Thursday, July 9, 2026
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मध्यप्रदेश के कड़कनाथ चिकन को मिला जीआई तमगा

इंदौर : देश की जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री ने मध्यप्रदेश के झाबुआ की पारंपरिक प्रजाति के कड़कनाथ मुर्गे को लेकर सूबे के दावे पर मंजूरी की मुहर लगा दी है। करीब साढ़े छह साल की लम्बी जद्दोजहद के बाद झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम भौगोलिक पहचान (जीआई) का चिन्ह पंजीकृत किया गया है।

इस निशान के लिये सहकारी सोसायटी कृषक भारती कोऑपरेटिव लिमिटेड (कृभको) के स्थापित संगठन ग्रामीण विकास ट्रस्ट के झाबुआ स्थित केंद्र ने आवेदन किया था।

जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक “मांस उत्पाद तथा पोल्ट्री एवं पोल्ट्री मीट की श्रेणी ” में किये गये इस आवेदन को 30 जुलाई को मंजूर कर लिया गया है। यानी झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम जीआई तमगा पंजीकृत हो गया है । यह जीआई पंजीयन सात फरवरी 2022 तक वैध रहेगा।

ग्रामीण विकास ट्रस्ट के क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधक महेंद्र सिंह राठौर ने “पीटीआई-भाषा” से इसकी तसदीक की । उन्होंने बताया, “हमारी अर्जी पर झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम जीआई चिन्ह का पंजीयन हो गया है । हमें इसकी औपचारिक सूचना मिल चुकी है।”

जानकारों ने बताया कि जीआई पंजीयन का चिन्ह विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले ऐसे उत्पादों को प्रदान किया जाता है जो अनूठी खासियत रखते हैं। जीआई चिन्ह के कारण कड़कनाथ चिकन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी पहचान भी हासिल होगी जिससे इसके निर्यात के रास्ते खुल सकते हैं। इस चिन्ह के कारण झाबुआ के कड़कनाथ चिकन के ग्राहकों को इस मांस की गुणवत्ता का भरोसा मिलेगा, जबकि इस मांस के उत्पादकों को नक्कालों के खिलाफ पुख्ता कानूनी संरक्षण हासिल होगा।

झाबुआ मूल के कड़कनाथ मुर्गे को स्थानीय जुबान में “कालामासी” कहा जाता है। इसकी त्वचा और पंखों से लेकर मांस तक का रंग काला होता है। कड़कनाथ के मांस में दूसरी प्रजातियों के चिकन के मुकाबले चर्बी और कोलेस्ट्रॉल काफी कम होता है। झाबुआवंशी मुर्गे के गोश्त में प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। कड़कनाथ चिकन की मांग इसलिये भी बढ़ती जा रही है, क्योंकि इसमें अलग स्वाद के साथ औषधीय गुण भी होते हैं । कड़कनाथ प्रजाति के जीवित पक्षी, इसके अंडे और इसका मांस दूसरी कुक्कुट प्रजातियों के मुकाबले काफी महंगी दरों पर बिकता है।

झाबुआ की गैर सरकारी संस्था ने आठ फरवरी 2012 को कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस को लेकर जीआई प्रमाणपत्र की अर्जी दी थी। लम्बी जद्दोजहद के बाद इस अर्जी पर अंतिम फैसला हो पाता, इससे पहले ही एक निजी कम्पनी यह दावा करते करते हुए जीआई तमगे की जंग में कूद गयी थी कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में मुर्गे की इस प्रजाति को अनोखे ढंग से पालकर संरक्षित किया जा रहा है।

हालांकि, जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री ने झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस को लेकर मध्यप्रदेश का दावा मार्च में शुरूआती तौर पर मंजूर कर लिया था और अपनी भौगोलिक उपदर्शन पत्रिका में इस बारे में विज्ञापन भी प्रकाशित किया था। इसके बाद पड़ोसी छत्तीसगढ़ ने इस प्रजाति के लजीज मांस को लेकर जीआई प्रमाणपत्र हासिल करने की जंग में कदम पीछे खींच लिये थे।

भारत के पास 2018-19 में होगा बिजली अधिशेष : केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण

