स्वाभिमान का प्रतीक हैं महाराणा प्रताप : प्रतिभा सिंह
स्त्री शिक्षा के जरिए गाँधी के आदर्शों को मूर्त किया सीताराम सेकसरिया ने
मनुष्यता का साहित्य है भक्तिकालीन काव्य
बेसन की सोंधी रोटी पर

बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ
चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ
बाँट के अपना चेहरा, माथा,
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ
कामकाजी माताओं के लिये दफ्तरों में सहयोगात्मक माहौल बनाने की जरूरत: एसोचैम
नयी दिल्ली : उद्योग मण्डल ‘एसोचैम’ ने अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस पर महिला सशक्तीकरण के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए कामकाजी माताओं के लिये दफ्तरों में सहयोगात्मक माहौल बनाने की जरूरत पर जोर दिया है। एसोचैम के अध्यक्ष बी. के. गोयनका ने एक बयान में कहा ‘दफ्तरों और कामकाज के अन्य स्थानों पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के मद्देनजर एक अलग माहौल बनाने की जरूरत है। कामकाजी माताओं के लिये कार्यस्थलों के वातावरण को उनकी सुविधा के हिसाब से रूपान्तरित किये जाने और काम करने के घंटों में लचीलापन लाने की जरूरत है।’ उन्होंने कहा कि अनेक कम्पनियों ने कामकाजी माताओं की जरूरतों के हिसाब से अपने संचालनात्मक ढांचे को ढालने का काम शुरू कर दिया है।
गोयनका ने कहा कि उनकी नजर में स्वस्थ समाज के निर्माण में महिला सशक्तीकरण बेहद जरूरी है। लिहाजा कुल श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना भी आवश्यक है। पिछले पांच वर्षों के दौरान श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी का प्रतिशत 25 पर ही बना हुआ है। उन्होंने कहा कि इस भागीदारी को बढ़ाने के लिये उन्हें कार्यस्थल पर अनुकूल माहौल दिया जाना चाहिये, ताकि वे अपनी मातृत्व सम्बन्धी जिम्मेदारियों और दफ्तर के दायित्वों के बीच संतुलन बना सकें। एसोचैम अध्यक्ष ने कहा कि उनका संगठन आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने के लिये अनेक कदम उठा रहा है। चैम्बर ने ‘स्टार्ट-अप’ योजना के तहत महिलाओं के क्षमता विकास तथा प्राविधिक प्रशिक्षण की दिशा में काम शुरू किये हैं।
इस तरह हुई मदर्स डे की शुरुआत
माँ और बच्चों के इसी खास प्यार-मोहब्बत भरे रिश्ते से जुड़ा है ‘मदर्स डे’। जाहिर है जब रिश्ता इतना खास है तो इस रिश्ते का सैलिब्रेशन भी खास होना चाहिए। बच्चों के साथ माँ के इस रिश्ते को एक खास सैलिब्रेशन कर नई पहचान दी एक अमेरिकी नागरिक ऐना जार्विस ने जिन्होंने पहली बार अपनी माँ के सम्मान में ‘मदर्स डे’ का आयोजन 1908 में वर्जीनिया, अमेरिका में किया। ऐना ने हालांकि खुद कभी शादी नहीं की और उनकी कोई संतान भी नहीं थी लेकिन इस चलन की शुरुआत ऐना ने अपनी माँ की याद से की थी। ऐना की माँ की मृत्यु 1905 में हुई थी, वह एक समाज सेविका थीं। ऐना की माँ अक्सर अपनी पुत्री से अपनी यह इच्छा जाहिर किया करती थीं कि एक दिन सारी दुनिया की माओं का सम्मान होना चाहिए और उन्हें समाज में उनके योगदान के लिए सराहा जाना चाहिए। 