Wednesday, July 8, 2026
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नीरज को एशियाई खेलों का ध्वजवाहक चुना गया

नयी दिल्ली : स्टार भाला फेंक एथलीट नीरज चोपड़ा को 18 अगस्त को जकार्ता में होने वाले एशियाई खेलों के उद्घाटन समारोह के लिये भारतीय दल का ध्वजवाहक चुना गया।

भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा ने दल के लिये आयोजित रवानगी समारोह के दौरान यह घोषणा की। एशियाई खेलों का आयोजन 18 अगस्त से दो सितंबर तक जकार्ता और पालेमबांग में किया जायेगा।
बीस वर्षीय नीरज मौजूदा राष्ट्रमंडल खेलों के चैम्पियन हैं और उन्होंने पिछले महीने फिनलैंड में सावो खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।
नीरज ने 2017 में एशियाई एथलेटिक चैम्पियनशिप में 85.23 मीटर के थ्रो से स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। उन्होंने पोलैंड में 2016 आईएएएफ विश्व अंडर-20 चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक हासिल किया था।
पूर्व हाकी कप्तान सरदार सिंह 2014 एशियाई खेलों में भारत के ध्वजवाहक थे।
भारतीय खिलाड़ियों ने दक्षिण कोरिया के इंचियोन में पिछले चरण में 11 स्वर्ण, 10 रजत और 36 कांस्य पदक से कुल 57 पदक हासिल किये थे।

आजादी पर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यह कहा था

15 अगस्त 1947 की आधी रात को जब दुनिया के कई हिस्सों में लोग नींद में डूबे हूए थे, उस समय भारत में जश्न का माहौल था। लोगों की आंखों में न नींद थी और न कोई आलस। देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलने की खुशी ऐसी थी कि सबकी आंखों में सिर्फ आने वाले भारत के सपने तैर रहे थे। ऐसे माहौल में देश के पहले प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आजादी का पहला भाषण दिया था। इस भाषण को ‘ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ के नाम से जाना जाता है। आइए जानते हैं उन्होंने इस भाषण में क्या कहा था

‘हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था, और अब समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह ना सही, लेकिन बहुत हद्द तक। आज रात बारह बजे, जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता की नई सुबह के साथ उठेगा। एक ऐसा क्षण जो इतिहास में बहुत ही कम आता है, जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है, और जब वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है। यह एक संयोग है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ खुद को भारत और उसकी जनता की सेवा, और उससे भी बढ़कर सारी मानवता की सेवा करने के लिए प्रतिज्ञा ले रहे हैं।

इतिहास के आरम्भ के साथ ही भारत ने अपनी अंतहीन खोज प्रारंभ की, और ना जाने कितनी ही सदियां इसकी भव्य सफलताओं और असफलताओं से भरी हुई हैं। चाहे अच्छा वक़्त हो या बुरा, भारत ने कभी इस खोज से अपनी नजर नहीं हटाई और कभी भी अपने उन आदर्शों को नहीं भूला जिसने इसे शक्ति दी। आज हम दुर्भाग्य के एक युग का अंत कर रहे हैं और भारत पुनः खुद को खोज पा रहा है। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो महज एक कदम है, नए अवसरों के खुलने का, इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं। क्या हममें इतनी शक्ति और बुद्धिमत्ता है कि हम इस अवसर को समझें और भविष्य की चुनौतियों को स्वीकार करें?

भविष्य में हमें विश्राम करना या चैन से नहीं बैठना है बल्कि निरंतर प्रयास करना है ताकि हम जो वचन बार-बार दोहराते रहे हैं और जिसे हम आज भी दोहराएंगे उसे पूरा कर सकें। भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा करना। इसका मतलब है गरीबी और अज्ञानता को मिटाना, बिमारियों और अवसर की असमानता को मिटाना। हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही महत्वाकांक्षा रही है कि हर एक आंख से आंसू मिट जाएं। शायद ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों कि आंखों में आंसू हैं और वे पीड़ित हैं तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा।

और इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, और कठिन परिश्रम करना होगा ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें। वो सपने भारत के लिए हैं, पर साथ ही वे पूरे विश्व के लिए भी हैं, आज कोई खुद को बिलकुल अलग नहीं सोच सकता क्योंकि सभी राष्ट्र और लोग एक दुसरे से बड़ी समीपता से जुड़े हुए हैं। शांति को अविभाज्य कहा गया है, इसी तरह से स्वतंत्रता भी अविभाज्य है, समृद्धि भी और विनाश भी, अब इस दुनिया को छोटे-छोटे हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता है। हमें स्वतंत्र भारत का महान निर्माण करना है जहां उसके सारे बच्चे रह सकें।

आज नियत समय आ गया है, एक ऐसा दिन जिसे नियति ने तय किया था – और एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र खड़ा है। कुछ हद्द तक अभी भी हमारा भूत हमसे चिपका हुआ है, और हम अक्सर जो वचन लेते रहे हैं उसे निभाने से पहले बहुत कुछ करना है। पर फिर भी निर्णायक बिंदु अतीत हो चुका है, और हमारे लिए एक नया इतिहास आरम्भ हो चुका है, एक ऐसा इतिहास जिसे हम गढ़ेंगे और जिसके बारे में और लोग लिखेंगे।

ये हमारे लिए एक सौभाग्य का क्षण है, एक नए तारे का उदय हुआ है, पूरब में स्वतंत्रता का सितारा। एक नयी आशा का जन्म हुआ है, एक दूरदृष्टिता अस्तित्व में आई है। काश ये तारा कभी अस्त न हो और ये आशा कभी धूमिल न हो।! हम सदा इस स्वतंत्रता में आनंदित रहें।

भविष्य हमें बुला रहा है। हमें किधर जाना चाहिए और हमारे क्या प्रयास होने चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानो और कामगारों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम गरीबी, अज्ञानता और बिमारियों से लड़ सकें, हम एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश का निर्माण कर सकें, और हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना कर सकें जो हर एक आदमी-औरत के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सकें?

