Sunday, July 5, 2026
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90 साल की उम्र में जताई अपने पैसे कमाने की चाह, आज हाथों-हाथ बिकती है इनकी बर्फियां!

चंडीगढ़ :  93 साल की हरभजन कौर अपने हाथों से बनाई बेसन बर्फी जब चंडीगढ़ के साप्‍ताहिक ऑर्गेनिक मार्केट में भेजती हैं तो मिठास का वो ज़ायका हाथों-हाथ बिक जाता है। बमुश्किल तीन साल पहले उन्‍होंने बर्फी बेचकर अपनी जिंदगी की ‘पहली कमाई’ की थी और उससे हासिल खुशियों ने उन्‍हें रसोई के रास्‍ते सुख की एक अनदेखी, अनजानी डगर पर डाल दिया। हरभजन कौर अमृतसर के नज़दीक तरन-तारन में जन्‍मी थी। फिर शादी के बाद अमृतसर, लुधियाना रही और करीब दस साल पहले पति की मौत के बाद वे कुछ समय से अपनी बेटी के साथ चंडीगढ़ में रहने लगी। एक रोज़ बेटी ने यों ही उनके दिल की थाह लेनी चाही और पूछ लिया – ”कोई मलाल तो नहीं न है आपको, कोई चाहत तो बाकी नहीं, कहीं आने-जाने या कुछ करने-देखने की इच्‍छा बाकी हो तो बताओ। जैसे वे इस सवाल का इंतज़ार ही कर रही थी। ”बस, एक ही मलाल है … मैंने इतनी लंबी उम्र गुज़ार दी और एक पैसा भी नहीं कमाया। माँ का मन टटोलने के बाद इस बेटी ने अगला सवाल दागा – ”आप क्या कर सकती हो, कैसे कमाना चाहोगी वो पहला रुपय्या?”
इस सवाल का जवाब नब्‍बे बरस की मां ने जो दिया उसे दोहराते हुए बेटी का गला आज भी भर आता है। आंखों में उतर आए सैलाब को किसी तरह संभालते हुए वह बताती हैं कि माँ ने उस रोज़ अपना ‘बिज़नेस प्‍लान’ बताया – ”मैं बेसन की बर्फी बना सकती हूँ। घर में धीमी आंच पर भुने बेसन की मेरे हाथ की बर्फी को कोई तो ख़रीददार मिल ही जाएगा …. ”
नज़दीकी सैक्‍टर 18 के ऑर्गेनिक बाज़ार से परिवार वालों ने संपर्क साधा और वहां से मिला 5 किलो बेसन बर्फी का पहला ऑर्डर। बर्फी तो हाथों-हाथ बिक गई और हरभजन ने अपनी उस बेशकीमती पहली कमाई को मुट्ठी में महसूस करते हुए बस इतना ही कहा था – ”अपने कमाए पैसे की बात ही कुछ और होती है।” फिर उस कमाई को उन्‍होंने अपनी तीनों बेटियों में बराबर बांट दिया।
घरवालों ने सोचा माँ को तसल्ली हो गई होगी। लेकिन वो तो अब अपने इस ‘हुनर‘ को आगे बढ़ाने की इच्छा पाल बैठी थी। देखते-देखते मुहल्ले-पड़ोस, परिचितों तक बर्फी की शोहरत पहुंचने लगी और हरभजन कौर ‘ऑर्डर’ पर अपने घर की रसोई में और कई चीज़ें भी बनाने लगी। बादाम का शरबत, लौकी की आइसक्रीम, टमाटर चटनी, दाल का हलवा, अचार वगैरह भी अब इस जुनूनी माँ की ऑर्डर लिस्‍ट के रास्‍ते सप्‍लाई होने लगे। हालांकि ऑर्डर पूरा करने की रफ्तार धीमी होती है, मगर जब ज़ायके में भरा हो अद्भुत स्‍वाद तो हर कोई इंतज़ार की लाइन में लगने को तैयार हो जाता है। वे खुद जुटती हैं अपने ऑर्डर निभाने। घर में काम के लिए आने वाली सहायिका या बेटियों-नातिन को कुछ भी छूने या हाथ बंटाने की भी छूट नहीं होती। मेवे-मगज बीनने, छांटने, धोने-सुखाने से लेकर खर्रामा-खर्रामा आंच पर स्‍वाद और सुगंध की कीमियागिरी चलती रहती है। जिस बेसन बर्फी के दम पर हरभजन ने इस पकी उम्र में यह निराला सफर शुरू किया है उसे बनाना उन्‍होंने अपने पिता से सीखा था, यानी करीब सौ साल पुरानी रेसिपी का स्‍वाद आज भी जिंदा है। अपनी कुछ रेसिपी वे अपने शैफ नाती को सौंप चुकी है, जो अपने रेस्‍टॉरेंट में पंजाब की इस खान-पीन विरासत को हमेशा के लिए सुरक्षित कर चुका है।
इस बीच, चंडीगढ़ की बेसन बर्फी वाली हरभरजन कौर के कद्रदान शहर में बढ़ने लगे हैं। शहर में रहने वाली एक आरजे खुश्‍बू, जो हर हफ्ते ऑर्गेनिक बाज़ार से अपनी किचन के लिए ख़रीददारी करती हैं, पिछली दफा बर्फी खरीदने के बाद बोली ”सब्जियों, फलों, दालों, शहद और तेल के साथ-साथ इस बार बर्फी लेकर जाते हुए मुझे अहसास हुआ है उस जज्‍़बे, जुनून, उस दीवानगी और गरमाइश का, जो इन तमाम उत्‍पादों में समायी होती है। और बर्फी का तो क्‍या कहना, सीधे दादी-माँ का खज़ाना है।”हरभजन कौर की नातिन को नानी के जुनून पर इतना फख्र है कि उसने बाकायदा ‘हरभजन’ ब्रांड नाम उनके व्‍यंजनों को सुझाया है और एक खूबसूरत-सी टैगलाइन भी सोच ली है – ”बचपन की याद आ जाए।”
अब जब नानी बढ़ चली हों ‘ऑन्‍ट्रप्रेन्‍योरशिप’ की राह पर, तो नातिन भी कहां पीछे रहने वाली है। जल्‍द उसकी शादी है और वो खास मेहमानों को हलवाई की मिठाई नहीं बल्कि नानी के हाथ की बर्फी देने की ठान चुकी है। और उनकी रसोई से उठती महक बता रही है कि नानी अपनी लाडली की इस फरमाइश को पूरा करने में जुट चुकी हैं। उन्हें कुछ साबित भी नहीं करना। वे तो उन छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करने की दास्तान हैं जो अक्सर हमारे सीनों में कहीं अटकी रह जाती हैं।
उनकी कहानी पकी उम्र में स्वाभिमान, आत्मसम्मान और अनंत ख़ुशियों को हासिल करने की तरकीब सिखाती है। हरभजन कौर की इस कहानी को जानने-सुनने के बाद कुछ लोगों ने ऐसा ही कुछ अपने पेरेंट्स के लिए भी करने की इच्‍छा जतायी है। उन्‍हें लगता है यह उस उम्र में बुजुर्गों को सशक्‍त और समर्थ बनाने का एक तरीका हो सकता है जब वे खाली रहते-रहते कभी खुद से ही नाराज़ हो जाते हैं तो कभी चिड़चिड़े बन जाते हैं, या और कुछ नहीं तो अपनी बीमारियों को ही जीने लगते हैं। लेकिन इस तरह उन्‍हें ‘एम्‍पावर्ड’ बनाकर समाज के लिए उपयोगी बने रहने की भावना से भरा जा सकता है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

