नयी दिल्ली : दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना का लंबी बीमारी के बाद गत शनिवार को यहां निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे।उनके परिवार ने यह जानकारी दी है।खुराना के परिवार में पत्नी, एक बेटा और दो बेटियां हैं। उनके एक बेटे का पिछले महीने निधन हो गया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता खुराना 1993 से 1996 तक दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे थे। उन्हें 2004 में राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। खुराना के बेटे हरीश ने पीटीआई भाषा को बताया कि खुराना को छाती में संक्रमण था और पिछले कुछ दिनों से बुखार भी था। शनिवार सुबह से ही उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उन्हें पांच साल पहले ब्रेन हेमरेज हुआ था और तब से वह बीमार चल रहे थे। परिवार ने कहा कि उनका अंतिम संस्कार कल किया जाएगा। केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन ने ट्वीट कर उनके निधन पर शोक जताया। हर्षवर्धन ने कहा, ‘‘ भाजपा परिवार और दिल्ली के हमारे पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ श्री मदनलाल खुरानाजी के परिवार को मेरी गहरी संवेदना। उनका लंबी बीमारी के बाद आज निधन हो गया। मेरी संवेदनाएं उनके प्रियजनों के साथ हैं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।’’
घरेलू हिंसा से उबरकर कश्मीर की परवीन बनीं मिसेज इंडिया इंटरनेशनल
श्रीनगर : परवीन भारत की पहली मुस्लिम महिला बन गई हैं जिन्होंने प्रतिष्ठित मिसेज इंडिया इंटरनेशनल का खिताब अपने नाम किया है। इस प्रतियोगिता का आयोजन हाल ही में मलेशिया में किया गया। नुसरत पवीन दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम जिले के यारीपोरा खानपोरा गांव की रहने वाली हैं। नुसरत के तीन बच्चे हैं। उनकी असफल शादी ने उनकी जिंदगी ग़मों से भर दी थी इससे उन्हें मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी।
36 वर्षीय नुसरत परवीन ने अपने दुखों को प्रेरणा में बदलते हुए वह कर दिखाया है जो आजतक किसी भारतीय मुस्लिम महिला ने किया ही नहीं था। परवीन भारत की पहली मुस्लिम महिला बन गई हैं जिन्होंने प्रतिष्ठित मिसेज इंडिया इंटरनेशनल का खिताब अपने नाम किया है। इस प्रतियोगिता का आयोजन हाल ही में मलेशिया में किया गया। कश्मीर के एक मीडिया संस्थान को दिए इंटरव्यू में नुसरत परवीन ने कहा, ‘मेरा दर्द काफी गहरा और क्रूर था। मैंने दुखों को अकेले सहा और किसी तरह उबर कर बाहर आई। मैंने अपने बीते कल को पीछे छोड़ने का फैसला किया और तब मेरे भीतर कुछ करने का जज्बा पैदा हुआ।’ नुसरत पवीन दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम जिले के यारीपोरा खानपोरा गांव की रहने वाली हैं। नुसरत के तीन बच्चे हैं। उनकी असफल शादी ने उनकी जिंदगी ग़मों से भर दी थी इससे उन्हें मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। हालांकि अच्छी बात ये है कि अब वह इन सह से बाहर निकल आई हैं और आज ऐसा मुकाम हासिल किया है जिससे उनका नाम एक नए फलक पर पहुंच चुका है। नुसरत बताती हैं, ‘मैंने महाराष्ट्र के एक लड़के से प्रेम विवाह किया था जो कि पेशे से आर्किटेक्ट था। लेकिन जैसे-जैसे वह अपने करियर में सफल होता गया वैसे-वैसे वह मुझसे भी दूर होता गया।’
नुसरत ने कहा, ‘एक आम भारतीय स्त्री की तरह मैंने उसकी हर बात मानी और किसी तरह रिश्ते को बचा कर रखा। लेकिन शायद मेरी किस्मत में ही ऐसा होना लिखा था। मैं किसी तरह अपने बच्चों के भविष्य के लिए उसके साथ रहा करती थी।’ कुछ ही दिन पहले नुसरत को उनके पति की दूसरी शादी के बारे में मालूम चला तो उनके दिल पर मानो पहाड़ टूट पड़ा हो। वह चौंक गईं और टूट भी गईं। लेकिन उन्होंने किसी तरह खुद को संभाला और अपनी जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने की योजना बनाई। मिसेज इंडिया इंटरनेशनल प्रतियोगिता में जीत हासिल करने के बाद नुसरत ने कहा, ‘मैंने जजों को बताया कि मैं एक हाउसवाइफ हूं और तीन बच्चों की मां भी हूं। अभी तक मैं घर की चाहारदीवारी में कैद थी और बच्चों की देखभाल करती थी, लेकिन आज मैं वहां हूं जहां पहुंचने की कभी कल्पना भी नहीं की थी। नुसरत अंग्रेजी में बहुत तेज नहीं हैं इसलिए उन्होंने जजों से हिंदी में बात करने का आग्रह किया। अपनी सीधी बात से वह जजों को प्रभावित कर पाईं और आज वह इस मुकाम को भी हासिल कर पाईं।
(साभार योर स्टोरी)
वीरांगना सम्मान समारोह व सांस्कृतिक उत्सव ने मन मोहा
