Sunday, April 19, 2026
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चुनावी फायदे के लिए कर्ज माफी के बीज मत बोइए – स्वामीनाथन

नयी दिल्ली :  देश में किसान कर्ज के बढ़ते बोझ और फसलों की सही लागत नहीं मिलने से जूझ रहे हैं। राजनीतिक दल इसी का फायदा उठाते हुए कर्ज माफी का वादा कर रहे हैं। हाल ही में हुए 5 में से 3 राज्‍यों में कांग्रेस ने इसी वादे के सहारे चुनाव जीता। हालांकि हरित क्रांति के जनक एमएस स्‍वामीनाथन कर्ज माफी को अर्थव्‍यवस्‍था के लिए उपयुक्‍त नहीं मानते। उन्‍होंने राजनेताओं से अपील की है कि चुनावी फायदे के लिए वे इस तरह के कदम ना उठाएं।
एक निजी चैनल से बातचीत में उन्‍होंने कहा, ‘खेती की समस्‍या आर्थिक है। मानसून और बाजार छोटे किसानों के लिए दो बड़े जरूरी तत्‍व हैं। चुनावी फायदे के लिए राजनेताओं को आर्थिक रूप से अव्‍यावहारिक नीतियों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।’ मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ और राजस्‍थान में कांग्रेस ने सरकार बनाते ही किसानों के कर्ज माफ करने का ऐलान किया। इस ऐलान के तहत दो लाख रुपये तक का कर्ज माफ होगा।

स्‍वामीनाथन ने कहा कि कर्ज माफी कृषि नीति का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए।उन्‍होंने कहा, ‘कर्ज तभी माफ होना चाहिए जब किसान को पैसा लौटाने में काफी दिक्‍कत हो रही हो और यह कदम भी कभी-कभार ही लेना चाहिए। यह कभी भी कृषि नीति का हिस्‍सा नहीं बनना चाहिए क्‍योंकि जरूरत खेती को लाभ देने वाली और आर्थिक रूप से व्‍यावहारिक बनाने की है।’
बता दें कि स्‍वामीनाथन ने किसानों और खेती की बेहतरी के लिए एक रिपोर्ट दी थी लेकिन उसे लागू नहीं किया गया है। किसान संगठन लगातार इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहे हैं। न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य(एमएसपी) के बारे में उन्‍होंने कहा, ‘एमएसपी तभी कामयाब होगी जब खरीद प्रक्रिया होगी। कीमतों, खरीद और सार्वजनिक वितरण के लिए एक नीति है। यदि पर्याप्‍त खरीद नहीं होगी तो हो सकता है कि एमएसपी का फायदा न मिले इसलिए हमें कीमतों और खरीद के लिए एक संपूर्ण नीति चाहिए।’
स्‍वामीनाथन ने इस बात पर जोर दिया कि किसानों की आर्थिक दशा सुधारने और युवाओं को इसकी तरफ आकर्षित करने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा, ‘खेती को आर्थिक रूप से व्‍यावहारिक और लाभप्रद बनाने की जरूरत है। हमारे पास मौका है कि हम ऐसी नीति बनाए जिससे कि किसानों की माली हालत सुधरे और इसके साथ ही खेती युवाओं को आकर्षित करे।

