Thursday, July 9, 2026
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विश्व चैंपियनशिप में सिन्धू ने जीता रजत पदक

नानजिंग : पीवी सिंधू को एक बार फिर बड़े टूर्नामेंट में उप विजेता बनकर संतोष करना पड़ा जब वह विश्व चैंपियनिशप के महिला एकल फाइनल में आज यहां कैरोलिना मारिन के खिलाफ हार गई।
ओलंपिक रजत पदक विजेता सिंधू को स्पेन की ओलंपिक चैंपियन मारिन के खिलाफ 19-21 10-21 की हार के साथ रजत पदक से संतोष करना पड़ा।
पिछले साल ग्लास्गो में विश्व चैंपियनशिप के फाइनल में जापान की नोजोमी ओकुहारा के खिलाफ शिकस्त झेलने वाली 23 साल की सिंधू के पास मारिन की तेजी का कोई जवाब नहीं थ जिन्होंने 45 मिनट में जीत दर्ज की।
सिंधू इसके साथ ही विश्व चैंपियनशिप में चार बार पोडियम पर जगह बनाने वाली एकमात्र भारतीय खिलाड़ी बन गई। इससे पहले उन्होंने 2013 में ग्वांग्झू और 2014 में कोपेनहेगन में भी कांस्य पदक जीते थे।
साथ ही मारिन विश्व चैंपयनशिप खिताब तीन बार जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी। उन्होंने इससे पहले 2014 और 2015 में जकार्ता में विश्व खिताब जीते।
इस मैच से पहले सिंधू ने मारिन के खिलाफ छह मैचों में जीत दर्ज की थी जबकि पांच में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इन दोनों खिलाड़ियों के बीच जून में मलेशिया ओपन में हुए पिछले मुकाबले को सिंधू ने जीता था।

राष्ट्रीय राजमार्गो पर पैदल यात्रियों की अनदेखी से मानवाधिकार आयोग नाराज

नयी दिल्ली : केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गो पर पैदल यात्रियों, खासकर दिव्यांगों की अनदेखी पर राज्य सरकारों तथा सड़क निर्माण एजेंसियों से रिपोर्ट मांगी है। केंद्र ने यह कदम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कहने पर उठाया है। आयोग ने इस संबंध में क्षोभ जताते हुए केन्द्र से निर्देश जारी कर रिपोर्ट तलब करने को कहा था।
आयोग की लगातार पूछताछ के बाद सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों तथा सड़क निर्माण से जुड़ी केन्द्रीय एजेंसियों को पत्र लिखकर पैदल यात्रियों के बारे में किए गए उपायों को लेकर आगाह किया है। इसी 30 जुलाई को लिखे पत्र में मंत्रालय ने उन्हें अपने 12 अप्रैल के पत्र की याद दिलाई है। जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गो पर पैदल यात्रियों तथा दिव्यांगों के लिए सुविधाएं सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया था।
पत्र में मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से बताया था कि सड़क पर पैदल यात्रियों के संदर्भ में सुविधाओं का इंतजाम आइआरसी : 103 की ‘पैदल यात्रियों के लिए दिशानिर्देश’ शीर्षक से जारी मानकों के अनुरूप होना चाहिए। इस सिलसिले में मंत्रालय ने 17 जून, 2015 को उसकी ओर से जारी परिपत्र का उल्लेख भी किया है।
बता दें कि आइआरसी :103 इंडियन रोड कांग्रेस द्वारा अनुमोदित वो नियमावली है जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गो पर फुटपाथ और जेब्रा क्रासिंग बनाने के लिए अपनाए जाने वाले मानकों का ब्यौरा दिया गया है।
राजमार्गो पर पैदल यात्रियों की उपेक्षा को लेकर मानवाधिकार आयोग को नागरिकों की कई शिकायतें मिली थीं। जिसे लेकर उसने सड़क मंत्रालय से चिंता जताई थी और पीडब्लूडी, एनएचएआइ, एनएचआइडीसीएल तथा बीआरओ को निर्देश देने को कहा था। इस साल जून में उसने इस बाबत फिर से पूछताछ की थी और मंत्रालय से अधिकारियों को मौके पर भेजकर वस्तुस्थिति की पड़ताल करने को कहा था, लेकिन मंत्रालय के कई बार याद दिलाने बावजूद किसी ने भी पैदल यात्रियों की सुविधाओं के बाबत कोई रिपोर्ट उसे नहीं भेजी है।
अपने 17 जून, 2015 के परिपत्र में मंत्रालय ने कहा था कि पैदल यात्रियों व दिव्यांगों की सुविधाओं का प्रावधान सड़क की योजना और डिजाइन बनाते वक्त ही कर दिया जाना चाहिए। साथ ही निर्माण और रखरखाव के दौरान भी इस बाबत ध्यान रखा जाना चाहिए। यह भी स्पष्ट किया था कि इन सुविधाओं का बुनियादी मकसद सड़क पर वाहनों और पैदल यात्रियों के बीच टकराव की नौबत को यथासंभव कम करना है।

