Saturday, April 11, 2026
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नीलांबर कोलकाता : एक साँझ कविता की – 4′

एक साँझ कविता की – 4′ लेकर एक बार फिर  नीलांबर कोलकाता 10 जून की शाम कोलकाता में अपने प्रिय कवियों के साथ उपस्थित हो रहा हैं।यहाँ कविताएँ विभिन्न रूपों में  संवाद करेंगी।हिंदी के वरिष्ठ कवि राजेश जोशी की अध्यक्षता में होने वाले कविता पाठ में शामिल हैं हिंदी की सुपरिचित कवयित्री अनामिका, तुषार धवल सिंह और घनश्याम कुमार देवांश।

इसके अलावा नीलांबर की टीम के द्वारा कविता कोलाज और कविता मोंताज की भी प्रस्तुति की जाएगी । साथ में रश्मि बंदोपाध्याय और उनके दल ‘नृत्यंगनाज’ के द्वारा काव्य नृत्य प्रस्तुत किया जाएगा।

माता कुन्ती से है जिसका संबंध….उसे कहते हैं आज कुतवार

मुरैना जिले में कुतवार जगह देखते ही महाभारत की यादें ताजा हो जाती हैं। इस स्थान का संबंध पांडवों की मां कुंती से है। महाभारत काल में इसे कुंतीभोज नाम से भी जाना जाता था। यह जगह ग्वालियर से लगभग 45 किमी दूर मुरैना जिले में स्थित है। यह जगह महाभारत कालीन है, इसे कुछ लोग कुतवार के नाम से जानते हैं। इस स्थान का संबंध पांडवों की मां कुंती से है। महाभारत काल में इसे कुंतीभोज नाम से भी जाना जाता था। वीर पांडव, अर्जुन की ननसार भी यही है और अर्जुन व श्रीकृष्ण द्वारा बनवाए गए हरिसिद्धी मंदिर और देवी कुंती द्वारा पूजा गया शिवलिंग भी यहीं स्थापित है। पास ही आसन नदी का तट जहां आज भी सूर्य के घोड़ों की टाप और सूर्य के पदचिन्हों की छाप मौजूद है।

चंबल घाटी का सबसे प्राचीन नगर कुंतलपुर है, जिसे आज के समय में कुतवार के नाम जाना जाता है। पुराणों के इतिहास संबंधी अंशों तथा प्राचीन राजनीतिक भूगोल पर प्रकाश डालें, तो पता चलता है कि चंबल पर राजा शूरसेन राज करते थे। राजा शूरसेन की पुत्रियों में से एक का नाम प्रथा था, जिसे उन्होंने अपने मित्र राजा कुंतीभोज को गोद दे दिया था। प्रथा के सहोदर भ्राता का नाम वसुदेव था। कुंतीभोज द्वारा उनका लालन-पालन करने के बाद प्रथा का नाम कुंती पड़ गया।  राजा कुंतीभोज का राज्य चंबल के दक्षिण में था।

इतिहास के अनुसार कुंतीभोज महाभारत में द्रोणाचार्य के हाथों मारे गए थे। यह भू-भाग कुंती क्षेत्र के नाम से विख्यात हुआ और दंतिदुर्ग (दतिया) तक फैला हुआ है। 4-हजारों वर्ष से कुतवार में किले के पीछे एक स्थल को कर्णवार कहा जाता है, जहां से कुंती ने नवजात कर्ण को मंजूषा में रख अश्व नदी (अब आसन) में बहा दिया था। यह मंजूषा आसन से चंबल में जा पहुंची। यहां एक स्थान सूर्यवाह के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि यहां का नाम सूर्यवाह इसलिए पड़ा, क्योंकि कुंती के आह्वान पर सूर्यदेव प्रकट हुए थे। उस अद्भुत घटना के स्मृति चिह्न अश्व नदी के किनारे एक ऊंची चट्टान पर घोड़ों की टापों के रूप में प्राचीन काल से बने हुए हैं। यहां एक टूटा हुआ मंदिर भी है। अनुमान लगाया जाता है कि यहां सूर्य मंदिर रहा होगा।

भगवान सूर्य नारायण ने यहां उतारा था अपना रथ
कहा जाता है कि इसी स्थान पर महाभारत काल में भगवान सूर्य नारायण ने अपना रथ उतारा था और कुंती से भेंट की। किवदंती है कि यहां महर्षि दुर्वासा की तपस्थली भी है। खुदाई में नागराजवंश के समय के सिक्के व बर्तनों का मिलना इस स्थान की ऐतिहासिक सत्यता को और मजबूत बनाता है। सिंधिया स्टेट के समय आसन नदी पर यहां अर्धचंद्राकार बांध भी बनाया गया था। राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 3 पर ग्वालियर से आगरा की ओर जाने पर छौंदा टोल प्लाजा से दाहिने हाथ पर मुड़कर कुतवार जाया जा सकता है। नजदीकी रेलवे स्टेशन मुरैना इस स्थान से लगभग 12 किमी दूर है।
कांतिपुरी की कुंती
विजयेन्द्र कुमार माथुर के अनुसार वर्तमान कोतवार जो डभोरा  (बमोरा) स्टेशन से 12 मील दूर है वही कांतिपुरी है। यह आसन नदी के तट पर स्थित है और ग्वालियर से 20 मील है। कांतिपुरी जो प्राचीन पद्मावती के निकट ही स्थित थी गुप्तकाल में नागराजाओं के अधिकार में थी। विष्णुपुरा 4,24,64 में पद्मावती में नागराजाओं का उल्लेख है। कांतिपुरी के कुंतीपुरी , कुंतीपद, और कुंतलपुरी नाम भी मिलते हैं। पांडवों की माता कुंती संभवत: इसी नगरी के राजा कुंतिभोज की पुत्री थी।