साइकिल से दुनिया का चक्कर लगाने वाली सबसे तेज एशियाई महिला बनी वेदांगी

मुम्बई : पुणे की 20 साल की वेदांगी कुलकर्णी साइकिल से दुनिया का चक्कर लगाने वाले सबसे तेज एशियाई बन गयी हैं। वेदांगी ने रविवार को कोलकाता में तड़के साइकिल चलाकर इसके लिए जरूरी 29,000 किलोमीटर की मानक दूरी को तय किया। उन्होंने इस सफर की शुरूआत जुलाई में पर्थ से की थी और इस रिकार्ड को पूरा करने के लिए वह ऑस्ट्रेलिया के इस शहर में वापस जाएंगी। वेदांगी ने बताया कि उन्होंने 14 देशों का सफर किया और 159 दिनों तक रोजाना लगभग 300 किलोमीटर साइकिल चलाती थी। इस दौरान उन्हें कुछ ‘‘ अच्छे और बुरे’’ अनुभव हुए। उनके पिता विवेक कुलकर्णी ने बताया दुनिया में कुछ ही लोगों ने इस मुश्किल चुनौती को पूरा किया है और उनकी बेटी दुनिया का चक्कर लगाने के मामले में सबसे तेज एशियाई है। ब्रिटेन की जेनी ग्राहम (38) के नाम महिलाओं के बीच सबसे कम दिनों में साइकिल से चक्कर लगाने का रिकार्ड है जिन्होंने इसके लिये 124 दिन का समय लिया था। यह रिकार्ड पिछले रिकार्ड से तीन सप्ताह कम था। इस अभियान को पूरा करने के दौरान वेदांगी को कई चुनौतियों को सामना करना पड़ा। कनाडा में एक भालू उनका पीछे करने लगा था। रूस में बर्फ से घिरी जगहों पर उन्होंने कई रात अकेले गुजारी तो वहीं स्पेन में चाकू की नोक पर उनसे लूटपाट हुई।
ब्रिटेन के बॉउर्नेमाउथ विश्व विद्यालय की खेल प्रबंध की इस छात्रा ने बताया कि उन्होंने इसके लिये दो साल पहले ही तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने साइकिल पर लगभग 80 प्रतिशत यात्रा को अकेले पूरा किया। यात्रा के दौरान उन्होंने शून्य से 20 डिग्री कम से 37 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को झेलना पड़ा। इस दौरान वह ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, आइसलैंड, पुर्तगाल, स्पेन फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन, फिनलैंड और रूस से होकर गुजरी।

महिला-पुरुषों के बीच आर्थिक बराबरी में लग जाएंगे 202 साल

जेनेवा : दुनियाभर में कार्यस्थल पर महिलाओं को पुरुषों की बराबरी तक पहुंचने में 202 साल लग जाएंगे। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की मंगलवार को जारी ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट में यह बात सामने आई। इसके मुताबिक वेतन समेत आर्थिक अवसरों के मामलों में महिलाओं और पुरुषों की स्थिति में भारी अंतर है।
टॉप-10 देशों में एशिया से सिर्फ फिलीपींस शामिल
रिपोर्ट के मुताबिक राजनीति, शिक्षा और स्वास्थ्य में महिला-पुरुष असमानता की स्थिति में इस साल में सुधार हुआ है। लेकिन, इन क्षेत्रों में समानता का लक्ष्य पाने में 108 साल लग जाएंगे। क्योंकि, एक साल के अंदर स्थिति में 0.1% से भी कम सुधार हुआ है। पिछले साल महिला-पुरुषों की उपलब्धियों और वेलफेयर में फासला बढ़ गया था। दस साल में पहली बार ऐसा हुआ था। महिला-पुरुष समानता में आइसलैंड 85.8% स्कोर के साथ लगातार 10वें साल पहले नंबर पर रहा है। महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में भी यह टॉप पर है। हालांकि, यहां जनप्रतिनिधि, सीनियर अफसर और मैनेजर के तौर पर महिलाओं के प्रतिनिधित्व में गिरावट आई है।
149 देशों की सूची में भारत 108वें नंबर पर
महिला-पुरुष समानता के मामले में दुनिया में भारत 66.5% स्कोर के साथ 108वें नंबर पर है। राजनीतिक सशक्तिकरण में देश में महिला-पुरुषों की स्थिति में करीब 40% फासला है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में मैनेजर स्तर के पदों पर सिर्फ 34% महिलाएं हैं। महिला-पुरुषों के वेतन में 63% अंतर है। मध्य – पूर्व और उत्तर अफ्रीका की स्थिति सबसे खराब है। यूएन वूमेन की रीजनल डायरेक्टर अन्ना-करिन जेटफोर्स का कहना है कि दुनियाभर में ऐसा कोई देश नहीं जिसने पूरी तरह महिला-पुरुष के बीच समानता का लक्ष्य हासिल कर लिया हो। लैंगिक असमानता दुनिया की सच्चाई है। महिलाओं की जिंदगी से जुड़े हर पहलू में यह दिखाई दे रहा है। महिला-पुरुष के बीच आर्थिक समानता हासिल करने के लिए 202 साल का वक्त बहुत ज्यादा है। एशिया में फिलीपींस की स्थिति सबसे अच्छी है। ग्लोबल इंडेक्स में इसका आठवां नंबर है। शिक्षा, राजनीति और वेतन के मामले में यहां महिला-पुरुषों में समानता बाकी एशियाई देशों से ज्यादा है। एशियाई देशों में दूसरा नंबर लाओस का है। लेकिन, फिलीपींस के काफी नीचे है। ग्लोबल इंडेक्स में लाओस का 26वां, सिंगापुर और 67वां और चीन का 103वां नबर है।