आइआरसी : 103 में पैदल यात्रियों के लिए दिशानिर्देश

-शहरी क्षेत्रों में राष्ट्रीय राजमार्गो पर दोनो ओर फुटपाथ होने चाहिए

-फुटपाथ की न्यूनतम चौड़ाई 1800 मिमी हो, ताकि ह्वीलचेयर चल सके।

-जहां पूरे फुटपाथ की इतनी चौड़ाई संभव न हो वहां बीच-बीच में 1800 गुणा 2500 मिमी के पासिंग स्थान बनाए जाने चाहिए।

-फुटपाथ से 2200 मिमी ऊपर तक किसी प्रकार का अवरोध नहीं होना चाहिए।

-फुटपाथ की सड़क से ऊंचाई 150 मिमी से अधिक नहीं होनी चाहिए।

-फुटपाथ के दोनो छोर ढलानदार होने चाहिए। ढलान 1200 मिमी चौड़ी हो।

-दृष्टिहीनो की सुविधा के लिए फुटपाथ के किनारे से 600 मिमी जगह छोड़कर उभारदार टाइलें लगाई जाएं।

-शहरी क्षेत्रों में पैदल यात्रियों को सड़क पार करने के लिए जेब्रा क्रासिंग जरूरी।

-दृष्टिहीनो की सुविधा के लिए जेब्रा क्रासिंग को थर्मोप्लास्टिक से बनाया जाए ताकि यह टटोलने में उभारदार हो।

-दृष्टिहीनो की सहूलियत के लिए जेब्रा क्रासिंग पर ध्वनिकारक ट्रैफिक सिगनल भी लगाए जाने चाहिए।

-जेब्रा क्रासिंग की चौड़ाई सामान्यतया 2 से 4 मीटर होनी चाहिए।

(साभार – दैनिक जागरण)

आठ साल की बच्ची ने दर्ज कराया ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड’ में नाम

