नयी दिल्ली : विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने पिछले पांच कारोबारी सत्रों में भारतीय पूंजी बाजारों में 3,000 करोड़ रुपये का निवेश किया । इससे पहले अप्रैल – जून के दौरान उन्होंने पूंजी बाजारों से भारी निकासी की थी। ताजा निवेश से पहले पिछले तीन माह के दौरान एफपीआई ने पूंजी बाजारों से 61,000 करोड़ रुपये से अधिक निकाले हैं । मार्च माह में उन्होंने 2,662 करोड़ रुपये डाले थे। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार दो से छह जुलाई के दौरान एफपीआई ने भारतीय शेयर बाजारों में 2,235 करोड़ रुपये डाले हैं। वहीं उन्होंने ऋण या बांड बाजार में 892 करोड़ रुपये लगाए हैं। इस तरह उनका कुल निवेश 3,127 करोड़ रुपये रहा। रिलायंस सिक्युरिटीज के रिटेल ब्रोकिंग प्रमुख राजीव श्रीवास्तव ने कहा , ‘‘ शेयर बाजारों में कुछ मूल्यवर्धन वाली खरीदारी देखने को मिल रही है। इससे पहले लघु और मध्यम कैप में बाजार की चाल में गिरावट देखने को मिला था। वर्ष 2018 में इसमें श्रेणी में बाजार ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अब कुल 20 प्रतिशत नीचे आया है। ’हालांकि , कुल मिलाकर इस साल एफपीआई ने पूंजी बाजारों से 44,737 करोड़ रुपये निकाले हैं। इसमें से 40,541 करोड़ रुपये ऋण बाजार से और 4,196 करोड़ रुपये शेयरों से निकाले हैं। जनवरी में एफपीआई ने पूंजी बाजारों में शुद्ध रूप से 22,272 करोड़ रुपये का निवेश किया था। वहीं फरवरी में उन्होंने 11,674 करोड़ रुपये की निकासी की थी।
चिता की राख से खाद बनाएगा बाल वैज्ञानिकों का मोक्षा प्रोजेक्ट
बिलासपुर: मल्टीपरपज स्कूल दयालबंद के छात्रों व बाल वैज्ञानिकों के बनाए मॉडल मोक्षा को दुबई में हुई प्रतियोगिता में इनोवेशन ट्रैक कैटेगरी में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है। मोक्षा एक प्रोजेक्ट है, जिससे चिता की राख से खाद बनाया जा सकता है। इससे पहले इसे नीति आयोग ने भी सराहा था।
कलेक्टर पी.दयानंद ने बच्चों को शाबासी दी और उन्हें प्रमाण पत्र भी प्रदान किए। शिक्षा विभाग के सहायक संचालक डॉ.संदीप चोपड़े ने बताया कि दुबई में इनोवेशन ट्रैक कैटेगेरी में 22 से 26 जून तक यह प्रतियोगिता हुई। इसमें इन बच्चों ने अपने मोक्षा मॉडल के साथ भारत का प्रतिनिधित्व किया।
पूरे देश में प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने के बाद छात्रों को यह अवसर मिला था। प्रतियोगिता में अलग-अलग देशों से आए प्रोजेक्ट के बीच बाल वैज्ञानिकों ने पुरस्कार प्राप्त किया। वापस लौटने पर कलेक्टर दयानंद बाल वैज्ञानिक अतुल अग्रवाल, यमन कुमार, स्वास्तिक प्रजापति व गौरव महतो से मिले। कलेक्टर ने उन्हें बधाई देकर उनसे बात की। बाल वैज्ञानिकों ने कलेक्टर को प्रतियोगिता के अनुभव सुनाए। इस प्रतियोगिता में छह देशों के बाल वैज्ञानिकों ने अपना प्रोजेक्ट प्रस्तुत किया। उनके बीच भारत के प्रोजेक्ट को बेस्ट जज प्रोजेक्ट का पुरस्कार मिला है। इस प्रतियोगिता को बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ने आयोजित किया था। इसके माध्यम से बाल वैज्ञानिकों के अविष्कार को दुनिया के सामने रखा गया। इस प्रतियोगिता में भारत के अलावा दूसरे देशों के बाल वैज्ञानिकों के अविष्कार व प्रोजेक्ट को भी प्रस्तु किया गया था।
वर्ष 2016 में देश भर से अगवा हुए 55,000 बच्चे
नयी दिल्ली : देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के चोरी हो जाने का जो डर है उसे पूरी तरह बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता । खासतौर पर गृह मंत्रालय की ओर से जारी वर्ष 2016 के आँकड़ों को देखते हुए जिनके मुताबिक उस वर्ष भारत से करीब 55,000 बच्चों को अगवा किया गया है और यह आंकड़ा एक वर्ष पहले के आंकड़ों के मुकाबले 30 फीसदी अधिक है। गृह मंत्रालय की 2017-18 की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2016 में 54,723 बच्चे अगवा हुए लेकिन केवल 40.4 फीसदी मामलों में ही आरोप पत्र दाखिल किए गए।