कहते हैं कि इसी स्थान पर सूर्य नारायण कुन्ती से मिलने आये थे जिसके बाद कर्ण का जन्म हुआ। कहते हैं कि आज भी यहाँ घोड़ों की टापों के निशान मौजूद हैं..जो कि चित्र में दिख रहा है

कान्तिपुरी में नागवंशी जाटों का शासन
नागवंश एक सुप्रसिद्ध वंश है जो सूर्यवंश एवं चन्द्रवंश की तरह ही अनेक क्षत्रिय आर्यों के वंशों का समूह है। ऐतिहासिकों का मत है कि ये क्षत्रिय अपनी ‘नाग’ चिन्हित ध्वजा के कारण ही नाग नाम से प्रसिद्ध हुए। यह यक्ष, गंधर्व और देवताओं की कोटि का सुसंस्कृत वंश था।[30] रामायणकाल में भी इस नागवंश की बड़ी प्रसिद्धि थी। इस काल में इस विशाल नागवंश का संगठन कई छोटे-छोटे प्रसिद्ध जाट राजवंशों के द्वारा हुआ जिनमें वैसाति या वैस, तक्षक, काला (कालीधामन), पौनिया (पूनिया), औलक, कलकल, भारशिव (भराईच) आदि हैं। ये जाटवंश नागवंश की शाखा के नाम से प्रसिद्ध हैं। [31]
इण्डियन एंटीक्वेरी जिल्द 14, पृ० 45 पर लिखा है कि शेरगढ़ (कोटा राज्य) के द्वार पर नागवंशज राजाओं का शिलालेख, 15 जनवरी 791 ई० का खुदवाया हुआ मिला है जिसने उस स्थान पर विन्दुनाग, पद्मनाम, सर्वनाग, देवदत्त नामक चार नाग नरेशों का शासन होना सिद्ध होता है। [32] इन नागवंशी जाटों का राज्य कान्तिपुरी, मथुरा, पद्मावती, कौशाम्बी, अहिछत्रपुर, नागपुर, चम्पावती (भागलपुर), बुन्देलखण्ड तथा मध्यप्रान्त पश्चिमी मालवा, नागौर (जोधपुर) पर रहा। इनके अतिरिक्त शेरगढ़ कोटा राज्य की प्राचीन भूमि पर, मध्यप्रदेश में चुटिया, नागपुर, खैरागढ़, चक्रकोटय एवं कवर्धा में भी इस वंश का राज्य था। महाविद्वान् महाराजा भोज परमार (जाट) की माता शशिप्रभा नागवंश की कन्या थी। राजस्थानी महासन्त वीरवर तेजा जी (धौल्या गोत्री जाट) का अपनी बहादुर पत्नी बोदल समेत एक बालू नामक नागवंशी वीर से युद्ध करते हुए ही प्राणान्त हुआ था। वहीं पर वीर तेजा जी की समाधि बनी हुई है। आज भी राजस्थान में इस वंश के जाटों की संख्या अधिक है। उत्तरप्रदेश जि० बदायूं में रम्पुरिया, खुदागंज, धर्मपुर, जि० बुलन्दशहर के अहार गांव में नागवंशी जाट हैं। यह ‘अहार’ वही प्राचीन गांव है जहां कि दुर्योधन द्वारा विष खिलाकर अचेत भीमसेन को गंगा में फेंक दिया गया था, जिसे नागवंशियों ने बचा लिया था।