बैकुंठपुर : प्रतिभाएं मां के गर्भ में पलती हैं। माता-पिता के विशिष्ठ गुण अक्सर बच्चों में भी दिखते हैं, लेकिन कई बार बच्चे और भी आगे निकल जाते हैं। कोरिया जिले के छोटे से सुविधा विहीन कस्बे चर्चा में कोयले की खदानें हैं। यहां रहने वाली अंजली सिंह ने साल 2011 में रोलर स्केटिंग में राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर क्षेत्र को गौरवान्वित किया था। बात सात साल पुरानी हो गई। अब अंजली के नक्शेकदम पर उनकी आठ साल की बेटी श्रेया चल रही हैं। दो महीने पहले श्रेया ने लगातार 72 घंटे तक रोलर स्केटिंग की। इसे एक रिकॉर्ड के रूप में दर्ज कराने के लिए उनकी तरफ से दावा पेश किया और ‘लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में श्रेया का नाम दर्ज हो गया। श्रेया की इस उपलब्धि ने एक बार फिर चर्चा के लोगों का नाम राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है।
श्रेया की मां अंजली भी सात 2011 में रोलर स्केटिंग में राष्ट्रीय रिकॉर्ड होल्डर रहीं हैं। इसके साथ-साथ जुलाई 2010 में सबसे लंबी आउटडोर ऑनलाइन हॉकी गेम के प्लेयर के रूप में अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं। वो ही श्रेया की गुरु भी हैं। उन्हीं ने श्रेया को नियमित कोचिंग दी और इस सुविधाविहीन क्षेत्र में बच्ची को खेल के इस हुनर में आगे बढ़ाया। अंजली को पूरी उम्मीद है कि उनकी बेटी आगे चलकर इस क्षेत्र में और भी बड़े कीर्तिमान स्थापित करेगी।
रोलर स्केटिंग की राष्ट्रीय स्पर्धा इस साल कर्नाटक के बेलगाम में आयोजित की गई थी। यहीं पर श्रेया ने यह कीर्तिमान बनाया। इस दौरान लगातार 72 घंटे तक रोलर स्केटिंग करते हुए श्रेया के चेहरे पर कोई भी थकान नजर नहीं आ रही थी। वहां मौजूद लोग उनका स्टैमिना देखकर अचंभित थे।
श्रेया के पिता मुकेश सिंह और उनकी मां अंजली का कहना है कि क्षेत्र में कई प्रतिभाशाली बच्चे हैं जो इस दिशा में अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं, यदि प्रशासन द्वारा स्केटिंग हेतु एक छोटा सा कोर्ट बनवा दिया जाए तो वे और भी बच्चों को प्रशिक्षण दे सकते हैं। बच्चे आगे बढ़ेंगे तो क्षेत्र का नाम रोशन होगा।

(साभार – दैनिक जागरण पर अशोक सिंह की खबर)