हमे कठिन परिश्रम करना होगा। हम में से से कोई भी तब तक चैन से नहीं बैठ सकता है जब तक हम अपने वचन को पूरी तरह निभा नहीं देते, जब तक हम भारत के सभी लोगों को उस गंतव्य तक नहीं पहुंचा देते जहां भाग्य उन्हें पहुंचाना चाहता है।

हम सभी एक महान देश के नागरिक हैं, जो तीव्र विकास की कगार पे है, और हमें उस उच्च स्तर को पाना होगा। हम सभी चाहे जिस धर्म के हों, समानरूप से भारत मां की संतान हैं, और हम सभी के बराबर अधिकार और दायित्व हैं। हम और संकीर्ण सोच को बढ़ावा नहीं दे सकते, क्योंकि कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हैं।

विश्व के देशों और लोगों को शुभकामनाएं भेजिए और उनके साथ मिलकर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बढ़ावा देने की प्रतिज्ञा लीजिए। और हम अपनी प्यारी मात्रभूमि, प्राचीन, शाश्वत और निरंतर नवीन भारत को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और एकजुट होकर नए सिरे से इसकी सेवा करते हैं।’

72वां स्वतंत्रता दिवस: 15 अगस्त नहीं इस दिन आज़ाद होता भारत

हर हिन्दुस्तानी के दिल में हिन्दुस्तान है और इस हिन्दुस्तान की तारीख में 15 अगस्त बहुत खास दिन है। हिन्दुस्तान यानि हमारा प्यारा भारत इस साल आजादी की 72वीं वर्षगांठ मना रहा है। 15 अगस्त भारतीयों के जेहन में बसी एक ऐसी तारीख है जिसकी तुलना 26 जनवरी छोड़कर शायद ही किसी और दिन से की जा सके मगर आजादी का यह दिन कुछ और भी हो सकता है।  लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत को आज़ादी मिलने के लिए किसी और तारीख पर सहमति बनी थी।

ये था मामला

असल में कांग्रेस साल 1930 से ही स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए 26 जनवरी के दिन का चयन कर चुकी थी। हालांकि इंडिया इंडिपेंडेंस बिल के मुताबिक ब्रिटिश प्रशासन ने सत्ता हस्तांतरण के लिए 3 जून 1948 की तारीख तय की गई थी। फरवरी 1947 में नए चुनकर आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट रिचर्ड एटली ने घोषणा की थी कि, सरकार तीन जून 1948 से भारत को पूर्ण आत्म प्रशासन का अधिकार प्रदान कर देगी। लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को देखते हुए सी.राजागोपालचारी ने कहा कि 1948 तक रुकने की क्या जरूरत है। फरवरी 1947 में ही लुई माउंटबेटन को भारत का आखिरी वायसराय नियुक्त किया गया था। माउंटबेटन पहले पड़ोसी देश बर्मा के गवर्नर हुआ करते थे। उन्हें ही व्यवस्थित तरीके से भारत को सत्ता हस्तांतरित करने की जिम्मेदारी भी दी गई थी।

माउंटबेटन ने क्या किया

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि माउंटबेटन ब्रिटेन के लिए 15 अगस्त की तारीख को शुभ मानता था क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के वक़्त जब 15 अगस्त 1945 को जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था, तब माउंटबेटन अलाइड फोर्सेज का कमांडर हुआ करता था। इसलिए माउंटबेटन ने ब्रिटिश प्रशासन से बात करके भारत को सत्ता हस्तांतरित करने की तिथि 3 जून 1948 से 15 अगस्त 1947 कर दी। हालांकि एक दूसरे इतिहासकार धड़े का तर्क ज्यादा पुष्ट मालूम पड़ता है।

भारत को 3 जून 1948 के बजाय 15 अगस्त 1947 को ही सत्ता हस्तांतरित करने को लेकर एक और कारण यह भी बताया जाता है कि, ब्रिटिशों को इस बात की भनक लग गयी थी कि, मोहम्मद अली जिन्ना जिनको कैंसर था और वो ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों को चिंता थी कि अगर जिन्ना नहीं रहे तो महात्मा गांधी अलग देश न बनाने के प्रस्ताव पर मुसलमानों को मना लेंगे।

माउंटबेटन ने की थी साजिश!