वर्ष 2016 में बच्चों के अपहरण के मामलों में दोषसिद्धि की दर महज 22.7 फीसदी रही। वर्ष 2015 में ऐसे 41,893 मामले दर्ज किए गए जबकि वर्ष 2014 में यह संख्या 37,854 थी। वर्ष 2017 के आंकड़े अभी प्रस्तुत नहीं किए गए हैं । मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि ‘ हाल में हुए पीट – पीटकर हत्या के ज्यादातर मामलों के पीछे सोशल मीडिया पर बच्चा उठाने की अफवाहें थी। आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के अपहरण का डर , खासकर ग्रामीण इलाकों में , पूरी तरह से बेबुनियाद नहीं है। ’ को गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उन घटनाओं का पता लगाने को कहा था जिनमें सोशल मीडिया पर बच्चा उठाने की अफवाहों के बाद भीड़ ने पीट – पीटकर हत्या की घटना को अंजाम दिया। विगत दो महीने में बच्चा चोरी के संदेह में 20 से ज्यादा लोगों की पीट – पीटकर हत्या की गई। हाल की घटना एक जुलाई को महाराष्ट्र के धुले में हुई जिसमें बच्चा चोर होने के शक में पांच लोगों की हत्या कर दी गई।
अब बच्चा गोद लेना होगा आसान, संशोधित होगा कानून
नयी दिल्ली : सरकार जल्द ही बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया आसान बनाने जा रही है। सरकार की तरफ से संसद के मानसून सत्र में जूवेनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट में संशोधन संबंधी बिल पेश किया जाएगा। बिल के पास होने के बाद से बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया केवल दो महीने में ही पूरी हो सकेगी। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के सेक्शन दो (उपधारा 23 के तहत बच्चा गोद लेने संबंधी कानूनी प्रक्रिया ) के नियमों में बदलाव की मंजूरी मिलनी है।
इसके बाद न्यायालयों का चक्कर लगाने से भावी अभिभावकों को मुक्ति मिल जाएगी। वह पूरी प्रक्रिया पर निचले यानी जिलाधिकारी स्तर से अंतिम मुहर लगवा सकेंगे। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने साल 2017 में गोद लेने के नियमों में बदलाव कर जुवेनाइल जस्टिस केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन एक्ट 2017 को लागू किया था। इसे फिर से संशोधित कर और सरल बनाया जा रहा है।
नए नियम गोद लेने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करके देश में गोद लेने के कार्यक्रम को और मजबूत करेंगे। अभी जिलाधिकारी कार्यालय के मातहत आने वाली बाल संरक्षण कमेटी की संभावित या भावी अभिभावकों का भौतिक सत्यापन करती है। सारी व्यवस्था ऑनलाइन होने के कारण संभावित अभिभावक सीधे ऑनलाइन रजिस्टर होते हैं। सत्यापन के बाद वे गोद लेने वाली एजेंसियों के पास जाते हैं।
अभी नियम यह है कि बच्चा गोद लेने के लिए सारी प्रक्रिया पूरी करने और गोदनामा पर वैधानिकता की अंतिम मुहर के लिए कोर्ट से अनुमति लेनी पड़ती है। इस प्रक्रिया में कई बार दो-दो साल का समय भी लग जाता है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय 850 से 900 मामले कोर्ट से अनुमति की बाट जोह रहे हैं। गोद लिए गए बच्चों के आँकड़ों पर नजर डाले तो मार्च 2018 तक 3,276 बच्चे गोद दिए गए थे। विदेशियों को 651 बच्चे गोद दिए गए। इस समय लगभग 15 हजार संभावित अभिभावक अपनी बारी के इंतजार में हैं। लिहाजा इस प्रक्रिया से शीघ्र निस्तारण में मदद मिलेगी। एक अनुमान के मुताबिक देश में 50 हजार अनाथ बच्चे हैं। ऐसे में नियमों को सरल बनाकर और बच्चों को छत दी जा सकेगी।
आरा : बिहार का वह स्थान जहाँ अज्ञातवास के दौरान रुके थे पाण्डव
आरा भारत के बिहार का एक प्रमुख शहर है। यह भोजपुर जिले का मुख्यालय है। राजधानी पटना से इसकी दूरी महज 55 किलोमीटर है। देश के दूसरे भागों से ये सड़क और रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। यह नगर वाराणसी से 136 मील पूर्व-उत्तर-पूर्व, पटना से 37 मील पश्चिम, गंगा नदी से 14 मील दक्षिण और सोन नदी से आठ मील पश्चिम में स्थित है। यह पूर्वी रेलवे की प्रधान शाखा तथा आरा-सासाराम रेलवे लाइन का जंकशन है। डिहरी से निकलनेवाली सोन की पूर्वी नहर की प्रमुख ‘आरा नहर’ शाखा भी यहाँ से होकर जाती है। आरा को 1865 में नगरपालिका बनाया गया था।