सरलीकृत शिक्षा ने किया बेड़ा गर्क, फारसी पढ़कर तेल बेचना गलत नहीं

अपराजिता फीचर डेस्क
इन दिनों बेरोजगारी की खूब चर्चा है जो आँकड़ों के मुताबिक सबसे ऊँचे स्तर पर जा पहुँची है मगर सच तो यह है कि बेरोजगारी का मामला शिक्षा और हमारी सोच को बदले बगैर सुलझने वाला नहीं है। हमने शिक्षा को सरल बनाने के नाम पर न सिर्फ शिक्षा का बेड़ा गर्क किया है बल्कि बच्चों को ही ऐसा पंगु बना दिया है कि वे जब युवा बनते हैं तो जीवन की चुनौतियों का सामना कर ही नहीं पाते हैं।
हम हर बार यहकहा जाता है कि शिक्षा का आधार योग्यता, जानकारी और मेधा होती है मगर इन दिनों हर चीज का आधार अंक हैं। इसी आधार पर दाखिला होता है और इसी आधार पर मिलती है नौकरी। नतीजा यह है आज शिक्षा का आधार ज्ञान या जानकारी प्राप्त करना नहीं बल्कि येन – केन प्रकारेण नौकरी के लिए अंकों का जुगाड़ करना है। अंकों को लेकर प्रतिस्पर्द्धा का आलम यह है कि अपने बोर्ड की सफलता का प्रतिशत अधिक से अधिक दिखाने के लिए बोर्ड सबसे अधिक जोर किसी तरह पास प्रतिशत बढ़ाने में लगाते हैं। नतीजा यह है कि 90 या 97 प्रतिशत परिणाम होता तो है मगर जब बात योग्यता की होती है तो सारे सितारे खो जाते हैं। हर साल मेधातालिका में टॉपर्स के नम्बर बढ़ते हैं मगर वे कितने कुशल हैं, जीवन की आने वाली चुनौतियों का सामना करने में कितने सक्षम हैं, व्यावहारिक तौर पर अपनी सूचना और जानकारी को जीवन में किस कदर उतार पाते हैं, ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनसे भागने की कोशिश ही करते हुए तमाम बड़े दिग्गजों को देखा गया है। स्थिति यह है कि साहित्य जैसे विषय में शत – प्रतिशत अंक आ रहे हैं मगर यह कितना समीचीन है, यह सोचने की जरूरत है। नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस (एनएसओ) की ओर से हाल ही में जारी आंकड़ें बताते हैं कि साल 2017-18 में शिक्षित पुरूषों में बेरोजगारी निरक्षर पुरूषों की तुलना में कई गुना ज्यादा थी. साल 2017-18 में जहां 2.1 फीसदी निरक्षर पुरूष बेरोजगार थे, वहीं माध्यमिक स्कूल पास पुरूष में ये दर 9.1 फीसदी रही। ट्यूशन पर निर्भरता चिन्ता का एक बड़ा कारण है। आप किसी भी बोर्ड के अव्वल विद्यार्थी से पूछ लीजिए, वह अपनी सफलता का श्रेय अपने ट्यूशन या कोचिंग शिक्षक को देना नहीं भूलता। यह जमीनी धरातल पर हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। हाल ही में किये गये शिक्षा सम्बन्धी एक वैश्विक सर्वे में भारत के बच्‍चों को लेकर एक चौंकाने वाली जानकारी सामने आयी है। इसमें बताया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा ट्यूशन भारत के बच्चे पढ़ते हैं. भारत में 74 फीसदी बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं। इनमें अधिकांश गणित विषय में सहायता लेते हैं। इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का ट्यूशन पढ़ना चिंताजनक है मगर आज दिक्कत यह है कि बच्चों के लिए अगर यह बैसाखी बन गया है तो अभिभावकों के लिए भी स्टेटस सिम्बल ही है। यह सर्वे कैंब्रिज विश्वविद्यालय की सहयोगी संस्था द्वारा कराया गया है।सर्वेक्षण में दुनियाभर के 20 हजार शिक्षकों और विद्यार्थियों से सवाल पूछे गये। इसमें से 4400 शिक्षक और 3800 छात्र भारत के थे।इसके जरिये यह पता लगाने की कोशिश की गयी कि दुनियाभर के स्कूली बच्चों और शिक्षकों की प्राथमिकताएं क्या है? भारत में कॅरियर के मामले में इंजीनियरिंग और मेडिकल सबसे लोकप्रिय क्षेत्र हैं।

भारत में 16 फीसदी छात्र और सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहते हैं और 8 फीसदी वैज्ञानिक।भाषाओं के मामले में भारतीय छात्रों की पहली पसन्द अंग्रेजी है। 84.7 फीसदी छात्र अंग्रेजी पढ़ना चाहते हैं।गणित और विज्ञान पर भारतीय छात्रों का ज्यादा जोर है। 78 फीसदी छात्रों की गणित पढ़ने में दिलचस्पी है। उसके बाद भौतिक विज्ञान 73.1 और रसायन विज्ञान 71.8 फीसदी का नंबर आता है, जबकि 47.8 फीसदी बच्‍चे कंप्‍यूटर साइंस पढ़ना चाहते हैं। अब यह सोचने वाली बात है कि क्या यह सम्भव है कि जरा भी गलती शिक्षकों को न मिले..यह सरलीकरण शिक्षा व्यवस्था को कहाँ ले जाकर छोड़ेगा..। निजी स्कूलों में वर्क एडुकेशन के नाम पर जो सिखाया जाता है, उसमें से अधिकतर तो बच्चे बाजार से खरीदते हैं, कई बार बच्चों की जगह अभिभावक ये सारे सामान बनाते हैं…सवाल यह है कि बच्चे ने क्या सीखा..कई बार यह भी शिकायत मिलती है कि शिक्षिका सीधे वह सामान बनाकर लाने को कह देती है…बच्चा न बना पाया तो अभिभावक बना देते हैं। आजकल तो बच्चों के प्रोजेक्ट पूरे करना भी एक व्यवसाय बन गया है..इस स्थिति में बच्चे क्या सीखेंगे? आज लगभग हर स्कूल समग्र शिक्षा की बात करता है, बैग का वजन बढ़ रहा है, अंक भी बढ़ रहे हैं मगर उतनी ही तेजी से बच्चों की दुनिया सिमट रही है। अधिकतर हिन्दी माध्यम स्कूलों में तो खेल के मैदान ही नहीं हैं..शारीरिक गतिविधि की कोई जगह नहीं है और जिन स्कूलों में हैं, उन स्कूलों के बच्चों के पास तो फुरसत ही नहीं है। पहले हम नोट्स लिखा करते थे तो इसी क्रम में न सिर्फ लिखावट सुधरती थी, लिखने की गति तेज होती थी बल्कि वह पाठ हमें थोड़ा -बहुत याद भी हो जाया करता था। आज जेरॉक्स कल्चर ने शिक्षा को ही जेरॉक्स बनाकर छोड़ दिया है। पहले बाजार में जब किसी प्रोजेक्ट से जुड़ी तस्वीर नहीं मिलती थी तो हम बाकायदा हाथ से बनाते थे, नतीजा यह हुआ कि थोड़ी – बहुत चित्रकला भी आ गयी थी, आज सीधे प्रिंट का जमाना है। यह न सिर्फ खर्चीला है बल्कि बच्चों की प्रतिभा को कुन्द कर कर रहा है। बच्चे बोलना नहीं सीख पा रहे, बहुत से बच्चों में अंक कम होने के कारण आत्महीनता भी आ रही है और द्वेष भी पनप रहा है। सिर्फ और सिर्फ अच्छे अंक पाने वाले बच्चों का प्रतिशत तो कम है तो जो बच्चे अंक अच्छे नहीं ला पाये…वह कहाँ जाए..? एक समय था जब परीक्षा पद्धति सख्त थी। शिक्षकों से डाँट भी पड़ती थी। बुरा लगता था मगर कभी इस बात को दिल पर नहीं लिया क्योंकि हमें यही सिखाया गया था कि शिक्षक ने अगर डाँटा है तो कुछ सोच – समझकर किया होगा..आज स्थिति यह है कि खुद अभिभावक प्रदर्शन करने लगते हैं। बच्चा क्या सीखेगा और वह शिक्षकों का आदर ही क्यों करेगा..? कॉलेजों में शिक्षकों से जिस तरह की बदसलूकी हो जाती है..वह इसी का परिणाम है।

पहले की तुलना में देखा जाए तो आज के बच्चे ज्यादा अवसादग्रस्त और हार मानने वाले हैं। अब सुना जा रहा है कि उच्च माध्यमिक की परीक्षा में उत्तर पुस्तिकाओं की परम्परा भी खत्म करने का प्रस्ताव है। प्रश्नपत्र में सीमित जगह में उत्तर लिखने होंगे। अगर प्रश्न का एक हिस्सा ऐसा होता…तब समझा जा सकता था मगर पूरे प्रश्नपत्र का संक्षिप्त कर देना तो बच्चों की बौद्धिकता और व्याख्या व लेखन शिक्षण प्रणाली पर कुठाराघात से अधिक कुछ नहीं है। हिन्दी माध्यम स्कूलों के बच्चों को अनूदित किताबों के सहारे छोड़ दिया गया है….नोट्स लिखा देने भर से शिक्षक गंगा नहा ले रहे हैं, पाठ्यक्रम भी समाप्त हो रहा है, बच्चे पास हो रहे हैं और दाखिला भी ले रहे हैं मगर इन सब के बीच जो शब्द गायब है, वह सीख पाना ही है। शिक्षा के जरिये अब न आचरण आ रहा न चरित्र, न मानवीय मूल्य, न नागरिक संस्कार, न राष्ट्रीय दायित्व एवं कर्तव्य बोध और न ही अधिकारों के प्रति चेतना। आज प्रत्येक वर्ग में शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर चिंता जताई जा रही है। शिक्षा के गिरते स्तर पर लंबी-लंबी बहसे होती है। और अंत में उसके लिए शिक्षक को दोषी करार दिया जाता है। जो शिक्षक स्वयं उस शिक्षा का उत्पादन है और जहाँ तक संभव हो रहा है मूल्यों, आदर्शों व सामाजिक उत्तर दायित्व के बोध को छात्रों में बनाये रखने का प्रयत्न कर रहा है, तमाम राजनीतिक दबावों के बावजूद। बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ जनगणना, आर्थिक गणना, बालगणना, पशुगणना, पल्स पोलियो से लेकर मतदाता सूची तैयार करना, मतगणना करना और चुनाव ड्यूटी तक तमाम राष्ट्रीय कार्यक्रमों को पूरी कुशलता से करने वाला शिक्षक इतना अकर्मण्य और अयोग्य कैसे हो सकता है? पाठ्यक्रम आधा कर दिया गया, हिन्दी साहित्य का इतिहास आधा पढ़ाया जा रहा है, भाषा विज्ञान को समेट दिया गया…प्राचीन इतिहास को गायब कर दिया गया..अब किस तरह की पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, हम. ये हमें सोचना चाहिए। द टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर बताती है कि पुरुषों की तुलना में शहरी बेरोजगार महिलाओं की संख्या और ज्यादा रही। रिपोर्ट बताती है कि 0.8 फीसदी शहरी अशिक्षित महिलाएं बेरोजगार थीं जबकि उच्च शिक्षा या उच्च माध्यमिक स्कूल पास महिलाओं में ये दर 20 फीसदी तक रही।  एनएसओ की ओर से आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) जारी किया गया था। सर्वेक्षण में श्रम बल में बेरोगाजार लोगों की संख्या के संबंध में जानकारी दी गई है। सर्वेक्षण के मुताबिक माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा या इससे ज्यादा शिक्षा प्राप्त शहरी महिलाओं में बेरोजगारी दर चार फीसदी तक बढ़ी है।

