नयी दिल्ली : करोड़ों भारतीय प्रशंसक टीम इंडिया के युवा खिलाड़ी पृथ्वी शॉ के स्कूल लेवल पर खेली गई 546 रन की पारी को आज तक नहीं भूले हैं। इसी बीच एक नए बल्लेबाज ने शॉ की 546 रन की पारी को पीछे छोड़ते हुए नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। 14 साल के प्रियांशु मोलिया ने हाल ही में डीके गायकवाड़ अंडर-14 क्रिकेट टूर्नामेंट में धमाकेदार प्रदर्शन कर 556 रनों की पारी खेलते हुए सुर्खियां बटोरी। मोहिंदर लाला अमरनाथ क्रिकेट एकेडमी ने प्रियांशु की इस पारी से योगी क्रिकेट एकेडमी को पारी और 690 रनों से रौंदा। मोहिंदर अमरनाथ के इस शिष्य ने 319 गेंदों का सामना कर 98 चौकों और 1 छक्के की मदद से नाबाद 556 रनों की पारी खेली। योगी क्रिकेट एकेडमी की पहली पारी को 52 रनों पर समेटने के बाद अमरनाथ क्रिकेट एकेडमी ने पहली पारी 4 विकेट पर 826 रन बनाकर घोषित की। इसके बाद योगी एकेडमी की दूसरी पारी 84 रनों पर ढेर हुई। प्रियांशु ने दोहरा प्रदर्शन करते हुए पहली पारी में 4 और दूसरी पारी में 2 विकेट लिए।
योगी क्रिकेट एकेडमी की पहली पारी को 52 रनों पर समेटने के बाद अमरनाथ क्रिकेट एकेडमी ने 4 विकेट पर 826 रन बनाकर पारी घोषित की। इसके बाद दूसरी पारी में योगी एकेडमी 84 रनों पर ढेर हो गई।
14 साल के प्रियांशु ने 98 चौके लगाकर ठोक डाले 556 रन
यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो कठिनाई को भी जीता जा सकता है
सादगी में भी सौन्दर्य है और सुर में अगर सादगी हो तो आवाज सीधे ईश्वर तक ले जाती है। इस आवाज में जब लोक जुड़ जाए तो वह और भी प्रभावशाली हो जाता हैं। सादगी और प्रभाव का ऐसा ही जादू है सुषमा ठाकुर की आवाज में। रिसड़ा की नया बस्ती की सुषमा ठाकुर ने संगीत को पढ़ा भी है और संगीत को जीया भी है। मधुर गायिका सुषमा ठाकुर हमने बात की, पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश –
पिता हैं संगीत के प्रथम गुरु
संगीत ज्ञान की शुरूआत घर से ही हुई। मेरे पिता राधाकृष्ण ठाकुर के रामचरित मानस के पाठ तथा मेरे चाचा जी राजेन्द्र जी ‘व्यास’ के भोजपुरी गायन का प्रभाव मेरे ऊपर पड़ा। मैं भी बचपन से ‘मानस पाठ’ तथा भजन गाने लगी। कुछ समय बाद काशीपुर के सर्वमंगला मंदिर में मेरे भजनों से प्रभावित होकर चित्रकूट के संत श्री श्यामसुंदर दास जी ने शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए प्रेरित किया। वहाँ की महिला समिति की अध्यक्ष कमला देवी की पुत्री गुड़िया दीदी से मुझे सरगम का ज्ञान मिला। तत्पश्चात मैंने घर पर ही मेरे संगीत शिक्षक अनिक दास तथा सपन चौधुरी से ख्याल तथा भजन सीखा। इसके बाद मैंने स्नातक में एक चयनित विषय (इलेक्टिव सब्जेक्ट) के रूप में बंगाल म्यूजिक कॉलेज से संगीत का ज्ञान प्राप्त किया। इस पूरे क्रम में मुझे मेरे पिता जी का विशेष सहयोग मिला।
आलोचना भी सुनी है और प्रोत्साहन भी मिला
प्रारम्भ में स्वयं मेरे पिताजी ने ही मुझे संगीत के लिए प्रेरित किया। फिर, संतों तथा श्रोताओं से प्रेरणा मिलती रही। माहौल अच्छा था पर कुछ लोगों की कटु बातें भी सामने आयीं – ‘लड़की को मंच पर चढ़ाते हैं’ और ‘लड़की को व्यास पीठ पर बैठाते हैं’ – जैसे आलोचना भरे शब्द भी सुनने पड़े। इन बातों के बावजूद मुझे अधिकांश लोगों का प्रोत्साहन मिला।
कई बार लोकगीतों का मजाक भी उड़ाते हैं लोग
लोकगीतों से मेरा कोई विशेष जुड़ाव नहीं रहा, फिर भी मैं यह महसूस करती हूँ कि नयी पीढ़ी का झुकाव पाश्चात्य संगीत की ओर अधिक है। कई बार लोग लोगीत का मजाक भी उड़ाते हैं।
विद्यालय बना सकते हैं लोकगीतों को लोकप्रिय
लोकगीत की उपेक्षा का प्रमुख कारण पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति की ओर झुकाव है। इस विषय में जागरूरकता लाने की जरूरत है और विद्यालय इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आज कठिन प्रतियोगिता है
आज कठिन प्रतियोगिता का दौर है पर नए – नए प्रयास भी किए जा रहे हैं। सहयोग के हाथ भी बढ़ रहे हैं। यदि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो कठिनाई को भी जीता जा सकता है।
संगीत ईश्वर की शक्ति है
संगीत ईश्वर की शक्ति है। सकारात्मक सोच के साथ इसे जीवनोपयोगी बनाए रखना है।
भारत में अगले एक दशक में 10 करोड़ रोजगार के अवसर पैदा करने की जरूरत: रिपोर्ट