गंगा और सोन की उपजाऊ घाटी में स्थित होने के कारण यह अनाज का प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र तथा वितरणकेंद्र है। रेलों और पक्की सड़कों द्वारा यह पटना, वाराणसी, सासाराम आदि से संबद्ध है। बहुधा सोन नदी की बाढ़ों से अधिकांश नगर क्षतिग्रस्त हो जाता है।
अरण्यदेवी मंदिर
आरा, भोजपुर, बिहार मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक आरण्य देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। दूर-दूर से श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए जुटते है। संवत् 2005 में स्थापित आरण्य देवी का मंदिर नगर के शीश महल चौक से उत्तर-पूर्व छोर पर स्थित है। यह नगर की अधिष्ठात्री मानी जाती है। बताया जाता है कि उक्त स्थल पर प्राचीन काल में सिर्फ आदिशक्ति की प्रतिमा थी। इस मंदिर के चारों ओर वन था। पांडव वनवास के क्रम में आरा में ठहरे थे। पांडवों ने आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की। मां ने युधिष्ठिर को स्वपन् में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करे। धर्मराज युधिष्ठिर ने मां आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित की। कहा जाता है कि भगवान राम जी, लक्ष्मण जी और विश्वामित्र जी जब बक्सर से जनकपुर धनुष यज्ञ के लिए जा रहे थे तो आरण्य देवी की पूजा-अर्चना की। तदोपरांत सोनभद्र नदी को पार किये थे। बताया जाता है कि द्वापर युग में इस स्थान पर राजा मयूरध्वज राज करते थे। इनके शासनकाल में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ यहां आये थे। श्रीकृष्ण ने राजा के दान की परीक्षा लेते हुए अपने सिंह के भोजन के लिए राजा से उसके पुत्र के दाहिने अंग का मांस मांगा। जब राजा और रानी मांस के लिए अपने पुत्र को आरा (लकड़ी चीरने का औजार) से चीरने लगे तो देवी प्रकट होकर उनको दर्शन दी थीं।

इस मंदिर में स्थापित बड़ी प्रतिमा को जहां सरस्वती का रूप माना जाता है, वहीं छोटी प्रतिमा को महालक्ष्मी का रूप माना जाता है। इस मंदिर में वर्ष 1953 में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुधन् व हनुमान जी के अलावे अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गयी थी।
इतिहास – आरा एक अति प्राचीन शहर है। पहले यहां मयूरध्वज नामक राजा का शासन था। महाभारतकालीन अवशेष यहां के बिखरे पड़े हैं। ये ‘आरण्य क्षेत्र’ के नाम से भी जाना जाता था। यहां का आरण्य देवी बहुत प्रसिद्ध है।
आरा अति प्राचीन ऐतिहासिक नगर है। इसकी प्राचीनता का संबंध महाभारतकाल से है। पांडवों ने भी अपना गुप्त वासकाल यहाँ बिताया था। जेनरल कनिंघम के अनुसार युवानच्वांग द्वारा उल्लिखित कहानी का संबंध, जिसमें अशोक ने दानवों के बौद्ध होने के संस्मरणस्वरूप एक बौद्ध स्तूप खड़ा किया था, इसी स्थान से है। आरा के पास मसाढ़ ग्राम में प्राप्त जैन अभिलेखों में उल्लिखित ‘आरामनगर’ नाम भी इसी नगर के लिए आया है। पुराणों में लिखित मयूध्वज की कथा से भी इस नगर का संबंध बताया जाता है। बुकानन ने इस नगर के नामकरण में भौगोलिक कारण बताते हुए कहा कि गंगा के दक्षिण ऊँचे स्थान पर स्थित होने के कारण, अर्थात् आड या अरार में होने के कारण, इसका नाम ‘आरा’ पड़ा। 1859 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रतायुद्ध के प्रमुख सेनानी कुंवर सिंह की कार्यस्थली होने का गौरव भी इस नगर को प्राप्त है। आरा स्थित ‘द लिटल हाउस’ एक ऐसा भवन है, जिसकी रक्षा अंग्रेज़ों ने 1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह से लड़ते हुए की थी।
कहते हैं कि अरण्य मंदिर से भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटते, यही वजह है कि अरण्य मंदिर में मां के दर्शन हेतु सिर्फ भोजपुर से ही नहीं, बल्कि प्रदेश के दूर दराज के हिस्सों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। आरा के शीश महल चौक से उत्तर-पूर्व छोर पर स्थित मां का इस मंदिर की स्थापना 2005 में हुई थी। मंदिर में स्थापित मां नगर की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। इस ऐतिहासिक मंदिर के बारे में कई धारणाएं और मान्यताएं हैं। इसी मंदिर वाले स्थान पर प्राचीन काल में सिर्फ आदिशक्ति की प्रतिमा थी। इस मंदिर के चारों ओर वन था। पांडव वनवास के क्रम में आरा में ठहरे थे। पांडवों ने आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की। मां ने युधिष्ठिर को स्वप्न में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करे। धर्मराज युधिष्ठिर ने मां आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित की।