एनएसओ ने स्पष्ट किया है साल 2017-18 के आँकड़ों की गणना के लिए अलग तरीकों का इस्तेमाल किया गया है, ऐसे में इनकी तुलना पहले के आंकड़ों से नहीं की जानी चाहिए। एनएसओ चेतावनीको ध्यान में रखा भी जाए तो तमाम तथ्य बताते हैं कि बीते समय में शिक्षा के स्तर के साथ बेरोजगारी दर भी बढ़ी है। इसके साथ ही सांख्यिकी मंत्रालय की ओर से जारी आँकड़ों में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2017-18 में देश में बेरोजगारी दर बढ़कर 6.1 प्रतिशत हो गयी। अगर साहित्य से सम्बन्धी शिक्षा और उससे जुड़े रोजगार पर बात की जाये तब भी सवाल वहीं हैं। साहित्य चाहे किसी भी भाषा का हो, अँग्रेजी हो, हिन्दी हो या बांग्ला हो, उसमें शॉर्ट कट के लिए कोई जगह नहीं होती, वह व्याख्या की माँग करता है। हर बच्चा पढ़कर प्रतियोगी परीक्षा में नहीं जाता, फिर इन विषयों में कट टू कट मार्क्स या संक्षिप्त उत्तर की व्यवस्था भर से कैसे काम चल सकता है। किसी तरह पास करवाने की व्यवस्था में वर्तनी से लेकर वाक्य में अशुद्धियों की भी छूट दी जा रही है। अगर विषय साहित्य से अलग हुआ तब तो जैसे वर्तनी और वाक्य की बात करना ही गुनाह हो जाता है। जरा सोचिए, ऐसे छात्र जब शिक्षक बनेंगे तो वे बच्चों को कैसी शिक्षा देंगे? आईसीएसई में 98.54 प्रतिशत और आईएससी में 96 प्रतिशत परिणाम रहा और आईएससी में तो जो टॉपर रहे, उनको शत प्रतिशत अंक मिले… आईएससी में कोलकाता के देवन कुमार अग्रवाल (साइंस) और बेंगलुरू की विभा स्वामिनाथन (मानवशास्त्र) के 100-100 फीसदी अंक आए हैं। भारतीय बच्चे गणित में भी रट्‌टा मार रहे हैं। चार अंकों तक के जोड़-घटाव तो वो 95 फीसदी तक सही कर लेते हैं, पर लाभ-हानि के प्रश्न हल करने में सटीकता 55 फीसदी ही है। सीबीएसई और आईसीएसई के विद्यार्थियों पर क्विज नेक्स्ट एप के एक सर्वे में यह बात सामने आई है।


अप्रैल 2019 में 70 शहरों के कक्षा 6 से 10 तक के 7,500 बच्चों पर यह सर्वे हुआ और इनसे जुटाए 1 लाख 20 हजार आँकड़ों को जाँचा। रिपोर्ट कहती है कि बच्चों में रट्‌टा मारने की आदत बढ़ रही है। क्विज नेक्स्ट के फाउंडर गुरु प्रसाद होरा ने भास्कर को बताया कि प्रश्न में की-वर्ड मिलने पर ही बच्चे सही जवाब दे पा रहे हैं। प्रश्न तार्किक हो तो समस्या और बढ़ जाती है।
सर्वे में की-वर्ड आधारित सवालों की सटीकता 86% रही। बिना की-वर्ड आधारित प्रश्नों को हल करने की सटीकता 63% रही। मार्च में दुनिया की सबसे बड़ी लर्निंग कम्युनिटी ब्रेनली ने मेट्रो शहरों के 5 हजार बच्चों पर सर्वे किया था। इसके अनुसार 55% विद्यार्थी गणित और विज्ञान की परीक्षा को लेकर चिंतित थे।  अब रही बात भाषा की, जिस पर कोहराम मचा है तो यह सही है कि पाँचवीं तक मातृभाषा में शिक्षा का पक्ष और तर्क, दोनों समझा जा सकता है मगर हिन्दी पढ़ने और सीखने में अहिन्दीभाषियों को क्या परेशानी हो सकती है। हिन्दी सिर्फ राजभाषा नहीं बल्कि देश को जोड़ने वाली सम्पर्क भाषा है और रोजगार की भाषा भी है। अँग्रेजी अब भी अमीरों की भाषा ही है और दूसरे स्थान पर ही है।

लोक फाउंडेशन और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने मिलकर सर्वे किया है। जिसकी जांच सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने की है। सर्वे के मुताबिक, भारत में अंग्रेजी बोलने वाला वर्ग धनी और शिक्षित है साथ ही ज्यादातर अगड़ी जाति का है। भूगोलीय स्थिति के आधार पर जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में अंग्रेजी बोलने वालों का आंकड़ा कम हो सकता है। भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी ही है
सर्वे के मुताबिकअंग्रेजी बोलने वालों का सम्बंध धर्म और जाति से भी है। अंग्रेजी बोलने वालों में 15 फीसदी से अधिक लोग क्रिश्चियन, 6 फीसदी हिंदू और 4 फीसदी मुस्लिम हैं। अगड़ी जाति के लोग दूसरी जातियों के मुकाबले तीन गुना अधिक अंग्रेजी बोलते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या ज्यादा है। बुजुर्गों के मुकाबले कम उम्र के लोग अंग्रेजी का अधिक इस्तेमाल करते हैं। हिन्दी के बाद देश में सबसे ज्यादा अंग्रेजी बोली जाती है। हिंदी भाषा में 50 से अधिक बोलियां जैसे भोजपुरी भी शामिल हैं जिसे 5 करोड़ लोग बोलते हैं। 52.8 करोड़ भारतीयों के लिए पहली और दूसरी भाषा हिंदी है।  सर्वे के अनुसार, 6 फीसदी लोगों ने कहा कि वे अंग्रेजी बोल सकते हैं। सामने आए नतीजे कहते हैं, अंग्रेजी अभी भी शहरी भाषा मानी जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले मात्र 3 फीसदी लोग बोले कि वे अंग्रेजी बोल सकते हैं वहीं शहरी क्षेत्र में ये आँकड़ा 12 फीसदी है।
41 फीसदी अमीर वर्ग के लोग ही अंग्रेजी बोलते हैं वहीं गरीब तबके का मात्र 2 फीसदी ही ऐसा कर पाता है। अंग्रेजी बोलने वालों में ज्यादातर शिक्षित वर्ग है और ये ऐसे लोग हैं जो ग्रेजुएट हैं।

अंग्रेजी अलग-अलग भाषाई क्षेत्र के लोगों को संवाद स्थापित करने के लिए पुल की तरह काम करती है। दक्षिण के मुकाबले दक्षिण-पूर्व के राज्यों में अंग्रेजी अधिक बोली जाती है। दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों के धनी और गोवा-मेघालय के क्रिश्चियन लोग इस भाषा का अधिक इस्तेमाल करते हैं। असम सबसे बड़ा अपवाद है, यहाँ कम आय और सीमित क्रिश्चियन लोगों की संख्या होने के बाद भी अंग्रेजी का अधिक प्रयोग किया जाता है। देश में दो भाषा बोलने वाले 37.5 फीसदी और तीन भाषा वाले 11 फीसदी लोग हैं। हिंदी के साथ दूसरी भाषा बोलने वालों में मराठी और गुजराती शामिल हैं। जनगणना 2011 के मुताबिक, 2 लाख 56 लोगों की पहली, 8.3 करोड़ लोगों की दूसरी और 4.6 करोड़ भारतीयों की तीसरी भाषा भी अंग्रेजी है। यहां दूसरी भाषा से मतलब ऐसे लोगों से है जो अन्य भाषा भी जानते हैं, लेकिन प्रमुखता से अंग्रेजी या हिंदी का प्रयोग करते हैं। जाहिर सी बात है कि जो हालात हैं, उसमें रोजगार और शिक्षा को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। देखा गया है कि अव्वल अंक पाने वाले जो पढ़ते हैं, वह उद्योग जगत या किसी भी क्षेत्र में व्यावहारिक तौर पर लागू करना मुश्किल है। युवाओं के पास प्लान बी न होना और सबका एक ही पेशे के पीछे भागना न सिर्फ अभाव का कारण है बल्कि मनचाही नौकरी न मिले तो वह अवसाद का कारण है। दरअसल, वक्त आ गया है कि पढ़े फारसी बेचे तेल की उक्ति को पलटा जाये…क्योंकि तेल भी हमारी दैनन्दिन जरूरत है। यहाँ फारसी को अगर अकादमिक शिक्षा से जोड़ा जाए और तेल को रोजगारपरक शिक्षा माना जाए और इसे छोटे – छोटे से स्तर पर ले जाया जाए, तब ही समाधान निकलेगा। सरकार क्या किसी के लिए सम्भव नहीं है कि हर एक को नौकरी मिले तो फिर हम उपलब्ध संसाधनों को विकसित कर अपनी आय का जरिया क्यों नहीं बना सकते? जो कर रहे हैं, वह बेहतर और उन्नत तरीके से करें, डिग्री हासिल करने के लिए अपने हाथ का हुनर छोड़ना जरूरी तो नहीं, बल्कि आप अपने ज्ञान से उसे और बेहतर बना सकते हैं। आप मूर्तियाँ, ताले, गलीचे, दरी, बर्तन से लेकर खेती और घर बनाने जैसे अनगिनत क्षेत्रों में काम कर सकते हैं। इस तरह आप न सिर्फ खुद आत्मनिर्भर होंगे..बल्कि रोजगार सृजन में सहायक भी होंगे। एमबीए पास अगर नल ठीक करने, बागवानी की एजेन्सी खोले तो क्या बुरा है। स्नातक की पढ़ाई के बाद अगर आप हाइजीनिक तरीके से गोलगप्पे बेचते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं, वह धीरे – धीरे आपका अपना एक कैफे बन सकता है। दरअसल, मानसिक जड़ता को तोड़े बगैर किसी भी समस्या का समाधान निकलना सम्भव नहीं है इसलिए फारसी पढ़कर भी तेल बेचने में ही फायदा है।

