Wednesday, July 8, 2026
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आजादी का रंग तिरंगा….आजादी का स्वाद तिरंगा

मसालेदार तिरंगा पनीर

सामग्री : 250 ग्राम ताजा पनीर, 75 ग्राम दही, बेसन पाव कटोरी, 1 बड़ा चम्मच लहसुन-अदरक पेस्ट, 2 टमाटर, 1/2 छोटा चम्मच अचार मसाला, 1 चम्मच पुदीना चटनी, 3/4 चम्मच चिली सॉस, 3/4 चम्मच टोमॅटो सॉस, लालमिर्च व गरम मसाला, नमक स्वादानुसार, कटा हरा धनिया।

विधि : सर्वप्रथम पनीर को 3 भागों में काट लें। हर परत के ऊपर पुदीना चटनी, अचार मसाला, चिली सॉस व टोमॅटो सॉस लगा लें और उसे एक के ऊपर एक रखें। तत्पश्चात बेसन, तेल, नमक, लालमिर्च व गरम मसाला मिलाएं तथा घोल को 5 मिनट तक हिलाएं। अब इसमें पनीर को डुबोकर डीप फ्राई कर लें। उसके बाद उनको 2 भागों में काट लें।
अब एक कड़ाही में तेल गरम करके राई-जीरा तड़काएं। उसमें लहसुन-अदरक पेस्ट डालें तथा टोमॅटो प्यूरी डालकर तेल छोड़ने तक पकाएं। अब दही को फेंटकर उसमें डालें और ऊपर से तले हुए रंग-बिरंगे पनीर को डालकर 1-2 उबाली ले लें। अगर पानी की आवश्यकता हो तो डालें अन्यथा नहीं। अब ऊपर से कटे हरे धनिए से सजाकर रोटी या परांठे के साथ चटपटा और मसालेदार तिरंगा पनीर पेश करें।

तिरंगा पास्ता

सामग्री: 3 कप पास्ता (उबला हुआ), 1/4-1/4 कप ब्लैक आलिव्स, लाल और हरी शिमला मिर्च (कटे हुए), 1-1 कप ब्रोकोली और टमाटर, 1 कप मोज़ेरेला चीज़ (कद्दूकस किया हुआ).
इटालियन ड्रेसिंग के लिए: 3 टेबलस्पून ऑलिव ऑयल, 2-2 टेबलस्पून पार्सले लीव्स और विनेगर, आधा टेबलस्पून लहसुन की कलियां, 1/4-1/4 टेबलस्पून ऑरिगेनो और चिली फ्लेक्स, 1-1 टेबलस्पून डाइड बेसिल और नींबू का रस।
विधि: ब्रोकोली को नरम होने तक उबाल लें. बाउल में ब्रोकोली, उबला हुआ पास्ता, दोनों शिमला मिर्च, टमाटर और ऑलिव्स मिला लें । सारी इटालियन सामग्री मिलाकर अच्छी तरह मिलायें। 30 मिनट तक फ्रिज में ठंडा होने के लिए रखें. मोज़ेरेला चीज़ से गार्निश करके परोसें।

श्रीकृष्ण की नगरी और वैज्ञानिकों का आश्चर्य है द्वारिका

मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक नए नगर की स्थापना की थी। कहना चाहिए कि भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया था लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वारिका नष्ट हो गई? किसने किया द्वारिका को नष्ट? क्या प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गई द्वारिका? क्या किसी आसमानी ताकत ने नष्ट कर दिया द्वारिका को या किसी समुद्री शक्ति ने उजाड़ दिया द्वारिका को। आखिर क्या हुआ कि नष्ट हो गई द्वारिका और फिर बाद में वह समुद्र में डूब गई। अंतिम पेज पर खुलेगा इसका रहस्य जो आज तक कोई नहीं जानता।
इस सवाल की खोज कई वैज्ञानिकों ने की और उसके जवाब भी ढूंढे हैं। सैकड़ों फीट नीचे समुद्र में उन्हें ऐसे अवशेष मिले हैं जिसके चलते भारत का इतिहास बदल गया है। अब इतिहास को फिर से लिखे जाने की जरूरत बन गई है। आओ, इस सबके खुलासे के पहले जान लें इस क्षेत्र की प्राचीन पृष्ठभूमि को। पहले जान लें इस क्षेत्र का इतिहास… तब खुलेगा द्वारिका का एक ऐसा रहस्य, जो आप आज तक नहीं जान पाए हैं।