असल में जिन्ना ही वह चेहरा थे जिनको आगे रखकर ब्रिटिशों ने भारत को दो टुकड़ों में बांटने की साजिश रची थी और देश में ब्रिटिशों ने ऐसा हिन्दू- मुस्लिम ध्रुवीकरण किया जिसकी आग सदियों तक नहीं मिटने वाली थी। अगर जिन्ना की मृत्यु ब्रिटिशों के प्लान के पूरा होने से पहले हो जाती तो उन्हें मुश्किल आ सकती थी। बता दें कि 15 अगस्त ब्रिटिशों के लिए शुभ दिन था क्योंकि इसी दिन ब्रिटेन और मित्र राष्ट्रों ने जापान को आत्म समर्पण करवाकर द्वतीय विश्वयुद्ध जीता था इसलिए इसे दिन भारत को भी सत्ता हस्तांतरित करने का निर्णय लिया गया। अंततः 15 अगस्त 1947 को ब्रिटेन ने भारत को सत्ता हस्तांतरित कर दिया और जैसा कि अंग्रेजों को अंदेशा था यह सब हो जाने के कुछ ही महीने बाद जिन्ना की मृत्यु हो गई।

संवेदनहीन राजनीति की जद में बच्चे और शेल्टर होम्स

सुषमा त्रिपाठी
हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि समस्या को कांड में तब्दील कर राजनीतिक हथियार बना लिया जाता है और नतीजा यह है कि लोग राजनीति में उलझ जाते हैं। समस्या पीछे छूट जाती है। यही हो रहा है मुज्जफरपुर के बाद देवरिया में। मुज्जफरपुर कांड पर सुप्रीम कोर्ट खुद तत्पर है, मामला सीबीआई के पास है। बिहार सरकार ने तय कर लिया है कि बाल सुधार गृहों का संचालन अब वह खुद करेगी। योगी आदित्यनाथ ने भी सीबीआई जाँच की बात कह दी है मगर शेल्टर होम कांड को राजनीति के वार से आप कैसे बचाने जा रहे हैं? सबसे खौफनाक बात है कि बच्चियों की तकलीफ भूलकर राजनीति संवेदनहीनता की हदें पार कर चुकी है और अपराधी बेशर्म हँसी हँस रहे हैं। इतनी हिम्मत बगैर प्रश्रय पाये तो आ नहीं सकती। ऐसा नहीं होता तो बिहार के सीएम नीतीश कुमार मंत्री मंजू वर्मा का इस्तीफा अब तक माँग चुके होते। अब जब कि सबूत भी सामने आ चुके हैं कि बिहार में समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा और बृजेश ठाकुर के बीच जनवरी से अब तक 17 बार फोन पर बातचीत हुई थी।

इतनी देर क्यों नीतीश जी?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह स्कैंडल मामले में मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर के कॉल डिटेल से यह खुलासा हुआ है। मुजफ्फरपुर मामले को लेकर समाज कल्याण मंत्री मंजू वर्मा पर इस्तीफे की तलवार लटक रही है। हालांकि सोमवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही कहा था कि किसी को अकारण जिम्मेदार ठहराकर इस्तीफ़ा कैसे लिया जा सकता है, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा था कि अगर कुछ भी साक्ष्य सामने आता है तो वो इस्तीफ़ा लेने में देर नहीं करेंगे। अब मुजफ्फरपुर मामले की जांच में लगे अधिकारियों को प्रारंभिक छानबीन में पता लगा है कि मंजू वर्मा के पति चंद्रेश्वर वर्मा मामले में मुख्य अभियुक्त बृजेश ठाकुर के सम्पर्क में थे। बृजेश ठाकुर के फोन की कॉल डिटेल से यह जानकारी सामने आई है। ऐसी स्थिति में सीएम किस बात का इन्तजार कर रहे हैं। हैरत की बात यह है कि कांड में मामला दर्ज होने के बाद भी ब्रजेश ठाकुर को सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं। कोई जानने की कोशिश नहीं कर रहा कि आखिर बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित एक बालिका गृह यौन शोषण मामले का मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में प्रकाशित होने वाले तीन अखबारों का मालिक भी है। उस पर इन अखबारों की कुछ प्रतियां छपवाकर उस पर बड़ा-बड़ा सरकारी विज्ञापन पाने में कामयाब होने के आरोप हैं।

मंजू वर्मा को क्यों बचाया जा रहा है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ब्रजेश तीन अखबारों मुजफ्फरपुर से प्रकाशित एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र प्रात: कमल, पटना से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार न्यूज नेक्स्ट और समस्तीपुर जिला से उर्दू में प्रकाशित एक अखबार हालात-ए-बिहार से प्रत्यक्ष या परोक्ष से जुड़ा हुआ है। ब्रजेश को प्रात: कमल के विशेष संवाददाता के रूप में भी सूचीबद्ध किया गया है। उसके पुत्र राहुल आनंद न्यूज नेक्स्ट के संवाददाता और हालात-ए-बिहार के संवाददाता के रूप में एक शाईस्ता परवीन तथा संपादक के रूप में रामशंकर सिंह का नाम दर्शाया गया है। ब्रजेश को पीआईबी और राज्य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (आईपीआरडी) दोनों से मान्यता प्राप्त पत्रकार का दर्जा प्राप्त था, जो कि उनके खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद उनकी मान्यता दोनों जगहों से रद्द कर दी गयी। आईपीआरडी सूत्रों ने बताया कि उत्तर बिहार से जुड़ी परियोजनाओं का सरकारी विज्ञापन प्रात: कमल अखबार का प्रकाशन शुरू होने के समय से प्रकाशित हो रहा है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ब्रजेश के स्वामित्व वाले हिंदी दैनिक की 300 से अधिक प्रतियां प्रकाशित नहीं होती हैं, लेकिन प्रतिदिन इसके 60,862 प्रतियां बिक्री दिखाया गया था, जिसके आधार पर उसे बिहार सरकार से प्रति वर्ष करीब 30 लाख रुपये के विज्ञापन मिलते थे।