जरूरतमंदों की मदद और सद्भाव का पैगाम देती है ईद

ईद-उल-फितर को मीठी ईद के रूप में भी जाना जाता है। हिज़री कैलेंडर के अनुसार दसवें महीने यानी शव्वाल के पहले दिन ये त्योहार दुनिया भर में मनाया जाता है। इस्लामी कैलेंडर में ये महीना चांद देखने के साथ शुरू होता है। जब तक चांद नहीं दिखे तब तक रमजान का महीना खत्म नहीं माना जाता। इस तरह रमजान के आखिरी दिन चांद दिख जाने पर अगले दिन ईद मनाई जाती है। ऐसा भी माना जाता है कि इस दिन हजरत मुहम्मद मक्का शहर से मदीना के लिए निकले थे।

क्यों मनाई जाती है ईद

मक्का से मोहम्मद पैगंबर के प्रवास के बाद पवित्र शहर मदीना में ईद-उल-फितर का उत्सव शुरू हुआ। माना जाता है कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी। इस जीत की खुशी में सबका मुंह मीठा करवाया गया था, इसी दिन को मीठी ईद या ईद-उल-फितर के रुप में मनाया जाता है। काज़ी डॉ सैय्यद उरूज अहमद ने बताया, इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार हिजरी संवत 2 यानी 624 ईस्वी में पहली बार (करीब 1400 साल पहले) ईद-उल-फितर मनाया गया था। पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बताया है कि उत्सव मनाने के लिए अल्लाह ने कुरान में पहले से ही 2 सबसे पवित्र दिन बताए हैं। जिन्हें ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा कहा गया है। इस प्रकार ईद मनाने की परंपरा अस्तित्व में आई।

सद्भाव और मदद का पैगाम देता है ये त्योहार

ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रुप से संपन्न हो या न हो, सभी एकसाथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में चैरिटी ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुरान में ज़कात अल-फ़ित्र को अनिवार्य बताया गया है। जकात यानी दान को हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। परंपरागत रूप से इसे रमजान के अंत में और लोगों को ईद की नमाज पर जाने से पहले दिया जाता है। मुस्लिम अपनी संपत्ति को पवित्र करने के रूप में अपनी सालाना बचत का एक हिस्सा गरीब या जरूरतमंदों को कर के रूप में देते हैं। विश्व के कुछ मुस्लिम देशों में ज़कात स्वैच्छिक है, वहीं अन्य देशों में यह अनिवार्य है।

परंपरा के अनुसार कैसे मनाई जाती है ईद

ईद की शुरुआत सुबह दिन की पहली प्रार्थना के साथ होती है। जिसे सलात अल-फ़ज़्र भी कहा जाता है। इसके बाद पूरा परिवार कुछ मीठा खाता है। वैसे ईद पर खजूर खाने की परंपरा है। फिर नए कपड़ों में सजकर लोग ईदगाह या एक बड़े खुले स्थान पर जाते हैं, जहां पूरा समुदाय एक साथ ईद की नमाज़ अदा करता है। प्रार्थना के बाद, ईद की बधाईयां दी जाती है। उस समय ईद-मुबारक कहा जाता है। ये एक दूसरे के प्यार और आपसी भाईचारे को दर्शाता है।

ईद-उल-फितर के मौके पर एक खास दावत तैयार की जाती है। जिसमें खासतौर से मीठा खाना  शामिल होता है। इसलिए इसे भारत और कुछ दक्षिण एशियाई देशों में मीठी ईद भी कहा जाता है। ईद-उल-फितर पर खासतौर से सेवइयां यानी गेहूं के नूडल्स को दूध के साथ उबालकर बनाया जाता है और इसे सूखे मेवों और फलों के साथ परोसा जाता है।

पानी में घिरे हुए लोग

केदारनाथ सिंह

पानी में घिरे हुए लोग
प्रार्थना नहीं करते
वे पूरे विश्वास से देखते हैं पानी को
और एक दिन
बिना किसी सूचना के
खच्चर बैल या भैंस की पीठ पर
घर-असबाब लादकर
चल देते हैं कहीं और

यह कितना अद्भुत है
कि बाढ़ चाहे जितनी भयानक हो
उन्हें पानी में थोड़ी-सी जगह ज़रूर मिल जाती है
थोड़ी-सी धूप
थोड़ा-सा आसमान
फिर वे गाड़ देते हैं खम्भे
तान देते हैं बोरे
उलझा देते हैं मूंज की रस्सियां और टाट
पानी में घिरे हुए लोग
अपने साथ ले आते हैं पुआल की गंध
वे ले आते हैं आम की गुठलियां
खाली टिन
भुने हुए चने
वे ले आते हैं चिलम और आग

फिर बह जाते हैं उनके मवेशी
उनकी पूजा की घंटी बह जाती है
बह जाती है महावीर जी की आदमकद मूर्ति
घरों की कच्ची दीवारें
दीवारों पर बने हुए हाथी-घोड़े
फूल-पत्ते
पाट-पटोरे
सब बह जाते हैं
मगर पानी में घिरे हुए लोग
शिकायत नहीं करते
वे हर कीमत पर अपनी चिलम के छेद में
कहीं न कहीं बचा रखते हैं
थोड़ी-सी आग

फिर डूब जाता है सूरज
कहीं से आती हैं
पानी पर तैरती हुई
लोगों के बोलने की तेज आवाजें
कहीं से उठता है धुआं
पेड़ों पर मंडराता हुआ
और पानी में घिरे हुए लोग
हो जाते हैं बेचैन

वे जला देते हैं
एक टुटही लालटेन
टांग देते हैं किसी ऊंचे बांस पर
ताकि उनके होने की खबर
पानी के पार तक पहुंचती रहे

फिर उस मद्धिम रोशनी में
पानी की आंखों में
आंखें डाले हुए
वे रात-भर खड़े रहते हैं
पानी के सामने
पानी की तरफ
पानी के खिलाफ

सिर्फ उनके अंदर
अरार की तरह
हर बार कुछ टूटता है
हर बार पानी में कुछ गिरता है
छपाक……..छपाक……

भाषाओं का परिर्वतन 

बालकृष्ण भट्ट 

यह एक सामान्य सिद्धांत है कि किसी भाषा पर प्रभुत्व होना या उससे अच्छी तरह परिचित हो जाना तभी लोग मानते हैं जब सीखने वाला उसी भाषा में सीख सके अर्थात चित्तवृत्ति उसके मनन करने के विषयों की उसी भाषा के रंग से ग्रहण करे। इसके मानने में किसको इनकार होगा कि हर एक भाषा के ढंग निराले ही हैं। दो भाषा व्याकरण की रीति पर कुछ मिलती भी हो परंतु वे चीजें जिनकी मुहाविरे कहते हैं कभी नहीं मिल सकते और यही मुहाविरे ही हर भाषा की जान है। हिंदी और अंगरेजी ही को लीजिए इन दो भाषाओं में थोड़ा-थोड़ा कहीं-कहीं व्याकरण के नियमों का तो भेद हई है। किंतु बड़ा भारी अंतर मुहाविरों की निराली चाल का है। जहाँ कहीं इन मुहाविरों की कोई गलती सुनने में आती हैं तो वह कान से चट खटक जाती है। यह लोग कदापि न समझै कि मुहाविरे अंगरेजी ही में हैं और जब उन पर आक्षेप होता हैं तो ‘राधा बाजार अंगरेजी’ या ‘बाबुओं की अंगरेजी’ इत्यादि शब्द तजआ निंदा की राह से कहे जाते हैं। जब तक किसी भाषा में जान है अर्थात रोजमर्रे के काम में उसे लोग वर्तते हैं और पुष्ट रीति पर उसके स्थिति बनी रहती है तब तक नये-नये मुहाविरे नित्य गले में बनते ही जायेंगे।