नयी दिल्ली : केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण (सीईए) के अनुसार चालू वित्त वर्ष में देश में व्यस्ततम समय के इतर बिजली की उपलब्धता 4.6% अधिक और व्यस्त समय में 2.5% अधिक रहने का अनुमान है। इस प्रकार चालू वित्त वर्ष में भारत एक बिजली अधिशेष वाला राज्य होगा।
पिछले साल सीईए ने अपनी भार और उत्पादन में संतूलन संबंधी रपट (एलजीबीआर) में अनुमान जताया था कि 2017-18 में भारत एक बिजली अधिशेष वाला राज्य होगा। लेकिन इस दौरान पूरे देश में अधिक व्यस्त समय बिजली की आपूर्ति में 2.1% की कमी और बाकी समय में 0.7% की कमी देखी गई।
चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में अधिक मांग के समय बिजली आपूर्ति में कमी 0.7% जबकि सामान्य समय में कमी 0.6% रही ।
वित्त वर्ष 2018-19 की एलजीबीआर के मुताबिक बिजली आपूर्ति की अखिल भारतीय स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता है कि खपत की दृष्टि से सबसे व्यस्त अवधि में बिजली का अधिशेष 2.5% और सामान्य समय में अधिशेष 4.6% रहेगा। इस प्रकार इस वित्त वर्ष में भारत एक बिजली अधिशेष राज्य रहेगा। बिजली विशेषज्ञों के अनुसार, ‘‘भारत एक बिजली अधिशेष राज्य है क्योंकि इसकी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 3,44,000 मेगावाट है जबकि उसकी बिजली की अधिकतम मांग 1,70,000 मेगावाट तक ही है।
बिजली आपूर्ति में कमी की मुख्य वजह वितरण कंपनियों द्वारा बिजली खरीद कम करना है। इसकी दो वजह हैं या तो उनके पास बिजली खरीदने के पैसे नहीं है या वह बिजली बिलों की कम वसूली से डरे रहते हैं।’’
इसके अलावा बिजली आपूर्ति में कमी की एक और वजह सूदूर और पहाड़ी क्षेत्रों में बिजली की पहुंच और वितरण कम होना है। रपट के अनुसार पश्चिमी, उत्तरी और पूर्वोत्तर इलाकों में बिजली अधिशेष का प्रतिशत क्रमश: 1.9%, 14.8% और 22.9% रहेगा। हालांकि पूर्वी और दक्षिणी इलाकों को क्रमश: 4.2% और 0.7% बिजली आपूर्ति में कमी का सामना करना पड़ेगा।

बेटी की याद में क्‍लर्क पिता ने भरी 45 लड़कियों की फीस

बंगलुरू : कर्नाटक के एक स्‍कूल में एक पिता ने ऐसा कुछ किया, जिसकी चर्चा हर जगह हो रही है। कर्नाटक के एक गांव के एमपीएसएस गर्वमेंट हाईस्‍कूल के क्‍लर्क बसवराज ने 45 गरीब लड़कियों की स्कूल फीस भरी, जिसकी लिए उनकी तारीफ हो रही है। ऐसा उन्होंने अपनी बेटी की याद में किया, जिसकी मौत हो चुकी है। ऐसा करके उन लड़कियों के वह भगवान स्‍वरूप हो गए हैं। बसवराज ने कहा कि इस साल से मैं उन गरीब लड़कियों की फीस भरूंगा जो स्कूल में पढ़ाई करती हैं।
बता दें कि बसवराज कर्नाटक के कलबुर्गी शहर के मक्‍तामपुर में रहते हैं। उनकी बेटी धनेश्‍वरी की बीमार होने के कारण मौत हो गयी थी, जिसके बाद बसवराज ने कुछ नेक काम करने का सोचा और 45 गरीब लड़कियों की फीस भरी। उन्होंने गरीब बच्चियों की जिंदगी में उजाला करने का सोचा। इससे सरकारी स्‍कूल की लड़कियां काफी खुश हैं।
फातिमा नाम की लड़की ने कहा कि ‘हम गरीब परिवार से हैं। हम स्कूल फीस देने में असमर्थ हैं। बसवराज सर ने बेटी की याद में ये नेक काम किया। मैं उम्‍मीद करती हूं कि बसवराज की बेटी स्‍वर्ग में पिता के इस कार्य से गर्व महसूस कर रही होगी। भगवान उनकी बेटी की आत्मा को शांति दे।’ लोग बासवराज की तारीफ कर रहे हैं। ट्विटर पर एक यूजर ने लिखा है कि ‘क्या कोई अमीर आदमी ऐसा कर सकता है? सिर्फ गरीब आदमी ही लोगों की दिक्कतों को समझ सकता है। अमीर आदमी सिर्फ पैसों की बरबादी और शादी-पार्टी में पैसा खर्च करते हैं।’