मुरैना से महाभारत काल का नाता और गहराता जा रहा है। वर्ष 1997 में जिले के कुतवार गांव में हुई खुदाई में आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को महाभारत कालीन कुंतलपुर शहर (राजा कुंतिभोज के राज्य की राजधानी) मिला था। अब पुरातत्व विभाग को सिंहौनिया (कच्छपघात कालीन राजाओं की राजधानी सिंहपाणी) में एक और महाभारत कालीन शहर होने के प्रमाण मिले हैं। इस शहर की खुदाई के लिए प्रस्ताव एएसआई को भेजा गया है। पुरातत्व विभाग को सिंहौनिया थाने के पीछे स्थित मिट्टी के विशाल टीले में करीब चार से पांच हजार साल पुराना (महाभारत कालीन) नगर होने के प्रमाण मिले हैं। वर्ष 2012 में एक सर्वे के दौरान विभाग को महाभारत कालीन मृदभांड (मिट्टी के बर्तन) व अन्य पुरातत्व महत्व के अवशेष मिले थे। इसके बाद यह पुष्ट हुआ कि सिंहौनिया के इस टीले पर कुतवार जैसा ही कोई नगर बसा करता था। ज्ञात हो कि कुतवार गांव के एक मिट्टी के टीले से पुरातत्व विभाग को मृदभांड व अन्य अवशेष मिले थे। इसके बाद खुदाई करने पर शहर सामने आया था।
पानसिंह तोमर का गाँव भी महाभारत काल का है
एथलीट व डकैत रहे पानसिंह तोमर के गाँव भिड़ौसा व लेपा भी महाभारत काल के ही हैं। यहां भी पुरातत्व विभाग को महाभारत कालीन पुरावशेष मिले हैं, जिनमें चार से पांच हजार साल पुराने मृदभांड प्रमुख हैं। पुरातत्वविदों की मानें तो यहां भी महाभारत काल में कोई गांव या शहर बसा हुआ होगा।
महाभारत में उल्लेखित कई जगह हैं अंचल में
महाभारत में पांडवों की मां कुंती का मायका कुंतलपुर नाम से उल्लेखित है। यहां पर कुंती ने कर्ण को आसन नदी में प्रवाहित किया था। यह नगर एएसआई को कुतवार गांव में मिला। यहां वह कर्णखार भी मिली, जहां से कर्ण को बहाया गया था। महाभारत में महाराज शांतनु द्वारा बसाए गए नगर शांतनु नगर का भी उल्लेख है। यह नगर आज भी चंबल किनारे के शांतनुखेरा नामक गांव के नाम से जाना जाता है।
महाभारत में चर्मण्यवती गंगा (चंबल) नामक नदी का उल्लेख है जहां महाराज शांतनु नौका विहार करते थे। यह चंबल नदी, शांतनु खेरा आज भी उसी स्थिति में है। हमने वर्ष 2012 में जो सर्वे किया था उसमें हमें सिंहौनिया व लेपा भिड़ौसा से महाभारत काल की चीजें मिलीं। हम यहां खुदाई करने का प्रस्ताव एएसआई को भेज चुके हैं। अंचल में और भी जगह हैं जो इतनी पुरानी हो सकती हैं, लेकिन इसके लिए हम दूसरे चरण में सर्वे करेंगे।

कुतवार देवी मंदिर

कुंती ने बनवाया था हरिसिद्धि माता का मंदिर
कालपी से झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जब ग्वालियर आईं तो अंग्रेजों से नफरत करने वाली ग्वालियर की बागी सेना ने उनका साथ दिया रानी ने किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद जयाजीराव सिंधिया पांडवों की मां के कुतवार में बनाए हरिसिद्धि माता के मंदिर में जा छिपे थे। जयाजीराव सिंधिया ने जिस मंदिर में शरण ली थी वह कुंती के पिता कुंति भोज ने राजधानी कुंतलपुर में आसन नदी के किनारे अपनी पुत्री के लिए बनवाया था। इसी मंदिर के किनारे कुंती ने सूर्य देव की कृपा से महाभारत युद्ध के महारथी कर्ण को जन्म दिया था। लोकलाज से बचने इसी मंदिर के किनारे बने घाट से सोने की पेटी में कवच-कुंडलों के साथ कर्ण को सुरक्षित रख कर नदी में बहा दिया था।

(साभार – दैनिक भास्कर)

प्लास्टिक नष्ट होने में लग जाते हैं 1 हजार साल

इन दिनों प्लास्टिक का इस्तेमाल हर क्षेत्र में बढ़ा है। यह धरती और समंदर को प्रदूषित करने के साथ ही समुद्री जीवों और मानव स्वास्थ्य + के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। अब तक इसका कोई ठोस विकल्प ढूंढा नहीं जा सका है। यही वजह है कि इस बार 5 जून यानी विश्व पर्यावरण दिवस 2018 को ‘बीट प्लास्टिक पलूशन’ थीम पर मनाने का फैसला किया गया। इसके जरिए सरकारों, उद्योगों, विभिन्न समुदायों और आम जनता से मिलकर प्लास्टिक से निपटने का अनुरोध किया जा रहा है जिससे विकल्प तलाश कर प्लास्टिक उत्पादन में कमी लाई जा सके। भारत इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का ग्लोबल होस्ट भी है।
प्लास्टिक के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि हर साल दुनियाभर में 500 अरब प्लास्टिक बैग्स + का इस्तेमाल होता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण इसका निपटारा कर पाना गंभीर चुनौती है। दरअसल, प्लास्टिक न तो नष्ट होता है और न ही सड़ता है। आपको जानकर शायद हैरानी हो कि प्लास्टिक 500 से 700 साल बाद नष्ट होना शुरू होता है और पूरी तरह से डिग्रेड होने में उसे 1000 साल लग जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ जितना भी प्लास्टिक का उत्पादन हुआ है वह अब तक नष्ट नहीं हुआ है।