रांची के रंजीत ने बनाया रश्मि रोबोट, हिन्दी-भोजपुरी में करती हैं बातें

रांची : रांची के रंजीत श्रीवास्तव ने दुबई की नागरिकता हासिल करने वाली रोबोट सोफिया का भारतीय संस्करण रश्मि विकसित किया है। जो महज दो साल के रिकॉर्ड समय और सिर्फ 50 हजार रुपये खर्च कर बना है। रश्मि को हांगकांग की कंपनी द्वारा विकसित एक मानव सदृश रोबोट सोफिया की अगली पीढ़ी बताया जा रहा है, जो अंग्रेजी के साथ हिंदी, भोजपुरी और मराठी में आपसे बात कर सकती है। यह हावभाव बदलने और भावनात्मक बातें करने में भी निपुण है।
दुनिया का पहला हिंदीभाषी रोबोट
लखनऊ के मदुरै कामराज विश्‍वविद्यालय से एमबीए करने वाले रंजीत का दावा है कि रश्मि दुनिया की पहली हिंदी भाषी, सच्चा अहसास देने वाली और महिला की तरह व्यवहार करने वाली रोबोट है, जो बातचीत के क्रम में होंठ भी हिलाती है। इस रोबोट में लिंग्यूस्टिक इंटरप्रेटर (एलआई), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), विजुअल डेटा और फेशियल रिकोगनिशन तकनीक का उपयोग किया गया है।
राजधानी के पहाड़ी मंदिर इलाके के रहने वाले 38 वर्षीय रंजीत कहते हैं कि यह रोबोट मेरे द्वारा विकसित विशेष सॉफ्टवेयर और लिंग्यूस्टिक इंटरप्रेटर प्रणाली पर काम करता है। एलआइ प्रोग्रामिंग बातचीत में भावना का विश्लेषण करता है जबकि एआइ प्रोग्राम डिवाइस से प्रतिक्रिया देने का काम करता है।
देश-विदेश की कई कंपनियां संपर्क में
उन्होंने ट्राई चेयरमैन आरएस शर्मा से मदद मिलने का जिक्र किया। कहा कि शर्माजी ने हमेशा से उन्हें विशिष्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके सॉफ्टवेयर को लेकर देश-विदेश की कई नामी-गिरामी कंपनियां अलग-अलग प्रोजेक्ट में जुड़ने के लिए संपर्क साध रही है।
दो माह में पूरा हो जाएगा निर्माण
रश्मि रोबोट को एक अविश्वसनीय और असाधारण उपलब्धि बताते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में किसी भी हिंदी भाषी रोबोट का बनाना सुखद है। आइएसएम, धनबाद के डॉ. सोमनाथ ने इसे सोफिया के अपडेट वर्जन के रूप में उदृत किया। करीब 15 वर्षों से सॉफ्टवेयर डेवलप कर रहे रंजीत ने अगले दो माह में इसे पूरी तरह मानव आकृति देने का दावा किया। अभी रोबोट के सिर और शरीर सहित 80 फीसद तक विकसित किए गए हैं और वे ठीक से काम कर रहे हैं। श्रीवास्तव ने कहा कि हाथों और पैरों को जोड़ने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
संवदेनशील दोस्त बनने की है क्षमता
पूर्व में लोट्स सॉफ्टवेयर कंपनी चलाने वाले रंजीत ने कहा कि रश्मि चेहरे, आंख, होंठ और भौं के जरिये अपनी अभिव्यक्ति करती है। जरूरत के अनुसार यह रोबोट अपनी गर्दन को घूमा-फिरा भी सकता है। भारत जैसे आबादी बहुल देश में रोबोट की उपयोगिता के बारे में रंजीत ने कहा कि यह भविष्य की पीढ़ी की जरूरत है। यह रिसेप्शनिस्ट, सहायक, एकाकी लोगों और जरूरतमंदों के संवेदनशील मित्र के रूप में काम कर सकती है।
बदसूरत बोला तो रोबोट ने कहा-भाड़ में जाओ…
उन्होंने रश्मि रोबोट का प्रदर्शन कर दिखाया कि यह कुछ पूछने पर आखिर कैसे प्रतिक्रिया करती है और कैसा जवाब देती है। मसलन, रोबोट को कहा गया कि तुम बदसूरत हो तो रश्मि ने तपाक से जवाब दिया…नहीं, तुम भाड़ में जाओ। कहा गया कि आप सुंदर हैं, यह कहती है धन्यवाद। अपने पसंदीदा अभिनेता के बारे में पूछे जाने पर रश्मि रोबोट ने शाहरुख खान का नाम लिया। श्रीवास्तव ने कहा कि अपनी आंखों में लगे कैमरों के कारण यह व्यक्ति विशेष को एकाध मुलाकात के बाद जानने-पहचानने भी लगती है।
सोफिया से प्रेरित होकर बोलनेवाले रोबोट बनाने की जिद ठानने वाले रंजीत ने कहा कि मैंने झारखंड सरकार के विभिन्न विभागों के लिए कई सॉफ्टवेयर विकसित किए हैं, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया। निबंधन, सूचना-जनसंपर्क और पर्यटन विभाग के लिए रंजीत ने पोर्टल बनाए हैं। टूरिज्म पोर्टल ने राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार भी जीता। उनके पिता टीपी श्रीवास्तव बीएसएनएल में एजीएम हैं।