हावड़ा : शरत सदन में रविवार की शाम वीरांगना सम्मान समारोह और सांस्कृतिक उत्सव में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया। साहित्य के लिए डॉ.वसुंधरा मिश्र, सिनेमा के लिए ज़ारा परवीन, पत्रकारिता के लिए सुषमा त्रिपाठी, समाजसेवा के लिए करिश्मा खन्ना प्रियदर्शी तथा रंगमंच के लिए डॉ.बिन्दु जायसवाल को यह सम्मान दिया गया। समारोह में संगठन की नवगठित कार्यकारिणी की सदस्याएं भी सम्मानित की गयीं। यह कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फाउंडेशन, पश्चिम बंगाल इकाई की ओर से किया गया था। समारोह में विधायक वैशाली डालमिया अखिल भारतीय क्षत्रिय समाज के मुख्य संरक्षक जय प्रकाश सिंह, वीरांगना के संस्थापक सह मुख्य संरक्षक डॉ.एम.एस.सिंह ‘मानस’, वीरांगना की अंतर्राष्ट्रीय महासचिव भारती सिंह, वीरांगना पटना की महामंत्री निशा सिंह, समाजसेवी शोभा सिंह विशिष्ट मेहमान थे। कार्यक्रम में वीरांगना संदेश के नये अंक का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए वीरांगना की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने कहा कि हम महिलाओं की एकता और उनकी उन्नति के लिए कार्यरत हैं।

अखिल भारतीय क्षत्रिय समाज के महामंत्री शंकर बख्श सिंह ने कहा कि प्रतिभा सिंह हमारी संस्था की आजीवन सदस्या काफी अरसे से रही हैं। जब उन्होंने इस राज्य में वीरांगना की बागडोर संभाली है तो यहां अखिल भारतीय क्षत्रिय समाज वीरांगना के साथ मिलकर कार्य करेगा।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शृंखला सौरभ गिरि, प्रियंका सोनकर, राहुल राणा ने हिन्दी व भोजपुरी गीतों से लोगों का मन मोहा। मोनिका गुप्ता व खुशी सिंह व अनुज के नृत्य ने लोगों का मन मोह लिया। मंच संचालन ओमप्रकाश ने किया। प्रतिमा सिंह, पूजा सिंह, इंदु सिंह, किरण सिंह, रीता सिंह, मीनू सिंह, पूनम सिंह,ममता सिंह, दिव्या सिंह, प्रिया सिंह, सुनीता सिंह, आदि पदाधिकारियों ने विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी की।
अक्षरों में जिनके आग है….अदम गोंडवी
हिंदुस्तान में ग़ज़ल तवायफ की कोठे की सीढ़ियां उतर कर दूसरे तमाम रास्ते तलाशने लगी थी। लोग नई-नई रवायतें गढ़ने में लगे हुए थे और इन्हीं नई रवायतों में एक रवायत दुष्यंत कुमार की भी थी। इसी वक़्त दुष्यंत कुमार ने ग़ज़लों को आम आदमी की उस जुबान में लिखना शुरू किया जिसे वह जानता और समझता था।
उन्होंने अपनी ग़ज़ल के हवाले से सियासत, जम्हूरियत और हुकूमती इन्तेजामात की खामियों पर बुनियादी चोट करनी शुरू की और जिसे आगे चलकर अवामी शायर अदम गोंडवी साहब ने बखूबी आगे बढ़ाया। उन्होंने हिंदी ग़ज़ल को सिर्फ नई बुलंदियां ही नहीं दीं बल्कि उन तमाम लोगों को भी अपनी ग़ज़ल में जगह दी जो कहीं न कहीं हाशिए पर धकेले हुए थे, और जिनकी बातें उस वक्त शायरी में बहुत कम लोग कर रहे थे।
अदम गोंडवी ने अपनी ग़ज़लों में भूख, गरीबी और मजलूमों के दर्द को जोड़ा जिन्हें कोई नहीं पूछता था इसलिए अगर सही मायने में देखा जाए तो उनकी ग़ज़लें समाज में सबसे पीछे खड़े लोगों की आवाजें हैं, और इसी बात को वह अपनी ग़ज़ल के हवाले से कुछ इस तरह बयां करते हैं,
भूख के एहसास को शेरो-सुख़न तक ले चलो
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो
जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ हो गई
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो
मुझको नज़्म-ओ-ज़ब्त की तालीम देना बाद में
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो
गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है
तिश्नगी को वोदका के आचरन तक ले चलो
ख़ुद को जख्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग
इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो
अदम गोंडवी का असली नाम रामनाथ सिंह था। उनकी पैदाइश 22 अक्टूबर 1947 को गांव आटा परसपुर, जिला गोंडा, उत्तर प्रदेश में एक गरीब किसान घर में हुई। उनका बचपन मुफलिसी में बीता और इसी वजह से वो बहुत ज्यादा तालीम हासिल नहीं कर पाए। उन्होंने महज प्राइमरी तक ही तालीम हासिल की और फिर पढ़ाई छोड़कर खेती किसानी में रम गए। अगर हम उनके अदबी मिजाज पर रोशनी डालें तो आजादी के बाद समाज में दम भरते दोहरे रवैये, सियासतदानों-अफसरानों के दोगलेपन और सामंती जुल्मों पर उन्होंने अपनी कलम जिस बेबाकी के साथ चलाई है वो निहायत ही काबिल-ए-तारीफ है, और ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।
अदम गोंडवी साहब की शायरी का लहजा इंकलाब-जिंदाबाद से कहीं आगे निकलता हुआ दिखाई देता है। उनके लहजे में एक बगावती तेवर एकदम साफ नजर आता है. हिंदी गजल में दुष्यंत कुमार की रवायत को आगे बढ़ाने का काम अगर सही मायने में किसी ने किया है तो वो अदम गोंडवी ही हैं. कह सकते हैं कि अदम गोंडवी की ग़ज़लें सीधे-सीधे आग बरसाती हैं।
अगर दुष्यंत ने इमरजेंसी के दौरान सरकार के लिए इंदिरा गांधी की निरंकुशता को एक गुड़िया की सौ कठपुतलियों की सौ कठपुतलियों की जान है, कह कर आड़े हाथों लिया. अदम ने भी लिखा,
काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
कितना असर है खादी के उजले लिबास में
एक बार का वाकया है, एक कार्यक्रम के सिलसिले में उन्हें बुलाना था. मैंने उनसे संपर्क किया और वो फौरन राजी भी हो गए. फिर मैंने डरते-डराते उनसे पूछा, “कार्यक्रम में आने की आपकी कोई फीस?” हालांकि मैं अपने फीस वाले सवाल को लेकर थोड़ा फिक्रमंद जरूर था. मैं उनकी माली हालत से बखूबी वाकिफ था मगर मैं उनके इस जवाब के लिए तैयार नहीं था.