भारतीय मूल के गणितज्ञ अक्षय वेंकटेश को मिला ‘फिल्ड्स मेडल’ पुरस्कार

नयी दिल्ली : मशहूर भारतीय-ऑस्ट्रेलियाई गणितज्ञ अक्षय वेंकटेश सहित चार विजेताओं को गणित के विशिष्ट फिल्ड्स मेडल से सम्मानित किया गया है। गणित के क्षेत्र में इसे नोबेल पुरस्कार के समान माना जाता है। 36 वर्षीय वेंकटेश को यह मेडल गणित विषय में विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया है।
वेंकटेश के अलावा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इरानी-कुर्द मूल के प्रोफेसर कौचर बिरकर, बॉन विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले जर्मनी के पीटर स्कूल्ज और ईटीएच ज्यूरिख में इतालवी गणितज्ञ एलिसो फिगेली को मेडल से सम्मानित किया गया है। प्रत्येक विजेता को 15,000 कनाडाई डॉलर का नकद पुरस्कार भी दिया गया है।
बता दें कि विशिष्ट फिल्ड्स मेडल चार साल में एक बार दिया जाता है। ये मेडल 40 साल से कम उम्र के सबसे उदीयमान गणितज्ञ को दिया जाता है। हर बार कम से कम दो और विशेषत: चार लोगों को पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।
गौरतलब है कि अक्षय वेंकटेश का जन्म नयी दिल्ली में हुआ था। वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं। जब वह दो साल के थे तब उनके माता-पिता ऑस्ट्रेलिया चले गए थे। वेंकटेश बचपन से ही प्रतिभाशाली थे। उन्होंने उच्च विद्यालय में प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं भौतिकी और गणित ओलंपियाड्स में भाग लिया था और 11 व 12 वर्ष की आयु में दो विषयों में पदक जीते थे। उन्होंने उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में हाई स्कूल समाप्त किया और 16 साल की उम्र में, 1997 में गणित में प्रथम श्रेणी में अपना ग्रेजुएशन किया। केवल 20 साल उम्र में ही उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर ली।
वेंकटेश ने संख्या सिद्धांत, अंकगणितीय ज्यामिति, टोपोलॉजी, ऑटोमोर्फिक रूपों और एर्गोडिक सिद्धांत में उच्चतम स्तर पर काम किया है। उनके शोध को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें ओस्ट्रोस्की पुरस्कार, इंफोसिस पुरस्कार, सलेम पुरस्कार और शास्त्र रामानुजन पुरस्कार शामिल हैं।

कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूंगा नहीं, वरदान मांगूंगा नहीं

शिवमंगल सिंह सुमन स्मरण -यह आलेख गत 5 अगस्त को लिखा गया था। हमारा प्रयास रहता है कि हमारे हर प्रयास में एक प्रेरणा रहे। यह उसी दृष्टि से किया गया प्रयास है। 

प्रो. जयराम शुक्ल

आज राष्ट्रकवि डा.शिवमंगल सिंह सुमन की जयंती है। सुमनजी, दिनकरजी की तरह ऐसे यशस्वी कवि थे जिनकी हुंकार से राष्ट्र अभिमान की धारा फूटती थी। संसद में अटलजी ने स्वयं की कविता से ज्यादा सुमनजी की कविताएँ उद्धृत की। हाल यह  कि सुमनजी की कई कविताएँ अब अटल बिहारी वाजपेयी के नाम से प्रचलित हैं। अटलजी सुमनजी को अपना साहित्यिक गुरू मानते हैं। वे सुमनजी ही थे जो अटलजी को कवि सम्मेलनों तक खींच ले गए। इसीलिए सुमनजी व अटलजी की रचनाधर्मिता में अद्भुत साम्य मिलता है।