नयी दिल्ली : भारत को अगले एक दशक में जनसंख्या में युवा आबादी की वृद्धि को ध्यान में रखते हुये रोजगार के 10 करोड़ अवसर पैदा करने की जरूरत होगी। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रोजगार में वृद्धि होने से देश में आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं में तेजी लाई जा सकती है और इसे अधिक समावेशी बनाया जा सकता है। पीडब्ल्यूसी की रिपोर्ट, ‘नागरिक: बड़ पैमाने पर रोजगार सृजन के जरिये समावेशी वृद्धि’ में अगले दशक में देश मे रोजगार बढ़ाने के व्यावहारिक तरीके का उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि किस तरीके से छोटे जिलों में देश के स्थानीय संसाधनों को बाजार से जोड़ने से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘अगले दशक में हमें आस्ट्रेलिया की आबादी जितने पांच गुणा रोजगार के अवसरों का सृजन करना होगा। यह देश के सामने सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा है। यदि इससे सोच विचार तथा ऊर्जावान तरीके से निपटा जाता है, तो हमारी वृद्धि बढ़ेगी जिससे इसे अधिक समावेशी बनाया जा सकेगा।’’
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को अपनी श्रमबल भागीदारी दर (एलएफपीआर) को बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए कार्यशील आबादी विशेष रूप से महिलाओं को अधिक अवसर उपलब्ध कराने पड़ेंगे।
अब करवाइए शादियों का बीमा, लीजिए वेडिंग पॉलिसी
नयी दिल्ली : बदलते दौर के साथ शादी समारोह की साज-सज्जा, भव्यता और खर्च का बजट तेजी से बढ़ा है। इन दिनों एक शादी समारोह की लागत 10 लाख रुपये से 2 करोड़ तक पहुच रही है। ऐसे में शादी समारोह की सुरक्षित करना जरूरी हो गया है। आप इसको बहुत ही कम खर्च में कर सकते हैं। आज के समय में ज्यादातर बीमा कंपनियां वेडिंग इंश्योरेंस मुहैया करा रही हैं। इस बीमा पॉलिसी को लेकर आप शादी समारोह के दौरान किसी आकस्मिक घटना से होने वाले नुकसान से सुरक्षित कर सकते हैं। आइए जानते हैं इस इंश्योरेंस पॉलिसी के बारे में।
क्यों जरूरी है शादी का बीमा
भारत में शादी समारोह में जमकर पैसा खर्च किया जाता है। दूल्हे-दुल्हन के महंगे कपड़ों से लेकर जेवरों का भी लाखों का बजट होता है। इसके अलावा कार्ड छपने, समारोह स्थल की बुकिंग, हलवाई, डेकोरेटर और ट्रैवल बुकिंग आदि पर भी भारी भरकम रकम खर्च होता है। अगर शादी समारोह में कोई अप्रिय घटना घट जाती है तो वेडिंग इश्योरेंस होने पर इसका मुआवजा मिल जाता है। हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी राशि का बीमा कराया गया है। इसके अलावा अगर किसी कारणवश आपकी शादी की डेट बढ़ गई है या रद्द हो गई है, तो इसका दावा भी आप कर सकते हैं।
कुल खर्च का सिर्फ एक फीसदी प्रीमियम
शादी समारोह को सुरक्षित बनाने के लिए आप बहुत ही मामूली खर्च पर वेडिंग इंश्योरेंस ले सकते हैं। बीमा विशेषज्ञों के मुताबिक कुल खर्च का कवर पर प्रीमियम 0.75 फीसदी से एक फीसदी तक ही बैठता है। अगर कोई 10 लाख रुपये खर्च का कवर लेता है तो उसका प्रीमियम 8,000 रुपये से 15,000 रुपये के बीच आता है। आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, एचडीएफसी एर्गो, बजाज ऑलियांज जैसी कंपनियां वेडिंग इंश्योरेंस देती हैं।
इस तरह कर सकते हैं दावा
वेडिंग इंश्योरेंस लेने के बाद अगर शादी समारोह में कोई अप्रिय घटना घट जाती है तो आप बीमा कंपनी से क्लेम ले सकते हैं। हालांकि, इसके लिए आपको सभी बिल दिखाने होंगे। वहीं, ज्वैलरी चोरी हो जाती है तो एफआईआर दर्ज की कॉपी के साथ बिल दिखाने होंगे।
हर बिल को को सम्भालना जरूरी
वेडिंग इंश्योरेंस पॉलिसी लेने से पहले यह जानना जरूरी है कि आप समारोह से जुड़े सभी खर्चों का रिकॉर्ड व्यवस्थित तरीके से सहेज कर रखें। पॉलिसी लेते समय कंपनियां समारोह स्थल, कार्यक्रमों की सूची, दूल्हा और दुल्हन की जानकारी, करीबी रिश्तेदारों के परिचय आदि जैसी जानकारियां लेती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिल, इनवॉइस और बुकिंग रसीद जैसे खर्च के सबूत संभालकर रखने चाहिए। दावे के वक्त इनकी जरूरत पड़ती है।
यह कवर नहीं होता
शादी समारोह के बीच झगड़े से होने वाले नुकसान या शादी रद्द होने पर कवर नहीं मिलता है। इसके अलावा लापरवाही और आपराधिक छेड़छाड़ की घटनाओं से शादियां रद्द होने पर भी कवर नहीं मिलेगा।
पॉलिसी लेने की योग्यता
बीमा लेने वाले व्यक्ति की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और अधिकतम आयु 40 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। वह भारत का नागरिक हो।
बीमा पॉलिसी लेने से पहले इन बातों का रखें ख्याल
वेडिंग पॉलिसी में किस प्रकार का कवर मिलेगा इसको पता करें।
क्या पॉलिसी आपकी जरूरत को पूरा करने में सक्षम है।