1905 में माँ की मृत्यु होने पर ऐना ने तय किया कि वह उनकी यह इच्छा जरूर पूरी करेंगी। प्रारंभ में ऐना ने अपनी माँ के लिए चर्च में फूल भेजने शुरू किए फिर एक टीम तैयार कर उसके साथ उन्होंने सरकार से इस दिन को सरकारी छुट्टी का दिन और आधिकारिक रूप से ‘मदर्स डे’ के नाम से घोषित किए जाने की माँग की। ऐना और उनके सहयोगियों की माँग पर 1914 में अमेरिका के अट्ठाईसवें राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने मई माह के दूसरे रविवार का दिन मदर्स डे के रूप में मनाये जाने की घोषणा की। अमेरिका में ‘मदर्स डे’ की शुरूआत के बाद दूसरे देशों में भी इसे अपना लिया गया, हालांकि कई देशों में इसे अलग तारीखों में भी मनाया जाता है पर आमतौर पर ‘मदर्स डे’ मार्च या मई माह में ही मनाया जाता है। भारत में भी ‘मदर्स डे’ मई माह के दूसरे रविवार(संडे) को मनाया जाता है। ‘मदर्स डे’ की शुरूआत आधिकारिक रूप से भले ही 19 वीं शताब्दी में अमेरिका से हुई हो पर कहा यह भी जाता है कि इस खास दिन का सैलिब्रशन सदियों पूर्व भी किसी न किसी रूप में होता रहा है। इंग्लैंड में 17वीं शताब्दी में एक खास दिन माँ के सम्मान में आयोजित किया जाता था। इस दिन चर्च में प्रार्थना के बाद बच्चे अपने घर फूल या उपहार लेकर जाते थे। प्राचीन ग्रीक और रोमन इतिहास में भी इस दिन को मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं, इस दिन को मनाने के पीछे उनके धार्मिक कारण जुड़े थे।
(साभार – प्रभासाक्षी)
कवि निराला के ‘महाराणा प्रताप’ उपन्यास के कुछ अंश

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश
राजसिंहासन
मुसलमानों के शासनकाल में जिन वीरों ने अपने सर्वस्व का बलिदान करके अपनी जाति, धर्म, देश और स्वतंत्रता की रक्षा की, उनमें अधिक संख्या राजपूत वीरों की ही देख पड़ती है, जैसे मुसलमानों की दुर्दम शक्ति का प्रतिरोध करने कि लिए उन वीर राजपूतों की शक्ति-रेखा विधाता ने खींची हो। दैव के काल्पनिक क्रम के भीतर जितनी मात्रा में बहिजंगत को सत्य का प्रकाश मिलता है, उतनी ही मात्रा में आध्यात्मिक गौरव की उज्ज्वलता भी प्रस्फुटित होकर हमारी मानस-दृष्टि को आश्चर्यचकित और स्तब्ध कर देती है।
स्वतंत्रता की सिंहवाहिनी के इंगित मात्र से देश के बचे हुए राजपूत-कुल-तिलक-वीरों की आत्माहुति, जलती हुई चिताग्नि में अगणित राजपूत कुल-ललनाओं द्वारा उज्ज्वल सतीत्व रत्न की रक्षा तथा लगातार कई शताब्दियों तक ऐसे ही रक्तोष्ण शौर्य के प्रात्यहिक उदाहरण, इन सजीवमूर्ति सत्य घटनाओं के अनुशीलन से वर्तमान काल की शिरश्चरणविहान, जल्पना मूर्तियाँ भारत के अशान्त आकाश में तत्काल विलीन हो जाती हैं और उस जगह वह चिरन्तन सत्यमूर्ति ही आकर प्रतिष्ठित होती है। तब हमें मालूम हो जाता है कि जातीय जीवन में साँस किस जगह चल रही है। वास्तव में उन वीरों के अमर आदर्श की जड़ भारतीय आत्माओं के इतने गहन प्रदेश तक पहुँची हुई है कि वहाँ उस जातीय वृक्ष को उन्मूलित कर, इच्छानुसार किसी दूसरे पौधे की जड़ जमाना बिल्कुल असंभव, अदूरदर्शिता की ही परिचायक कहलाती है।