सुमनजी दिनकर की भाँति राष्ट्रीय गौरव के उद्घोष थे। वैसे सुमनजी का जन्म 5 अगस्त 1915 को  झगरपुर उन्नाव में हुआ था पर वे खुद को रिमाड़ी मानने व कहे जाने पर गौरवान्वित महसूस करते थे। अमरपाटन सतना का प्रतापगढी से उनका ताल्लुकात रहा है। उनका परिवार रीवा राजघराने से सीधे जुडा़ है।

सन् 1990 में मध्यप्रदेश साहित्य सम्मेलन ने उन्हें भवभूति अलंकरण से अलंकृत करने का निर्णय लिया। मेरे आग्रह पर बाबू जी(श्री मायाराम सुरजन जो उस समय सम्मेलन के अध्यक्ष थे) ने यह आयोजन रीवा में रखा। मेरा सौभाग्य है कि मैं इस कार्यक्रम का संयोजक था।

मानस भवन में आयोजित वह समारोह आज भी जिसको याद होगा..वह निश्चित ही रोमांचित हो जाएगा उन क्षणों का स्मरण करके। सुमनजी उस कार्यक्रम में एक घंंटे से ज्यादा बोले, और भावविभोर होकर बोले। अपने बचपन,परिजन भाइयों को मंच से याद किया। विंध्य और रीवा की महत्ता बताई। कुछ कविताएं भी पढ़ी।

शुरुआत अपनी परिचयात्मक पंक्तियाँ से की..

मैं शिप्रा सा सरल तरल बहता हूँ

मैं कालिदास की शेषकथा कहता हूँ

ये मौत हमारा क्या कर सकती है

मै महाकाल की नगरी में रहता हूँ।

ये पंक्तियां सुमनजी के परिचय की ताउम्र सिग्नेचर ट्यून बनी रही।

अवंतिका वासी सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें सुमनजी का सानिद्ध मिला और उन लोगों ने भी दैवतुल्य मान सम्मान दिया। मुझे याद है कि आयोजन की पूर्व संध्या सुमनजी का साक्षात्कार लेने मेजर साहब(कुंवर अर्जुन सिंह जी की ससुराल जहाँ वे रुके थे) के घर गया। मेजर शिवप्रसाद सिंह उनके चचेरे भाई थे। शाम का वक्त था वे अपने सभी भाइयों के साथ जमे रमे थे। लौटने लगा तो जबरिया बैठा लिया यह कहते हुए कि देखो हम भाई मिलते हैं तो कैसे धमाल मचता है। उस शाही महफिल में मेजर साहब तो थे ही शिवमोहन सिंह जी व शिवचरण सिंह कक्काजी भी थे।

दूसरे दिन इस महफिल का उन्होंने मंच से अपने भाषण में भी उल्लेख किया..और अपने व भाइयों के नाम महिमा बताने लगे कि देखो हम सभी भाई शिव के गण हैं।

बहरहाल सुमनजी ने तबीयत से साक्षात्कार दिया वह देशबंन्धु के पहले पन्ने पर छपा। फिर सम्मेलन की पत्रिका .विवरणिका..ने भी विशेषांक के रूप में छापा। वह मेरे श्रेष्ठ साक्षात्कारों में से एक है।

सुमनजी ने कविता की शर्त बताई.. जो जन की जुबान में बस जाए वही कविता है। मैने भले ही जितना लिखा पर जो भी जन की जुबान पर है मैं मानता हूँ कि उतना ही सार्थक लिखा। मैंने साक्षात्कार की जो भूमिका लिखी थी समारोह में प्रायः सभी ने उसका उल्लेख किया। ..लिखने, दिखने और बोलने का त्रिवेणी संगम देखना है तो सुमनजी में देखिए।

सुमनजी लिखते तो अद्भुत थे ही, उससे अच्छा प्रस्तुत करते थे..उनकी भाषण कला बेहतर थी या लेखन कला तय कर पाना मुश्किल। दिखने में तो शुभ्रवस्त्रावृता थे ही साक्षात् वाणी पुत्र लगते थे। उनकी स्मृति को नमन…