आरण्य देवी मंदिर में भगवान राम ने की थी पूजा
कहा जाता है कि भगवान राम , लक्ष्मण और विश्वामित्र जब बक्सर से जनकपुर धनुष यज्ञ के लिए जा रहे थे तो आरण्य देवी की पूजा-अर्चना की। इसके बाद ही सोनभद्र नदी को पार किए थे। द्वापर युग में इस स्थान पर राजा मयूरध्वज राज करते थे। इनके शासनकाल में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ यहां आये थे। श्रीकृष्ण ने राजा के दान की परीक्षा लेते हुए अपने सिंह के भोजन के लिए राजा से उसके पुत्र के दाहिने अंग का मांस मांगा। जब राजा और रानी मांस के लिए अपने पुत्र को आरा (लकड़ी चीरने का औजार) से चीरने लगे तो देवी प्रकट होकर उनको दर्शन दी थीं। इस मंदिर में स्थापित बड़ी प्रतिमा को जहां सरस्वती का रूप माना जाता है, वहीं छोटी प्रतिमा को महालक्ष्मी का रूप माना जाता है।

आरण्य देवी की हैं दो बहनें
आरण्य देवी की मूर्तियां काले पत्थर की हैं। एक मूर्ति 4½ फुट ऊंची है और दूसरी 3½ फुट ऊंची है। यह कहा जाता है कि दोनों बहनें हैं। वे पीले रंग की साड़ी में उनके सिर पर फूल माला और मुकुट के साथ सज रही हैं। आरण्य देवी की दाहिने तरफ के मंदिर में राधा और कृष्ण की मूर्तियां हैं । इस मंदिर में वर्ष 1953 में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुधन् व हनुमान जी के अलावे अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गयी थी। ऐतिहासिक आरण्य देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती ही जा रही है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए जुटते है।
यहाँ है पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण महाभारत कालीन प्राचीन कुण्डवा शिवमंदिर मगर आज भी उपेक्षित है
हिन्दुओ के धार्मिक आस्था का केंद्र प्रखंड के प्राचीन कुण्डवा शिवमंदिर(कुडवा शिवमंड)।पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोंण से काफी महत्वपूर्ण। अपने अद्भुत शिल्पकला एवं बेहतरीन कारीगरी के कारण मंदिर को किंदवंतियो के अनुसार महाभारतकालीन होने का गौरव प्राप्त है।मंदिर की बनावट ही इसे पुरातन मंदिरों की श्रेणी में खड़ा करती है।

प्राचीन शिवमंदिर होने के कारण शिवरात्रि पर्व पर या सोमवार को दर्शनार्थियों की भारी भीड़ होती है। कुण्डवा शिवमंदिर भोजपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी पश्चिम आरा-बक्सर मुख्यमार्ग एनएच 84 से बिल्कुल सटे उतर दिशा में बिलौटी एवं शाहपुर के बीच अवस्थित है।यह प्राचीन शिवमंदिर कब बना इसका कोई लिखित प्रमाण तो नही मिलता,परंतु लोक गाथाओं,किंदवंतियो, बनावट, स्थापत्यकलाकृतियों से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह मंदिर महाभारत कालीन राजाओ द्वारा बनवाया गया हो।ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण यह मंदिर समुचित व्यवस्था एवं प्रोत्साहन के आभाव में ऐतिहासिक धरोहर की ओर आजतक पुरातत्ववेत्ताओं का ध्यान आकर्षित नही कर पाया।

वनकुंड की खुदाई में मिला शिवलिंग का आकार गोलाकार न होकर चपटा है जिसे बाणासुर ने स्थापित किया था । वर्तमान में मंदिर का अवशेष एक आयताकार झाड़ीनुमा ऊंचे टीले पर अवस्थित है जिसका क्षेत्रफल लगभग 5 एकड़ में फैला हुआ है। यह भूखंड टीले के बीचोबीच उतर दिशा की तरफ प्राचीन प्रधान शिवमंदिर अवस्थित है। सतह पर मंदिर लगभग 30 फिट लंबी 10 फिट चौड़ी है।करीब 30 फीट ऊंचे गुम्बज वाले इस मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ खुलता है जो अमूमन आम शिवमंदिरो से इसे भिन्न करता है।

मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग गोलाकार लंबा न होकर चपटा है।किंदवंतियो के अनुसार यह शिवलिंग मंदिर के पास के तालाब(कुंड) से प्राप्त हुआ था। बताया जाता है कि महाभारत कालीन असुरो का राजा वाणासुर यही आकर गंगानदी के मुख्यधारा के किनारे तपस्या करता था।तपस्या करने के उपरांत उसने यज्ञ करने की ठानी तथा यज्ञ के लिए हवन कुंड की खुदाई होने लगी। हवन कुंड के खुदाई के दौरान श्रमिकों का फावड़ा(कुदाल) किसी ठोस आधार से टकराया जिसके बाद इस कटे शिवलिंग जो कुदाल से कटने के बाद चपटे आकार के इस शिवलिंग को वाणासुर द्वारा मंदिर बनवाकर स्थापित किया गया। इस प्राचीन शिवमंदिर के समीप दीवार के सहारे कई प्राचीन टूटी फूटी मुर्तिया टीकाकार रखी गई है।काले पत्थरों से बनी यह मूर्तियाँ कृषकों द्वारा समय-समय पर कृषि कार्य हेतु खुदाई के दौरान प्राप्त हुई है।

मूर्तियों की बनावट से इसकी प्राचीनतम होने का एहसास होता है।इस मंदिर का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इसे बनाने में ईट का प्रयोग नही हुआ है।यह मंदिर वृहद शिलाखंडों को काटकर बनाया गया है। यद्यपि की यहाँ करीब 100 किमी तक पहाड़ का नामोनिशान नही है तो इतने बड़े शिलाखंडों को यहां तक कैसे लाया गया होगा।मंदिर की शिलाखंडों पर उकेरी गई कलाकृतियों को तत्कालीन कारीगरों की काबलियत को दर्शाता है।
वीरांगना ही नहीं, माहिर कूटनीतिज्ञ भी थीं रानी लक्ष्मीबाई
महारानी लक्ष्मीबाई की वीरांगना छवि को जनमानस में छापने का सबसे बड़ा काम कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी” ने किया। पिछली डेढ़ शताब्दी से वे भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की नायिका और अद्भुत वीरता की मिसाल के तौर पर लोक मानस में अंकित हैं। उनकी बहादुरी के किस्से और ज्यादा मशहूर इसलिए हो जाते हैं, क्योंकि उनकी सबसे ज्यादा तारीफ तो उनसे लड़ने वाले अंग्रेजों ने खुद की थी। आज भी अगर आप झांसी के किले में जाएं और वह स्थान देखें, जहां से रानी ने घोड़े सहित किले से छलांग लगा गई थीं, तो वह दृश्य सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

किले के निचले हिस्से में रखी गुलाम गौस खां की कड़क बिजली तोप बताती है कि कहने को वह लड़ाई एक रियासत को बचाने की थी, लेकिन असल में वह ऐसा इतिहास रच रही थी, जिससे आने वाले समय में राष्ट्रवाद, हिंदू-मुस्लिम एकता और महिला सशक्तीकरण जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा होने वाली थी लेकिन इस संवाद में रानी का वह रूप अक्सर लोक स्मृति में नहीं आ पाता कि वे कूटनीति की भी महारथी थीं। इसका सबसे पहला पहलू तो यह है कि जिन रानी को 1857 की क्रांति की नायिका माना जाता है, वे 1857 में युद्ध में ही नहीं उतरीं।
रानी ने तलवार उठाई फरवरी 1858 में.. तो रानी 10 मई 1857 को क्रांति की शुरुआत से लेकर फरवरी 1858 के बीच आखिर क्या कर रहीं थीं। क्या वे हाथ पर हाथ धरे देश में हो रही इस क्रांति को देख रहीं थीं। लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व को देखते हुए ऐसा मानना कठिन है. असल में इन छह-सात महीने में रानी बराबर इस बात की कोशिश कर रहीं थीं कि उनके राज्य को उसका जायज हक मिल जाए। उनके पति गंगाधर राव के निधन के बाद उनके दत्तक पुत्र को अंग्रेज झांसी का महाराज स्वीकार कर लें। इसके लिए रानी ने कूटनीति या राजनय के हरसंभव विकल्प पर काम किया। रानी के इन प्रयासों को झांसी के गजेटियर में विस्तार से दर्ज किया गया है।

रानी चाहती थीं कि अंग्रेजों से युद्ध न करना पड़े, ताकि झांसी की बेगुनाह जनता को इस लड़ाई की कीमत न चुकानी पड़े। यह कीमत कितनी भारी थी कि इसकी कल्पना हम आज शायद नहीं कर सकते, लेकिन रानी के वीरगति को प्राप्त होने के बाद झांसी को जिस तरह अंग्रेजों ने लूटा, वह अपने आप में अध्ययन का विषय है। इस लूट का वर्णन गदर के समय महाराष्ट्र से तीर्थयात्रा पर निकले वासुदेव गोडसे शास्त्री नाम के ब्राहृमण ने मराठी में लिखी किताब “माझा प्रवास” में किया। बाद में इसका हिंदी अनुवाद अमृत लाल नागर ने “आंखों देखा गदर” नाम से किया। इस पुस्तक में शास्त्री ने लूट की आंखों देखी लिखी है। युद्ध के बाद झांसी को पांच चरण में लूटा गया। लूट का सबसे पहला हक गोरे सैनिकों को मिला और उन्होंने सोना-चांदी और दूसरे कीमती सामान लूटे। उसके बाद भारतीय मूल के सैनकों ने लूटा। इस तरह पांच दिन तक लूट हुई और आखिर में झांसी की एक-एक चीज लूट ली गई।