सभी पॉलिसी देखें और उसके बाद जरूरत के मुताबिक बेहतर पॉलिसी चुनें।
प्राथमिक कवर में समारोह/वेडिंग रद्द होना शामिल होना चाहिए।
आग लगने और चोरी के लिए आप अलग से पॉलिसी भी ले सकते हैं।
आपके पास पहले से ज्वेलरी इंश्योरेंस है, तो वेडिंग इंश्योरेंस में इसे हटा दें।
अनुपम खेर ने एफटीआईआई के चेयरमैन पद से दिया इस्तीफा
नयी दिल्ली :अनुपम खेर ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया है। न्यूज एजेंसी एएनआई के ट्वीट के मुताबिक अनुपम खेर ने व्यस्तता का हवाला देते हुए यह फैसला लिया है। उन्होंने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा कि मैंने खुद का एक एक्टिंग स्कूल लॉन्च करने का फैसला किया है। इसलिए मैंने सोचा कि संस्थान के अध्यक्ष के रूप में बने रहना अनैतिक और अनुचित होगा। इसलिए मैंने नैतिक आधार पर अपना इस्तीफा दे दिया है। यदि उनके नए स्कूल की बात करें तो इसे 2 फरवरी को लॉन्च किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कूल अभिनय में तीन महीने का कोर्स करवाएगा। उन्होंने आगे यह भी बताया कि यहां तैराकी और घुड़सवारी जेसा शिक्षण नहीं मिलने वाला है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि इसमें अभिनय सीखने जैसा कुछ है। मैं सुनिश्चित करता हूं कि हमारे स्कूल का प्रयास होगा कि स्कूल अंतरराष्ट्रीय मानक की शिक्षा प्रदान करे। यहां पर आने वाले टीचर्स दुनिया भर के बेहतरीन शिक्षकों में से एक होंगे। सिजमें से भारतीय उद्योग के दिग्गजों को भी शामिल किया जाएगा।
राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को लिखे इस्तीफे में अनुपम खेर ने बताया है कि इस वजह से उन्हें 2018 से 2019 के दौरान 9 महीने अमेरिका में रहना पड़ेगा। ऐसे में वह इस्तीफा दे रहे हैं। इसके बाद अनुपम खेर ने यह जिम्मा संभाला था। पिछले दिनों अनुपम खेर ने अपनी आने वाली फिल्म ‘द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ की शूटिंग भी पूरी की है। यह फिल्म मनमोहन सिंह के मीडिया अडवाइजर संजय बारू की किताब पर आधारित है। फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद पूर्व पीएम मनमोहन सिंह पर अनुपम खेर के बयान ने काफी सुर्खियां बंटोरी थीं। खेर ने कहा था कि इतिहास कांग्रेस नेता को गलत नहीं समझेगा। बता दें कि अनुपम खेर ने अक्टूबर, 2017 को एफटीआईआई चेयरमैन का कार्यभार संभाला था। उनसे पहले गजेंद्र चौहान का कार्यकाल विवादित रहा था। अनुपम खेर ने अपने पत्र में लिखा है कि एक इंटरनैशनल टीवी शो के लिए उन्हें 6 महीने के लिए अमेरिका में रहना था। बाद में इस शो को 4 महीने का कार्यकाल विस्तार दे दिया गया।
राजनीति कीजिए मगर हमारे महापुरुषों को बख्श दीजिए
चुनाव नजदीक आ रहे हैं। कुछ ही दिनों में मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने जा रहे हैं। इनकी बात इसलिए क्योंकि ये दोनों बड़े राज्य हैं और यहाँ जो भी नतीजे निकलते हैं, उसका असर देश की राजनीति पर पड़ना तय है। चुनाव सामने आते ही आरोप – प्रत्यारोप की राजनीति भी शुरू हो रही है और यह अभी और तेज होगी क्योंकि अगले साल लोकसभा चुनाव होंगे। नतीजा यह है कि अब तक जो हमारे जननेता व राष्ट्रपुरुष हाशिये पर थे, अब उन पर पड़ी धूल को झाड़पोंछ कर खड़ा किया गया है। सच तो यह है कि कोई महापुरुष किसी प्रदेश या समुदाय विशेष का नहीं होता मगर हमारा दुर्भाग्य यह है कि सबसे ज्यादा राजनीति इनके नाम पर ही होती है, नये इतिहास गढ़े जा रहे हैं। होना यह चाहिए कि हम अपने महापुरुषों को समान रूप से सम्मान दें मगर हो यह रहा है कि राजनीतिक दलों की सियासी चालें इस भावना को दबा रही है। महात्मा गाँधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयन्ती एक ही दिन 2 अक्टूबर को पड़ती है। जब तक कांग्रेस की सरकार थी, कहीं न कहीं शास्त्री जी को एक कोने में डाला जाता रहा। ठीक उसी प्रकार, 31 अक्टूबर को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि और देश के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयन्ती एक दिन ही पड़ी। हर बार सरदार पटेल हर जगह नजर नहीं आते थे मगर इस बार शायद यह पहली बार हुआ कि इन्दिरा गाँधी हाशिये पर चली गयीं। ये दोनों ही स्थितियाँ सही नहीं हैं। राजनेता राजनीति करेंगे, ये उनका काम है मगर सवाल यह है कि हमारी जिम्मेदारी क्या है? आखिर ये सभी नेता हमारे अपने हैं, पार्टियाँ आएंगी और जायेंगी मगर जनता ही है जो हमेशा से रही है। एक असंतुलन की स्थिति हर जगह है…एक बेवजह की तुलना की जाती है और एक अनावश्यक शीत युद्ध लग जाता है। सवाल यह है कि सभी महापुरुषों को हम समान रूप से सम्मान नहीं दे सकते। यह सही है कि विचारधाराएँ अलग हो सकती हैं मगर उनका अलग होना उनकी खासियत है। भला किस बगीचे में एक ही रंग के फूल अच्छे लगते हैं? ये हमारी खुशनसीबी है कि हमारे देश में इतनी विविधता है, इतने रंग हैं…हम सभी रंगों को सम्मान क्यों नहीं कर सकते? यह सही है कि आप बहुत मेहनत करते हैं, अच्छा काम कर रहे हैं मगर इससे आपको यह अधिकार कैसे मिल जाता है कि आप दूसरों को कमतर मानकर हाशिये पर धकेलें…आप अपनी बात विनम्रता से समझा भी सकते हैं।