क्या मेनका के इस बयान के बाद सांसद गम्भीर होंगे

आखिर ये कैसे सम्भव हो पा रहा है? सबसे बड़ी बात क्या बच्चे और वंचित बच्चे आपकी प्राथमिकता सूची में हैं? क्या आप वाकई इस मसले को लेकर गम्भीर हैं? क्या सांसद अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं या उन्होंने राई रक्ती भर भी कोशिश की है। खुद देश की महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी को कहना पड़ रहा है कि उनको समय से रिपोर्ट ही नहीं मिल रही है। उनका मानना है कि अगर जाँच करवायी जाये तो ऐसे कई मामले सामने आयेंगे और हम सब जानते हैं कि यह सही है। मुजफ्फरपुर और देवरिया में फर्क सिर्फ इतना है कि ये दो अलग अलग राज्यों में हैं। मुजफ्फरपपुर मामले का मुख्य गुनहगार हवालात में है तो देवरिया शेल्टर होम केस में यूपी सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए जिलाधिकारी को हटा दिया है। केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि ये न सिर्फ भयावह है, बल्कि इस तरह की घटनाओं के सामने आने के बाद दुख होता है। उन्हें पता है कि इस तरह की बहुत सी घटनाएं होती होंगी लेकिन हमने उन संस्थाओं को पैसे देने के अलावा ध्यान नहीं दिया। इस तरह के घृणित अपराध को रोकने के लिए हमें पुख्ता कदम उठाने ही होंगे। मेनका गांधी ने कहा कि वो सांसदों के सामने प्रस्ताव रखती हैं कि वो अपने संसदीय क्षेत्र में जाकर इस संबंध में जानकारी जुटा कर उन्हें रिपोर्ट दें। सांसदों द्वारा प्राप्त रिपोर्ट के बाद वो तत्काल कार्रवाई करेंगी। उन्होंने कहा कि कुछ सफेदपोश लोग इस तरह के काले कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की समस्या से निजात पाने के लिए एक हजार औरतों और एक हजार बच्चों के लिए बड़े शेल्टर होम को बनाने की जरूरत है। हमें छोटे छोटे सेंटर्स के गठन से बचना होगा। उनका मंत्रालय बड़े सेंटर्स के गठन के लिए धन मुहैया कराएगा। आप सोशल मीडिया पर भी इसे बड़े भयावह तरीके से पेश करते हैं और बच्चों पर हो रहे अपराधों के प्रति तो बिल्कुल संवेदनशील नहीं हैं। पीड़िता की तस्वीरें और जबरन उनका इंटरव्यू लेकर अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाना एक भद्दे मजाक के अलावा कुछ नहीं हो सकता। कठुआ मामले में भी मीडिया हाउसों को चेतावनी मिली थी। कोई ऐसी ठोस प्रणाली नहीं है जो ऐसे शेल्टर होम्स की निगरानी करे। हम यहाँ सिर्फ बिहार, यूपी या किसी खास राज्य की बात इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि सारे देश में हालात ऐसे हैं, आप कितनी घटनायें सामने रखेंगे?

जनता ही कुछ कर सकती है

हैरानी है कि तमाम कानूनों, एजेंसियों, बाल सुधार अभियानों, संस्थाओं और आयोगों के अलावा पुलिस और सरकार की विशाल मशीनरी हाथ पर हाथ धरे ही बैठी रहती, अगर टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस (टिस) के छात्रों का एक अध्ययन दल बिहार न पहुंचता और वहाँ बाल संरक्षण में काम कर रहे एनजीओ की सोशल ऑडिट न करता। पिछले साल अगस्त में नीतिश कुमार सरकार ने ये काम टिस को सौंपा था। इस साल अप्रैल में टिस अध्ययन दल ने जो रिपोर्ट बिहार सरकार को सौंपी उसमें छह शॉर्ट स्टे होम्स में और 14 शेल्टरों में बाल यौन उत्पीड़न के मामले बताए गए थे।
बिहार सरकार एनजीओ की मदद से 110 शेल्टर होम या संरक्षण गृह चलाती है। उत्तर प्रदेश के देवरिया में भी ऐसा ही एक संरक्षण गृह सामने आया जो एक दंपत्ति चला रहा था। वहां से भी 24 लड़कियों को छुड़ाया गया और तीन लोगों की गिरफ्तारी हुई है. कुछ समय पहले झारखंड के रांची में मिशनरीज़ ऑफ चेरेटी की दो ननों पर बच्चा चोरी का आरोप लगा था।
दुनिया की कुल बाल आबादी में 19 फीसदी बच्चे भारत में हैं. देश की एक तिहाई आबादी में, 18 साल से कम उम्र के करीब 44 करोड़ बच्चे हैं। सरकार के ही एक आकलन के मुताबिक 17 करोड़ यानी करीब 40 प्रतिशत बच्चे अनाश्रित, वलनरेबल हैं जो विपरीत हालात में किसी तरह बसर कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक और भौगोलिक तौर पर वंचित और उत्पीड़ित बच्चों के अधिकारों की बहाली और उनके जीवन, शिक्षा, खानपान और रहन-सहन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। महिला और बाल कल्याण के लिए 1966 में बना राष्ट्रीय जन सहयोग और बाल विकास संस्थान, एनआईपीसीसीडी बच्चों और महिलाओं के समग्र विकास के लिए काम करता है. बच्चों पर केंद्रित राष्ट्रीय बाल नीति, 2013 में अस्तित्व में आ पाई। बच्चों पर यौन अपराधों को रोकने के लिए पोक्सो कानून 2012 में लाया गया. 2014 में जुवेनाइल जस्टिस (केयर ऐंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) बिल लाया गया। जेजे एक्ट 2000 में बना था, 2006 और 2011 में दो बार इसमे संशोधन किए गए। जहां तक बाल कल्याण नीतियों की बात है तो समन्वित बाल सुरक्षा योजना, आईसीपीएस चलाई जा रही है। जिसका आखिरी आंकड़ा 2014 तक का है जिसके मुताबिक 317 स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसियां (एसएए) और अलग अलग तरह के 1501 होम्स के लिए 329 करोड़ रुपए आवंटित किए गए और 91,769 बच्चों को इनका लाभ प्राप्त हुआ। आईसीपीएस के तहत ही देश के ढाई सौ से ज्यादा जिलों में चाइल्डलाइन सेवाएं चलाई जा रही हैं। बच्चों के उत्पीड़न और उनकी मुश्किलों का हल करने का दावा इस सेवा के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन लगता नहीं कि मुजफ्फरपुर या देवरिया में बच्चियों की चीखें इन चाइल्डलाइन्स तक पहुँच पाई हों।