एनआरसी को लेकर असमवासी अफवाहों में न आयें : प्रो. मुखी

नयी दिल्ली : असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर उपजी आशंकाओं को दूर करते हुये असम के राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी ने इसे एक उपलब्धि करार दिया और इसे, देश में घुसपैठ की समस्या का कारगर समाधान बताया है। एनआरसी से जुड़ी शंकाओं, समाधान और उपयोगिता पर पेश हैं मुखी से ‘भाषा’ के पांच सवाल ….
प्रश्न :  लंबी और जटिल प्रक्रिया के बाद एनआरसी का प्रारूप सामने आया। इस कवायद को कितना कारगर मानते है, तथा सफलता का श्रेय किसे देंगे?
उत्तर : यह न सिर्फ असम बल्कि पूरे देश के लिये ऐतिहासिक उपलब्धि है। इसके लिये मैं बधाई देना चाहूंगा महापंजीयक को, असम सरकार के अधिकारियों और कमचारियों को और माननीय उच्चतम न्यायालय को, जिनके अथक परिश्रम और सावधानी भरे सतत प्रयास से यह अहम कार्य सम्पन्न हुआ।
प्रश्न : असम के लोगों में इसके बारे में क्या प्रतिक्रिया है, क्योंकि दिल्ली सहित देश भर में एनआरसी को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है?
उत्तर : मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि अभी यह एनआरसी का प्रारूप है। इसके आधार पर अभी कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी। राज्य में एक ऐसी भ्रांति चल रही थी कि जिसका नाम प्रारूप में नहीं आया वह विदेशी घोषित हो गया, उनका क्या होगा। ऐसा कुछ भी नहीं है। आज वे कोई विदेशी नहीं हैं। जिन लोगों का नाम छूट गया है, उन्हें अपने दावे को पुष्ट करने का पूरा अधिकार है। इसकी पूरी प्रक्रिया लोगों को बतायी गयी है और इसके लिये दो महीने का समय भी दिया गया है। असम में इसे लेकर सामान्य तौर पर कोई भ्रम नहीं है।
प्रश्न : भ्रम या चिंता उन 40 लाख लोगों के मन में है जिनके नाम एनआरसी के प्रारूप में शामिल नहीं हुये। उन लोगों के लिये आप क्या कहेंगे?
उत्तर : मैं आश्वस्त कर सकता हूं कि हमारे प्रदेश में किसी के लिये चिंता करने की कोई बात नहीं होनी चाहिये। हर किसी का अधिकार सुरक्षित है, क्योंकि भारत सरकार और असम सरकार ये सुनिश्चित कर रही है कि एक भी भारतीय ऐसा नहीं रहेगा जिसका एनआरसी के अंदर नाम न आ जाये। उन्हें हर मौका दिया जायेगा। यदि इस प्रक्रिया के पूरा होने पर भी किसी का नाम एनआरसी में सम्मिलित नही हो पाता तो वह ट्रिब्यूनल में अपील कर सकता है।
प्रश्न : तमाम जनप्रतिनिधियों और प्रतिष्ठित लोगों के नाम एनआरसी में शामिल नहीं हो पाये, इससे जनसामान्य की चिंता बढ़ना क्या लाजिमी नहीं है?
उत्तर:  मैंने पहले ही कहा कि इतनी व्यापक प्रक्रिया में कुछ नामों का छूटना बड़ी बात नही है। इतना बड़ा काम हुआ है, उसमें कई गलतियां हो सकती हैं, भूल चूक हो सकती है, लेकिन उन सभी को दुरुस्त करने के भी पुख्ता इंतजाम इसमें किये गये हैं। इन्हें सुधारने के लिये पर्याप्त समय दिया गया है। इसीलिये मैंने कहा कि यह प्रारूप मात्र है। जहां तक जनसामान्य की चिंता की बात है तो मैं यह जरूर कहूंगा कि यह जो इतना बड़ा कार्य हुआ है वह असम की जनता के साथ जो एक समझौता हुआ था, उसके तहत हुआ है। मैं असमवासियों को आश्वस्त भी करना चाहता हूं कि एक भी भारतीय ऐसा नहीं रहेगा जिसका नाम इस लिस्ट में न आ जाये।
प्रश्न :  एनआरसी की उपयोगिता और महत्व पर आपकी क्या राय है?
उत्तर : एनआरसी के बारे में मेरी स्पष्ट धारणा बनी है कि यह एक ऐसा महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार हुआ है, जो देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभायेगा। इसकी उपयोगिता को लेकर मेरा यह कहना है कि जिस प्रकार से असम ने अपनी एनआरसी तैयार की है, देश के हित में यह बेहतर होगा कि हर राज्य अपनी एनआरसी तैयार कराये। ताकि देश की सरकार को और राज्य की सरकार को यह पूर्ण जानकारी रहे कि राज्य और देश में कौन विदेशी रह रहे हैं। और जो विदेशी रह रहे हैं उनको भी यह जानकारी हो कि वे बतौर विदेशी रह रहे हैं। इसके निमित्त हर राज्य एनआरसी बनाये और प्रत्येक दस साल के अंतराल पर होने वाली जनगणना के साथ इसे अपडेट भी करे। ऐसा करने से एनआरसी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिये लाभप्रद और कारगर उपाय साबित होगा। अगर अन्य राज्य ऐसी पहल करते हैं तो मैं यह भी कहना चाहूंगा कि अन्य राज्यों में यह काम बहुत जल्दी पूरा हो सकेगा क्योंकि असम सरकार के अधिकारियों का अनुभव उनके लिये बेहद उपयोगी संपदा साबित होगा। बल्कि मेरा सुझाव है कि अन्य राज्यों में यह पहल करने पर इसे ‘आधार’ से जोड़ा जाना चाहिये जिससे भारत में विदेशी नागरिकों का एक राज्य से दूसरे राज्य में जाकर बसना भी मुमकिन नहीं हो पायेगा।