हम जिस समय का इतिहास लिख रहे हैं, उस समय भारत के सम्राट् ‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ मुगल बादशाह अकबर थे। इनके पहले दिल्ली के सिंहासन पर जितने मुसलमान सम्राट् बैठे थे, उनकी नीति हिन्दुओं के प्रति खासकर वीर राजपूतों के प्रति मुसलमान-स्वभाव के अनुकूल, प्रत्यक्ष विरोध करने वाली थी, परन्तु सूक्ष्मदर्शिता अकबर ने उस नीति को ग्रहण नहीं किया। साम्राज्य-विस्तार की लालसा अकबर में उन लोगों की अपेक्षा बहुत बढ़ी-चढ़ी थी, परन्तु ये उन लोगों की तरह दुश्मन को दबाकर न मारते थे, इनकी नीति थी मिलाकर शत्रु को अपने वशीभूत करना। इस नीति के बल पर इनको सफलता भी खूब मिली। प्राय: सम्पूर्ण राजपूताना इनके अधीन हो गया। उस समय जिस महावीर पुरुष ने अकबर का सामना किया, हिन्दुओं की कीर्ति-पताका मुगलों के हाथ नहीं जाने दी, आज हम उसी लोकोज्ज्वल-चरित्र महावीर महाराणा प्रतापसिंह की कीर्ति-गाथा अपने पाठकों को भेट करते हैं ।
उस समय भारत वर्ष में जितने मानवीय क्षत्रियवंश थे, उनमें ‘सिसोदिया वंश’ विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, आज भी इस वंश की इज्जत वैसी ही की जाती है। इस वंश में किसी प्रकार के कलंक की कालिमा नहीं लग पायी। मुसलमानों ने छाया-स्पर्श से भी इस वंशवालों को घृणा थी और वे अन्त तक दूध के धोये ही बने रहे।
महाराणा प्रतापसिंह के पिता उदयसिंह अपनी छोटी रानी को और-और रानियों से ज्यादा प्यार करते थे। इसका फल यह हुआ कि उन्हें संतुष्ट करने के लिए मृत्यु के समय उदयसिंह ने उन्हीं के लड़के को राजगद्दी दी। उनका नाम जगमल था। उदयसिंह का यह कार्य नीति के खिलाफ हुआ। क्योंकि राजगद्दी के हकदार प्रतापसिंह थे। ये जगमल से बड़े थे। उदयसिंह के इस कार्य की प्रजाजनों में बड़ी समालोचना हो चली और भीतर-ही-भीतर वे लोग इस अनीति की निन्दा करने लगे। वास्तव में प्रेम के वशीभूत होकर, दायित्वपूर्ण उत्तराधिकारी-क्रम पर महाराणा उदयसिंह का इस तरह स्वेच्छाचार करना, राज-पद्धति के बिलकुल विपरीत हुआ था।
यह जहर फैलता गया। धार्मिक विचारों से तो राज्य के अधिकारी प्रतापसिंह ठहरते ही थे, इसके अलावा प्रजाजनों का प्रेम भी उनके ऊपर बहुत ही गहरा था। प्रतापसिंह का दिल लुभा लेनेवाला अकृत्रिम बर्ताव, प्रजाजनों को समदृष्टि से देखना, अपने को प्यारी प्रजा का सेवक समझना, देश और धर्म के नाम पर अपने सर्वस्व का त्याग, इस तरह के और भी अनेक सद्गुण उनमें थे। जगमल के राजगद्दी पाने पर और सभी लोगों को क्लेश हुआ, परन्तु दृढ़व्रत प्रताप के चेहरे पर शिकन भी न पड़ी। वे पूर्ववत् ही प्रसन्न रहते और जैसे स्नेह की दृष्टि से जगमल को पहले देखते थे, वैसे ही अब भी देखते।
महाराणा उदयसिंह का कार्य जिन राजपूत-सरदारों को खटकता था, उनमें झालवाड़ के महाजन और चन्दावत कृष्णजी प्रमुख थे। प्रताप झालावाड़ महाराज के भानजे थे। अपने भानजे को अपने प्राप्य अधिकार से वंचित होते देखकर झालावाड़-नरेश से न रहा गया। उन्होंने कृष्णजी के साथ अन्यान्य सरदारों को एकत्र कर सलाह की और फिर राज्य की प्रजा का रुख देखा। कुमार प्रतापसिंह को उनका उचित अधिकार देने के लिए सब लोग उतावले हो गये और सबने महाराणा उदयसिंह की दुर्बलता की निन्दा की। राज्य के सामन्त सदस्यों और प्रजा-समष्टि की राय के अनुसार प्रतापसिंह को गद्दीनशीन करने की तैयारियाँ भीतर-ही-भीतर होने लगीं। जगमल का पक्षपात करने वाले इने-गिने लोग ही थे।