सृष्टि के चेतन पदार्थों का जो नियम है कि वे कभी एक सा नहीं रहते वरन दिन प्रतिदिन परिवर्तन की सान पर चढ़ते ही जाते हैं। यह नियम भाषा के संबंध में पूरी रीति पर लगता है। क्योंकि कुछ ऐसा मालूम होता है कि रुधिर और अस्थि मनुष्य के शरीर से उतना निकट संबंध नहीं रखते जितना उनकी भाषा रखती है। और इसी कारण बड़े से बड़े पंडित के आगे कोई अशुद्ध संस्कृत शब्द बोलिए तो वह इतना न खटकेगा जितना एक सामान्य से सामान्य बेमुहाविरे हिंदी शब्द कान को चोट पहुँचावेगा। क्योंकि संस्कृत अब बोल चाल की भाषा न रह गई। विचार कर देखिए तो जो हिंदी हम आजकल बोलते हैं वह पहले क्या थी और अब क्या है। अब फारसी उर्दू शब्द उसमें मिलते जाते हैं क्योंकि जब आपके बड़े-बड़े प्रामाणिक हिंदी कवियों ने फारसी अरबी के शब्द ग्रहण किए तो हमारे और आपके निकाले वे सब जो हमारी भाषा के नस-नस में अंतःप्रविष्ठ में हो रहे हैं क्योंकर निकाल सकते हैं। बल्कि, विरुद्धता दिखलाना वैसा ही है जैसा किसी वेगगामिनी नदी के प्रवाह को अकेले एक हाथ से रोककर उलट देने का प्रयत्न करना है। जिस तरह ये शब्द सर्वसाधारण अपनी भाषा में प्रचलित कर लेते हैं या जिस तरह के शब्द अपने नित्य के बोल चाल से लोग निकालकर फेंक देते हैं और उस पर आप को कुछ भी अधिकार नहीं है। आप मनुष्यों की भाषा तभी बदल सकते हैं जब जुलू या हबशी की जात का कोई आदमी इन देशों में पैदा कर सकैं या इससे भी बढ़कर कोई दूसरा प्राकृतिक अनर्थ जो सर्वथा प्रकृति विरुद्ध हो कर सकैं। क्योंकि यह कैसे संभव है कि प्रबल कालचक्र अपनी निशानी सब चीजों पर न छोड़ जाय। मुसलमानों के अत्याचार का फल जैसा हम अपनी रीति-रसम सामाजिक व्यवहार अपनी और अपने यहाँ की स्त्रियाँ की दशा सब में पाते हैं तब यह क्यों कर हो सकता है कि मुगलों की भाषा का असर हमारी भाषा में न हो।

सोचिये कि जिस हिंदी को हम बोलते हैं वह कितने हजार वर्ष से घिसते-घिसते करोड़ों टक्करें खाकर और न जानिये कौन-कौन सी मुसीबतें झेलकर न मालूम किसका-किसका जमाना देख भाल आज हमारे बोल-चाल के काम में आ रही है। यदि प्रकृति को भी हिंदी ही मान लीजिये तो देखिये कि आजकल की हिंदी से और चाँद और पृथ्वीराज के समय की हिंदी से और चाँद के समय की हिंदी से और कालिदास के समय की हिंदी से काल में कितना अंतर है क्योंकि कालिदास भवभूति प्रभृति कवियों के समय में भी संस्कृत जैसी उनके नाटकों में पाई जाती है केवल विद्धानों ही की मंडली में बोली जाती थी और वे लोग भी कवित्व शक्ति के प्रकाशक गाझिन शास्त्रार्थ के बाद घर जाते रहे होंगे तो नौकरों या लड़के बालों या स्त्रियों से (या सृष्टिसृष्टुराध्या) के जोड़ की बड़े धूम-धाम की संस्कृत न बोलते रहे होंगे। जैसा वेद की संस्कृत का व्याकरण भास बाल्मीकि तथा कालिदास आदि कवियों की संस्कृत के व्याकरण से कुछ पृथक है वैसा ही नाटक की प्राकृतों का व्याकरण चंद आदि की प्राकृतों से विभिन्न है अर्थात जो एक समय के विद्धानों की साधु भाषा थी वही किसी पूर्व समय के बेपढ़े-लिखे लोगों की भाषा रही और उस अदल-बदल में एक बात सदा ध्यान देने लायक है कि भाषा का परिवर्तन शब्दों पर इतना निर्भर नहीं जितना उसके व्याकरण संबंधी विषयों पर या मुहाविरों के अदल-बदल होने पर अर्थात नये शब्दों की भरती होने से कुछ डर की बात नहीं है बल्कि पढ़े-लिखे लोग या सर्वसाधारण उन शब्दों को अपना कर मान लें तो भाषा भी पुष्ट हो जायगी।

फारसी में देखिये तो यही हाल है अंगरेजी में देखिये तो यही हाल है। पृथ्वी की और भाषाओं में यही नियम पाया जाता है कि दूसरी भाषा के शब्द बेधड़क अपना कर लेते हैं। जैसा कोई किसी लड़के को गोद ले वैसा ही वह शब्द उसी भाषा का होकर रह जाता है। एक दूसरी विचित्र बात यह भी है एक भाषा का शब्द जब दूसरी भाषा में जाता है तो बहुधा अपने शुद्ध रूप में कभी नहीं रहता और जब ऐसा अशुद्ध शब्द भी दूसरी किसी भाषा में अच्छी तरह मिल जाता है तो उसके शुद्ध करने का प्रयत्न भी व्यर्थ ही है क्योंकि बोलने वालों के मन या जबान पर जो एक बार चढ़ गया वह कभी नहीं निकल सकता।

भाषाओं के इतिहास में आप हिंदी की दशा देखा यह मत समझ लीजिये कि भाषा की सूरत बदलने के लिए विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाना जरूरी बात है। ऐसा ख्याल करना भूल है कि अगर विदेशियों की भाषा के साथ यह भाषा टक्कर न खाये होती तो शुद्ध रीति पर बनी रहती। क्योंकि वेद की संस्कृत को नाटक और काव्यों की संस्कृति में किसने उतार दिया। या संस्कृत को प्राकृतों के रूप में किसी विदेशी भाषा के साथ टक्कर खाने ने बदल दिया। और फिर भाषा की बाहरी आकृति पर विदेशियों का कुछ असर पहुँच सकता है पर उसके भीतरी नियमों को तिलभर भी खसकाना किसी के सामर्थ्य में नहीं है। हमने ऊपर कहा कि भाषा भी संसार को इतर चैतन्य सृष्टि का नियम मानती है। इस तरह जैसा पीटने से गदहा घोड़ा नहीं हो सकता। उसी तरह बाहर वालों का संपर्क भी कुछ बहुत हानिकारक नहीं हो सकता और फिर भाषा के संबंध में (हानि) शब्द का पूरा-पूरा तात्पर्य तय करना बड़ा कठिन है क्योंकि परिवर्तन के बीज तो भाषा में आप ही आप भरे हैं। क्यों संस्कृत से प्राकृत हुई और प्राकृतों से वर्तमान हिंदी। हम लोगों का केवल इतना ही कर्तव्य है कि देखते जायँ कि क्या-क्या अदल-बदल हुआ है। अभेद्य दुर्ग सदृश पाणिनि के व्याकरण के आगे हिंदी का व्याकरण छोटी सी फूस की झोपड़ी है। ये तो प्रकट है कि अब हमें उतने बड़े व्याकरण की आवश्यकता न रह गई। एक वह समय था कि अनेक जंजालों से भरे हुए पाणिनि कात्यायन पंतजलि के सूत्र वार्तिक भाष्य में एक मात्रा का भी हेर फेर हो जाने पर एक बड़ी भारी इमारत को ढहाकर फिर से खड़ी करना था और इसी का परिणाम यह हुआ कि हमारे यहाँ का व्याकरण ऐसा झंझट से भरा हुआ शास्त्र हो गया जैसा पृथ्वी के किसी कोने में न हुआ होगा। सच पूछिये तो दो गाड़ी के बोझ की पुस्तकें शेखर मंजूषा कैयट बड़े-बड़े जगड़ जाल जो रच गये उनमें और है क्या। सिवा इसके कि कीचड़ में पाँव फिर धोओ एक बड़े यत्न और प्रयास से। एक बने बनाये सुंदर और मनोहर महल को तोड़-फोड़ छिन्न-भिन्न कर पीछे पछताय फिर उसी को बनाया है। इन्हीं विफल चेष्टाओं में व्याकरण इतना बड़ा शास्त्र हो गया जिसमें नवीन और प्राचीनों का झगड़ा पढ़ते-पढ़ते उमर की उमर बीत जाती है कोरे के कोरे मूर्ख रह जाते हैं। ऐसी सरल भाषा हिंदी में इस सब खटपट का अब कुछ काम ही न रह गया पर क्यों ऐसा हुआ यह तो आदमी तभी तैकर रखेगा। जब और भी सैकड़ों हजारों (क्यों) का उत्तर दे सकेगा जैसा क्यों मनुष्य संसार में पैदा होता है? क्यों फिर यहाँ से चला जाता है? इत्यादि, इत्यादि। अब यह प्रश्न उसके संबंध में और उठता है कि यदि भाषा की धारा ऐसे अपरिवर्तनीय इतने जोर-शोर के साथ बह रही कि उसमें चूँ भी नहीं कर सकते तो किसी समय के अच्छे-अच्छे लेखकों का क्या दबाव या अंतर उस पर होता है। इस प्रश्न का उत्तर सहज में मिल सकता है। पुरानी हिंदी को ही लीजिये पुराने ठेठ हिंदी शब्दों को कोई अच्छी तरह सोच-विचार कर लिखने वाला फिर से निज कर समाज में प्रचलित कर सकता है। अपनी निज की भाषा के कामकाजी शब्दों को मर जाने का मृतक प्राय हो जाने से बचाना अच्छे लेखकों का काम है। बाहरी भाषाओं के शब्दों को अपना-सा कर डालना जिसमें भाषा दिन-प्रतिदिन अमीर होती जाय यह भी एक बड़ा काम है और सबसे बड़ा काम है अपने भाषा के विषयों को दूना-चौगुना करते जाना अर्थात जो-जो विषय भाषा में पहले कम थे उनको जिलो देना और जो विषय कभी थे ही नहीं उनको बाहर से लाय भरती करना। इस सबका असर यह होगा कि भाषा की नमन शक्ति बहुत बढ़ जायगी अर्थात जिस तरह के विषय पहले उससे बाहर समझे जाते थे वे जल्द उसकी पहुँच के भीतर आ जायेंगे। हमारे देखते ही देखते अंगरेजी मेमों ने हिंदुस्तानी गहनों का पहिनना आरंभ कर दिया जैसा सोने की चूड़ियाँ जड़ाऊ करें आदि। इसी तरह यदि हम अपनी मातृभाषा को अंगरेजी भाषा के आभूषण से आभूषित करें तो क्या क्षति है। ऐसे प्रश्नों की मीमांसा में अभी अनेक पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष रह गये हैं उनका विचार हम दूसरे अंक में करैंगे। आगे के अंक में ग्रामीण शब्दों के गुण प्रकट किए जायेंगे।