प्लास्टिक छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है पर नष्ट नहीं होता है। इससे पर्यावरण प्रदूषित होता है। दुनियाभर में केवल 1 से 3% प्लास्टिक ही रीसाइकल हो पाता है। अक्सर लोग इसे जलाकर सोचते हैं कि उन्होंने प्लास्टिक को नष्ट कर दिया है जबकि प्लास्टिक को जलाना और भी खतरनाक है। प्लास्टिक के कचरे को जलाने से ऐसी गैसें निकलती हैं, जो फेफड़ों के कैंसर का कारण बन सकती हैं। पेट्रोलियम, नैचरल गैस और दूसरे केमिकल्स के इस्तेमाल से प्लास्टिक बैग्स बनाए जाते हैं। 1950 के दशक में अमेरिका और यूरोप में प्लास्टिक के उत्पादन की जानकारी मिलती है। सुपरमार्केट्स में पहली बार प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल 1977 में शुरू हुआ था।
… तो समुद्र में मछलियों से ज्यादा होगा प्लास्टिक
वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि प्लास्टिक का विकल्प न खोजा गया तो अगले 30 वर्षों यानी करीब 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक भर जाएगा। हर साल करीब एक करोड़ टन प्लास्टिक समंदर में जमा हो रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि हर मिनट कूड़े से भरे एक ट्रक के बराबर प्लास्टिक समुद्र के पानी में मिल रहा है। पिछले दशक में दुनियाभर में प्लास्टिक का इतना उत्पादन किया गया था, जितना पिछली पूरी शताब्दी में नहीं हुआ था। UN Environment के मुताबिक हम जो प्लास्टिक इस्तेमाल में लाते हैं उसका 50 फीसदी सिंगल-यूज या डिस्पोजेबल होता है। हर मिनट दुनिया में करीब 10 लाख प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैं। दुनियाभर में जो भी कूड़ा-कचरा पैदा होता है, उसका 10 से 20 फीसदी हिस्सा प्लास्टिक का ही होता है।


समुद्री जीवों का ‘यमराज’
समुद्र में प्लास्टिक बढ़ने से समुद्री जीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। यह खतरा कितना गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2008 में कैलिफॉर्निया में बीच पर एक व्हेल मृत पाई गई। उसके पेट में 22 किलो प्लास्टिक पाया गया, जो उसकी मौत की वजह बना। प्लास्टिक के कारण हर साल करीब एक लाख समुद्री जीव-जंतु मर रहे हैं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

पर्यावरण का संरक्षण कर मनायें पर्यावरण दिवस

विश्व में सबसे समृद्ध देश वही है जहाँ हरियाली हैं, इसी को बनाए रखने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को मनाया जाता है। इस बार विश्व 45वां विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा और उसके संरक्षण को ध्यान में रखकर इसकी पहल की गई थी। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे यह उद्देश्य है कि लोगों को इस बारे में जागरूक किया जा सके कि आखिर क्यों पर्यावरण की सुरक्षा जरूरी है।

विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पूरी दुनिया में अलग-अलग तरह के कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इन कार्यक्रमों के दौरान पौधरोपण किए जाते हैं और साथ ही पर्यावरण को कैसे संरक्षित रखना है, इस बारे में विचार-विमर्श होता है।
वैश्विक स्तर पर आज सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट से निपटने की और इस गंभीर मुद्दे पर आम जनता और सुधी पाठकों को जागरूक करने की। हमने पर्यावरण, वन्य जीव-जंतुओं और मानव समाज का सीधा रिश्ता आम आदमी की समझ के मुताबिक समझाने का प्रयास सरल व वैज्ञानिक दृष्टि से किया है।

तो आइए आज हम सब मिलकर इस विश्व पर्यावरण दिवस साथ मिलकर मनाते है। इसके लिए आपको कहीं जाने या किसी रैली में भाग लेने की जरूरत नहीं, केवल अपने आस-पड़ोस के पर्यावरण का अपने घर जैसा ख्याल रखें जैसे कि –