इधर जिस मुहुर्त से राज्य का शासन भार जगमल के हाथ में आया, उसी मुहुर्त से उसे राजमद का भयंकर नशा हो गया। वह सीधे पैर ही न रखता था। स्वभाव का उद्दण्ड, राजनीति में अनजान, लोगों के स्वभाव से अपरिचित, लड़ाई के नाम से घबड़ाने वाला महामूर्ख जगमल सभासदों को संतुष्ट न कर सकता था। उसके रूखे और अमानुषिक बर्ताव से सब लोग तंग आ गये। उसने भी शासन की बागडोर अपने हाथ में पाते ही अनियंत्रण का घोड़ा तेजी से बढ़ाया। फल यह हुआ कि अपने सवार को लेकर घोड़ा कुराह चलने लगा, काँटों और झाड़ियों में अड़ने लगा। जगमल की स्वतंत्रता ने घोर अत्याचार का रूप धारण किया। उससे सभासद सरदार-राजपूतों के दिलों में सख्त चोट लगी। कुछ एक ने तो घबड़ाकर राज्य में ही रहना छोड़ दिया।
राज्य में इस तरह के उपद्रव देखकर स्वदेश के सहृदय भक्त प्रताप से न रहा गया। एक दिन वे जगमल के पास गये और बड़े स्नेहपूर्ण शब्दों में समझाते हुए कहा, ‘‘जगमल, ईश्वर की इच्छा से आज तुम विशाल जन समूह के शासक हो। लाखों मनुष्यों के भाग्य-विधाता हो। परन्तु तुम्हें स्मरण रखना चाहिए, अधिकार के माने ये नहीं हैं-कि स्वेच्छाचार किया जाय, निरपराध मनुष्यों से तुम अपनी शक्ति की थाह लो। देखो तो सही, तुम्हारे अनेक सभासद राज्य छोड़कर चले जा रहे हैं। क्या अत्याचार करके अपनी प्रजा को सन्तुष्ट करोगे ? तुम्हें अपना स्वभाव बदलना चाहिए। समय बड़ा नाजुक है। अगर तुम नहीं सुधरे तो तुम्हारा और तुम्हारे राज्य का भविष्यफल बड़ा विषमय होगा।’’

प्रताप की संवेदनासूचक उक्तियों से मदान्ध जगमल होश में नहीं आया, बल्कि उसने इसे अपनी राजसी शान के खिलाफ अपमान समझा। कड़ककर उसने कहा, ‘‘तुम मेरे बड़े भाई हो सही, परन्तु तुम्हें स्मरण रहे कि तुम्हें मुझे उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं हैं। तुम मेरी आज्ञा के अनुचर हो। मैं नादान नहीं हूँ और न किसी बनिये के घर से उठाकर लाया हुआ, महाराणा उदयसिंह का गोद लिया लड़का ही हूँ। राजा-महाराजओं के यहाँ का बर्ताव उनके कार्य मुझे न सिखलाओ, पिताजी ने कुछ समझकर ही मुझे राजगद्दी दी है।’’
प्रताप- ‘‘जगमल।’’
जगमल- ‘‘प्रताप, तुम महाराणा की शान के खिलाफ पेश आये हो। तुम्हें मैं इसका यथोचित दण्ड दूँगा। तुम आज ही मेरे राज्य की सीमा से बाहर हो जाने का प्रबंध करो।’’
एक प्रकार के सम्मान के ज्ञान के प्रताप की आँखों को बरबस झुका दिया। वे चुपचाप वहाँ से चल दिये। उस समय इधर-उधर से कुछ नौकर प्रताप और जगमल की बातों को कान लगाये सुन रहे थे। जगमल की कठोर दण्डाज्ञा को सुनकर सब चौंक उठे। यह सबको बुरा लगा। वे आपस में जगमल की नीचता की समालोचना करने लगे। धीरे-धीरे फैलती हुई बात सरदारों के कानों तक पहुँची। उधर प्रताप ने किसी दूसरे से कुछ भी न कहा जैसे कुछ हुआ ही न हो। परन्तु उनकी मुखाकृति उत्तरोत्तर गंभीर होती चली गया, जैसे प्रभात के सूर्य-रश्मि पर मेघों की छाया आ पड़ी हो। प्रताप अपने अशवागार में गये और घोड़े को कसने की आज्ञा दी। इधर सरदारों को जगमल की नुष्ठुर आज्ञा का हाल मालूम होते ही सबके-सब प्रताप को खोजने लगे। प्रताप नगर को पारकर कुछ दूर चले गये थे। उस एकान्त स्थान में चन्दावत कृष्ण ने प्रताप को पीछे से पुकारा, प्रताप ने भी घोड़े को रोक लिया। बहुत समझाने पर चन्दावत कृष्ण के साथ वे लौटे।
