहीं दीं तो आप उनसे उम्मीद ही नहीं कर सकते कि वह कुछ बेहतर और खोजपरक खबरें करें। जिला संवाददाताओं की स्थिति तो और भी खराब है। नाममात्र के पैसे और वह भी जब समय पर न मिलें तो उसके पास दूसरा विकल्प तलाशने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता। ऐसे पत्रकार ही दूसरे व्यवसाय भी करते हैं और दलाली तथा फिरौती भी। आप उनको कुछ कह नहीं सकते हैं क्योंकि आपने उनको समुचित सुविधायें नहीं दी हैं।
पत्रकारिता में सम्पादक आज सर्वेसर्वा नहीं है। विज्ञापन के अनुकूल नीतियाँ बनानी पड़ती हैं। पत्रकार होना संवाददाता, सब एडिटर भर नहीं है बल्कि परदे के पीछे आपके संस्थान को चमकाने के लिए जो लोग काम कर रहे हैं, वह भी आपकी दुनिया और पत्रकारिता का हिस्सा हैं। । मान्यता सिर्फ संवाददाताओं को मिलती है जो कि अधिक से अधिक 60 प्रतिशत हो भी तो मान्यता प्राप्त पत्रकार अधिकतम प्रतिशत 30 प्रतिशत भर हैं तो फिर ये जो 70 प्रतिशत हिस्सा है,..उनके हिस्से क्या आया। इनमें गैर मान्यता प्राप्त संवाददाता, सब एडिटरछायाचित्रकार, पेजीनेटर, वीडियो एडिटर, सर्कुलेशन से लेकर विज्ञापन तक के लोग शामिल हैं..ये सब हाशिये पर क्यों हैं…?
पत्रकारों से मारपीट, बदसलूकी व हत्या
सरकार केन्द्र की हो या राज्य की, उसका उद्देश्य पत्रकारों से काम निकालना होता है और इसके बाद पक्ष हो या विपक्ष, हर जगह मीडिया को पीटा जाता है। बंगाल में ऐसी न जाने कितनी घटनाएं हो चुकी हैं। त्रिपुरा के एक निजी चैनल में काम करने वाले पत्रकार शांतनु भौमिक की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के शोध के अनुसार देश में साल 1992 से अब तक 91 पत्रकारों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। विडंबना यह है कि सिर्फ 4 प्रतिशत मामलों में ही इंसाफ मिला। 96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को किया गया माफ 96 प्रतिशत मामलों में अपराधियों को माफी मिल गई। 23 मामलों में हत्या के पीछे छिपा मंसूबा नहीं पता चला। सिर्फ 38 मामलों में मोटिव स्पष्ट हो पाया। जिनकी मौत का कारण स्पष्ट हुआ उनमें कई को इंसाफ नहीं मिला। कुछ को मिला तो आधा अधूरा। सबसे ज्यादा हत्या राजनीतिक कारणों से हुई हत्या सबसे ज्यादा 47 प्रतिशत पत्रकारों की मौत राजनीति क्षेत्रों को कवर करने के दौरान हुई है। उसे बाद भ्रष्टाचार को उजागर करने वाल 37 प्रतिशत पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया गया। 21 प्रतिशत अपराध, 21 प्रतिशत बिजनेस व 21 प्रतिशत संस्कृति संबंधित क्षेत्रों को कवर करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया गया। वहीं मानवाधिकार को लेकर 18 प्रतिशत पत्रकारों की मौते हुईं। आपको बता दें कि जिन पत्रकारों की हत्या हुई वह एक साथ दो तीन क्षेत्रों को देखते थे, इसलिए आंकड़ा 100 प्रतिशत से ऊपर है। महिलाओं को तो यौन उत्पीड़न से गुजरना पड़ता है और बड़ी -बड़ी हस्तियाँ भी ऐसा करने में पीछे नहीं हैं।