रानी इसी त्रासदी से बचना चाहती थीं. उन्होंने आखिर तक कूटनीति का सहारा लिया, लेकिन अंत में हुआ यह कि अंग्रेजी सेना से बागी हुए भारतीय सैनिकों और आसपास के सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। इस लड़ाई में उन्होंने रानी को अपना नेता घोषित किया और महारानी के जयकारों के साथ युद्ध का यलगार कर दिया। तकरीबन यही स्थिति दिल्ली में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर और लखनऊ में बेगम जीनत महल के साथ हुई थी। इससे अंग्रेजों को यह संकेत गया कि रानी कूटनीतिक बातचीत सिर्फ दिखावे के लिए कर रही हैं और असल में युद्ध ही इसका मकसद है। जब बागी सैनिक झांसी के किले पर लक्ष्मीबाई के जयकारे लगाने लगे तो रानी ने उनका नेतृत्व करना स्वीकार किया और उसके बाद का इतिहास तो सबको मालूम ही है।
निकाह हलाला प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी सरकार, संविधान पीठ करेगी पड़ताल
नयी दिल्ली : विधि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि केंद्र सरकार निकाह और हलाला प्रथा का सुप्रीम कोर्ट में विरोध करेगी। यह एक ऐसा चलन है, जो मुस्लिम पुरुष को अपनी तलाकशुदा पत्नी से दोबारा निकाह का हक देता है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आने वाले दिनों में निकाह हलाला की कानूनी वैधता की पड़ताल करेगी।
अधिकारी ने बताया कि केंद्र सरकार का यह मानना है कि यह प्रथा लैंगिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है और उसने शीर्ष अदालत में इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। तब सुप्रीम कोर्ट ने केवल तीन तलाक पर सुनवाई करने का फैसला किया था। अदालत ने कहा था कि निकाह हलाला और बहुविवाह अलग मसला है।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। बाद में सरकार ने एक विधेयक लाकर तीन तलाक को दंडनीय अपराध घोषित किया था। वह बिल लोकसभा में तो पास हो गया था, लेकिन राज्यसभा में अटक गया। इस प्रस्तावित कानून में एक साथ तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित करते हुए तलाक देने वाले पति को तीन कैद की सजा का प्रावधान किया गया है।
कबीर की साखी…
कस्तूरी कुँडल बसै, मृग ढ़ुढ़े बब माहिँ.
ऎसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ..
प्रेम ना बाड़ी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय.
राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देई लै जाय ..
माला फेरत जुग गाया, मिटा ना मन का फेर.
कर का मन का छाड़ि, के मन का मनका फेर..
माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया शरीर.
आशा तृष्णा ना मुई, यों कह गये कबीर ..
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.
खलक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद..
वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर.
परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर..
साधु बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय.
तपन बुझावे और की, अपनो पारस लाय..
सोना सज्जन साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार.
दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धकै दरार..
जिहिं धरि साध न पूजिए, हरि की सेवा नाहिं.
ते घर मरघट सारखे, भूत बसै तिन माहिं..
मूरख संग ना कीजिए, लोहा जल ना तिराइ.
कदली, सीप, भुजंग-मुख, एक बूंद तिहँ भाइ..
तिनका कबहुँ ना निन्दिए, जो पायन तले होय.
कबहुँ उड़न आखन परै, पीर घनेरी होय..
बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि.
हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि..
ऐसी बानी बोलिए,मन का आपा खोय.
औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय..
लघता ते प्रभुता मिले, प्रभुत ते प्रभु दूरी.
चिट्टी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी..
निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय.
बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय..
मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं.
मुकताहल मुकता चुगै, अब उड़ि अनत ना जाहिं..