रुक्मिणी देवी मंदिर

ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। इन पांचों कुल के लोगों ने आपस में कई प्रसिद्ध लड़ाइयां लड़ी हैं जिसमें से एक दासराज्ञ का युद्ध और दूसरा महाभारत का युद्ध प्रसिद्ध है।

पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा। (हरिवंश पुराण, 1, 30, 29)। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया। (महाभारत, 1, 85, 32)

किसको कौन सा क्षेत्र मिला : ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुहु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भूमंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए।

द्वारिकाधीश मंदिर

यदु ने पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं मांडलिक पद से इंकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। अन्य चारों भाइयों को जो प्रदेश दिए गए, उनका विवरण इस प्रकार है- यदु को चर्मरावती अथवा चर्मण्वती (चंबल), बेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिण-पूर्व का भू-भाग मिला और द्रुहु को उत्तर-पश्चिम का। गंगा-यमुना दो-आब का उत्तरी भाग तथा उसके पूर्व का कुछ प्रदेश जिसकी सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी, अनु के हिस्से में आया।

यदि हम यादवों के क्षेत्र की बात करें तो वह आज के पाकिस्तान स्थित सिन्ध प्रांत और भारत स्थित गुजरात का प्रांत है। इसके बीच का क्षेत्र यदु क्षेत्र कहलाता था। पहले राज्य का विभाजन नदी और वन क्षे‍त्र के आधार पर था। सरस्वती नदी पहले गुजरात के कच्छ के पास के समुद्र में विलीन होती थी। सरस्वती नदी के इस पार (अर्थात विदर्भ की ओर गोदावरी-नर्मदा तक) से लेकर उस पार सिन्धु नदी के किनारे तक का क्षेत्र यदुओं का था। सिन्धु के उस पार यदु के दूसरे भाइयों का क्षेत्र था।
कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका इसका नाम पड़ा। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका। ये 7 नगर हैं- द्वारिका, मथुरा, काशी, हरिद्वार, अवंतिका, कांची और अयोध्या। द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है।

समुद्र में मिली ग्रेफाइट की संरचना

गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका। द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारिका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है। द्वारिका का प्राचीन नाम कुशस्थली है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। यहां द्वारिकाधीश का प्रसिद्ध मंदिर होने के साथ ही अनेक मंदिर और सुंदर, मनोरम और रमणीय स्थान हैं। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहां के बहुत से प्राचीन मंदिर तोड़ दिए। यहां से समुद्र को निहारना अति सुखद है।

खोज का एक दृश्य

कृष्ण क्यों गए थे द्वारिका : कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यदुओं का नामोनिशान मिटा देने की ठान रखी थी। वह मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करता था। उसके कई मलेच्छ और यवनी मित्र राजा थे। अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरूड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी को पुनः बसाया।
कृष्ण अपने 18 नए कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका आ गए। यहीं 36 वर्ष राज्य करने के बाद उनका देहावसान हुआ। द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।
द्वारिका के इन समुद्री अवशेषों को सबसे पहले भारतीय वायुसेना के पायलटों ने समुद्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए नोटिस किया था और उसके बाद 1970 के जामनगर के गजेटियर में इनका उल्लेख किया गया। उसके बाद से इन खंडों के बारे में दावों-प्रतिदावों का दौर चलता चल पड़ा। बहरहाल, जो शुरुआत आकाश से वायुसेना ने की थी, उसकी सचाई भारतीय नौसेना ने सफलतापूर्वक उजागर कर दी। एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्‍पनिक नगर है, लेकिन इस कल्‍पना को सच साबित कर दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्‍ट प्रो. एसआर राव ने।

प्रो. राव ने मैसूर विश्‍वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद बड़ौदा में राज्‍य पुरातत्‍व विभाग ज्‍वॉइन कर लिया था। उसके बाद भारतीय पुरातत्‍व विभाग में काम किया। प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की। साथ में उन्‍हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्‍यता के भी कई अवशेष उन्‍होंने खोजे। उस जगह पर भी उन्‍होंने खुदाई में कई रहस्‍य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।
पहले 2005 फिर 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने समुद्र में समाई द्वारिका नगरी के अवशेषों के नमूनों को सफलतापूर्वक निकाला। उन्होंने ऐसे नमूने एकत्रित किए जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। 2005 में नौसेना के सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किए गए।