यहां वो कविता प्रस्तुत कर रहे हैं जिसे अटलजी  ने तेरह दिन की सरकार के पतन के दिन संसद में पढी थी..आज भी इस कविता को प्रायः लोग अटल जी की ही मानकर चलते हैंं।

संघर्ष पथपर जो मिले

यह हार एक विराम है

जीवन महासंग्राम है

तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

स्‍मृति सुखद प्रहरों के लिए

अपने खंडहरों के लिए

यह जान लो मैं विश्‍व की संपत्ति चाहूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

क्‍या हार में क्‍या जीत में

किंचित नहीं भयभीत मैं

संधर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

लघुता न अब मेरी छुओ

तुम हो महान बने रहो

अपने हृदय की वेदना मैं व्‍यर्थ त्‍यागूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

चाहे हृदय को ताप दो

चाहे मुझे अभिशाप दो

कुछ भी करो कर्तव्‍य पथ से किंतु भागूँगा नहीं।

वरदान माँगूँगा नहीं।।

(साभार)

अमेरिका ने भारत से कहा, ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’

नयी दिल्ली :   अमेरिका ने फ्रेंडशिप डे पर खास अंदाज में भारत से दोस्ती का इजहार किया है। भारत में स्थित अमेरिकी दूतावास ने ‘शोले’ फिल्म के गाने ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ की मिसाल देते हुए फ्रेंडशिप डे पर भारत को मुबारकबाद दी है।

इसके साथ ही अमेरिकी दूतावास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हाथ मिलाते हुए फोटो भी ट्वीट की है। इसमें दोनों नेता हंसते हुए दिखाई दे रहे हैं। हाल में भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में काफी प्रगति हुई है।

एक दिन पहले ही अमेरिका ने भारत को ‘रणनीतिक व्यापार अधिकार-पत्र-1’ (एसटीए-1) का दर्जा दिया है। अभी तक यह दर्जा एशिया में सिर्फ जापान और दक्षिण कोरिया के पास ही था।  गौरतलब है कि दोस्ती के मामले में भारतीय सिनेमा की यादगार फिल्म शोले के जय-वीरू की मिसाल अक्सर दी जाती है।

1 मिनट 45 सेकेंड का वीडियो

अमेरिकी दूतावास द्वारा फ्रेंडशिप डे पर किए गए ट्वीट में दूतावास के कर्मचारी ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गाने पर डांस करते दिख रहे हैं। 1 मिनट 45 सेकेंड के इस वीडियो को अब तक 1500 से ज्यादा लोग देख चुके हैं। वीडियो के साथ लिखा गया है कि भारत अमेरिका की दोस्ती साल 2018 में मजबूत होती गई है। हम आप सभी को फ्रेंडशिप डे की मुबारकबाद देते हैं।

रक्षा व्यापार में भी बढ़ोतरी

भारत और अमेरिका के बीच लगातार रक्षा व्यापार बढ़ रहा है। एशिया में चीन की बढ़ती चुनौती को देखते हुए अमेरिका भारत की अहमियत को बहुत अच्छी तरह समझता है।

वहीं भारत भविष्य की रणनीतियों को देखते हुए विदेश नीति में अमेरिका को अहम स्थान दे रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका भारत को अहम रणनीतिक साझेदार का दर्जा पहले ही दे चुका है।