इस तरह करें पर्यावरण का संरक्षण 
1.अपने घर के आसपास पौधारोपण करें और स्वच्छ रखें।
2. गरमी, भूक्षरण, धूल इत्यादि से बचाव तो कर ही सकते हैं।
3. पक्षियों को बसेरा भी दे सकते हैं, फूल वाले पौधों से आप अनेक कीट-पतंगों को आश्रय व भोजन दे सकते हैं।
4. कपड़े व कागज के थैलों का करें इस्तेमाल।
5. डीजल जेनेरेटर को कम से कम इस्तेमाल करें।
6. प्लास्टिक के बैग्स को संभाल कर रखें। इन्हें कई बार इस्तेमाल में लाएं। सामान खरीदने जाने पर अपने साथ कैरी बेग (कपड़े या कागज के बने) लेकर जाएं।
7. प्लास्टिक सामान को कम करने की कोशिश करें। धीरे-धीरे प्लास्टिक से बने सामान की जगह दूसरे पदार्थ से बने सामान अपनाएं।
8. शहरी पर्यावरण में रहने वाले पशु-पक्षियों जैसे गोरैया, कबूतर, कौवे, मोर, बंदर, गाय, कुत्ते आदि के प्रति सहानुभूति रखें व आवश्यकता पड़ने पर दाना-पानी या चारा उपलब्ध कराएँ।
9. ताप विद्युत संयंत्रों के उत्सर्जन में कटौती , उद्योगों के लिए कड़े उत्सर्जन मानक तैयार करके , घरों में ठोस ईंधन के इस्तेमाल में कमी लाकर।
10. ईंट निर्माण के लिए जिग-जैग ईंट-भट्टों के इस्तेमाल और तत्परता के साथ वाहन उत्सर्जन मानकों को कड़ा बनाने जैसे नीतिगत उपायों से हम अपने प्रदुषित पर्यावरण में सुधार लाया जा सकता है।
(साभार – प्रभा साक्षी)

वीडियो एडिटर: मनोरंजन जगत में चुनें अपनी राह

अलग-अलग कई वीडियो को एक वीडियो बनाना, खराब दृश्यों में सुधार करना, साउंडट्रैक जोड़ना जैसे कार्य एक वीडियो एडिटर के जिम्मे होते हैं। एक वीडियो एडिटर का मुख्य काम किसी भी मोशन पिक्चर, केबल या ब्रॉडकास्ट विजुअल मीडिया इंडस्ट्री के लिए साउंडट्रैक, फिल्म और वीडियो का संपादन करना होता है। वीडियो एडिटर का कौशल ही फाइनल प्रोडक्ट की गुणवत्ता और डिलीवरी तय करता है। इसकी खास बात यह है कि बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी युवा इसे करियर विकल्प के तौर पर चुन सकते हैं। डिजिटल वीडियो एडिटिंग में करियर बनाने के लिए एक व्यक्ति के पास इसके लिए जरूरी कंप्यूटर सिस्टम और प्रोग्राम्स की ट्रेनिंग प्राप्त होना जरूरी है।
क्या करता है एक वीडियो एडिटर
किसी भी फिल्म के निर्माण के दौरान रॉ फुटेज शूट के संपादन का काम एक वीडियो एडिटर के जिम्मे होता है। आधुनिक वीडियो डिजिटल कैमरे के बढ़ते इस्तेमाल से पहले फिल्म फुटेज को असली स्ट्रिप्स (पट्टियों) पर शूट किया जाता था। उस वक्त वीडियो एडिटर्स को हाथ से उन्हें काटना पड़ता था और कई दृश्यों को एक साथ जोड़ना पड़ता था। एक वीडियो एडिटर को आमतौर पर निर्देशक या निर्माता के साथ बैठकर घंटों तक शूट किए गए रॉ फुटेज को देखना होता है। फिर उनके साथ मिलकर यह निर्धारित करना होता है कि कौन-सा दृश्य रखना है और कौन सा हटाना है।
कोर्स का विवरण
वर्तमान में वीडियो या फिल्म एडिटिंग का कोर्स भारत के लगभग सभी प्रतिष्ठित फिल्म संस्थानों में उपलब्ध है। ये कोर्सेज सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा स्तर पर कराए जाते हैं। इन कोर्सेज का लक्ष्य फिल्म एडिटिंग के सभी पहलुओं जैसे नॉन-लीनियर एडिटिंग, प्रोफेशनल एडिटिंग, कैमरा बेसिक्स, ग्राफिक्स और स्पेशल इफेक्ट टेक्नीक्स इत्यादि की शिक्षा छात्रों को मुहैया कराना है। फिल्म या वीडियो एडिटिंग के अंडरग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन के लिए अभ्यर्थियों का 12वीं पास होना जरूरी है और पीजी डिप्लोमा कोर्स के लिए संबंधित स्ट्रीम में ग्रेजुएट होना अनिवार्य शर्त है। वीडियो एडिटर के असिस्टेंट के तौर पर काम शुरू करने के लिए बैचलर डिग्री काफी है।
रोजगार की संभावनाएं
भारत में हर साल 1000 से ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं, जो भारत को सबसे ज्यादा फिल्म बनाने वाले देशों में से एक बनाती हैं। फिल्म निर्माण के लिए एडिटिंग मौलिक जरूरत है, इसलिए कुशल वीडियो संपादकों की मांग आने वाले दशकों में घटने वाली नहीं है। वीडियो एडिटर के तौर पर एक व्यक्ति फीचर या नॉन फीचर फिल्मों, डॉक्युमेंट्री, विज्ञापनों और टीवी कार्यक्रमों में रोजगार तलाश कर सकता है। मोशन पिक्चर इंडस्ट्री में असिस्टेंट एडिटर से एडिटर के पद तक प्रमोशन पा सकते हैं। इसके अलावा किसी फिल्म स्कूल, टेक्निकल स्कूल या यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का काम भी कर सकते हैं।
वेतन
शुरुआती तौर पर अभ्यर्थी 7,000 से 10,000 रुपये तक कमा सकते हैं। दो से तीन साल का अनुभव प्राप्त करने के बाद वेतन 15,000 से 25,000 रुपये तक बढ़ सकता है। बेहद अनुभवी वीडियो एडिटर छह अंकों वाली उम्दा वेतन की भी उम्मीद कर सकते हैं।
रोजगार के अवसर – फिल्म, टीवी और म्यूजिक प्रोडक्शन, फिल्म और टीवी की मार्केटिंग और डिस्ट्रिब्यूशन, फिल्म प्रोडक्शन, डिस्ट्रिब्यूशन या थियेटर संबंधी पर्सनल या पारिवारिक व्यवसाय,पोस्ट प्रोडक्शन स्टूडियो, कॉर्पोरेट एप्लायर (कॉरपोरेट ट्रेनिंग वीडियो)
प्रमुख संस्थान
सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट, कोलकाता
वेबसाइट: srfti.ac.in
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे
वेबसाइट: www.ftiindia.com
एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नोएडा
वेबसाइट:www.aaft.com
सेंटर फॉर रिसर्च इन आर्ट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नई दिल्ली
वेबसाइट: www.craftfilmschool.com
डिपार्टमेंट ऑफ फिल्म एंड टीवी स्टडीज, भारतीय विद्या भवन
वेबसाइट:www.film-tvstudies.com