प्रिंट पत्रकारों को सबसे ज्यादा बनाया गया निशाना
लगभग 88 प्रतिशत पत्रकारों ऐसे पत्रकारों को निशान बनाया गया जो प्रिंट मीडिया में काम करते थे। 12 प्रतिशत टीवी पत्रकारों की हत्या की गाई। वहीं 8 प्रतिशत रेडियो व इंटरनेट पत्रकारिता करने वालों का निशाना बनाया गया। हत्या का शक राजनीतिक दलों पर सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्या के बाद जांच में पाया गया कि 36 फीसदी पत्रकारों कि हत्या में राजनीतिक दलों के हाथ होने की आशंका जताई गई। 28 फीसदी हत्याओं में किसी आपराधिक समूह पर शक किया गया। स्थानीय लोगों के शामिल होने की आशंका 12 फीसदी हत्याओं में हुई। वहीं 12 फीसदी हत्याओं में किसी सरकारी अधिकारी व पैरामिलिट्री पर शक किया गया। पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत दुनिया में 14वें स्थान पर पूरी दुनिया में ऐसे कई देश है जहां पर पत्रकारों की मौत के बाद उन्हें इंसाफ नहीं मिला। भारत ऐसे देशों की सूची में 14वीं स्थान पर है। इन देशों की सूची में सबसे ऊपर सोमानिया और इराक है। इसके अलावा पाक, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, श्रीलंका जैसे देश भी शामिल है। इन सभी देशों के 83 फीसदी मामले अब भी अनसुलझे हें 96 फीसदी मामलों में स्थानीय पत्रकारों को निशाना बनाया गया था। प्रत्येक दस में से चार पत्रकारों को बंदी बनाया गया या पहले धमकियां मिली थी। (सन्दर्भ – साभार समाचार फॉर मीडिया)

शांतनु भौमिक को भी मार डाला गया

भारत में क्षेत्रीय भाषाओं में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सबसे ज़्यादा ख़तरे की ज़द में रहते हैं क्योंकि वे कम चर्चित होते हैं। साल 2017 में बेंगलुरु में एक पत्रकार गौरी लंकेश को उनके घर के बाहर ही गोली मार दी गई। इसी तरह त्रिपुरा में एक क्राइम रिपोर्टर सुदीप दत्ता भौमिक की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद कई अख़बारों ने इसके विरोध में अपने संपादकीय हिस्से को खाली छोड़ दिया था। कितनी सरकारें, संस्थाएं और लोगों मीडिया को बचाने के लिए सड़क पर उतरे, यह एक सवाल है क्योंकि चौथा खम्भा बचेगा ही नहीं तो बाकी तीन खम्भों की हिफाजत कैसे होगी?
इतिहास भी अधूरा और उपेक्षित
हिन्दी पत्रकारिता की दुनिया का इतिहास दरअसल सम्पादकों और उनके अखबारों का इतिहास है। सवाय है कि क्या युगल किशोर सुकुल ने अकेले अखबार निकाला होगा जो कि सम्भव ही नहीं है तो बाकी लोग कहाँ गये? कृष्ण बिहारी मिश्र की पुस्तक सम्पादकों पर बात करती है, संवाददाताओं, छायाकारों, पृष्ठ सज्जाकारों और प्रिटिंग के इतिहास पर खास खोज नहीं हुई। हिन्दी का पहला अखबार जहाँ निकला, आज आमड़तल्ला गली में वह मकान गुम है। बहुत से पत्रकार गरीबी में मरे और आज भी जी रहे हैं। पहला पेजिनेटर, पहली महिला पत्रकार, छायाकार, सब मौन हैं। क्या मीडिया संस्थानों में इन पर शोध नहीं होना चाहिए?
दुनिया में पत्रकारों की स्वतन्त्रता हाशिये पर
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में इरिट्रिया सबसे निचली पायदान पर है। तानाशाही शासन वाले इस पूर्व अफ्रीकी देश के खस्ताहाल की खबरें बाहर नहीं निकलतीं। कई पत्रकारों को मजबूरन देश छोड़ना पड़ा है। इरिट्रिया के बारे में निष्पक्ष जानकारी पाने के लिए पेरिस से चलने वाले रेडियो एरीना को एकलौता स्रोत माना जाता है।
तानाशाह के इशारे पर – पूरी दुनिया की नजर से छिपे हुए उत्तरी कोरिया में भी प्रेस की आजादी नहीं पाई जाती। शासक किम जोंग उन की मशीनरी मीडिया में प्रकाशित सामग्री पर पैनी नजर रखती है। लोगों को केवल सरकारी टीवी और रेडियो चैनल मिलते हैं और जो लोग अपनी राय जाहिर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें अक्सर राजनैतिक कैदी बना दिया जाता है।
तुर्कमेनिस्तान पर नजर – केवल एक अखबार है और इस अखबार के संपादकीय भी छपने से पहले जांचे जाते हैं। हाल ही में आए एक नए कानून से लोगों को कुछ विदेशी मीडिया संस्थानों की खबरें तक पहुंच मिली है। इंटरनेट और तमाम वेबसाइटों पर सरकार की नजर होती है।
आलोचकों का सफाया – विएतनाम में स्वतंत्र पत्रकारिता का कोई अस्तित्व ही नहीं है. सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी पत्रकारों को बताती हैं कि क्या प्रकाशित होगा। (भारतीय वामपंथी गौर से जरूर पढ़ें जो कि भारत में लोकतंत्र की दुहाई देते हैं)। कई मीडिया संस्थानों के पत्रकार, संपादक, प्रकाशिक खुद ही पार्टी के सदस्य हैं। अब ब्लॉगरों पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है। पार्टी के विरुद्ध लिखने पर जेल में डाल दिया जाता है.।
चीन में नहीं आजादी – रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि चीन दुनिया में पत्रकारों और ब्लॉगरों के लिए सबसे बड़ी जेल है। किसी भी न्यूज कवरेज के पसंद ना आने पर शासन संबंधित पक्ष के विरुद्ध कड़े कदम उठाता है। विदेशी पत्रकारों पर भी भारी दबाव है और कई बार उन्हें इंटरव्यू देने वाले चीनी लोगों को भी जेल में बंद कर दिया जाता है।
सीरिया में सुलगते हालात — सीरिया में अब तक ऐसे कई पत्रकारों को मौत की सजा दी जा चुकी है, जो असद शासन के खिलाफ हुई बगावत के समय सक्रिय थे। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स ने सीरिया को कई सालों से प्रेस की आजादी का शत्रु घोषित किया हुआ है। वहां असद शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाला अल-नुसरा फ्रंट और आईएस ने बदले की कार्रवाई में सीरिया के सरकारी मीडिया संस्थान के रिपोर्टरों पर हमले किए और कईयों को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतारा।