प्राय: सभी सरदार जगमल से नाराज थे, प्रताप के लौटने पर चन्दावत कृष्ण ने जगमल की नीचता का प्रमाण पेश करते हुए उसे राज्य-संचालन करने के आयोग्य ठहरा, गद्दी से उतार उस पवित्र सिंहासन पर सिसोदिया-कुल-सूर्य, पावन चरित्र महाराणा प्रतापसिंह को बैठाया और उनकी अधीनता में रहकर राज्य का संचालन और अपनी जाति, धर्म और देश की रक्षा करने की प्रतिज्ञा की। सब सरदारों ने एक स्वर से महाराणा प्रतापसिंह की जय घोषणा की। महाराणा प्रतापसिंह के शासन-भार ग्रहण करने का संवाद पा राज्य की समस्त प्रजा को हर्ष हुआ। सब लोग अपने नवीन महाराणा को अनेक प्रकार की भेंटे देते हुए अपने हृदय की निश्चल सेवा की सूचना देने लगे। महाराणा प्रताप के राजसिंहासन पर बैठते ही मानो राज्य के शरीर में एक नवीन जीवन का संचार हो गया, चारों ओर सजीव स्फूर्ति का कलरव होने लगा।
रवीन्द्र के गीत – संगीत और उनका पुष्प प्रेम

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुख, व्यथा – वेदना, आशा – आकांक्षा, आनंद – विषाद, अनुभूति – उपलब्धि आदि विभिन्न प्रकार के भाव मिलते हैं। उनके गीतों में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन और कला, रूप और रस की आनंद धारा है। प्रेम रस से सिंचित, विरह के स्वर में डूबा, आनंद का प्रकाश उड़ेलती, पूजा का नैवेद्य रूप और प्रकृति के विभिन्न रूपों का चित्रण उनके काव्य में मूर्त रूप ले लेता है। इसके अतिरिक्त दमन करने वाले को सावधान कर दुर्बल और शोषित वर्ग को उससे लड़ने का साहस प्रदान करने का आह्वान किया है। कविगुरू के गीत मनुष्य को एक अतीन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाते हैं। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करते अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर – माधुर्य, भाव-गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
कविगुरू की संगीत संपदा सभी वर्गों के लिए है। यह यौवन का भोज्य और बुढ़ापे का साथी है। उनके गीतों में प्रायः अढा़ई हजार गीतों में 67 प्रकार के उद्भिदों और फूलों का उल्लेख 687बार हुआ। उनके काव्य में 108 प्रकार के पेड़ पौधों के विषय में वर्णन आया है। सभी प्रकार के सुंदर, सुगंधित, बहारी फूलों का तो प्रयोग किया ही गया है साथ ही अवहेलित और ग्राम्य फूलों जैसे कचालू सहजन, वन मल्लिका, सरसों, ताड़, दूब आदि को भी नहीं छोड़ा है। मधुमंजरी, नीलमणि, हिमझूरी, ताराभरा, हर सिंगार आदि के नामकरण कविगुरू ने किए हैं।
“तुमि आमाय डेकेछिले छूटिर निमंत्रणे” (प्रेम – 288)
ये बहुत ही परिचित गीत है जिसके साथ मनुष्य का आत्मिक संबंध मिलता है। इसी गीत के अंतरे में है – – –
“चाइलो रवि शेष चाओवा तार कनकचांपार वने” कवि कनकचांपा से बहुत परिचित हैं कि दिन के अवसान की व्याख्या के समय उनकी लेखनी से इस तरह की पंक्तियों निकली। पेड़ – पौधों को रवींद्र नाथ ने आत्मा और हृदय से जोड़ा। कनकचांपा का पेड़ ऊंचे कद और प्रशस्त पत्तों से युक्त है जिनमें सूर्य किरणों की रश्मियां बहुत देर तक रह जाती है जो इसी पेड़ विशेष पेड़ के लिए ही संभव है। वि
जीवंत और मानवीय गुणों से सम्पन्न उद्भिद और वनस्पतियों पर कवि ने अपनी लेखनी खूब चलाई है।
कवि का पुष्प प्रेम का जन्म निश्चित ही उनका बाल्यकाल ही रहा है किंतु जब उन्होंने शिक्षायतन शांतिनिकेतन का निर्माण किया तो फूलों के प्रति उनके अगाध प्रेम का पता चलता है।