ये चीजें प्राप्त हुईं

गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास स्थित द्वारिका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य किया और वहां पड़े चूना पत्थरों के खंडों को भी ढूंढ निकाला।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने इन दुर्लभ नमूनों को देश-विदेशों की पुरा प्रयोगशालाओं को भेजा। मिली जानकारी के मुताबिक ये नमूने सिन्धु घाटी सभ्यता से कोई मेल नहीं खाते, लेकिन ये इतने प्राचीन थे कि सभी दंग रह गए।
नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे में यह उत्खनन किया और वहां पड़े भवनों के खंडों के नमूने एकत्र किए जिन्हें आरंभिक तौर पर चूना पत्थर बताया गया था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि ये खंड बहुत ही विशाल और समृद्धशाली नगर और मंदिर के अवशेष हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक (धरोहर) एके सिन्हा के अनुसार द्वारिका में समुद्र के भीतर ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी खुदाई की गई थी और 10 मीटर गहराई तक किए गए इस उत्खनन में सिक्के और कई कलाकृतियां भी प्राप्त हुईं।
इस समुद्री उत्खनन के बारे में सहायक नौसेना प्रमुख रियर एडमिरल एसपीएस चीमा ने तब बताया था कि इस ऐतिहासिक अभियान के लिए उनके 11 गोताखोरों को पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्रशिक्षित किया और नवंबर 2006 में नौसेना के सर्वेक्षक पोत आईएनएस निर्देशक ने इस समुद्री स्थल का सर्वे किया। इसके बाद इस साल जनवरी से फरवरी के बीच नौसेना के गोताखोर तमाम आवश्यक उपकरण और सामग्री लेकर उन दुर्लभ अवशेषों तक पहुंच गए। रियर एडमिरल चीमा ने कहा कि इन अवशेषों की प्राचीनता का वैज्ञानिक अध्ययन होने के बाद देश के समुद्री इतिहास और धरोहर का तिथिक्रम लिखने के लिए आरंभिक सामग्री इतिहासकारों को उपलब्ध हो जाएगी।इस उत्खनन के कार्य के आंकड़ों को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सामने पेश किया गया। इन विशेषज्ञों में अमेरिका, इसराइल, श्रीलंका और ब्रिटेन के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। नमूनों को विदेशी प्रयोगशालाओं में भी भेजा गया ताकि अवशेषों की प्राचीनता के बारे में किसी प्रकार की त्रुटि का संदेह समाप्त हो जाए।

रणछोड़ राय मंदिर

2001 में सरकार ने गुजरात के समुद्री तटों पर प्रदूषण के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी द्वारा एक सर्वे करने को कहा। जब समुद्री तलहटी की जांच की गई तो सोनार पर मानव निर्मित नगर पाया गया जिसकी जांच करने पर पाया गया कि यह नगर 32,000 वर्ष पुराना है तथा 9,000 वर्षों से समुद्र में विलीन है। यह बहुत ही चौंका देने वाली जानकारी थी। माना जाता है कि 9,000 वर्षों पूर्व हिमयुग की समा‍प्ति पर समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण यह नगर समुद्र में विलीन हो गया होगा, लेकिन इसके पीछे और भी कारण हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार जब हिमयुग समाप्त हुआ तो समद्र का जलस्तर बढ़ा और उसमें देश-दुनिया के कई तटवर्ती शहर डूब गए। द्वारिका भी उन शहरों में से एक थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि हिमयुग तो आज से 10 हजार वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। भगवान कृष्ण ने तो नई द्वारिका का निर्माण आज से 5 हजार 300 वर्ष पूर्व किया था, तब ऐसे में इसके हिमयुग के दौरान समुद्र में डूब जाने की थ्योरी आधी सच लगती है।
लेकिन बहुत से पुराणकार और इतिहासकार मानते हैं कि द्वारिका को कृष्ण के देहांत के बाद जान-बूझकर नष्ट किया गया था। यह वह दौर था, जबकि यादव लोग आपस में भयंकर तरीके से लड़ रहे थे। इसके अलावा जरासंध और यवन लोग भी उनके घोर दुश्मन थे। ऐसे में द्वारिका पर समुद्र के मार्ग से भी आक्रमण हुआ और आसमानी मार्ग से भी आक्रमण किया गया। अंतत: यादवों को उनके क्षेत्र को छोड़कर फिर से मथुरा और उसके आसपास शरण लेना पड़ी।
हाल ही की खोज से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि यह वह दौर था जबकि धरती पर रहने वाले एलियंस का आसमानी एलियंस के साथ घोर युद्ध हुआ था जिसके चलते यूएफओ ने उन सभी शहरों को निशाना बनाया, जहां पर देवता लोग रहते थे या जहां पर देवताओं के वंशज रहते थे।