अब रेलवे स्टेशनों के शौचालयों में सस्ते दामों पर मिलेंगे नैपकिन और कंडोम

नई दिल्ली : रेलवे बोर्ड ने हाल ही में एक नई शौचालय नीति को मंजूरी दी है जिसके तहत अब रेलवे स्टेशनों के अंदर और बाहर बने शौचालयों में न सिर्फ यात्रियों को बल्कि आसपास के क्षेत्र के लोगों को कम दामों पर कंडोम और सेनेटरी नैपकिन मुहैया कराए जाएंगे।
नीति में कहा गया है कि स्टेशन परिसर के अंदर तथा बाहर शौचालयों की कमी के कारण आसपास के क्षेत्रों खासतौर पर झुग्गी बस्ती और गांवों में रहने वाले लोग अकसर खुले में शौच करते हैं जिससे गंदगी फैलती है और इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं। देश की करीब 82 प्रतिशत महिलाएं आज भी सेनेटरी नैपकिन से दूर हैं।
इसमें कहा गया कि इन समस्याओं से निपटने के लिए रेलवे स्टेशन परिसरों का इस्तेमाल महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय वाला सुविधा केन्द्र बनाने में करेगा। यहां मासिक धर्म से जुड़ी साफ-सफाई तथा गर्भ निरोधक के इस्तेमाल की जानकारी दी जाएगी। नई नीति के अनुसार, प्रत्येक सुविधा केन्द्र में कम दामों में महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन और उसके निपटान की सुविधा तथा पुरुषों को कंडोम देने की सुविधा होगी।
नीति के तहत प्रत्येक स्टेशन में ऐसे दो केन्द्र होंगे। पहला स्टेशन के अंदर और दूसरा स्टेशन के बाहर जिससे इसका इस्तेमाल स्टेशन आने वाले और आसपास रहने वाले दोनों की प्रकार के लोग कर सकें। इसके अलावा प्रत्येक केन्द्र में महिला, पुरुष और दिव्यांगजनों के लिए अलग-अलग शौचालय होंगे। इसमें कहा गया है कि 8500 स्टेशनों पर इस प्रकार की सुविधा केन्द्रों के निर्माण के लिए धन सीएसआर कोष से आएगा।

226 साल पुराने न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज की पहली महिला प्रमुख बनीं स्टेसी कनिंघम