अदम गोंडवी साहब मेरी बात सुनकर कुछ सेकेंड के लिए खामोश हो गए और फिर यकायक बोले, ‘मज़लूमों को उनका हक दिला सकते हो? समाज में फैली गैर बराबरी को ख़त्म कर सकते हो? नहीं कर सकते हो आदरणीय. और आदरणीय मेरी शायरी का यही मेहनताना है. खैर, अगर शरीर ने साथ दिया तो जरूर हाजिर हो जाऊंगा’.
हालांकि बदकिस्मती से उनकी तबियत नासाज होने की वजह से उनका आना नहीं हो पाया। इस बात से एक बात की तसदीक जरूर होती है कि वो अपनी शायरी को लेकर बेहद संजीदा थे। वो इसे एक व्यवसाय के मानिंद नहीं बल्कि समाज में इसके एक सकारात्मक असर के हवाले से देखते थे।
उनके जानने वाले बताते हैं कि जब वो किसी से नाराज होते थे तो सिर्फ इतना ही कहते थे, आदरणीय आप बहुत असामाजिक हो रहे हैं। अदम गोंडवी साहब जब-जब अपनी नरम आवाज में अपने बगावती अशआर कहते थे तो ऐसा महसूस होता था कि उनके अशआर लफ्जों से नहीं बल्कि सैकड़ों आइनों से मिलकर बने हों और हर एक आईना समाज में फैली तमाम बुराइयों और जुल्मों की दास्तानें चीख चीखकर बयां कर रहा हो। वह एक ऐसे शायर थें जिन्होंने अपनी ताकत से कहीं आगे जाकर समाज के दबे कुचले लोगों की आवाज़ों का परचम अपनी शायरी के हवाले से बुलंद किया।
अगर उनका बस चलता तो वह मुल्क की बीमारू और लचर व्यव्यथा को तोड़कर जमींदोज कर देते मगर उनके कमजोर माली हालात ने उन्हें सिर्फ शायरी तक ही सीमित रक्खा।हालांकि उन्होंने जो किया है वो अवामी शायरी और हिंदी ग़ज़ल में एक मील का पत्थर जरूर साबित होती है। वह लिखते हैं,
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है
सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर एहसास हो कैसे
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है
उनकी शायरी ने मजलूमों और हाशिए पर धकेले गए उन तमाम लोगों को वो आवाज दी और जिसका इस्तेमाल वो अपने हकूक पाने के लिए और अपनी आवाज गूंगी-बहरी हुकूमतों के कानों तक पहुंचाने के लिए कर सकें। उन्हें बस एक ही बात का अफसोस रहा कि वह समाज में कोई तबदीली नहीं ला सके मगर जो लोग तबदीली के बारे में सोचते हैं या फिर करने की ख्वाहिश रखते हैं उन्हें उनके अशआरों से हौसला यकीनन हासिल होता रहा है और कहीं हद तक ये बात आज नजर भी आती है। उनकी शायरी मुल्क के नवजवानों को हुकूमतों से लड़ने और उन्हें आईना दिखाने की प्रेरणा देती है, उनका हौसला बढ़ाती है।
अदम गोंडवी साहब बहुत ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन अपनी शायरी में उन्होंने जिस लहजे का इस्तेमाल किया है वह उनके अव्वल दर्जे की जहनी सोच और प्रगतिशीलता को सामने लाता है। उनके अशआरों की गहराई दांतों तले अंगुली दबाने पर मजबूर करती है और इसकी एक बानगी पेश-ए-खिदमत है,
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है
तुम्हारी मेज चाँदी की तुम्हारी ज़ाम सोने के
यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है
दरअसल अदब से उनका लगाव बचपन में ही हो गया था और तभी से उनकी दिलचस्पी शेर-ओ-शायरी की तरफ बढ़ने लगी थी और इसी वजह से वे आसपास के मुशायरों एवं कवि सम्मेलनों में जाने लगे थे। अस्सी का दशक आते-आते वे अदब और शेर-ओ-सुखन की दुनिया में एक जाना पहचाना चेहरा बनकर उभरने लगे थे। धीरे-धीरे उनकी शायरी लोगों के दिल-ओ-दिमाग में उतरने लगी थी और हो भी क्यों न, वो लोगों की बात कर रहे थे।