एक समय था जब धोनी की तूती बोलती थी। अपनी सफलता के दम पर उन्होंने कई वरिष्ठ क्रिकेटरों को टीम से बाहर करवाया था…मगर ये समय है..करवट बदलता है। आज धोनी खुद युवराज, सहवाग और हरभजन की स्थिति में हैं। आज विराट भी वही कर रहे हैं बल्कि एक तरीके से कहा जाए तो हास्यास्पद तरीके से अपनी मनमानी कर रहे हैं जो कि सही नहीं है। क्षेत्र कोई भी हो, अनुशासन और परस्पर सम्मान बहुत जरूरी है और जब यह देश के इतिहास, उसकी संस्कृति से जुड़ा मामला है तो यह और भी संवेदनशील मामला हो जाता है। पटेल के नाम पर राजनीति करने वाले, महापुरुषों को अपनी सम्पत्ति मानने वाले ये समझें न समझें…हमें इस साजिश को समझना होगा और इसे काटना भी होगा। गाँधी हों, भगत सिंह हों, शास्त्री जी हों, सरदार पटेल हों, पंडित नेहरू हों, नेताजी हों या फिर इंदिरा गाँधी हों…इन सबने अपने समय के अनुसार काम किया, वे फैसले लिए जो उस समय उनके हिसाब से जरूरी थे। आप असहमत हो सकते हैं मगर इनके बीच तुलना गलत है और कमतर मानना तो अपराध है..इस बात को समझने की जरूरत है।
ये हैं इंदिरा गांधी के वो फैसले, जिसने बदल दिया पूरा भारत
आज देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का जन्मदिन है। भारतीय राजनीति के इतिहास में इंदिरा गांधी को विशेष रूप से याद रखा जाता है। एक तेज तर्रार, त्वरित निर्णयाक क्षमता और लोकप्रियता ने इंदिरा गांधी को देश और दुनिया की सबसे ताकतवर नेताओं में शुमार कर दिया। इंदिरा को तीन कामों के लिए देश सदैव याद करता रहेगा। पहला बैंकों का राष्ट्रीयकरण, दूसरा राजा-रजवाड़ों के प्रिवीपर्स की समाप्ति और तीसरा पाकिस्तान को युद्ध में पराजित कर बांग्लादेश का उदय। आइए जरा नजर डालते हैं इन कामों के बारे में।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण : 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उस समय कांग्रेस में दो गुट थे इंडिकेट और सिंडिकेट। इंडिकेट की नेता इंदिरा गांधी थीं। सिंडिकेट के लीडर थे के.कामराज। इंदिरा गांधी पर सिंडिकेट का दबाव बढ़ रहा था। सिंडिकेट को निजी बैंकों के पूंजीतंत्र का प्रश्रय था। इंदिरा गांधी का कहना था कि बैंकों के राष्ट्रीयकरण की बदौलत ही देश भर में बैंक क्रेडिट दी जा सकेगी। उस वक्त मोरारजी देसाई वित्त मंत्री थे। वे इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर चुके थे। 19 जुलाई 1969 को एक अध्यादेश लाया गया और 14 बैंकों का स्वामित्व राज्य के हवाले कर दिया गया। उस वक्त इन बैंकों के पास देश का 70 प्रतिशत जमापूंजी थी।
राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की 40 प्रतिशत पूंजी को प्राइमरी सेक्टर जैसे कृषि और मध्यम एवं छोटे उद्योगों) में निवेश के लिए रखा गया था। देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक की शाखाएं खुल गईं। 1969 में 8261 शाखाएं थीं। 2000 तक 65521 शाखाएं हो गई। 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। हालांकि 2000 के बाद यह प्रक्रिया धीमी पड़ गई।
राजा-महाराजओं के प्रिवीपर्स की समाप्ति : 1967 के आम चुनावों में कई पूर्व राजे-रजवाड़ों ने सी.राजगोपालाचारी के नेतृत्व में स्वतंत्र पार्टी का गठन लिया था। इनमें से कई कांग्रेस के बागी उम्मीदवार भी थे। इसकी के चलते इंदिरा गांधी ने प्रिवीपर्स खत्म करने का संकल्प ले लिया। 23 जून 1967 को ऑल इंडिया कांग्रेस ने प्रिवीपर्स की समाप्ति का प्रस्ताव पारित कर दिया। 1970 में संविधान में चौबीसवां संशोधन किया गया और लोकसभा में 332-154 वोट से पारित करवा लिया। हालांकि राज्य सभा में यह प्रस्ताव 149-75 से पराजित हो गया। राज्यसभा में हारने के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति वीवी गिरी से सारे राजे-महाराजाओं की मान्यता समाप्त करने को कहा।