न्यूयॉर्क : 226 साल पहले जब न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना हुई थी तब अमेरिका में महिलाओं को वोट डालने का अधिकार नहीं था। वह अपनी वसीयत नहीं लिख सकती थीं। यहां तक कि उन्हें अपने नाम पर जमीन जायदाद खरीदने तक का अधिकार भी नहीं था। मगर आज 43 बरस की स्टेसी कनिंघम ने एनवाईएसई की कमान संभाल ली है।
क्लर्क के रूप में की थी शुरुआत
न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज (एनवाईएसई) ट्रेडिंग फ्लोर पर क्लर्क के रूप में करियर की शुरुआत करने वाली स्टेसी ने शुक्रवार को एक्सचेंज की 67 वीं अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाल लिया। इससे पहले वह एनवाईएसई ग्रुप की मुख्य परिचालन अधिकारी थीं। अब स्टेसी के अध्यक्ष बनने के बाद निवर्तमान अध्यक्ष फार्ले एक्सचेंज छोड़ रहे हैं। फार्ले ने 2013 में एनवाईएसई के अध्यक्ष का कार्यभार संभाला था।
दुनिया का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित बाजार
इस स्टॉक एक्सचेंज को दुनिया का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित शेयर बाजार माना जाता है। इसकी वित्तीय ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया की सबसे बड़ी निवेश कंपनियां, टेक्नॉलाजी कंपनियां और रिटेल कंपनियां यहां सूचीबद्ध हैं।
1792 में हुई थी एनवाईएसई की स्थापना
यह तथ्य अपने आप में दिलचस्प है कि 1792 में जब इस शेयर बाजार की स्थापना की गई तब कोई नहीं जानता थाकि एक दिन यह दुनिया का सबसे बड़ा शेयर बाजार बन जाएगा।
दिलचस्प रहा स्टेसी का सफर
स्टेसी ने 1994 में 20 साल की उम्र में बतौर इन्टर्न एनवाईएसई में करियर शुरू किया था। उनका कहना है कि शेयर बाजार के उतार चढ़ाव की बारीकियों को समझने के दौरान ही उन्हें ट्रेडिंग फ्लोर से प्यार हो गया। दो वर्ष बाद 1996 में वह एनवाईएसई के ट्रेडिंग फ्लेार पर फ्लोर क्लर्क बनीं और कदम दर कदम आगे बढ़ती रहीं। स्टेसी कहती हैं कि अपने कार्यकाल के दौरान वह नयी तरह की वित्तीय लिस्टिंग्स को बढ़ावा देंगी और अन्तरराष्ट्रीय शेयर बाजार में आ रही गिरावट को कम करने के लिए काम करेंगी। एक्सचेंज को अपना ‘घर’ कहने वाली स्टेसी का कहना है कि उन्हें इस बात की बहुत खुशी है कि वह इसका एक हिस्सा हैं। साथ ही वह यह भी स्वीकार करती हैं कि वित्त और प्रौद्योगिकी में काम करने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम है। शेयर मार्केट के अलावा उन्हें कुकिंग का शौक है। उन्हें तरह तरह के व्यंजन बनाना और खिलाना अच्छा लगता है। अपने मिड करियर अध्ययन कार्यक्रम के दौरान स्टेसी ने आठ माह का कुकिंग मैनेजमेंट का कोर्स किया और न्यूयार्क के एक रेस्तरां में काम भी किया।

टीम के रूप में काम करने से मंगल ग्रह पर कॉलोनी बसाने में मिलेगी मदद: शोध

वॉशिंगटन : वैज्ञानिकों के मुताबिक  यदि इंसान मंगल ग्रह पर कॉलोनी बसाना चाहता है तो टीम के रूप में अच्छा काम और अंतरिक्ष यात्रियों के बीच हास्य विनोद की भावना होना जरूरी है। इन वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि सीमित अंतरिक्ष में फंसे एक समूह की मनोवैज्ञानिक गतिशीलता की समझ प्रौद्योगिकी जितनी ही अहम है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक ऐसे अंतरिक्ष यात्री अन्य अंतरिक्ष यात्रियों के साथ बेहतर काम कर सकते हैं जो भावनात्मक तौर पर स्थर हों , सहमत किए जाने लायक हों , नए अनुभव हासिल करना चाहते हों , लचीले हों और ज्यादा अंतर्मुखी या बहिर्मुखी नहीं हों।
उन्होंने कहा कि हास्य विनोद की भावना से तनावपूर्ण स्थितियों से निपटने में मदद मिल सकती है। यह शोध ‘ अमेरिकन साइकोलॉजिस्ट ’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

हरियाणा की 16 साल की शिवांगी ने माउंट एवरेस्ट फतह कर दी

नयी दिल्ली : हरियाणा की 16 साल की शिवांगी पाठक ने विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (नेपाल की ओर से) फतह कर इतिहास रच दिया है। यह कारनामा कर वह ऐसा करने वाली भारत की सबसे युवा महिला बन गई हैं। एवरेस्ट की ऊंचाई 29,029 फुट है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिवांगी को इस शानदार उपलब्धि के लिए ट्वीट कर बधाई दी। हिसार की रहने वाली शिवांगी ने यह सफलता ‘सेवन समिट ट्रेक’ में हिस्सा लेने के दौरान हासिल की। अपनी कामयाबी पर बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘अगर लड़कियां ठान लें तो वो कुछ भी कर सकती है। दुनिया की किसी भी चीजों को हासिल कर सकती है।’ शिवांगी माउंट एवरेस्‍ट पर तिरंगा फहराने वाली पहली दिव्यांग पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा को अपनी प्रेरणा मानती हैं। शिवांगी ने कहा, ‘एक साल पहले मैंने अरुणिमा सिन्हा की बायोपिक का एक वीडियो देखा था। उससे मुझे काफी प्रेरणा मिली। स्टडी में काफी मन लगाने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार पर्वतारोहण में ही मेरा दिल लगा। तो मैंने यही अच्छा करने की ठानी।’ इससे पहले शिवांगी लद्दाख में स्थित 6,053 मीटर ऊंची चोटी स्टॉक खांगरी भी फतह कर चुकी है।
पिता-पुत्री ने फतह किया माउंट एवरेस्ट
कुछ दिनों पहले गुड़गांव में रहने वाले 53 वर्षीय अजीत बजाज और उनकी 24 वर्षीय बेटी दीया बजाज ने एवरेस्ट पर पहुंचकर तिरंगा फहराया। एक साथ यह कारनामा करने वाले वह पहले पिता-पुत्री हैं। बेटी दीया पिता से 15 मिनट पहले एवरेस्ट पर पहुंची। बाद में पिता अजीत बजाज पहुंचे।