(साभार – वेबदुनिया)

तांबे के बर्तन से पिएंगे तो रहेंगे स्वस्थ

तांबे के बैक्टीरिया-नाशक गुणों में मेडिकल साइंस की ओर से पिछले कुछ वर्षों में कई प्रयोग हुए हैं और वैज्ञानिकों ने यह मालूम किया है कि पानी की अपनी याददाश्त होती है यह हर उस चीज को याद रखता है जिसको यह स्पर्श करता है। ऐसा माना जाता है कि पानी की भी अपनी स्मरण-शक्ति होती है और किस बर्तन में कैसे फायदा मिल सकता है। आइए जानते हैं कि आखिर तांबे के बर्तन में पानी रखने से क्या-क्या फायदे मिल सकते हैं –

तांबे के पानी से मिलने वाले फायदे

1. तांबे के बर्तन में रखा पानी पूरी तरह से शुद्ध माना जाता है। यह सभी प्रकार के बैक्टीरिया को खत्म कर देता है, जो डायरिया, पीलिया, डिसेंट्री और अन्य प्रकार की बीमारियों को पैदा करते हैं।

2. अगर आप पानी को रात भर या कम-से-कम चार घंटे तक तांबे के बर्तन में रखें तो यह तांबे के कुछ गुण अपने में समा लेता है।

3. तांबा यानि कॉपर, सीधे तौर पर आपके शरीर में कॉपर की कमी को पूरा करता है और बीमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं से आपकी रक्षा कर आपको पूरी तरह से स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होता है।

4. तांबे में एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण होने के कारण शरीर में दर्द, ऐंठन और सूजन की समस्या नहीं होती। ऑर्थराइटिस की समस्या से निपटने में भी तांबे का पानी अत्यधि‍क फायदेमंद होता है।

5. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट कैंसर से लड़ने की क्षमता में वृद्धि करते हैं। अमेरिकन कैंसर सोसायटी के अनुसार तांबे कैंसर की शुरुआत को रोकने में मदद करता है और इसमें कैंसर विरोधी तत्व मौजूद होते है।

6. पेट की सभी प्रकार की समस्याओं में तांबे का पानी बेहद फायदेमंद होता है। प्रतिदिन इसका प्रयोग करने से पेट दर्द, गैस, एसिडिटी और कब्ज जैसी परेशानियों से निजात मिल सकती है।

7. शरीर की आंतरिक सफाई के लिए तांबे का पानी कारगर होता है। इसके अलावा यह लिवर और किडनी को स्वस्थ रखता है और किसी भी प्रकार के इंफेक्शन से निपटने में तांबे के बर्तन में रखा पानी लाभप्रद होता है।

8. तांबा अपने एंटी-बैक्‍टीरियल, एंटीवायरल और एंटी इंफ्लेमेट्री गुणों के लिए भी जाना जाता है। यह शरीर के आंतरिक व बाह्य घावों को जल्‍दी भरने के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है।

9. तांबे में भरपूर मात्रा में मौजूद मिनरल्स थॉयराइड की समस्या को दूर करने में सहायक होते हैं। थॉयराइड ग्रंथि‍ के सही क्रियान्वयन के लिए तांबा बेहद उपयोगी है।

10. तांबे में उपस्थि‍त एंटी-ऑक्सीडेंट तत्व असमय बढ़ती उम्र के निशान को कम कर आपको जवां बनाए रखता है। इसके अलावा यह फ्री रैडिकल में भी लाभदायक है, जो त्वचा को झुर्रियों, बारीक लाइनों और दाग-धब्बों से बचाकर स्वस्थ और जवां बनाए रखता है।