आखिर यह हँसी किसके दम पर है

2007 में विधायी संस्था के रूप में गठित, नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में इस समय 1300 गैरपंजीकृत चाइल्ड केयर संस्थान (सीसीआई) हैं यानी वे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत रजिस्टर नहीं किए गए हैं। देश में कुल 5850 सीसीआई हैं. और कुल संख्या 8000 के पार बताई जाती है। इस डाटा के मुताबिक सभी सीसीआई में करीब दो लाख तैंतीस हजार बच्चे रखे गए हैं। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने देश में चलाए जा रहे समस्त सीसीआई को रजिस्टर करा लेने का आदेश दिया था. लेकिन सवाल पंजीकरण का ही नहीं है. पंजीकृत तो कोई एनजीओ करा ही लेगा क्योंकि उसे फंड या ग्रांट भी लेना है, लेकिन कोई पंजीकृत संस्था कैसा काम कर रही है इसपर निरंतर निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था तो रखनी ही होगी. डिजीटलाइजेशन पर जोर के बावजूद सरकार अपने संस्थानों और अपने संरक्षण में चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली और कार्यक्षमता की निगरानी का कोई अचूक सिस्टम विकसित नहीं कर पा रही है।
बंगाल की स्थिति कुछ अलग नहीं है। यहाँ भी ऐसे मामले सामने आये हैं मगर यहाँ भी राजनीति ने मुद्दे को दबा रखा है।
अब शेल्टर होम्स को लेकर एक इत्मिनान रखने वाला रवैया छोड़ देना चाहिए क्योंकि दक्षिण 24 परगना में शिशुओं की खरीद-फरोख्त का मामला बहुत पुराना नहीं हुआ है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसमें बड़े-बड़े नाम सामने आये थे। वहीं एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट कहती है कि देश भर में बच्चों के खिलाफ होने वाले आपराधिक मामलों में 12,786 की वृद्धि हुई है। 2015 में आँकड़ा जहाँ 94,172 था, वहीं आँकड़ा 2016 में 1,06,958 हो गया। वहीं बच्चों के लिए काम कर रही संस्था क्राई के मुताबिक पिछले एक दशक में यह आँकड़ा 500 गुना बढ़ चुका है। बिहार के बाल सुधार गृह का मामला तो बानगी भर है। बच्चों के खिलाफ सबसे अधिक अपराध उत्तर प्रदेश (15 प्रतिशत), महाराष्ट्र (14 प्रतिशत), मध्य प्रदेश (13 प्रतिशत), दिल्ली और पश्‍चिम बंगाल में हुए और इन 5 राज्यों में ही 50 प्रतिशत मामले दर्ज किये गये हैं। अब तक आप अपहरण से परेशान थे मगर सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि बच्चों से होने वाले दुष्कर्म के आँकड़े 18 प्रतिशत बढ़ चुके हैं। एनसीआरबी का हालिया जो आँकड़ा है वह बताता है कि लापता बच्चों को लेकर सबसे अधिक मामले पश्‍चिम बंगाल में सामने आये जिसका प्रतिशत 15.1 प्रतिशत है मगर वर्ष के अन्त तक 55, 944 बच्चों का पता लगाया गया था। राज्य की महिला एवं बाल विकास मंत्री डॉ. शशि पाँजा ने एक कार्यक्रम में पूछे जाने पर कहा था कि शिकायत अधिक दर्ज होने के कारण संख्या बढ़ी है। इसके अतिरिक्त कई बार ये बच्चे बांग्लादेशी होते हैं और भाषायी समानता होने के कारण इनको बंगाली समझ लिया जाता है।

बच्चे नहीं बचेंगे तो भविष्य भी नहीं बचेगा

यह बात अपनी जगह है मगर क्या इतने भर से हम आश्‍वस्त हो सकते हैं? पिछले साल ही राज्य के कई होम्स में शिशुओं की तस्करी और 10 से अधिक बच्चों की खरीद-फरोख्त का जो मामला सामने आया था, उसमें कारा (सेन्ट्रल एडप्शन रिसोर्स अथॉरिटी) में अनियमितताओं के आरोप लगे थे। शिशु तस्करी का मामला दक्षिण 24 परगना या उत्तर 24 परगना ही नहीं बल्कि उत्तर बंगाल तक जा पहुँचा था। अभी भी यह मामला बंद नहीं हुआ है। इसके पहले नवम्बर 2016 में उत्तर 24 परगना के बादुरिया और मानसिक जरूरतमंदों के ठाकुरपुकुर स्थित होम से 12 बच्चों को पुलिस ने बचाया था। इसके पहले हुगली के गुड़ाप में शेल्टर होम में भी उत्पीड़न का मामला सामने आया था। अगर हम वाकई अपनी समस्याओं को लेकर गम्भीर हैं तो जरूरी है कि राजनीति को इससे दूर करें, वरना आँकड़ों को लेकर रोने का कोई मतलब नहीं है। शेल्टर होम्स पर निगरानी बढ़ाइए और जनप्रतिनिधियों को रिपोर्ट देने के लिए बाध्य कीजिए। सरकारों को निजी संस्थाओं पर अपनी निर्भरता कम करके अपना तंत्र मजबूत कर सख्त कदम उठाने होंगे और उससे भी जरूरी है कि हम खुद सक्रिय हों क्योंकि आखिरकार सरकारें आती और जाती रहेंगी…ये बच्चे हमारे हैं, हमारे देश की तकदीर हैं जिसे हम यूँ ही नहीं छोड़ सकते।