(साभार – भाषा)

आजीविका साबुन 156 महिलाओं के लिए बना ‘आजीविका’ का साधन

रायसेन : ग्रामीण आजीविका मिशन और स्वच्छ भारत अभियान की ‘सारथी’ बन मध्यप्रदेश के रायसेन की ग्रामीण महिलाएं गरीबी और बीमारियों के विरुद्ध अपनी लड़ाई खुद लड़ रही हैं। स्वसहायता समूह से जुड़ी इन सैकड़ों महिलाओं द्वारा बनाया गया साबुन ‘आजीविका’ जिले में स्वच्छता- स्वास्थ्य का ब्रांड बन गया है। चंदन, मोगरा, नीबू, गुलाब और एलोवेरा फ्लेवर के इस साबुन से अब सरकारी स्कूलों के बच्चे भी रोजाना हाथ धोएंगे। आजीविका साबुन 156 महिलाओं के लिए आजीविका का भी साधन बन गया है, जो अपने परिवार को आर्थिक गति देने में जुटी हुई हैं।
प्रशासन ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत अब सरकारी प्राइमरी एवं मिडिल स्कूलों के छात्र-छात्राओं के हाथ धुलाने के लिए जनपद शिक्षा केंद्रों को स्कूलों में आजीविका साबुन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। इससे जहां बच्चों में बीमारियों का अंदेशा कम होगा, वहीं बच्चे स्वच्छता के प्रति प्रारंभिक स्तर पर ही जागरूक होंगे।
राज्य शासन के निर्देश पर जिलेभर के 2,538 शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में जनपद शिक्षा केंद्रों के माध्यम से साबुन उपलब्ध कराए जाएंगे। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम, नेशनल रूरल लाइवलीहुड मिशन) द्वारा इन स्वसहायता समूहों का गठन किया गया है। ग्रामीण महिलाएं इनमें बढ़चढ़ कर सहभागिता कर रही हैं।
50 ग्राम वजनी इस साबुन की कीमत 18 रुपए रखी गई है। जिलेभर के सभी शासकीय प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में प्रति स्कूल दो साबुन प्रतिमाह के हिसाब से तीन माह के लिए 24,040 साबुन भेज दिए गए हैं, जिनकी कीमत करीब साढ़े चार लाख रुपए है। स्कूलों के अलावा यह साबुन फुटकर एवं थोक में भी बिक्री के लिए उपलब्ध कराया गया है।
आजीविका साबुन का इस्तेमाल सरकारी कर्मचारी, जनप्रतिनिधि और आम ग्रामीण भी कर रहे हैं। साबुन निर्माण के लिए सिर्फ एक घंटे के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। एक घंटे में करीब 100 साबुन का निर्माण होता है।
मप्र राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन, रायसेन के जिम्मेदार अधिकारी डॉ. एसडी खरे कहते हैं, इस साबुन के जरिये जिले में स्वच्छता का संदेश भी दिया जा रहा है। यह साबुन शहरी-ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता -स्वास्थ्य का चर्चित ब्रांड बन गया है।
स्वसहायता समूह से जुड़ीं ग्राम पांडाझिर की विमला तिवारी बताती हैं, गत दो माह में एक हजार साबुन बनाकर लगभग पांच हजार रुपए का मुनाफा हुआ है। स्कूलों में सप्लाई के अलावा हमारे द्वारा गांवों की छोटी-बड़ी दुकानों पर भी साबुन बेचा जा रहा है।
(साभार – दैनिक जागरण पर आनन्द कुशवाह की खबर)