इजरायली वैज्ञानिकों का दावा- तम्बाकू के पौधे से बनाया जा सकेगा कृत्रिम फेफड़ा

इजरायली बायोटेक फर्म कोलप्लांट के वैज्ञानिकों ने तम्बाकू के पौधे से कृत्रिम फेफड़े बनाने का रास्ता खोजने का दावा किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, तम्बाकू के पौधे को आनुवांशिक तौर पर सुधार कर कोलेजन नाम का प्रोटीन बनाया जा सकता है। इसके बाद थ्रीडी तकनीक के जरिए वैज्ञानिक कोलेजन से बनी खास स्याही का इस्तेमाल कृत्रिम फेफड़ों के विकास में कर सकते हैं। इसमें मानव कोशिका डालकर स्वस्थ फेफड़े को ट्रांसप्लांट के लिए तैयार किया जा सकता है।
कोलेजन प्रोटीन त्वचा और जोड़ों के ऊतकों में पाया जाता है। इसके अणु कोशिकाओं के विकास में सहायक ढांचे का काम करते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि जेनेटिकली मोडिफाइड तम्बाकू के पौधे से 8 हफ्ते में कोलेजन का निर्माण शुरू किया जा सकेगा। पत्तियों को खास प्रक्रिया से गुजारने के बाद कोलेजन इकट्ठा कर इसे एक स्याही में बदल दिया जाएगा।

यूएस की एक फर्म यूनाइटेड थैरेप्यूटिक्स एक ऐसा थ्रीडी प्रिंटर विकसित करने पर काम कर रही है, जिसके जरिए कृत्रिम फेफड़े बनाए जा सकें। इस तरह के प्रिंटर का इस्तेमाल त्वचा और रेटिना बनाने में किया जा चुका है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि फेफड़े के निर्माण के लिए तकनीकी रूप से ज्यादा सक्षम प्रिंटर का इस्तेमाल करना होगा, जो कोलेजन के बड़े अणुओं को संभाल सके। क्योंकि, रोशनी पड़ने पर ही कोलेजन अणु आपस में जुड़कर सख्त हो जाते हैं।

अभी तक वैज्ञानिकों ने फेफड़ों के ऊतकों का केवल एक छोटा सा हिस्सा तैयार किया है। कोशिकाओं की सहायता से पूरा फेफड़ा विकसित करने पर काम जारी है। हालांकि, जानवरों पर किए गए प्रयोगों में सामने आया है कि यह प्रक्रिया कारगर हो सकती है।

यूके स्टेम सेल फाउंडेशन के मुख्य वैज्ञानिक प्रोफेसर ब्रेंडन ने कहा कि तम्बाकू के पौधे से बने फेफड़ों में ट्रांसप्लांट सर्जरी को पूरी तरह बदल देने की क्षमता होगी। हो सकता है कि अगले 10 सालों में यह हमारे सामने मौजूद हो। लेकिन, अभी बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना है।

ब्रेंडन ने कहा- अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि कोशिकाओं के साधारण ढांचे को फेफड़े जितने बड़े और पेंचीदा अंग में विकसित किया जा सकता है कि नहीं।