राजनीति में अपराधीकरण का प्रवेश नहीं होना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : गम्भीर अपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे व्यक्तियों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध के लिए दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में सुनवाई शुरू हो गई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में अपराधीकरण का प्रवेश नहीं होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अधिकारों का बंटवारा करने के सिद्धांत का हवाला दिया और कहा कि अदालतों को लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए और कानून बनाने के संसद के अधिकार के दायरे में नहीं जाना चाहिए। संविधान पीठ ने कहा, यह लक्ष्मण रेखा उस सीमा तक है कि हम कानून घोषित करते हैं। हमें कानून नहीं बनाने हैं, यह संसद का अधिकार क्षेत्र है।
केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि यह विषय पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र का है और यह एक अवधारणा है कि दोषी ठहराए जाने तक व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है। इस पर पीठ ने मंत्रियों द्वारा ली जाने वाली शपथ से संबंधित सांविधान के प्रावधान का हवाला दिया और जानना चाहा कि क्या हत्या के आरोप का सामना करने वाला संविधान के प्रति निष्ठा बनाए रखने की शपथ ले सकता है।
वेणुगोपाल ने कहा, शपथ में ऐसा कुछ नहीं है जो यह सिद्ध कर सके कि आपराधिक मामले का सामना कर रहा व्यक्ति संविधान के प्रति निष्ठा नहीं रखेगा और इतना ही नहीं, संविधान में निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के प्रावधान हैं और दोषी साबित होने तक एक व्यक्ति को निर्दोष माना जाता है।
इससे पहले हाल ही में गैरसरकारी संगठन पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने दावा किया कि 2014 में संसद में 34 प्रतिशत सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले थे और यह पूरी तरह असंभव है कि संसद राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कोई कानून बनाएगी। भाजपा नेता अश्वनी उपाध्याय ने भी चुनाव सुधारों और राजनीति को अपराधीकरण और सांप्रदायीकरण से मुक्त करने का निर्देश देने के आग्रह के एक याचिका दायर कर रखी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राजनीति के अपराधीकरण के मुद्दे पर शीर्ष अदालत को ही विचार करना चाहिए।

माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला ने शेयर बेचकर कमाए 242 करोड़ रुपये

वाशिंगटन : माइक्रोसॉफ्ट के भारतीय मूल के सीईओ सत्या नडेला ने कंपनी में अपने शेयर बेचकर 242 करोड़ रुपये की कमाई की है। उन्होंने ऐसे समय यह बिक्री की है, जब कंपनी के शेयर 110 डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर चल रहे हैं। माइक्रोसॉफ्ट के शेयर पिछले एक साल में 53 फीसदी बढ़े हैं और 25 जुलाई को 111 डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंचे थे। 50 साल के नडेला के पास कंपनी के 7.78 लाख शेयर अभी भी हैं। हालांकि नडेला इन पैसों का कहां निवेश करने वाले है, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है। माइक्रोसॉफ्ट के प्रवक्ता ने सिर्प इतना कहा कि यह नडेला का निजी वित्तीय निर्णय है। कंपनी के अनुसार, नडेला लगातार कंपनी की कामयाबी के लिए काम कर रहे हैं और शेयरों की उनकी होल्डिंग माइक्रोसॉफ्ट द्वारा तय की गई सीमा के तहत ही है। गौरतलब है कि नडेला के अलावा कई और भारतीय प्रतिभाएं दिग्गज कंपनियों की कमान संभाले हुए हैं। इनमें गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, मास्टरकार्ड के अजय बंगा, नोकिया के सीईओ राजीव सूरी और एडोब के सीईओ शांतनु नारायण शामिल हैं। इसके अलावा संजय झा ग्लोबल फाउंड्रीज के सीईओ, नेटएप के अगुआ जार्ज कुरियन और काग्निजेंट के सीईओ जॉर्ज कुरियन शामिल हैं।

सालाना वेतन-भत्ते 138 करोड़ रुपये
उनका सालाना वेतन भी करीब 100 करोड़ रुपये के करीब है और भत्ते-सुविधाओं समेत कंपनी उन पर करीब 138 करोड़ रुपये खर्च करती है। नडेला ने फरवरी 2014 में स्टीव बॉमर की जगह माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ का पद संभाला था। इससे पहले उन्होंने 2016 में शेयरों की बिक्री की थी, लेकिन तब कंपनी के एक शेयर की कीमत 58 डॉलर ही थी।