चित्र साभार

भारत भी पीछे – इस देश में आपातकाल लग चुका है तो सेंशरशिप का कोपभाजन अखबारों को भी बनना पड़ा था। आए दिन हत्यायें आम बात हैं। लोकतांत्रिक और बहुजातीय देश होने के बावजूद भारत प्रेस फ्रीडम की सूची में शामिल 180 देशों में 136वें नंबर पर है. उसके आस पास के देशों में होंडुरास, वेनेज्वेला और चाड जैसे देश हैं।

बात अब मजीठिया पर
उच्चतम न्यायालय ने पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन पुनर्निर्धारण के लिए गठित मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को शुक्रवार को बरकरार रखते हुए कर्मचारियों को परिवर्तित वेतन देने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारियों को परिवर्तित वेतन 11 नवंबर, 2001 से मिलना चाहिए। सरकार ने इसी तारीख को बोर्ड की सिफारिशें अधिसूचित की थीं। न्यायालय ने कहा कि कर्मचारियों को नया वेतन अप्रैल, 2014 से मिलेगा और नियोक्ता को 1 साल के भीतर 4 किस्तों में बकाया राशि का भुगतान करना होगा। न्यायाधीशों ने कहा कि हम सिफारिशों को वैध ठहराते हैं। न्यायाधीशों ने कहा कि बोर्ड ने अपनी सिफारिशें देने के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया था और उसके तथा उसके गठन के बारे में लगाए गए आरोप सही नहीं हैं। न्यायालय ने बोर्ड के गठन की वैधानिकता और इसकी सिफारिशों को चुनौती देने वाली विभिन्न समाचार-पत्रों के प्रबंधकों की याचिकाएं खारिज कर दीं। न्यायालय ने कहा कि अतिरिक्त वेतन (वेरिएबल पे) के बारे में बोर्ड की सिफारिशें भी उसके अधिकार क्षेत्र में थीं। न्यायालय ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता कि वेतन संरचना अनुचित है। न्यायालय ने इस साल जनवरी में समाचार-पत्रों की याचिकाओं पर सुनवाई पूरी करने के बाद कहा था कि निर्णय बाद में सुनाया जाएगा। श्रम मंत्रालय ने समाचार पत्र उद्योग की आपत्तियों के बावजूद 2007 में मजीठिया वेतन बोर्ड का गठन किया था और इसके बाद जनवरी, 2008 से कर्मचारियों को मूल वेतन का 30 फीसदी तदर्थता के आधार पर अंतरिम राहत देने की घोषणा की गई थी। भारी वित्तीय बोझ के बावजूद समाचार-पत्र उद्योग ने इसे लागू किया था। वेतन बोर्ड ने 31 दिसंबर, 2010 को अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी थीं जिन्हें केंद्र ने कुछ संशोधनों के साथ 11 नवंबर, 2011 को अधिसूचित किया था। ये खबर तमाम बड़े अखबारों और मीडिया संस्थानों ने दबायी और समाचार कहीं नहीं दिखा। मान्यता प्राप्त या गैर मान्यता प्राप्त, सब पत्रकारों की स्थिति एक ही है….मनाइए पत्रकारिता दिवस….।
(सन्दर्भ – साभार समाचार फॉर मीडिया, डी डब्ल्यू, वेबदुनिया)