अदम गोंडवी साहब का आखिरी वक्त बहुत अच्छा नहीं गुजरा। पेट की गंभीर बीमारी की वजह से उन्हें दो-तीन महीने अस्पताल में रहना पड़ा. उहोंने अपनी आखिरी सांस 18 दिसम्बर 2011 को लखनऊ स्थित संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में ली. जिसके बाद वे ऐसी खाली जगह छोड़ गए जिसे भरना शायद मुमकिन न होगा।
उनके दो कविता संग्रह (धरती की सतह पर) तथा (समय से मुठभेड़) प्रकाशित हुए और जो आज भी बेहद पसंद किये जाते हैं. उनकी तमाम मशहूर कविताओं-ग़ज़लों में से एक, “आइये महसूस करिये जिंदगी के ताप को, मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको” बेहद चर्चित हुई” लेकिन सांप्रदायिक उन्माद पर लिखे उनके इस शेर के साथ उनके जन्म दिवस पर उन्हें याद करते हुए हम सब उन्हें नमन करते हैं, “गर गलतियां बाबर की थीं, जुम्मन का घर फिर क्यों जले।”
(साभार – फर्स्ट पोस्ट पर प्रकाशित आशीष मिश्रा का आलेख)
‘और आपने दो गज जमीं तक न छोड़ी इन्कलाबी शायर के लिए’
सुषमा त्रिपाठी
एक शायर जिसने हिन्दी में गजल को आवाज दी, एक शख्सियत जो इन्कलाब की आवाज बनी, एक कवि जो पूरे शहर की पहचान बन गया…वही शहर इतना बेरहम निकला कि तरक्की के नाम पर दो गज जमीन भी उससे छीन ली। खैर, सत्ता और सरकारें कब अदब का फर्क समझी हैं? परायी धरती पर हिन्दी के नाम पर विश्व सम्मेलन करने वाले और वहाँ हिन्दी का डंका बजाने वालों के पास हिन्दी के कवि और शायर के लिए इतनी सी जमीन भी नहीं है कि अब उसकी निशानी को बचाने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। जी मैं, दुष्यन्त कुमार की बात कर रही हूँ….उनका घर ढहाया गया..इस बात की खबर थी….फिर भी एक उम्मीद जगी थी..शायद कुछ बचा लिया गया हो…मगर घर की जगह सिर्फ धूल दिखी। सवाल तो मेरा यह है कि क्या दुष्यन्त कुमार सिर्फ मध्य प्रदेश या भोपाल के हैं? वह तो सारी हिन्दी के हैं, वह सारे हिन्दुस्तान के हैं…फिर इतनी खामोशी क्यों रही?

जो निशानियाँ पूरे एक मकान में थीं….वे दो कमरों में सिमटी पड़ी हैं और उनको अब भी इन्तजार है कि कब एक बड़ी सी छत मिले…कि इन निशानियों को सलीके से रखा जाए!भोपाल इन दिनों स्मार्ट सिटी का शिकार हो रहा है। इमारतें गिर रही हैं। शहर में जहाँ देखिए धूल ही उड़ रही है। माना कि तरक्की जरूरी है मगर क्या स्मार्ट सिटी की दुनिया में एक घर के लिए दो गज जमीन भी नहीं दी जा सकती थी? आखिर हिन्दीभाषी प्रदेशों की संस्कृति साहित्यकारों को वह सम्मान क्यों नहीं देती, जिसके वे हकदार हैं…क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि कोलकाता में कविगुरु रवीन्द्रनाथ की धरोहर को कोई सरकार छूने की भी हिम्मत कर सके? ये किसकी गलती है कि हम धर्मस्थलों के गिरने पर ईंट से ईंट बजा सकते हैं मगर हमारे अहसासों को जुबान देने वाले साहित्यकारों के लिए हमारी संवेदना ही मर गयी है।

आखिर क्यों साहित्यकार….आम जनता की धड़कन में नहीं बस पा रहा है? वह क्यों मीडिया और साहित्यकारों के एक वर्ग तक सीमित है? हद तो तब हो गयी जब दुष्यन्त कुमार के बारे में पूछने पर गुलशन कुमार समझते हैं….मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर किस तरह से प्रतिक्रिया दूँ। ये सही है कि मीडिया और साहित्यकारों के शोर ने संग्रहालय के लिए थोड़ी जगह फिलहाल बचा ली है मगर जो मूल जगह थी…जहाँ दुष्यन्त ने ‘साये में धूप’ जैसी कृति दी…जिस आँगन में अपनी पूरी संवेदना के साथ बिजनौर से लाकर आम का पेड़ लगाया…वो आँगन तो ढह गया….संग्रहालय कहीं भी बन सकता है मगर जिस घर को दुष्यन्त ने खुद खड़ा किया…क्या वह घर हमें दूसरी बार मिलेगा?