देश ने एक तिहाई तटरेखा खोयी, उतनी की ही वृद्धि भी हुई : रिपोर्ट

नयी दिल्ली : पिछले 26 वर्षों में चक्रवात और लहरों जैसी प्राकृतिक आपदाओं और निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियों से भारत की करीब एक तिहाई तटरेखा का क्षरण हुआ है जबकि नये रेत निक्षेपण की वजह से करीब करीब उतना ही क्षेत्र जुड़ा भी है।

राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र ने 1990 और 2016 के बीच भारत की 7,517 किलोमीटर लंबी तटरेखा में से 6,031 किलोमीटर क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और पाया कि उसके 33 फीसदी हिस्से खासकर बंगाल की खाड़ी से लगती तटेरखा का क्षरण हुआ । सबसे अधिक क्षरण पश्चिम बंगाल में हुआ। साथ ही, सर्वेक्षण के दौरान 29 फीसद की वृद्धि या निक्षेपण में बढ़ोतरी भी नजर आयी। इस रिपोर्ट के लेखकों में एक एनसीसीआर के निदेशक एम वी रमना मूर्ति ने कहा, ‘‘क्षरण और वृद्धि एक दूसरे के पूरक हैं। यदि एक जगह से बालू या अवसाद बह गये तो यह अवश्य ही कहीं और जमा हुए।’’

इस रिपोर्ट के अनुसार सर्वेक्षण के अंतर्गत शामिल तटरेखा के 2,156.43 किलोमीटर हिस्से का क्षरण हुआ जबकि 1,941.24किलोमीटर क्षेत्र की बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट के सहलेखक पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम राजीवन ने बताया कि वैसे तो लंबे समय से यह ज्ञात था कि तटरेखा का क्षरण हो रहा है लेकिन अधिकारियों ने उसके सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण की जरूरत महसूस की ताकि विभिन्न एजेंसियां जरूरी कार्रवाई कर सकें।

मूर्ति के अनुसार क्षरण से मानव बस्तियां नष्ट होती है, क्योंकि समुद्र का पानी स्थल पर आ जाता है। इससे तटीय क्षेत्रों में खेती भी प्रभावित होती है। छोटी नौकाओं वाले पारंपरिक मछुआरों के लिए तट समुद्र में जाने का द्वार होता है, ऐसे में तट के नष्ट होने का तात्पर्य उन्हें समुद्र में उतरने के लिए बंदरगाह का इस्तेमाल करना होता है।

मूर्ति के मुताबिक उसी तरह वृद्धि से भूक्षेत्र बढ़ जाता है क्योंकि तट का विस्तार होता है। यह एक सकारात्मक बात है। लेकिन यदि यही वृद्धि डेल्टा या संकरी खाड़ी में होता है तो उसका पारिस्थितिकी पर नकारात्मक असर होता है क्योंकि गाद जमने से समुद्र का पानी इन क्षेत्रों में नहीं जा पाता। एश्चुअरी और संकरी खाड़ी जलीय जंतुओं और वनस्पतियों का प्रजनन स्थल होता है।

नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वी एस नायपॉल का निधन

लंदन : उपनिवेशवाद, आदर्शवाद, धर्म और राजनीति जैसे विषयों पर मुखर रूप से अपनी बात रखने वाले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक वी एस नायपॉल का 85 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
नायपॉल की पत्नी नादिरा नायपॉल ने एक बयान में कहा,‘‘ उन्होंने जो हासिल किया वह महान था और उन्होंने अंतिम सांस अपने प्रियजनों के बीच ली। उनका जीवन अद्भुत रचनात्मकताओं एवं प्रयासों से भरा था।’’
नायपॉल ने अपने जीवन में 30 से अधिक किताबें लिखीं। ‘द मिस्टिक मैसूर’ उनकी पहली किताब थी। वर्ष 1961 में प्रकाशित ‘अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास’ उनकी सबसे मशहूर एवं लोकप्रिय किताब है।
‘द मिमिक मेन’ (1967) , ‘इन ए फ्री स्टेट’ (1971) , ‘गुरिल्लाज’ (1975), ‘ए बेंड इन द रिवर, (1979) , ‘ए वे इन वर्ल्ड’ (1994) , ‘द इनिग्मा ऑफ अराइवल‘ (1987), ‘बियॉन्ड बिलिफ : इस्लामिक एक्सकर्जन अमंग द कन्वर्टेड पीपुल्स’ (1998), ‘हॉफ ए लाइफ’ (2001), ‘द राइटर एंड द वर्ल्ड’ (2002), ‘लिटरेरी ऑकेजन्स (2003), ‘द नॉवेल मैजिक सीड्स’ (2004) आदि उनकी मशहूर रचनाओं में से हैं।
नायपॉल को कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें वर्ष 1971 में मिला ‘मैन बुकर प्राइज’ और वर्ष 1990 में मिला ‘नाइटहुड’ शामिल है।
नायपॉल को वर्ष 2001 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का जन्म 17 अगस्त 1932 में त्रिनिदाद में एक भारतीय हिंदू परिवार में हुआ था और 18 साल का होने पर वह छात्रवृत्ति हासिल कर ऑक्सफोर्ड में पढ़ने के लिए चले गए। इसके बाद वह इंग्लैंड में बस गए।
नायपॉल ने पहली शादी पेट्रीसिया एन हेल नायपॉल से वर्ष 1955 में की थी लेकिन वर्ष 1996 में पेट्रीसिया का निधन हो गया और उसी वर्ष नायपॉल पाकिस्तानी पत्रकार नादिरा अल्वी से शादी के बंधन में बंध गए।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले बिल्डर पर सौ करोड़ का जुर्माना