कुष्ठ रोग को तलाक का आधार नहीं बनाने को कैबिनेट ने किया बिल मंजूर

नयी दिल्ली : केंद्रीय कैबिनेट ने एक नया बिल पारित किया है। इसके तहत कुष्ठ रोग को तलाक लेने का आधार नहीं बनाया जा सकता है। पर्सनल लॉज (संशोधन) बिल, 2018 के तहत ईसाइयों के तलाक अधिनियम, मुस्लिम विवाह अलगाव अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम, विशेष विवाह अधिनियम और हिंदू गोद लेने और गुजारा भत्ता अधिनियम में संशोधन करके तलाक के लिए कुष्ठ रोग को आधार बनाने को प्रतिबंधित किया जाएगा।
कानून मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अब तक इन कानूनों में तलाक लेने के लिए कुष्ठ रोग को आधार बनाने का प्रावधान था। चूंकि जब यह कानून बने थे तब तक कुष्ठ रोग एक लाइलाज बीमारी थी। चूंकि अब कुष्ठ रोग कई तरह की दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो सकता है, इसलिए किसी भी कानून के तहत कुष्ठ रोगी से अलगाव का प्रावधान किसी भी तरह से उचित नहीं है।
उल्लेखनीय है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव में दस्तखत कर रखे हैं जिसमें कुष्ठ रोग के पीड़ित से किसी भी स्तर पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र व राज्य सरकारों से कहा था कि कुष्ठ रोग से प्रभावित पीड़ितों का पुनर्वास किया जाए।

काँवड़ शिविर में सेवा कार्य को आगे आया मुस्लिम समुदाय

मेरठ : मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना …यह लाइन ऐसे लोगों के लिए सबक है जो वोट की खातिर आमजन को आपस में लड़ाते हैं और उन्हें मजहब के नाम पर आपस में बांटते हैं। मेरठ-बुलंदशहर हाईवे पर लगे कांवड़ शिविर में शिवभक्तों की सेवा में लीन नजर आए मुस्लिम वर्ग के लोग क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
वहीं पश्चिम उत्तर प्रदेश का माहौल शिवमय हो रहा है। चौधरी चरण सिंह कांवड़ पटरी मार्ग पर शिव भक्तों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। शिव भक्त दिन और रात में अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं। उधर, पिछले तीन दिनों में हरिद्वार से डेढ़ करोड़ से अधिक शिव भक्त गंगाजल उठाकर अपनी यात्रा शुरू कर चुके हैं। उत्तराखंड के मंगलौर से मुरादनगर तक करीब 107 किलोमीटर लंबे कांवड़ पटरी मार्ग पर केसरिया सैलाब उमड़ रहा है। 28 जुलाई से विधिवत शुरू हुई कांवड़ यात्रा के पहले तीन दिनों में काफी कम संख्या में शिव भक्त कांवड़ मार्ग पर नजर आए। लेकिन एक अगस्त से कांवड़ पटरी मार्ग पर राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कई शहरों के कांवड़िये बड़ी संख्या में गंगाजल लेकर लौटना शुरू हो गए हैं।

..जब आनंद महिंद्रा ने बनवाया ‘जख्मी जूतों का हॉस्पिटल’