मान्यता समाप्ति के इस अध्यादेश को ननीभाई पालखीवाला ने सुप्रीमकोर्ट में सफलतापूर्वक चुनौती भी दी गई। इस बीच 1971 के चुनाव हो गए और इंदिरा गांधी को जबर्दस्त सफलता मिली। उन्होंने संविधान में संशोधन कराया और प्रिवीपर्स की समाप्ति कर दी। इस तरह राजे-महाराजों के सारे अधिकार और सहूलियतें वापस ले ली गईं।
हर राजा-महाराजा को अपनी रियासत का भारत में एकीकरण करने के एवज में उनके सालाना राजस्व की 8.5 प्रतिशत राशि भारत सरकार द्वारा हर साल देना बांध दिया गया था। यह समझौता सरदार पटेल द्वारा देसी रियासतों के एकीकरण के समय हुआ था। इस निर्णय के बाद सारे राजे-महाराजे इंदिरा गांधी के खिलाफ हो गए। इंदिरा गांधी ने संसद में कहा कि एक समतावादी समाज की स्थापना के लिए प्रिवीपर्स और विशेष दर्जा जैसे प्रावधान बाधक थे। इस निर्णय से देश में सामंतवादी प्रवृत्तियों के शमन में मदद मिली और लोकतंत्र मजबूत हुआ
बांग्लादेश का उदय : आजादी के पहले अंग्रेज बंगाल का धार्मिक विभाजन कर गए थे। हिंदू बंगालियों के लिए पश्चिम बंगाल और मुस्लिम बंगालियों के लिए पूर्वी पाकिस्तान बना दिए गए थे। पूर्वी पाकिस्तान की जनता पाकिस्तान की सेना के शासन में घुटन महसूस कर रही थी। उनके पास नागरिक अधिकार नहीं थे। शेख मुजीबुर रहमान की अगुआई में मुक्ति वाहिनी ने पाकिस्तान की सेना से गृहयुद्ध शुरू कर दिया। नतीजतन भारत के असम में करीब 10 लाख बांगला शरणार्थी पहुंच गए, जिनसे देश में आंतरिक और आर्थिक संकट पैदा हो गया।
बांग्ला देश के स्वाधीनता आंदोलन को रेडिकल मानता था और मुक्ति वाहिनी को संगठित करने के लिए उसने अपनी फौज भेजना शुरू कर दिया था। 1971 तक हमारी सेना वहां पहुंच गई। पश्चिमी पाकिस्तान के हुक्मरानों को यह लगने लगा था कि भारतीय सेना की मदद से पूर्वी पाकिस्तान में उनकी हार सुनिश्चित है।
भारतीय सेना द्वारा बांगलादेश में कार्रवाई करने से पहले ही पाकिस्तान की हवाई सेना ने भारतीय एयर बेस पर हमले शुरू कर दिए। भारत की सेना को हमलों की भनक लग चुकी थी। हमले भारतीय वायुसेना ने निष्फल कर दिए। इसी के साथ 1971 का दूसरा भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। पाकिस्तान कमजोर पड़ने लगा तो संयुक्त राष्ट्रसंघ में पहुंच गया और युद्ध विराम के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की।
7 दिसंबर को अमेरिका ने प्रस्ताव पारित करते हुए तुरंत युद्ध विराम लागू करने के लिए कहा जिस पर स्टालिन शासित रूस ने वीटो कर लिया। रूस का मानना था कि भारतीय सेना की यह कार्रवाई पाकिस्तान की सेना के दमन के खिलाफ थी। हिंदुस्तान की सेना ने मुक्तिवाहिनी के साथ मिलकर पाकिस्तान की 90,000 सैनिकों वाली सेना को परास्त कर दिया। 16 दिसंबर को भरातीय सेना ढाका पहुंच गई। पाकिस्तान की फौज को आत्मसमर्पण करना पड़ा।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद किसी भी देश की सेना का यह सबसे बड़ा आत्मसमर्पण था। विश्व के मानचित्र में एक नये देश बांग्लादेश का उदय हुआ, देर सवेर पाकिस्तान के सहयोगी अमेरिका और चीन ने भी बांग्लादेश को मान्यता दे दी।
आपातकाल ने किया बदलाव : इन तीन बड़े निर्णयों के कारण इंदिरा गांधी को आयरन लेडी कहा जाने लगा। बांगलादेश के उदय को इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन का उत्कर्ष कहा जा सकता है, वहीं 1975 में रायबरेली के चुनाव में गड़बड़ी के आरोप और जेपी द्वारा संपूर्ण क्रांति के नारे के अंतर्गत समूचे विपक्ष ने एकजुट होकर इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। इस पर इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया। आपातकाल में नागरिक अधिकार रद्द हो गए और प्रेस और मीडिया पर सेंसरशिप लागू हो गई। कई विपक्षी नेता जेल भेज दिए गए। संजय गांधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान और सत्ता पक्ष द्वारा दमन के कारण आपातकाल को इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन का निम्न बिंदु कहा जाने लगा।
दरअसल, 1971 में ही हाईकोर्ट ने रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी का निर्वाचन अवैध ठहरा दिया था। इस चुनाव में राजनारायण थोड़े ही मतों से हार गए थे। इंदिरा गांधी ने इस निर्णय को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी तो उन्हें स्टे मिल गया। वे प्रधानमंत्री के पद पर बनी रह सकतीं थी लेकिन सदन की कार्रवाई में भाग नहीं ले सकती थीं और न ही सदन में वोट दे सकती थीं। इन्ही परिस्थितियों के मद्देनजर इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगा दिया था। इसका जनता ने माकूल जवाब दिया। 1977 में इमरजेंसी हटा ली गई और आम चुनाव हुए जिसमें इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व हार हुई।