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के आदेश को बरकरार रखते हुए पुणे के एक बिल्डर पर पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर निर्माण करने पर प्रोजेक्ट की कुल लागत का 10 फीसदी जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना 100 करोड़ रुपये बैठ रहा है।
कोर्ट ने इस मामले में प्रोजेक्ट प्रोपोनेंट पर भी पांच करोड़ रुपये का जुर्माना ठोका है। लेकिन, प्रोजेक्ट को गिराने का आदेश देने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा, इस मामले में जिन लोगों ने फ्लैट और दुकानें ले ली हैं उनका नुकसान होगा। हालांकि कोर्ट अवैध निर्माण को वैध करने के खिलाफ है लेकिन इस केस में उसके सामने कोई विकल्प नहीं है।
जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की पीठ ने यह जुर्माना गंगा गोयल डेवलपर्स इंडिया प्रा. लि. पर लगाया है। बिल्डर ने पर्यावरण क्लीयरेंस का उल्लंघन कर निर्माण खड़ा कर दिया था। इसके अलावा उसने कई म्यूनिसिपल कानूनों का भी उल्लंघन किया था। बिल्डर के खिलाफ एक स्थानीय व्यक्ति तानाजी बालासाहेब गंभीरे ने एनजीटी में शिकायत की थी।
एनजीटी ने बिल्डर को पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का दोषी पाया और 20016 में उसे 100 करोड़ रुपये पर्यावरणीय मुआवजे के तौर पर जमा करने के आदेश दिया। साथ ही एनजीटी ने यह भी आदेश दिया था कि महाराष्ट्र के मुख्य सचिव पर्यावरण प्रमुख सचिव के व्यवहार की जांच करें और उसकी रिपोर्ट एनजीटी में पेश करें। इस प्रोजेक्ट में 807 फलैट, 117 दुकान/ ऑफिस, सांस्कृतिक केंद्र और क्लब हाउस हैं।

बृजेश कुमारी बिजली फॉल्ट ठीक करने वाली पहली ‘लाइनवुमेन’

लखनऊ : यूपी में अब लाइनवूमेन बिजली फाल्ट ठीक करती नजर आएंगी। बेहद मुश्किल और मेहनत भरा यह काम अब तक पुरुषों के लिए ही माना जाता था लेकिन एटा के जलेसर की बृजेश कुमारी बघेल ने इस धारणा को बदल दिया। वह प्रदेश की पहली लाइनवूमेन बनीं जो पुरुष सहकर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तार, खंभे और ट्रांसफार्मर के फाल्ट ठीक करने का काम बखूबी कर रही हैं। इस तरह उन्होंने किसी पर निर्भर रहने की अपेक्षा अपने छह बच्चों का जिम्मेदारी खुद उठाना बेहतर समझा।
बड़ी जिम्मेदारी तो संभाली मुश्किल डगर