अपने काम से प्यार होना बेहद जरूरी है

डोलन मजुमदार शो बिजनेस की दुनिया में बतौर संचालक चर्चित नाम है जो तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ रही हैं। फिल्म फेयर और आईपीएल 9 जैसे समारोह में अपनी प्रतिभा दिखाने वाली दोलन कई व्यावसायिक व गैर व्यावसायिक संस्थाओं और संगठनों के कार्यक्रमों का संचालन कर चुकी हैं। निश्चित तौर पर यह काम आसान नहीं है और वह भी तब जब कि इस क्षेत्र में आना आकस्मिक तौर पर हुआ है। पेश हैं अपराजिता से डोलन मजुमदार की बातचीत के कुछ अंश –
प्र. इस क्षेत्र में आपका आना कैसे हुआ?
उ. इस क्षेत्र में यानि संचालन करना मेरे कार्यक्षेत्र की योजना का हिस्सा नहीं था। मैंने शुरुआत 25 दिसम्बर 2011 में आसनसोल गैलेक्सी से की थी। न्यूज रीडिंग और एंकरिंग का कोर्स किया मगर इसके साथ ही पॉलिटेक्निक का भी कोर्स किया था। 2 साल नौकरी भी की मगर मगर 10 से 5 की नौकरी करना मुझे पसन्द नहीं था।
प्र. किस प्रकार की दिक्कतें हुईं?
उ. मेरे घरवाले मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे। जब मैं यह क्षेत्र चुना तो मुझे प्रोत्साहन मिला मगर नाराज होने वाले लोग भी बहुत थे। मैंने ई टीवी में पियाली बुटिक के लिए भी एंकरिंग की मगर इवेन्ट इंडस्ट्री में आने के बाद सब कुछ बदल गया।
प्र. शो बिजनेस और ग्लैमर की दुनिया में काम करना कितनी चुनौतीपूर्ण है?
उ. मेरी प्रतियोगिता और मेरी लड़ाई खुद से है। मेरा काम ऐसा है कि मुझे खूबसूरत दिखना पड़ता है और ऐसी ही जीवन शैली अपनानी पड़ती है जो कि खर्चीली है। मैं कई बार जो पहनती हूँ, वह आयोजकों का चयन होता है मगर आईपीएल में इस तरह की पाबंदी नहीं थी। सिर्फ अच्छे कलाकार के दम पर कोई कार्यक्रम या समारोह सफल नहीं होता, अच्छे एंकर का होना जरूरी है। इसके साथ ही आयोजक भी महत्वपूर्ण है। कई तरह के लोग आते हैं, ऐसे में इवेंट मैनेजर की सहायता से उनसे निपटना आसान हो जाता है।
प्र. कभी देर रात तो कभी बाहर, कई तरह की स्थितियों के बीच आप काम करती हैं तो क्या सुरक्षा एक मसला है?
उ. मैं अपनी तरफ से सजग भी रहती हूँ और पेपरस्प्रे या नेलकटर जैसी चीजें भी साथ रखती हूँ। पहले मैं इतनी साहसी यानी बोल्ड नहीं थी मगर ये तो है कि आपकी आवाज में डर नहीं दिखना चाहिए। अब तो फेसबुक पर पेज है, दूसरे एंकरों से दोस्ती है तो दिक्कत नहीं होती। इस मामले में दिल्ली और मुम्बई में स्थिति बहुत अच्छी है और आगे बढ़ने के मौके भी हैं। यह है कि आपको हमेशा नये लोगों से मिलने का मौका मिलता है।
प्र. एकरिंग के आगे जाने के बारे में सोचा है? आपको सबसे अधिक प्रोत्साहन किससे मिला?
. रेडियो और टीवी में जाने का मन है। सबसे अधिक प्रोत्साहन तो माँ से मिला जिन्होंने हर पल मेरा साथ दिया।
प्र. युवाओं को क्या कहना चाहेंगी?
उ. जो कीजिए पूरी तैयारी के साथ कीजिए। यूँ ही बगैर तैयारी के काम नहीं हो सकता इसलिए विषय की समझ होना बहुत जरूरी है इसलिए इसका ध्यान रखना चाहिए।
प्र. क्या सन्देश देना चाहेंगी?
उ. अपने प्रति ईमानदार रहना जरूरी है। शुरू में लोग हतोत्साहित करते हैं मगर लगन और परिश्रम से सब ठीक हो जाता है। अपने काम से प्यार होना बेहद जरूरी है।