पुराना किला में प्रदर्शित की जाएगी हड़प्पा, मोहनजोदड़ो युग की कलाकृतियां

नयी दिल्ली : दिल्ली के ऐतिहासिक पुराना किला में दी सेन्ट्रल ऐन्टिक्वटी क्लेक्शन (सीएसी) प्रखंड को एक आधुनिक गैलरी में बदला जा रहा है जिसमें पहली बार हड़प्पा , मोहनजोदाड़ो , तक्षशिला और चन्हूदड़ो की कलाकृतियों और मिट्टी के बर्तनों को प्रदर्शनी में रखा जाएगा। एक सरकारी बयान में बताया गया कि मध्य एशिया और भारतीय स्थल जैसे कि कालीबंगन , हस्तिनापुर , अरिकामेडु , तमलुक जैसे भारतीय स्थलों की कलाकृतियां भी यहां कला प्रदर्शनी में रखी जाएंगी। बयान में बताया गया है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) यहां संरक्षण और उन्नयन का काम कर रहा है। दो लाख से अधिक कलाकृतियों और बर्तनों को सीएसी की प्रदर्शनी में प्रस्तुत किया जाएगा। बयान में बताया गया है कि पुराना किला के आसपास खाई वाले क्षेत्र को फिर से ठीक करने के लिए आवश्यक विकास कार्य शुरू किया गया है और जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा।

निपाह वायरस, लक्षण और बचाव

केरल में चमगादड़ से फैलने वाले खतरनाक निपाह वायरस ने आतंक मचा रखा है। अब तक करीब एक दर्जन लोग इसकी चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। कर्नाटक, ओडिशा और हिमाचल प्रदेश में भी इसके फैलने की खबरों से हड़कंप मच गया है। वहीं इसने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की भी चिंता बढ़ा दी है। मंत्रालय की ओर से एक एडवाइजरी जारी कर सभी राज्यों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है।
वहीं, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने एक कमेटी बनाई है जो बीमारी की तह तक जाने में जुटी है। वैसे यह एक तरह का दिमागी बुखार है, जिसकी चपेट में आकर लोगों की जान जा रही है। यह संक्रमित इंसान से स्‍वस्‍थ मनुष्‍य तक बड़ी आसानी से फैल सकता है। बताया जा रहा है कि निपाह वायरस संक्रमित चमगादड़ों, संक्रमित सुअर या संक्रमित व्‍यक्ति के संपर्क में आने से फैलता है।
क्‍या है निपाह वायरस – विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक निपाह एक ऐसा वायरस है जो चमगादड़ों से इंसानों में फैलता है। यह जानवरों और इंसानों दोनों में गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है। इस वायरस का मुख्‍य स्रोत फल खाने वाले चमगादड़ (फ्रूट बैट) हैं। इन्हें फ्लाइंग फॉक्स के नाम से भी जाना जाता है।

लक्षण – निपाह वायरस के लक्षण दिमागी बुखार की तरह ही हैं। बीमारी की शुरुआत सांस लेने में दिक्‍कत, चक्कर आना, तेज सिरदर्द और फिर बुखार से होती है है। इसके बाद बुखार दिमाग तक पहुंच जाता है, जिससे मरीज की मौत भी हो सकती है।

इलाज – हालांकि, अब तक इस भयानक निपाह वायरस का कोई वैक्‍सीन नहीं बन पाया है। बचाव ही इसका एकमात्र इलाज है। इससे संक्रमित रोगी की उचित देखभाल और डॉक्‍टरों की कड़ी निगरानी में रखा जाना चाहिए।

निपाह वायरस के कैसे बचें?