घर की जगह सपाट धूल उड़ाती जमीन आपका स्वागत करती है और एक कोने में अन्धेरे में जमीन पर पड़ा सँग्रहालय का बोर्ड धूल खा रहा है साहित्यकारों की विरासत, दुष्यन्त कुमार पाण्डुलिपि सँग्रहालय…..समझ में नहीं आ रहा था कि इस देखकर किस तरह की प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए..क्या हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार की धरोहर की नियति यह होनी चाहिए? ये हमारी चेतना का विषय है जिसे आप व्यावहारिक होकर नहीं समझ सकते।

हिन्दीवालों को खुद से सवाल करने की जरूरत है। जब से सुना था कि कवि का घर स्मार्ट सिटी के नाम पर ढहा दिया गया, पीड़ा, साथ ही दुःख और गुस्सा तीनों परेशान कर रहे थे। एक बार देखना चाहती थी कि वो जगह देखूँ जहाँ ये निशानियाँ बचाकर रखी गयी हैं। दुष्यन्त कुमार का यह सँग्रहालय भोपाल के शिवाजीनगर में स्थानान्तरित कर दिया गया है। भोपाल की वरिष्ठ पत्रकार सुमन त्रिपाठी के साथ पहुँचती हूँ दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय..जहाँ द्वार पर पहुँचते ही दुष्यन्त की कविता ‘बयान’ उनकी हस्तलिपि में हमारा स्वागत करती है एक सवाल के साथ –
‘कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये।’
हम अन्दर जाते हैं और हमारी मुलाकात होती है संग्रहालय के निदेशक राजुरकर राज से…संग्रहालय सिर्फ दुष्यन्त की विरासत ही नहीं सहेज रहा बल्कि यह संग्रहालय हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों की पूरी विरासत को सम्भाल रहा है। अन्दर जाते ही एक शोकेस में सजी ईंटों से हमारा सामना होता है। इस पर लिखा है ‘खण्डहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही। दुष्यन्त कुमार के उसी खण्डहर बना दिये गये घर (69/8 दक्षिण तात्या टोपे नगर) से निकाले गये ईंटों के टुकड़े ’ इन ईंटों को वरिष्ठ पुराविद् डॉ. नारायण व्यास के सहयोग से संग्रहालय निदेशक राजुरकर राज ने संरक्षित किया है।’

यहाँ वह पत्र है जो दुष्यन्त ने महानायक अमिताभ बच्चन को लिखा तो यहीं पर 1827 में रची गयी श्रीमद्भागवत की पाण्डुलिपि भी है जिसे सँग्रहालय को पंडित ईशनारायाण जोशी ने उपलब्ध करवाया है। ढाई हजार वर्ष पुरानी श्रीगृहणावली है। यहाँ पर दुष्यन्त कुमार को मिला पदक, उनकी पासबुक है तो राजेश्वरी त्यागी के सौजन्य से प्राप्त ‘साये में धूप’ की पाण्डुलिपि भी संरक्षित है।

यहाँ पर आपको हरिवंश राय बच्चन, भीष्म साहनी, शरद जोशी, रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वरनाथ रेणु की हस्तलिपि मिलती है। महिमा मेहता के सौजन्य से प्राप्त नरेश मेहता का चश्मा, डॉ. अंजनी चौहान के सौजन्य से प्राप्त शरद जोशी का चश्मा है तो ड़ॉ. शिवमंगल सिंह सुमन के हस्ताक्षर भी हैं। सोहनलाल द्ववेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के हाथों के निशान हैं इस संग्रहालय में और हल्दीघाटी की मिट्टी भी है।

सामान इतना है कि रखने की जगह कम पड़ जा रही है। संग्रहालय के निदेशक चाहते हैं कि कम से कम इतनी जगह तो मिले कि धरोहर के साथ सृजनात्मक गतिविधियों को भी जारी रखा जाये। जगह मिली है मगर इतनी बड़ी जगह नहीं मिली है कि दुष्यन्त कुमार के साथ हिन्दी की इस दुर्लभ अनूठी विरासत को सहेज कर रखा जाये। राजुरकर राज कहते हैं, ‘संग्रहालय की तुलना में दुष्यन्त का घर कहीं अधिक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण था। उसे बचा लिया जाना चाहिए था। मकान को बचाकर भी स्मार्ट सिटी को विकसित किया जा सकता था।’ इसके पहले शरद जोशी के घर पर भी बुलडोजर चलाया गया। इस घर में ही दुष्यन्त कुमार ने ‘साये में धूप’ लिखी।

संग्रहालय को नोटिस मिली तो उसे खाली करना पड़ा। इस मकान में मध्य प्रदेश के राजभाषा विभाग में नौकरी करते हुए दुष्यन्त कुमार ने अपनी एक लम्बी उम्र गुजारी। ये घर बहुत खास था। गजलकार दुष्यन्त ने जवाहर चौक के अपने मकान में दो दशक पूर्व तक 15 वर्ष गुजारे। 31 दिसंबर 1975 तक उनके इस मकान में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, डॉ. कमलेश्वर और शरद जोशी जैसे साहित्य के हस्ताक्षरों की महफिल जमा करती थी। सम्पदा संचानालय ने मार्च 2017 में मकान और संग्रहालय को खाली करने का नोटिस जारी की थी। नोटिस मिलते ही दुष्यन्त कुमार के पुत्र आलोक कुमार त्यागी ने मकान तुरन्त ही खाली कर दिया, लेकिन उनकी धरोहर को पाण्डुलिपि संग्रहालय को वैकल्पिक स्थान या भवन नहीं मिलने के कारण खाली नहीं किया जा सका।