मार्च 2017 में बृजेश के पति राकेश उर्फ रविंद्र कुमार की बिजली दुर्घटना में मौत हो गई। तीन लड़कियों और तीन लड़कों की पूरी जिम्मेदारी आ गई। बृजेश ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बिजली विभाग से मिली मदद के बाद भी काम करने की गुजारिश की। एसडीओ जलेसर पवन वर्मा ने ग्रेजुएट पास बृजेश को आफिस और फील्ड में काम करने का विकल्प दिया तो उन्होंने फील्ड में लाइनवूमेन के तौर पर काम करना स्वीकार किया। तीन महीने से बृजेश काम कर रही हैं। साड़ी पहनकर काम करने में दिक्कतें आईं तो उन्होंने सलवार-सूट पहनकर काम करना शुरू किया। जलेसर के एसडीओ पवन वर्मा कहते हैं कि हमने शुरुआत में उन्हें अन्य लाइनमैन के साथ सहयोगी के तौर पर रखा, अब वह काम सीख गईं हैं। बृजेश की सबसे बड़ी बेटी इंटरमीडिएट में पढ़ती है, अन्य बच्चे भी स्कूल जाते हैं। वह कहती हैं कि बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए ही इतनी मेहनत वाली नौकरी कर रही हैं।

महिलाओं के लिए नया अवसर

प्रदेश में महिलाओं के लिए रोजगार का एक नया रास्ता और खुल गया। जल्द ही यूपी पावर कारपोरेशन अपने अन्य वितरण निगमों में भी महिलाओं को इस तरह काम करने का मौका दे सकता है। अधीक्षण अभियंता शेष बघेल कहते हैं कि आपरेटिंग स्टाफ के तौर पर महिलाओं की तैनाती शून्य है। अब बृजेश की तैनाती से संभव है इस में महिलाएं अधिक आएं।

अहम महिला अफसर :
एमडी यूपी पॉवर कारपोरेशन – अपर्णा यू, आईएएस
निदेशक, विद्युत सुरक्षा निदेशालय – शुभ्रा सक्सेना, आईएएस
निदेशक, केस्को, कानपुर – सौम्या अग्रवाल, आईएएस

मुश्किलें :
पहनावा
काम का समय तय नहीं
बेहद भारी और मुश्किल उपकरणों का उठाना-लगाना

हरिवंश : पत्रकारिता से उच्च सदन के उपसभापति तक का सफर

नयी दिल्ली : राज्यसभा में आज राजग के उम्मीदवार के रूप में उपसभापति पद पर निर्वाचित हुए हरिवंश सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं और राजनीति में वह जयप्रकाश नारायण के आदर्शों से प्रेरित हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज उच्च सदन में उन्हें उपसभापति पद पर निर्वाचित होने के बाद बधाई देते हुए कहा कि वह ‘समाज-कारण’ से जुड़े रहे और ‘राज-कारण’ से दूर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिताबदियारा गांव में 30 जून, 1956 को जन्मे हरिवंश को जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए और पत्रकारिता में डिप्लोमा की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही मुंबई में उनका ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समूह में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में 1977-78 में चयन हुआ। वह टाइम्स समूह की साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में 1981 तक उपसंपादक रहे।

उन्होंने 1981 -84 तक हैदराबाद एवं पटना में बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी की। 1984 में उन्होंने पत्रकारिता में वापसी की और 1989 अक्तूबर तक आनंद बाजार पत्रिका समूह से प्रकाशित ‘रविवार’ साप्ताहिक पत्रिका में सहायक संपादक रहे।

हरिवंश ने वर्ष 1990-91 के कुछ महीनों तक तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (संयुक्त सचिव) के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी काम किया।

ढाई दशक से अधिक समय तक ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक रहे हरिवंश को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने राज्यसभा में भेजा। उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार का बेहद करीबी माना जाता है।

राज्यसभा में आज उपसभापति पद के लिए हुए चुनाव में हरिवंश को 125 और उनके समक्ष खड़े हुए विपक्ष के उम्मीदवार बी के हरिप्रसाद को 105 मत मिले।

उपसभापति पद पर निर्वाचित होने के बाद उन्हें सभी दलों के नेताओं ने बधाई दी। किंतु प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें बधाई देते समय उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण और लगभग अपरिचित पहलुओं का भी दिलचस्प ढंग से उल्लेख किया।

हरिवंश ने कई पुस्तकें लिखी और संपादित की हैं। इनमें ‘दिसुम मुक्तगाथा और सृजन के सपने’, ‘जोहार झारखंड’, ‘झारखंड अस्मिता के आयाम’, ‘झारखंड सुशासन अभी भी संभावना है’, ‘बिहार रास्ते की तलाश’ शामिल हैं।