नयी दिल्ली : एजेंसी महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने जख्मी जूतों के डॉक्टर नरसी राम के लिए ‘जख्मी जूतों का हॉस्पिटल’ तैयार करवा दिया है। यह सब कैसे हुआ, इसका किस्सा खासा दिलचस्प है। असल में हरियाणा के जींद में पटियाला चौक पर एक शख्स नरसी राम की जूते सुधारने की दुकान है। राम ने अपनी दुकान का नाम ‘जख्मी जूतों का हस्पताल’ रखा है। उसने इसमें अपने को डॉक्टर नरसी राम लिखा और जूते सुधारने से लेकर लंच तक का समय बताया।
किसी ने नरसी राम का फोटो उद्योगपति आनंद महिंद्रा को व्‍हाट्सअप पर भेज दिया। फिर क्या था महिंद्रा इस शख्स के मुरीद हो गए और उन्होंने ट्विटर पर इसकी फोटो ट्वीट करते हुए लिखा कि ‘इस आदमी को आईआईएम में मार्केटिंग सिखाना चाहिए।’ महिंद्रा ने लोगों से इस शख्स को खोजने की अपील की। उन्होंने कहा कि वो उसके छोटे से स्टार्टअप में निवेश करना चाहते हैं। इसके बाद इस शख्स को ढूंढ लिया गया। महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी ने उसे फूल और मोमेंटो दिया और कंपनी के टैक्ट्रर पर बिठाकर सारे शहर में घुमाया।
यूनिक कियोस्क अब महिंद्रा ने फिर से ट्वीट कर कहा, ‘जख्मी जूतों का हॉस्पिटल’ तैयार हो चुका है। उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने नरसी राम से संपर्क करके उसके स्टार्टअप में निवेश करने का न्योता दिया है। नरसी राम ने उनसे अपने लिए अच्छा सा कियोस्क मांगा।
आनंद महिंद्रा के मुंबई स्थित डिजाइन स्टूडियो ने एक बेहतरीन ‘कियोस्क’ नरसी राम के लिए तैयार किया है। इसे जल्द ही नरसी राम को भेजा जाएगा। इस कियोस्क में दो बेंच लगी है। ऊपर ‘जख्मी जूतों का हस्पताल’ लिखा है। ये वैंटिलेटेड और वाटरप्रूफ कियोस्क है। इसमें जूते रखने और टांगने की सुविधा भी दी गई है। बहुत कम लागत में बने इस कियोस्क का डिजाइन यूनिक है।

ट्रोलिंग के बाद रैंप पर चलीं हनान हामिद, सीएम ने कहा- सरकार की बेटी

तिरुअनंतपुरम : कॉलेज के बाद मछली बेच कर अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाने वाली अंडरग्रेजुएट स्‍टूडेंट हनान हामिद ने केरल के मुख्‍यमंत्री से मुलाकात कर सुरक्षा की मांग की। इसके बाद सीएम पिनाराई विजयन ने हनान को सुरक्षा और समर्थन देने का वादा किया है। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग के बाद हनान ने राज्‍य में आयोजित फैशन शो में भी हिस्‍सा लिया और रैंप पर चलीं। दरअसल, कॉलेज के यूनिफार्म में मछली बेचती हनान की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। कुछ लोगों ने जहां सहानुभूति जताई वहीं कुछ ने जमकर ट्रोल किया। इसके बाद ही हनान ने सरकार से सुरक्षा की मांग को लेकर गुहार लगाई और मुख्‍यमंत्री से बुधवार को मुलाकात की।


सीएम के साथ ही विपक्ष के नेता रमेश चेन्नीथला से भी उन्होंने मुलाकात की और उन लोगों के प्रति मदद के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने बताया, ‘सीएम का कहना है कि मैं सरकार की बेटी हूं, इसलिए सरकार सारी सुरक्षा देगी।’ उन्होंने चेन्नीथला को उनकी शिक्षा मुफ्त कराने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने हनान के लिए घर बनवाने का वादा भी किया है।
हनान ने बताया कि मुख्‍यमंत्री ने उन्हें सरकार की बेटी कहा है और अब सरकार उन्हें सुरक्षा देगी। बता दें कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहीं हनान की कहानी को कई लोगों ने झूठा भी बताया, लेकिन सरकार उनके समर्थन में खड़ी है। उल्‍लेखनीय है कि कल ही ओणम बकरीद खादी एक्‍सपो के लिए हनान ने रैंप वॉक भी किया है। केरल खादी बोर्ड की वाइस-चेयरपर्सन शोभना जॉर्ज ने हनान को आमंत्रित किया था। हनान ने खादी के कपड़े पहन रैंपवॉक किया।