यह चेतने का समय है। यह जागने और धरोहरों को सहेजने का समय है। सरकारों से उम्मीद छोड़कर खुद पहल करने का समय है। विरोध के बाद शिवराज सामने आये और आश्वासन दिया कि एक बड़ी जगह मिलेगी मगर क्या हम सुनिश्चित हो सकते हैं कि इस तरह के हादसे किसी और शख्सियत की धरोहरों के साथ नहीं होंगे? कम से कम एक मुहिम तो ऐसी हो जहाँ एक मुकम्मल जगह मिले। इस विरासत के लिए, नहीं, हर विरासत के लिए। हिन्दीवालों आगे आओ, कहीं देर न हो जाये। सम्प्रति संग्रहालय देखकर यही कहने की इच्छा होती है, बकौल एक कवि –
‘उनकी आँखों का मर गया पानी
मेरी आँखों में भर गया पानी।’
(यह आलेख सलाम दुनिया में प्रकाशित हुआ है)
कवि निराला की कविता को सुर दे रहा एक युवा का संगीत
जिन मुद्दों पर बड़े-बड़े महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के क्लासरूम में आज बहस छिड़ती है, उन्हीं मुद्दों को आज से न जाने कितने दशक पहले ही निराला ने समाज के सामने रख दिया था। पर आज की युवा पीढ़ी में विरले ही रह गए हैं, जिन्होंने निराला को पढ़ा है। इन्हीं विरलों में शामिल है एक हरप्रीत सिंह, जो अपने संगीत के माध्यम से निराला और उनके जैसे कवियों से आज के लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। हरप्रीत इन कवियों की कविताओं को खुद संगीतबद्ध करते हैं और फिर उन्हें गाते भी हैं। हरप्रीत हिंदी की इन बेहतरीन कविताओं के लिए आज वही कर रहें हैं जो कभी जगजीत सिंह ने उर्दू शायरी के लिए किया था।
साल 2015 में आई दिबाकर बनर्जी की फिल्म ‘तितली’ का प्रमोशनल गाना ‘कुत्ते’ में अपनी आवाज देने वाले हरप्रीत की ज़िन्दगी भी संघर्षों में बीती है। कम उम्र में ही अपने पिता को खोना और उसके बाद आय का कोई स्थिर साधन नहीं था, हरप्रीत ने बहुत सी मुश्किलों और चुनौतियों का सामना किया लेकिन उन्हें सफलता मिली निराला की प्रसिद्द कविता ‘बादल राग’ के दम पर। गायिकी का जूनून रखने वाले हरप्रीत बताते हैं,“मैंने कभी भी इन कविताओं को नहीं पढ़ा था, यहां तक कि स्कूल में भी नहीं। मेरी एक दोस्त चाहती थी कि मैं सावन के बारे में कुछ लिखूं और गाऊं। जब मैं कुछ सोच नहीं पाया तो उसने मुझे कुछ कविताएँ पढ़ने के लिए दी। निराला की ‘बादल राग’ उनमें से एक थी। जब मैंने इसे पढ़ा, तो मुझे लगा जैसे किसी ने भी इस सुंदर मौसम पर इससे बेहतर कुछ भी नहीं लिखा है। मैंने पूरा दिन बस यही कविता पढ़ी। आखिरकार, जब मैंने अपना गिटार उठाया, तो अपने आप संगीत बन गया।”बस यहीं से शुरू हुआ, ऐसे कवियों की कविताओं को संगीतबद्ध करने का सिलसिला।
(साभार – द बेटर इंडिया से संशोधित अंश)
ये 5 स्टार्टअप्स देश को सुरक्षित बनाने के लिए कर रहे सेना की मदद
डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज (डीआईएससी) के तहत रक्षा मंत्री ने स्टार्टअप शुरू करने वाले उद्यमियों के सामने भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों की जरुरतों के हिसाब से 11 तकनीकी चुनौतियों को रखा था। इन चुनौतियों में ज्यादातर ऐसी थीं, जो सुरक्षा बलों से जुड़ी हैं। इसमें क्षमता के हिसाब से प्रोटोटाइप तैयार करने वालों को 1.5 करोड़ रुपये तक का अनुदान देने की घोषणा भी की गई थी।
दो महीने से भी अधिक बीत रहे हैं जब देश की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय स्टार्टअप जगत को देश की सुरक्षा में योगदान करने का मौका दिया था। डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज (डीआईएससी) के तहत रक्षा मंत्री ने स्टार्टअप शुरू करने वाले उद्यमियों के सामने भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों की जरुरतों के हिसाब से 11 तकनीकी चुनौतियों को रखा था। इन चुनौतियों में ज्यादातर ऐसी थीं, जो सुरक्षा बलों से जुड़ी हैं। इसमें क्षमता के हिसाब से प्रोटोटाइप तैयार करने वालों को 1.5 करोड़ रुपये तक का अनुदान देने की घोषणा भी की गई थी। रक्षा मंत्री ने इन सभी स्टार्टअप को लेजर वेपनरी, अनमैन्ड सरफेस, अंडरवॉटर वीइकल, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और लॉजिस्टिक जैसी समस्याओं का समाधान करने के सुझाव दिए थे। इस स्कीम की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सिलेंस (iDEX) पहल के तहत इसी साल अप्रैल में की गई थी। हालांकि पहले से ही कई स्टार्टअप रक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं और अपने अनोखे उत्पादों से सेना का काम आसान कर रहे हैं। हम आपको उन्हीं स्टार्टअप से रूबरू कराने जा रहे हैं।