स्वस्थ जीवन का आवश्यक आधार है योग

 शारीरिक, मानसिक और आध्‍यात्मिक अभ्‍यास के समूह को ही योग कहा जाता है। इसके अंतर्गत श्‍वसन व्‍यायाम, ध्‍यान और अलग-अलग प्रकार के आसन किए जाते हैं। नियमित रूप से योग का अभ्‍यास करने से मानसिक और शारीरिक रूप से कई लाभ मिलते है। योग शब्‍द की उत्‍पत्ति संस्‍कृत भाषा के युज शब्‍द से हुई है, जिसका अर्थ जोड़। तन और मन का जोड़ ही योग है। शारीरिक, मानसिक और आध्‍यात्मिक अभ्‍यास के समूह को ही योग कहा जाता है। इसके अंतर्गत श्‍वसन व्‍यायाम, ध्‍यान और अलग-अलग प्रकार के आसन किए जाते हैं। नियमित रूप से योग का अभ्‍यास करने से मानसिक और शारीरिक रूप से कई लाभ मिलते हैं, जिन्‍हें साइंस सही मानता है। इस लेख के माध्‍यम में हम आपको 10 ऐसे फायदे बता रहे हैं जिसे वैज्ञानिकों ने भी अपनी मंजूरी दी है।

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य : वह भारतीय गणितज्ञ, जिन्होंने आइंस्टाइन के सिद्धांत का किया सरलीकरण

प्रसिद्ध भारतीय भौतिक विज्ञानी, गणितज्ञ और शिक्षाविद प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य का गणित के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान है। सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत में योगदान के लिए उन्हें खासतौर पर याद किया जाता है। आइंस्टीन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पेचीदा गणितीय समीकरणों के रूप में व्यक्त होता है। इन समीकरणों को हल करना काफी कठिन था। प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य ने इस समीकरण को हल करने की कोशिश की और उसमें वह काफी सफल रहे। उन्होंने आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत का सरलीकरण ​करने में अहम योगदान दिया। आज उनके द्वारा विकसित विधि ‘वैद्य मेट्रिक’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस विधि में उन्होंने विकिरण उत्सर्जित करने वाले किसी तारे के गुरुत्वाकर्षण के सन्दर्भ में आइंस्टीन के समीकरणों को हल किया। उनके इस कार्य ने आइंस्टीन के सिद्धांत को समझने में मदद दी।

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य का जन्म 23 मई, 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के शाहपुर में हुआ था और उनकी प्रारंभिक शिक्षा भावनगर में संपन्न हुई। गणित में विशेष रुचि होने के कारण उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से अनुप्रयुक्त गणित में विशेषज्ञता के साथ एम.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। वैद्य अपने समय के प्रसिद्ध भौतिकविद और शिक्षाविद विष्णु वासुदेव नार्लीकर से बहुत प्रभावित थे।
उस दौर में विष्णु वासुदेव नार्लीकर के साथ कार्य करने वाले शोधार्थियों के समूह की पहचान सापेक्षता केन्द्र के रूप में विख्यात हो चुकी थी। वैद्य भी उनके दिशा-निर्देश में इस क्षेत्र में शोधकार्य करना चाहते थे। इसलिए वैद्य बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गए। वहां उन्होंने श्री विष्णु वासुदेव नार्लीकर के दिशा-निर्देशन में सापेक्षता सिद्धांत पर शोधकार्य शुरू कर दिया तथा ‘वैद्य सॉल्यूशन’ प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त की प्रासंगिकता को मान्यता साठ के दशक में मिली, जब खगोल-विज्ञानियों ने ऊर्जा के घने, मगर शक्तिशाली उत्सर्जकों की खोज की। जैसे ही सापेक्षतावादी खगोल भौतिकी को मान्यता मिली, वैसे ही ‘वैद्य सॉल्यूशन’ को सहज ही अपना स्थान हासिल हो गया और विज्ञान के क्षेत्र में वैद्य को ख्याति मिली। वैद्य एक मशहूर गणितज्ञ होने के साथ ही एक शिक्षाविद भी थे। वह चाहते थे कि गणित बच्चों के लिए सुगम व रुचिकर बने। इसके लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए। उनका मानना था कि गणित सिखाना शायद कठिन है, मगर गणित सीखना कठिन नहीं है क्योंकि यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। उन्होंने गुजराती तथा अंग्रेजी में विज्ञान और गणित की कई प्रसिद्ध पुस्तकों का लेखन किया, जैसे, ‘अखिल ब्राह्मांडमैन’, जिसका अर्थ है सम्पूर्ण ब्रह्मांड में, तथा ‘व्हाट इज मॉडर्न मैथमेटिक्स’।
वर्ष 1947 तक उन्होंने सूरत, राजकोट, मुम्बई आदि जगहों पर गणित के शिक्षक के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने अपनी शिक्षा भी जारी रखी। वर्ष 1948 में उन्होंने बम्बई विश्वविद्यालय से अपनी पी.एच.डी. पूरी कर ली। अपना रिसर्च कार्य उन्होंने नव स्थापित टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान से किया। यहीं उनकी मुलाकात प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा से हुई थी। कुछ समय बाद मुम्बई छोड़कर वह अपने गृह राज्य गुजरात लौट आए। वर्ष 1948 में उन्होंने बल्लभनगर के विट्ठल महाविद्यालय में कुछ समय तक शिक्षण कार्य किया। फिर वह गुजरात विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफेसर नियुक्त हुए। वैद्य ने अपना पूरा जीवन एक समर्पित शिक्षक के रूप में बिताया। वह हमेशा खुद को एक गणित शिक्षक कहे जाने पर गर्वान्वित महसूस करते थे। प्रशासनिक प्रतिबद्धताओं के बावजूद वह विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए समय निकाल ही लेते थे।
वर्ष 1971 में उन्हें गुजरात लोकसेवा आयोग का सभापति नियुक्त किया गया। फिर वर्ष 1977-78 के बीच वह केन्द्रीय लोकसेवा आयोग के भी सदस्य रहे। 1978-80 के दौरान वह गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। वैद्य ने गुजरात गणितीय सोसायटी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विक्रम साराभाई कम्यूनिटी साइंस सेंटर के विकास में भी उनका अहम योगदान था। इंडियन एसोसिएशन फॉर जनरल रिलेटिविटी ऐंड ग्रेविटेशन (आईएजीआरजी) की स्थापना में भी वैद्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। वर्ष 1969 में स्थापित इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष सर विष्णु वासुदेव नार्लीकर थे। उन्हें स्वतंत्रता के बाद भारत में गांधीवादी दर्शन के अनुयायी के रूप में जाना जाता है। वैद्य, गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर आजादी के आन्दोलन में भी शामिल रहे। उन्होंने गांधीवादी विचारों को अपनाते हुए खादी का कुर्ता और टोपी को धारण किया। उपकुलपति के पद पर रहते हुए भी सरकारी कार का उपयोग करने से मना कर दिया और विश्वविद्यालय आने-जाने के लिए साइकिल का ही उपयोग करते रहे। 12 मार्च, 2010 को 91 वर्ष की आयु में प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य का निधन हो गया। प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य के योगदान को देखते हुए विज्ञान संचार के लिए समर्पित संस्था विज्ञान प्रसार द्वारा उन पर एक वृत्तचित्र का भी निर्माण किया गया है।