लोकसभा चुनाव लड़ेंगे कमल हासन

चेन्नई : अभिनेता और राजनेता कमल हासन की पार्टी मक्कल निधि मय्यम (एमएनएम) अगले लोकसभा चुनाव लड़ेगी। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी तमिलनाडु के विकास पर फोकस कर रही है। अगले चुनावों में समान विचारधारा वाली पार्टियों से गठबंधन करेंगे। हालांकि उन्होंने कहा कि यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि उनकी पार्टी किसी गठबंधन का हिस्सा बनेगी या उसका नेतृत्व करेगी।

उम्मीदवारों पर फैसला जल्द
कमल हासन ने इसी साल फरवरी में अपनी राजनीतिक पार्टी मक्कल निधि मय्यम (एमएनएम) का गठन किया है। वे लगातार राज्य की एआईएडीएमके और केंद्र सरकार पर निशाना साधते रहे हैं। हासन ने कहा- मैं चुनाव लड़ूंगा, जल्द ही कमेटी उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया शुरू कर देगी। उन्होंने कहा कि वे ऐसी किसी पार्टी से गठबंधन नहीं करेंगे, जो तमिलनाडु के डीएनए को बदलने की कोशिश करता है।

कांग्रेस के साथ गठबंधन के दे चुके हैं संकेत
कमल हासन ने पिछले दिनों कहा था- कांग्रेस द्रमुक से गठबंधन तोड़ देती है तो वे 2019 लोकसभा चुनाव में उससे हाथ मिलने को तैयार हैं। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस के साथ एमएनएम का गठबंधन राज्य के लोगों के लिए काफी फायदेमंद होगा। हासन ने जून में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात भी की थी।

विधानसभा उपचुनाव भी लड़ेगी कमल की पार्टी
पिछले महीने कमल हासन ने ऐलान किया था कि उनकी पार्टी तमिलनाडु की 20 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में उम्मीदवार उतारेगी। यहां मद्रास हाईकोर्ट द्वारा अन्नाद्रमुक के 18 विधायकों को अयोग्य घोषित करने के बाद से ये सीटें खाली हैं। वहीं, दो सीटें एम करुणानिधि और एके बोस के निधन के बाद से खाली हैं।

कालीमती : वह साहसी महिला जिसने किया था, भारत का पहला कानूनन विधवा-पुनर्विवाह!

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में सुकास स्ट्रीट पर एक घर के बाहर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था। यह घर था प्रेसीडेंसी कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर राज कृष्ण बंदोपाध्याय का। उस दिन उनके घर में एक शादी हो रही थी और यह शादी पूरे देश में चर्चा का विषय थी। घर के बाहर गलियों में लोगों की इतनी भीड़ थी कि दुल्हन की पालकी को मंडप तक पहुंचाना मुश्किल हो रहा था। उस समय के सभी जाने-माने चेहरे यहाँ मौजूद थे। इनमें शामिल थे रामगोपाल घोष, हरचंद्र घोष, सम्भूनाथ पंडित, द्वारकानाथ मित्र जैसे लोग।

ये सभी पालकी को सही-सलामत भीड़ से निकालकर ला रहे थे। भीड़ इतनी थी कि काबू करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी। इसी सब में, एक व्यक्ति मंडप के पास खड़ा होकर कुछ दिशा-निर्देश दे रहा था ताकि कोई गड़बड़ न हो। ये थे मशहूर समाज-सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर! वही ईश्वर चंद्र विद्यासागर जिन्होंने हिन्दू विधवा पुनर्विवाह का कानून पारित करवाया था। यह एक्ट जुलाई 1856 में पारित हुआ और इसके मात्र चार महीने बाद वे यहाँ एक विधवा की शादी करा रहे थे। जिसे देखने पूरा कलकत्ता उमड़ पड़ा था। यह शादी थी 10 साल की उम्र में ही विधवा हो चुकी कालीमती की।
विद्यासागर ने कालीमती की शादी अपने ही एक साथी श्रीचन्द्र विद्यारत्ना से करवाई। इस शादी का जहाँ एक तरफ़ बहुत से लोगों ने विरोध किया तो दूसरी तरफ़ ऐसे भी लोग थे, जिन्होंने इस शादी का पुरज़ोर समर्थन किया। हिन्दू विधवा पुनर्विवाह एक्ट पास होने के बाद होने वाला यह पहला कानूनन विधवा विवाह था, पर यह पहली बार नहीं था जब किसी विधवा का पुनर्विवाह हुआ हो। इससे दो दशक पहले ही एक बंगाली युवा यह नामुमकिन कार्य कर चुका था।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर

दक्षिनारंजन मुखोपाध्याय ने बर्दवान की रानी बसंता कुमारी से विवाह किया था। बसंता कुमारी, राजा तेजचन्द्र की विधवा थी। यह शायद पहली बार था जब किसी विधवा का पुनर्विवाह हुआ था और वह भी अंतर्जातीय। हालांकि, मुखोपाध्याय और बसंता के रिश्ते को किसी ने स्वीकार नहीं किया और उन्हें अपना शहर छोड़कर लखनऊ में जाकर बसना पड़ा लेकिन मुखोपाध्याय का समाज में एक मुकाम था और वे रईस परिवार से थे, इसलिए उस समय ऐसा कदम उठाकर भी उन्होंने आराम से जीवन व्यतीत किया पर विद्यासागर को ग़रीब और आम विधवाओं की व्यथाओं ने प्रभावित किया और उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ़ जंग छेड़ दी। इसके लिए उन्होंने संस्कृत कॉलेज के अपने दफ़्तर में न जाने कितने दिन-रात बिना सोये निकाले ताकि वे शास्त्रों में विधवा-विवाह के समर्थन में कुछ ढूंढ सके।
और आख़िरकार उन्हें ‘पराशर संहिता’ में वह तर्क मिला जो कहता था कि ‘विधवा-विवाह धर्मवैधानिक है’! इसी तर्क के आधार पर उन्होंने हिन्दू विधवा-पुनर्विवाह एक्ट की नींव रखी। 19 जुलाई 1856 को यह कानून पास हुआ और 7 दिसंबर 1856 को देश का पहला कानूनन और विधिवत विधवा-विवाह हुआ।

विद्यासागर महिलाओं के उत्थान के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। कहा जाता है कि जिन भी विधवा लड़कियों की शादी वे करवाते थे, उन्हें फ़रों की साड़ी भी वही उपहार स्वरुप देते थे। उस समय इन सभी कार्यों के लिए विद्यासागर को समाज से ज़्यादातर विरोध और ताने ही मिले, लेकिन वे अपने आदर्शों पर अडिग रहे। उनके इन उसूलों को जहाँ समाज नकारता था, वहीं उसी समाज के कई तबके के लोग विद्यासागर को मसीहा मानते थे और उनका हौंसला बढ़ाते थे।

बताया जाता है कि शांतिपुर के साड़ी बुनकरों ने विद्यासागर के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए साड़ियों पर बंगाली में कविता बुनना शुरू किया था,

“बेचे थाको विद्यासागर चिरजीबी होए”
(जीते रहो विद्यासागर, चिरंजीवी हो! )

भले ही, इतिहास इस विधवा-पुनर्विवाह पर मौन रहा लेकिन यह शादी पूरे भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।

(साभार – द बेटर इंडिया)