रवींद्र नाथ की पुत्रवधु प्रतिमा देवी ने कवि के पुष्प प्रेम की आंतरिक झलक को उजागर किया है। उन्होंने लिखा है, “उत्तरायण के पेड़ – पौधे उन्हें अत्यंत प्रिय थे। सेमल का पेड़ (कोणार्क के सामने) किस तरह बढेगा, कौन सी खाद देनी होगी, उसमें कौनसी लता लगाने से उसका सौंदर्य बढेगा, इन विषयों पर उनकी सतर्क दृष्टि सदैव परिलक्षित होती थी। कोणार्क के पीछे की जमीन में कंटिकारी एवं विविध प्रकार के कांटों के पौधों को लगाया गया। – – – – फूलों के नये नये नामकरण किए गए। कुछ तो कोपाई नदी के किनारे लगे हैं, कई फूलों की उनकी अच्छी सुगंध, अच्छे वर्ण के कारण लगवाते, कहते – – ये ये फूल ले आओ। शांतिनिकेतन में लगाए गए। एक जंगली फूल शायद कोपाई से लाया गया था उसका नाम दिया “वन पुलक”। उसे “उदीचि” गृह के पास लगाया गया – अभी भी वह वहाँ है। (रवीन्द्र नाथेर पुष्प प्रीति, प्रवासी, माघ 1363)
श्री देवी प्रसन्न चट्टोपाध्याय ने लिखा है कि सन् 1901 में गुरुदेव रवीन्द्र नाथ अपनी पत्नी और पुत्र के साथ शांतिनिकेतन चले गए। शालविथि, माधवी कुंज आदि का निर्माण किया। (शांतिनिकेतन, उत्तरायण, माघ 1395)

प्रसिद्ध पुष्प वैज्ञानिक डॉ देवी प्रसाद मुखोपाध्याय ने बांग्ला भाषा में” रवींद्र संगीते प्रयुक्त उद्भिद औ फूल” में रवीन्द्र नाथ के गीतों में प्रयुक्त फूलों और पेड़ – पौधों पर साहित्यिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चर्चा की है।प्रस्तुत पुस्तक का हिंदी अनुवाद मैंने डॉ देवी प्रसाद मुखोपाध्याय के निर्देशन में किया जिसे बाउलमन कोलकाता प्रकाशन ने ” रवींद्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल” शीर्षक से प्रकाशित किया।इस पुस्तक में रवीन्द्र नाथ द्वारा प्रयुक्त लगभग 120 फूलों और पेड़ – पौधों के रंगीन चित्र भी दिए गए हैं।
रवीन्द्र नाथ का पुष्प प्रेम वास्तव में उनकी सचेतनता का प्रकृष्ट प्रमाण है। वे बहुत ही सहज होकर लिखते हैं – – ऐ मालती लता दोले पियाल तरूर कोले पूब हावाते अर्थात पूर्वी हवा से पियाशाल पेड़ की गोद में मालती की लता हिलडुल रही है। फूलों के साथ उनकी घनिष्ठता, उनकी उपमाएं, चित्र आदि जिस तरह से मिलते हैं वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। कदंब उनके लिए वर्षा कालीन अंधकार में रौद्र दिनों की स्मृति, केवड़ा निषेध के बेड़े में घिरा अमृत स्पर्श, कामना की प्रतिरूप अशोक मंजरी, जूही फूल के हृदय में युगों युगों की वेदना का भार बनकर ही चित्रित हुआ है।
हम साधारण मनुष्य हैं – – हमें तो स्वयं से भी प्रेम करना नहीं आता – – – विश्व प्रकृति से प्रेम करना तो बहुत दूर की बात है। फिर भी प्रकृति जिसके पास इस रूप में निकट आ गयी हो उसके लिए जीवन में प्राप्ति और अप्राप्ति का विषय बहुत ही तुच्छ हो जाता है। बड़े होने के साथ साथ कई संघर्षों से पाला पड़ता है परंतु इस प्रकार का अपरिमेय और निश्छल प्रेम हम कहां प्राप्त कर सकते हैं। रवींद्र नाथ के गीत संगीत की दुनिया वास्तव में सोने की छड़ी छू जाने जैसी ही हैं। रवीन्द्र जयंती पर कविवर को प्रेम अभिव्यक्ति के कुछ शब्दार्पण अर्पित करती हूँ।रवीन्द्र नाथ को उनकी समग्रता में जानने और समझने के लिए दूसरा जन्म भी कम है , बहुत ही कठिन साध्य है।
ऐतिहासिक विरासत बचाने के साथ कलाकारों को हक़’ दिला रहे समर्थ चतुर्वेदी