प्राथमिक शिक्षक के एक आविष्कार से बचीं हैदराबाद की 9 झीलें

हैदराबाद :  आंध्र प्रदेश का पोचमपल्ली गाँव साड़ियों के लिए काफ़ी प्रसिद्ध है। यहाँ से सिर्फ़ 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मुक्तापुर गाँव। मछली पकड़ना इस गाँव के लोगों का मुख्य पेशा है। स्थानीय तालाबों से यहाँ के मछुआरे मछलियाँ पकड़कर बेचते हैं और अपना घर चलाते हैं लेकिन इन तालाबों में बरसात के मौसम में उग आने वाले खर-पतवार से यहाँ के मछुआरे काफी परेशान थे। ये खर-पतवार इतनी तेजी से बढ़ते कि दो-तीन दिन में ही पूरे तालाब को ढक लेते थे। इसके चलते मछलियों तक न तो सूर्य की रोशनी पहुँच पाती और न ही उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन मिल पाती। खर-पतवार हटाने के लिए इन मछुआरों को साल के 3 महीने लगातार तालाब की साफ़-सफाई करनी पड़ती।
गाँव के लगभग 100 आदमी हर दिन 150 एकड़ के तालाब की सफाई के लिए जाते और इस वजह से उनके रोज़मर्रा के दूसरे सभी काम रह जाते। यदि यह काम मज़दूर लगवाकर करवाया जाता तो कम से कम 3 लाख रुपये का खर्च होता। खर-पतवार निकालते समय गंदे पानी में जाने की वजह से गाँव के लोगों को कभी सांप काट लेते तो कभी उन्हें त्वचा से संबंधित बीमारियाँ हो जातीं। यह सिलसिला साल 2012 तक चला और फिर गाँव के ही एक मछुआरे ने खर-पतवार को हटाने के लिए एक मशीन बना दी। इसी गाँव के रहने वाले गोदासु नरसिम्हा मछुआरा होने के साथ-साथ एक प्राथमिक स्कूल में शिक्षक भी थे। तालाब साफ़ करने के लिए अक्सर उन्हें स्कूल से छुट्टियाँ लेनी पड़ती थीं और इस वजह से उन्हें स्कूल से नोटिस मिला कि अगर उन्होंने ज़्यादा छुट्टी ली तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी। नरसिम्हा ने कहा, “मेरे परिवार में मैं, मेरी पत्नी और दो बच्चे हैं। स्कूल से जो भी तनख्वाह मिलती, कम से कम उससे थोड़ी तो मदद हो जाती। मछलियाँ बेचने से कोई ख़ास कमाई नहीं हो रही थी, क्योंकि मछलियों की तादाद खर-पतवार के कारण कम हो गई थी। तब मुझे लगा कि इस समस्या का कोई स्थाई समाधान ढूँढना पड़ेगा।”
उन्होंने एक ऐसी मशीन का प्रोटोटाइप तैयार किया, जिससे खर-पतवार को न सिर्फ़ बाहर निकाला जा सकता था, बल्कि उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा भी जा सकता था, ताकि वह दोबारा न उग आए। एक मछुआरे का इस तरह मशीन बना देना शायद आश्चर्य की बात लगे, लेकिन नरसिम्हा की रुचि शुरू से ही आविष्कार में थी। सिर्फ़ 9 साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो देने वाले नरसिम्हा को उनके बड़े भाई ने पाला। उनका भाई उनसे छह साल बड़ा था। उसे पिता की जगह पी.डब्ल्यू.डी. विभाग में चौकीदार की नौकरी मिल गई थी। नरसिम्हा हमेशा से ही पढ़ाई में तेज थे और साथ ही उन्हें मशीनों से खेलने का बहुत शौक था। जो भी उन्हें जरा-सी देर में कोई मशीन खोलकर ठीक करते हुए देखता, वह यही कहता कि तुम बड़े होकर मैकेनिकल इंजीनियरिंग करना।
इसलिए नरसिम्हा ने अपने भाई से कहा कि वो उन्हें प्राइवेट स्कूल-कॉलेज में पढ़ाए। पर इस बात की तरफ उनके भाई ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसलिए वे अपने एक रिश्तेदार के यहाँ रहने लगे। वहाँ वे उनके घर का काम करते थे और बदले में जो भी पैसे मिलते, उससे अपने स्कूल की फीस भरते।
10वीं कक्षा के बाद उन्होंने डिप्लोमा करने का फ़ैसला किया और टेस्ट भी क्लियर कर लिया। सबने उन्हें मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के लिए ही कहा। पर सरकारी कॉलेज में उन्हें सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला मिला और प्राइवेट से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला लेने में उनके भाई ने उनका साथ नहीं दिया।
डिप्लोमा के पहले साल में ही दिलचस्पी नहीं होने के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और अपने गाँव में ही रहकर छोटा-मोटा काम करने लगे। उन्होंने गाँव के ही प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। उनकी शादी करवाने के बाद उनके भाई अपने परिवार के साथ हैदराबाद चले गए और नरसिम्हा गाँव में ही रह गए। जैसे-तैसे वे अपना गुज़ारा कर रहे थे। पर जब तालाब से उनकी आय का ज़रिया खत्म होने लगा, तो उनके भीतर जो एक इनोवेटर छिपा बैठा था, वह सामने आ गया। मशीन का प्रोटोटाइप तो तैयार था, लेकिन मशीन बनाने के लिए उन्हें पैसों की ज़रूरत थी।
“ऐसे में, हमारे गाँव के सरपंच और बाकी लोगों ने मदद किया। उन्होंने 20, 000 रुपए इकट्ठा करके दिए। सबसे ज़्यादा साथ मुझे मेरी पत्नी का मिला। दिन भर हम लोग तालाब की साफ़-सफाई में हाथ बंटाते और छोटे-मोटे काम करते। रात में वो मशीन बनाने में मेरी मदद करती। उन्होंने सबसे पहले ‘कटिंग मशीन’ बनाई, जिसकी मदद से वे चाहते थे कि तालाब में ही खर-पतवार को काटा जा सके। लेकिन यह मशीन तालाब के बाहर ही कामयाब थी। पानी में इसके ब्लेड काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में, उन्होंने तय किया कि एक और मशीन बनानी होगी जो खर-पतवार को बाहर भी निकाले। लेकिन फिर वही पैसों की समस्या आ खड़ी हुई।
इस बार तो गाँव के लोगों ने भी उनका सहयोग करने से मना कर दिया, क्योंकि उन्हें लगा कि उनका पैसा बर्बाद हुआ है। ऐसे में, उन्होंने इधर-उधर से पैसे इकट्ठे करने की कोशिश की और आखिरकार उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें 30,000 रुपये का कर्ज दिया। इससे उन्होंने लिफ्टिंग मशीन तैयार की। वह बताते हैं, “मशीन तो तैयार थी और कामयाब भी, पर इसको अंतिम रूप देने के लिए 10, 000 रुपये की और ज़रूरत थी। इसके लिए मैं आस-पास के गाँवों में गया और वहाँ के लोगों को बताया कि अगर वे कुछ पैसे दें तो मैं उनके गाँव के तालाब भी साफ़ कर दूंगा। पूरे इलाके में यह समस्या थी। इस तरह मैंने 10, 000 रुपये का जुगाड़ कर लिया।”
60, 000 रुपए की लागत से उन्होंने यह मशीन बनाई जो कामयाब रही। उन्होंने अपने गाँव के साथ-साथ दूसरे गाँवों के तालाबों को भी साफ़ किया। उनके बारे में जब स्थानीय अखबार में खबर आई, तो ‘पल्ले सृजना’ नामक एक संगठन ने उनसे संपर्क किया। यह संगठन नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की ही एक इकाई है, जो ग्रामीण और ज़मीनी स्तर पर होने वाले इनोवेशन को सपोर्ट करती है।
मशीन की मदद से तालाब को साफ़ किया गया
‘पल्ले सृजना’ की मदद से नरसिम्हा को अपना यह आविष्कार राष्ट्रीय मंच पर दिखाने का मौका मिला। इसके बाद, हैदराबाद नगर निगम ने उन्हें हैदराबाद के कई तालाब और झीलों की साफ़-सफाई का कार्यभार सौंपा। आर.के पुरम लेक, तौलीचौकी का तालाब सहित उन्होंने अब तक लगभग 8-9 झीलों की सफाई की है।
इसके अलावा, उनका पुनरुद्धार कार्य भी चलता रहा। उनके और उनकी मशीन के बारे में पढ़कर और भी कई लोगों ने उनसे संपर्क किया और मदद मांगी। नरसिम्हा ने बताया, “अब तक मैंने ओडिशा के एक पॉवर प्लांट के लिए मशीन बनाई है और किसानों के लिए कई मशीनें बनाई हैं। खर-पतवार हटाने की अपनी पहली मशीन में भी मैंने बहुत से बदलाव किए हैं। अब एक अच्छी क्वालिटी की मशीन की कुल लागत लगभग 30 लाख रुपए है। अगर इस तरह की मशीन आप विदेशी बाज़ारों से खरीदें तो लागत कम से कम 1 करोड़ रुपए पड़ेगी। नरसिम्हा और उनकी मशीन के बारे में यूट्यूब चैनल पर देखकर केन्या के जल, पर्यावरण एवं सिंचाई मंत्री सलमों ओरिम्बा ने भी उन्हें खर-पतवार हटाने की 10 मशीन बनाने का ऑर्डर दिया है। ओरिम्बो ने भारतीय प्रशासन से संपर्क किया और फिर अपने कुछ अधिकारियों के साथ भारत आकर नरसिम्हा की मशीन का जायजा लिया।
मशीन देखने के लिए ख़ास तौर पर केन्या के अधिकारी आये
नरसिम्हा ने कहा, “उनके मुताबिक, केन्या में भी लोग यह परेशानी झेल रहे हैं और इसलिए वे चाहते हैं कि मैं उन लोगों के लिए भी इस तरह की मशीन तैयार करूँ। मुझसे मशीन बनवाने की वजह है कम लागत। अगर वे यही मशीन बाहर से लेंगे तो उन्हें करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ेंगे।अपने इन कार्यों के लिए नरसिम्हा को भारत सरकार और राज्य सरकार से काफ़ी सराहना मिली है। साल 2015 में उनकी मशीन को राष्ट्रपति भवन में लगी प्रदर्शनी में दिखाया गया था। उन्हें नेशनल इनोवेशन अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया है।
उन्हें पुणे, चेन्नई और विशाखापट्टनम से भी मशीन बनाने के ऑर्डर मिले हैं। केन्या के प्रोजेक्ट के लिए वे जुलाई में वहां जाएंगे और वहाँ के तालाबों और झीलों का निरीक्षण करेंगे, ताकि उसी हिसाब से मशीन बना सकें।
अपनी इस सफलता का श्रेय वे अपने गाँववालों, अपनी पत्नी-बच्चे और पल्ले सृजना को देते हैं, जिन्होंने हर संभव तरीके से उनका साथ दिया। उनका कहना है कि वे आगे भी इसी तरह लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए मशीन बनाते रहना चाहते हैं। उनका सपना है कि वे गाँव में ही एक वर्कशॉप स्थापित करें।