जनता पार्टी के नेतृत्व में चार घटक दलों के साथ मोरराजी देसाई प्रधानमंत्री बने। हालांकि दो साल ही जनता पार्टी में खींचतान शुरू हो गई। चरण सिंह 64 सांसदों को साथ जनता पार्टी से अलग हो गए। मोरारजी देसाई ने सदन में विश्वासमत का सामना करने से पहले् ही इस्तीफा दे दिय़ा।

चरणसिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। चरणसिंह भी सदन में विश्वास मत हासिल करते इसके पहले ही कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और राष्ट्रपति से नए चुनाव करने का अनुरोध किया । 1980 के चुनावों में कांग्रेस को जबर्दस्त जीत हासिल हुई और कांग्रेस सत्ता में लौटी। जाहिर है इंदिरा के शासनकाल में हुई ये ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाओं ने भारत में न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक परिवर्तन भी किए। आज भी देश और दुनिया इंदिरा गांधी को एक मजबूत नेता के रूप में जानती है।
(साभार – न्यूज 18 पर प्रकाशित अभय कुमार का आलेख)
इसलिए खास है 182 मीटर ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी
सरदार वल्लभ भाई पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ (Statue of Unity) का 31 अक्टूबर को उनकी जयंती पर अनावरण किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रतिमा का अनावरण किया। अपनी ऊँचाई के कारण यह प्रतिमा अब दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति बन गई है। दुनिया में अब दूसरे स्थान पर चीन में स्प्रिंग टेंपल में बुद्ध की मूर्ति है जिसकी ऊंचाई 153 मीटर है। गुजरात सरकार को उम्मीद है कि इस विशालकाय मूर्ति को देखने के लिए देश ही नहीं विदेशों के पर्यटक भी आएंगे। इस नाते सरकार की ओर से पर्यटकों के ठहने के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। सरकार आमदनी के लिए टिकट भी लगाएगी। यह प्रतिमा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मूर्ति बनाने वाली कंपनी एलएंडटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक एस एन सुब्रमण्यन ने कहा, “स्टैच्यू आफ यूनिटी जहां राष्ट्रीय गौरव और एकता की प्रतीक है वहीं यह भारत के इंजीनियरिंग कौशल तथा परियोजना प्रबंधन क्षमताओं का सम्मान भी है।” प्रतिमा की विशेषतायें यह रहीं –
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का कुल वजन 1700 टन है और ऊंचाई 522 फीट यानी 182 मीटर है। प्रतिमा अपने आप में अनूठी है। इसके पैर की ऊँचाई 80 फीट, हाथ की ऊँचाई 70 फीट, कंधे की ऊँचाई 140 फीट और चेहरे की ऊँचाई 70 फीट है।
इस मूर्ति का निर्माण राम वी. सुतार की देखरेख में हुआ है. देश-विदेश में अपनी शिल्प कला का लोहा मनवाने वाले राम वी. सुतार को साल 2016 में सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था. इससे पहले वर्ष 1999 में उन्हें पद्मश्री भी प्रदान किया जा चुका है। इसके अलावा वे बांबे आर्ट सोसायटी के लाइफ टाइम अचीवमेंट समेत अन्य पुरस्कार से भी नवाजे गए हैं। वह इन दिनों मुंबई के समुंदर में लगने वाली शिवाजी की प्रतिमा की डिजाइन भी तैयार करने में जुटे हैं। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि यह प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को भी पीछे छोड़ देगी और दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी।
चीन स्थित स्प्रिंग टेंपल की 153 मीटर ऊंची बुद्ध प्रतिमा के नाम अब तक सबसे ऊंची मूर्ति होने का रिकॉर्ड था मगर सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा ने अब चीन में स्थापित इस मूर्ति को दूसरे स्थान पर छोड़ दिया है। 182 मीटर ऊंचे ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ का आकार न्यूयॉर्क के 93 मीटर उंचे ‘स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ से दोगुना है।
मूर्ति बनाने वाली कंपनी लार्सन एंड टुब्रो ने दावा किया कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है और महज 33 माह के रिकॉर्ड कम समय में बनकर तैयार हुई है. जबकि स्प्रिंग टेंपल के बुद्ध की मूर्ति के निर्माण में 11 साल का वक्त लगा. कंपनी के मुताबिक यह प्रतिमा न्यूयॉर्क में स्थित स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से लगभग दोगुनी ऊंची है।