मथुरा : समर्थ चतुर्वेदी द्वारा शुरू किया गया स्टार्टअप मैत्रेय इंक कलाकारों को मुफ़्त में अपने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आने और अपने उत्पाद बेचने का मौक़ा देता है। इसके लिए कंपनी कलाकारों से मात्र 2 प्रतिशत कमीशन चार्ज करती है। मैत्रेय के ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर 700 से ज़्यादा नायाब उत्पाद और 2000 से अधिक कलाकृतियाँ मौजूद हैं। दशकों से भारतीय कलाकारों और चित्रकारों के साथ अपनी कला को आर्थिक रूप से भुनाने की चुनौती रही है। जो एजेंसियां और आर्ट डीलर्स उनके उत्पाद बाज़ार तक पहुंचाते हैं, वे कलाकारों से भारी कमीशन चार्ज करते हैं और उनका शोषण करते हैं। इतना ही नहीं, कई बार ये बिचौलिए नवीन उत्पादों को भी ऐंटीक या प्राचीन बताकर ग्राहकों को ठगते हैं और कलाकारों का श्रेय और हक़ उनको नहीं मिल पाता। समर्थ चतुर्वेदी ने इस परिदृश्य को बदलने के उद्देश्य के साथ मैत्रेय नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। समर्थ, योर स्टोरी के ब्रैंड्स ऑफ़ इंडिया 2019 कार्यक्रम के विजेता हैं। 28 वर्षीय समर्थ की परवरिश मथुरा में हुई और उनके पिता भी कलाकारों और चित्रकारों के साथ काम करते थे। उन्होंने पाया कि उनके पिता कलाकारों को उनकी कला की सही क़ीमत दिलाने में मदद करते थे। समर्थ का फ़ैमिली बिज़नेस भी इस बाज़ार से ही जुड़ा था और उनका परिवार पत्थर, तांबे और टेराकोटा से बने उत्पादों को बनाते थे और उन्हें सीधे म्यूज़ियम्स (संग्रहालयों) या प्राइवेट कलेक्टर्स को बेचते थे। इस तरह के बिज़नेस मॉडल से बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो जाती थी और कलाकारों को फ़ायदा होता था। समर्थ के पारिवारिक व्यवसाय को बड़ा नुकसान पहुंचने लगा और उन्हें यह बिज़नेस बंद करना पड़ा। इसके बाद समर्थ ने फ़ैसला लिया के वह अपनी मार्केटिंग की नौकरी छोड़कर, अपने फ़ैमिली बिज़नेस को फिर से खड़ा करने का प्रयास करेंगे। वह कहते हैं, “मुझे अभी तक याद है कि मेरे पिता काफ़ी तनाव में थे, जब उन्हें बिज़नेस बंद करना पड़ा। इस दौरान ही मुझे लगा कि अपने इकनॉमिक्स, बिज़नेस डिवेलपमेंट, रिसर्च और डिजिटल मार्केटिंग के स्किल्स और अनुभव का इस्तेमाल करके अपने फ़ैमिली बिज़नेस को फिर से स्थापित कर सकता हूं।”
इस उद्देश्य के साथ ही, 2010 में उन्होंने मैत्रेय इंक की शुरुआत की और देशभर के 145 चित्रकारों और 70 मूर्तिकारों को अपने स्टार्टअप से जोड़ा। अपने पिता बिरेंद्र नाथ चतुर्वेदी की मदद से उन्होंने 700 से अधिक नायाब मूर्तियों और 2000 कलात्मक उत्पादों का कलेक्शन तैयार किया। समर्थ और उनके पिता ने बिना किसी बाहरी निवेश की मदद के यह कलेक्शन तैयार किया। समर्थ कहते हैं कि उन्होंने बाहरी निवेश के लिए इसलिए कोशिश नहीं की क्योंकि यह मार्केट अभी उतना तैयार नहीं था और बड़े निवेशकों को इसमें ख़ास आकर्षण भी नहीं था। उन्होंने बताया कि इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस समर्थ के पास आते रहते हैं और उनके काम से जुड़ने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं।
अपने बिज़नेस मॉडल के बारे में जानकारी देते हुए समर्थ बताते हैं कि उनके स्टार्टअप ने कलाकारों को बिना किसी फ़ीस के अपने ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर आने का मौक़ा दिया और अधिक से अधिक कलाकारों तक पहुंचने के लिए उन्होंने सरकार की मदद ली। फ़िलहाल मैत्रेय के पास 35 लोगों की टीम है और हाल ही में, कंपनी को चीन और थाइलैंड से 5 करोड़ रुपए का ऑर्डर मिला है। समर्थ ने बताया कि एक समय पर उनकी कंपनी का 36 करोड़ रुपए सालाना टर्नओवर था, लेकिन किसी वजह से उन्हें अचानक काम बंद करना पड़ा, लेकिन अब धीरे-धीरे कंपनी का काम फिर से लय में आ रहा था और फ़िलहाल उनका सालाना टर्नओवर 1.4 करोड़ रुपए तक है।