किसानों की कमाई बढ़ा रही है यह 20 रुपये की शीशी

एक सफ़ेद रंग की छोटी-सी 20 रूपये की शीशी आज किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। यह शीशी है ‘वेस्ट डीकम्पोज़र’ की। वेस्ट डीकम्पोज़र का अर्थ है कचरे को गला-सड़ा कर अपघटित करना। इस ‘वेस्ट डीकम्पोज़र’ की मदद से किसान खेतों की उर्वरकता बढ़ा सकते हैं और साथ ही जैविक खाद बना सकते हैं। उन्हें अब फसल के बाद बचने वाली पराली को भी जलाने की जरूरत नहीं है। ‘वेस्ट डीकम्पोज़र’ के घोल में इस पराली को मिला कर खाद तैयार की जा सकती है।
इस डीकम्पोज़र को राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र ने तैयार किया है। केंद्र के डायरेक्टर किशन चंद्रा बताते हैं कि पिछले साल से ही ये वेस्ट डीकम्पोज़र किसानों को दिया जा रहे हैं। इस वेस्ट डीकम्पोज़र की सबसे खास बात ये है कि किसान इसे दोबारा अपने खेत में ही तैयार कर सकते हैं और इसका इस्तेमाल करने के बाद उन्हें कोई कीटनाशक प्रयोग करने की जरुरत नहीं है। गाजियाबाद में रहने वाले किसान पंकज वर्मा बताते हैं कि अब पराली उनके लिए सोना है और ये डीकम्पोज़र अमृत समान है। जबसे उन्होंने इसका इस्तेमाल करना शुरु किया है खेत की सेहत बढ़ गई है और फसल में कोई बीमारी नहीं लगती। वहीं हरियाणा के एक किसान अमित का कहना है कि इस डीकम्पोज़र ने हरियाणा के सैकड़ों किसानों को पराली जलाने से रोका है। इस वेस्ट डीकम्पोज़र को गाय के गोबर और पत्तों में पाए जाने वाले जीवाणु से तैयार किया गया है। इसे इस्तेमाल करने की विधि बहुत ही आसान है। सबसे पहले इस वेस्ट डीकम्पोज़र को 200 लीटर पानी में 2 किलोग्राम गुड़ के साथ मिलकर इसका घोल तैयार करें और उसे लगभग एक सप्ताह तक ऐसे ही रहने दें।
हर दिन इस घोल को किसी लकड़ी के डंडे से दिन में दो बार अच्छे से हिलाएं।
एक हफ्ते बाद आप इस घोल का स्प्रे अपने खेतों में कर सकते हैं।
स्प्रे के अलावा आप इस घोल को घर के किचन से निकलने वाले कूड़े-कचरे व खेतों में बचने वाली पराली आदि मिला कर खाद भी तैयार कर सकते हैं।
वेस्ट डीकम्पोज़र का तैयार घोल
इस घोल से ही आप कुछ लीटर घोल अलग निकाल कर और इसमें पानी और गुड़ मिलाकर फिर से घोल तैयार कर सकते हैं। इस तरह से आप एक ही घोल का इस्तेमाल बार-बार कर सकते हैं। इस वेस्ट डीकम्पोज़र की मदद से खेती की लागत को कम से कम किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल करके किसान बिना किसी रसायन उर्वरक व कीटनाशक के फसल उगा सकते हैं। इससे यूरिया, डीएपी या एमओपी की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आप यहाँ सम्पर्क कर सकते हैं,

नेशनल सेंटर ऑफ़ ऑर्गेनिक फार्मिंग (कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार)
हापुर रोड, कमला नेहरू नगर, गाजियाबाद – 201002
फोन: 0120 – 2764906, 2764212; फ़ैक्स: 0120- 2764901
ईमेल: [email protected]; वेबसाइट: http://ncof.dacnet.nic.in
(साभार – द बेटर इंडिया)

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं

मिर्जा गालिब

कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये

वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब
वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये

सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़र
ताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये

वो मेवा हाये ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाह
वो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाये हाये

कभी केक में बटर इस्तेमाल करने पर थी पाबन्दी, प्रिंस ने पोप को पत्र लिखकर मांगी थी इजाजत