यारी…तेरी यारी

दोस्ती की कसमें खाना एक बात है और उसे निभाना दूसरी बात है। दोस्ती हो या कोई भी रिश्ता, वह एक दिन की कहानी नहीं है। एक पल से शुरू हुई बात अफसाना बन सकती है और यह हमारे हाथ में है। दोस्त तो हर जगह हो सकते हैं मगर उनको सहेजना भी एक कला है। आप भी यह कला जान सकते हैं, बस इन बातों का ध्यान जरूर रखें –
दोस्त बनिए बॉस नहीं। ठीक है कि दोस्तों पर हक जताया जा सकता है मगर हक जताने और हुकूम चलाने में फर्क है। इस फर्क को समझना और दोस्तों की सुनकर उनको समझना भी जरूरी है।
दोस्तों के बीच हंसी-मजाक होते रहते हैं, लेकिन बात-बात पर अपने दोस्तों का मजाक बनाने से बचें। दोस्तों का काम एक-दूसरे को सपोर्ट करना होता है न की एक-दूसरे को नीचा दिखाना नहीं होता।
आज के दौर में वक्त देना मुश्किल है। ऐसे में आप सबको समय चुराना पड़ेगा। थोड़ी सी कोशिश से यह मुमकिन है। दोस्त ताजी हवा का झोंका हैं तो उनके साथ तो एक शाम बनती ही है। अगर मुमकिन हो तो सप्ताहांत में या छुट्टियों में घूम आया कीजिए। कोशिश कीजिए कि उसकी जरूरत के वक्त वह अकेला न रहे, आप उसके साथ रहें।
गलती किसी से भी हो सकती है और अपनी गलती को मान लेने में ही समझदारी होती है। अगर आपकी किसी गलती की वजह से आपका दोस्त आप से नाराज हो जाए तो उसे सॉरी कहिए और मना लीजिए। कभी – कभी एहसास दिलाना पड़ता है दोस्तों को कि वह हमारे लिए कितने खास हैं।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ मतलब पड़ने पर या काम पड़ने पर ही अपने दोस्तों को याद करते हैं। अगर आप भी ऐसा करते हैं तो एक बार अपने बर्ताव पर ध्यान दें। अगर आपको दोस्त ऐसे मिले हैं तो एक दूरी बनाकर रखें मगर दोस्ती तोड़ें नहीं।

(तस्वीर – साभार)

रेमन मैगसायसाय पुरस्कार विजेताओं में दो भारतीयों का नाम शामिल

मनीला : दो भारतीय नागरिकों भरत वटवाणी और सोनम वांगचुक का नाम इस वर्ष के रेमन मैगसायसाय पुरस्कार के विजेताओं में शामिल है। इस पुरस्कार को एशिया का नोबेल पुरस्कार माना जाता है। इन दोनों भारतीयों का नाम उन छह लोगों में शामिल है जिन्हें आज विजेता घोषित किया गया। रेमन मैगसायसाय अवार्ड फाउंडेशन ने कहा कि वटवाणी की यह पहचान भारत के मानसिक रूप से पीड़ित निराश्रितों को सहयोग एवं उपचार मुहैया कराने में उनके साहस और करुणा तथा समाज द्वारा नजरंदाज किये गए व्यक्तियों की गरिमा को बहाल करने के कार्य के प्रति उनके दृढ़ और उदार समर्पण के लिए की गई है। ’वांगचुक (51) को यह पहचान उत्तर भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में ‘‘ शिक्षा की विशिष्ट व्यवस्थित , सहयोगी और समुदाय संचालित सुधार प्रणाली के लिए की गई है जिससे लद्दाखी युवाओं के जीवन के अवसरों में सुधार हुआ। इसके साथ ही यह आर्थिक प्रगति के लिए विज्ञान एवं संस्कृति का उपयोग करने के लिए रचनात्मक रूप से स्थानीय समाज के सभी क्षेत्रों को सकारात्मक रूप से लगाने को लेकर उनके कार्य के लिए किया गया है। उनके इस कार्य से विश्व में अल्पसंख्यक लोगों के लिए एक उदाहरण बना। ’इसके साथ ही इस पुरस्कार के अन्य विजेताओं में युक चांग (कंबोडिया), मारिया डी लोर्ड्स मार्टिंस क्रूज (पूर्वी तिमोर), होवर्ड डी (फिलिपिंस) और वी टी होआंग येन रोम (वियतनाम) शामिल हैं। रेमन मैगसायसाय अवार्ड फाउंडेशन अध्यक्ष कारमेनसिता एबेला ने कहा कि विजेता स्पष्ट रूप से एशिया की उम्मीद के नायक हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से समाज को आगे बढ़ाया। रेमन मैगसायसाय पुरस्कार एशिया का सबसे बड़ा पुरस्कार है। इसकी स्थापना 1957 में फिलिपिन के तीसरे राष्ट्रपति की स्मृति में की गई थी और इस पुरस्कार का नाम उनके नाम पर रखा गया है। यह पुरस्कार औपचारिक रूप से 31 अगस्त 2018 को फिलिपिन के सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रदान किया जाएगा।