हिन्दी भाषी जनता ने प्रेमचन्द को सांस्कृतिक नायक नहीं बनाया

कोलकाता : इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के प्रो. वसंत त्रिपाठी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में यथार्थवाद अपने युग की खौफनाक सच्चाइयाँ व्यक्त करता है। उन्हें हिन्दी भाषी जनता ने उस तरह अपना सांस्कृतिक नायक नहीं बनाया जिस तरह से बंगाल की जनता ने रवींद्रनाथ को बनाया है। दिल्ली से आए साहित्यकार डॉ.प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद ने हिंदी को लोकप्रिय बनाया और उनके साहित्य ने इंसान को लड़ने की ताकत दी। यह अफसोस कि बात है कि किसी हिन्दी भाषी राज्य के विश्‍वविद्यालय का नाम प्रेमचंद के नाम पर नहीं है। भारतीय भाषा परिषद और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा आयोजित प्रेमचंद जयंती में विद्वानों ने ये बातें कहीं। प्रेसिडेंसी विश्‍वविद्यालय के प्रो.ॠषिभूषण चौबे ने कहा कि प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू मिजाज को समझ कर अपनी कथा भाषा की रचना की थी और अपने समाज की रूढ़ियों पर चोटें की थीं। खिदिरपुर कॉलेज की प्रो.इतु सिंह ने कहा कि प्रेमचंद हिंदी जनता के हृदय सम्राट हैं। उनके कथा साहित्य में जो राजनीति है उसका उद्देश्य संकीर्ण न होकर संपूर्ण भारत को एक नई दिशा में बदलना था। कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल प्रो सत्या उपाध्याय ने कहा कि प्रेेमचंद का समय सामाजिक सुधारों और स्वाधीनता आंदोलनों का भारत था और वे इस भारत के प्रतिनिधि साहित्यकार थे अध्यक्षीय भाषण देते हुए शंभुनाथ ने कहा कि प्रेमचंद का राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीयतावाद दोनों ही उच्च मानवीय मूल्यों को लेकर चलता है। उनके कथा साहित्य के केंद्र में दलित और स्त्री के साथ पूरा भारत भी था। वर्तमान भारत को बदलने की सबसे बड़ी दृष्टि प्रेमचंद से मिलती है। संगोष्ठी में विनोद यादव ने अपना आलेख पाठ किया। भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में युवाओं की उपस्थिति प्रेमचंद की महानता को एक बड़ा नमन है। प्रो.संजय जायसवाल ने संगोष्ठी का संचालन किया और परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

प्रेमचंद का साहित्य़ मनुष्यता के विकास का साहित्य है

मिदनापुर : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से “प्रेमचंद आज” विषय पर प्रेमचंद जयंती का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष (कला व वाणिज्य) प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य मनुष्यता के विकास का साहित्य है। प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि प्रेमचंद किसानों के अधिकारों के लिए निरंतर अपनी रचनाओं में संघर्ष करते हुए सामंतवाद और पूंजीवाद से टकराते हैं। डॉ. श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि प्रेमचंद समाज के हर वर्ग के हितार्थ लिखते हैं। गोप कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. रेणु गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद ने सबको जोड़ने का काम किया है। संस्कृत की प्रो. इला नंदा ने कहा कि प्रेमचंद समग्रता के लेखक हैं। प्रेमचंद पर आयोजित परिचर्चा में सोनाली कुमारी,बीना पाल, पूनम पाल, श्रद्धा उपाध्याय ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। शोधार्थी विनोद यादव ने कहा कि प्रेमचंद उपभोक्तावाद का विरोध करते हैं। दीपनारायण चौहान ने कहा कि प्रेमचंद ने कथा साहित्य को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। प्रियंका गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद को लेकर हिंदी समाज उदासीन रहा है। हमें प्रेमचंद को पूरे समाज का हिस्सा बनाना होगा। मधु सिंह ने प्रेमचंद की कहानियों में व्यक्त प्रेम पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रेम कहानियों में त्याग, समर्पण का भाव परिलक्षित होता है। इसके अलावा मिथिलेश साव, राधेश्याम सिंह, सलोनी शर्मा, सोनी कुमारी, श्रद्धा उपाध्याय, राहुल गौड़, बिना पाल, सोमा दे आदि ने अपने विचार रखें। इस अवसर पर प्रभाती मुंगराज, चंदना मंडल, मौसमी गोप, राजकुमार मिश्रा, धनंजय प्रसाद ने संवाद-सत्र में हिस्सा लिया। कार्यक्रम का सफल संचालन मधु सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन रूपल साव ने दिया।

न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी, न्यायमूर्ति विनीत सरन और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ ने ली शपथ