वॉल्टन परिवार दुनिया में सबसे अमीर बिजनेस घराना, टॉप-10 में अंबानी परिवार 7वें नंबर पर
नई दिल्ली : ब्लूमबर्ग ने दुनिया के 25 सबसे अमीर बिजनेस घराने की सूची जारी की है। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक, 152 अरब डॉलर (10.33 लाख करोड़ रुपए) के साथ वॉलमार्ट चलाने वाला वॉल्टन परिवार दुनिया के सबसे अमीर बिजनेस घराने की लिस्ट में पहले स्थान पर है। वहीं दुनिया की टॉप 10 बिजनेस घराने की सूची में अंबानी परिवार 43 अरब डॉलर (2.96 लाख करोड़ रुपए) की नेटवर्थ के साथ सातवें नंबर पर हैं। इसमें शामिल 25 परिवार 1.1 लाख करोड़ डॉलर (74.99 लाख करोड़ रुपए) के मालिक है। इन परिवारों की कुल वैल्यू एप्पल या इंडोनेशिया की GDP से भी ज्यादा है।
दुनिया के टॉप- 10 सबसे अमीर बिजनेस घराने-
1. वॉल्टन परिवार
कंपनी- वॉलमार्ट
नेटवर्थ- 10.33 लाख करोड़ रुपए (152 अरब डॉलर)
फैमिली रिटेल मार्केट की सबसे बड़ी कंपनी वॉलमार्ट है। सैम वॉल्टन ने 1945 में वॉलमार्ट की शुरुआत की थी। वॉलमार्ट के दुनियाभर में करीब 12000 स्टोर हैं।
2. कोच ब्रदर्स
कंपनी- कोच इंडस्ट्रीज
नेटवर्थ- 6.73 लाख करोड़ रुपए (99 अरब डॉलर)
फ्रेड कोच ने 1940 में वुड रिवर ऑयल एंड रिफाइनरी कंपनी की स्थापना की थी। सेहत खराब होने की वजह से जून 2018 में डेविड कोच फैमिली बिजनेस के लीडरशिप से हट गए हैं। चार भाई फ्रेडरिक, चार्ल्स, डेविड और विलियम ने मिलकर पिता के तेल रिफाइनरी के बिजनेस को संभाला। कंपनी का सालाना रेवेन्यू करीब 100 अरब डॉलर है।
3. मार्स फैमिली
कंपनी- मार्स
नेटवर्थ- 6.12 लाख करोड़ रुपए (90 अरब डॉलर)
फ्रैंक मार्स ने स्कूल के दिनों में चॉकलेट बनाने की कला सीख ली थी। एमएंडएम, मिल्की वे एंड मार्स बार से कंपनी ने खास पहचान बनाई है। कंपनी का रेवेन्यू 35 अरब डॉलर है। कंपनी का बिजनेस फैमिली संभाल रही है।
4. वैन डेम, डी मेवियस एंड डी स्पोएलबर्च
कंपनी- एनह्यूजर बुश ब्रयूरीज
नेटवर्थ- 3.67 लाख करोड़ रुपए (54 अरब डॉलर)
14वीं शताब्दी में तीन फैमिली वैन डेम, डी मेवियस और डी स्पोएलबर्च ने मिलकर बिजनेस की शुरुआत की थी। कंपनी ब्रेवरेजेज बनाती है। कंपनी की कुल वेल्थ 54 अरब डॉलर है। स्टेला अलटियोज, बडवाइजर और कोरोना इनके सबसे ज्यादा बिकने वाले प्रोडक्ट्स हैं।
5. ड्यूमस फैमिली
कंपनी- हर्मज
नेटवर्थ- 3.33 लाख करोड़ रुपए (49 अरब डॉलर)
साल 1837 में थियेरी हर्मस ने ड्यूमस की शुरूआत की थी। कंपनी नोबेलमेन के लिए राइडिंग गियर बनाती है। जीन और लुइस डुमस ने बिजनेस को लग्जरी फैशन का ग्लोबल लीडर बनाया। पीयेरे-एलिक्स ड्यूमस कंपनी के आर्टिस्टिक्स डायरेक्टर, जबकि एक्सल ड्यूमस कंपनी के चेयरमैन हैं।
6. वरथीमर फैमिली
कंपनी- शॅनल
नेटवर्थ- 3.11 लाख करोड़ रुपए (46 अरब डॉलर)
शॅनल लग्जरी गुड्स सेक्टर की कंपनी है। पियेरे वरथीमर ने 1924 एक परफ्यूम कॉन्ट्रैक्ट कोको शॅनल को फंडिंग किया था। 2017 में कंपनी का रेवेन्यू 9.6 अरब डॉलर था। वरथीमर के पास रेसहॉर्स और वाइनयार्ड्स भी है।
![]()
7. अंबानी परिवार
कंपनी- रिलायंस इंडस्ट्रीज
नेटवर्थ- 2.96 लाख करोड़ रुपए (43.4 अरब डॉलर)
मुकेश औऱ अनिल अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी ने 1957 में रिलायंस इंडस्ट्रीज की शुरुआत की थी। 2002 में धीरूभाई की मौत के बाद उनके बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने इसे संभाला। कंपनी पेट्रोलियम, पेट्रोकेमिकल्स, रिटेल और टेलीकॉम सेक्टर में बिजनेस कर रही है। मुकेश मुंबई में दुनिया की सबसे महंगी 27 मंजिला इमारत में रहते हैं।
8. क्वांट फैमिली
कंपनी- बीएमडब्ल्यू
नेटवर्थ- 2.91 लाख करोड़ रुपए (43 अरब डॉलर)