क्रिसमस का सबसे खास हिस्सा है केक। बिना केक क्रिसमस अधूरा  है। केक की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। एक दौर ऐसा भी था जब बेकर्स को केक में बटर तक इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं थी। नतीजा स्टॉलेन केक बेहद स्वादहीन और कठोर बनता था। जर्मन में बनने वाले स्टॉलेन केक को सबसे पहले 1545 में क्रिसमस ब्रेड के तौर पर बेक किया गया था। केक कई वैरायटी सालों तक यह अपने बदलाव के कई पड़ावों को पार करने के बाद आज हमारे डेजर्ट का सबसे खास हिस्सा बन गया है। जानते हैं इसका सफरनामा….
स्टॉलेन केक : स्वाद के लिए चुकानी पड़ती रकम
‘जर्मनी के सैक्सनी प्रांत में यह केक आटे, यीस्ट और ऑयल से बनाया गया था। यह टेस्टलेस और हार्ड था। तब बेकर्स को बटर इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं थी।
15वीं शताब्दी में प्रिंस इलेक्टर अर्न्स्ट और उनके भाई ड्यूक अल्ब्रेख्त ने रोम में पोप को लिखा कि बेकर्स को बटर इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाए। इसकी वजह थी कि ऑयल वहां महंगा था और मुश्किल से मिलता था। शुरुआत में इनकी अपील खारिज कर दी गई।
आखिरकार पोप ने प्रिंस को जवाब दिया कि सिर्फ आप और आपकी फैमिली बटर इस्तेमाल कर सकती है। इसे बटर लेटर के तौर पर जाना जाता है। कुछ और लोगों को भी इजाजत दी गई, लेकिन सालाना रकम चुकानी पड़ती थी।
काफी सालों बाद बटर से बैन पूरी तरह से हटाया गया। आज भी पारंपरिक स्टॉलेन उतना मीठा और हल्का नहीं होता जैसा दुनिया के अन्य हिस्सों में बनाया जाता है।
डंडी केक : मेरी क्वीन ऑफ स्कॉट्स को पसंद नहीं थी चेरीज़, इसलिए बनाया ये केक
19वीं सदी में स्कॉटलैंड में इसे सबसे पहले बेक किया गया था। कहा जाता है कि मेरी क्वीन ऑफ स्कॉट्स को अपने केक में ग्लेस चेरीज़ पसंद नहीं थीं। इसलिए सबसे पहले उनके लिए यह केक बनाया गया, जिसमें चेरी की जगह बादाम इस्तेमाल किए गए।
आज यह यूके के सुपरमार्केट्स में बड़े पैमाने पर बिकता है और इसकी खासियत ही है- बादाम से डेकोरेशन। 1947 के बाद एक नामी कंपनी ने इसे इंडिया में भी बेचा।
हालांकि 1980 में इसे मार्केट से विदड्रॉ कर लिया गया, लेकिन क्रिसमस गिफ्ट के तौर पर दिया जाता रहा। ऐसा कहा जाता है कि टी टाइम में क्वीन एलिजाबेथ डंडी केक पसंद करती हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

स्पेन में बाढ़ पीड़ितों के लिए नडाल ने दान किए 8 करोड़ रुपये 

टेनिस स्टार राफेल नडाल ने गुरुवार को स्पेन के मलोर्का बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए 8 करोड़ रुपए (1.15 मिलियन डॉलर) दान में दिए हैं। इसी साल नौ अक्टूबर को मलोर्का द्वीप में बाढ़ आई थी, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई थी। 17 बार ग्रैंडस्लेम विजेता नडाल ने पीड़ितों की सहायता के लिए स्वच्छता अभियान चलाया है। साथ ही उनके लिए एक एकेडमी भी खोली है। स्थानीय प्रशासन के मुताबिक, “हम उनके स्नेह और मानवता के बारे में जानते हैं। यह उनकी प्रतिभा और उन्हें मिले रिजल्ट के समान है। उन्होंने इसे टेनिस कोर्ट और उससे बाहर भी दिखाया है।”
प्रशासन ने कहा, “नडाल आपदा से प्रभावित लोगों की मदद के लिए एक प्रदर्शनी मैच में आने वाले थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से नहीं पहुंच सके। इसके बावजूद उन्होंने पीड़ितों के लिए दान किया।” नडाल के लिए प्रदर्शनी मैच का आयोजन 7 दिसंबर को होने वाला था, लेकिन दाएं पैर की एड़ी में चोट के कारण वे नहीं पहुंच सके। उन्होंने नवंबर के पहले सप्ताह में सर्जरी करवाई थी, जो अभी तक ठीक नहीं हो पाई है।