1. चमगादड़ों की लार या पेशाब के संपर्क में न आएं
2. खासकर पेड़ से गिरे फलों को खाने से बचें
3. संक्रमित इंसानों और पशुओं खासकर सुअरों के संपर्क में न आएं
4. निपाह वायरस के अधिक प्रभाव वाले इलाकों में जाने से बचें
5. इस्तेमाल में नहीं लाए जा रहे कुओं में पर जानें से बचें
6 केरल सहित उसके पड़ोसी राज्यों से आने वाले फल जैसे केला, आम व खजूर खाने से परहेज करें
7. फलों को पोटाश वाले पानी में धोकर खाएं
8. निपाह वायरस के लक्षण पाए जाने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं

मुस्लिम युवक को बचाने के लिए भीड़ से भिड़ा सिख इन्स्पेक्टर

नैनीताल : भीड़ से एक मुस्लिम शख्स की जान बचाने वाले उत्तराखंड पुलिस के इंस्पेक्टर गगनदीप सिंह का कहना है कि मैं तो केवल अपनी ड्यूटी कर रहा था। रामनगर पुलिस स्टेशन में बतौर सब इंस्पेक्टर तैनात गगन सोशल मीडिया पर हीरो बने हुए हैं। उधम सिंह नगर के रहने वाले 28 पुलिस अधिकारी ने बताया कि जब भीड़ ने उस जोड़े पर हमला किया तो वे गिरजा मंदिर के पास नदी के किनारे बैठे थे। गिरजा मंदिर नैनीताल जिले में रामनगर शहर से करीब 15 किमोमीटर दूर है। उन्होंने बताया, ‘यह घटना 22 मई दोपहर करीब 12 बजे की है, जब गंगा दशहरा मनाने के लिए काफी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पर इकट्ठा हो रहे थे। मैं मंदिर परिसर में ड्यूटी पर था, तभी मैंने लोगों का शोर सुना और देखा कि भीड़ 24 वर्षीय मुस्लिम युवक इरफान को मंदिर की तरफ ला रही है। उन्होंने नदी के किनारे उसके साथ मारपीट भी की थी। नदी का किनारा मंदिर से करीब 50 मीटर नीचे है।’ सिंह ने बताया कि मुझे उस युवक की जान को खतरा लगा और मैं तुरंत भीड़ की तरफ बढ़ा। उन्होंने बताया, ‘मैंने मेरे शरीर का इस्तेमाल उस युवक लिए ढाल के तौर पर किया और मैं गुस्साई भीड़ से उसे दूर ले जाने की कोशिश कर रहा था।’

सिंह ने बताया कि उसी वक्त मैंने महिला इंस्पेक्टर से लड़की को मंदिर परिसर के दूसरी तरफ से दूर ले जाने के लिए कहा। हम लोग उस जोड़े को पुलिस स्टेशन ले आए, ताकि वे लोग दोबारा उन पर हमला ना कर पाएं। सिंह ने बताया, ‘हमने उनसे पूछताछ की। दोनों बालिग थे। लड़के की उम्र करीब 24 साल थी और वहीं लड़की 18 साल से ऊपर थी। कुछ समय बाद जब हम सुनिश्चित हो गए तो हम लोग ने उन्हें सुरक्षा देते हुए दूर छोड़ आए।’
पुलिस विभाग द्वारा उनकी बहादुरी के लिए 2500 रुपए का इनाम दिए जाने पर सिंह ने कहा, ‘मैं केवल मेरी ड्यूटी कर रहा था। मैं उस गुस्साई भीड़ को इसकी मंजूरी नहीं दे सकता था कि वह उस शख्स को नुकसान पहुंचाए।’

11,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेसवे का उद्घाटन

बागपत : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11,000 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेसवे को आज जनता को समर्पित किया। इस एक्सप्रेसवे का मुख्य मकसद दिल्ली में जाम और प्रदूषण की समस्या से निपटना है। इससे अब भारी वाहन दिल्ली में प्रवेश के बिना बाहर – बाहर से अपने गंतव्य को जा सकेंगे। इस मौके पर बुनियादी ढांचा विकास को अपनी सरकार की प्राथमिकता बताते हुए मोदी ने कहा कि देश में 28,000 किलोमीटर राजमार्गों का जाल फैलाने पर तीन लाख करोड़ रुपये की राशि खर्च की जा चुकी है। उन्होंने कहा कि राजमार्ग , रेलवे , हवाई यातायात और आई – वे (सूचना हाईवे) उनकी सरकार की प्राथमिकता है। मोदी ने कहा कि देश में राजमार्ग निर्माण की गति अब 27 किलोमीटर प्रतिदिन पर पहुंच गई है जो पिछली कांग्रेस सरकार में 12 किलोमीटर थी। जबकि पिछले साल करीब 10 करोड़ लोगों ने हवाई यात्रा की। ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेस वे की लंबाई 135 किलोमीटर है और इसे 500 दिन के भीतर तैयार किया गया है।