मार्केट की स्थिति के बारे में बात करते हुए समर्थ बताते हैं, “ज़्यादातर डीलर्स कलाकारों से उनके उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए बहुत अधिक फ़ीस लेते हैं और उत्पाद की बिक्री होने पर 70 प्रतिशत तक हिस्सा कलाकारों को मिल पाता है। जबकि अगर डीलर्स मुफ़्त में कलाकारों को अपने प्लेटफ़ॉर्म पर उत्पाद प्रदर्शित करने देते हैं तो बिके हुए माल का 60 प्रतिशत तक हिस्सा वे ख़ुद रख लेते हैं। इन डीलर्स और एजेंसियों से इतर मैत्रेय कलाकारों को मुफ़्त में अपने उत्पाद ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर प्रदर्शित करने की छूट देता है और माल की बिक्री होने पर सिर्फ़ 2 प्रतिशत तक ही कमीशन चार्ज करता है और 98 प्रतिशत हिस्सा कलाकारों को जाता है।” मैत्रेय न सिर्फ़ कलात्मक उत्पादों की बिक्री करता है, बल्कि कला के संरक्षण की दिशा में भी काम करता है। मैत्रेय ने साइंस और आर्ट्स के बारे में पढ़ाने के लिए एक शिक्षण संस्थान भी शुरू किया है। मैत्रेय की कोशिश है कि मथुरा स्कूल ऑफ़ आर्ट्स को रीक्रिएट किया जाए। कंपनी इस तरह से ऐतिहासिक विरासतों और लुप्त होती कलाओं को बचाने के लिए तरह-तरह के प्रयास करती रहती है।
समर्थ कहते हैं, “वह चाहते हैं कि नज़रअंदाज़ करने की वजह से पूरी तरह से ख़त्म हो चुकीं ऐतिहासिक कलाओं को फिर से मुख्यधारा में लाया जाए। हम कला को उनके सही कद्रदानों तक पहुंचाना चाहते हैं। हम जल्द ही बाहरी निवेश के लिए प्रयास शुरू करेंगे और अपने बिज़नेस को तेज़ी के आगे ले जाने की कोशिश करेंगे।
(साभार – योर स्टोरी)
निवेश के फैसलों में महिलाओं की भूमिका और बड़ी होनी चाहिए : बफे
ओमाहा (अमेरिका) : अमेरिका के विख्यात निवेशक वारेन बफे ने शनिवार को कहा कि वित्तीय निवेश के मामलें में महिलाओं की भूमिका और ऊंची होनी चाहिए। अरबपति बुफे ने आमाहा में अपनी कंपनी बर्कशायर हैथवे की सालाना बैठक के दौरान महिला निवेशकों के अलग से आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति अप्रत्याशित रही।
वैरिएंट पर्सपेक्टिव (भिन्न परिप्रेक्ष्य) नाम से इस बैठक का आयोजन अमेरिका में वित्तीय क्षेत्र में काम करने वाली कुछ महिला पेशेवरों ने किया था। इसका उद्येश्य निवेश के कामलों में महिलाओं को और बड़ा स्थान दिलाना है। बफे ने इस लक्ष्य के बारे में टिप्पणी की, ‘ बहुत लम्बे समय से इसकी प्रतीक्षा है।’’ उन्होंने कहा,
‘ जब कोई बाहर से मुझे निवेश के किसी सुझाव को लेकर बात करता है तो मैं यह नहीं पूछता कि वह पुरुष है या स्त्री, (क्यों कि) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।’ बफे ने कहा, ‘ प्रतिभूति यह नहीं जानती कि उसका मालिक कौन है। वैरियंट पर्सपेक्टिव के अनुसार अमेरिका में केवल तीन प्रतिशत निवेश कोष ही महिलाओं के स्वामित्व में हैं। एक निवेश कोष चला रहीं महिला लॉरा रिटेनहाउस ने कहा, ‘ यह हैरानी की बात है कि अमेरिका में 60 प्रतिशत सम्पत्ति महिलाओं के हाथ में है पर वे देश में एक ऐसी महिला नहीं ढूंढ पातीं जो उनके निवेश कोष का प्रबंध कर सके।’