टोन्बो इमेजिंग (Tonbo Imaging)
युद्ध के मैदान में धूल, धुआं, धुंध, छिद्र और यहां तक कि अंधेरा भी दृष्टि को बाधित कर देता है, जिस वजह से सैनिकों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। बेंगलुरु की कंपनी टोन्बो इमेजिंग ऐसे सेंसर विकसित करती है जो ऐसे माहौल में भी साफ दिखने वाले उपकरण में इस्तेमाल की जा सके। इस कम्पनी की शुरुआत 2003 में अरविंद लक्ष्मीकुमार और अंकित कुमार ने की थी। यह स्टार्टअप सरनोफ कॉर्पोरेशन और स्टैनफोर्ड रिसर्च इंटरनेशनल की सहायक कंपनी के रूप में काम कर रहा है।
टोन्बो इमेजिंग माइक्रो ऑप्टिक्स, लोवर पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और रियल टाइम विजन की मदद से कम रोशनी या धुंध में दृष्टि को साफ बनाती है। इसके लिए मिड वेव आईआर और लॉन्ग वेव आईआर स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करती है। कंपनी ने अब तक 2.3 करोड़ डॉलर की फंडिंग जुटाई है। इसमें आर्टिमैन वेंचर्स, वाल्डेन रिवरवुज वेंचर और क्वॉलकॉम वेंचर जैसे इन्वेस्टर्स शामिल हैं।
आइडिया फोर्ज (Idea Forge)
मुम्बई : स्थित इस स्टार्टअप ने भारत का पहला स्वायत्त माइक्रो यूएवी (मानव रहित एरियल विमान) विकसित किया। 2007 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) बॉम्बे के पूर्व छात्रों अंकित मेहता, राहुल सिंह और आशीष भट्ट द्वारा स्थापित, कंपनी के यूएवी का उपयोग निगरानी, इमेजरी और अन्य औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है। कंपनी ने अब तक इंफोसिस, इंडसएज पार्टनर्स और वाल्डन रिवरवुड वेंचर्स से एक करोड़ डॉलर की कुल राशि निवेश के रूप में प्राप्त की है।
विजएक्सपर्ट्स (VizExperts)
नई दिल्ली स्थित इस स्टार्टअप की शुरुआत डेटा को फैसले लेने में उपयोग में लाने वाली सोच के साथ विकसित किया गया था। इसकी स्थापना IIT-BHU के पूर्व छात्र प्रवीण भानिरम्का द्वारा 2006 में की गई थी। यह एक इंटेलिजेंस कंपनी के रूप में शुरू हुई थी। कंपनी द्वारा विकसित भूस्थानिक प्लेटफॉर्म GEORBIS सेना को वास्तविक समय में ऑपरेशन प्लानिंग से जुड़ी जानकारियां प्रदान करता है ताकि उचित समय पर सही फैसले लिए जा सकें। विज एक्सपर्स्ट्स ने 2008 में रिसर्च एवं डेवलपमेंट विभाग में एक लाख डॉलर खर्च किए थे।
एक्सिओ बायोसॉल्युशन्स (Axio Biosolutions)
बेंगलुरु स्थित यह ट्रॉमा केयर और डिवाइस कंपनी सैन्य बल को मेडिकल सॉल्युशन उपलब्ध कराती है। इसकी स्थापना 2008 में लियो मावेली ने की थी। कंपनी द्वारा बनाया जाने वाला काइटोसान आधारित हेइमोस्टैटिक ड्रेसिंग उपलब्ध कराती है। इससे घाव से खून बहना बंद हो जाता है और वहां पर कोई इन्फेक्शन नहीं होता। कंपनी का दावा है कि गंभीर से गंभीर घाव से बहने वाले खून को यह प्रॉडक्ट पांच मिनट में रोक सकने की क्षमता रखता है। इस कंपनी ने भी एक्सेल पार्टनर, आईडीजी वेंचर्स इंडडिया और यूसी-आरएनटी फंड से एक करोड़ की फंडिंग मिल चुकी है।
क्रोन सिस्टम (CRON Systems)
हरियाणा स्थित यह स्टार्टअप देश की सीमाओं पर होने वाले अवैध घुसपैठ का पता लगाकर उसे सुरक्षित करने में योगदान देने वाला सिस्टम विकसित कर रहा है। इस स्टार्टअप की शुरुआत फरहीन अहमद, टॉमी, तुषार छाबड़ा और सौरव अग्रवाल द्वारा की गई थी। क्रोन सिस्टम फिलहाल सीमा सुरक्षा बल और भारतीय थल सेना को पूरा सहयोग प्रदान कर रहा है। शुरू में इस कंपनी ने केवी सीरीज तैयार की थी जो कि इन्फ्रारेड लेजर द्वारा संचालित है। इससे बॉर्डर पर होने वाली घुसपैठ का पता लगाया जा सकता है, फिर चाहे कैसा भी मौसम हो। कंपनी के मुताबिक इस सिस्टम को भारत-पाक सीमा पर लगाया भी जा चुका है। अभी फिलहाल कंपनी के लैब में स्वचालित ड्रोन और स्मार्ट फेंसिंग पर काम चल रहा है। हालांकि इस बात की कोई रिपोर्ट नहीं है कि कंपनी को कितनी फंडिंग मिल चुकी है लेकिन कंपनी में योरनेस्ट एंजेल फंड, टेकस्टार और टेकस्टार एडीलेड एक्सेलेरेटर ने इसमें निवेश किया है।