बच्चों से मिलने की अधूरी चाह लिए अभिनेत्री गीता कपूर ने कहा अलविदा

मुम्बई : फिल्म पाकीजा में राजकुमार की दूसरी पत्नी का किरदार निभाने वाली गीता कपूर ने गत शनिवार की सुबह दुनिया को अलविदा कह दिया। बताया जा रहा है कि उन्होंने सुबह 9 बजे वृद्धाश्रम में आखिरी सांस ली। उनकी मौती की खबर की पुष्टि प्रोड्यूसर अशोक पंडित ने अपने ट्वीटर हैंडल पर की है। उन्होंने गीता कपूर का एक वीडियो अपलोड किया है, जिसमें उनका शव नजर आ रहा है। इतना ही नहीं अशोक पंडित ने गीता की मौत की खबर देते हुए ट्वीट भी किया है। उन्होंने लिखा, ’57 साल की गीता कपूर के पार्थिव शव के पास खड़ा हूं, जिन्हें एक साल पहले उनके बच्चे एसआरवी असपताल में छोड़ कर चले गए थे। ओल्ड एज होम में उन्होंने आज अपनी आखिरी सांस ली। हमने उनका काफी ख्याल रखने की कोशिश की, लेकिन बेटे और बेटी का इंतजार उन्हें दिन प्रतिदन कमजोर बना रहा था।’
इतना ही नहीं अशोक ने कहा- पिछले एक साल से वह अपने बच्चों का इंतजार कर रही थीं, लेकिन कोई उनसे मिलने नहीं आया। पिछले शनिवार हमने उन्हें खुश करने के लिए एक ब्रेकफास्ट अरेंज किया था। वह ठीक थीं, लेकिन खुश नहीं थीं। वह बस अपने बच्चों को देखना चाहती थीं। और इसी आखिरी ख्वाहिश के साथ उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

बुकिंग से 24 घंटे के भीतर फ्लाइट टिकट कैंसिल करने पर कोई चार्ज नहीं

नई दिल्ली : हवाई सफर करने वाले अब बिना किसी शुल्क के 24 घंटे के भीतर टिकट कैंसिल कर सकते हैं। हालांकि शर्त यह है कि फ्लाइट की उड़ान के निर्धारित समय में 4 घंटे का समय बाकी होना चाहिए।

हवाई सफर करने वाले यात्रियों के लिए अच्छी खबर है। विमानन मंत्रालय द्वारा दिए गए प्रस्ताव के मुताबिक यदि कोई यात्री टिकट बुकिंग करने के 24 घंटे के भीतर ही टिकट कैंसिल करता है, तो उसे कोई शुल्क नहीं देना होगा। हालांकि शर्त यह हैं कि फ्लाइट की उड़ान के निर्धारित समय में 4 दिन बाकी होने चाहिए। विमानन मंत्री जयंत सिन्हा ने ये जानकारी दी। साथ ही पैसेंजर चार्टर का ड्राफ्ट जारी करते समय सरकार ने ये भी कहा कि कैंसिलेशन फीस किसी भी हालत में बेस फेयर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। डीजीसीए के डीजी बीएस भुल्लर ने कहा कि पहले ट्रेवल एजेंट की कैंसिलेशन फीस बेस फेयर से ज्यादा होती थी। नए चार्टर के मुताबिक ये फीस एजेंट की कैंसिलेशन फीस मिलाकर भी बेस फेयर से ज्यादा नहीं होगी।

इस बारे में बात करते हुए एविएशन सेक्रेटरी आर एन चौबे ने कहा कि ये ड्राफ्ट 1 महीने में तैयार हो जाएगा। इसके अलावा फ्लाइट में वाईफाई के सवाल पर चौबे ने कहा कि टेलीकॉम मंत्रालय एक हफ्ते के भीतर लाइसेंस की शर्तों पर फैसला करेगा। यात्री 2 महीने के भीतर फ्लाइट में वाईफाई की सुविधा का उपयोग कर सकेंगे।