(साभार – द बेटर इंडिया)

एस. जयशंकर बने विदेश मंत्री तो गृह मंत्रालय शाह हुए अमित,टीम पीएम मोदी की झलक

नयी दिल्‍ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए-2 सरकार का गठन हो चुका है। गत गुरुवार को हुए शपथ ग्रहण समारोह में देश-दुनिया की गणमान्‍य हस्तियों ने शिरकत की। पीएम मोदी के साथ कई कैबिनेट मंत्रियों ने भी गुरुवार को राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में आयोजित इस शपथ ग्रहण समारोह में करीब 8000 मेहमान शामिल हुए। सरकार गठन के अगले दिन शुक्रवार को मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा भी कर दिया गया, जिसके अनुसार, पहली बार मोदी सरकार में शामिल हुए अमित शाह को देश के गृह मंत्रालय की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है।कार्यों के बंटवारे के अनुसार, पिछली सरकार में गृह मंत्रालय की जिम्‍मेदारी संभालने वाले राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्रालय की जिम्‍मेदारी दी गई है। एनडीए-1 सरकार में रक्षा मंत्रालय की जिम्‍मेदारी संभालने वालीं निर्मला सीतारमण को इस बार वित्‍त मंत्रालय की जिम्‍मेदारी दी गई है। उनके पास कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का भी प्रभार है।

कैबिनेट मंत्री और उनका प्रभार

  • अमित शाह (गृह मंत्री)
  • राजनाथ सिंह( रक्षा मंत्री)
  • निर्मला सीतारमण( वित्त मंत्री)
  • सुब्रहमण्यम जयशंकर( विदेश मंत्री)
  • नितिन गडकरी ( रोड, ट्रांसपोर्ट मंत्री)
  • डीवी सदानंद गौड़ा ( केमिकल और फर्टिलाइजर  मंत्री)
  • रामविलास पासवान ( कंज्यूमर अफेयर)
  • नरेंद्र सिंह तोमर (कृषि मंत्री)
  • रवि शंकर प्रसाद( लॉ जस्टिस, टेलीकॉम मंत्री)
  • हरसिमरत कौर बादल( फूड प्रॉसेसिंग मंत्री)
  • थावरचंद गहलोत(  सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री)
  • रमेश पोखरियाल निशंक( मानव संसाधन विकास मंत्री)
  • अर्जुन मुंडा (ट्राइबल अफेयर्स)
  • स्मृति ईरानी (महिला एवं बाल विकास और कपड़ा)
  • डॉ. हर्षवर्धन ( स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, अर्थ साइंस)
  • प्रकाश जावडेकर (पर्यावरण, वन मंत्री, सूचना और प्रसारण मंत्री)
  • पीयूष गोयल( रेल और वाणिज्य मंत्री)
  • धर्मेंद्र प्रधान( पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, स्टील मंत्रालय)
  • मुख्तार अब्बास नकवी( अल्पसंख्यक मंत्रालय)
  • प्रह्लाद जोशी( संसदीय कार्यंमंत्री, कोयला और खान)
  • महेंद्र नाथ पांडे( कौशल विकास मंत्री)
  • अरविंद सावंत(भारी उद्योग और पब्लिक इंटरप्राइज)
  • गिरिराज सिंह( एनिमल हस्बैंड्री, डेयरी और फिशरीज)
  • गजेंद्र सिंह शेखावत( जलशक्ति मंत्रालय)

टूरिस्ट गाइड रऊफ ने जान देकर बचाई पाँच पर्यटकों की जान

श्रीनगर :  पहलगाम में पांच लोगों को बचाने के लिए अपनी जान गंवाने वाले 32 वर्षीय पर्यटक गाइड रऊफ अहमद डार दुुनिया को असली कश्मीरियत का मतलब सिखा गए। शुक्रवार शाम अनंतनाग जिले के प्रसिद्ध पहलगाम रिसॉर्ट में नौका पर सवार पांच पर्यटक लिद्दर नदी में गिर गए। इन्हें बचाने के लिए डार अपनी जान की परवाह किए बिना नदी में कूद गए। बचाव कार्य में उन्होंने पर्यटकों को तो बचा लिया पर तेज बहाव में खुद की जान गंवा दी। अधिकारियों के मुताबिकदक्षिण कश्मीर जिले में मावुरा के समीप राफ्टिंग पॉइंट पर अचानक हवाओं के तेज झोंके से पर्यटक  लिद्दर नदी में जा गिरे। नौका में तीन पर्यटक स्थानीय और पश्चिम बंगाल एक जोड़ा सवार था।
अधिकारियों ने प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बताया, ‘डार गाइड के रूप में पश्चिम बंगाल के जोड़े के साथ थे। नौका पलटते ही डार ने बिना देरी किए फौरन बचाव कार्य शुरू कर दिया और उन्हें बचा लिया लेकिन खुद तेज बहाव में बह गए।’ जानकारी मिलने पर बचाव कार्य शुरू हुआ और  शनिवार सुबह भवानी पुल के पास पर्यटक गाइड का शव मिला, जिसे परिवार को सौंप दिया गया।

बने सच्ची कश्मीरियत का प्रतीक

राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने अहमद डार को ‘रीयल लाइफ हीरो’ बताया और उनके परिवार को पांच लाख रुपये वित्तीय सहायता की घोषणा की है। राज्य उपायुक्त खालिद जहांगीर ने कहा कि डार ने सही मायनों में कश्मीरियत का प्रदर्शन किया, जो प्यार और भाईचारा सिखाती है।

उन्होंने डार के लिए बहादुरी पुरस्कार की सिफारिश की है। वहीं मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम के निर्देश पर चार लाख रुपये के बहादुरी पुरस्कार की स्वीकति दी गई है। उधर, पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी डार की बहादुरी की तारीफ कर उन्हें सलाम किया। भाजपा राज्य महासचिव अशोक कौल ने भी दुख जाहिर किया। प्रदेश कांग्रेस मुखिया जी ए मीर ने भी डार को सच्ची कश्मीरियत का प्रतीक बताया। पश्चिम बंगाल के पर्यटक जोड़े मनीष कुमार सराफ और श्वेता सराफ ने डार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि वे हमें दूसरी जिंदगी दे गए।

सभी ने डार की बहादुरी को किया सलाम

राज्य के पर्यटन प्रभारी और राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार खुर्शीद गनई ने डार की मौत पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि अपनी जान की परवाह किए बगैर डार ने लिद्दर नदी की तेज लहरों में पांच लोगों को डूबने से बचाया। यह किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान है। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शोक जताते हुए कहा कि इस बहादुर व्यक्ति डार को मेरा सलाम। उन्होंने पलटी हुई नौका से पर्यटकों को बचाया लेकिन अपनी जान गंवा दी। अल्लाह उन्हें जन्नत में आला मुकाम दे। प्रदेश कांग्रेस प्रमुख जीए मीर ने डार को सच्ची कश्मीरियत का प्रतीक बताया। भाजपा के प्रदेश महासचिव (संगठन) अशोक कौल ने डार की मौत पर दुख जताया और उसके परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं। कौल ने राज्यपाल प्रशासन से डार के परिवार को हरसंभव सहायता मुहैया कराने की अपील की। पूर्व मंत्री और पीपुल्स कांफ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन ने भी डार को श्रद्धांजलि दी। कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर बशीर खान ने भी शोक जताते हुए आश्रित परिवार के लिए तत्काल राहत के रूप में दो लाख की घोषणा की।

राज्यपाल ने रऊफ की बहादुरी को किया सलाम
राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने टूरिस्ट गाइड रऊफ अहमद डार की बहादुरी को सलाम किया। उन्होंने कहा कि रऊफ वास्तविक जीवन में नायक साबित हुआ। दूसरों के जीवन को बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया। राज्यपाल ने दिवंगत आत्मा की शांति और दुख की घड़ी में शोक संतप्त परिवार की शांति के लिए कामना की है। उन्होंने रऊफ के परिवार के लिए पांच लाख रुपये की वित्तीय सहायता देने की घोषणा की। मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रह्मण्यम के निर्देश पर डार के परिजनों को अनुग्रह राशि दी गई है