सरदार पटेल की इस मूर्ति को बनाने में करीब 2,989 करोड़ रुपये का खर्च आया. कंपनी के मुताबिक, कांसे की परत चढ़ाने के आशिंक कार्य को छोड़ कर बाकी पूरा निर्माण देश में ही किया गया है। यह प्रतिमा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कम्पनी ने कहा कि रैफ्ट निर्माण का काम वास्तव में 19 दिसंबर, 2015 को शुरू हुआ था और 33 माह में इसे पूरा कर लिया गया।
इस स्मारक की आधारशिला 31 अक्तूबर, 2013 को पटेल की 138 वीं वर्षगांठ के मौके पर रखी गई थी, जब पीएम नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इसके लिये भाजपा ने पूरे देश में लोहा इकट्ठा करने का अभियान भी चलाया गया।
सरदार पटेल की मुख्य प्रतिमा बनाने में1,347 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि 235 करोड़ रुपये प्रदर्शनी हॉल और सभागार केंद्र पर खर्च किये गये। वहीं 657 करोड़ रुपये निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अगले 15 साल तक ढांचे के रखरखाव पर खर्च किए किए जाएंगे। 83 करोड़ रुपये पुल के निर्माण पर खर्च किये गये।
देश को एक सूत्र में बाँधने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल
‘लौहपुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल भारत के पहले गृहमंत्री थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देशी रियासतों का एकीकरण कर अखंड भारत के निर्माण में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। गुजरात में नर्मदा के सरदार सरोवर बांध के सामने सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची लौह प्रतिमा का निर्माण किया गया है।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने की वजह से सरदार पटेल ने राजनीतिक इतिहास में एक अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान पाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरदार पटेल की 137वीं जयंती पर इस प्रतिमा को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। इस प्रतिमा का नाम एकता की मूर्ति (स्टेच्यू ऑफ यूनिटी) रखा गया है। आइए जानते हैं सरदार वल्लभ भाई पटेल के बारे में 10 बातें-

1. सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ। वे खेड़ा जिले के कारमसद में रहने वाले झावेर भाई और लाडबा पटेल की चौथी संतान थे। 1897 में 22 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वल्लभ भाई की शादी झबेरबा से हुई। पटेल जब सिर्फ 33 साल के थे, तब उनकी पत्नी का निधन हो गया।
2. सरदार पटेल अन्याय नहीं सहन कर पाते थे। अन्याय का विरोध करने की शुरुआत उन्होंने स्कूली दिनों से ही कर दी थी। नडियाद में उनके स्कूल के अध्यापक पुस्तकों का व्यापार करते थे और छात्रों को बाध्य करते थे कि पुस्तकें बाहर से न खरीदकर उन्हीं से खरीदें। वल्लभभाई ने इसका विरोध किया और छात्रों को अध्यापकों से पुस्तकें न खरीदने के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप अध्यापकों और विद्यार्थियों में संघर्ष छिड़ गया। 5-6 दिन स्कूल बंद रहा। अंत में जीत सरदार की हुई। अध्यापकों की ओर से पुस्तकें बेचने की प्रथा बंद हुई।
3. सरदार पटेल को अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने में काफी समय लगा। उन्होंने 22 साल की उम्र में 10वीं की परीक्षा पास की। सरदार पटेल का सपना वकील बनने का था और अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें इंग्लैंड जाना था, लेकिन उनके पास इतने भी आर्थिक साधन नहीं थे कि वे एक भारतीय महाविद्यालय में प्रवेश ले सकें। उन दिनों एक उम्मीदवार व्यक्तिगत रूप से पढ़ाई कर वकालत की परीक्षा में बैठ सकते थे। ऐसे में सरदार पटेल ने अपने एक परिचित वकील से पुस्तकें उधार लीं और घर पर पढ़ाई शुरू कर दी।
4. बारडोली सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहे पटेल को सत्याग्रह की सफलता पर वहां की महिलाओं ने ‘सरदार’ की उपाधि प्रदान की। आजादी के बाद विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाने के लिए पटेल को ‘भारत का बिस्मार्क’ और ‘लौहपुरुष’ भी कहा जाता है। सरदार पटेल वर्णभेद तथा वर्गभेद के कट्टर विरोधी थे।
5. इंग्लैंड में वकालत पढ़ने के बाद भी उनका रुख पैसा कमाने की तरफ नहीं था। सरदार पटेल 1913 में भारत लौटे और अहमदाबाद में अपनी वकालत शुरू की। जल्द ही वे लोकप्रिय हो गए। अपने मित्रों के कहने पर पटेल ने 1917 में अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर का चुनाव लड़ा और उसमें उन्हें जीत भी हासिल हुई।