गोवा सरकार बनाएगी 60,000 जैव शौचालय: पर्रिकर

पणजी : गोवा सरकार राज्य को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 280 करोड़ रुपए की लागत से 60,000 जैव शौचालय बनवाएगी। मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने  हाल ही में  प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस विधायक विल्फ्रेड़ डिसूजा के प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी।
मुख्यमंत्री ने कहा , ‘‘ हम स्वच्छ भारत अभियान के तहत राज्य को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए 60,000 जैव शौचालय बनवाएंगे।राज्य संचालित गोवा अपशिष्ट प्रबंधन निगम इस योजना के तहत 12 अगस्त तक जैव शौचालय की खरीद के लिए निविदांए जारी करेगा। ’पंचायत निदेशालय तथा ग्रमीण विकास एजेंसी (आरडीए) इस योजना को लागू करने में निगम का सहयोग करेगी।
उन्होंने कहा , ‘‘ निगम निविदाएं जारी करेगा लेकिन एक ही कॉन्ट्रैक्टर के लिए दो तीन माह में 60,000 शौचालय तैयार कर पाना मुश्किल है इस लिए हमने सात से आठ कॉन्ट्रैक्टर को लेने का निर्णय किया है। ’उन्होंने बताया कि पूरी परियोजना की लागत 280 करोड़ रुपए है और प्रत्येक शौचालय पर 35,000 से 40,000 रुपए के बीच खर्च आएगा , जो उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा , ‘‘ जहां हमें जमीन मिलने में मुश्किलें आएंगी हम सामुदायिक शौचालय बनवाएंगे। ’’

बीमा कंपनियों के पास बिना दावे के पड़े हैं 15,167 करोड़ रुपये

नयी दिल्ली : देश की 23 बीमा कंपनियों के पास बीमाधारकों का 15,167 करोड़ रुपये बिना दावे का पड़ा है। इस पैसे का कोई लेनदार नहीं है। भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) ने बीमा कंपनियों से इस तरह के बीमाधारकों की पहचान करने और उन्हें उनका पैसा देने के निर्देश दिए हैं।
हर बीमा कंपनी में पॉलिसीधारक की सुरक्षा के लिए बनायी गई निदेशक स्तरीय समिति को जिम्मेदारी दी गई है कि वह बीमाधारकों के सभी बकायों का समय से भुगतान करे। बिना दावे वाली कुल 15,166.47 करोड़ रुपये की राशि में से भारतीय जीवन बीमा निगम के पास अकेले ही 10,509 करोड़ रुपये पड़े हैं। जबकि निजी क्षेत्र की अन्य 22 बीमा कंपनियों के पास ऐसे 4,657.45 करोड़ रुपये पड़े हैं जिनका कोई दावेदार सामने नहीं आ रहा है।
निजी बीमा कंपनियों में आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस के पास 807.4 करोड़ रुपये, रिलायंस निप्पॉन लाइफ इंश्योरेंस के पास 696.12 करोड़ रुपये, एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस के पास 678.59 करोड़ रुपये और एचडीएफसी स्टैंडर्ड लाइफ इंश्योरेंस में 659.3 करोड़ रुपये पड़े हैं।
इरडा ने इन जीवन बीमा कंपनियों से कहा है कि वह सभी अपनी वेबसाइट पर एक खोज सुविधा उपलब्ध करायें जिसपर पॉलिसी धारक अथवा लाभार्थी या फिर उनके परिवार के सदस्य इस बात का पता लगा सकें कि क्या उनका कोई बकाया कंपनी के पास लंबित है। पालिसीधारक को बीमा कंपनियों की वेबसाइट पर अपना पालिसी नंबर, पैन, नाम, जन्मतिथि और आधार नंबर आदि डालना होगा। बीमा कंपनियों से यह भी कहा गया है कि वह हर छह महीने में उनके पास पड़ी बिना दावे के बीमा राशि के बारे में जानकारी को अद्यतन करें।