नए नियमों के मुताबिक अगर मूल शेड्यूल से 24 घंटे पहले फ्लाइट की देरी की जानकारी दी जाती है और फ्लाइट 4 घंटे से ज्यादा लेट है, तो एयरलाइंस को यात्री को टिकट का पूरा रिफंड देने का विकल्प देना होगा। अगर फ्लाइट देरी के कारण अगले दिन उड़ती है, तो यात्रियों को फ्री में होटल की सुविधा देनी होगी। अगर फ्लाइट लेट होने के कारण यात्री की कनेक्टिंग फ्लाइट छूट जाती है तो एयरलाइंस को पेनल्टी देनी होगी। ये पेनल्टी 20 हजार रुपए तक हो सकती है।

पहली बार सरकार ने टारमेक (tarmac) का नियम लागू किया है। अगर किसी कारण से फ्लाइट 2 घंटे से ज्यादा खड़ी रहती है यात्रियों को फ्लाइट से उतारना होगा। अगर फ्लाइट 1 घंटे से ज्यादा खड़ी रहती है तो एयरलाइंस को यात्रियों को खाने-पीने का सामान देना होगा। इसके अलावा ड्राफ्ट में प्रस्ताव है कि दिव्यांग के लिए फ्लाइट में पर्याप्त लेग स्पेस के साथ ही फ्री रिजर्व सीट भी होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर एयरलाइंस इस तरह के बदलाव का विरोध कर रही थी। आपको बता दें कि अभी ये विमानन मंत्रालय का प्रस्ताव हैं, इस प्रस्ताव पर जनता के सुझावों के लिए 30 दिन तक का समय दिया गया है। इस प्रस्ताव पर फैसला 15 जुलाई तक लिया जा सकता है।

दीपिका पादुकोण बनेंगी बॉलीवुड की पहली ‘सुपरवुमन’

नई दिल्ली : बॉलीवुड की पद्मावती दीपिका पादुकोण ने संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ में अभिनय से यह साबित कर दिया था कि वह बॉलीवुड की बेहतरीन अभिनेत्री हैं और उन्हें टक्कर देना मुश्किल है। जिसके बाद दीपिका के फैंस बेसब्री से उनकी अगली फिल्म का इंतजार कर रहे हैं।

वही सूत्रों के मुताबिक दीपिका जल्द ही महिला सुपरहीरो फ्रैंचाइजी में काम करने वाली हैं। बताया जा रहा है कि यह बॉलीवुड की पहली फिल्म होगी जिसमें किसी महिला को सुपरवुमन के किरदार में देखा जायेगा। अगर ऐसा होता है कि यह बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरहीरो फिल्म होगी और इसका बजट बॉलीवुड की अब तक की फिल्मों में सबसे ज्यादा होगा।

अंग्रेजी अखबार ने इस बात का खुलासा किया है कि दीपिका ने जो फिल्म साइन की है उसकी तैयारी वो अभी से करने लगी हैं। दीपिका मार्शलआर्ट्स का प्रशिक्षण लेने की योजना बना रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, फिल्म में दीपिका पादुकोण का करेक्टर हॉलीवुड फिल्म ‘वंडर वुमन’ से प्रेरित है। फिलहाल फिल्म का बजट 300 करोड़ बताया जा रहा है और फिल्म में कई निवेशक निवेश कर रहे हैं।

बता दें कि दीपिका ने हॉलीवुड में अपना डेब्यू विन डीजल के साथ फिल्म ट्रिपल एक्स: द रिटर्न ऑफ जेंडर कैग से किया था। कहा जा रहा है कि दीपिका जल्द ही एक और हॉलीवुड फिल्म साइन करने वाली हैं। दीपिका और इरफान डायरेक्टर विशाल भारद्वाज की अगली फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाले थे, लेकिन इरफान की तबीयत खराब होने के बाद इस फिल्म की शूटिंग कैंसल हो गई इसके बाद अब दीपिका हॉलीवुड फिल्मों पर ध्यान दे रही हैं।