6. सरदार पटेल गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह की सफलता से काफी प्रभावित थे। 1918 में गुजरात के खेड़ा खंड में सूखा पड़ा। किसानों ने करों से राहत की मांग की, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने मना कर दिया। गांधीजी ने किसानों का मुद्दा उठाया, पर वो अपना पूरा समय खेड़ा में अर्पित नहीं कर सकते थे इसलिए एक ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे थे, जो उनकी अनुपस्थिति में इस संघर्ष की अगुवाई कर सके। इस समय सरदार पटेल स्वेच्छा से आगे आए और संघर्ष का नेतृत्व किया।
7. गृहमंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों (राज्यों) को भारत में मिलाना था। इस काम को उन्होंने बिना खून बहाए करके दिखाया। केवल हैदराबाद के ‘ऑपरेशन पोलो’ के लिए उन्हें सेना भेजनी पड़ी। भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिए उन्हे भारत का ‘लौहपुरुष’ के रूप में जाना जाता है। सरदार पटेल की महानतम देन थी 562 छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण करके भारतीय एकता का निर्माण करना। विश्व के इतिहास में एक भी व्यक्ति ऐसा न हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो। 5 जुलाई 1947 को एक रियासत विभाग की स्थापना की गई थी।
8. सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते। वे महात्मा गांधी की इच्छा का सम्मान करते हुए इस पद से पीछे हट गए और नेहरूजी देश के पहले प्रधानमंत्री बने। देश की स्वतंत्रता के पश्चात सरदार पटेल उपप्रधानमंत्री के साथ प्रथम गृह, सूचना तथा रियासत विभाग के मंत्री भी थे। सरदार पटेल के निधन के 41 वर्ष बाद 1991 में भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारतरत्न से उन्हें नवाजा गया। यह अवॉर्ड उनके पौत्र विपिनभाई पटेल ने स्वीकार किया।

9. सरदार पटेल के पास खुद का मकान भी नहीं था। वे अहमदाबाद में किराए एक मकान में रहते थे। 15 दिसंबर 1950 में मुंबई में जब उनका निधन हुआ, तब उनके बैंक खाते में सिर्फ 260 रुपए मौजूद थे।
10. आजादी से पहले जूनागढ़ रियासत के नवाब ने 1947 में पाकिस्तान के साथ जाने का फैसला किया था लेकिन भारत ने उनका फैसला स्वीकार करने से इंकार करके उसे भारत में मिला लिया। भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल 12 नवंबर 1947 को जूनागढ़ पहुंचे। उन्होंने भारतीय सेना को इस क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के निर्देश दिए और साथ ही सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया।
जम्मू एवं कश्मीर, जूनागढ़ तथा हैदराबाद के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा। जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ़ भी भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, तो सरदार पटेल ने वहां सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया, किंतु कश्मीर पर यथास्थिति रखते हुए इस मामले को अपने पास रख लिया।
(साभार – वेबदुनिया)
भारत, बांग्लादेश क्रूज सेवाएं शुरू करेंगे; नए पड़ावों में कोलाघाट, छिलमारी बंदरगाह
नयी दिल्ली : भारत और बांग्लादेश दोनो देशों के बीच जल परिवहन को बढ़ावा देने के लिये रूपनारायण नदी को प्रोटोकॉल मार्ग के रूप में शामिल करने पर विचार करने के लिये सहमत हुये हैं। इसके अलावा दोनों पक्षों पश्चिम बंगाल में कोलाघाट और बांग्लादेश में छिलमारी को जहाजों के पड़ाव के लिए नामित करने पर भी सहमति हुई है। अंतर्देशीय जल परिवहन के प्रोटोकॉल व्यवस्था और उसमें सुधार पर चर्चा के लिए द्विपक्षीय बैठक में यह निर्णय लिया गया। भारत के नौवहन मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि बांग्लादेश के साथ ‘अंतर्देशीय जल पारगमन एवं व्यापार पर प्रोटोकॉल’ (पीआईडब्ल्यूटीटी) विषय पर स्थायी समिति की 19वीं बैठक में दोनों देश पश्चिम बंगाल में जियोंखली से कोलाघाटी तक रूपनारायण नदी (राष्ट्रीय जल मार्ग- 86) को शामिल करने के विषय में विचार करने पर सहमत हुए हैं। पश्चिम बंगाल में कोलाघाट और बांग्लादेश में छिलमारी को जहाजों के विश्राम स्थल के रूप में घोषित करने पर भी सहमति बनी है।”
नयी व्यवस्था के तहत फ्लाई ऐश, सीमेंट, निर्माण सामग्री इत्यादि रूपनारायण नदी के जरिए भारत से बांग्लादेश भेजी जा सकेगी। बयान में कहा गया है कि दोनों देश अंतर्देशीय प्रोटोकॉल मार्ग और तटीय नौवहन मार्गों पर यात्रियों और क्रूज जहाजों के आवागमन के लिये मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को अंतिम रूप दिया गया है। क्रूज सेवाएं कोलकाता से ढाका और गुवाहाटी से जोरहाट के बीच चलायी जा सकती हैं।