(साभार योर स्टोरी)
भारतीय अमेरिकी महिला को मानव तस्करी से निपटने के लिए मिला पुरस्कार
ह्यूस्टन :अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने भारतीय मूल की अमेरिकी महिला को ह्यूस्टन में मानव तस्करी से लड़ने में उत्कृष्ट योगदान के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। ह्यूस्टन के मेयर सिलवेस्टर टर्नर की मानव तस्करी पर विशेष सलाहकर मीनल पटेल डेविस को गत सप्ताह व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम में मानव तस्करी से लड़ने के लिए राष्ट्रपति पदक प्रदान किया गया। इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मौजूद रहे।
पुरस्कार पाने के बाद डेविस ने कहा, ‘‘यह अविश्वसनीय है।’’ यह इस क्षेत्र में देश का सर्वोच्च सम्मान है।
उन्होंने कहा, ‘‘मेरे माता-पिता भारत से यहां आए थे। मैं अमेरिका में जन्म लेने वाली अपने परिवार की पहली सदस्य थी तो कई साल पहले मेयर कार्यालय से अब व्हाइट हाउस तक आना अविश्वसनीय है।’’
जुलाई 2015 में नियुक्त डेविस ने अमेरिका के चौथे सबसे बड़े शहर में नीतिगत स्तर पर और व्यवस्था में बदलाव लाकर मानव तस्करी से निपटने पर स्थानीय स्तर पर बड़ा योगदान दिया। डेविस ने कनेक्टिकट विश्वविद्यालय से एमबीए और न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की है।
महिलाओं के लिए तजिकिस्तान में शुरू हुआ जिंदगी शाइस्ता प्रोजेक्ट, घट गयी घरेलू हिंसा
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में हर तीन में से एक महिला उत्पीड़न का शिकार होती है। वहीं, घरेलू हिंसा के मामलों में तजिकिस्तान की महिलाओं की स्थिति सबसे खराब है। यहां 2014 तक 64% महिलाओं से रोजाना मारपीट होती थी। ऐसे में यहां ‘जिंदगी शाइस्ता’ प्रोजेक्ट शुरू किया गया। इसकी वजह से घरेलू हिंसा की दर घटकर 34% रह गई। वहीं, 59% महिलाओं को घर से बाहर जाकर काम करने की आजादी भी मिल गई।
क्या है जिंदगी शोइस्ता प्रोजेक्ट?
‘द गार्डियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, पांच इंटरनेशनल एनजीओ ने महिलाओं की दिक्कतों को देखते हुए 2014 में यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। इसके लिए यूके ने 24 अरब यूरो की फंडिंग की। सबसे पहले इस प्रोजेक्ट की शुरुआत ताजिकिस्तान में की गई। चार साल में सकारात्मक परिणाम मिलने के बाद यह प्रोजेक्ट अब 14 देशों में चलाया जा रहा है।
पाकिस्तान में स्कूल के प्ले टाइम में होती है काउंसलिंग
जिंदगी शोइस्ता प्रोजेक्ट की मैनेजर शहरीबोनु शोनासिमोवा मानती हैं कि ताजिकिस्तान के नतीजों को अच्छी शुरुआत माना जा सकता है। इसके तहत रवांडा में कपल्स की काउंसलिंग की जा रही है। पाकिस्तान में स्कूल के प्ले टाइम के दौरान महिलाओं और पुरुषों को समझाया जाता है। शहरीबोनु के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट के तहत अफगानिस्तान, उजबेकिस्तान, किर्गिस्तान और चीन में भी ताजिकिस्तान की तरह काम किया जा रहा है।
‘सम्मान से जीना सिखा गयी यह योजना’
ताजिकिस्तान के उत्तरी जिले पेंजीकेंत के गांव जोमी में रहने वाली रानो महमुरोदोवा (42) की जिंदगी में भी ‘जिंदगी शाइस्ता’ प्रोजेक्ट बदलाव लाया। 18 साल की उम्र में रानो का निकाह हुआ था। करीब 22 साल तक उन्होंने अपने पति के दुर्व्यवहार का सामना किया। नशे का आदी होने के बाद उनके पति ने नौकरी छोड़ दी थी और वे हर वक्त रानो के साथ गाली-गलौज और मारपीट करता था। जोमी गांव का सर्वे किया गया तो घरेलू हिंसा का आंकड़ा 60% पाया गया।
रानो बताती हैं कि लगातार काउंसलिंग के बाद उनके पति के व्यवहार में सुधार आया और वे दोबारा नौकरी करने लगा। उसने रानो से कहा, ‘‘मुझे पता ही नहीं लगा कि मेरे साथ रहना कितना मुश्किल था। तुम्हें 22 साल तक दिए कष्ट के लिए मुझे माफ कर दो।’’ रोमी का कहना है कि जिंदगी शाइस्ता का मतलब गरिमा से जीना होता है। यह प्रोजेक्ट मेरे साथ-साथ देश की हजारों महिलाओं के जीवन में बदलाव ले आया।