हेरबर्ट क्वांट ने को दुनिया की सबसे लग्जरी व्हीकल बनाने वाली कंपनी बीएमडब्ल्यू को सफल बनाने का श्रेय जाता है। 2015 में मतरिआर्च, जोहाना क्वांट की मौत के बाद उनके बच्चे स्टीफ क्वांट और सुसेन क्लैटन कंपनी को चला रहे हैं। इसके अलावा क्वांट फैमिली जर्मनी की लॉजिस्टिक कंपनी लॉगविन और डच सिक्युरिटी सॉफ्टवेयर कंपनी गेमाल्टो में निवेश किया है।
9. करगिल मैकमिलन फैमिली
कंपनी- करगिल
नेटवर्थ- 2.88 लाख करोड़ रुपए (42.3 अरब डॉलर)
साल 1865 में विलियम डब्ल्यू करगिन ने एक ग्रेन वेयरहाउस से करगिल की शुरुआत की थी। फूड और एग्रीकल्चर के लिए काम करने वाली ये कंपनी अमेरिका की बड़ी कंपनी है। उनके जाने के बाद उनकी फैमिली ने बिजनेस को संभाला।
10. बोहरिंगर वोन बाउमबच फैमिली
कंपनी- बोहरिंगर इंगेलहियम
नेटवर्थ- 2.87 लाख करोड़ रुपए (42.2 अरब डॉलर)
जर्मन ड्रगमेकर बोहरिंगर इंग्लेहेम की स्थापना 1885 में अल्बर्ट बोहरिंगर ने की थी। 130 से अधिक वर्षों बाद बोहरिंगर परिवार समेत वॉन बाम्बाचस इस कंपनी को चला रहा है। 1939 में अल्बर्ट बोहरिंगर का निधन हो गया था। 2010 में कंपनी के 125 साल पूरे हुए थे।
(साभार – दैनिक भास्कर )
यूजीसी की जगह उच्च शिक्षा आयोग ला रही है सरकार
नई दिल्ली : उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को मजबूती देने और फर्जी विश्वविद्यालयों पर लगाम कसने के लिए सरकार ने यूजीसी एक्ट में बड़ा बदलाव करने का फैसला लिया है। इसके तहत यूजीसी नाम की संस्था अब खत्म हो जाएगी। इसकी जगह एचईसीआई (हायर एजुकेशन कमीशन आफ इंडिया) लेगा। लेकिन इसके पास विश्वविद्यालयों और कालेजों को वित्तीय मदद देने का अधिकार अब नहीं होगा। अब यह अधिकार सीधे मंत्रालय के पास होगा।
नए एक्ट के तहत एचईसीआई के पास फर्जी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में फर्जी डिग्री बांट रहे संस्थानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई और मान्यता रद करने तक का अधिकार होगा। साथ ही अनियमितता बरतने वालों के खिलाफ जुर्माना और तीन साल की सजा का भी अधिकार होगा। वहीं नए एक्ट के तहत सभी विवि के लिए एक ही आयोग होगा। इनमें केंद्रीय विवि, राज्य विवि, निजी विवि, डीम्ड विवि आएंगे। जिनके लिए वह नियम और दिशा-निर्देश तय कर सकेंगे।
अभी निजी और डीम्ड जैसे विश्वविद्यालयों के लिए नियम मंत्रालय से तय होते है। इसके साथ ही एचईसीआई के दायरे में ऑनलाइन रेगुलेशन, नैक को मजबूती देने, विवि और कालेजों को स्वायत्ता, स्वयं पोर्टल सहित ओपन लर्निग रेगुलेशन आदि तय करने का भी काम होगा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट कर इस बदलाव पर खुशी जताई और कहा कि इससे उच्च शिक्षा में चल रहे इंस्पेक्टर राज का भी खात्मा होगा।

मौजूदा समय में मंत्रालय के पास विवि और कालेजों को ज्यादा ग्रांट देने और निरीक्षण के नाम पर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी सामने आते रहे है। यही वजह है कि नए बदलाव के बाद गठित होने वाले एचईसीआई के पास वित्तीय अधिकार नहीं होगा। उसका फोकस सिर्फ विश्वविद्यालयों के पठन-पाठन और शोध क्षेत्र में किए जा रहे उसके काम-काज को लेकर रहेगा। इसके अलावा मान्यता जैसे विषयों का निराकरण ऑनलाइन किया जाएगा। इसके लिए एचईसीआई के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं होगी। नए एक्ट के तहत गठित होने वाले एचईसीआई में चेयरमैन, वाइस चेयरमैन के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े 12 सदस्य भी होंगे। इसके साथ ही आयोग का एक सचिव भी होगा, जो सदस्य सचिव के रुप में काम करेगा। इन सभी की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। चेयरमैन का चयन कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में गठित एक चार सदस्यीय सर्च कमेटी करेगी। इनमें उच्च शिक्षा सचिव भी बतौर सदस्य शामिल होंगे।