नयी दिल्ली : न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी, न्यायमूर्ति विनीत सरन और न्यायमूर्ति के एम जोसेफ को वरिष्ठता के इसी क्रम में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद की शपथ दिलाई गयी। इन तीन न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण के साथ ही अब उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 25 हो गयी है।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपने न्यायालय कक्ष में सवेरे साढ़े दस बजे सबसे पहले न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी को शपथ दिलाई। इसके बाद न्यायमूर्ति सरन और फिर न्यायमूर्ति जोसेफ ने न्यायाधीश के पद की शपथ ली।
इन न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण समारोह में शीर्ष अदालत के सारे न्यायाधीश और विधि अधिकारी उपस्थित थे। इनके अलावा बड़ी संख्या में वकील भी प्रधान न्यायाधीश के न्यायालय में मौजूद थे।
हालांकि, इससे पहले न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी आधिकारिक अधिसूचना में उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ का नाम वरिष्ठता क्रम में सबसे नीचे होने की वजह से कल तक कुछ विवाद की स्थिति बनी हुयी थी।
शीर्ष अदालत की कोलेजियम के सदस्यों में से न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति ए के सीकरी सहित कुछ न्यायाधीशों ने सरकारी अधिसूचना में न्यायमूर्ति जोसेफ की वरिष्ठता कम करने के संबंध में प्रधान न्यायाधीश से मुलाकात करके इस पर अपनी नारजगी भी व्यक्त की थी।

न्यायालय के सूत्रों ने बताया था कि प्रधान न्यायाधीश ने आपत्ति व्यक्त करने वाले न्यायाधीशों को आश्वासन दिया था कि वह इस मामले को केन्द्र सरकार के समक्ष उठायेंगे।

न्यायालय के सूत्रों ने कल कहा था कि कुछ न्यायाधीशों द्वारा इसे लेकर व्यक्त की गयी चिंता पर इस समय कुछ भी नहीं हो सकता परंतु मंगलवार को तीनों न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण के बाद इस पर चर्चा की जायेगी।

द्रमुक अध्यक्ष करूणानिधि का निधन

चेन्नई :  द्रमुक अध्यक्ष एम. करूणानिधि का लंबी बीमारी के बाद आज शाम शहर के एक अस्पताल में निधन हो गया। कावेरी अस्पताल में भर्ती 94 वर्षीय नेता ने मंगलवार को शाम छह बजकर दस मिनट पर अंतिम सांस ली। अस्पताल के कार्यकारी निदेशक डॉक्टर अरविन्दन सेल्वाराज की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, ‘‘हमें बड़े दुख के साथ बताना पड़ रहा है कि हमारे प्रिय कलैनार एम. करूणानिधि का सात अगस्त, 2018 को शाम छह बजकर दस मिनट पर निधन हो गया। डॉक्टरों और नर्सों की हमारी टीम के सर्वश्रेष्ठ प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।’’ विज्ञप्ति के अनुसार, ‘‘हम भारत के कद्दावर नेताओं में से एक के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं और परिवार के सदस्यों तथा दुनिया भर में बसे तमिलवासियों का दुख साझा करते हैं।’’ करूणानिधि का रक्तचाप कम होने के बाद 28 जुलाई को उन्हें गोपालपुरम स्थित आवास से कावेरी अस्पताल भेजा गया था। पहले वह वार्ड में भर्ती थे, बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया।