‘कैंसर को लाइलाज बीमारी समझना गलत : मनीषा कोइराला

नई दिल्ली : एम्स में पहली बार पर्यावरणीय, व्यावसायिक कारणों पर दो दिवसीय सम्मेलन शुरू हुआ। इंडियन सोसायटी ऑफ क्लीनिकल आंकोलॉजी की ओर से आयोजित इस सम्मेलन के पहले दिन फिल्म अभिनेत्री मनीषा कोइराला भी शामिल हुई। वह कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से उबर चुकी हैं। सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने अनुभव बताए। उन्होंने कहा कि कैंसर को लाइलाज न समझें। कैंसर से बचाव के लिए जीवन में पांच चीजें अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि कैंसर को लेकर लोगों के मन में गलत धारणा है। लोग सोचते हैं कि कैंसर मतलब लाइलाज बीमारी, जबकि यह ठीक हो सकती है। दिक्कत यह है कि इस बीमारी से उबरकर दोबारा जीवन शुरू करने वाले बहुत कम लोग सामने आकर बोलने को तैयार होते हैं। मुझे हुई परेशानी के बारे में लोग जानते हैं, पर मेरा मानना है कि इससे कुछ अच्छा भी हुआ, जिसे कोई नहीं जानता। पहले मैं हर छोटी परेशानी से अवसाद में चली जाती थी, पर अब लगता है कि किसी भी समस्या से निपट सकती हूं। इस बीमारी के बाद महसूस हुआ कि जीवन शैली ठीक नहीं थी।

12 बच्चों की मां ने 89 साल की उम्र में ली स्नातक की डिग्री

लिंचबर्ग : उत्तरी कैरोलिना के ग्रामीण क्षेत्र में पैदा हुईं 12 बच्चों की मां एला वॉशिंगटन ने 89 वर्ष की उम्र में स्नातक की डिग्री हासिल की है। कुछ साल पहले एला ने वर्जीनिया के लिंचबर्ग में लिबर्टी विश्वविद्यालय में दाखिला लेने का फैसला किया। लिबर्टी विश्वविद्यालय ने कहा कि अंततः एला स्नातक स्तर पर चली गईं, उन्होंने पिछले शनिवार को अपनी स्नातक की डिग्री ग्रहण की। लिबर्टी विश्वविद्यालय के 2018 बैच की सबसे उम्रदराज स्नातक एला ने कहा कि शिक्षा आपको अपने लिए और आपके आने वाले लोगों के जीवन को सर्वश्रेष्ठ बनाने में मदद करती है।

छठी कक्षा में छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई
परिवार के खेतों में काम करने के लिए एला को छठी कक्षा में स्कूल छोड़ना पड़ा था। जब उसने परिवार शुरू किया तो वह वॉशिंगटन डीसी चलीं गईं। वहां परिवार पालने के लिए उन्होंने विभिन्न प्रकार की नौकरियां कीं। पेंटागन में एक संरक्षक से लेकर एक वयस्क डेकयर में नर्सिंग सहायक तक। एला ने किसी न किसी तौर पर अपने अधिकांश जीवन में काम किया। एला ने पूर्णकालिक नौकरी के दौरान 12 बच्चों को पालन-पोषण किया। परंतु पढ़ाई के प्रति उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ।

पढ़ाई के प्रति कभी कम नहीं हुआ लगाव
एला की बेटी एलेन मिशेल ने लिबर्टी विश्वविद्यालय को बताया कि एक बहुत की कम पढ़ी लिखी अश्वेत महिला के लिए वॉशिंगटन डीसी आने के बाद अधिक अवसर नहीं थे। लेकिन उन्होंने बहुत अधिक मेहनत की, उन्होंने वो सबकुछ किया जो भी वो हमारा पालन-पोषण करने के लिए कर सकतीं थीं। इस दौरान उन्होंने सभी बच्चों की शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया। मिशेल ने कहा, वह हमेशा एक आजीवन शिक्षार्थी रहीं हैं। सीखने और शिक्षा के लिए उनकी इच्छा एक पारिवारिक परंपरा बन गई।

2012 में लिबर्टी विश्वविद्यालय में दाखिला लिया
49 साल की उम्र में जब एला अपनी शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम हुईं तो 1978 में उन्होंने जीईडी डिप्लोमा प्राप्त करने के लिए एक वयस्क शिक्षा कार्यक्रम में दाखिला लिया। चौबीस साल बाद, वह फिर से अपनी पढ़ाई कर रहीं थीं। 83 वर्ष की उम्र में एला की बेटी मिशेल ने उन्हें सुझाव दिया कि वह कॉलेज में दाखिला लेकर अपने पढ़ाई के लक्ष्य को पूरा करें। उन्होंने 2012 में लिबर्टी विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और अपनी एसोसिएट की डिग्री पूरी की। वह यहीं नहीं रुकीं, वह पहले से ही स्कूल से स्नातक की डिग्री लेने के लिए काम कर रहीं हैं।