कविता

रेखा श्रीवास्तव

कविता

कविता केवल

कविता नहीं होती

वो तो होती है

मन की अभिव्यक्ति

मन का सुख

मन का दुख

कविता केवल

कविता नहीं होती

वो तो होती है

दुख में बिल्कुल

आपसे चिपकी हुई

आंसू की तरह

बहती रहती है

कागजों पर

रचती रहती है

एक नया संसार

कविता केवल

कविता नहीं होती

वो तो होती है

अकेलेपन की साथी

हाथ थामे रहती है

रास्ता दिखाती रहती है

कदम बढ़ाती रहती है

कविता केवल कविता

नहीं होती

वह जख्म को

भरने  का काम करती है

कभी खोलकर तो कभी

ढँक कर घाव ठीक करती है

कविता केवल

कविता नहीं होती

वो तो रोशनदान

होती है

चारों ओर से बंद कमरे में

भी हल्की रोशनी ला देती है

और उम्मीद की नयी किरण

जगा जाती है

कविता केवल कविता नहीं होती

वो तो पूरी जिंदगी होती है

सारे रंगों से भरी होती है

सारे ख्वाबों से भरी होती है

कविता केवल कविता नहीं होती है

व्यभिचार में पुरुष का साथ देने वाली महिला अपराध में बराबर की जिम्मेदारः सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट में गत गुरुवार को व्यभिचार के लिए सिर्फ पुरुष को सज़ा देने वाली आईपीसी की धारा 497 पर सुनवाई हुई, जहां कोर्ट ने टिप्पणी किया कि शादी जैसी संस्था को बचाने और उसकी पवित्रता को बनाए रखने में दोनों पार्टनर बराबर जिम्मेदार होने चाहिए। अगर एक विवाहित महिला अपने पति के अलावा किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाती है, तो ऐसे में केवल पुरुष को दंडित कैसे किया जा सकता है, जबकि महिला उस अपराध में बराबर की जिम्मेदार है।
कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि कैसे संसद ने कानून में प्रावधान कर दिया कि अगर कोई विवाहित पुरुष किसी महिला के साथ उसके पति की मर्जी के बिना संबंध बनाता है, तो अपराध की श्रेणी में आएगा। कोर्ट ने कहा कि पति की इजाजत से महिला को दूसरे विवाहित पुरुष के साथ संबंध व्याभिचार को बढा़वा देता है। कोर्ट ने कहा कि कई मौकों पर देखा गया है कि महिला शादीशुदा होने के बावजूद पति से अलग रहती है। ऐसे में उसका किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाना अपराध के दायरे में कैसे आ सकता है।
मामले में जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि धारा 497 के तहत पत्नी को पति की मर्जी से किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाने को कानून छूट देना बकवास कानून है। क्या पत्नी के साथ एक संपत्ति की तरह बर्ताव किया जाना चाहिए। जस्टिस डीवाई चंद्रचूर्ण ने याचिकाकर्ता के खिलाफ तर्क देते हुए कहा कि धारा 497 शादी की पवित्रता का बचाव करती है। फिर भी अगर एक विवाहित पुरुष शादी से बाहर जाकर एक अविवाहित महिला के साथ संबंध बनाता है, जो कि इस कानून के दायरे में नहीं आता है। यह भी शादी की पवित्रता को बनाए रखने का काम करती है।
जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि भारत की पहली महिला जज जस्टिस अन्ना चंडी ने विवाहेत्तर संबंध को अपराध के दायरे में लाए जाने को लेकर लॉ कमीशन की रिपोर्ट पर आपत्ति जताई थी।जस्टिस अन्ना ने इस व्याभिचार की धारा को खत्म करने का प्रस्ताव दिया था। उन्होने बताया कि 42वें लॉ कमीशन की रिपोर्ट में पुरुष और महिला दोनों को दोषी बनाए जाने का प्रस्ताव दिया था।
पति की सहमति है तो अपराध नहीं, तो क्या पत्नी गुलाम है? व्यभिचार की धारा 497 पर मंथन
व्यभिचार के जुर्म में सिर्फ पुरुष को दोषी मानने की धारा 497 की वैधानिकता पर मंथन कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को कहा कि ये प्रावधान मनमाना, भेदभावपूर्ण और समानता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला लगता है। कोर्ट ने कहा कि कानून में ये कैसी विसंगति है पत्नी को गुलाम की तरह समझा गया है। अगर उसके पति की सहमति है तो उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने वाला अपराध का भागी नहीं है। ये भेदभाव और मनमाना प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा पहली निगाह मे धारा 497 भेदभाव पूर्ण और मनमानी लगती है
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने आइपीसी की धारा 497 की वैधानिकता पर सुनवाई के दौरान की। यह धारा कहती है कि अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे की पत्नी से उसकी सहमति के बगैर शारीरिक संबंध बनाता है तो वह अपराध करता है और इसके लिए उसे पांच साल तक की सजा हो सकती है। लेकिन इस धारा में विवाहित महिला को अपराधी नहीं माना गया। यहां तक कि उसे अपराध के लिए उकसाने का भी जिम्मेदार नहीं माना गया है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील कालीश्वरन राज ने कानून को चुनौती देते हुए कहा कि ये धारा संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 यानी समानता और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करती है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों को देखा जाए तो कानून की ये धारा समयानुकूल नहीं रह गई है। इसी दौरान पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि कानून में कैसी विसंगति है कि अगर पति की सहमति है तो अपराध नहीं है।
पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है सुनवाई
जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा कि इसमें पत्नी को गुलाम की तहत समझा गया है जो गलत है। हालांकि जस्टिस चंद्रचूड ने कहाकि इस प्रावधान से सिर्फ पति की सहमति का हिस्सा अलग से रद नहीं किया जा सकता क्योंकि उससे बाकी बचा हिस्सा ज्यादा गंभीर अपराध बन जाएगा। जस्टिस आरएफ नारिमन ने कहा कि कानून का उद्देश्य बहुत बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं लगता क्योंकि इसमें पत्नी को वस्तु की तरह समझा गया है। उन्होंने कहा कि अगर शादीशुदा आदमी बाहर जाकर संबंध बनाता है तो अपराध नहीं है। ऐसे में ये कहा जाना कि ये कानून विवाह संस्था को संरक्षित करने के लिए बनाया गया है कहां तक ठीक होगा। क्योंकि उससे तो विवाह संस्था संरक्षित नहीं होती।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने भी कहा कि यह प्रावधान भ्रामक लगता है क्योंकि सहमति होना कानूनन स्वीकार करने लायक बात नहीं है। उन्होंने कहा कि ये ठीक है कि प्रावधान विवाह संस्था को संरक्षित करने के लिए है लेकिन जिस तरह से इसे ड्राफ्ट किया गया है उसमे तो ये पहली निगाह में समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन करता है।
पीठ ने कहा कि वे निजता के पहलू में नहीं जाएंगे और न ही इस बहस मे पड़ेगे कि शादी से इतर संबंध बनाने का अधिकार है कि नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि शादी एक ऐसी संस्था है जिसके स्त्री और पुरुष दो स्तंभ हैं। अगर वहां व्याभिचार की घटना होती है तो दोनों की जिम्मेदारी बनती है।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एडल्टरी को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का मतलब ये नहीं है कि एडल्टरी के लिए कोई लाइसेंस मिल रहा है। चर्चा अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति की यौन स्वतंत्रता और पसंद पर भी हुई। जस्टिस रोहिंग्टन ने कहा कि विवाह संबंध का आपसी भरोसा व्यक्ति की पसंद पर तर्कसंगत नियंत्रण लगाता है।